अर्थव्यवस्था

क्या भारत साइबर हमले से निपटने में सक्षम है?

बीते महीने तमिलाडु स्थित भारत के सबसे बड़े परमाणु संयंत्र कोडनकुलम में हुए साइबर अटैक ने भारत के साइबर सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए।

इस ख़बर के फैलने के बाद इस बात पर चर्चा होने लगी है कि क्या भारत किसी भी साइबर हमले से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है? क्या वह अपने महत्वपूर्ण आधारभूत ढांचों को हानि पहुँचाने वाले डिजिटल हमलों से बचा सकता है?

इस बहस ने एक और बड़े मुद्दे को हवा दे दी है, क्या भारत डेबिट कार्ड हैकर और दूसरे वित्तीय फ्रॉड से बचने के लिए तैयार है, क्योंकि ये भारत के करोड़ों लोगों का मुद्दा है।

पिछले ही महीने, भारतीय रिज़र्व बैंक ने बैंकों को एक चेतावनी दी है। यह चेतावनी सिंगापुर स्थित साइबर सिक्यूरिटी फ़र्म ग्रुप - आईबी की चेतावनी के बाद आया है जिसमें कहा गया था कि क़रीब 12 लाख डेबिट कॉर्ड के डिटेल्स ऑनलाइन उपलब्ध हैं।

बीते साल, हैकरों ने पुणे के कोस्मो बैंक के खातों से 90 करोड़ रुपये की फ़र्ज़ी ढंग से निकासी कर ली थी, ऐसा उन्होंने बैंक के डाटा सप्लायर पर साइबर हमले करके किया था।

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के साइबर इनिशिएटिव के प्रमुख अरुण सुकुमार ने बीबीसी को बताया, "भारत की फ़ाइनेंशियल सिस्टम पर हमला करना आसान है क्योंकि हम अभी भी ट्रांजैक्शन के लिए स्विफ्ट जैसे इंटरनेशनल बैंकिंग नेटवर्क पर निर्भर हैं। इंटरनेशनल गेटवेज़ की वजह से हमला करना आसान है।''

साइबर सिक्यूरिटी कंपनी सायमन टेक की एक रिपोर्ट बताती है कि ऐसे साइबर हमलों के लिए शीर्ष तीन ठिकानों में भारत एक है।

हालांकि भारत की विशाल डिजिटल आबादी को देखते हुए इसमें कमी आएगी। हर महीने फ्रांस जितनी आबादी भारत में कंप्यूटर से जुड़ रही है और यही बात सबसे बड़ी चिंता की है क्योंकि पहली बार इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों को भी डिजिटल पेमेंट करने के लिए कहा जा रहा है।

उदाहरण के लिए, नवंबर 2016 में भारत सरकार ने अचानक से 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट के चलन पर रोक लगा दी, यह देश में मौजूद कुल रक़म का 80 प्रतिशत हिस्सा थे। इसके विकल्प के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल पेमेंट को काफ़ी प्रमोट किया।

भारतीय पेमेंट प्लेटफॉर्म पेटीएम हों या फिर इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म गूगल पे हो, दोनों का कारोबार भारत में काफ़ी बढ़ गया है। क्रेडिट सुइसे की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2023 तक भारत में मोबाइल के ज़रिए एक ट्रिलियन डॉलर की पेमेंट होने लगेगी। क्रेडिट और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल भी काफ़ी लोकप्रिय है। आज की तारीख़ में भारत में क़रीब 90 करोड़ कार्ड इस्तेमाल हो रहे हैं।

टेक्नालॉजी एक्सपर्ट प्रशांतो राय ने बीबीसी को बताया, "भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल काफ़ी नए लोग कर रहे हैं, इनकी आबादी 30 करोड़ से ज़्यादा है। ये मध्य वर्ग या निम्न वर्ग के लोग हैं। जिनकी डिजिटल साक्षरता बेहद कम है। इनमें विभिन्न राज्यों में काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूर हैं जो इसकी भाषा को नहीं समझते, उनके साथ धोखाधड़ी होने की आशंका बहुत ज्यादा है।''

इसके अलावा प्रशांतो राय दूसरी समस्या की ओर भी इशारा करते हैं, "दूसरी बात यह है कि बैंकों के फ्रॉड के बारे में काफ़ी कम रिपोर्टिंग होती है, कई बार उपभोक्ताओं को मालूम ही नहीं होता है कि आख़िर क्या हुआ था?"

