भारत

मैगनेटिक स्ट्रिप वाले एटीएम कार्ड 1 जनवरी से बंद हो जाएंगे

सभी बैंकों के मैगनेटिक स्ट्रिप वाले एटीएम कार्ड 1 जनवरी से बंद हो जाएंगे। इसके लिए एसबीआई समेत सभी बैंक अपने खाताधारकों को मेल व मैसेज के माध्यम से सूचित कर रहे हैं। बैंकों ने सबसे पहले बिना चिप वाले मैगनेटिक स्ट्रिप वाले ही एटीएम कार्ड जारी किए थे। ये बिना चिप वाले एटीएम कार्ड का 31 दिसंबर के बाद प्रयोग नहीं किया जा सकेगा।

खाताधारक बिना चिप वाले एटीएम कार्ड को दो तरीके से बदलवा सकते हैं। पहला, इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

दूसरा, अपनी बैंक शाखा में जाकर एक फार्म भरने के बाद एटीएम कार्ड को बदलवाया जा सकता है। फार्म जमा करने के एक सप्ताह के अंदर कार्ड बदल जाएगा।

ऐसे होते हैं मैगनेटिक स्ट्रिप वाले एटीएम कार्ड
इसमें पीछे की तरफ काले रंग की पट्टी होती है। इसी काली पट्टी में खाताधारक की पूरी डिटेल रहती है। इससे कार्ड की क्लोनिंग बढ़ जाती है।

इसलिए बदला जा रहा है इन कार्डों को
आरबीआई ने ठगी की बढ़ती वारदातों को देखते हुए चिप वाले एटीएम कार्ड जारी करने निर्देश दिये हैं। पहले कार्डों को बदलने के लिए जून माह तक का समय निर्धारित किया गया था, लेकिन अब 31 दिसंबर तक कार्ड बदले जाने हैं।

भारत सबसे अधिक झेल रहा जलवायु परिवर्तन की मार

भारत पर जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी मार पड़ रही है। जलवायु परिवर्तन से हो रही क्षति को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।

जल्द जारी होने वाली लांसेट की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में जलवायु परिवर्तन से 2017 में 153 अरब कार्य घंटे बर्बाद हुए। इसमें अकेले भारत की क्षति 75 अरब कार्य घंटों के बराबर थी। यह दुनिया में हुई कुल क्षति का 49 फीसदी है। चिंताजनक तथ्य यह है कि 99 फीसदी क्षति निम्न आय वाले देशों में हो रही है।

क्षति का आकलन गर्मी बढ़ने के कारण पैदा होने वाली परिस्थितियों, तबाही की घटनाओं, इसके चलते स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों, बीमारियों आदि को ध्यान में रखते हुए किया गया है। इस अध्ययन में दुनिया भर के नामी संस्थानों ने भाग लिया है।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो दशकों से भी कम समय में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव तेजी से सामने आए हैं। मसलन, 2000 से 2017 के बीच 62 अरब कार्य घंटे के बराबर की उत्पादकता नष्ट हुई है। जहां तक भारत का सवाल है, तो 2000 में  43 अरब कार्य घंटों की क्षति का अनुमान था, जो दो दशक में काफी बढ़ गई।

रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से दुनिया को उत्पादकता के रूप में जो क्षति पहुंची है, वह 326 अरब डॉलर के बराबर है। भारत के संदर्भ में यह 160 अरब डॉलर है। जबकि चीन की क्षति 21 अरब कार्य घंटों के साथ महज 1.4 फीसदी के करीब हुई है। इससे साफ है कि चीन की तैयारियां भारत से कहीं बेहतर हैं।

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