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सैटेलाइट टेस्ट कोई हथियार नहीं था: रूस

रूस ने कहा है कि उसने अंतरिक्ष में जो सैटेलाइट टेस्ट किया था, वो कोई हथियार नहीं था।

रूस के रक्षा मंत्रालय ने अमरीका और ब्रिटेन के आरोपों को ख़ारिज करते हुए उन पर तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाया।

रूस के रक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा, ''15 जुलाई को जो टेस्ट किए गए थे उसने किसी दूसरे अंतरिक्षयाण के लिए कोई ख़तरा पैदा नहीं किया है। और इसने किसी भी अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन नहीं किया है।''

रूस ने कहा कि वो रूस के अंतरिक्ष उपकरणों की देख रेख और उनकी जाँच के लिए नई तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है।

इससे पहले ब्रिटेन और अमरीका ने कहा था कि वो रूस की इन गतिविधियों को लेकर चिंतित हैं।

ब्रिटेन और अमरीका ने आरोप लगाया था कि रूस ने अंतरिक्ष में एक सैटेलाइट से हथियार जैसी कोई चीज़ लॉन्च की है।

ब्रिटेन के अंतरिक्ष निदेशालय के प्रमुख ने एक बयान जारी कर कहा, ''रूस ने हथियार जैसी कोई चीज़ को लॉन्च कर जिस तरह से अपने एक सैटेलाइट को टेस्ट किया है उसको लेकर हम लोग चिंतित हैं।''

बयान में कहा गया है कि इस तरह की कार्रवाई अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए ख़तरा है।

रूस के इस सैटेलाइट के बारे में अमरीका ने पहले भी चिंता जताई थी।

ब्रिटेन के अंतरिक्ष निदेशालय के प्रमुख एयरवाइस मार्शल हार्वे स्मिथ ने बयान जारी कर कहा, ''इस तरह की हरकत अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए ख़तरा पैदा करती है और इससे अंतरिक्ष में मलवा जमा होने का भी ख़तरा रहता है जो कि सैटेलाइट और पूरे अंतरिक्ष सिस्टम को नुक़सान पहुँचा सकता है जिस पर सारी दुनिया निर्भर करती है।''

उन्होंने कहा, ''हम लोग रूस से आग्रह करते हैं कि वो आगे इस तरह के टेस्ट से परहेज़ करें। हम लोग रूस से ये भी आग्रह करते हैं कि अतंरिक्ष में ज़िम्मेदार रवैये को बढ़ावा देने के लिए वो ब्रिटेन और दूसरे सहयोगियों के साथ रचनात्मक तरीक़े से काम करता रहे।''

बीबीसी के रक्षा संवाददाता जोनाथन बेल के अनुसार ब्रिटेन ने पहली बार रूस पर अंतरिक्ष में सैटेलाइट टेस्ट करने का आरोप लगाया है और ये ठीक उसके कुछ दिनों के बाद हुआ है जब ब्रिटेन में इंटेलिजेन्स और सुरक्षा कमेटी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि ब्रिटेन की सरकार रूस से ख़तरे को भाँपने में बुरी तरह नाकाम रही थी।

स्पेस वॉर की आशंका?

इस घटना के बाद अंतरिक्ष में हथियारों की नई तरह की दौड़ शुरू होने की चिंता को जन्म दे सकती है और कई दूसरे देश भी उन तकनीक की जाँच कर रहे हैं जिसका अतंरिक्ष में हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

अमरीका ने कहा है कि रूस का ये वही सैटेलाइट सिस्टम है जिसके बारे में उसने साल 2018 में भी चिंता ज़ाहिर की थी और इस साल भी सवाल उठाया था जब अमरीका ने रूस पर आरोप लगाया था कि उसका एक सैटेलाइट अमरीका के एक सैटेलाइट के क़रीब जा रहा था।

इस ताज़ा घटनाक्रम के बारे में अमरीकी स्पेस कमांड के प्रमुख जनरल जे रेमंड ने कहा है कि इस बात के सुबूत हैं कि रूस ने अंतरिक्ष में स्थित एक सैटेलाइट विरोधी हथियार का टेस्ट किया है।

जनरल रेमंड ने कहा कि रूस ने सैटेलाइट के ज़रिए ऑर्बिट में एक नई चीज़ को लॉन्च किया है।

उनका कहना था, ''स्पेस स्थित सिस्टम को विकसित करने और उसको टेस्ट करने की रूस की लगातार कोशिशों का ये एक और सुबूत है। और ये अंतरिक्ष में अमरीका और उसके सहयोगियों के सामनों को ख़तरे में डालने के लिए हथियारों के इस्तेमाल के रूस के सार्वजनिक सैन्य डॉक्ट्रिन के अनुरूप है।''

कितने नेपाली प्रवासी भारत में और कितने भारतीय प्रवासी नेपाल में काम कर रहे हैं: सुप्रीम कोर्ट

भारत में कितने नेपाली प्रवासी लोग काम कर रहे हैं और कितने भारतीय प्रवासी इस वक़्त नेपाल में काम कर रहे हैं?

इन दोनों सवालों का सटीक जवाब देना आसान नहीं है। क्योंकि भारत और नेपाल सदियों पुराने रिश्ते में बंधे हैं और ख़ासकर 1950 के शांति और मैत्री संधि के कारण दोनों देशों में बिना किसी रोक-टोक के लोगों का आना-जाना होता रहा है।

लोगों के आने-जाने का कोई भी आँकड़ा मौजूद नहीं है और इसीलिए ऊपर पूछे गए दोनों सवालों का सही जवाब न भारत के पास है और न ही नेपाल के पास।

ऐसी परिस्थिति में नेपाल की सरकार के लिए तब मुश्किल खड़ी हो गई, जब 10 जुलाई को नेपाल की सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए उससे पूछा कि भारत में काम कर रहे नेपाली कामगारों को वो तमाम सुविधाएँ और सुरक्षा क्यों नहीं दी जाए, जो दूसरे देशों में काम कर रहे नेपाली कामगारों को मिलती हैं।

अदालत ने नेपाल की सरकार को 15 दिनों के अंदर नोटिस का जवाब देने को कहा है।

नेपाल की सरकार ने अपने नागरिकों को दुनिया के 170 देशों में रहने और काम करने की इजाज़त दे रखी है। हाल के वर्षों में नेपाल ने कई देशों से श्रम समझौतों पर दस्तख़त किए हैं।

नेपाल ने विदेशी रोज़गार फंड भी बनाया है, जिसके तहत विदेशों में काम कर रहे नेपाली नागरिकों के ज़ख़्मी होने या उनकी मौत होने पर उनके परिजनों को मुआवज़ा दिया जाता है।

नेपाली सरकार अपने कामगारों को विदेशी रोज़गार परमिट भी जारी करती है जिसके ज़रिए कोई कामगार 15 लाख नेपाली रुपए तक का बीमा करवा सकता है।

लेकिन ये सारे क़ानून और सुविधाएँ नेपाल के उन श्रमिकों पर लागू नहीं होती हैं, जो भारत में आकर काम करते हैं या जो भारतीय नागरिक नेपाल में काम करते हैं।

दोनों ही देशों में ऐसे कामगारों की सही जानकारी नहीं है। इससे इस बात की आशंका पैदा हो गई है कि ज़रूरत पड़ने पर इन प्रवासी कामगारों को सुरक्षित प्रवासन या पर्याप्त वित्तीय मुआवज़ा नहीं मिल सकेगा।

नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वालों में से एक निर्मल कुमार उप्रेती कहते हैं कि भारत में काम कर रहे नेपाली कामगारों के हितों की नेपाली सरकार के ज़रिए की जा रही अनदेखी नेपाल के विदेशी रोज़गार क़ानून का खुला उल्लंघन है।

उप्रेती के अनुसार ये नेपाली प्रवासी कामगारों की सुरक्षा के अधिकार का भी उल्लंघन है।