भारत में वित्तीय धोखाधड़ी कई तरह से होती है। कुछ हैकर्स धोखाधड़ी के लिए एटीएम मशीनों में कार्ड की नक़ल उतारने वाले स्किमर्स लगा देते हैं या कीबोर्ड में कैमरा लगा देते हैं। इसके ज़रिए बिना किसी संदेह के आपके कार्ड का डुप्लीकेट तैयार हो जाता है। वहीं कुछ हैकर्स आपको फोन करके आपसे जानकारी निकालने की कोशिश करते हैं।

प्रशांतो राय बताते हैं, "भारत में डिजिटल ट्रांजैक्शन की प्रक्रिया धुंधली और कंफ्यूज करने वाली है। वास्तविक दुनिया में ये पता रहता है कि कौन पैसा ले रहा है और कौन दे रहा है लेकिन मोबाइल पेमेंट प्लेटफॉर्म में यह हमेशा स्पष्ट नहीं होता है। उदाहरण के लिए, कोई शख़्स ऑनलाइन एक टेबल बेच रहा है, कोई ख़रीददार बनकर ऑनलाइन पेमेंट करने की बात करता है।''

"इसके बाद वह बताता है कि उसने पेमेंट कर दिया है और आपको टेक्स्ट मैसेज के ज़रिए एक कोड मिलेगा। यह भुगतान सुनिश्चित करने के लिए होगा। ज्यादातर उपभोक्ता इसके बारे में नहीं सोचते और वे उस शख्स को इस कोड के बारे में बता देते हैं। अगली बात उन्हें यह पता चलती है कि उनके एकाउंट से ही पैसे निकल गए हैं।''

समस्या यह है कि सिस्टम ख़ुद में ना तो सुरक्षित है और ना ही पारदर्शी।  कोस्मो बैंक की धोखाधड़ी में यह बात सामने आई थी कि साफ्टवेयर इतने बड़े ट्रांजैक्शन के दौरान पैटर्न में आए मिस्मैच को नहीं पकड़ पाया। जब तक फ्रॉड पकड़ में आया तब तक बहुत बड़ी रक़म का नुक़सान हो चुका था।

किसी मानक के नहीं होने से भी, पहली बार उपयोग करने वालों के लिए ऑनलाइन ट्रांजैक्शन काफ़ी कंफ्यूजन पैदा करने वाला है। उदाहरण के लिए एटीएम मशीनों को देखिए, ये कई तरह के होते हैं और हर पेमेंट ऐप का इंटरफेस अलग-अलग है।

सुकुमार एक दूसरी बात भी सुझाते हैं, उनके मुताबिक़ यह लोगों की भी समस्या है, लोगों में सामान्य जागरुकता का अभाव है, जिसके चलते वे ख़ुद को और पूरी व्यवस्था को जोखिम में डाल लेते हैं।

सुकुमार बताते हैं, "कीबोर्ड का इस्तेमाल करने वाले लोगों को भी सावधानी बरतने की ज़रूरत है। कोडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट में जिस वायरस का हमला हुआ है, वह वहां एक कर्मचारी की वजह से ही पहुंचा था जिसने बाहर की एक यूएसबी को सिस्टम के कंप्यूटर में लगाया था।  इससे पूरे प्लांट के सिस्टम को ख़तरा हुआ। ऐसा ही किसी बैंक या फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन में संभव है।''

प्रशांतो राय के मुताबिक़ फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार और वित्तीय संस्थानों की है ना कि उपभोक्ताओं की।

वे बताते हैं, "भारत में जिस रफ्तार से इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है, उसे देखते हुए इसे केवल शिक्षा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। शातिर और दक्ष हैकरों पर नज़र रखना हर किसी के लिए संभव नहीं है क्योंकि वे लगातार अपनी रणनीति और तरीक़ों को बदलते रहते हैं। ऐसे में किसी फ्रॉड को रोकने की ज़िम्मेदारी रेगुलेटरों की है।''

इसके अलावा, विभिन्न साइबर सिक्यूरिटी संस्थानों के बीच आपसी संवाद की रफ्तार भी बहुत धीमी है। भारत के डिजिटल आधारभूत ढांचों की सुरक्षा करने वाले कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी) कई बार सरकार को ख़तरों के बारे में समय से जानकारी मुहैया नहीं करा पाती है।

लेकिन भारत सरकार को समस्या को अंदाज़ा है। यही वजह है कि देश 2020 के लिए राष्ट्रीय साइबर सिक्यूरिटी पॉलिसी तैयार कर रहा है। इसमें उन छह अहम क्षेत्रों की पहचान की गई है जिसमें स्पष्ट नीति की ज़रूरत महसूस की जा रही है। इनमें फाइनेंस सिक्यूरिटी भी शामिल है।

प्रशांतो राय के मुताबिक़ देश के अंदर हर अहम क्षेत्र का अपना कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी) होना चाहिए, जिसके बीच आपसी संवाद हो और सरकार संयोजक की भूमिका निभाए।

ऐसा होने की सूरत में ही भारत के कैशलेस इकॉनमी बनने की राह में आने वाले ख़तरों पर प्रभावी ढंग से अंकुश लग पाएगा।

