2014 के मुजफ्फरनगर की तरह 2019 की तैयारी है कासगंज दंगा

भारत में उत्तर प्रदेश के कासगंज में गणतंत्र दिवस पर भड़की हिंसा के बाद राजनीति तेज हो गई है। पक्ष-विपक्ष के साथ कई संगठनों और पूर्व अफसरों ने भी आरोप-प्रत्यारोप लगाने शुरू किए हैं। गुजरात के बर्खास्त आईपीएस अफसर संजीव भट्ट ने उत्तर प्रदेश की कासगंज हिंसा के पीछे राजनीतिक साजिश की ओर इशारा किया है। उनके ट्वीट पर लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रहीं हैं।

संजीव भट्ट ने 28 जनवरी को 12.52 मिनट पर ट्वीट कर कहा है, ''कासगंज तो शुरुआत है, यह लो-ग्रेड सांप्रदायिक बुखार 2019 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहेगा। ठीक उसी तरह जैसे 2014 के लिए मुजफ्फरनगर कांड हुआ था। इस बार यह और बड़े पैमाने पर होगा और इसका असर गहरा होगा।''

उत्तर प्रदेश के छोटे जिले कासगंज में गणतंत्र दिवस के मौके पर उस वक्त हिंसा भडक गई थी, जब विश्व हिन्दू परिषद् और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कुछ लोग तिरंगा झंडा और भगवा झंडा लेकर तिरंगा यात्रा निकाल रहे थे, जबकि मुस्लिम गणतंत्र दिवस माना रहे थे और तिरंगा झंडा फहराने की तैयारी कर रहे थे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, रास्ता मांगे जाने को लेकर हुई कहासुनी बड़े दंगे में बदल गई। इसी दौरान चली गोली में चंदन गुप्ता नामक युवक की मौत हो गई। चंदन के अंतिम संस्कार के बाद भी कस्बे में हिंसा भड़क उठी और दुकानें और गाड़ियां जलाने की घटना हुई। चार दिन से लगातार कासगंज में तनावपूर्ण शांति बनी हुई है।

कानून-व्यवस्था की बहाली के लिए पुलिस ने अब तक दोनों पक्षों से 112 लोगों को गिरफ्तार किया है। इस घटना में सात लोगों के खिलाफ नामजद केस दर्ज किया गया है। पुलिस अफसरों के मुताबिक, वीडियो फुटेज के आधार पर हिंसा में शामिल लोगों को चिह्नित कर गिरफ्तार किया जा रहा है। मुख्य आरोपी शकील फरार बताया जाता है। उसके घर से देसी बम और पिस्टल बरामद होने की बात कही जा रही। नवनियुक्त डीजीपी ओपी सिंह ने स्थिति को नियंत्रण में बताया है। उन्होंने कहा है कि कस्बे में तनावपूर्ण शांति है। हिंसा में शामिल लोगों को चिह्नित कर गिरफ्तार किया जा रहा है। कासगंज में नेताओं के जाने पर भी रोक लगा दी गई है ताकि कोई नेता आम जनता की भावनाएं नहीं भड़कायें।