बीबीसी के मुताबिक उन्होंने कहा, ''नेपाली प्रवासी मज़दूरों के लिए भारत भी अन्य देशों की तरह एक विदेशी मुल्क है। लेकिन विदेशी मज़दूर होने का कोई भी दस्तावेज़ी सूबत नहीं होने के कारण ये नेपाली नागरिक किसी भी तरह के मुआवज़े या सुविधा से वंचित रहते हैं, जो दूसरे देशों में काम कर रहे नेपाली कामगारों को मिलता है।''

नेपाल के अधिकारियों के अनुसार क़रीब 50 लाख नेपाली लोग विदेशों में काम करते हैं और नेपाल में रह रहे अपने परिवार के ख़र्च के लिए विदेशों से पैसे भेजते हैं।

वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान विदेशों में रह रहे नेपाली नागरिकों ने केवल आधिकारिक स्रोतों के ज़रिए आठ अरब 80 लाख अमरीकी डॉलर नेपाल भेजे थे।

ये बता पाना मुश्किल है कि इसी दौरान हुंडी और हवाला जैसे अनाधिकारिक चैनलों से कितने पैसे नेपाल आए थे।

विश्व बैंक के 2018 में किए गए एक आकलन के अनुसार भारत में काम कर रहे नेपाली कामगारों ने एक साल में एक अरब 30 लाख अमरीकी डॉलर से ज़्यादा रक़म नेपाल भेजी थी, जबकि नेपाल में काम कर रहे भारतीय कामगारों ने उसी दौरान क़रीब एक अरब 50 लाख अमरीकी डॉलर भारत भेजा था। इस तरह से देखा जाए तो नेपाल भारत में आने वाले कैश फ़्लो (रेमिटेन्स) का एक बड़ा ज़रिया है।

अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कितने नेपाली भारत में और कितने भारतीय नेपाल में काम कर रहे हैं।

इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ माइग्रेशन (आईओएम) की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार क़रीब 30 से 40 लाख नेपाली कामगार भारत में रहते और काम करते हैं। हालांकि भारतीय अधिकारियों का अनुमान है कि ये संख्या इससे कहीं ज़्यादा है।

आईओएम के अनुसार नेपाल में काम कर रहे भारतीयों की संख्या क़रीब 5-7 लाख है।

नेपाल के राष्ट्रीय योजना आयोग के पूर्व सदस्य और विदेशों में काम कर रहे नेपाली कामगारों पर गहन अध्ययन करने वाले डॉक्टर गणेश गुरुंग कहते हैं, ''सीमा खुली हुई है और मज़दूरों को आवागमन की पूरी आज़ादी है, इसलिए सही संख्या बता पाना बहुत मुश्किल है। भारत-नेपाल सीमा पार करने वाले बहुत सारे कामगार सिर्फ़ विशेष मौसम में एक-दूसरे के यहाँ आते-जाते हैं। मिसाल के तौर पर तराई-मधेस क्षेत्र में रहने वाले नेपाली मज़दूर फसल के समय पंजाब और हरियाणा जाते हैं और बिहार और उत्तर प्रदेश के कई मज़दूर इसी दौरान नेपाल आते हैं। नेपाल के कई मज़दूर ख़ास मौसम में भारत मज़दूरी करने के लिए जाते हैं।''

भारत-नेपाल सीमा पर आवागमन की आज़ादी के जहां कई फ़ायदें हैं वहीं इसके कुछ हानिकारक पहलू भी हैं।

इस तरह के असुरक्षित और ग़ैर-पंजीकृत कामगारों की दयनीय स्थिति से अवगत लोग कहते हैं कि असंगठित क्षेत्र में काम करने के कारण उन्हें हमेशा इस बात का ख़तरा रहता है कि वो कभी भी ज़ख़्मी हो सकते हैं, उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा सकता है और उनका शोषण हो सकता है, लेकिन इनसे बचने का उनके पास कोई रास्ता नहीं है।

भारत में रहने और काम करने वाले नेपालियों की मदद करने वाली एक संस्था नेपाली जनसंपर्क समिति एंड मैत्री इंडिया के चेयरमैन बालकृष्ण पांडेय कहते हैं कि नेपाली कामगारों की सुरक्षा के उपायों के बारे में सोचना एक ऐसा मुद्दा है जिसकी दशकों से अनदेखी की गई है।

बालकृष्ण पांडेय 17 साल की उम्र में नेपाल से भारत चले गए थे। ''वो कहते हैं, 1990 से मैं ये मुद्दा उठा रहा हूं कि नेपाल से भारत आकर काम करने वाले ग़रीब मज़दूरों को किसी तरह के पंजीकरण और सुरक्षा दिए जाने की ज़रूरत है। कई प्रधानमंत्री आए-गए। नेपाल के कई नेता जब भारत आए तो यहाँ प्रवासी मज़दूरों के साथ ठहरे, लेकिन जब वो सत्ता में आए तो प्रवासी नेपालियों को भूल गए।''

पांडेय के अनुसार कोरोना महामारी फैलने के बाद से क़रीब छह लाख नेपाली प्रवासी कामगार भारत से नेपाल चले गए हैं। इनमें मणिपुर में फँसी कुछ नेपाली महिलाएँ भी शामिल हैं जिन्हें भारत से खाड़ी देश तस्करी करके ले जाया जा रहा था, लेकिन उन्हें एक ग़ैर-सरकारी संगठन की मदद से बचा लिया गया।

भारत-नेपाल की 1880 किलोमीटर सीमा के रास्ते सदियों से नेपाल के कामगार भारत आते रहे हैं। नेपाली अधिकारी कहते हैं कि उन्हें नेपाली कामगारों की परेशानियों की जानकारी है, उन्हें ये भी पता है कि नेपाली महिलाओं और बच्चों की तस्करी होती है।

नेपाल के श्रम और सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता सुमन घिमिरे कहते हैं कि वो और उनके सहयोगी नेपाली प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षा के बारे में हमेशा विचार-विमर्श करते रहते हैं।

वो कहते हैं, ''कोरोना महामारी के बाद नेपाल के स्थानीय निकायों ने नेपाल से भारत आने वाले सभी लोगों का पंजीकरण शुरू कर दिया है। भारत में काम करने वाले नेपाली प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षा में यह पहला क़दम है। हमें और करने की ज़रूरत है और हम इसको लेकर गंभीर हैं।''

नेपाल के प्रवासियों की स्थिति में सुधार करने के लिए उठाए जा रहे क़दमों का स्वागत करते हुए नेपाल योजना आयोग के पूर्व सदस्य डॉक्टर गणेश गुरुंग कहते हैं, ''भारत-नेपाल की सीमा पार कर नौकरी करने या मौसमी काम करने के लिए जाने वाले अत्यंत ग़रीब लोग हैं। उन्हें हमेशा ख़तरा रहता है, हर हालत में उनकी हिफ़ाज़त की जानी चाहिए।''

भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर करने के कई प्रयास हुए जिनमें मज़दूरों का आना-जाना भी शामिल है।

1950 की शांति संधि की समीक्षा के लिए 2016 में बनी कमेटी इमीनेंट पर्सन्स ग्रुप (ईपीजी) ने सीमा पर लोगों के आवागमन के बारे में कई सुझाव दिए थे। कई बैठकों के बाद कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मुकम्मल कर ली है लेकिन दोनों में से किसी भी सरकार ने अभी तक कमेटी की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ईपीजी रिपोर्ट एक आवश्यक आधार हो सकती है जिसके सहारे दोनों देशों के प्रवासी कामगारों के नियमों में सुधार और उनकी सुरक्षा के लिए उपाय सुझाए जा सकते हैं।

साल 2009-10 के दौरान डॉक्टर गणेश गुरुंग जब योजना आयोग के सदस्य थे तब उन्होंने भारत जा रहे मज़दूरों की सुरक्षा के लिए कुछ प्रस्ताव रखे थे लेकिन उनके अनुसार, "मेरे प्रस्तावों ने योजना आयोग में हंगामा खड़ा कर दिया था। तीन वर्षीय योजना में इसे किसी तरह शामिल तो कर लिया गया लेकिन ज़मीन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।''