नोबेल के बाद अभिजीत बोले, भारत की अर्थव्यवस्था संकट में है

भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी एस्टेयर ड्युफ़लो के साथ माइकल क्रेमर को 2019 के अर्थशास्त्र का नोबेल सम्मान दिया गया है।

अभिजीत बनर्जी और उनकी पत्नी ड्युफ़लो अमरीका की मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में प्रोफ़ेसर हैं।

नोबेल सम्मान की घोषणा होने के बाद एमआईटी में बनर्जी अपनी पत्नी के साथ पत्रकारों के सवालों के जवाब दे रहे थे।

इसी दौरान उनसे एक पत्रकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि बहुत बुरी स्थिति है।

बनर्जी ने कहा कि भारत में लोग अभावग्रस्तता के कारण उपभोग में कटौती कर रहे हैं और गिरावट जिस तरह से जारी है उससे लगता है कि इसे नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

बनर्जी और डुफलो एमआईटी के अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफ़ेसर हैं। इन दोनों की शादी 2015 में हुई थी। अभिजीत बनर्जी भारत में भी कई रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर पूछे गए सवाल के जवाब में बनर्जी ने कहा, ''मेरी समझ से भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ही ख़राब है। एनएसएस के डेटा देखें तो पता चलता है कि 2014-15 और 2017-18 के बीच शहरी और ग्रामीण भारत के लोगों ने अपने उपभोग में भारी कटौती की है। सालों बाद ऐसा पहली बार हुआ है। यह संकट की शुरुआत है।''

पत्रकार के अनुरोध पर अभिजीत बनर्जी ने सवालों का जवाब अपनी मातृभाषा बांग्ला में भी दिया। उनकी पत्नी ड्युफ़लो फ़्रांस की हैं और ड्युफ़लो ने भी अंग्रेज़ी के अलावा फ़्रेंच में जवाब दिया।

अभिजीत बनर्जी ने भारत में डेटा संग्रह के तरीक़ों में हुए विवादित बदलाव पर भी बोला। कई लोगों का आरोप है कि भारत सरकार जीडीपी ग्रोथ और राजस्व घाटे का जो डेटा दिखाती है वो असल डेटा नहीं है। ऐसा आरोप मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम भी लगा चुके हैं। अभिजीत बनर्जी ने कहा कि सरकार के डेटा पर कई तरह के संदेह हैं।

अभिजीत बनर्जी को मिला अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार

भारतीय मूल के अमरीकी इकॉनामिस्ट अभिजीत बनर्जी, इश्तर डूफलो और माइकल क्रेमर को संयुक्त रूप से इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया है।

इन तीनों को दुनिया भर में ग़रीबी दूर करने के लिए एक्सपेरिमेंट अप्रोच के लिए ये सम्मान दिया गया है। माना जा रहा है कि बीते दो दशक के दौरान इस अप्रोच का सबसे अहम योगदान रहा। दुनिया भर में ग़रीबों की आबादी 70 करोड़ के आसपास मानी जाती है।

अभिजीत बनर्जी के ही एक अध्ययन पर भारत में विकलांग बच्चों की स्कूली शिक्षा की व्यवस्था को बेहतर बनाया गया, जिसमें क़रीब 50 लाख बच्चों को फ़ायदा पहुंचा है।

तीन लोगों में अभिजीत बनर्जी की पार्टनर इश्तर डूफलो भी शामिल हैं, जो अर्थशास्त्र में नोबेल जीतने वाली सबसे कम उम्र की महिला हैं। अर्थशास्त्र में नोबेल जीतने वाली वे महज दूसरी महिला हैं।

पुरस्कार की घोषणा होने के बाद इश्तर डूफेलो ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा है, "महिलाएं भी कामयाब हो सकती हैं ये देखकर कई महिलाओं को प्रेरणा मिलेगी और कई पुरुष औरतों को उनका सम्मान दे पाएंगे।''

कोलकाता यूनिवर्सिटी से 1981 में बीएससी करने के बाद अभिजीत बनर्जी ने 1983 में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से एमए की पढ़ाई पूरी की।  1988 में उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी पूरी की।

अभिजीत बनर्जी को नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें बधाई दी है। मोदी ने ट्वीट करके कहा है, ''अभिजीत बनर्जी ने ग़रीबी उन्मूलन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।''

उनके बारे में ये भी कहा जा रहा है कि उन्होंने राहुल गांधी के न्याय योजना की रुपरेखा तैयार की थी। इसकी पुष्टि खुद राहुल गांधी ने भी की है, उन्होंने ट्वीट किया है कि अभिजीत ने न्याय योजना को तैयार किया था, जिसमें ग़रीबी को नष्ट करने और भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की क्षमता है।

उनके जेएनयू कनेक्शन को लेकर भी सोशल मीडिया पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।

