सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अदालतों को 'सुपर गार्जियन' नहीं बनना चाहिए

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने एक लड़की की इच्छा से सहमति जताते हुए कहा है कि वह अब बालिग है और अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करने की हकदार है। कोर्ट ने आगे कहा कि अदालतों को 'सुपर गार्जियन' नहीं बनना चाहिए।

दरअसल, इस लड़की को अपने संरक्षण में रखने के लिए अलग रह रहे उसके माता-पिता कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। भारत के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर तथा न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की सदस्यता वाली एक पीठ ने खचाखच भरे अदालत कक्ष में 18 वर्षीया लड़की से बात की। लड़की ने कहा कि वह बालिग हो गई है और कुवैत में पढ़ाई कर रही है तथा अपने पिता के साथ रहना चाहती है।

न्यायालय ने कहा कि लड़की ने बेहिचक कहा है कि वह अपना करियर बनाने के लिए कुवैत वापस जाने का इरादा रखती है। ऐसी स्थिति में हमारा यह मानना है कि बालिग होने के नाते वह अपनी पसंद के अनुसार चलने की हकदार हैं तथा न्यायालय इस पहलू पर विचार नहीं कर सकता कि उस पर उसके पिता का दबाव है या नहीं। गौरतलब है कि लड़की की केरल निवासी मां उसे अपने संरक्षण में रखना चाहती है। उसके पिता कुवैत में रहते हैं।

न्यायालय केरल निवासी महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो उससे अलग कुवैत में रह रहे अपने पति के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग कर रही थी। महिला की दलील है कि उसकी बेटी और बेटे के संरक्षण के विषय पर उसके पति न्यायालय के आदेश की अवमानना कर रहे हैं। लड़की अब बालिग हो गई है, जबकि लड़का अब भी नाबालिग है। मामले का निपटारा करते हुए न्यायालय ने कहा कि पिता को अपने बेटे से मिलने के लिए हर यात्रा पर उसकी मां को 50,000 रूपया अदा करना होगा।