भारत में उच्च शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार
भारत एक विशाल और पिछड़ा देश है। भारत में शिक्षा व्यवस्था में व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार मौजूद है। भारत की एक अरब पच्चीस करोड़ से ज्यादा की आबादी के लिए न तो पर्याप्त स्कूल हैं, न कालेज और न ही यूनिवर्सिटियां। और जो हैं भी, उनकी हालत भी बदतर हैं।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति कितनी नाज़ुक और भयावह है। इसका एहसास तो तब होता है, जब प्रति वर्ष बारहवीं के बोर्ड का परिणाम आता है और दिल्ली विश्वविद्यालय या अन्य विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए मारा मारी शुरू हो जाती है। कट आफ लिस्ट देखकर तो ऐसा लगता है कि इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाने के लिए छात्र को 99 प्रतिशत से अधिक अंक लाना जरूरी है वर्ना वे इन चुनी हुई यूनिवर्सिटियों में प्रवेश लेने का सपना ही न देखें। इसके कारण बहुत से छात्र और छात्राएँ अवसाद का शिकार होकर आत्महत्या तक कर लेते हैं।
एक आंकड़े के अनुसार, प्रति एक लाख छात्रों पर बिहार, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में क्रमशः सिर्फ 7, 8 और 11 कालेज हैं। दक्षिण के राज्यों में स्थिति थोड़ी बेहतर है। मगर यह तय है कि भारत के शिक्षण संस्थान गिनती एवं गुणवत्ता दोनों ऐतबार से दुनिया के निम्न स्तर पर हैं।
भारत में सरकारों को इसकी कोई चिंता नहीं है कि पास होने वाले बच्चों को एडमिशन मिलता है या नहीं। और अगर मिल भी गया तो जिन विश्वविद्यालय या कोलेजों में वे जाते हैं, वहां भी शिक्षा का स्तर बदतर होता और वहां निम्न स्तर की पढाई होती है। कुछ गिने-चुने विश्वविद्यालय को यदि छोड़ दिया जाए तो एक बड़ी संख्या ऐसे विश्वविद्यालयों की है, जहां शिक्षा का स्तर इतना निम्न होता है कि छात्र-छात्राओं को डिग्रियां तो मिल जाती हैं। मगर वे रोजगार से प्रायः कोसों दूर रहते हैं।
अगर उच्च शिक्षा की बात की जाए तो स्थिति बेहद खराब और दयनीय है। हालांकि स्नातक तक पढ़ने वाले कुछ छात्र-छात्राएं प्रतियोगी परिक्षाएं पास करके सरकारी नौकरियों में खप जाते हैं। मगर अधिकांश दर-दर भटकने के लिए मजबूर ही होते हैं। उन्हें कम वेतन वाली प्राइवेट नौकरियों के सहारे अपने जीवन की गाड़ी खींचनी पड़ती है।
भारत में केवल उन्हीं छात्र-छात्राओं को नौकरियां नसीब हो पाती हैं जो या तो तकनीकी शिक्षा से लैस होते हैं या फिर कुछ विशेष प्रकार के रोजगार परक कोर्स करके कहीं न कहीं अपने लिए रोजगार का जुगाड़ कर लेते हैं।
मगर चिंता भारत में उच्च शिक्षा के दिनोंदिन गिरते स्तर को लेकर है। प्रायः यह देखने में आता है कि एमए करने के बाद भी छात्र-छात्राओं को पढ़ाई छोड़ने को विवश होना पड़ता है क्योंकि उसके बाद की डिग्रियां प्राप्त करने के बाद भी यह निश्चित नहीं होता है कि उन्हें कहीं न कहीं पढ़ाने के लिए बहाल कर ही लिया जाएगा।
टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड रैंकिंग के अनुसार, भारत की कोई भी यूनिवर्सिटी या शिक्षण संस्थान 1 से 500 की रैंकिंग के भीतर नहीं आता। शर्मनाक स्थिति यह है कि भारत के कुछ संस्थानों का नाम 600 से 800 के बीच आता है।
इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारत दुनिया के विकसित देशों के मुकाबले कितना पिछड़ा हैं।
पिछले दिनों यूजीसी ने एक सर्कूलर जारी किया था कि जो छात्र या छात्राएं यहां तक कि शिक्षक भी अगर पीएचडी के शोध पत्र में नकल करते पाए गए तो या तो उनकी डिग्री रद्द कर दी जाएगी या फिर उस पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि किस प्रकार बड़े पैमाने पर उच्च शिक्षा में भ्रष्टचार और अनैतिक तौर-तरीकों को परवान चढ़ने का मौका मिला है।
भारत की राजधानी नई दिल्ली की कुछ चुनिंदा यूनिवर्सिटीज की बात छोड़ दी जाए तो राज्यों में जो विश्वविद्यालय हैं, वहां नियमों का खुलेआम उल्लंघन तो किया ही जाता है, साथ ही छात्रों का पीएचडी के नाम पर बुरी तरह शोषण भी किया जाता है। बहुत से ऐसे प्रोफेसर हैं जो अपने शोधार्थी से पैसे लेकर स्वयं उनका शोध पत्र लिख डालते हैं या फिर अन्य विशेषज्ञों की सेवाएं ली जाती हैं जो एक निश्चित राशि के एवज़ में उनका शोध पत्र न केवल तय समय सीमा में लिख कर दे देते हैं बल्कि उनके मौखिक परीक्षा तक में सहयोग करते हैं।
