अर्थव्यवस्था

राहुल गांधी ने कहा, वो और उनकी पार्टी अदानी की आलोचना क्यों करती है?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार, 8 सितम्बर 2023 को ब्रसेल्स में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वो और उनकी पार्टी अदानी की आलोचना क्यों करती है।

राहुल गांधी ने कहा, "हमें निजी या सरकारी सेक्टर से कोई समस्या नहीं है । हमें इस बात से दिक्कत होती है जब एक-दो लोग पूरे देश को वित्तीय तौर पर नियंत्रित करने लगते हैं।''

इसके साथ ही राहुल गांधी ने भारत में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर एमएसएमई सेक्टर को निशाना बनाने का आरोप लगाया है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी इन दिनों यूरोप दौरे पर हैं जिसमें वह नीदरलैंड, बेल्जियम और फ्रांस जैसे कई देश पहुंच रहे हैं।

इसी सिलसिले में राहुल गांधी ने शुक्रवार, 8 सितम्बर 2023 को बेल्जियम  राजधानी ब्रसेल्स में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिया।

राहुल गांधी की पार्टी कांग्रेस और वह स्वयं अदानी समूह और उसकी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कथित करीबी रिश्तों की आलोचना करती रही है।

राहुल गांधी ने कहा, "अदानी जी से हमारी दिक्कत ये है कि वह बंदरगाहों, हवाई अड्डों, कृषि, अनाज गोदामों, रियल इस्टेट और सीमेंट बिज़नेस को नियंत्रित करते हैं। यह भारत के लिए ठीक नहीं है।''

राहुल गांधी ने कहा, "सरकारी नीतियों ने एक व्यवस्थित ढंग से हमारे रोजगार तंत्र की रीढ़ की हड्डी कहे जाने वाली एमएसएमई सेक्टर को निशाना बनाया है। अदानी जी से हमारी समस्या ये है कि वह बंदरगाहों, हवाई अड्डों, कृषि, अनाज गोदामों, रियल इस्टेट और सीमेंट बिज़नेस को नियंत्रित करते हैं।''

राहुल गांधी ने कहा, ''यह भारत के लिए फायदेमंद नहीं है। एक तरफ तो बीजेपी एकाधिकारवादी मॉडल को बढ़ावा दे रही है। वहीं, दूसरी तरफ़ नौकरियां पैदा करने वाले एमएसएमई सेक्टर को तबाह कर रही है। इसकी वजह से एक रोज़गार संकट खड़ा हो रहा है।''

कांग्रेस पार्टी पिछले काफ़ी समय से अदानी समूह के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों की संसद में जेपीसी बनाकर जांच करने की मांग कर रही है।

हालांकि, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से इन आरोपों पर खुलकर बात नहीं की गयी है।

अमित शाह ने केंद्रीय पंजीयक-सहारा रिफंड पोर्टल लॉन्च किया

भारत के केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने मंगलवार, 18 जुलाई 2023 को 'केंद्रीय पंजीयक-सहारा रिफंड पोर्टल' लॉन्च किया।

इसका लक्ष्य सहारा ग्रुप की चार कॉपरेटिव सोसाइटीज में जमा करोड़ों लोगों की राशि का रिफंड करना है।

अमित शाह ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताते हुए कहा कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब जमाकर्ता ऐसे मामले में रिफंड हासिल करेंगे जिसमें कई एजेंसियां शामिल है और इन सभी ने मामले में जब्तियां की हैं।

अमित शाह ने जमाकर्ताओं को आश्वासन दिया कि अब उनका पैसा कोई रोक नहीं सकता है और उन्हें पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन के 45 दिन के भीतर रिफंड मिलेगा।

उन्होंने कहा कि इसकी वजह से लोगों में कॉपरेटिव सोसाइटीज के प्रति असुरक्षा की भावना बनी है। अमित शाह ने कहा कि इसमें सभी स्टेक होल्डर्स को बुलाकर बातचीत की गई।

इस पर विचार करने के लिए सेबी, ईडी, आयकर विभाग, सीबीआई, लॉ अधिकारी समेत सभी स्टेक होल्डर्स को बुलाकर ये फैसला किया।

पीआईबी की ओर से जारी प्रेस रिलीज़ में बताया गया कि सहारा समूह की सहकारी समितियों के जमाकर्ताओं की वैध जमा धनराशि के भुगतान संबंधी शिकायतों के समाधान के लिए सहकारिता मंत्रालय के आवेदन पर, सुप्रीम कोर्ट ने 29 मार्च 2023 को एक आदेश दिया था।

इसके तहत सहारा समूह की सहकारी समितियों के वास्तविक जमाकर्ताओं के वैध देयों के भुगतान के लिए "सहारा-सेबी रिफंड खाते" से 5000 करोड़ रुपये सहकारी समितियों के केंद्रीय रजिस्ट्रार (CRCS) को हस्तांतरित किए जाने का आदेश दिया।

अमित शाह ने कहा, ''इसकी शुरुआत 5000 करोड़ रुपये के साथ हुई है और जब 5000 करोड़ रुपया निवेशकों का वापस हो जाएगा तो हम फिर सुप्रीम कोर्ट के पास जाएंगे और बताएंगे कि अब इतने निवेशकर्ता बचे हैं।''

उन्होंने कहा कि एक करोड़ निवेशकों को ट्रायल बेस पर 10 हजार रुपये तक की राशि का रिफंड किया जाएगा।

क्या सऊदी अरब का तेल उत्पादन पर दिया बयान अमेरिका के लिए झटका है?

