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भारत की अर्थव्यवस्था में मंदी: भारत की जीडीपी 23.9 फ़ीसदी गिरी

भारत के सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी की विकास दर में लॉकडाउन के शुरूआती महीनों वाली तिमाही में ज़बरदस्त गिरावट हुई है।

भारत में केंद्र सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार 2020-21 वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच विकास दर में 23.9 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

ऐसा अनुमान लगाया गया था कि कोरोना वायरस महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन के कारण भारत की जीडीपी की दर पहली तिमाही में 18 फ़ीसदी तक गिर सकती है।

वहीं, भारत के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई का अनुमान था कि यह दर 16.5 फ़ीसदी तक गिर सकती है लेकिन ताज़ा आंकड़े चौंकाने वाले हैं।

जनवरी-मार्च तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था में 3.1 फ़ीसदी की वृद्धि देखी गई थी जो आठ साल में सबसे कम थी।

जीडीपी के आंकड़े बताते हैं कि मार्च तिमाही में उपभोक्ता ख़र्च धीमा हुआ, निजी निवेश और निर्यात कम हुआ। वहीं, बीते साल इसी जून तिमाही की दर 5.2 फ़ीसदी थी।

जीडीपी के इन नए आंकड़ों को साल 1996 के बाद से ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़ी गिरावट बताया गया है।

इन आंकड़ों पर सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियों के अलावा आंकड़ा इकट्ठा करने के तंत्र पर भी असर पड़ा है। सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा है कि 25 मार्च से देश में लॉकडाउन लगाया गया जिसके बाद आर्थिक गतिविधियों पर रोक लग गई।

सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा है कि अधिकतर निकायों ने क़ानूनी रिटर्न दाख़िल करने की समयसीमा बढ़ा दी थी। इन परिस्थितियों में जीएसटी जैसे आंकड़े के स्रोत सीमित हो गए थे।

क्या है जीडीपी

ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट यानी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) किसी एक साल में देश में पैदा होने वाले सभी सामानों और सेवाओं की कुल वैल्यू को कहते हैं।

रिसर्च और रेटिंग्स फ़र्म केयर रेटिंग्स के अर्थशास्त्री सुशांत हेगड़े का कहना है कि जीडीपी ठीक वैसी ही है, जैसे 'किसी छात्र की मार्कशीट' होती है।

जिस तरह मार्कशीट से पता चलता है कि छात्र ने सालभर में कैसा प्रदर्शन किया है और किन विषयों में वह मज़बूत या कमज़ोर रहा है? उसी तरह जीडीपी आर्थिक गतिविधियों के स्तर को दिखाता है और इससे यह पता चलता है कि किन सेक्टरों की वजह से इसमें तेज़ी या गिरावट आई है?

इससे पता चलता है कि सालभर में अर्थव्यवस्था ने कितना अच्छा या ख़राब प्रदर्शन किया है। अगर जीडीपी डेटा सुस्ती को दिखाता है, तो इसका मतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था सुस्त हो रही है और देश ने इससे पिछले साल के मुक़ाबले पर्याप्त सामान का उत्पादन नहीं किया और सेवा क्षेत्र में भी गिरावट रही।

भारत में सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफ़िस (सीएसओ) साल में चार दफ़ा जीडीपी का आकलन करता है। यानी हर तिमाही में जीडीपी का आकलन किया जाता है। हर साल यह सालाना जीडीपी ग्रोथ के आँकड़े जारी करता है।

भारत-चीन तनाव: चीन ने भारत से तनाव के बीच तिब्बत को लेकर अहम घोषणा की

भारत से सरहद पर तनाव के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक 'नए आधुनिक समाजवादी तिब्बत' के निर्माण की कोशिश करने का आह्वान किया है।

इससे पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने तिब्बत का दौरा किया था और भारत से लगी सीमा पर निर्माण कार्यों का जायज़ा लिया था।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और चीन के सेंट्रल मिलिटरी कमिशन के चेयरमैन शी जिनपिंग ने बीजिंग में तिब्बत को लेकर हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में यह टिप्पणी की।

उन्होंने कहा कि चीन को तिब्बत में स्थिरता बनाए रखने और राष्ट्रीय एकता की रक्षा करने के लिए और कोशिशें करने की ज़रूरत है।

चीन ने 1950 में तिब्बत पर अपना नियंत्रण स्थापित किया था।

निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के साथ खड़े होने वाले आलोचकों का कहना है कि 'चीन ने तिब्बत के लोगों और वहाँ की संस्कृति के साथ बुरा किया'।

तिब्बत के भविष्य के शासन पर कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों की इस बैठक में शी जिनपिंग ने उपलब्धियों की प्रशंसा की और फ्रंटलाइन पर काम कर रहे अधिकारियों की भी तारीफ़ की, लेकिन उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में एकता को बढ़ाने, उसे फिर से जीवंत और मज़बूत करने के लिए और प्रयासों की आवश्यकता है।

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, शी जिनपिंग ने बैठक में कहा कि 'तिब्बत के स्कूलों में राजनीतिक और वैचारिक शिक्षा पर और ज़ोर दिए जाने की ज़रूरत है ताकि वहाँ हर युवा के दिल में चीन के लिए प्यार का बीज बोया जा सके'।

शी जिनपिंग ने कहा कि तिब्बत में कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका को मज़बूत करने और जातीय समूहों को बेहतर ढंग से एकीकृत करने की आवश्यकता है।

इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि ''हमें एकजुट, समृद्ध, सभ्य, सामंजस्यपूर्ण और सुंदर, आधुनिक, समाजवादी तिब्बत बनाने का संकल्प लेना होगा।''

उन्होंने कहा कि 'तिब्बती बौद्ध धर्म को भी समाजवाद और चीनी परिस्थितियों के अनुकूल बनाए जाने की ज़रूरत है'।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि 'अगर चीन से तिब्बत को वाक़ई इतना फ़ायदा हुआ होता, जितना शी जिनपिंग ने बैठक में दावा किया, तो चीन को अलगाववाद का डर नहीं होता और ना ही चीन तिब्बत के लोगों में शिक्षा के ज़रिए 'नई राजनीतिक चेतना' भरने की बात करता'।

अमरीका और चीन तनाव के बीच भी तिब्बत को लेकर बात उठी थी।

जुलाई में, अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने कहा था कि अमरीका तिब्बत में 'राजनयिक पहुँच को रोकने और मानवाधिकारों के हनन में लिप्त' कुछ चीनी अधिकारियों के वीज़ा को प्रतिबंधित करेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि अमरीका तिब्बत की 'सार्थक स्वायत्तता' का समर्थन करता है।

चीन के कब्ज़े में तिब्बत कब और कैसे आया?

