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लाइव : ओडिशा में महिलाओं के साथ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बातचीत

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लाइव : कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ओडिशा के जेपोर में जनसभा को संबोधित किया

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ओडिशा के कोरापुट में सार्वजनिक संबोधन

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ओडिशा के कोरापुट में सार्वजनिक संबोधन

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश में जनसभा को संबोधित किया

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश में जनसभा को संबोधित किया

राफेल घोटाले पर मीडिया को संबोधित करते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी | एचडी

राफेल घोटाले पर मीडिया को संबोधित करते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी | एचडी

राफेल घोटाले पर मीडिया को संबोधित करते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

राफेल घोटाले पर मीडिया को संबोधित करते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

ट्रंप ने मोदी को दिया बड़ा झटका, भारत को होगा नुकसान

अमरीका ने मंगलवार को अपनी 'जीएसपी स्कीम' में बदलाव करते हुए भारत को इससे बाहर करने का फ़ैसला किया है, जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नकारात्मक साबित हो सकता है।

भारत के पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के लिए भी ये क़दम काफ़ी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि ट्रंप सरकार ने ये फ़ैसला आम चुनाव से ठीक पहले किया है। ऐसे में मोदी सरकार के पास इसका जवाब देने के लिए पर्याप्त समय नहीं है।

बीजेपी अब तक अपनी सरकार की विदेश नीति को सफल बताती आई है, लेकिन ट्रंप सरकार के इस फ़ैसले को मोदी सरकार की असफलता के रूप में देखा जा सकता है।

अमरीकी सरकार अपनी प्रिफ्रेंशियल ट्रेड पॉलिसी (कारोबार में तवज्जो) के जनरल सिस्टम ऑफ़ प्रिफरेंसेज़ में से भारत को बाहर निकाल दिया है।

अब तक इस नीति की वजह से भारत से अमरीका जाने वाले 1930 उत्पाद अमरीका में आयात शुल्क देने से बच जाते थे।

इस बदलाव से अमरीका में भारत की हस्तशिल्प चीज़ें, केमिकल, मछली पालन से जुड़े उत्पाद और कृषि आधारित उत्पादों को आयात शुल्क देना पड़ेगा।

अगर इसके असर की बात करें तो इससे हज़ारों नौकरियों पर संकट आ सकता है।

दरअसल, साल 1970 के दशक में अमरीकी सरकार ने विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने के मंसूबे के साथ इस नीति को अपनाया था।

इस नीति के तहत विकासशील देश अपने कुछ उत्पादों को बिना आयात शुल्क दिए अमरीका को निर्यात कर सकते थे।

दुनिया भर में भारत ने इस नीति का सबसे ज़्यादा फ़ायदा उठाया है।

फेडरेशन ऑफ़ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशंस के अध्यक्ष गणेश कुमार गुप्त बताते हैं, ''जीएसपी से बाहर निकाले जाने से कई मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स की प्रतिस्पर्धा को नुक़सान होगा। साथ ही साथ इससे उपभोक्ताओं को भी नुक़सान होगा। ज़्यादातर केमिकल उत्पादों की क़ीमत पांच फ़ीसदी की दर से बढ़ने की संभावना है जो कि भारत के कुल निर्यात का एक बड़ा हिस्सा है।''

वो कहते हैं, ''इसके साथ ही इस क़दम से अमरीका की 'इंपोर्ट डायवर्सिफिकेशन' नीति भी प्रभावित होगी, जिससे वह विकासशील देशों के मुख्य सप्लायर के रूप में चीन की जगह लेने की चाहत रखता है।''

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लगातार टैरिफ़ ड्यूटी को लेकर भारत को निशाना बनाते आए हैं। बीते साल अक्टूबर में उन्होंने भारत को टैरिफ़ किंग की उपाधि भी थी और अमरीकी उत्पादों के लिए खुली छूट देने की मांग उठाई थी।

अमरीका बीते काफ़ी समय से मेडिकल डिवाइसों पर लगने वाले प्राइसिंग कैप को हटाने की मांग कर रहा है जिससे अमरीकी कंपनियों को नुक़सान हो रहा है।