रामचंद्र गुहा ने ट्वीट किया है, "अभिजीत बनर्जी और इश्तर डूफेलो को नोबेल मिलने की ख़बर से खुश हूं। वे इसके योग्य हैं। अभिजीत बहुत बदनाम किए जा रहे यूनिवर्सिटी के गर्व भरे ग्रेजुएट हैं। उनका काम कई युवा भारतीय विद्वानों को प्रभावित करेगा।''

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी अभिजीत बनर्जी को बधाई दी है।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की रैंकिंग में भारत 10 पायदान गिरा

वर्ल्ड इकॉनोमिक फ़ोरम (WEF) की एक सालाना रिपोर्ट में भारत काफ़ी नीचे फिसल गया है। अर्थव्यवस्था में प्रतियोगिता के लिए लाई जाने वाली बेहतरी को आंकने वाली इस रिपोर्ट में ऐसा कहा गया है।

ग्लोबल कॉम्पिटिटिव इंडेक्स में पिछले साल भारत 58वें नंबर पर था लेकिन अब वह 68वें नंबर पर पहुंच गया है।

इस इंडेक्स में सबसे ऊपर सिंगापुर है। उसके बाद अमरीका और जापान जैसे देश हैं। ज़्यादातर अफ़्रीकी देश इस इंडेक्स में सबसे नीचे हैं।

भारत की रैंकिंग गिरने की वजह दूसरे देशों का बेहतर प्रदर्शन बताया जा रहा है। इस इंडेक्स में चीन भारत से 40 पायदान ऊपर 28वें नंबर पर है, उसकी रैंकिंग में कोई बदलाव नहीं आया है।

वियतनाम, कज़ाकस्तान और अज़रबैजान जैसे देश भी इस सूची में भारत से ऊपर हैं। ब्रिक्स देशों में चीन सबसे ऊपर है जबकि ब्राज़ील भारत से भी नीचे 71वें नंबर पर हैं।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी है और काफ़ी स्थिर भी है लेकिन आर्थिक सुधारों की रफ़्तार काफ़ी धीमी है।

बेहतर आर्थिक माहौल के मामले में कोलंबिया, दक्षिण अफ़्रीका और तुर्की ने पिछले साल भारत से बेहतर प्रदर्शन किया है और वे भारत से आगे निकल गए हैं।

इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि दुनिया भर में मंदी के लक्षण दिखाई दे रहे हैं जिनसे जूझना अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती होगी।

इस रैंकिंग में पाकिस्तान 110वें नंबर पर है जबकि नेपाल (108) और बांग्लादेश (105) भी उससे ऊपर हैं।

इस रिपोर्ट में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था, मज़ूदरों की दशा और बैंकिंग सेवाओं की हालत को इस गिरावट के लिए ज़िम्मेदार माना गया है।

यह गिरावट भारत के लिए निस्संदेह चिंता की बात है। ख़ासतौर पर ऐसे समय में जब भारत को अधिक निवेश और कारोबारी गतिविधियों की ज़रूरत है ताकि सुस्ती से निबटा जा सके।

क्या टैक्स में राहत देने से ही मंदी की मार ठीक हो जाएगी?

भारत की केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कॉरपोरेट कंपनियों को टैक्स में छूट देने की घोषणा की। वित्त मंत्री की घोषणा के बाद कांग्रेस की कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है।

मोदी सरकार ने घरेलू कंपनियों, नयी स्थानीय विनिर्माण कंपनियों के लिये कॉरपोरेट टैक्स को कम करते हुए इसे 25.17 फ़ीसदी कर दिया है। वित्त मंत्री ने कहा कि यदि कोई घरेलू कंपनी किसी प्रोत्साहन का लाभ नहीं ले तो उसके पास 22 प्रतिशत की दर से आयकर भुगतान करने का विकल्प होगा। जो कंपनियां 22 प्रतिशत की दर से आयकर भुगतान करने का विकल्प चुन रही हैं, उन्हें न्यूनतम वैकल्पिक कर का भुगतान करने की ज़रूरत नहीं होगी।

मोदी सरकार के इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा ​कि सावन के अंधे की कहावत भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा सरकार के लिए सच साबित हो रही है।

सुरजेवाला ने कहा कि अर्थव्यवस्था डूब रही है, देश मंदी की मार से जूझ रहा है और कंपनियां बंद हो रही हैं। उन्होंने कहा कि जीडीपी गिर रही है, निर्यात फेल हो गया है और भाजपा के मंत्री और सरकार ये कह रहे हैं कि सब ठीक है। उनके अनुसार सब कुछ ग़लत है लेकिन यह सत्ता में कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों को समझ नहीं आ रहा।

कांग्रेस ने मोदी सरकार पर ज़ोरदार निशाना साधते हुए कहा कि यह सरकार एक क़दम आगे और चार क़दम पीछे है। कांग्रेस प्रवक्ता ने प्रधानमंत्री मोदी और वित्त मंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि वे देश की अर्थव्यवस्था नौसिखियों की तरह चला रहे हैं।

उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार द्वारा लिया गया हालिया निर्णय केवल डगमगाते संसेक्स इंडेक्स को बचाने के लिए लिया गया है। इसके निर्णय के तहत कॉरपोरेट जगत को सालाना एक लाख 45 हज़ार करोड़ रूपये की छूट दी गई है।

इसके अलावा कांग्रेस प्रवक्ता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से पाँच सवाल पूछे।

1. कॉरपोरेट टैक्स की दरों को 30 प्रतिशत से कम कर 22 प्रतिशत और 25 प्रतिशत से कम कर 15 प्रतिशत करने से सालाना एक लाख 45 हज़ार करोड़ रूपये का नुक़सान होगा। प्रधानमंत्री जी और वित्त मंत्री जी देश को यह बताएं कि इस वित्तीय घाटे की भरपाई कहां से होगी? क्या इसके लिए एक बार फिर वेतनभोगियों, मध्यम वर्ग के लोगों, ग़रीब, किसान, छोटे दुकानदार, छोटे-छोटे व्यवसायियों पर कर लगा कर और पेट्रोल, डीज़ल, बिजली के दामों में बढ़ोतरी कर किया जाएगा? या फिर देश की मुनाफ़े वाली पीएसयू का ख़ून निचोड़ कर किया जाएगा।

2. क्या प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बताएंगे कि कॉरपोरेट टैक्स के तहत एक लाख 45 हज़ार करोड़ रूपये का सालाना छूट दिया गया है उससे जो फिस्कल डिफिसिट (वित्तीय घाटा) जो बढ़ जाएगा। उसके लिए आपके पास क्या उपाय है? अब जब ​वित्तीय घाटा सात प्रतिशत तक पहुंच जाएगा जिसका सीधा असर देश की प्रगति और महंगाई पर पड़ेगा तो उसके लिए आपके पास क्या उपाय हैं?

3. प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बजट पास करने वाले संसद की बार-बार अवहेलना और उसे दरकिनार क्यों कर रहे हैं? 70 सालों में यह पहली सरकार है जिसने बजट पेश करने के 45 दिनों के अंदर ख़ुद के पेश किए हुए बजट को ही ख़ारिज कर दिया या संशोधन कर दिया या उसे वापस ले लिया। क्या देश की संसद और संसदीय प्रणाली की इस प्रकार व्यापक अवहेलना उचित है?

4. अगर आपको इनकम टैक्स में राहत ही देना था तो फिर इस देश के साधारण जनता, नौकरीपेशा लोगों और मध्यम वर्ग को इसमें राहत क्यों नहीं दिया गया? आज भी जब आर्थिक मंदी की मार पड़ रही है तो इसका सबसे ज्यादा असर नौकरीपेशा, मध्यम वर्ग और साधारण व्यक्ति पर पड़ रहा है। तो फिर सरकार इस वर्ग को कोई राहत नहीं देती है, ऐसा क्यों?

5. क्या केवल टैक्स राहत देने से ही मंदी की मार ठीक हो जाएगी? क्या यही आपका आर्थिक ​विज़न है? और अगर टैक्स राहत देने से मंदी की मार दूर हो जाती है तो फिर व्यक्तिगत इनकम टैक्स देने वाले जो लोग हैं वो 30 प्रतिशत पर टैक्स देंगे और हज़ारों करोड़ रूपये का मुनाफ़ा कमाने वाली कंपनियां वो 22 और 15 प्रतिशत की दर से टैक्स देंगी, यह इस देश में कौन सी न्यायसंगत और उचित बात है?

भारत की अर्थव्यवस्था शून्य की दर से बढ़ रही

भारत में पांच तिमाही पहले अर्थव्यवस्था आठ प्रतिशत की दर से विकास कर रही थी। अब वो गिरते-गिरते पांच प्रतिशत पर पहुंच गई है। ऐसा नहीं है कि यह गिरावट एकाएक आई है।

वास्तव में ये पाँच प्रतिशत से भी कम है क्योंकि जो तिमाही विकास दर के आँकड़े हैं, वो संगठित और कॉर्पोरेट सेक्टर पर आधारित होते हैं।

असंगठित क्षेत्र को इसमें पूरी तरह शामिल नहीं किया जाता है, तो ये मान लिया जाता है कि असंगठित क्षेत्र भी उसी रफ़्तार से बढ़ रहा है, जिस रफ़्तार से संगठित क्षेत्र।

लेकिन चारों तरफ़ से ख़बरें आ रही हैं कि लुधियाना में साइकिल और आगरा में जूते जैसे उद्योगों से जुड़े असंगठित क्षेत्र बहुत बड़ी तदाद में बंद हो गए हैं।