10 जुलाई के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हुए वो कहते हैं, ''सुधार शुरू करने का ये सबसे बेहतर समय है।''

दिल्ली स्थित नेपाली पत्रकार सुरेश राज कहते हैं कि दोनों देशों को अपने-अपने प्रवासी कामगारों की सुरक्षा के लिए तत्काल क़दम उठाने चाहिए, उनका पंजीकरण करना चाहिए और उन्हें कोई प्रमाण पत्र जारी करना चाहिए।

सुरेश राज कहते हैं, "कौन सीमा पार कर रहा है एक बार अधिकारी जब इसका पंजीकरण शुरू कर देंगे तो उसके बाद दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास के अधिकारियों के लिए भारत में काम कर रहे नेपाली कामगारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना थोड़ा आसान हो जाएगा।"

लेकिन नेपाली दूतावास के एक अधिकारी कहते हैं कि दोनों देशों को बहुत संभलकर काम करना होगा।

वो कहते हैं, ''अगर हम अपने कामगारों को विदेशी रोज़गार परमिट जारी करना शुरू करते हैं, जो सदियों से बिना किसी रोक-टोक के सीमा पार करते रहे हैं तो इससे भारत-नेपाल के रिश्तों पर असर पड़ेगा। हमें बहुत ज़्यादा सावधानी बरतने की ज़रूरत है। लेकिन मज़दूरों के प्रवासन को नियमित और नियंत्रित किया जाना अत्यंत ज़रूरी है।''

भारत-नेपाल के बीच ऐसे श्रम-संबंधों को देखते हुए ये कहना मुश्किल है कि नेपाल की सरकार सुप्रीम कोर्ट के नोटिस का कुछ ही दिनों में कैसे और क्या जवाब देगी?

क्या भारत-चीन वार्ता से बॉर्डर पर शांति स्थापित हो जाएगी?

भारत और चीन के बीच गलवानी घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों तरफ से शांति बहाल करने की कोशिशों के बीच भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच रविवार को टेलिफ़ोन पर बातचीत हुई।

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई बातचीत का ब्यौरा भारत स्थित चीनी दूतावास ने बयान जारी दिया है।

भारत में चीनी राजदूत सुन वायडोंग ने अपने बयान में दोनों विशेष प्रतिनिधियों के आपस में बातचीत का ब्यौरा दिया है। उन्होंने कहा है कि चीनी विदेश मंत्री ने अजीत डोभाल को बताया कि भारत और चीन के आपसी रिश्ते 70 साल पुराने हैं।

चीनी विदेश मंत्री के मुताबिक़ भारत और चीन के बीच वेस्टर्न सेक्टर सीमा के गलवान घाटी में जो कुछ हुआ है, उसमें सही क्या है और ग़लत क्या हुआ है - ये स्पष्ट है।

चीनी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि चीन अपनी संप्रभुता की रक्षा करने के साथ-साथ इलाके में शांति भी बहाल करना चाहता है।

वांग यी ने अपनी बातचीत में इस बात पर भी ज़ोर दिया कि चीन और भारत दोनों की शीर्ष प्राथमिकता विकास है, ऐसे में दोनों देशों को तनाव कम करने पर ध्यान देना चाहिए।

चीनी राजदूत के मुताबिक़ दोनों प्रतिनिधियों के बीच विस्तार से बातचीत हुई। इस बातचीत में मोटे तौर पर चार बातों पर सहमति बनी है -

- दोनों देश के शीर्ष नेताओं के बीच बनी सहमति को लागू किया जाएगा। दोनों नेताओं के बीच सीमावर्ती इलाकों में शांति के साथ विकास के लिए लंबे समय तक साथ काम करने की सहमति है।

- दोनों देश आपसी समझौते के मुताबिक सीमा पर तनातनी को कम करने के लिए संयुक्त रूप से कोशिश करेंगे।

- विशेष प्रतिनिधियों के बीच होने वाली बातचीत के ज़रिए दोनों पक्ष आपसी संवाद को बेहतर बनाएंगे। भारत चीन के बीच सीमा मामलों में सलाह और संयोजन के लिए वर्किंग मैकेनिज्म की व्यवस्था को नियमित करके उसे बेहतर बनाया जाएगा। इससे दोनों पक्षों के बीच भरोसा मज़बूत होगा।

दोनों पक्ष ने हाल में हुई कमांडर स्तर की बैठक में जिन बातों पर सहमति जताई गई है, उसका स्वागत किया है। पहली जुलाई को कमांडर स्तर की बैठक में दोनों पक्षों ने सीमा पर तनातनी को कम करने पर सहमति जताई थी।

इससे पहले भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से बयान जारी कर कहा गया था कि भारत और चीन के बीच वेस्टर्न सेक्टर की सीमा पर हाल की गतिविधियों को लेकर डोभाल और वांग यी के बीच स्पष्ट और विस्तार से बात हुई है।

दोनों पक्षों में इस बात पर सहमति जताई गई है कि द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए दोनों देशों को सीमा पर शांति बहाल करनी होगी और मतभेदों को विवाद का रूप लेने से रोकना होगा।

इस दिशा में दोनों पक्ष सीमा पर तनातनी कम करने की प्रक्रिया पर काम कर चुके हैं, यानी अब वैसी स्थिति नहीं है जैसी कि दोनों पक्षों के सैनिकों के आमने सामने आ जाने से उत्पन्न हो गई थी। दोनों पक्षों ने इसे चरणबद्ध तरीके से कदम दर कदम करने पर सहमति जताई है।

बयान में ये भी कहा गया है कि दोनों विशेष प्रतिनिधियों की इस बातचीत में दोनों देशों के सैन्य और राजनयिक अधिकारियों के बीच भी बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई गई है।

इसके अलावा डोभाल और वांग यी के बीच आपसी बातचीत को नियमित रखने पर भी सहमति बनी है।

वहीं समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने सोमवार को बीजिंग में पत्रकारों से कहा, ''दोनों पक्षों में सीमा पर तनातनी कम करने को लेकर साकारात्मक प्रगति हुई है।''

लिजियान ने उम्मीद जताई है कि भारतीय पक्ष चीन के साथ मिलकर उन बातों को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाएगा जिन बातों को लेकर आपसी सहमति बन गई है।

भारत-चीन सीमा विवाद पर नज़र रख रहे अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि सीमा पर तनातनी को कम करने की प्रक्रिया सोमवार सुबह से शुरू हो गई है।

अधिकारियों ने बताया कि यह काम तीन जगहों पर चल रहा है, ये जगहें हैं - गलवान, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स। बीबीसी को जानकारी देने वाले अधिकारी ने स्पष्ट किया कि वे देपसांग या पैंगोंग त्सो झील की बात नहीं कर रहे हैं।

एक अन्य अधिकारी ने बताया, "तंबू और अस्थायी ढांचे दोनों तरफ़ से हटाए जा रहे हैं और सैनिक पीछे हट रहे हैं। लेकिन इसका मतलब वापसी या प्रकरण का अंत नहीं है।''

भारतीय अधिकारियों ने बताया कि इन गतिविधियों की लगातार निगरानी की जा रही है जिसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों और ऊँचे प्लेटफॉर्म्स की मदद ली जा रही है।

कई मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि चीनी सैनिक कितने पीछे हटे हैं, इस सवाल के जवाब में अधिकारी ने कोई दूरी बताने से इनकार किया।

उन्होंने इतना ही कहा, ''यह उस प्रक्रिया की शुरूआत है जो 30 जून को चुसुल में हुई दोनों पक्षों के कमांडरों की बैठक के बाद तय की गई थी।''

हालांकि मीडिया में आ रही रिपोर्ट्स के अनुसार गलवान में जहां पर हिंसा हुई थी चीनी सैनिक वहां से दो किलोमीटर पीछे की ओर जा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि बीते 15 जून को गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी।

इसके बाद बीते एक जुलाई को दोनों देशों की सेनाओं के बीच कमांडर स्तर की बातचीत हुई और उस बातचीत में भी भारत-चीन एलएसी पर तनातनी को कम करने पर सहमति जताई गई थी।

इसके बाद सप्ताह भर पहले भारत सरकार ने 59 ऐसे मोबाइल ऐप्स बंद करने की घोषणा की जिनमें जाने माने सोशल प्लेटफ़ॉर्म टिकटॉक, वीचैट अली बाबा ग्रुप का यूसी ब्राउज़र भी शामिल थे।

हालांकि भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन स्पष्ट कहा कि शिकायत मिली थी कि एंड्रॉयड और आईओएस पर ये ऐप्स लोगों के निजी डेटा में भी सेंध लगा रहे थे। इन ऐप्स पर पाबंदी से भारत के मोबाइल और इंटरनेट उपभोक्ता सुरक्षित होंगे। यह भारत की सुरक्षा, अखंडता और संप्रभुता के लिए ज़रूरी है।

क्या 'स्टॉप हेट फ़ॉर प्रॉफ़िट' मुहिम फ़ेसबुक को ख़त्म कर देगी?