सऊदी अरब के विदेश मंत्री ने कहा है कि तेल उत्पादन पर लिया गया निर्णय ओपेक प्लस देशों के बीच आम सहमति को दिखाता है और सऊदी अरब का मानना है कि साल 2023 में तेल उत्पादन न बढ़ाने की उसकी मौजूदा नीति सही है।

ये बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस पर प्रतिबंध लगाने के बाद अमेरिका का सऊदी अरब पर तेल उत्पादन बढ़ाने के लिए दबाव रहा है।

साल 2022 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने तेल उत्पादन बढ़ाने पर मोहम्मद बिन सलमान को राज़ी करने के लिए सऊदी अरब का दौरा भी किया था। हालांकि, इसका असर ज़्यादा दिन नहीं रहा और सऊदी अरब ने तेल उत्पादन नहीं बढ़ाया।

यूक्रेन युद्ध के बाद बाइडन प्रशासन ने जी-7 के देशों के साथ रूस के तेल पर प्राइस कैप भी लगाया है ताकि तेल निर्यात से होने वाली उसकी आमदनी घटाई जा सके। ओपेक प्लस देशों के उत्पादन न बढ़ाने से रूस को आमदनी ज़्यादा होगी।

तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक प्लस का नेतृत्व रूस करता है। वहीं, ओपेक देशों में सऊदी अरब का दबदबा है। सऊदी पर आरोप लगता आया है कि वो तेल उत्पादन के मामले में रूस की लाइन पर है।

सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान ने लंदन में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा, "हम हमेशा कहते आए हैं कि हम एक स्थिर बाज़ार को लेकर प्रतिबद्ध हैं। हमें लगता है कि बाज़ार को साल 2023 के आख़िर तक उत्पादन में किसी बदलाव की ज़रूरत नहीं है।''

उन्होंने ये भी कहा कि "ओपेक और ओपेक प्लस देशों के बीच सभी फ़ैसले सभी सहयोगियों के साथ काफ़ी विचार-विमर्श के बाद लिए जाते हैं। ओपेक प्लस देशों की ओर से ऑन रिकॉर्ड दिए गए सभी बयान एक आम सहमति को दिखाते हैं।''

भारत में फ़ेक ऑनलाइन रिव्यूज़ पर रोकथाम के लिए सरकार ने नियम बनाए

भारत में ई-कॉमर्स कारोबार से जुड़ी अमेज़न और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों को अब अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद सभी प्रोडक्ट्स और सेवाओं के पेड कंज़्यूमर रिव्यूज़ के बारे में जानकारी सार्वजनिक करनी होगी।

सरकार ने फेक रिव्यूज़ पर रोकथाम और सही जानकारी के आधार उचित फ़ैसला लेने में ग्राहकों को मदद देने के लिए नए नियमों का ऐलान किया है।

इसके अलावा सरकार ने उन रिव्यूज़ के प्रकाशन पर भी रोक लगा दी है जिनके लिए भुगतान किया गया है या फिर उसे ऐसे लोगों ने लिखा है जो इसी काम के लिए सप्लायर द्वारा या फिर तीसरे पक्ष द्वारा नियुक्त किया गया है।

ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स (बीआईएस) के ये नियम संबंधित पक्षों से बातचीत के बाद तैयार किए गए हैं और ये 25 नवंबर 2022 से लागू हो जाएंगे। इन नियमों का पालन फिलहाल स्वैच्छिक रखा गया है लेकिन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर फ़ेक रिव्यूज़ की परेशानी जारी रही तो सरकार इसे अनिवार्य बनाने पर विचार करेगी।

उपभोक्ता मामलों के विभाग के सचिव रोहित कुमार सिंह ने सोमवार, 21 नवम्बर 2022 को बताया कि बीआईएस के ये नियम उन सभी संगठनों पर लागू होंगे जो ऑनलाइन कंज्यूमर रिव्यूज़ प्रकाशित करते हैं।

इनमें प्रोडक्ट और सर्विस मुहैया कराने वाले सप्लायर्स, अपने ग्राहकों से रिव्यू इकट्ठा कराने वाली कंपनी या फिर कोई तीसरी पार्टी जिसे ये जिम्मा दिया गया है, शामिल हैं।

रोहित कुमार सिंह ने बताया कि बीआईएस इसके लिए अगले 15 दिनों में सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू करेगी जिससे ग्राहक ये जान पाएंगे कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स इन नियमों का पालन कर रही है या नहीं। ई-कॉमर्स कंपनी बीआईएस के पास इसके लिए सर्टिफिकेशन का आवेदन दे सकती हैं।

अमेरिका नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन को तबाह करना चाहता है: रूस

रूस के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि अमेरिका और नेटो नॉर्ड स्ट्रीम एक और दो पाइपलाइन को नष्ट करने की मंशा रखते हैं।

रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाखारोवा ने कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कनाडाई विदेश मंत्री मेलानी जॉली के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस में जो कुछ भी कहा उससे अमेरिकी मंशा स्पष्ट हो गई है।