मुख्यतः बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के इस सुदूर इलाक़े को 'संसार की छत' के नाम से भी जाना जाता है। चीन में तिब्बत का दर्जा एक स्वायत्तशासी क्षेत्र के तौर पर है।

चीन का कहना है कि इस इलाके पर सदियों से उसकी संप्रभुता रही है, जबकि बहुत से तिब्बती लोग अपनी वफ़ादारी अपने निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के प्रति रखते हैं।

दलाई लामा को उनके अनुयायी एक जीवित ईश्वर के तौर पर देखते हैं तो चीन उन्हें एक अलगाववादी ख़तरा मानता है।

तिब्बत का इतिहास बेहद उथल-पुथल भरा रहा है। कभी वो एक खुदमुख़्तार इलाक़े के तौर पर रहा, तो कभी मंगोलिया और चीन के ताक़तवर राजवंशों ने उस पर हुकूमत की।

लेकिन साल 1950 में चीन ने इस इलाके पर अपना झंडा लहराने के लिए हज़ारों की संख्या में सैनिक भेज दिए। तिब्बत के कुछ इलाक़ों को स्वायत्तशासी क्षेत्र में बदल दिया गया और बाक़ी इलाक़ों को इससे लगने वाले चीनी प्रांतों में मिला दिया गया।

लेकिन साल 1959 में चीन के ख़िलाफ़ हुए एक नाकाम विद्रोह के बाद 14वें दलाई लामा को तिब्बत छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी, जहाँ उन्होंने निर्वासित सरकार का गठन किया।

साठ और सत्तर के दशक में चीन की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान तिब्बत के ज़्यादातर बौद्ध विहारों को नष्ट कर दिया गया। माना जाता है कि दमन और सैनिक शासन के दौरान हज़ारों तिब्बतियों की जाने गई थीं।

चीन तिब्बत विवाद कब शुरू हुआ?

चीन और तिब्बत के बीच विवाद, तिब्बत की क़ानूनी स्थिति को लेकर है।

चीन कहता है कि तिब्बत तेरहवीं शताब्दी के मध्य से चीन का हिस्सा रहा है लेकिन तिब्बतियों का कहना है कि तिब्बत कई शताब्दियों तक एक स्वतन्त्र राज्य था और चीन का उस पर निरंतर अधिकार नहीं रहा।

मंगोल राजा कुबलई ख़ान ने युआन राजवंश की स्थापना की थी और तिब्बत ही नहीं बल्कि चीन, वियतनाम और कोरिया तक अपने राज्य का विस्तार किया था।

फिर सत्रहवीं शताब्दी में चीन के चिंग राजवंश के तिब्बत के साथ संबंध बने।

260 साल के रिश्तों के बाद चिंग सेना ने तिब्बत पर अधिकार कर लिया, लेकिन तीन साल के भीतर ही उसे तिब्बतियों ने खदेड़ दिया और 1912 में तेरहवें दलाई लामा ने तिब्बत की स्वतन्त्रता की घोषणा की।

फिर 1951 में चीनी सेना ने एक बार फिर तिब्बत पर नियन्त्रण कर लिया और तिब्बत के एक शिष्टमंडल से एक संधि पर हस्ताक्षर करा लिए जिसके अधीन तिब्बत की प्रभुसत्ता चीन को सौंप दी गई।

दलाई लामा भारत भाग आये और तभी से वे तिब्बत की स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

जब चीन ने तिब्बत पर क़ब्ज़ा किया तो उसे बाहरी दुनिया से बिल्कुल काट दिया। इसके बाद तिब्बत के चीनीकरण का काम शुरू हुआ और तिब्बत की भाषा, संस्कृति, धर्म और परम्परा - सबको निशाना बनाया गया।

क्या तिब्बत चीन का हिस्सा है?

चीन-तिब्बत संबंधों से जुड़े कई सवाल हैं जो लोगों के मन में अक्सर आते हैं। जैसे कि क्या तिब्बत चीन का हिस्सा है? चीन के नियंत्रण में आने से पहले तिब्बत कैसा था? और इसके बाद क्या बदल गया?

तिब्बत की निर्वासित सरकार का कहना है, ''इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में तिब्बत विभिन्न विदेशी शक्तियों के प्रभाव में रहा। मंगोलों, नेपाल के गोरखाओं, चीन के मंचू राजवंश और भारत पर राज करने वाले ब्रितानी शासक, सभी की तिब्बत के इतिहास में कुछ भूमिकाएं रही हैं। लेकिन इतिहास के दूसरे कालखंडों में वो तिब्बत था जिसने अपने पड़ोसियों पर ताक़त और प्रभाव का इस्तेमाल किया और इन पड़ोसियों में चीन भी शामिल था।''

''दुनिया में आज कोई ऐसा देश खोजना मुश्किल है, जिस पर इतिहास के किसी दौर में किसी विदेशी ताक़त का प्रभाव या अधिपत्य ना रहा हो। तिब्बत के मामले में विदेशी प्रभाव या दखलंदाज़ी तुलनात्मक रूप से बहुत ही सीमित समय के लिए रही थी।''

लेकिन चीन का कहना है कि ''सात सौ साल से भी ज़्यादा समय से तिब्बत पर चीन की संप्रभुता रही है और तिब्बत कभी भी एक स्वतंत्र देश नहीं रहा। दुनिया के किसी भी देश ने कभी भी तिब्बत को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं दी।''

जब भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना

साल 2003 के जून महीने में भारत ने ये आधिकारिक रूप से मान लिया था कि तिब्बत चीन का हिस्सा है।

चीन के राष्ट्रपति जियांग जेमिन के साथ भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मुलाक़ात के बाद भारत ने पहली बार तिब्बत को चीन का अंग माना।

उस समय भारत में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के नेता थे। इससे साफ जाहिर होता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते बीजेपी और भारत की निकटता चीन के साथ बढ़नी शुरू हो गई। यह भारत के विदेश नीति में आमूल चूल बदलाव दिखता है। इससे पहले कांग्रेस पार्टी की सरकार ने कभी ऐसी गलती नहीं की। कांग्रेस ने तिब्बत पर चीन के कब्जे को कभी मान्यता नहीं दी और तिब्बत को हमेशा आज़ाद मुल्क माना।

हालांकि तब ये कहा गया था कि ये मान्यता परोक्ष ही है, लेकिन दोनों देशों के बीच रिश्तों में इसे एक महत्वपूर्ण क़दम के तौर पर देखा गया था।

वाजपेयी-जियांग जेमिन की वार्ता के बाद चीन ने भी भारत के साथ सिक्किम के रास्ते व्यापार करने की शर्त मान ली थी। तब इस क़दम को यूँ देखा गया कि चीन ने भी सिक्किम को भारत के हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया है।

भारतीय अधिकारियों ने उस वक़्त ये कहा था कि भारत ने पूरे तिब्बत को मान्यता नहीं दी है जो कि चीन का एक बड़ा हिस्सा है, बल्कि भारत ने उस हिस्से को ही मान्यता दी है जिसे स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र माना जाता है।

दिल्ली सांप्रदायिक दंगा: एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दिल्ली पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए

मानवाधिकारों पर काम करने वाला अंतरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में इस साल फ़रवरी में हुए दंगों पर अपनी स्वतंत्र जाँच रिपोर्ट जारी की है।

रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस पर दंगे ना रोकने, उनमें शामिल होने, फ़ोन पर मदद मांगने पर मना करने, पीड़ित लोगों को अस्पताल तक पहुंचने से रोकने, ख़ास तौर पर मुसलमान समुदाय के साथ मारपीट करने जैसे संगीन आरोप लगाए गए हैं।