क्या बहिष्कार फ़ेसबुक को नुक़सान पहुंचा सकता है? इसका जवाब 'हां' है।

18वीं शताब्दी में हुए 'उन्मूलनवादी आंदोलन' (एबोलिशनिस्ट मूवमेंट) ने ब्रिटेन के लोगों को ग़ुलामों की बनाई हुई वस्तुओं को ख़रीदने से रोका।

इस आंदोलन का बड़ा असर हुआ। लगभग तीन लाख लोगों ने चीनी ख़रीदनी बंद कर दी, जिससे ग़ुलामी प्रथा को ख़त्म किए जाने का दबाव बढ़ा।

'स्टॉप हेट फ़ॉर प्रॉफ़िट' वो ताज़ा अभियान है जिसमें 'बहिष्कार' को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मुहिम का दावा है कि फ़ेसबुक अपने प्लेटफ़ॉर्म पर नफ़रत से भरी और नस्लवादी सामग्री (कॉन्टेंट) हटाने की पर्याप्त कोशिश नहीं करता।

'स्टॉप हेट फ़ॉर प्रॉफ़िट' मुहिम ने कई बड़ी कंपनियों को फ़ेसबुक और कुछ अन्य सोशल मीडिया प्लैटफ़ॉर्म्स से अपने विज्ञापन हटाने के लिए राज़ी कर लिया है।

फ़ेसबुक से अपने विज्ञापन हटाने वालों में कोका-कोला, यूनीलीवर और स्टारबक्स के बाद अब फ़ोर्ड, एडिडास और एचपी जैसी नामी कंपनियां भी शामिल हो गई हैं।

समाचार वेबसाइट 'एक्सियस' के अनुसार माइक्रोसॉफ़्ट ने भी फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम पर मई में ही विज्ञापन देना बंद कर दिया था। माइक्रोसॉफ़्ट ने अज्ञात 'अनुचित सामग्री' की वजह से फ़ेसबुक पर विज्ञापन देने बंद किए हैं।

इस बीच रेडिट और ट्विच जैसे अन्य ऑनलाइन प्लंटफ़ॉर्म्स ने भी अपने-अपने स्तर पर नफ़रत-विरोधी क़दम उठाए हैं और फ़ेसबुक पर दबाव बढ़ा दिया है।

तो क्या इस तरह के बहिष्कार से फ़ेसबुक को भारी नुक़सान हो सकता है?

इस सवाल का छोटा सा जवाब है - हां। क्योंकि फ़ेसबुक के रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से ही आता है।

अवीवा इन्वेस्टर्स के डेविड कमिंग ने बीबीसी से कहा कि फ़ेसबुक से लोगों का भरोसा उठ गया है और यूज़र्स को फ़ेसबुक के रवैये में नैतिक मूल्यों की कमी नज़र आई है। डेविम कमिंग का मानना है कि ये धारणाएं फ़ेसबुक के कारोबार को बुरी तरह नुक़सान पहुंचा सकती हैं।

शुक्रवार को फ़ेसबुक के शेयर की कीमतों में आठ फ़ीसदी गिरावट दर्ज की गई थी। नतीजन, कंपनी के सीईओ मार्क ज़करबर्ग को कम से कम साढ़े पांच खरब रुपयों का नुक़सान हुआ।

लेकिन क्या ये नुक़सान और बड़ा हो सकता है? क्या इससे आने वाले दिनों में फ़ेसबुक के अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो सकता है? इन सवालों के स्पष्ट जवाब मिलने अभी बाकी हैं।

पहली बात तो ये है कि फ़ेसबुक बहिष्कार का सामना करने वाली पहली सोशल मीडिया कंपनी नहीं है।

साल 2017 में कई बड़े ब्रैंड्स ने ऐलान किया कि वो यूट्यूब पर विज्ञापन नहीं देंगे। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि एक ख़ास ब्रैंड का विज्ञापन किसी नस्लभेदी और होमोफ़ोबिक (समलैंगिकता के प्रति नफ़रत भरा) वीडियो के बाद दिखाया गया था।

इस ब्रैंड के बहिष्कार को अब लगभग पूरी तरह भुला दिया गया है। यूट्यूब ने अपनी विज्ञापन नीतियों में बदलाव किया और अब यूट्यूब की पेरेंट कंपनी गूगल भी इस सम्बन्ध में ठीक काम कर रही है।

हो सकता है कि इस बहिष्कार का फ़ेसबुक को बहुत ज़्यादा नुक़सान न हो। इसके कुछ और कारण भी हैं।

पहली बात तो ये कि कई कंपनियों ने सिर्फ़ जुलाई महीने के लिए फ़ेसबुक का बहिष्कार करने की बात कही है। दूसरी बात ये कि फ़ेसबुक के रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा छोटे और मध्यम कंपनियों के विज्ञापन से भी आता है।

सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल सबसे ज़्यादा ख़र्च करने वाले 100 ब्रैंड्स से फ़ेसबुक को तकरीबन तीन खरब रुपये की कमाई हुई थी और यह विज्ञापन से होने वाली कुल कमाई का महज़ छह फ़ीसदी था।

एडवर्टाइज़िंग एजेंसी डिजिटल ह्विस्की के प्रमुख मैट मॉरिसन ने बीबीसी को बताया कि बहुत-सी छोटी कंपनियों के लिए 'विज्ञापन न देना संभव नहीं है।'

मॉरिसन कहते हैं, "जो कंपनियां टीवी पर विज्ञापन के लिए भारी-भरकम राशि नहीं चुका सकतीं, उनके लिए फ़ेसबुक एक ज़रूरी माध्यम है। कारोबार तभी सफल हो सकता है जब कंपनियां अपने संभावित ग्राहकों तक पहुंच पाएं। इसलिए वो विज्ञापन देना जारी रखेंगी।''

इसके अलावा, फ़ेसबुक का ढांचा ऐसा है कि ये मार्क ज़करबर्ग को किसी भी तरह के बदलाव करने की ताक़त देता है। अगर वो कोई नीति बदलना चाहते हैं तो बदल सकते हैं। इसके लिए सिर्फ़ उनके विचारों को बदला जाना ज़रूरी है। अगर ज़करबर्ग कार्रवाई न करना चाहें तो नहीं करेंगे।

हालांकि पिछले कुछ दिनों में मार्क ज़करबर्ग ने बदलाव के संकेत दिए हैं। फ़ेसबुक ने शुक्रवार को ऐलान किया कि वो नफ़रत भरे कमेंट्स को टैग करना शुरू करेगा।

दूसरी तरफ़, बाकी कंपनियां ख़ुद से अपने स्तर पर कार्रवाई कर रही हैं।

सोमवार को सोशल न्यूज़ वेबसाइट रेडिट ने ऐलान किया कि वो 'द डोनाल्ड ट्रंप फ़ोरम' नाम के एक समूह पर प्रतिबंध लगा रहा है। इस समूह के सदस्यों पर नफ़रत और धमकी भरे कमेंट करने का आरोप है। ये समूह सीधे तौर पर राष्ट्रपति ट्रंप से नहीं जुड़ा था लेकिन इसके सदस्य उनके समर्थन वाले मीम्स शेयर करते थे।

