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सोमवार, 6 दिसम्बर 2021
 
 

चीन और भारत को जलवायु परिवर्तन के ख़तरे से जूझ रहे देशों को ख़ुद समझाना होगा: आलोक शर्मा

रविवार, 14 नवम्बर, 2021  आई बी टी एन खबर ब्यूरो
 
 
सीओपी26 शिखर सम्मेलन ख़त्म होने के बाद उसके अध्यक्ष आलोक शर्मा ने कहा है कि चीन और भारत को जलवायु परिवर्तन के ख़तरे से जूझ रहे देशों को ख़ुद समझाना होगा। उनका ये बयान ग्लासगो में हुए समझौते की भाषा बदलने के लिए इन दोनों देशों के जोर देने के बाद आया है।

भारत और चीन ने इस समझौते में कोयले के उपयोग को ''फेज आउट'' (ख़त्म) करने के बजाय ''फेज डाउन'' (कम करना) लिखने पर जोर दिया। हालांकि आलोक शर्मा ने जोर देकर कहा कि ये ''ऐतिहासिक समझौता'' 1.5 डिग्री तक की तापमान वृद्धि के लक्ष्य के अनुरूप है।

कोयले के उपयोग को कम करने की स्पष्ट योजना के साथ किया गया ये अब तक का पहला जलवायु समझौता है। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिहाज से कोयला सबसे ख़राब जीवाश्म ईंधन माना जाता है।

आलोक शर्मा ने कहा कि ग्लासगो जलवायु समझौते में बनी सहमति ''नाजुक जीत'' है। उन्होंने चीन और भारत से अनुरोध किया है कि वे जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील देशों के सामने बताएं कि उनके कदम कैसे ''उचित'' हैं।

बीबीसी वन के 'एंड्रयू मार शो' में उन्होंने कहा: "मैं सभी से अपील करने जा रहा हूं कि वे इस दिशा में और प्रयास करें। लेकिन कल उन्होंने जो किया उसके लिए चीन और भारत को ख़ुद जलवायु-संवेदनशील देशों को समझाना होगा।''

आलोक शर्मा ने कहा कि उनकी भूमिका अंतिम समझौते पर ''आम सहमति बनाने'' की थी। उन्होंने कहा, "हमने कल जो किया, उसे मैं विफलता नहीं कहूंगा। वो एक ऐतिहासिक उपलब्धि है।'' आज की दुनिया 19वीं सदी की तुलना में 1.2 डिग्री अधिक गर्म है।

सीओपी26 के मुख्य लक्ष्यों में से एक ये भी तय करना है कि 2100 तक पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री से अधिक न हो। शनिवार, 13 नवंबर 2021 को इस समझौते पर सहमति बनाने के लिए इस सम्मेलन को तय समय से अधिक देर तक चलाना पड़ा।

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली मलाला यूसुफ़ज़ई ने एंड्रयू मार शो में कहा कि ''नेताओं को मुनाफ़े पर इंसानों और पृथ्वी को ज़रूर तरजीह देनी चाहिए।''

उनकी संस्था 'मलाला फंड' की हाल की एक रिपोर्ट में बताया गया कि दुनिया के बढ़ रहे तापमान के चलते 2021 में क़रीब 40 लाख लड़कियां शिक्षा से वंचित रह जाएंगी। इस रिपोर्ट के अनुसार, निम्न और निम्न-मध्य आय वाले देशों की इन लड़कियों को बाढ़ और सूखे जैसी रोकी जा सकने वाली प्राकृतिक आपदाएं स्कूल जाने से रोकती हैं।
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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