दंगों के बाद के छह महीनों में दंगा पीड़ितों और शांतिप्रिय आंदोलनकारियों को डराने-धमकाने, जेल में मारपीट और उन्हीं के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए जाने का हवाला देते हुए रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि दिल्ली पुलिस पर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप के एक भी मामले में अब तक एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई है। दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के तहत काम करती है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल के कार्यकारी निदेशक अविनाश कुमार के मुताबिक, ''सत्ता की तरफ़ से मिल रहे इस संरक्षण से तो यही संदेश जाता है कि क़ानून लागू करने वाले अधिकारी बिना जवाबदेही के मानवाधिकारों का उल्लंघन कर सकते हैं। यानी वो ख़ुद ही अपना क़ानून चला सकते हैं।''

रिपोर्ट जारी करने से पहले एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दिल्ली पुलिस का पक्ष जानने के लिए उनसे संपर्क किया पर एक सप्ताह तक कोई जवाब नहीं मिला।  

मार्च में दिल्ली पुलिस के संयुक्त पुलिस आयुक्त आलोक कुमार ने बीबीसी हिंदी संवाददाता सलमान रावी से एक साक्षात्कार में दंगों के दौरान पुलिस के मूक दर्शक बने रहने के आरोप से इनकार किया था और कहा था कि, ''पुलिस कर्मियों के ख़िलाफ़ अगर कोई आरोप सामने आए तो उनकी जांच की जाएगी''।

इससे पहले दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने भी दिल्ली दंगों पर एक फ़ैक्ट-फ़ाइंडिंग रिपोर्ट जुलाई में जारी की थी।

इसमें भी कई पीड़ितों ने पुलिस के एफ़आईआर दर्ज ना करने, समझौता करने के लिए धमकाने और उन्हीं पर हिंसा का आरोप लगाकर दूसरे मामलों में अभियुक्त बनाने की शिकायत की थी।

साथ ही दिल्ली पुलिस पर दंगे को मुसलमान समुदाय को निशाना बनाने की साज़िश की जगह ग़लत तरीक़े से दो समुदाय के बीच का झगड़ा बनाकर पेश करने का आरोप लगाया गया था। दिल्ली पुलिस ने आयोग के किसी सवाल का भी जवाब नहीं दिया था।

दंगों से पहले दिल्ली पुलिस की भूमिका

एमनेस्टी इंटरनेशनल की यह रिपोर्ट 50 दंगा पीड़ित, चश्मदीद, वकील, डॉक्टर, मानवाधिकार आंदोलनकारी, रिटायर हो चुके पुलिस अफ़सर से बातचीत और लोगों के बनाए गए वीडियो के अध्ययन पर आधारित है।

इसमें सबसे पहले 15 दिसंबर 2019 के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में दिल्ली पुलिस के नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे छात्रों से मारपीट और यौन उत्पीड़न के आरोपों का ज़िक्र है।

इस वारदात की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाए जाने की जनहित याचिकाओं का दिल्ली हाई कोर्ट में दिल्ली पुलिस ने विरोध किया है।

इसके बाद पाँच जनवरी 2020 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में रॉड्स के साथ तोड़फोड़ और क़रीब दो दर्जन छात्रों और अध्यापकों के साथ मारपीट का ब्यौरा है।

इस मामले में जेएनयू के छात्रों और अध्यापकों की तरफ़ से 40 से ज़्यादा शिकायतें दर्ज किए जाने के बाद भी दिल्ली पुलिस ने एक भी एफ़आईआर दर्ज नहीं की है।

हालांकि जेएनयू छात्र संघ की आइशी घोष समेत मारपीट में चोटिल हुए कुछ सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर तभी दर्ज कर ली गई थी। रिपोर्ट दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले जनवरी के महीने में हुई कई चुनावी रैलियों में बीजेपी नेताओं के भड़काऊ भाषणों की जानकारी भी देती है।

26 फ़रवरी 2020 को दिल्ली हाई कोर्ट दिल्ली पुलिस को एक 'कॉन्शियस डिसिज़न' (सोचा समझा फ़ैसला) के तहत बीजेपी सांसदों और नेताओं, कपिल मिश्रा, परवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश देती है। इनमें से एक के भी ख़िलाफ़ अब तक कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई है।

जुलाई में बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य को दिए एक साक्षात्कार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने माना था कि भड़काऊ भाषण ग़लत थे, हम उन सभी तरह के बयानों के ख़िलाफ़ हैं जो उकसाने वाले हैं, देश को बदनाम करने वाले हैं और सेक्युलर कैरेक्टर को डैमेज करने वाले हैं। हम इन सबके ख़िलाफ़ हैं। जो किया, ग़लत किया। मैं उसकी मुख़ालफ़त कर रहा हूँ। इस तरह के ज़हरीले बयानों को हमने किसी तरह जस्टीफ़ाई नहीं किया है और न करना चाहिए।

दंगों के दौरान दिल्ली पुलिस की भूमिका

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में कई दंगा पीड़ितों ने अपने बयानों में ये दावा किया है कि जब उन्होंने दिल्ली पुलिस के आपात 100 नंबर पर फ़ोन किया तो या तो किसी ने उठाया नहीं या फिर पलटकर कहा, ''आज़ादी चाहिए थी ना, अब ले लो आज़ादी।''

'हम क्या चाहते? आज़ादी' का नारा सीएए-विरोधी प्रदर्शनों में इस्तेमाल हुआ था और आंदोलनकारियों के मुताबिक़ यहां भेदभाव और अत्याचार से आज़ादी की बात की जा रही थी।

रिपोर्ट में पुलिस के पाँच नौजवानों को जूतों से मारने के वीडियो और उनमें से एक की मां से बातचीत शामिल है जो दावा करती हैं कि उनके बेटे को 36 घंटे जेल में रखा गया, जहां से छुड़ाए जाने के बाद उसकी मौत हो गई।

मां के मुताबिक़ उन्हें बेटे की हिरासत का कोई दस्तावेज़ नहीं दिया गया और ना ही क़ानून के मुताबिक़ बेटे को हिरासत में लिए जाने के 24 घंटों के अंदर मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।

रिपोर्ट में दंगों के दौरान पुलिस के मूकदर्शक बने रहने और कुछ मामलों में पत्थरबाज़ी में शामिल होने और पीड़ितों को अस्पतालों तक पहुंचने से रोकने के मामलों का भी ब्यौरा है।

दंगों में मारे जाने वाले 53 लोगों में से ज़्यादातर मुसलमान हैं और हिंदू समुदाय के मुक़ाबले उनके घर-दुकानों और सामान को ज़्यादा नुक़सान हुआ है।

रिपोर्ट के मुताबिक़ जब उन्होंने एक स्कूल के हिंदू केयरटेकर से बात की तो उन्होंने पुलिस को बार-बार फ़ोन करने पर भी मदद ना मिलने की बात तो की पर साथ ही पुलिस के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाते हुए कहा कि उनके मदद के लिए ना आ पाने की वजह रास्ता रोक खड़े दंगाई थे।

दंगों को हिंदू-विरोधी बताने वाली, गृह मंत्री अमित शाह को सौंपी गई, 'सेंटर फॉर जस्टिस' (सीएफ़जे) नाम के एक ट्रस्ट की रिपोर्ट 'डेली रायट्स: कॉन्सपिरेसी अनरैवल्ड' में भी दिल्ली पुलिस को लेकर यही उदारवादी रवैया दिखाई देता है।