इसके अलावा ऐमेज़न के स्वामित्व वाले वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म ट्विच ने भी 'ट्रंप कैंपेन' द्वारा चलाए जाने वाले एक अकाउंट पर अस्थायी रूप से पाबंदी लगा दी है। ट्विच ने कहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप की रैलियों के दो वीडियो में कही गई बातें नफ़रत को बढ़ावा देने वाली थीं।

इसमें से एक वीडियो साल 2015 (ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने से पहले) का था। इस वीडियो में ट्रंप ने कहा था कि मेक्सिको बलात्कारियों को अमरीका में भेज रहा है।

ट्विच ने अपने बयान में कहा, "अगर किसी राजनीतिक टिप्पणी या ख़बर में भी नफ़रत भरी भावना है तो हम उसे अपवाद नहीं मानते। हम उसे रोकते हैं।''

ये साल सभी सोशल मीडिया कंपनियों के लिए चुनौती भरा होने वाला है और फ़ेसबुक भी इन चुनौतियों के दायरे से बाहर नहीं है। हालांकि कंपनियां हमेशा अपनी बैलेंस शीट को ध्यान में रखकर फ़ैसले लेती हैं। इसलिए अगर ये बहिष्कार लंबा खिंचता है और ज़्यादा कंपनियां इसमें शामिल हो जाती हैं तो ये साल फ़ेसबुक के लिए काफ़ी कुछ बदल देगा।

नया क़ानून बना तो सात लाख भारतीयों को छोड़ना पड़ सकता है कुवैत

प्रवासियों को लेकर कुवैत में तैयार हो रहे क़ानून ने खाड़ी देश में रह रहे भारतीयों के मन में उन चिंताओं को फिर से जगा दिया है जब दो साल पहले नियमों में बदलाव के चलते सैकड़ों भारतीय इंजीनियरों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा था।

अंग्रेज़ी अख़बार 'अरब न्यूज़' के मुताबिक़ कुवैत की नेशनल एसेंबली की क़ानूनी समिति ने प्रवासियों पर तैयार हो रहे एक बिल के प्रावधान को विधि सम्मत माना है।

ख़बरों के मुताबिक़ मंज़ूरी के लिए इस प्रस्ताव को दूसरी समितियों के पास भेजा जाने वाला है। इस क़ानून के मसौदे में कहा गया है कि कुवैत में रहने वाले भारतीयों की तादाद को देश की कुल आबादी के 15 फ़ीसद तक सीमित किया जाना चाहिए।

समझा जाता है कि वहां रहने वाले तक़रीबन 10 लाख प्रवासी भारतीयों में से सात लाख लोगों को बिल के पास होने की सूरत में वापस लौटना पड़ सकता है।

सऊदी अरब के उत्तर और इराक़ के दक्षिण में बसे इस छोटे से मुल्क की तक़रीबन पैंतालीस लाख की कुल आबादी में मूल कुवैतियों की जनसंख्या महज़ तेरह-साढ़े तेरह लाख ही है।

यहां मौजूद मिस्र, फिलिपीन्स, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और दूसरे मुल्कों के प्रवासियों में सबसे अधिक भारतीय हैं।

ख़बरों के मुताबिक़, प्रस्तावित क़ानून में दूसरे मुल्कों से आकर कुवैत में रहने वाले लोगों की तादाद को भी कम करने की बात कही गई है। कहा गया है कि प्रवासियों की तादाद को वर्तमान स्तर से कम करके कुल आबादी के 30 फ़ीसद तक ले जाया जाएगा।

कुवैत की एक मंटीनेशनल कंपनी में काम करने वाले नासिर मोहम्मद (बदला हुआ नाम) को इंजीनयरिंग की डिग्री होते हुए भी मजबूरी में सुपरवाइज़र के तौर पर काम करना पड़ रहा है।

वो कहते हैं, ''यहां रहने वाले हिंदुस्तानी सोच रहे हैं कि अगर बिल क़ानून बन गया तो क्या होगा?''

नासिर मोहम्मद फिर भी ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत मानते हैं कि उन्हें पुरानी कंपनी की जगह नई कंपनी में काम मिल गया वर्ना 2018 में आए नए कुवैती नियमों के दायरे से बाहर हो जाने की वजह से आईआईटी और बिट्स पिलानी से पास हुए इंजीनियरों तक की नौकरी बस देखते-देखते चली गई थी।

भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इंजीनियरों के मामले को कैवत की सरकार के साथ उठाया भी था लेकिन उसका कोई हल नहीं निकल सका।

नासिर मोहम्मद कहते हैं, "हालात ये हैं कि इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर चुके बहुत सारे भारतीय कुवैत में सुपरवाइज़र, फ़ोरमैन वग़ैरह की तनख्वाह और ओहदों पर काम कर रहे हैं जबकि ड्यूटी उन्हें एक इंजीनियर की निभानी पड़ती है।''

कुवैत में रह रहे हैदराबाद निवासी मोहम्मद इलियास कहते हैं कि नए प्रवासी क़ानून जैसे नियम की सुगबुगाहट 2008 की आर्थिक मंदी के बाद से बार-बार होती रही है और ये 2016 में तब और तेज़ हुई थी जब सऊदी अरब ने निताक़त क़ानून को लागू किया था।

निताक़त क़ानून के मुताबिक़ सऊदी अरब के सरकारी विभागों और कंपनियों में स्थानीय लोगों की नौकरी दर को ऊपर ले जाना है।

पिछले साल एक कुवैती सांसद ख़ालिद अल-सालेह ने एक बयान जारी कर सरकार से मांग की थी कि "प्रवासियों के तूफ़ान को रोका जाना चाहिए जिन्होंने नौकरियों और हुकूमत के ज़रिये मिलने वाली सेवाओं पर क़ब्ज़ा जमा लिया है।''

सफ़ा अल-हाशेम नाम की एक दूसरी सांसद ने चंद साल पहले कहा था कि "प्रवासियों को साल भर तक ड्राइविंग लाइसेंस न देने और एक कार ही रखने की इजाज़त दिए जाने के लिए क़ानून लाया जाना चाहिए।''

सफ़ा अल-हाशेम के इस बयान की कुछ हलकों में निंदा भी हुई थी।

कुवैत की नेशनल एसेंबली में 50 सांसद चुनकर आते हैं हालांकि माना जाता है कि वहां अमीर ही फ़ैसला लेने वाली भूमिका में हैं।

हाल में भी जब नए क़ानून की बात चली है तो कुछ स्थानीय लोग इसके ख़िलाफ़ भी बयान देते दिखाई दिए हैं।

19वीं सदी के अंत से 1961 तक ब्रिटेन के 'संरक्षण' में रहे कुवैत में भारतीयों का जाना लंबे समय से शुरु हो गया था। इस समय व्यापार से लेकर तक़रीबन सारे क्षेत्रों में वहां भारतीय मौजूद हैं, कुवैती घरों में ड्राइवर, बावर्ची से लेकर आया (महिला नौकरानी) तक का काम करने वालों की संख्या साढ़े तीन लाख तक बताई जाती है। लोगों का मानना है कि जल्दी-जल्दी में दूसरे लोगों से उनकी जगह भर पाना इतना आसान न होगा।

रीवन डिसूज़ा का परिवार 1950 के दशक में ही भारत से कुवैत चला गया था और उनकी पैदाईश भी वहीं की है।

रीवन डिसूज़ा स्थानीय अंग्रेज़ी अख़बार टाईम्स कुवैत के संपादक हैं।

बीबीसी से बातचीत के दौरान वो कहते हैं, "प्रवासियों पर बिल को अभी महज़ क़ानूनी समिति द्वारा संविधान के अनुकूल माना गया है, अभी इसे कई और कमिटियों जैसे मानव संसाधन समिति और दूसरे चरणों से गुज़रना है। इसके बाद ही ये बिल के तौर पर पेश हो सकेगा। इसके क़ानून बनने की बात उसके बाद ही मुमकिन है।''

रीवन डिसूज़ा इसे एक दूसरे नज़रिए से भी देखते हैं।

वो कहते हैं कि कोविड-19 से उपजे संकट और उसके बीच भारत सरकार के ज़रिये वहां रह रहे ग़ैर-क़ानूनी लोगों को वापस ले जाने की स्थानीय सरकार की मांग की अनदेखी करने को लेकर कुवैती हुकूमत के कुछ हलक़ों में नाराज़गी है और वो अब किसी एक देश के काम करने वालों पर आश्रित नहीं रहना चाहते हैं।

क्या आईसीएमआर 15 अगस्त तक कोरोना की स्वदेशी वैक्सीन बना लेगा?