टेलिग्राम पर मारिया ने कहा कि ब्लिंकन बिना हिचक के कह रहे हैं कि अमेरिका और नेटो नॉर्ड स्ट्रीम एक और दो गैस पाइपलाइन को तबाह करने की मंशा रखते हैं।

मारिया ने टेलिग्राम पर लिखा है, ''ब्लिंकन ने कहा कि पाइपलाइन से यूरोप में गैस नहीं जा रही है। नॉर्ड स्ट्रीम दो को यूरोप में गैस भेजने के लिए अनुमति नहीं है। नॉर्ड स्ट्रीम एक को रूस ने एक हफ़्ते पहले ही रोक दिया था। ब्लिंकन ने कहा कि रूस ऊर्जा ज़रूरतों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।''

रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा, ''रूस ने कभी ऊर्जा को हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया। अभी रूस और पहले सोवियत संघ यूरोप को गैस देते रहे हैं। इसमें कभी कोई रुकावट नहीं आई। पिछले 50 सालों से इस मुद्दे पर अमेरिका झूठ बोलता रहा है।''

नॉर्ड स्ट्रीम एजी कंपनी ने कहा है कि 26 सितंबर 2022 को पाइपलाइन को ज़्यादा नुक़सान पहुँचाया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन के पास दो धमाके हुए थे। डेनिश न्यूज़ एजेंसी ने कहा था कि बड़ी मात्रा में गैस समंदर में लीक हुई है। इसके आसपास के इलाक़ों में शिप की आवाजाही रोक दी गई है।

नॉर्ड स्ट्रीम दो क़रीब 1,200 किलोमीटर लंबी यह गैस पाइपलाइन परियोजना बाल्टिक सागर से होकर पश्चिमी रूस से उत्तर-पूर्वी जर्मनी तक जाती है।

इस परियोजना के ज़रिए रूस से जर्मनी जाने वाली प्राकृतिक गैस की सप्लाई को दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया। वर्तमान में रूस से जर्मनी जाने वाली गैस 'नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन' होकर जाती है, जिसे 2012 में बनाया गया था।

यदि यह परियोजना सफल हो जाएगी, तो इस पाइपलाइन से जर्मनी को हर साल 55 अरब घन मीटर गैस की सप्लाई हो सकेगी। इस परियोजना की मालिक रूस की सरकारी गैस कंपनी 'गज़प्रोम' है। लेकिन अब सब अधर में लटक गया है और जर्मनी दूसरे विकल्प की तलाश में है।

भारत में प्राकृतिक गैस की कीमत 40 फीसदी बढ़ोतरी के साथ रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची

भारत में प्राकृतिक गैस की कीमत 40 फीसदी बढ़ोतरी के साथ रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं।

प्राकृतिक गैस को ही सीएनजी और पीएनजी में बदला जाता है। गैस के दाम बढ़ने का सीधा असर ट्रांसपोर्ट और रसोई खर्च पर पड़ेगा। प्राकृतिक गैस से फर्टिलाइजर, बिजली बनाने जैसे काम भी किए जाते हैं।

भारत के तेल मंत्रालय के एक आदेश के अनुसार पुराने क्षेत्रों से उत्पादित गैस के लिए भुगतान की दर जो पहले 6.1 अमेरिकी डॉलर थी, उसे बढ़ाकर 8.57 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट कर दिया गया है।

इसके साथ ही रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और उसकी सहयोगी कंपनियों के लिए भी गैस की कीमतों को 9.92 अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर 12.6 अमेरिकी डॉलर प्रति एमएमबीटीयू कर दिया है।

अप्रैल 2019 के बाद से प्राकृतिक गैस की दरों में ये तीसरी बढ़ोतरी है।

दरों में यह तीसरी वृद्धि होगी और बेंचमार्क अंतरराष्ट्रीय कीमतों में मजबूती के कारण आई है।

एसबीआई ने भारत का आर्थिक विकास दर का अनुमान घटाया

भारतीय स्टेट बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री ने 2022-23 वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर का अनुमान 7.5 प्रतिशत से घटाकर 6.8 प्रतिशत कर दिया है। इसकी वजह पहली तिमाही में विकास दर का अनुमान से कम रहना बताया गया है।

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, एसबीआई ग्रुप के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष ने हालांकि 2022-23 वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में विकास दर के बढ़ने का अनुमान लगाया गया है।

इससे पहले बुधवार, 31 अगस्त, 2022 को जारी आंकड़ों में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) ने बताया था कि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के कमज़ोर प्रदर्शन के चलते वित्त वर्ष 2022-23 की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 13.5 प्रतिशत रही। अप्रैल 2022 से जून 2022 के बीच इस सेक्टर की विकास दर केवल 4.8 प्रतिशत ही रही।

सौम्य कांति घोष ने अपने पहले के अनुमान में बताया था कि पहली तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था 15.7 प्रतिशत की गति से विकास करेगी। भारतीय रिज़र्व बैंक ने तो सबसे अधिक 16.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया था।

सौम्य कांति घोष ने कहा है कि जीडीपी के आंकड़े तथ्यों को सामने लाने से ज़्यादा छिपाते हैं। उन्होंने औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई} के आकलन के लिए सर्वेक्षण में शामिल वस्तुओं के समूह की समीक्षा करने की मांग की है।