असंगठित क्षेत्र का विकास दर गिर रहा है तो यह मान लेना कि असंगठित क्षेत्र, संगठित क्षेत्र की रफ़्तार से बढ़ रहा है, ग़लत है।

हमारे असंगठित क्षेत्र में 94 प्रतिशत लोग काम करते हैं और 45 प्रतिशत उत्पादन होता है। अगर जहां 94 प्रतिशत लोग काम करते हैं, वहां उत्पादन और रोज़गार कम हो रहे हैं तो वहां मांग घट जाती है।

यह जो मांग घटी है, वो नोटबंदी से बाद से शुरू हुआ। फिर आठ महीने बाद जीएसटी का असर पड़ा और उसके बाद बैंकों के एनपीए का असर पड़ा। इन सबके बाद ग़ैरबैंकिंग वित्तीय कंपनियों के संकट का असर पड़ा।

यानी अर्थव्यवस्था को तीन साल में तीन बड़े-बड़े झटके लगे हैं, जिनकी वजह से बेरोजगारी बढ़ी है। सीएमआई के आँकड़े दिखाते हैं कि भारत में कर्मचारियों की संख्या 45 करोड़ थी, जो घट कर 41 करोड़ हो गई है।

इसका मतलब यह है कि चार करोड़ लोगों की नौकरियां या काम छिन गए हैं। जब इतने बड़े तबके की आमदनी कम हो जाएगी तो ज़ाहिर सी बात है मांग घट जाएगी। जब मांग घट जाएगी तो उपभोग की क्षमता कम हो जाएगी और जब उपभोग की क्षमता कम हो जाएगी तो निवेश कम हो जाएगा।

भारत की अर्थव्यवस्था में निवेश की दर 2012-13 में सबसे ऊपर थी। उस वक़्त निवेश की दर 37 फ़ीसदी की दर से बढ़ रही थी और वो आज गिरकर 30 फ़ीसदी से कम हो गई है।

जब तक निवेश नहीं बढ़ता है, विकास दर नहीं बढ़ती है।

जो समस्या है, ये असंगठित क्षेत्र से शुरू हुई और अब वो धीरे-धीरे संगठित क्षेत्र पर भी असर डाल रही है। उदाहरण के तौर पर आप ऑटोमोबिल और एफ़एमसीजी सेक्टर को देख सकते हैं।

आपने पारले-जी बिस्किट की मांग घटने के बारे में सुना होगा। यह एक संगठित क्षेत्र है। इनका उपयोग असंगठित क्षेत्र से जुड़े लोग करते हैं। जब असंगठित क्षेत्र में आमदनी कम होगी तो मांग अपने-आप कम हो जाएगी।  एफ़एमसीजी का भी यही हाल है।

अगर भारत की अर्थव्यवस्था छह या पाँच प्रतिशत की रफ़्तार से भी बढ़ रही है तो यह एक बहुत अच्छी रफ़्तार है। इसके बाद भी खपत कम क्यों हो रही है, इसे बढ़ना चाहिए था। निवेश भी पाँच प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ना चाहिए था।

जब खपत में कमी आई है, निवेश नहीं बढ़ रहा है तो यह दर्शाता है कि आर्थिक विकास दर पाँच, छह या सात प्रतिशत नहीं है बल्कि यह शून्य प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, क्योंकि असंगठित क्षेत्र के आँकड़े इसमें शामिल ही नहीं किए जाते हैं।

जिस दिन आप असंगठित क्षेत्र के आँकड़े उसमें जोड़ लेंगे तो पता लग जाएगा कि विकास दर शून्य या एक प्रतिशत है। असंगठित क्षेत्र के आँकड़े पाँच सालों में एक बार इकट्ठे किए जाते हैं। इस दरमियान यह मान लिया जाता है कि असंगठित क्षेत्र भी उसी रफ़्तार से बढ़ रहा है जिस रफ़्तार से संगठित क्षेत्र।

यह अनुमान लगाना नोटबंदी के पहले तक तो ठीक था, लेकिन जैसे ही नोटबंदी की गई, उसका जबरदस्त असर पड़ा। असंगठित क्षेत्रों पर और उसकी गिरावट शुरू हो गई।

8 नवंबर 2016 के बाद जीडीपी के आँकड़ों में असंगठित क्षेत्र के विकास दर के अनुमान को शामिल करने का यह तरीक़ा ग़लत है।

यह भी कहा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुज़र रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से नहीं सुस्ती के दौर से गुज़र रही है। जब विकास दर ऋणात्मक हो जाए तो उस स्थिति को मंदी का दौर माना जाता है।

लेकिन अभी जो आँकड़े सरकार ने प्रस्तुत किए हैं, अगर उनमें असंगठित क्षेत्र के आँकड़ों को शामिल कर लिया जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी के दौर गुजर रही है।

नोटबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र पिट गया। उसके बाद जीएसटी लागू किया गया।  हालांकि जीएसटी असंगठित क्षेत्रों पर लागू नहीं होता है।

संगठित क्षेत्रों पर जीएसटी का असर हुआ है। पिछले ढाई साल से जब से जीएसटी लागू हुआ है तब से 1400 से अधिक बदलाव किए गए हैं। इससे संगठित क्षेत्र के लोगों में उलझन बहुत बढ़ी है।

लोग जीएसटी फाइल नहीं कर पा रहे हैं। क़रीब 1.2 करोड़ लोगों ने जीएसटी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया है, लेकिन सिर्फ़ 70 लाख लोग जीएसटी फाइल करते हैं और एनुअल रिटर्न सिर्फ़ 20 प्रतिशत लोगों ने फाइल किया है।

तो कुल मिलाकर जीएसटी का अर्थव्यवस्था को जबरदस्त धक्का लगा है।

समस्या असंगठित क्षेत्र से शुरू होती है और संगठित क्षेत्र भी अछूता नहीं है। अर्थव्यवस्था में मंदी या फिर सुस्ती के चलते सरकार के टैक्स कलेक्शन में कमी आई है। पिछले साल जीएसटी में 80 हज़ार करोड़ की कमी आई और डायरेक्ट टैक्स में भी इतने की ही कमी आई।

कुल मिलाकर सरकारी ख़ज़ाने को 1.6 लाख करोड़ रुपए का घाटा हुआ। जब सरकार की आमदनी कम हुई तो उसने खर्चे कम कर दिए। जब खर्चे कम होंगे तो मंदी और गहरा जाएगी।

अब कहा जा रहा है कि बैंकों का विलय अर्थव्यवस्था को मज़बूती देगा। लेकिन ये बात ग़लत है। बैंकों के विलय का असर पाँच से दस साल बाद दिखेगा। उसका कोई तत्कालिक असर नहीं होगा।

सरकार की तरफ़ से दिए गए बयानों से यह बात स्पष्ट होती है कि उसने मान लिया है कि अर्थव्यवस्था कमज़ोर हुई है और एक के बाद एक पैकेज की घोषणा की जा रही है। आरबीआई भी घोषणा कर रहा है।

वे सभी अभी मंदी की बात नहीं कह रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे बाद में सब मंदी की बात कहने लगेंगे, जब असगंठित क्षेत्र के आँकड़ों को शामिल किया जाएगा।

आरबीआई ने 1.76 लाख करोड़ रुपए का पैकेज जारी किया है। इसका इस्तेमाल भी संगठित क्षेत्र के लिए किया जाएगा। असंगठित क्षेत्र के लिए किसी तरह के पैकेज की घोषणा नहीं की गई है। रोज़गार बढ़ाने के लिए पैकेज की घोषणा नहीं की गई है।

जहां से समस्या शुरू हुई है, उन क्षेत्रों पर सरकार का ध्यान नहीं है। जब तक इन क्षेत्रों के लिए पैकेज की घोषणा नहीं की जाएगी, तब तक कोई सुधार होता नहीं दिखेगा।

क्या भारत की मोदी सरकार अर्थव्यवस्था की सुस्ती से ऐसे निपटेगी?

सुस्त अर्थव्यवस्था और अलग अलग सेक्टर में लोगों की नौकरी का जाना पूरे देश में चिंता का विषय बना हुआ है।

इन्हीं चिंताओं के बीच शुक्रवार को भारत की केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि सरकार को देश की मौजूदा आर्थिक हालत का पूरा अंदाज़ा है और देश की विकास का एजेंडा सबसे ऊपर है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के दौरान फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्टमेंट (FPI) की आय पर आयकर सरचार्ज बढ़ाने का फ़ैसला वापस ले लिया। साथ ही घरेलू निवेशकों के लिए भी आयकर सरचार्ज को बढ़ाने का निर्णय भी रद्द कर दिया।

वित्त मंत्री ने शेयर बाज़ार में लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन पर सरचार्ज को बढ़ाने के सरकार के फ़ैसले की वापसी की भी घोषणा की।

वित्त मंत्री के साथ इस प्रेस वार्ता में केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर, वित्त सचिव राजीव कुमार, राजस्व सचिव अजय भूषण पांडेय, आर्थिक सचिव अतनु चक्रवर्ती, एक्सपेंडिचर सचिव गिरीश चंद्र मुर्मू भी मौजूद थे।