इसके साथ ही अमरीका चाहता है कि भारत अमरीका से आने वाले आईटी उत्पादों और कृषि क्षेत्र से जुड़े उत्पादों को अपने बाज़ार में ज़्यादा पहुंच उपलब्ध कराए।

अमरीकी सरकार ये भी चाहती है कि भारत डेयरी उत्पादों पर लगी हुई अपनी शर्त हटाए जिसके तहत उन जानवरों के ख़ून से बनी चीज़ें ना खिलाने की शर्त है जिनसे डेयरी उत्पाद पैदा किए जा रहे हैं।

भारत के वित्तीय सचिव अनूप वाधवान ने बीबीसी से कहा कि अभी तक दोनों देश कोई बीच का रास्ता निकालने के लिए वार्ता की प्रक्रिया में हैं।

उन्होंने अमरीकी उत्पादों पर लगाए गए करों का बचाव करते हुए कहा कि ये डब्ल्यूटीओ के लिए बंधी हुई दरों के अनुसार ही हैं।

बीबीसी से बात करते हुए वाधवान ने कहा, ''हम अमरीका से बात कर रहे थे और अमरीका के कृषि उत्पादों, डेयरी उत्पादों और सूचना प्रौद्योगिकी उत्पादों को बाज़ार तक सशर्त पहुंच देने और मेडिकल उपकरणों की क़ीमत तय करने के लिए तैयार थे, लेकिन दुर्भाग्यवश अमरीका के साथ वार्ता के नतीजे अलग नहीं आ सके।  हमारे व्यापारिक रिश्ते अच्छे बने हुए हैं, व्यापार वार्ता पर भी कोई असर नहीं हुआ है।''

उन्होंने कहा कि जीएसपी हटाए जाने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत ज़्यादा नहीं होगा और ये 19 करोड़ डॉलर तक ही सीमित रहेगा।

भारत और अमरीका के राजयनिक संबंधों के केंद्र में व्यापार ही है। अमरीकी आंकड़ों के मुताबिक़, दोनों देश सालाना 126.2 अरब डॉलर का व्यापार करते हैं, लेकिन हाल के दिनों में संरक्षणवादी आवाज़ें तेज़ी से उठी हैं।

बीते साल, भारत से आयात होने वाले स्टील और एल्यूमुनियम पर कर बढ़ा दिए थे। इसके जबाव में भारत ने भी 29 अमरीकी उत्पादों पर कर बढ़ाए थे जिनमें बादाम भी शामिल हैं, लेकिन भारत ने ये बढ़े हुए कर कुछ अच्छा समाधान होने की उम्मीद में लागू नहीं किए।

भारत ने हाल ही में नई ई-कॉमर्स नीति भी जारी की जिससे भारत में व्यापार कर रहीं अमरीकी कंपनियों एमज़ॉन और वॉलमॉर्ट के व्यवसाय पर असर हुआ है। इससे भी दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में तनाव आया।

इसके बाद भारत में डेटा को लेकर नए नियम लाए गए जिनके तहत भारत में व्यापार कर रहीं मास्टरकार्ड और वीज़ा जैसी कंपनियों से कहा गया कि वो भारतीयों से जुड़े डेटा को भारत में ही रखें। इससे इन कंपनियों के बिज़नेस मॉडल पर असर हुआ है।

अब अमरीका ने जो ये नया क़दम उठाया है इससे दोनों देशों के रिश्तों में व्यापारिक तनाव और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।

अमरीका ने भारत के लिए जीएसपी फ़ायदों को रोकने के लिए साठ दिनों का समय दिया है। भारत को उम्मीद है कि इसी दौरान वार्ता करके कुछ हल निकाल लिया जाएगा। दोनों ही ओर के व्यापारिक संगठन को उम्मीद है कि जल्द ही कोई रास्ता निकलेगा।