दिल्ली की सबसे चुनिंदा यूनिवर्सिटी के कई प्रोफेसर अपने शोधार्थियों से यूजीसी से मिलने वाले स्कालरशिप में भी कमीशन लेते हैं। वह छात्रों पर दबाव डालते हैं कि या तो वह उन्हें प्रति माह एक तयशुदा राशि दें वर्ना मिलने वाली छात्रवृत्ति पर यह कहकर रोक लगा दी जाएगी कि इनका काम स्तर का नहीं है। हार मानकर छात्रों को उनकी अनैतिक मांगों के आगे न केवल झुकना पड़ता है बल्कि अपने सम्मान की बलि भी देनी पड़ती है। उनका शोषण यह कहकर भी किया जाता है कि यदि तुमने हमारी बात नहीं मानी तो फिर कहीं भी शिक्षक के तौर पर बहाल होने का ख्वाब एक बुरे ख्वाब जैसा ही होकर रह जाएगा क्योंकि यही प्रोफेसर कहीं न कहीं किसी न किसी स्थान पर असिस्टेंट प्रोफेसर की बहाली के लिए इंटरव्यू लेने के लिए बुलाए जाते हैं।
बहुत से प्रोफेसर तो ऐसे हैं जो बेशर्मी की इंतेहा को पार करते हुए न सिर्फ अपने मेधावी छात्रों से लेख या पुस्तकें लिखवाकर बड़ी शान से अपने नाम से छपवाते हैं बल्कि उससे पैसे भी कमाते हैं और उनमें लिखने वाले का कोई हिस्सा नहीं होता।
जब से इन नौकरियों के लिए साक्षात्कार को जरूरी बना दिया गया है, इस प्रकार के अनैतिक तौर-तरीकों को और अधिक भयानक तरीके से बढ़ावा मिला है। जो विशेषज्ञ इंटरव्यू लेने आते हैं, पहले उनसे संपर्क साधने की कोशिश की जाती है। यदि उसमें कायमाबी मिल गई तो हर प्रकार से उनकी खुशामदें करनी पड़ती हैं और फिर यहां तक कि मोलभाव भी किया जाता है कि इस नौकरी के एवज़ में कितने लाख रूपये रिश्वत के तौर पर देने पड़ेंगे।
बहुत से प्रोफेसर तो ऐसे हैं जो बेशर्मी की इंतेहा को पार करते हुए न सिर्फ अपने मेधावी छात्रों से लेख या पुस्तकें लिखवाकर बड़ी शान से अपने नाम से छपवाते हैं बल्कि उससे पैसे भी कमाते हैं और उनमें लिखने वाले का कोई हिस्सा नहीं होता।
जब से इन नौकरियों के लिए साक्षात्कार को जरूरी बना दिया गया है, इस प्रकार के अनैतिक तौर-तरीकों को और अधिक भयानक तरीके से बढ़ावा मिला है। जो विशेषज्ञ इंटरव्यू लेने आते हैं, पहले उनसे संपर्क साधने की कोशिश की जाती है। यदि उसमें कायमाबी मिल गई तो हर प्रकार से उनकी खुशामदें करनी पड़ती हैं और फिर यहां तक कि मोलभाव भी किया जाता है कि इस नौकरी के एवज़ में कितने लाख रूपये रिश्वत के तौर पर देने पड़ेंगे।
बहुत से ऐसे प्रोफेसर हैं जिनकी पहली और अंतिम योग्यता बहाली से पहले उनकी चापलूसी, खुशामदी और नौकरों जैसी जिंदगी थी। उनकी बस एक ही कोशिश होती है कि जिस प्रोफेसर के अधीन उन्होंने पीएचडी की डिग्री प्राप्त की है, उनको हर प्रकार से खुश रखा जाए। और अगर उनके नाते-रिश्तेदार हों तो फिर बात ही क्या?
जब ऐसे खुशामदी नाकारा शिक्षक बहाल होकर आते हैं तो फिर उनसे यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह अपने छात्रों को ज्ञान के दीप से ऐसे प्रज्वलित कर देंगे कि उनका सारा जीवन ज्ञान के प्रकाश से जगमगा उठेगा?
सरकार को साक्षात्कार का चलन बिल्कुल बंद कर देना चाहिए और यूपीएससी की तरह एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जहां प्रतिभागी प्रतियोगिता परीक्षा पास करके ही नौकरी पा सकें। या फिर ऐसे लोगों को इन पदों पर बहाल किया जाए जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्राप्त की हो या विशेष प्रकार की उपलब्धियां उनके हिस्से में आई हों। हालांकि भारत जैसे देश में भ्रष्टाचार को पनपने का वहां भी मौका मिल ही जाएगा।
मोदी सरकार ने शासन की बागडोर संभालते वक़्त वादे तो बहुत सारे किए थे, मगर उन वादों की तभी धज्जियां उड़ गई थीं। जब एक कम पढ़ी-लिखी महिला को जिनका संबंध उच्च शिक्षा से कभी रहा ही नहीं, शिक्षा मंत्री जैसे अहम पद पर आसीन कर दिया गया था।
भारत में उच्च शिक्षा के साथ-साथ स्कूली शिक्षा के स्तर पर भी जो भ्रष्टाचार और नाकारापन फैला हुआ है। उसके विरूद्ध तेज अभियान चलाया जाए और सरकार को मजबूर किया जाए कि वह इसमें सुधार करे। अन्यथा भारत की शिक्षा व्यवस्था इसी प्रकार मरी और चरमरायी रहेगी और विद्वान के नाम पर नाकारा लोग ही पैदा होते रहेंगे। और भारत के लोग अपनी बदहाली का मातम मानते रहेंगे।
(इस लेख के लेखक मोहम्मद अलीम हैं। मोहम्मद अलीम संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित उपन्यासकार, नाटककार, पटकथा लेखक एवं पत्रकार हैं।)