इससे पहले इसकी समीक्षा 10 साल पहले 2012 में हुई थी। घोष के अनुसार, जीडीपी में हालांकि दहाई अंक में वृद्धि हुई है लेकिन यह बाज़ार की उम्मीदों से कम है। इसका कारण उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की सुस्ती को बताया है।

विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी की ज़ब्त संपत्ति का 9371 करोड़ रुपए बैंको को दिया गया: ईडी

भारत के प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी (डायरेक्टोरेट ऑफ एन्फ़ोर्समेंट) ने फ़रार कारोबारी विजय माल्या, मेहुल चोकसी और नीरव मोदी की ज़ब्त की गई संपत्ति में से 9371.17 करोड़ रुपए सरकारी बैंकों को ट्रांसफर कर दिया है।

जाँच एजेंसियों का कहना है कि इन कारोबारियों की वित्तीय धोखाधड़ी के कारण बैंकों को भारी नुक़सान हुआ है। ईडी ने इन कारोबारियों की कुल 18,170.02 करोड़ रुपए की क़ीमत की संपत्ति को अटैच किया है।

ईडी की तरफ़ से जारी बयान में कहा गया है, "ईडी ने न केवल 18,170.02 करोड़ रुपए की संपत्ति ज़ब्त की है बल्कि विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी मामले में पीएमएलए के तहत 9371.17 करोड़ रुपए सरकारी बैंकों और केंद्र सरकार को दे दिया गया है।"

ईडी का कहना है कि तीनों कारोबारियों की जितनी संपत्ति ज़ब्त की गई है वो बैंकों के नुक़सान का 80.45 फ़ीसदी है।

भारत तीन फ़रार कारोबारियों को विदेशों से वापस लाने की कोशिश कर रहा है। विजय माल्या और नीरव मोदी ब्रिटेन में हैं। फ़रवरी 2021 में ब्रिटेन की गृह मंत्री प्रीति पटेल ने नीरव मोदी को भारत भेजने के आदेश पर हस्ताक्षर किया था।

उसी तरह विजय माल्या को वापस लाने के लिए भी ब्रिटेन में क़ानूनी प्रक्रिया चल रही है। विजय माल्या पर 9,000 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है।

चीन और ईरान के बीच आर्थिक सहयोग योजना वैश्विक आर्थिक प्रणाली में 'गेम चेंजर' साबित होगा

चीन और ईरान के बीच 25 साल के लिए 400 अरब डॉलर की व्यापक आर्थिक सहयोग योजना पर अमरीका की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि यह क़दम सिर्फ़ क्षेत्र के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक प्रणाली में एक महत्वपूर्ण 'गेम चेंजर' साबित होगा।

पाकिस्तान में इस बात को लेकर बेचैनी है कि अब चीन ईरान का रुख़ कर रहा है। लेकिन इस मुद्दे पर गहरी नज़र रखने वाले पाकिस्तान के राजनयिकों और विश्लेषकों ने स्पष्ट रूप से इस संदेह को ख़ारिज कर दिया है।

उनका कहना है कि हालिया चीन और ईरान का आर्थिक सहयोग समझौता, चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) का विकल्प नहीं बनेगा, बल्कि इसे मज़बूत करेगा।

ईरान की मजबूरी और चीन की ज़रूरत

विशेषज्ञों के अनुसार, तेहरान ने चीन के साथ दीर्घकालिक आर्थिक, इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण और सुरक्षा के मुद्दों पर सहयोग करके ख़ुद को नई वैश्विक स्थिति के लिए एक शक्तिशाली देश बनाने की कोशिश की है।

लेकिन ऐसा करने पर, जहां एक तरफ़ ईरान को अमरीका के नए प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है, वहीं दूसरी तरफ़ यह समझौता उसे अमरीका के निरंतर प्रतिबंधों से बचा भी सकता है।

ईरान पर लंबे समय से चल रहे अमरीकी प्रतिबंधों ने ही उसे चीन के इतने क़रीब पहुंचा दिया है। यही वजह है कि ईरान वैश्विक दरों के मुक़ाबले कम क़ीमत पर चीन को तेल बेचने के लिए तैयार हो गया है। ताकि उसके तेल की बिक्री बिना किसी रुकावट के जारी रह सके और राष्ट्रीय ख़ज़ाने को एक विश्वसनीय आय का स्रोत मिल सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि समझौते के दस्तावेज़ तो अभी सामने नहीं आये हैं। लेकिन जो सूचनाएं मिली हैं, उनसे पता चलता है कि ईरान की नाज़ुक अर्थव्यवस्था में अगले 25 वर्षों में 400 अरब डॉलर की परियोजनाएँ आर्थिक स्थिरता लाने में मदद कर सकती हैं।

इसके बदले में, चीन रियायती दरों पर ईरान से तेल, गैस और पेट्रो-कैमिकल उत्पाद ख़रीद सकेगा। इसके अलावा, चीन, ईरान के वित्तीय, परिवहन और दूरसंचार क्षेत्रों में भी निवेश करेगा।

इस समझौते के तहत, ईरान के इतिहास में पहली बार, दोनों देश संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास, हथियारों का आधुनिकीकरण और संयुक्त इंटेलिजेंस से राज्य, सुरक्षा और सैन्य मामलों में सहयोग करेंगे।