निर्मला सीतारमण की घोषणाएं
- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए 70 हज़ार करोड़ के बेलआउट पैकज की मंज़ूरी दी गई।
- बैंकों को रेपो रेट की कटौती का फ़ायदा ब्याज में कमी कर ग्राहकों को देना होगा।
- लोन सेटलमेंट की शर्तें आसान हुईं। लोन की अर्ज़ी की ऑनलाइन मॉनिटरिंग होगी। कर्ज़ वापसी के 15 दिनों के भीतर बैंकों को ग्राहकों को दस्तावेज़ देने होंगे।
- टैक्स के लिए किसी को परेशान नहीं किया जाएगा। टैक्स असेसमेंट तीन महीने में पूरा किया जाएगा। आयकर से जुड़े ऑर्डर 1 अक्तूबर से सेंट्रलाइज़्ड सिस्टम के ज़रिए जारी किए जाएंगे।
- जीएसटी रिफंड आसान होगा, सभी जीएसटी रिफंड 30 दिन में किए जाएंगे। एमएसएमई की अर्जी के 60 दिनों के भीतर रिफंड दिया जाएगा।
- इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के लिए 100 करोड़ रुपये का पैकेज़ दिया जाएगा।  इस सेक्टर के कामकाज पर नज़र रखने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाई जाएगी।
- सीएसआर उल्लंघन को क्रिमिनल नहीं सिविल अपराध माना जाएगा।
- स्टार्टअप टैक्स निपटारे से जुड़े मामलों के लिए अलग सेल बनेगा।
- स्टार्टअप पंजीकरण में आयकर की धारा 56 2 (बी) लागू नहीं होगी।  स्टार्टअप्स में एंजेल टैक्स ख़त्म।
- 31 मार्च 2020 तक ख़रीदे गए बीएस-IV वाहन अपने रजिस्ट्रेशन पीरियड तक बने रहेंगे और उनके वन टाइम रजिस्ट्रेशन फ़ीस को जून 2020 तक के लिए बढ़ा दिया गया।
- ऑटोमोबाइल सेक्टर में स्क्रैपेज पॉलिसी (पुरानी गाड़ियां का सरेंडर) लाएगी सरकार। गाड़ियों की ख़रीद बढ़ाने के लिए सरकार कई योजनाओं पर काम कर रही है।
- अमरीका और चीन के बीच ट्रेड वॉर से हालात पर नकारात्मक असर पड़ा है।
- अमरीका और चीन जैसे देशों में मांग में कमी के आसार हैं लेकिन हमारा विकास दर उनकी तुलना में आगे है।
- अमरीका और जर्मनी विपरीत यील्ड कर्व्स का सामना कर रहे हैं, यानी इन देशों में मांग में कमी आई है।
- भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है। यहां कारोबार करना आसान हुआ। हम लगातार व्यापार को आसान कर रहे हैं। इसके लिए सभी मंत्रालय साथ मिलकर काम कर रहे हैं।
- प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हम वेल्थ क्रिएटर का आदर करते हैं। हमने अलग-अलग सेक्टर के लोगों से मुलाक़ात की। सरकार के एजेंडे में सुधार सबसे ऊपर है।
- मूडीज़ ने भारत के जीडीपी ग्रोथ को घटाकर 6.2 फ़ीसदी कर दी है जो पहले 6.8 फ़ीसदी थी।
- 2019 में वैश्विक विकास 3.2 फ़ीसदी से नीचे रह सकता है।
- पर्यावरण को लेकर मंजूरी में पहले से अब कम समय लगता है। इनकम टैक्स भरना पहले से बहुत आसान हुआ है। हम जीएसटी को और आसान बनाएंगे।
- इज़ ऑफ़ डूइंड बिज़नेस के मामले में यह सरकार पिछली सरकारों की तुलना में बहुत आगे है।
- अगले हफ़्ते होम बायर्स और अन्य मामलों को लेकर भी कुछ घोषणाएं की जाएंगी।

भारत में 70 सालों में नकदी का अभूतपूर्व संकटः नीति आयोग

भारत में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर छाया नकदी का संकट एक अभूतपूर्व सी परिस्थिति है।

राजीव कुमार ने कहा, "पिछले 70 सालों में किसी ने ऐसी परिस्थिति नहीं देखी जहाँ सारा वित्तीय क्षेत्र उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है और निजी क्षेत्र में कोई भी दूसरे पर भरोसा नहीं कर रहा है। कोई भी किसी को कर्ज़ देने को तैयार नहीं है, सब नकद दाबकर बैठे हैं।''

उन्होंने दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि इस जड़ता वाली स्थिति को तोड़ने के लिए अभूतपूर्व क़दम उठाए जाने की आवश्यकता है।

राजीव कुमार ने कहा कि निजी क्षेत्र की आशंकाओं को दूर करने के लिए सरकार को हरसंभव प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा, "नोटबंदी, जीएसटी और आईबीसी (दीवालिया क़ानून) के बाद हर चीज़ बदल गई है। पहले 35 फ़ीसदी नक़दी उपलब्ध होती थी, वो अब काफ़ी कम हो गया है। इन सभी कारणों से स्थिति काफ़ी जटिल हो गई है।'' 

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