भारत में कोरोना वायरस की वैक्सीन 15 अगस्त तक बना लेने की अंतिम तारीख़ तय करने से जुड़े मामले पर इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने अब सफ़ाई जारी की है। आईसीएमआर ने कहा है कि वैश्विक रूप से स्वीकृत नियमों के तहत ही फ़ास्ट ट्रैक वैक्सीन बनाई जाएगी।

आईसीएमआर ने अपना दो पन्नों का बयान ट्वीट करते हुए लिखा है कि भारत के लोगों की सुरक्षा और हित सर्वोच्च प्राथमिकता है।

दरअसल 15 अगस्त की तारीख़ पर बहस आईसीएमआर के महानिदेशक डॉक्टर बलराम भार्गव के इस हफ़्ते लिखे गए एक मेमो के बाद शुरू हुई थी। इसमें उन्होंने भारत की शीर्ष क्लीनिकल रिसर्च एजेंसियों से स्वतंत्रता दिवस तक कोरोना वायरस की वैक्सीन लॉन्च करने की बात कही थी।

अब आईसीएमआर ने महानिदेशक के बयान पर सफ़ाई जारी करते हुए कहा है, ''डीजी-आईसीएमआर का पत्र क्लीनिकल ट्रायल कर रहे अनुसंधानकर्ताओं से बेवजह की लाल-फ़ीताशाही से बचने के लिए था ताकि ज़रूरी प्रक्रियाएं भी न छूटें और नए प्रतिभागियों की भर्ती भी हो सके।''

''साथ ही नए स्वदेशी टेस्टिंग किट या कोविड-19 से संबंधित दवाई को बाज़ार में उतारने के लिए फ़ास्ट ट्रैक अनुमति में लाल-फ़ीताशाही बाधा न बने। स्वदेशी वैक्सीन विकसित करने की प्रक्रिया में धीमी गति से भी बचने को कहा गया था ताकि इस चरण को जल्द पूरा कर लिया जाए और जनसंख्या आधारित ट्रायल की शुरुआत की जा सके।''

आईसीएमआर ने कहा है कि फ़ास्ट ट्रैक वैक्सीन विकसित करने की प्रक्रिया वैश्विक रूप से स्वीकृत नियमों के तहत हो रही है।

आईसीएमआर का कहना है कि वैक्सीन का जानवरों और इंसानों पर एक साथ परीक्षण किया जा सकता है।

साथ ही वैक्सीन का ट्रायल मुश्किल से मुश्किल प्रयोगों के साथ होगा और ज़रूरत पड़ने पर डाटा सेफ़्टी मॉनिटरिंग बोर्ड इसकी समीक्षा कर सकता है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने उम्मीद जताई है कि भारत में बन रही कोरोना वैक्सीन 15 अगस्त तक लॉन्च हो जानी चाहिए। आईसीएमआर ने इस वैक्सीन के ट्रायल से जुड़े संस्थानों को ख़त लिखकर ये बात कही।

इस स्वदेशी वैक्सीन को आईसीएमआर और हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक कंपनी मिलकर बना रही है।

आईसीएमआर का कहना है कि एक बार क्लीनिकल ट्रायल पूरा हो जाए तो 15 अगस्त यानी भारत की आज़ादी के दिन इस वैक्सीन को आम लोगों के लिए लॉन्च किया जा सकता है।

क्लीनिकल ट्रायल के लिए भारत के 12 संस्थानों को चुना गया है। आईसीएमआर के निदेशक डॉक्टर बलराम भार्गव ने दो जुलाई को इन 12 संस्थानों को ख़त लिखकर कहा कि उन्हें सात जुलाई तक क्लीनिकल ट्रायल की इजाज़त ले लेनी चाहिए।

अपने पत्र में डॉक्टर भार्गव ने लिखा, ''कोरोना को रोकने के लिए आईसीएमआर के ज़रिए बनाई गई वैक्सीन के फ़ास्ट-ट्रैक ट्रायल के लिए भारत बायोटेक कंपनी के साथ एक समझौता किया गया है। कोरोनावायरस से एक स्ट्रेन निकालकर इस वैक्सीन को बनाया गया है।

''क्लीनिकल ट्रायल के बाद आईसीएमआर 15 अगस्त तक लोगों को ये वैक्सीन उपलब्ध कराना चाहता है। भारत बायोटेक भी युद्ध स्तर पर काम कर रही है। लेकिन इस वैक्सीन की सफलता उन संस्थानों के सहयोग पर निर्भर है जिन्हें क्लीनिकल ट्रायल के लिए चुना गया है।''

अमरीका का सेना पर बयान: माइक पॉम्पियो के बयान का भारत के लिए क्या मायने हैं?

भारत-चीन सीमा तनाव के बीच अमरीका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो का एक नया बयान सामने आया है।

माइक पॉम्पियो ने ब्रसेल्स फ़ोरम में कहा कि चीन से भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया में बढ़ते ख़तरों को देखते हुए अमरीका ने यूरोप से अपनी सेना की संख्या कम करने का फ़ैसला किया है।

भारत-चीन लद्दाख सीमा पर 15-16 जून को गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें भारत के 20 सैनिक मारे गए थे। दोनों देशों के बीच इस विवाद को सुलझाने के लिए बैठकों का दौर जारी है। लेकिन पूरे विश्व में इसकी चर्चा हो रही है।

इस तनाव पर अमरीकी विदेश मंत्री माइक पहले भी संवेदना जता चुके हैं। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वो भारत और चीन के बीच जारी तनाव पर नज़र रखे हुए हैं और मदद करना चाहते हैं।

ऐसे में अमरीकी विदेश मंत्री के नए बयान ने दोबारा से भारत-चीन सीमा विवाद को सुर्ख़ियों में ला दिया है।

माइक पॉम्पियो ने कहा, ''हम इस बात को सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हम चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का सामना करने के लिए तैयार रहें। हमें लगता है कि हमारे वक़्त की यह चुनौती है और हम इसे सुनिश्चित करने जा रहे हैं कि हमारी तैयारी पूरी है।''

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में घोषणा की थी कि अमरीका, जर्मनी में अपनी सेना की तादाद घटाएगा। राष्ट्रपति ट्रंप के इस फ़ैसले से यूरोपीय यूनियन ने नाराज़गी ज़ाहिर की थी।

अमरीका में डोनाल्ड ट्रंप के विरोधी इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। वहाँ की राजनीति में इसे अमरीका को सैन्य रूप से कमज़ोर करने वाले बयान के तौर पर पेश किया जा रहा है। इसी साल नंवबर में वहाँ चुनाव होने हैं। इस लिहाज़ से ये बयान और महत्वपूर्ण हो जाता है।

लेकिन भारत में भी चीन के साथ सीमा विवाद के मद्देनज़र इस बयान को काफ़ी अहमियत दी जा रही है।

माइक पॉम्पियो ने सिर्फ़ भारत के संदर्भ में ऐसा नहीं कहा है। वैसे इस इलाके़ में भारत अमरीका के लिए एक महत्वपूर्ण पार्टनर है।

भारत-चीन सीमा विवाद के बाद अमरीका की तरफ़ से सबसे पहले माइक पॉम्पियो ने ही बयान दिया था। चाहे अमरीका में नवंबर में होने वाले चुनाव की बात हो या फिर रक्षा मामलों की या फिर क्वॉड समूह की बात। भारत अमरीका के रिश्ते हर मोर्चे पर दोस्ताना रहे हैं। यही वजह है कि चुनाव से पहले डोनाल्ड ट्रंप भारत का दौरा भी कर चुके हैं।