दोनों देशों के बीच हुए समझौते के अनुसार, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के पाँच हज़ार सैनिकों को भी ईरान में तैनात किया जाएगा। लेकिन ध्यान रहे कि ईरान में इसे लेकर विरोध भी हो रहा है, जिसमें ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद सबसे आगे हैं।

यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि शायद ईरान, चीन की नई डिजिटल मुद्रा, ई-आरएमबी को अपनाने के लिए आदर्श उम्मीदवार साबित हो सकता है, जिसने डॉलर को नज़रअंदाज़ करने और इसे मंज़ूरी देने वाली ताक़त को कमज़ोर किया है।

याद रहे कि ईरान वर्तमान में वैश्विक वित्तीय और बैंकिंग प्रणाली स्विफ्ट (SWIFT) से नहीं जुड़ा है और ईरान के साथ कोई लेनदेन नहीं कर रहा है।

सीपीईसी - प्लस

पाकिस्तान-चीन संस्थान के अध्यक्ष सीनेटर मुशाहिद हुसैन सैयद के अनुसार, ईरान-चीन रणनीतिक समझौता क्षेत्र के लिए एक अच्छा क़दम है और पाकिस्तान के हितों के लिए सकारात्मक भी है, क्योंकि यह पाकिस्तान पर केंद्रित, क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को मजबूत करेगा।

मुशाहिद हुसैन ने उम्मीद जताई है कि बलूचिस्तान में स्थिरता लाने और चीन, अफगानिस्तान, ईरान तथा मध्य एशियाई देशों के साथ क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने में, ग्वादर पोर्ट की भूमिका को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

उन्होंने आगे कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि अमरीकी दबाव के कारण (जब 25 जनवरी, 2006 को डेविड मलफोर्ड भारत में अमेरिकी राजदूत थे) भारत ने आईपीआई (ईरान-पाकिस्तान-इंडिया पाइपलाइन) का नवीनीकरण नहीं किया। इसके बजाय अमरीका के साथ परमाणु समझौते का चुनाव किया। भारत ने तत्कालीन मंत्री मणिशंकर अय्यर को हटा दिया था जो आईपीआई के समर्थक थे।

पाकिस्तान में सीपीईसी के बारे में बेचैनी को खारिज करते हुए, मुशाहिद हुसैन ने कहा कि ईरान-चीन समझौता सीपीईसी को और अधिक सार्थक बना देगा। क्योंकि ये दोनों समझौते प्रतिस्पर्धा या प्रतिद्वंद्विता के लिए नहीं हैं, बल्कि दोनों का मक़सद चीन के साथ रणनीतिक सहयोग है।

'विश्व शक्ति से मुक़ाबला करने की तैयारी'

भारत के मशहूर रक्षा विश्लेषक प्रवीण साहनी कहते हैं, ''मुझे लगता है कि इस समझौते को फारस की खाड़ी में क्षेत्रीय तनाव के संदर्भ में देखना गलत होगा। चीन ने हमेशा ईरान-सऊदी प्रतिद्वंद्विता में किसी का भी समर्थन या विरोध करने से परहेज किया है। फारस की खाड़ी में चीन की बढ़ती उपस्थिति का मुख्य कारण उसके आर्थिक मामले हैं।''

वह कहते हैं कि चीन और सऊदी अरब ने भी एक साल पहले बड़े आर्थिक सौदों पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन ईरान के साथ चीन के इस नए समझौते से एक और महत्वपूर्ण बात पता चलती है। वो यह है कि अमरीकी प्रतिबंधों ने तेहरान को अकेला करने के बजाय, इसे चीन के कैम्प में और भी मज़बूती से आगे बढ़ाया है। इसलिए इस समझौते का महत्व न केवल क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह विश्व शक्ति से मुक़ाबले की भी तैयारी दिखाई देती है।

प्रवीण साहनी कहते हैं, ''समझौते का ज़्यादा विवरण फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इसकी तुलना सीपीईसी से नहीं की जा सकती है। फिर भी, बड़ा अंतर यह है कि इसमें दोनों पक्षों के बुनियादी हित जुड़े हुए हैं। चीन को तेल की ज़रूरत है, जो उसे ईरान से सस्ती दरों पर मिलेगा।''

प्रवीण साहनी कहते हैं, ''बदले में, ईरान अपने आर्थिक, तेल के उत्पादन, बुनियादी ढांचे और व्यापार में निवेश कराना चाहता है, जो चीन मुहैया करेगा। चीन-ईरान संबंधों में आर्थिक सहयोग है, जो चीन और पाकिस्तान के मामले में नहीं है। यह फ़र्क़ किस तरह की भूमिका निभाएगा, फिलहाल इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।''

उनके अनुसार, ''ईरान के पास ऐसे संसाधन हैं जिनकी चीन को सख्त जरूरत है, यानी हाइड्रोकार्बन। पाकिस्तान के पास ऐसी कोई दौलत नहीं है। इसलिए, आर्थिक मामलों के लिहाज़ से, पाकिस्तान और चीन के संबंध चीन और ईरान के संबंधों से बहुत अलग हैं।''