दंगों के बाद पुलिस की भूमिका

दंगों पर पहले आईं रिपोर्ट्‌स से अलग, एमनेस्टी इंटरनेशनल की तहक़ीक़ात दंगों के बाद हुई पुलिस की जांच पर भी नज़र डालती है और उस पर दंगों के बाद मुसलमानों को ज़्यादा तादाद में गिरफ़्तार करने और उन पर कार्रवाई करने का आरोप लगाती है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता ख़ालिद सैफ़ी की फ़रवरी में प्रदर्शन के लिए हुई गिरफ़्तारी का उल्लेख देकर ये दावा किया गया है कि पुलिस हिरासत में उनके साथ जो सलूक हुआ उस वजह से वो मार्च में अपनी पेशी के लिए व्हीलचेयर पर आए।

सैफ़ी छह महीने से जेल में हैं। उन्हें यूएपीए क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया है।

रिपोर्ट में कई दंगा-पीड़ितों के बयान हैं जिनमें वो पुलिस के हाथों प्रताड़ना और जबरन झूठे बयान दिलवाने, दबाव बनाने, कोरे कागज़ पर हस्ताक्षर करवाने के आरोप हैं।

एक ग़ैर-सरकारी संगठन, 'ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क' के व़कील का बयान भी है जो अपने क्लाइंट से बातचीत करने से रोके जाने, पुलिस के बुरे बर्ताव और लाठीचार्ज का आरोप लगाता है।

आठ जुलाई के दिल्ली पुलिस के एक ऑर्डर, जिसमें लिखा था कि दिल्ली दंगों से जुड़ी गिरफ़्तारियों में ''ख़ास ख़याल रखने की ज़रूरत है'' कि इससे ''हिंदू भावनाएं आहत'' ना हों, पर दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस को लताड़ा था।

कोर्ट ने ऑर्डर तो रद्द नहीं किया था पर ताक़ीद की थी कि, ''जांच एजंसियों को ये ध्यान रखना होगा कि वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दी गई हिदायतों से ऐसा कोई भेदभाव ना हो जो क़ानून के तहत ग़लत है''।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पिछले छह महीने के इस ब्यौरे के साथ ये मांग की है कि दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की जांच और जवाबदेही तय हो और पुलिस विभाग को सांप्रदायिक तनाव और हिंसा के व़क्त काम करने के बारे में प्रशिक्षण दिया जाए।

इस रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों पर दिल्ली पुलिस की प्रतिक्रिया का इंतज़ार है। पुलिस की ओर से बयान मिलने पर रिपोर्ट अपडेट कर दी जाएगी।

भारत-चीन तनाव: अगर भारत और चीन के बीच युद्ध होता है तो अंजाम क्या होगा?

भारत के चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ जनरल बिपिन रावत की 24 अगस्त 2020 को की गई 31 शब्दों की एक टिप्पणी ने अधिकतर अख़बारों के पहले पन्ने पर जगह बनाई और साथ ही इस पर ख़ासी चर्चाएं भी हुईं।

इसमें उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा था, ''लद्दाख में चीनी सेना के अतिक्रमण से निपटने के लिए सैन्य विकल्प भी है लेकिन यह तभी अपनाया जाएगा जब सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर वार्ता विफल रहेगी।''

रक्षा सेवा में रहे दिग्गजों ने शायद ही उनके इस बयान पर भौंहें चढ़ाई हों।

सेना के उत्तरी कमान के प्रमुख रहे लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डी.एस. हुड्डा ने कहा, ''क्या सीडीएस कह सकते हैं कि सैन्य विकल्प मौजूद नहीं हैं? मुझे लगता है कि वो केवल तथ्य बता रहे थे।''

भारतीय वायु सेना के उप-प्रमुख पद से रिटायर होने वाले एयर मार्शल अनिल खोसला कहते हैं, ''सीडीएस ने जो कहा, मुझे उसमें कुछ भी ग़लत नहीं लगा। यह एक नपा-तुला बयान था और मुझे लगता है कि यह थोड़ा पहले आ जाना चाहिए था।''

जनरल रावत के बयान के निहितार्थ निकालने से पहले हमें चीन के बारे में भी जान लेना चाहिए।

चीन की ज़मीनी सीमा 22,000 किलोमीटर और तटीय सीमा 18,000 किलोमीटर लंबी है। इसके अलावा विदेशों में भी उसने अपना आधारभूत ढांचा तैयार किया हुआ है जिसमें जिबूती में उसका बेस भी शामिल है।

भारत में रक्षा बलों को रक्षा मंत्रालय और गृह मंत्रालय अलग-अलग नियंत्रित करते हैं वहीं चीन में एक सेंट्रल मिलिट्री कमिशन (सीएमसी) है।  सीएमसी को सेना का प्रमुख अंग और उसके सैन्य बलों का कमांडर बताया जाता है और इसका नेतृत्व चेयरमैन और वाइस चेयरमैन करते हैं।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सीएमसी के चेयरमैन हैं।

सीएमसी चीन के हर एक सैन्य बल को नियंत्रण करती है। इनमें पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), पीएलए नेवी (पीएलएएन), पीएलए एयर फ़ोर्स, (पीएलएएएफ़) पीएलए रॉकेट फ़ोर्स (पीएलएआरएफ़), पीएलए स्ट्रैटेजिक सपोर्ट फ़ोर्स (पीएलएएसएसएफ़) और पीएलए जॉइंट लॉजिस्टिक सपोर्ट फ़ोर्स (पीएलएजेएलएसएफ़) शामिल हैं।  

भारत में जहां हर सेना की अपनी कमान है। वहीं चीनी सेना में भौगोलिक दृष्टि से परिभाषित पांच थिएटर कमान (टीसी) हैं। इनमें ईस्टर्न टीसी, सदर्न टीसी, वेस्टर्न टीसी, नॉर्दर्न टीसी और सेंट्रल टीसी शामिल हैं।

2019 में सुरक्षा पर जारी श्वेत पत्र में चीन के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने 2012 के बाद से हुए बदलावों के बारे में बताया था। इसमें कहा गया था-

संयुक्त सेना ने अपनी क्षमता को 3,00,000 जवानों से कम कर दिया है जबकि सक्रिय जवानों की संख्या 20 लाख है।

थल सेना में जहां जवान कम किए गए वहीं एयरफ़ोर्स ने अपने जवानों की संख्या बरक़रार रखी। वहीं, नेवी और पीएलएआरएफ़ में जवानों की संख्या बढ़ाई गई।

पीएलएआरएफ़ के पास चीन के परमाणु और पारंपरिक मिसाइलों का भंडार है और इसे पहले सेकंड अर्टिलरी फ़ोर्स भी कहा जाता था।

2012 से चीनी सेना पर अच्छा ख़ासा पैसा ख़र्च किया गया है। यह पैसा अच्छे वेतन, जवानों की ट्रेनिंग और उनके लिए काम करने का अच्छा माहौल बनाने, पुराने हथियारों को ख़रीदकर नए हथियार बनाने, सैन्य सुधार और विभिन्न सुरक्षाबलों के बीच सामंजस्य बनाने जैसे कामों पर खर्च किया गया।

हालांकि, कई भारतीय रक्षा विशेषज्ञों को चीन के इन दावों पर शक़ है।  कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि चीनी तकनीक अप्रमाणित हैं और उनके सुरक्षाबलों के पास युद्ध के अनुभव की कमी है।