आर्थिक क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध है। लेकिन हाल के दिनों में भारत को अमरीका की व्यापार की वरियता सूची से बाहर कर दिया गया था। दोनों देशों के बीच सामाजिक संबंध भी अच्छे हैं। यही वजह है कि एच1बी वीज़ा लेने वालों में भी भारतीयों की तादाद सबसे ज़्यादा है। अमरीका जानता है कि चीन के विश्व में बढ़ते दबाव को रोकने के लिए भारत का साथ ज़रूरी है।

अमरीका इस बयान के साथ दो हित एक साथ साध रहा है। पहला जर्मनी को इसके ज़रिए संदेश देना चाहता है।

दूसरी बात ये कि जब चीन का बर्ताव भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, ताइवान और फिलीपीन्स के साथ बदतर हो रहे थे, तो अमरीका को लगा कि ये सही मौक़ा है।

तब अमेरिका को लगता है कि सैन्य शक्ति का इस्तेमाल जर्मनी से हटा कर इन देशों की तरफ़ किया जाए। यहाँ याद रखने वाली बात है कि ये सभी देश अमरीका के अलायंस पार्टनर या स्ट्रैटेजिक पार्टनर हैं। अगर चीन इन सभी देशों पर हावी होगा तो उसको आर्थिक तौर पर नुक़सान होगा, साथ ही पार्टनरशिप पर भी असर पड़ेगा।

इसलिए अमरीका के इस बयान को एशिया में चीन के बढ़ते प्रसार के ख़तरे से अमरीका की बढ़ती चिंता के तौर पर देखना चाहिए।

ग्लिटर के पीछे: भारत में मीका और बाल खनन

नेल पॉलिश से लेकर लिपस्टिक तक, अभ्रक सौंदर्य प्रसाधन में पाया जाता है जो हर दिन लाखों लोग उपयोग करते हैं।

लेकिन उपभोक्ताओं के लिए अज्ञात, खनिज जो इन उत्पादों को अपनी चमक देता है, अक्सर दुनिया के सबसे गरीब क्षेत्रों में से एक गुलाम जैसी स्थितियों में पुरातन तरीकों का उपयोग करके निकाला जाता है।

झारखंड, भारत की धूल भरी पहाड़ियों में, गहरी दरारें कठोर पृथ्वी में समा गई हैं। पुरुष, महिलाएं और बच्चे गंदगी के माध्यम से अपने नंगे हाथों और कुछ अल्पविकसित साधनों का उपयोग करके जमीन को खुरचते हैं।

वे भूस्खलन और जहरीली धूल के निरंतर खतरे के तहत काम करते हैं, इस उम्मीद में अपने जीवन को खतरे में डालते हैं कि वे जीवित रहने के लिए पर्याप्त अभ्रक पाएंगे और बेचेंगे।

"मैं भुखमरी से मरने के बजाय खानों में काम करूंगी," एक महिला कहती है कि वह पृथ्वी से गुजरती है।

एक अन्य खदान में, 25 वर्षीय, अनिल अपनी पत्नी और अपने दो छोटे बच्चों के साथ मलबे के माध्यम से खोज कर रहा है। वे खानों के तल पर एक गाँव में रहते हैं, जहाँ कोई बहता पानी या बिजली नहीं है। अनिल एक किसान हुआ करते थे, लेकिन एक गंभीर सूखा ने अधिकांश भूमि को बंजर कर दिया।

"मीका हमारे लिए एकमात्र विकल्प है," वे कहते हैं। "हम सभी यहाँ काम करने आए हैं ... इसलिए हम चावल खरीद सकते हैं और खुद को खाना खिला सकते हैं।"

गरीब खनिकों से लेकर खदान मालिकों और निर्यातकों तक, जो चौंकाने वाली स्थिति में हैं, 101 ईस्ट प्रोग्राम में यूरोप में प्रमुख कॉस्मेटिक ब्रांडों की प्रयोगशालाओं में भारतीय देहात से अभ्रक आपूर्ति श्रृंखला का पता लगाते हैं।

कोरोनो वायरस महामारी के दौरान शरणार्थियों की देखभाल कौन करेगा?

कोरोनावायरस महामारी दुनिया भर के शरणार्थियों पर एक विनाशकारी प्रभाव डाल रही है।

भीड़-भाड़ वाले शिविरों में सामाजिक सुरक्षा और लगातार हाथ धोने जैसे निवारक उपायों को लागू करना अक्सर मुश्किल होता है।

शरणार्थियों की मदद करने वाली सहायता एजेंसियां ​​संघर्ष कर रही हैं।
यूरोप, उत्तरी अमेरिका और मध्य पूर्व में अमीर राष्ट्र दान को कम कर रहे हैं, और उस पैसे को घर पर रखने से महामारी के आर्थिक संकट से निपटने के लिए।

दुनिया के सबसे बड़े चैरिटी में से एक ऑक्सफैम ने करीब 1,500 कर्मचारियों को नौकरी से निकाला और पिछले महीने 18 देशों में से निकाला।

हाल के एक सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि 2021 तक वैश्विक सरकारी सहायता 25 बिलियन डॉलर घट जाएगी।

तो हम दुनिया के कुछ सबसे कमजोर लोगों के लिए सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करते हैं?

प्रस्तुतकर्ता: इमरान खान

मेहमान:

हेबा एली - द न्यू ह्यूमैनिटेरियन के निदेशक, एक गैर-लाभकारी पत्रकारिता संगठन जो मानवीय संकटों पर केंद्रित है।

ओले सोलवांग - नार्वे शरणार्थी परिषद में भागीदारी और नीति के निदेशक।

नासिर यासीन - अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ़ बेरूत में नीति और योजना के एसोसिएट प्रोफेसर और AUB4Refugees पहल के अध्यक्ष।

क्या कोरोना वायरस को बिना लॉकडाउन के काबू किया जा सकता है?

कोरोना वायरस तुर्की में देर से आया। यहां संक्रमण का पहला मामला 19 मार्च को दर्ज किया गया था। लेकिन जल्द ही यह तुर्की के हर कोने में फैल गया। महीने भर के भीतर ही तुर्की के सभी 81 प्रांतों में कोरोना वायरस फैल चुका था।

तुर्की में दुनिया में सबसे तेज़ी से कोरोना संक्रमण फैल रहा था। हालात चीन और ब्रिटेन से भी ज़्यादा ख़राब थे। आशंकाएं थी कि बड़े पैमानों पर मौतें होंगी और तुर्की इटली को भी पीछे छोड़ देगा। उस समय इटली सबसे ज़्यादा प्रभावित देश था।

तीन महीने गुज़र गए हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, वो भी तब जब तुर्की ने पूर्ण लॉकडाउन लागू ही नहीं किया।

तुर्की में आधिकारिक तौर पर 4397 लोगों की कोरोना संक्रमण से मौत की पुष्टि की गई है। दावे किए जा रहे हैं कि वास्तविक संख्या इसके दो गुना तक हो सकती है क्योंकि तुर्की में सिर्फ़ उन लोगों को ही मौत के आंकड़ों में शामिल किया गया है जिनकी टेस्ट रिपोर्ट पॉज़िटिव थीं।

लेकिन अगर दूसरे देशों की तुलना में देखा जाए तो सवा आठ करोड़ की आबादी वाले इस देश के लिए ये संख्या कम ही है।

विशेषज्ञ चेताते हैं कि कोरोना संक्रमण को लेकर किसी नतीजे पर पहुंचना या दो देशों के आंकड़ों की तुलना करना मुश्किल है, वो भी तब जब कई देशों में मौतें जारी हैं।

लेकिन यूनिवर्सिटी आफ़ केंट में वायरलॉजी के लेक्चरर डॉ. जेरेमी रॉसमैन के मुताबिक़ 'तुर्की ने बर्बादी को टाल दिया है।'