प्रवीण साहनी के मुताबिक, हालांकि इस बात पर बहुत चर्चा हुई है कि पाकिस्तान, ईरान, मध्य एशिया पर आधारित गलियारे से क्षेत्र में आर्थिक विकास और सुधार होगा या नही।

प्रवीण साहनी कहते हैं, ''यह एक दीर्घकालिक योजना तो हो सकती है, लेकिन छोटी अवधि में इसके फायदे की कोई संभावना नहीं है। ईरान और पाकिस्तान उन औद्योगिक उत्पादों का निर्माण नहीं करते हैं, जिन्हे मध्य एशियाई देश आयात करते हैं और न ही पाकिस्तान और ईरान मध्य एशियाई निर्यात के लिए प्रमुख बाजार हैं।''

उन्होंने कहा कि चीन से लेकर मध्य एशिया के साथ-साथ यूरोप तक ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर है जिसकी वजह से वहां सड़कों और रेलवे का नेटवर्क बिछा हुआ है। वो कहते हैं कि ''यह देखना मुश्किल है कि चीन के नए रास्ते पाकिस्तान और ईरान, इन पुराने रास्तों का विकल्प कैसे बन सकेंगे।''

प्रवीण ने आगे कहा कि ईरान के चाबहार बंदरगाह के निर्माण की परियोजना भारत ने शुरू की थी क्योंकि भारत को अफ़ग़ानिस्तान के खनिज संसाधनों का उपयोग करना था और उन्हें ईरान की औद्योगिक क्षमता के उपयोग से अधिक बेहतर बनाना था।

जाहिर है यह सब अफ़ग़ानिस्तान में ज़मीनी हालात को देखते हुए, 'दूर के ढोल सुहावने' की तरह था। अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी नहीं है कि भारत, ईरान के माध्यम से भारत-अफ़ग़ानिस्तान व्यापार गलियारे के लिए एक बड़ी सड़क या रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करे।

उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान ने फारस की खाड़ी में ईरान-सऊदी टकराव से दूर रहने की भरसक कोशिश की है और ऐसा ही भारत ने भी किया है।

प्रवीण कहते हैं, ''इस टकराव में दोनों पक्षों के आर्थिक हित हैं, लेकिन साथ ही, इस टकराव से संबंधित आंतरिक मुद्दे भी हैं। इसलिए समय के साथ-साथ सभी पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखना अधिक कठिन होता जा रहा है। खासतौर पर तब, जब अमरीका अगले कुछ वर्षों में यह तय करेगा कि उसे ईरान पर और दबाव बढ़ाने की जरूरत है। मुझे नहीं लगता कि यथार्थवादी संतुलन बनाए रखने के अलावा कोई और विकल्प है।''

'अमरीका ने पाकिस्तान और ईरान को चीन की तरफ़ धकेल दिया'

पाकिस्तान के पूर्व राजदूत और लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज में कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर इक़बाल अहमद ख़ान का कहना है, कि ईरान के साथ चीन की निवेश योजना उसकी आठ खरब डॉलर की बीआरआई परियोजनाओं का हिस्सा है, जिनमें से एक सीपीईसी भी है।

पूर्व राजदूत इक़बाल अहमद ख़ान के अनुसार, ईरान में चीन के निवेश की, सीपीईसी से तुलना करना सही नहीं है। क्योंकि ये दोनों चीन के ही निवेश हैं और दोनों एक-दूसरे के लिए सहायक होंगे और इसका फायदा तीनों देशों को होगा।

वो कहते हैं, ''चीन और ईरान दोनों पाकिस्तान के दोस्त हैं, इसलिए पाकिस्तान चाहता है कि परियोजना सफल हो।''

इक़बाल अहमद ख़ान ने आगे कहा कि ईरान में चीन का निवेश पाकिस्तान की कीमत पर नहीं है, इसलिए इसे ''शून्य-सम गेम'' नहीं समझना चाहिए।

इस सवाल पर कि क्या पाकिस्तान और चीन, ईरान पर अमरीकी प्रतिबंधों का बोझ उठा पाएंगे। इक़बाल अहमद ख़ान ने कहा कि वास्तव में पाकिस्तान और ईरान में चीन के निवेश का मुख्य कारण, अमरीका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध या इन देशों को नज़रअंदाज़ करने की कोशिशें हैं।

वो कहते हैं, ''पाकिस्तान और ईरान दोनों को ही अमरीका ने दरकिनार कर दिया है, जिससे हमें दूसरा रास्ता देखना पड़ा। पाकिस्तान ने अपनी राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति का अधिकतम लाभ उठाने का फैसला किया। एक तरफ चीन है और दूसरी तरफ ईरान है। हालांकि, अगर पाकिस्तान चीन का दोस्त है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान अमरीका का विरोधी है, बल्कि चीन तो पाकिस्तान से कई बार अमरीका और भारत दोनों से अपने संबंधों को सुधारने के लिए कह चुका है। हालांकि अमरीका को भी इसका एहसास होना चाहिए।''

इक़बाल अहमद ख़ान ने कहा कि पाकिस्तान ख़ुशी से ईरान के साथ सहयोग करेगा, बल्कि पाकिस्तान ईरान को भी उसकी तरह शंघाई सहयोग परिषद का सदस्य बनाने की कोशिश करेगा।