क्या भारत के पास चीन के खिलाफ सैन्य विकल्प मौजूद है?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय सेना ख़ुद को चीन के साथ लगने वाली 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर रक्षात्मक युद्ध में लगा देखती है।

इसका सीधा-सीधा मतलब है कि यह लड़ाई सामने से आने वाले दुश्मन को मार गिराने की है।

जनरल हुड्डा कहते हैं, ''चीन को लेकर हमारी सैन्य रणनीति पाकिस्तान से बिलकुल अलग है। पाकिस्तान को लेकर हम आक्रामक रहते हैं, विभिन्न क्षेत्रों में उन्हें धमकी भी देते रहते हैं लेकिन चीन को धमकाने के मामले में हम रक्षात्मक रणनीति अपनाते हैं और हम युद्ध करने की कल्पना भी नहीं करते हैं। इसका मतलब ये नहीं है कि हम एलएसी के पार जाकर हमला नहीं कर सकते हैं। ज़रूरत पड़ने पर हमें करना चाहिए। भारत ने माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स का गठन इसी मक़सद के लिए किया है।''

चीनी घुसपैठ के जवाब में क्या भारत जैसे को तैसा वाली रणनीति अपनाकर उसकी कुछ ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके सौदेबाज़ी कर सकता है?

इस सवाल पर लेफ़्टिनेंट जनरल हुड्डा कहते हैं, ''इस तरह के विकल्प शायद पहले अपनाए जाते। जैसे को तैसे की रणनीति अपनाकर सौदेबाज़ी करने का विकल्प काफ़ी भड़काऊ दिखाई दे सकता है लेकिन मुझे लगता है कि हम अच्छी स्थिति में हैं और उनका जवाब देने के लिए हमारे पास सैन्य क्षमता है।''

क्या लद्दाख की भौगोलिक स्थिति भारत को बढ़त देती है?

इस सवाल पर लेफ़्टिनेंट जनरल हुड्डा कहते हैं, ''पूर्वी लद्दाख का क्षेत्र समतल है और काफ़ी ऊंचाई पर है। एलओसी की तरह यह पहाड़ी नहीं है। सड़क नेटवर्क भी अच्छा है, अधिकतर चौकियों पर गाड़ी से आया जाया जा सकता है वहां हमें कोई चुनौती नहीं है। लेकिन यह कहना ग़लत होगा कि लद्दाख़ की भौगोलिक स्थिति भारत के पक्ष में है। चीन का मूलभूत ढांचा बहुत बेहतर है और यह उनको बढ़त देता है।''

क्या भारत की नौसेना-वायुसेना चीन से मज़बूत है?

अगर चीन के साथ समुद्री क्षेत्र में मामला बिगड़ता है तो क्या स्थिति होगी? इस पर नौसेना के एक पूर्व प्रमुख ने बताया कि उस हालत में भारत उस क्षेत्र में जाएगा जहां वो मज़बूत स्थिति में है यानी हिंद महासागर में।

वो कहते हैं, ''अगर कोई कहता है कि नौसेना को दक्षिण चीन सागर में चीन पर हमला करने के लिए भेजा जाएगा तो मुझे हैरानी होगी। हम चीन पर हिंद महासागर में ही बढ़त बना सकते हैं क्योंकि हम इस इलाक़े को जानते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हमारे पास यहां उनसे अधिक साज़ो-सामान उपलब्ध होगा।''

कई विश्लेषकों का मानना है कि अगर भारत सैन्य विकल्प की ओर जाता है तो भारतीय वायु सेना का इस्तेमाल सबसे बेहतर रहेगा।

ऐसा अनुमान है कि एयर बेस से कम ऊंचाई पर उड़ने के कारण भारतीय जहाज़ों में अधिक तेल और हथियार रहेगा। वहीं, चीनी वायु सेना तिब्बत के पठार और अन्य ऊंची जगहों से उड़ान भरेगी जहां पर बेहद बारीक हवा बहती है जिसकी वजह से हथियार रखने पर उनका अधिक तेल ख़र्च होगा।

लेकिन यही सब कुछ नहीं है।

पूर्वी एयर कमान के प्रमुख रहे एयर मार्शल (रिटायर्ड) खोसला कहते हैं, ''यह माना जाता रहा है कि हमें टी-3 की बढ़त है- मतलब टेक्नोलॉजी, टेरेन (भूगोल) और ट्रेनिंग। तकनीकी रूप से वो आगे हैं लेकिन दावों और वास्तविक क्षमता में संदेह है। भूगोल और ट्रेनिंग की बढ़त हमें है लेकिन वो इन मुद्दों को देख रहे हैं और व्यवस्थित रूप से इन्हें हल कर रहे हैं। अंतर कम करने के लिए हमें अपनी क्षमता को गुणात्मक और संख्यात्मक रूप से बढ़ाने की ज़रूरत है।''

उन्होंने बताया कि हाल के सालों में पीएलएएएफ़ ने कितनी तेज़ी से ख़ुद को विकसित किया है।

एयर मार्शल (रिटायर्ड) खोसला ने कहा, ''चीनी वायुसेना पीएलए का ही हिस्सा रही है। किसी भी सेना की तरह यह अच्छे से बनी है जिसके पास आवश्यकता के सारे साज़ो-सामान हैं। चीन के आर्थिक तौर पर उभरने के बाद खाड़ी युद्ध के दौरान उसने अपनी नौसेना और वायुसेना को तेज़ी से आधुनिक बनाना शुरू किया था। आज उनकी वायु सेना तेज़ी से अपनी क्षमताएं बढ़ा रही है।''

चीन से मुकाबला करने के लिए भारत को कहां तेज़ी लाने की ज़रूरत है?

खोसला कहते हैं कि भारत पर चीन की सबसे बड़ी बढ़त उसका स्वदेशी रक्षा विनिर्माण बेस है।

विनिर्माण बेस होने की वजह से हथियारों की आपूर्ति देश में ही हो सकती है जबकि भारत इस दिशा में काम कर रहा है और आने वाले भविष्य में उसे आयातित हथियारों पर निर्भर रहना होगा।

इसके अलावा जब साइबर और अंतरिक्ष की क्षमताओं की बात आती है तो उसमें भी चीन की भारत पर बढ़त क़ायम है।

चीफ़ ऑफ़ इंटिग्रेटेड डिफ़ेंस स्टाफ़ के पद से रिटायर हुए लेफ़्टिनेंट जनरल सतीश दुआ कहते हैं, ''चीन ने साइबर आर्मी बनाने में महारत पाई है और उसकी उस क्षेत्र में क्षमताएं हैं जहां पर हम पहुंचने का सोच रहे हैं।  हमारे सैन्य बलों को बेस्ट टैलेंट को आकर्षित करना होगा। हमारे देश में टैलेंट हैं लेकिन वो हमारे साथ काम करने की जगह किन्हीं और के साथ काम कर रहे हैं।''

चीन के श्वेत पत्र में सैन्य सुधार का भी ज़िक्र था। जनरल दुआ भारत में सैन्य सुधार के अपने अनुभवों को साझा करते हैं।