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''तुर्की उन देशों में शामिल है जिसने बहुत जल्द प्रतिक्रिया दी। ख़ासकर टेस्ट करने, पहचान करने, अलग करने और आवागमन को रोकने के मामले में। तुर्की उन चुनिंदा देशों में शामिल है जो वायरस की गति को प्रभावी तरीक़े से कम करने में कामयाब रहे हैं।''

जब वायरस की रफ़्तार बढ़ रही थी, अधिकारियों ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। कॉफ़ी हाउस जाने पर रोक लग गई, शापिंग बंद हो गई, मस्जिदों में सामूहिक नमाज़ रोक दी गई।

पैंसठ साल से ऊपर और बीस साल से कम उम्र के लोगों को पूरी तरह लॉकडाउन में बंद कर दिया गया। सप्ताहांत में कर्फ्यू लगाए गए और मुख्य शहरों को सील कर दिया गया।

इस्तांबुल तुर्की में महामारी का केंद्र था। इस शहर ने अपनी रफ़्तार खो दी, जैसे कोई दिल धड़कना बंद कर दे।

अब प्रतिबंधों में धीरे-धीरे ढील दी जा रही है, लेकिन डॉ. मेले नूर असलान अभी भी चौकन्नी रहती हैं। वो फ़तीह ज़िले की स्वास्थ्य सेवाओं की निदेशक हैं। ये इस्तांबुल के केंद्र में एक भीड़भाड़ वाला इलाक़ा है।  ऊर्जावान और बातूनी डॉ. असलान कांटेक्ट ट्रेसिंग अभियान का नेतृत्व कर रही हैं। पूरे तुर्की में कांटेक्ट ट्रेसिंग अभियान की छह हज़ार टीमें हैं।

वो बताती हैं, ऐसा लगता है जैसे हम युद्धक्षेत्र में हों। मेरी टीम के लोग घर जाना ही भूल जाते हैं, आठ घंटे के बाद भी वो काम करते रहते हैं। वो घर जाने की परवाह नहीं करते क्योंकि वो जानते हैं कि वो अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।

डॉ. मेले नूर असलान कहती हैं कि उन्होंने मार्च 11, यानी पहले दिन से ही वायरस को ट्रैक करना शुरू कर दिया था, इसमें ख़सरे की बीमारी को ट्रैक करने का उनका अनुभव काम आया।

वो कहती हैं, ''हमारी योजना तैयार थी। हमने सिर्फ़ अलमारी से अपनी फ़ाइलें निकालीं और हम काम पर लग गए।''

फ़तीह की तंग गलियों में हम दो डॉक्टरों के साथ हो लिए। पीपीई किटें पहने ये डॉक्टर एक एप का इस्तेमाल कर रहे थे। वो एक अपार्टमेंट में एक फ्लैट में गए जहां दो युवतियां क्वारंटीन में थीं। उनका दोस्त कोविड पॉज़िटिव है।

अपार्टमेंट के गलियारे में ही दोनों महिलाओं के कोविड के लिए परीक्षण किए गए, उन्हें रिपोर्ट चौबीस घंटों के भीतर मिल जाएगी। एक दिन पहले उन्हें हल्के लक्षण दिखने शुरु हुए हैं। 29 वर्षीया मज़ली देमीरअल्प शुक्रगुज़ार हैं कि उन्हें तुरंत रेस्पांस मिला है।

वो कहती हैं, ''हम विदेशों की ख़बरें सुनते हैं। शुरू में जब हमें वायरस के बारे में पता चला तो हम बेहद डर गए थे लेकिन जितना हमने सोचा था तुर्की ने उससे तेज़ काम किया। यूरोप या अमरीका के मुक़ाबले बहुत तेज़ काम किया।''

तुर्की में विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी प्रमुख डॉ. इरशाद शेख कहते हैं कि तुर्की के पास सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर दुनिया के लिए कई सबक़ हैं।

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''शुरुआत में हम चिंतित थे। रोज़ाना साढ़े तीन हज़ार तक नए मामले आ रहे थे। लेकिन टेस्टिंग ने बहुत काम किया। और नतीजों के लिए लोगों को पांच-छह दिनों का इंतेज़ार नहीं करना पड़ा।''

उन्होंने तुर्की की कामयाबी का श्रेय कांटेक्ट ट्रेसिंग, क्वारंटीन और तुर्की की अलग-थलग करने की नीति को भी दिया।

तुर्की में मरीज़ों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन भी दी गई। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसकी जमकर तारीफ़ की थी लेकिन अंतरराष्ट्रीय शोध ने इस दवा को खारिज कर दिया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के इलाज के तौर पर इस दवा का ट्रायल रोक दिया है। मेडिकल जर्नल लेंसेट में प्रकाशित एक शोध पत्र में दावा किया गया है कि इस दवा से कोविड-19 के मरीज़ों में कार्डिएक अरेस्ट का ख़तरा बढ़ जाता है और इससे फ़ायदे से ज़्यादा नुकसान हो सकता है।

हमें उन अस्पतालों में जाने की अनुमति दी गई जहां हज़ारों लोगों को दवा के रूप में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दी गई है। दो साल पहले बना डॉ. सेहित इल्हान वारांक अस्पताल कोविड के ख़िलाफ़ लड़ाई का केंद्र बना हुआ है।

यहां की चीफ़ डॉक्टर नुरेत्तिन यीयीत कहते हैं कि शुरू में ही हाड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन इस्तेमाल करना अहम है। डॉ यीयीत के बनाए चित्र इस नए चमकदार अस्पताल की दीवारों पर लगे हैं।

वो कहती हैं, ''दूसरे देशों ने इस दवा का इस्तेमाल देरी से शुरू किया है, ख़ासकर अमरीका ने, हम इसका इस्तेमाल सिर्फ़ शुरुआती दिनों में करते हैं, हमें इस दवा को लेकर कोई झिझक नहीं है। हमें लगता है कि ये प्रभावशाली है क्योंकि हमें नतीजे मिल रहे हैं।''

अस्पताल का दौरा कराते हुए डॉ, यीयीत कहते हैं कि तुर्की ने वायरस से आगे रहने की कोशिश की है। हमने शुरू में ही इलाज किया है और आक्रामक रवैया अपनाया है।

यहां डॉक्टर हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के अलावा दूसरी दवाओं, प्लाज़्मा और बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं।

डॉ. यीयीत को गर्व है कि उनके अस्पताल में कोविड से मरने वालों की दर एक प्रतिशत से भी कम रही है। यहां कि इंटेसिव केयर यूनिट यानी आईसीयू में बिस्तर खाली हैं। वो मरीज़ों को यहां से बाहर और वेंटिलेटर के बिना ही रखने की कोशिश करते हैं।

हम चालीस साल के हाकिम सुकूक से मिले जो इलाज कराने के बाद अब अपने घर लौट रहे हैं। वो डॉक्टरों के शुक्रगुज़ार हैं।

वो कहते हैं, ''सभी ने मेरा बहुत ध्यान रखा है। ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपनी मां की गोद में हूं।''

तुर्की मेडिकल एसोसिएशन ने अभी महामारी पर सरकार के रेस्पांस को क्लीन चिट नहीं दी है। एसोसिएशन कहती है कि सरकार ने जिस तरह से महामारी को लेकर क़दम उठाए उनमें कई कमियां थीं।

इनमें सीमाओं को खुला छोड़ देना भी शामिल है।

हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन तुर्की को कुछ श्रेय दे रहा है। डॉ शेख कहते हैं, ''ये महामारी अपने शुरुआती दिनों में है। हमें लगता है कि और भी बहुत से लोग गंभीर रूप से बीमार होंगे। कुछ तो है जो ठीक हो रहा है।''

कोरोना महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में तुर्की के पक्ष में भी कई चीज़ें हैं।  जैसे, युवा आबादी और आईसीयू के बिस्तरों की अधिक संख्या। लेकिन अभी भी रोज़ाना लगभग एक हज़ार नए मामले सामने आ ही रहे हैं।

तुर्की को कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में कामयाबी की कहानी के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन अभी भी सावधानी बरतने की ज़रूरत है क्योंकि अभी ये कहानी ख़त्म नहीं हुई है।