वो कहते हैं, ''ईरान के साथ चीन के सहयोग से पाकिस्तान को सीधे लाभ होगा। ईरान से तेल, जो वर्तमान में 13 हज़ार मील की दूरी तय करने के बाद चीन पहुंचता है। वह पाकिस्तान के रास्ते 15 सौ मील के सुरक्षित मार्ग से चीन पहुंचेगा।''

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान, ईरान, तुर्की और अन्य एशियाई देशों में चीन के निवेश और आर्थिक व व्यापारिक इंफ्रास्ट्रक्चर में, इसके निवेश अटलांटिक महासागर से हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के क्षेत्रों में, दुनिया की शक्ति को स्थानांतरित करने के ठोस संकेत हैं।

वैश्विक परिवर्तन की इस प्रक्रिया में पाकिस्तान और ईरान की महत्वपूर्ण भूमिका हैं। बदलाव की इस प्रक्रिया में अमरीकी प्रतिबंध की भी भूमिका है, जो इन देशों को दूसरी तरफ धकेल रही हैं।''

'ईरान समझौता और सीपीईसी स्वाभाविक साझेदार हैं'

इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रेटेजिक स्टडीज़ इस्लामाबाद में वैश्विक मामलों की विशेषज्ञ फातिमा रज़ा का कहना है, कि हालांकि दोनों परियोजनाओं में ऊर्जा और बुनियादी ढांचे की विशेषताएं समान हैं, लेकिन इसमें शामिल पक्षों के हित कई मायनों में अलग हैं।

हालांकि फातिमा रज़ा ने कहा कि चीन-ईरान समझौता दोनों देशों के बीच एक स्वाभाविक साझेदारी का समझौता है, जो सीपीईसी की संभावनाओं को भी आगे बढ़ा सकता है।

फातिमा रज़ा ने आगे कहा कि प्रत्येक पार्टी के लिए, दोनों की तुलना करना एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है। ''ये दोनों परियोजनाएं पाकिस्तान को सफल होने के लिए असाधारण अवसर प्रदान करती हैं, क्योंकि यह ईरानी तेल को चीन पहुंचाने के लिए प्राकृतिक मार्ग बन जाता है।''

फातिमा रज़ा ने कहा, ''चीन के लिए, इसका मतलब सीपीईसी जैसी परियोजना है, जो क्षेत्र में अपने विस्तार के प्रभाव को मजबूत करना चाहता है, जो इस क्षेत्र में अमरीकी हितों के लिए परेशानी खड़ी करेगा।''

फातिमा रज़ा का कहना है कि यह समझौता ईरान को उसकी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा, जिसकी उसे बहुत अधिक ज़रुरत है।

फातिमा रज़ा ने कहा, ''दोनों सौदे प्रतिस्पर्धी होने के बजाय अपनी प्रकृति में एक दूसरे को मजबूत करते हैं, लेकिन इसकी सफलता अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने वाले दलों पर निर्भर करती है।''

'खाड़ी और क्षेत्र के समग्र भौगोलिक-राजनीतिक संतुलन पर प्रभाव'

अरब न्यूज़ के एक विश्लेषक, ओसामा अल-शरीफ ने लिखा है, कि चीन और ईरान के बीच 25 साल के व्यापक रणनीतिक साझेदारी के समझौते का, खाड़ी और क्षेत्र के समग्र भोगौलिक-राजनीतिक संतुलन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।

इस समझौते पर ऐसे समय में हस्ताक्षर किए गए हैं, जब बीजिंग और वाशिंगटन के बीच संबंध बहुत तनावपूर्ण हैं।

इस समझौते ने ईरान के परमाणु समझौते पर पश्चिम की तरफ से, इस पर दोबारा बातचीत और इसके विस्तार के प्रयासों पर तेहरान को एक मजबूत स्थिति प्रदान की है।

ओसामा अल-शरीफ के अनुसार, ये समझौता चीन को ईरानी धरती पर 5 हज़ार सुरक्षा और सैन्य कर्मियों को तैनात करने का अवसर प्रदान करेगा, जो क्षेत्रीय गेम चेंजर साबित होगा।

चीन से पहले, तेहरान ने 2001 में मास्को के साथ विशेष रूप से परमाणु क्षेत्र में, 10 साल के सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो तब से दो बार बढ़ाया जा चुका है।

उन्होंने लिखा कि दो साल पहले ईरान, रूस और चीन के साथ नौसेना अभ्यास में शामिल हुआ था। इस नए समझौते से चीन को खाड़ी क्षेत्र में और साथ ही मध्य एशिया में भी अपने अड्डे स्थापित करने का मौक़ा मिलेगा।

बदले में, ईरान को चीन की टेक्नोलॉजी मिलेगी और उसके खराब बुनियादी ढांचे में निवेश होगा।

चीनी सरकार वर्षों से अन्य खाड़ी देशों के साथ अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत कर रही है।

बीजिंग ने संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत के साथ सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं और उनके सऊदी अरब के साथ अच्छे संबंध हैं।

ओसामा अल-शरीफ ने लिखा, ''नए समझौते से खाड़ी के अरब देशों की राजधानियों में खतरे की भावना बढ़ जाएगी। क्योंकि ये देश ईरान को अस्थिरता के एक प्रमुख स्रोत के रूप में देखते हैं और बीजिंग के साथ इसका गठबंधन तेहरान और क्यूम के बीच की रेखा को और मजबूत करेगा।''