वो कहते हैं, ''भारत में अभी साइबर, स्पेस एजेंसी और एक विशेष बल डिवीज़न है। हम चाहते हैं कि यह कमान मज़बूत और सुसज्जित हों। यहां तक कि 2013 में हमें इन विशेष बलों को सक्रिय करने की अनुमति मिल गई थी लेकिन हम इन्हें 2018 के आख़िर में सक्रिय कर पाए। ये बहुत कमज़ोर काम था। इस तरह की योजनाओं को लागू करने में तेज़ी लाने वाले सुधार किए जाने चाहिए। हमें तहख़ानों में बैठकर काम करना बंद कर देना चाहिए। युद्ध के तरीक़े लगातार बदल रहे हैं इसलिए जो पुराने ढर्रों पर चलना चाह रहे हैं उन्हें बदले जाने की ज़रूरत है।''

एनआईए चार्जशीट: पुलवामा हमले में जैश-ए-मोहम्मद का हाथ

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने भारत में कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले की चार्जशीट दाख़िल कर दी है।

चार्जशीट के अनुसार इस हमले के पीछे पाकिस्तान की धरती पर सक्रिय आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का हाथ है।

हालांकि पाकिस्तानी सरकार या उसके किसी संस्थान का चार्जशीट में नाम नहीं है।

14 फ़रवरी, 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले को आतंकवादियों ने विस्फोटक से भरी एक गाड़ी से भिड़ा दिया था जिसमें 40 से अधिक जवान मारे गए थे।

श्रीनगर स्थित बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर के अनुसार एनआईए ने 13,800 पन्नों की चार्जशीट दाख़िल की है।

एजेंसी ने इसमें जैश के प्रमुख मसूद अज़हर, उनके भाई मुफ़्ती अब्दुल रऊफ़ असग़र और उनके एक डिप्टी मारूफ़ असग़र को मुख्य साज़िशकर्ता क़रार दिया है।

मसूद अज़हर उन तीन आतंकवादियों में से एक हैं जिन्हें पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादियों के ज़रिए अग़वा किए भारतीय विमान आईसी-814 के यात्रियों को रिहा करने के बदले में उस समय की वाजपेयी सरकार ने छोड़ा था।

चार्जशीट में 20 लोगों के नाम लिए गए हैं जिन्होंने साज़िश रची, या साज़िश रचने में मदद की या फिर उस साज़िश को ज़मीन पर अमल किया।

चार्जशीट में उमर फ़ारूक़, शेख़ बशीर अहमद, तारिक़ शाह, मोहम्मद अब्बास नासिर, मोहम्मद इक़बाल, वैज उल-इस्लाम, इशान जान, और बिलाल अहमद के नाम शामिल हैं।

चार्जशीट के मुताबिक़ मसूद अज़हर के भांजे मोहम्मद उमर फ़ारूक़ बम बनाने के विशेषज्ञ थे जो 2018 में एलओसी पार कर भारत के कश्मीर में दाख़िल हुए थे। उमर फ़ारूक़ को इक़बाल राथेर ने स्थानीय मदद दी थी।

चार्जशीट में आदिल डार का नाम भी शामिल है। चार्जशीट में कहा गया है कि उमर फ़ारूक़ ने स्थानीय लोगों की मदद से इतने बड़े पैमाने पर विस्फोटक तैयार किया जिसे आदिल डार ने गाड़ी में भरकर सीआरपीएफ़ के क़ाफ़िले से टकरा दिया था।

आदिल डार की तो मौक़े पर ही मौत हो गई थी, लेकिन चार्जशीट में जिन 20 लोगों का नाम लिया गया है उनमें से सात को बाद में सुरक्षाबलों ने अलग-अलग मुठभेड़ में मारने का दावा किया है।

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार सात लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है और चार लोग अभी भी फ़रार हैं।

कुवैत में रह रहे लाखों भारतीयों का भविष्य अंधकार में डूबा, वापसी के आसार

कोरोना वायरस की महामारी ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की हालत ख़राब कर दी है। इसका असर लोगों के रोज़गार पर बहुत ही बुरा पड़ा है। तेल पर निर्भर अरब देशों की अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति और कमज़ोर हुई है। ऐसे में वहां की सरकारें प्रवासी कामगारों को लेकर नियम सख़्त कर रही हैं ताकि स्थानीय लोगों को रोज़गार मिल सके।

कुवैत टाइम्स दैनिक अख़बार के अनुसार कुवैत की नेशनल असेंबली ने प्रवासी कामगारों की संख्या सीमित करने के लिए मसौदा तैयार कर लिया है। इस मसौदे में कुछ ख़ास वीज़ा की मान्यता रद्द करने का भी प्रस्ताव है। अख़बार के अनुसार कुवैत में प्रवासी कामगारों की संख्या सीमित करने वाला क़ानून छह महीने के भीतर लागू हो जाएगा।

अख़बार का कहना है कि इस क़ानून की दस अलग-अलग श्रेणियों में कोटा सिस्टम पर छूट दी जाएगी। यह छूट घरों में काम करने वालों, मेडिकल स्टाफ़, शिक्षक और जीसीसी के नागरिकों को मिलेगी। यात्रा वीज़ा को वर्क वीज़ा में तब्दील करने की सुविधा को भी कुवैत प्रतिबंधित करने जा रहा है। इसके अलावा कोई डोमेस्टिक हेल्पर प्राइवेट या ऑइल सेक्टर में काम नहीं कर सकता है।

कुवैत प्रवासियों की संख्या कम करने के लिए कई स्तरों पर काम कर रहा है। पिछले हफ़्ते कुवैत ने घोषणा की थी कि बिना यूनिवर्सिटी की डिग्री के 60 साल से ऊपर की उम्र वालों को वर्क वीज़ा नहीं मिलेगा।

लार्सन एंड टर्बो में प्रतीक देसाई चीफ़ एग्जेक्युटिव हैं। वो 25 सालों से कुवैत में रह रहे हैं। लेकिन कुवैत सरकार के नए बिल से अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं।

प्रतीक देसाई ने बीबीसी से पिछले महीने कहा था, ''इस बिल के लागू होने के बाद आठ लाख भारतीयों को कुवैत छोड़ना पड़ सकता है। 40 लाख की आबादी में यहां 70 फ़ीसदी प्रवासी हैं। इस बिल का लक्ष्य प्रवासियों की तादाद 30 फ़ीसदी करना है।''

इन प्रवासियों में भारतीय सबसे ज़्यादा हैं। भारत के अलावा यहां पाकिस्तान, फ़िलीपीन्स, बांग्लादेश, श्रीलंका और मिस्र के लोग हैं।

भारत सरकार भी कुवैत के इस बिल को लेकर चिंतित है। पिछले महीने भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा था, ''भारतीयों की खाड़ी के देशों में अहम भूमिका रही है और इनके योगदान को वहां की सरकारें स्वीकार भी करती हैं। हमने कुवैत से इस मसले पर बात की है।''

प्रतीक देसाई का कहना है कि यह मामला केवल जॉब जाने का नहीं है बल्कि यहां से वापस आने का है। वो कहते हैं, ''जब आप लंबे समय से किसी जगह पर रहते हैं तो एक किस्म का भावनात्मक संबंध विकसित हो जाता है। इस फ़ैसले से हम आर्थिक से ज़्यादा भावनात्मक रूप से प्रभावित होंगे।''

कुवैत से भारतीय कमाई कर अपने परिजनों को भेजते हैं और यह भारत के लिए विदेशी मुद्रा का अहम स्रोत रहा है। प्यू रिसर्च सेंटर के डेटा के अनुसार 2017 में कुवैत से भारतीयों ने 4.6 अरब डॉलर भारत भेजे थे। कुवैत में क़रीब तीन लाख भारतीय ड्राइवर, रसोइए और केयरटेकर का काम करते हैं।