यूएस-इंडिया बिज़नेस काउंसिल की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है, ''जीएसपी कार्यक्रम को अमेरीकी चैंबर से मिल दीर्घकालिक समर्थन को ध्यान में रखते हुए, यूएसआईबीसी मांग करता है कि भारत के लिए जीएसपी फ़ायदे ज़ारी रखे जाएं। दोनों देशों के बीच कई गंभीर व्यापारिक विवादों के बावजूद, भारत और अमरीका दोनों को ही जीएसपी कार्यक्रम के तहत हुए व्यापार से फ़ायदा पहुंचा हैं।

मुस्लिम, दलित और आदिवासी उत्पीड़न पर संयुक्त राष्ट्र ने भारत को चेताया

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बाचले ने बुधवार को भारत को आगाह किया है कि 'बाँटने वाली नीतियों' से आर्थिक वृद्धि को झटका लग सकता है।

मिशेल ने कहा कि संकीर्ण राजनीति एजेंडा के कारण समाज में कमज़ोर लोग पहले से ही हाशिए पर हैं।

मिशेल ने कहा, ''हमलोगों को ऐसी रिपोर्ट मिल रही है जिससे संकेत मिलते हैं कि अल्पसंख्यकों के साथ उत्पीड़न के वाक़ये बढ़े हैं। ख़ास करके मुस्लिम और ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों में दलितों और आदिवासियों का उत्पीड़न बढ़ा है।''

मिशेल ने ये बात जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार काउंसिल की वार्षिक रिपोर्ट में कही।

इससे पहले पिछले साल संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद ने कश्मीर में मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन और उसकी जांच की बात कही थी।

उस समय कश्मीर पर यूएन की रिपोर्ट को भारत ने पूरी तरह से ख़ारिज करते हुए कहा था कि भारत की संप्रभुता का उल्लंघन और उसकी क्षेत्रीय एकता के ख़िलाफ़ है।

2016 में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच और एमनेस्टी इंटरनेशनल की सालाना रिपोर्ट में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की आलोचना की गई थी।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने ग्रीनपीस और फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन का हवाला देते हुए एनजीओ और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने और विदेशी फ़ंड रोकने के लिए मोदी सरकार को जमकर कोसा था।

वहीं, ह्यूमन राइट्स वॉच की 2016 की रिपोर्ट में कहा गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रहे हमलों को रोकने में नाकाम रही।

अपनी 659 पन्नों की रिपोर्ट में ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा था कि सरकार का या फिर बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स का विरोध करने वाले एनजीओ को मिलने वाले विदेशी फ़ंड्स पर रोक लगा दी गई इससे अन्य संगठन भी सकते में हैं।

ह्यूमन राइट्स वॉच की मीनाक्षी गांगुली ने कहा था, ''असहमति पर भारत सरकार का जो रवैया रहा है, उससे देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी की परंपरा को धक्का लगा है।''

बिना रफ़ाल के एफ-16 का सामना कैसे करेंगे : सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार

भारत में रफ़ाल मामले पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अदालत अपने अवलोकन में कुछ भी कहने से बचे क्योंकि कोर्ट की हर टिप्पणी का इस्तेमाल सरकार या विपक्ष पर निशाना साधने में इस्तेमाल किया जाएगा।

केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को एक पक्ष क्यों बनना चाहिए। वेणुगोपाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपनी जांच में पहले कह चुका है कि रफ़ाल सौदे में कोई भी गड़बड़ी नहीं हुई है।

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, वेणुगोपाल ने हाल ही में पाकिस्तान के लड़ाकू विमान एफ़-16 की कथित रूप से भारतीय सीमा में घुसपैठ का भी हवाला दिया।

वेणुगोपाल ने कहा, ''हमलोग अपने देश की सुरक्षा को मुकम्मल करने की कोशिश कर रहे हैं ... एफ़-16 और बमों से हम पर हमले होंगे तो हम क्या करेंगे? बिना रफ़ाल के हम उनका सामना कैसे करेंगे?''