ओसामा अल-शरीफ के अनुसार, इसके अलावा इस्राइल भी चीन के कदम को लेकर असहज महसूस करेगा। ईरान के परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले रूस और चीन दोनों ने, तेहरान के पक्ष को सपोर्ट किया और अमरीकी प्रतिबंधों का खुले तौर पर उल्लंघन किया है।

अमरीका और चीन के बीच तनाव बढ़ा

विश्व समाजवादी संगठन के एक विश्लेषक एलेक्स लांटियर लिखते हैं कि ईरान-चीन समझौते की शर्तों का खुलासा नहीं किया गया है। लेकिन ये हस्ताक्षर ऐसे समय में हुए, जब अमरीका ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को उठाने से इनकार कर दिया। साथ ही साथ चीन और अमरीका के अलास्का में होने वाले सम्मेलन में चीन और अमरीका के मतभेद खुलकर सामने आए।

इस शिखर सम्मेलन के शुरू होने से पहले प्रेस से बात करते हुए, अमरीकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकन ने कहा कि चीन को वाशिंगटन के ''नियम पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय आदेश'' को स्वीकार करना चाहिए वरना उसे ''इससे कहीं अधिक कठोर और अस्थिर दुनिया का सामना करना पड़ेगा।''

तेहरान में, चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने एक सवाल के जवाब में कहा कि ''हमारे दोनों देशों के बीच संबंध अब रणनीतिक स्तर पर पहुंच गए हैं और चीन इस्लामी गणतंत्र ईरान के साथ व्यापक संबंधों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है।''

दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग के लिए रोडमैप पर हस्ताक्षर से ज़ाहिर होता है कि बीजिंग संबंधों को उच्चतम स्तर तक बढ़ाएगा।

चीन का प्रतिरोध

चीन की सरकारी न्यूज़ एजेंसी ग्लोबल टाइम्स के अनुसार, चीनी विदेश मंत्री ने ईरानी अधिकारियों से कहा कि ''चीन प्रभुत्व और गुंडागर्दी का विरोध, अंतरराष्ट्रीय न्याय की सुरक्षा के साथ-साथ ईरान और अन्य देशों के लोगों के साथ अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों को भी मानेगा।''

इस समझौते पर पहली बार 2016 में ईरान के सुप्रीम लीडर सैयद अली खामेनी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच चर्चा हुई थी।

मध्य पूर्व के साथ आर्थिक संबंधों को गहरा करने के लिए, चीन ने ईरान को अपने बीआरआई कार्यक्रम के साथ विकास में सहयोग करने की भी पेशकश की थी।

तेहरान टाइम्स ने चीन में ईरान के राजदूत मोहम्मद केशवरज़ ज़ादेह के हवाले से बताया कि यह समझौता ''ईरान और चीन के बीच, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी, उद्योग, परिवहन और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग की क्षमता को स्पष्ट करता है।'' चीनी फर्मों ने ईरान में मास ट्रांजिट सिस्टम, रेलवे और अन्य महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया है।

दिसंबर 2020 में, इस समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने की अटकलों के बीच, अमरीकी विदेश विभाग के पॉलिसी प्लानिंग स्टाफ के डायरेक्टर, पीटर बर्कोवित्ज़ ने इसकी निंदा की।

उन्होंने समाचार पत्र अल अरेबिया को बताया था कि यदि ये समझौता होता है, तो यह ''स्वतंत्र दुनिया'' के लिए बुरी ख़बर होगी। ईरान पूरे क्षेत्र में आतंकवाद, मौत और विनाश के बीज बोता है। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का इस देश को सशक्त बनाना ख़तरे को और बढ़ा देगा।

लॉकडाउन: भारत की जीडीपी 2021 में 2019 से भी कम रह सकती है: यूएन रिपोर्ट

कोरोना महामारी से लड़ने के लिए व्यापक पैमाने पर टीकाकरण अभियान की शुरुआत करने के बावजूद साल 2021 के लिए भारत का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का स्तर साल 2019 के स्तर से नीचे रहने की आशंका है।

एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (यूएनईएससीएपी) ने मंगलवार, 30 मार्च 2021 को एक रिपोर्ट जारी की है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में कोरोना महामारी के शुरू होने से पहले ही जीडीपी और निवेश धीमा पड़ चुका था।

रिपोर्ट के अनुसार कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए पूर्ण लॉकडाउन के कारण 2020 की दूसरी तिमाही (अप्रैल से जून 2020) में आर्थिक बाधाएं अपने चरम पर थीं।

लॉकडाउन में ढील दिए जाने के बाद अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटना शुरू हुई लेकिन सालाना आधार पर शून्य के क़रीब आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान के साथ चौथी तिमाही में अर्थव्यवस्था की गति हल्की पड़ गई।

एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2021-22 में भारत की आर्थिक वृद्धि दर के सात फीसद रहने का अनुमान है जबकि इससे पहले के साल में यानी 2020-21 में कोरोना महामारी और उसके असर के कारण इसमें 7.7 फीसदी से अधिक के गिरावट होने का अनुमान है।