सीडीएस जनरल बिपिन रावत: चीन से बातचीत नाकाम हुई तो सैन्य विकल्प मौजूद

भारत के चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत ने कहा है कि चीन के साथ अगर बातचीत फ़ेल हुई, तो भारत के पास सैन्य विकल्प मौजूद है।

भारत में दिल्ली से प्रकाशित होने वाली इंग्लिश न्यूज़ पेपर हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, रावत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पूर्वी लद्दाख में चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा किए गए अतिक्रमण से निपटने के लिए भारत के पास एक सैन्य विकल्प मौजूद है, लेकिन इसका इस्तेमाल तभी किया जाएगा जब दोनों देशों की सेनाओं के बीच बातचीत और राजनयिक विकल्प निष्फल साबित हो जायेंगे।

जनरल रावत ने अख़बार से बातचीत में कहा कि ''वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अतिक्रमण या सीमा-उल्लंघन उस क्षेत्र की अलग-अलग समझ होने पर होता है। डिफ़ेंस सेवाओं को ज़िम्मेदारी दी जाती है कि वो एलएसी की निगरानी करें और घुसपैठ को रोकने के लिए अभियान चलाएं। किसी भी ऐसी गतिविधि को शांतिपूर्वक हल करने और घुसपैठ को रोकने के लिए सरकार के संपूर्ण दृष्टिकोण को अपनाया जाता है। लेकिन सीमा पर यथास्थिति बहाल करने में सफलता नहीं मिलती तो फ़ौज सैन्य कार्यवाही के लिए हमेशा तैयार रहती है।''

उन्होंने कहा कि भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार सभी लोग इस उद्देश्य के साथ सभी विकल्पों की समीक्षा कर रहे हैं कि चीन की सेना लद्दाख में यथास्थिति बहाल करे।

साल 2017 में चीनी सेना के ख़िलाफ़ डोकलाम में 73 दिन के सैन्य गतिरोध के दौरान भारत के सेना प्रमुख रहे जनरल बिपिन रावत ने अख़बार से बातचीत में इस धारणा को भी ख़ारिज किया कि प्रमुख ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है।

उन्होंने कहा कि भारत के हिन्द महासागर क्षेत्र के साथ-साथ उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर एक विशाल फ्रंट-लाइन है जिसकी सभी को लगातार निगरानी की आवश्यकता है।

उनके अनुसार सूचनाओं के संग्रहण और संयोजन के लिए ज़िम्मेदार सभी एजेंसियों के बीच नियमित रूप से बातचीत होती है।

उन्होंने कहा कि मल्टी-एजेंसी सेंटर हर रोज़ बैठकें कर रहा है जिनमें लगातार लद्दाख या भारतीय ज़मीन के किसी अन्य टुकड़े की स्थिति को लेकर बातचीत होती है।

जनरल रावत ने इस इंटरव्यू में किसी भी ऑपरेशन के डिटेल्स साझा करने से इनकार किया।

इससे पहले 11 अगस्त को बिपिन रावत ने एक संसदीय समिति को बताया था कि भारतीय सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे वक़्त तक चीन का मुक़ाबला करने और सर्दियों के दौरान पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में तैनाती के लिए तैयार है।

उन्होंने कहा था कि दोनों पक्षों के बीच तनाव कम होने में अधिक समय लग सकता है, लेकिन हम हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार हैं और लद्दाख में इसके इंतजाम भी कर लिए गए हैं।

गुपकर घोषणापत्र: जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए संघर्ष का ऐलान

भारत में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा वापस लिए जाने के बाद बीजेपी को छोड़कर केंद्र शासित प्रदेश के प्रमुख राजनीतिक दल शनिवार को एक साथ आए और अनुच्छेद-370 को फिर से बहाल करने को लेकर बयान जारी किया। बयान में कहा गया है कि वो इसको लेकर संघर्ष करेंगे।

नेशनल कॉन्फ़्रेंस (एनसी), पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), पीपल्स कॉन्फ़्रेंस, सीपीआईएम, कांग्रेस और आवामी नेशनल कॉन्फ़्रेंस ये वो दल हैं जिन्होंने 'गुपकर घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर किए थे।

'गुपकर घोषणापत्र' के हस्ताक्षकरकर्ताओं ने बयान में कहा है कि 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार के क़दम ने जम्मू-कश्मीर और नई दिल्ली के बीच रिश्तों को बदल दिया है।

बयान में कहा गया है कि सभी दल 4 अगस्त 2019 के 'गुपकर घोषणापत्र' का पालन करेंगे जिसमें क्षेत्रीय दलों ने संविधान के तहत दिए गए जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को बरक़रार रखने के लिए लड़ने का वादा किया है।

पीडीपी की नेता और जम्मू और कश्मीर राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती अभी भी हिरासत में हैं।

पिछले साल केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य के विशेष दर्जे को समाप्त करते हुए इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था।

अनुच्छेद-370 को हटाने के बाद सैकड़ों राजनेताओं को हिरासत में ले लिया था और कइयों को कठोर पब्लिक सेफ़्टी एक्ट (PSA) जैसे क़ानून के तहत हिरासत में लिया गया था।

जम्मू और कश्मीर राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों फ़ारूक़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती को इसी PSA क़ानून के तहत हिरासत में लिया गया था।

महबूबा मुफ़्ती की हिरासत को और तीन महीनों के लिए बढ़ा दिया गया है।

अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद सभी संचार के साधन बंद कर दिए गए थे और कड़े प्रतिबंधों के साथ-साथ कर्फ़्यू लगा दिया गया था। इसके साथ ही भारी सुरक्षाबलों की तैनाती की गई थी ताकि किसी भी विरोध प्रदर्शन को रोका जा सके।

सभी दलों के साझा बयान में अनुच्छेद-370 और 35ए को फिर से बहाल करने की मांग की गई है। साथ ही कहा गया है कि राज्य का बंटवारा अस्वीकार्य है।

5 अगस्त 2019 को दुर्भाग्य बताते हुए सभी नेताओं ने कहा है कि यह असंवैधानिक था और संविधान को समाप्त करने की कोशिश की गई।

बयान में कहा गया, ''हम कौन हैं? इसे दोबारा परिभाषित करने के लिए यह कोशिश हुई। लोगों को चुप रखने और उन्हें दबाने के लिए दमनकारी तरीक़ों से ये बदलाव हुए।''

पिछले साल कश्मीर में मुख्यधारा के राजनीतिक नेतृत्व ने 'गुपकर घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर किए थे।

इस घोषणापत्र में सर्वसम्मति से यह फ़ैसला लिया गया था कि सभी दल जम्मू-कश्मीर की पहचान, स्वायत्तता, सुरक्षा, ख़ास दर्जे को बरक़रार रखने और किसी भी प्रकार के हमले के लिए एकजुट रहेंगे।

यह बैठक एनसी के वरिष्ठ नेता और सांसद फ़ारूक़ अब्दुल्ला के घर गुपकर रोड पर हुई थी इसलिए इस घोषणापत्र का नाम 'गुपकर घोषणापत्र' रखा गया।

