एनआरसी: सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी संयोजक प्रतीक हजेला व रजिस्ट्रार जनरल को फटकारा
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने असम के एनआरसी समन्वयक प्रतीक हाजेला और आरजीआई शैलेश के राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) के मुद्दे पर फटकारते हुए मीडिया से बात करने पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने आरजीआई और एनआरसी समन्वयक से कहा कि इस बात को नहीं भूलें कि आप अदालत के अधिकारी हैं। आपका काम आदेशों का पालन करना है। आप कैसे इस तरह से प्रेस में जा सकते हैं। आप कोर्ट के अवमानना के दोषी हैं। कोर्ट ने समाचार पत्रों की खबरों का जिक्र करते हुए मीडिया को बयान जारी करने के एनआरसी संयोजक और भारत के महापंजीयक के अधिकार पर सवाल उठाये।
उल्लेखनीय है कि एनआरसी में कुल 3,29,91,384 आवेदकों में से अंतिम मसौदे में शामिल किए जाने के लिए 2,89,83,677 लोगों को योग्य पाया गया है। इस दस्तावेज में 40.07 लाख आवेदकों को जगह नहीं मिली है। यह 'ऐतिहासिक दस्तावेज' असम का निवासी होने का प्रमाण पत्र होगा।
आपको बता दें कि 1951 के बाद से भारत में पहली बार अवैध प्रवासियों को रोकने के लिए इस तरह का कोई लिस्ट जारी किया गया है। माना जा रहा है कि इस लिस्ट के जारी होने के बाद बांगलादेश से हो रहे अवैध प्रवास को रोकने में मदद मिलेगी। इस लिस्ट में 25 मार्च 1971 से पहले से रह रहे लोगों को ही असम का नागरिक माना गया है।
लेकिन एनआरसी पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्ष ने इस पर कई गंभीर सवाल उठाये हैं और 40 लाख लोगों को इस लिस्ट से निकाले जाने पर इसकी कड़ी आलोचना की है। इन 40 लाख लोगों में सबसे बड़ी संख्या बंगाल के निवासियों की है। दूसरे नंबर पर बिहार, तीसरे पर चंडीगढ़, चौथे पर मणिपुर और पांचवें पर मेघालय के उन निवासियों की है जो चाय बागान में काम करने के दौरान असम में बस गए थे। और भी चौंकाने वाले खुलासे हुए है जिसे सुनकर ताज्जुब होता है। असम के एनआरसी लिस्ट में बाप का नाम है तो बेटा का नहीं, पति का नाम है तो पत्नी का। इसे आप क्या कहेंगे? गंभीर भ्रष्टाचार या गंभीर अनियमितता या गहरी साजिश!
भारत एक लोकतान्त्रिक गणराज्य है। भारत राज्यों का संघ है। भारत में संघवाद है। जिस तरह से असम के एनआरसी लिस्ट से दूसरे राज्यों के निवासियों को निकाला गया है। यह भारतीय संघवाद पर हमला है और निश्चित तौर पर इसके गंभीर परिणाम होंगे। इसका असर अन्य राज्यों पर भी पड़ना तय है।
