पूर्व जनप्रतिनिधियों को पेंशन देना क्या करदाता पर बोझ नहीं: सुप्रीम कोर्ट
पूर्व सांसदों और विधायकों को आजीवन पेंशन और भत्ते दिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, लोकसभा और राज्यसभा के महासचिव को नोटिस जारी किया है।
सर्वोच्च अदालत ने यह नोटिस उत्तर प्रदेश के एनजीओ लोकप्रहरी की याचिका पर जारी किया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि पूर्व जनप्रतिनिधियों को पेंशन देना क्या करदाता पर बोझ नहीं है?
जनहित याचिका में कहा गया है कि पूर्व सासंदों और विधायकों को आजीवन पेंशन दी जा रही है, जबकि ऐसा कोई नियम नहीं है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यदि एक दिन के लिए भी कोई सांसद बन जाता है तो वह ना केवल आजीवन पेंशन का हकदार हो जाता है, बल्कि उसकी पत्नी को भी पेंशन मिलती है। साथ ही वह जीवन भर एक साथी के साथ ट्रेन में मुफ्त यात्रा करने का अधिकारी हो जाता है, जबकि राज्य के राज्यपाल को भी आजीवन पेंशन नहीं दी जाती।
एनजीओ के सचिव तथा पूर्व आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ला ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के वर्तमान जजों को भी साथी के लिए मुफ्त यात्रा का लाभ नहीं दिया जाता। चाहे वह आधिकारिक यात्रा पर ही क्यों ना जा रहे हों। लेकिन पूर्व सांसदों को यह सुविधा मिलती है।
उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था आम लोगों पर बोझ है और ये राजनीति को और भी लुभावना बना देती है। उन्होंने कहा कि देखा जाए तो यह खर्च ऐसे लोगों पर किया जाता है जो जनता का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं। इसलिए इस व्यवस्था को खत्म किया जाना चाहिए। मामले की सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी।
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