बॉम्बे हाई कोर्ट: तब्लीग़ी जमात के विदेशियों को बलि का बकरा बनाया गया

बॉम्बे हाई कोर्ट ने बहुचर्चित तब्लीग़ी जमात मामले में शुक्रवार को अहम फ़ैसला सुनाया है। कोर्ट ने दिल्ली के निज़ामुद्दीन के मरकज़ में तब्लीग़ी जमात के कार्यक्रम में शामिल होने वाले 29 विदेशी नागरिकों के ख़िलाफ़ दायर की गई एफ़आईआर को रद्द कर दिया है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि ''मीडिया में मरकज़ में शामिल विदेशियों को लेकर बड़ा प्रोपोगैंडा चलाया गया और ऐसी तस्वीर बनाई गई कि कोविड-19 बीमारी का वायरस फैलाने के लिए यही लोग ज़िम्मेदार हैं।''

इन विदेशी नागरिकों पर टूरिस्ट वीज़ा की शर्तों का उल्लंघन कर तब्लीग़ी जमात के कार्यक्रम में शामिल होने का आरोप लगाया गया था, जिसके चलते इन पर आईपीसी की विभिन्न धाराओं, महामारी रोग अधिनियम, महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, आपदा प्रबंधन अधिनियम और फ़ॉरेनर्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था।

विदेशी नागरिकों के अलावा, पुलिस ने छह भारतीय नागरिकों और याचिकाकर्ताओं को शरण देने वाली मस्जिदों के ट्रस्टियों के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज किया था।

औरंगाबाद पीठ के जस्टिस टीवी नलवड़े और जस्टिस एमजी सेवलिकर की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर की गई तीन अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई की। ये याचिकाकर्ता आइवरी कोस्ट, घाना, तंज़ानिया, जिबूती, बेनिन और इंडोनेशिया के नागरिक हैं।

दरअसल पुलिस ने दावा किया था कि उसे गुप्त जानकारी मिली है कि ये लोग अलग-अलग इलाक़ों की मस्जिदों में रह रहे हैं और लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन कर नमाज़ अदा कर रहे हैं, जिसके बाद सभी याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया था।

हालांकि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वो मान्य वीज़ा लेकर भारत आए थे, जिसे भारत सरकार ने ही जारी किया था और वो भारत की संस्कृति, परंपरा, आतिथ्य और भारतीय भोजन का अनुभव करने के लिए यहां आए थे।

उनका कहना है कि एयरपोर्ट पर पहुंचने पर उनकी स्क्रीनिंग हुई थी और कोविड-19 वायरस का टेस्ट हुआ था और रिपोर्ट नेगेटिव आने के बाद ही उन्हें एयरपोर्ट से बाहर निकलने की इजाज़त दी गई थी।

उनके मुताबिक़ यहां तक कि उन्होंने ज़िला पुलिस अधीक्षक को भी अहमदनगर ज़िले में पहुंचने की जानकारी दी थी। लेकिन 23 मार्च को लॉकडाउन हो जाने की वजह से गाड़ियां चलनी बंद हो गई थीं, होटल और लॉज बंद हो गए थे, इसकी वजह से मस्जिदों ने उन्हें आसरा दिया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि उन्होंने ज़िला कलेक्टर के आदेशों का उल्लंघन करने जैसा कोई ग़ैर-क़ानूनी काम नहीं किया है।

कोर्ट के आदेश के अनुसार, ''प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में मरकज़ में शामिल विदेशियों को लेकर बड़ा प्रोपोगैंडा चलाया गया और ऐसी तस्वीर बनाई गई कि देश में कोविड-19 बीमारी का वायरस फैलाने के लिए यही लोग ज़िम्मेदार हैं। एक तरह से इन विदेशियों का उत्पीड़न किया गया।''

''एक तरफ जब कोरोना महामारी या आपदा अपने पैर पसार रही थी तब राजनीति से प्रेरित एक सरकार बलि का बकरा तलाश रही थी, और ऐसा लगता है कि इन विदेशियों को बलि का बकरा बना दिया गया। सभी हालात और कोरोना संक्रमण से जुड़े ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ इस तरह के कदम उठाने की ज़रूरत नहीं थी।''

''वक्त आ गया है कि इस मामले में विदेशियों के ख़िलाफ़ कदम उठाने के लिए अब पछतावा जताया जाए और जो हानि हो चुकी है उसे सुधारने के लिए सकारात्मक कदम उठाए जाएं।''

क्या औरतें दिल्ली में कोरोना वायरस से ज़्यादा शिकार हुईं हैं?

दिल्ली में हुए दूसरे राउंड के सीरो सर्वे से पता चला है कि मर्दों की तुलना में औरतें कोरोना वायरस की ज़्यादा शिकार हुईं हैं।

सर्वे में पता चला कि लगभग एक तिहाई लोगों ने कोरोना का एंटीबॉडीज़ विकसित कर लिया है।

इस सर्वे के लिए 15 हज़ार से ज़्यादा लोगों के ब्लड सैंपल जमा किए गए थे।

जुलाई के महीने में दिल्ली में पहला सीरो सर्वे हुआ था जिसमें पाया गया था कि 23.48 फ़ीसद लोगों ने एंटीबॉडीज़ डेवेलप कर लिया है।

दिल्ली में अब तक डेढ़ लाख से ज़्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं और 4257 लोगों की मौत हो चुकी है।

दूसरा सर्वे अगस्त के शुरू में किया गया था। इस सर्वे के अनुसार 32.2 फ़ीसद महिलाओं ने एंटीबॉडीज़ विकसित किया है जबकि मर्दों में ये संख्या 28 फ़ीसद है।

इसकी क्या वजह है, अभी ये नहीं पता चल सका है। सर्वे में पता चला है कि कुल मिलाकर 29 फ़ीसद लोगों में एंटीबॉडीज़ डेवेलप हुआ है।

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि दिल्ली की कुल आबादी दो करोड़ का तीस फ़ीसद यानी क़रीब 60 लाख लोग कोरोना से संक्रमित हुए थे और वो अब ठीक भी हो चुके हैं।

दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा कि अभी भी दिल्ली हर्ड इम्युनिटी विकसित करने से बहुत दूर है।

जब किसी एक जगह में बहुत सारे लोग वायरस से इम्युन हो जाते हैं तो इसे हर्ड इम्युनिटी कहा जाता है और फिर वायरस का फैलाव बंद हो जाता है।

स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार अगर किसी जगह पर 40 से लेकर 70 फ़ीसद लोग एंटीबॉडीज़ विकसित कर लेते हैं तो वहां हर्ड इम्युनिटी विकसित हो जाती है।

मुंबई और पुणे में किए गए ठीक इसी तरह के सर्वे से पता चला है कि वहां 40 फ़ीसद से ज़्यादा लोगों ने एंटीबॉडीज़ डेवेलप कर लिया है। पुणे में तो ये 50 फ़ीसद तक पहुँच गया है।

दिल्ली भारत के सबसे ज़्यादा कोरोना प्रभावित शहरों में से एक है और जून के पहले दो हफ़्तों में तो यहां अस्पतालों में बेड की भारी कमी देखी गई थी।

लेकिन फिर उसके बाद से अस्पतालों की हालत में सुधार हुई है, अस्पतालों में बेड बढ़ा दिए गए हैं और रोज़ाना संक्रमितों की संख्या में भी काफ़ी कमी देखी जा रही है।