वेणुगोपाल ने मिग-21 बाइसन के बारे में कहा कि यह 1960 के दशक का फाइटर प्लेन है जिसने एफ़-16 का सामना किया, लेकिन अब भी रफ़ाल की हमें ज़रूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को फ़्रांस से हुए रफ़ाल सौदे की जांच में पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई 14 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी।

सुप्रीम कोर्ट में रफ़ाल मामले पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई में बुधवार को एटॉर्नी जनरल (एजी) के के वेणुगोपाल ने कहा कि इस लड़ाकू विमान के सौदे से जुड़े कुछ ख़ास दस्तावेज रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण ने जब एक नोट पढ़ना शुरू किया तो वेणुगोपाल ने आपत्ति जताई। भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि रफ़ाल सौदे से जुड़ी जांच की पुनर्विचार याचिका ख़ारिज नहीं करनी चाहिए क्योंकि 'अहम तथ्यों' को सरकार दबा नहीं सकती है।

रफ़ाल पर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और के एम जोसेफ़ की बेंच के सामने वेणुगोपाल ने कहा कि रक्षा मंत्रालय से नौकरशाहों ने ऐसे दस्तावेज चुरा लिए हैं जिसकी जांच अभी लंबित है।

सुनवाई के दौरान मौजूद वरिष्ठ क़ानूनी संवाददाता के सुचित्रा मोहंती अनुसार, एजी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि गोपनीयता के क़ानून के अनुसार चोरी करने वालों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई 14 मार्च तक टाल दी है।

एजी ने कहा कि फ़ाइल चोरी की गई और एक राष्ट्रीय दैनिक अख़बार 'द हिन्दू' ने इसे प्रकाशित कर दिया।

एजी से जस्टिस रंजन गोगोई ने पूछा कि सरकार ने इस मामले में क्या कार्रवाई की है तो वेणुगोपाल ने कहा, ''हमलोग इसकी जांच कर रहे हैं कि फ़ाइल चोरी कैसे हुई। एजी ने कहा कि द हिन्दू ने गोपनीय फ़ाइल को छापा है। हाल ही में द हिन्दू ने रफ़ाल सौदे से जुड़ी कई रिपोर्ट छापी हैं जिनमें बताया गया है कि सरकार ने कई नियमों का उल्लंघन किया है।''

वेणुगोपाल ने कहा कि रक्षा सौदों का संबंध राष्ट्र की सुरक्षा से होता है और ये काफ़ी संवेदनशील हैं। एजी ने कहा कि अगर सब कुछ मीडिया, कोर्ट और पब्लिक डिबेट में आएगा तो दूसरे देश सौदा करने से बचेंगे।

नरेंद्र मोदी सरकार ने फ़्रांस से 2016 में रफ़ाल सौदे पर हस्ताक्षर किया था। 59,000 करोड़ रुपए की इस डील में फ़्रांस की डसॉ कंपनी से भारत को 36 लड़ाकू विमान मिलने हैं।

प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वो अदालत में वही दस्तावेज रख रहे हैं जो सार्वजनिक रूप से पहले से ही मौजूद हैं। याचिकाकर्ताओं में आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह भी हैं, जिनकी तरफ़ से संजय हेगड़े सुप्रीम कोर्ट में दलील देने के लिए मौजूद थे। हालांकि सीजेआई ने संजय हेगड़े को सुनने से इनकार कर दिया।

एजी ने पुनर्विचार याचिका ख़ारिज करने के पक्ष में दलील देते हुए कहा कि सेक्शन तीन के उपनियम सी के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति वैसे दस्तावेजों का इस्तेमाल करता है, जिनका संबंध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संप्रभुता, एकता और विदेशी संबंधों से है तो यह ग़ैरक़ानूनी है। एजी ने सुप्रीम कोर्ट से गोपनीयता के क़ानून के उल्लंघन का हवाला देते हुए पुनर्विचार याचिका ख़ारिज करने की मांग की।

राफेल डील स्कैम पर कांग्रेस मुख्यालय में रणदीप सिंह सुरजेवाला द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

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