विज्ञान और टेक्नोलॉजी

चीन अपनी सेना में 'आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस' लाने को पूरी तरह तैयार

चीन अपनी सेना में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग में महारथ हासिल करने पर अपनी नज़रें टिकाई हैं। एशिया के इस विशाल देश का अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के मामले में आगे बढ़ने का यह प्रयास बेहद महत्वपूर्ण है।

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर चाइना एकेडमी ऑफ़ इनफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन के एक श्वेत पत्र में कहा गया है, ''आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए हथियारों के प्रयोग से दूर बैठे ही भविष्य में युद्ध को नियंत्रित किया जा सकता है, यह युद्ध की सटीकता को बनाने के साथ ही युद्धक्षेत्र को भी सीमित रख सकता है।

2017 में चीन की स्टेट काउंसिल ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें दोहरे उपयोग वाले सिविल और मिलिट्री तकनीक के एकीकृत उपकरणों के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने का विचार दिया गया और इसके लिए आधुनिक 'आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस' पर बल दिया गया था।

सिविल-मिलिट्री मेल का उद्देश्य निजी क्षेत्र सहित चीन की प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों को 'आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस' संबंधित सहयोग के जरिये सैन्य औद्योगिक उत्पादन के दायरे में लाना था।

2018 में चीन की दो मल्टीनेशनल टेकनोलॉजी कंपनियों ने बाइदु (2,368) और टेनसेंट (1,168) इसकी ज़िम्मेदारी ली और चीन के भीतर 'आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस' के अनुसंधान और विकास से जुड़े अधिकतम अमरीकी पेटेंट हासिल किये। लेकिन चीन इससे भी आगे बढ़ा और उसने अनुसंधान के ढांचे विकसित करने के लिए स्टार्ट अप्स में निवेश किये और उन्हें सरकारी योजनाओं के तहत अनुसंधानों से जोड़ने की रणनीति पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन की सेना और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस में लगी कंपनियों के बीच सहयोग है। यह इस बात से भी समझा जा सकता है कि चाइना आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एसोसिएशन के प्रमुख चीन की सेना के मेजर जनरल ली डेई हैं।

चीन के राष्ट्रीय ख़ुफ़िया क़ानून के मुताबिक़, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों पर कंपनियों को 'राष्ट्रीय ख़ुफ़िया कार्यों में सहयोग और सहायता' करना चाहिए।

इन प्रयासों से परिणाम भी मिलने लगे। मार्च 2019 में चीन ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की नई तकनीक को लेकर पेटेंट के मामले में अमरीका को पछाड़ दिया।

और अपनी उपलब्धियों को दिखाने के लिए, बीते चार वर्षों से वह एक सालाना सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन एक्सपो का आयोजन कर रहा है। इस शो में बड़े पैमाने पर ड्रोन, कमांड-कंट्रोल सिस्टम, ट्रेनिंग सिमुलेशन उपकरण और मानव रहित युद्ध हार्डवेयर्स जैसी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले सैन्य उत्पादों को प्रदर्शित किया जाता है।

ड्रोन एक ऐसा क्षेत्र है, जहां आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से बहुत बड़े पैमाने पर सुधार लाया जा सकता है। अन्य चीज़ों के अलावा, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एक ड्रोन को युद्ध के मैदान में अपने बल पर मानव रहित विमानों को पहचानने और उन्हें मार गिराने की क्षमता प्रदान करेगा।

ज़ियान यूएवी और चेंग्दू एयरक्राफ्ट इंडस्ट्री ग्रुप जैसी चीनी कंपनियां जे-10, जे-11 और जे-20 जैसे चीनी फ़ाइटर जेट बनाती हैं, जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले ड्रोन बनाने में निवेश कर रही हैं।

ज़ियान यूएवी ने ब्लोफिश ए-2 विकसित किया है, जो ऐसा ही एक ड्रोन है।

कंपनी की वेबसाइट में कहा गया है कि ब्लोफिश ए-2 अपने बल पर मिड-पॉइंट या फिक्स्ड-पॉइंट डिटेक्शन, फिक्स्ड-रेंज जासूसी और टारगेट स्ट्राइक समेत कहीं अधिक जटिल लड़ाकू मिशन पूरा करता है।

एक अन्य चीनी कंपनी, इहांग ने 184 एएवी नामक एक ड्रोन विकसित किया है, जो बिना किसी मानवीय सहायता के पहले से तय रास्ते पर 500 मीटर तक उड़ सकता है, यह अपने साथ एक पैसेंजर या सामान ले जाने में भी सक्षम है।

सिविल-मिलिट्री 'ड्रोन टैक्सी' के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है। यह सिविल-सैन्य एकीकरण की दिशा में उठाये गये चीन की एक बड़ी कोशिश का उदाहरण है।

सैन्य ड्रोन मानवरहित हवाई विमान (यूएवी) के रूप में युद्ध क्षेत्र में टोही विमान के रूप में काम करेगा और वहां से कमांड सेंटर में डेटा वापस भेज सकेगा।

एक बड़े क्षेत्र पर टोही विमान के रूप में काम करने की क्षमता यूएवी को एक ऐसी मशीन में बदल देंगे जो बिना मानवीय सहायता के निगरानी कर सकती हैं।

इसके अलावा, मशीन लर्निंग सिस्टम की क्षमता वाले ये ड्रोन युद्ध क्षेत्र में सही निर्णय लेने में सक्षम होंगे लिहाजा सैन्य जासूसी और भी अधिक सटीक तरीके से हो सकेगी।

इसके साथ ही 5G नेटवर्क तकनीक पर चीन की बढ़ती महारत से ड्रोन उस तेज़ी से डेटा भेज सकने में सक्षम हो सकेगा जो अब से पहले नहीं देखी गई है।

चीन दुनिया भर में यूएवी के एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है। यूएई, पाकिस्तान, लीबिया और सऊदी अरब जैसे देश इस तकनीक के लिए चीन की ओर नज़र लगाए हुए हैं।

ज़ियान यूएवी ने ब्लोफिश ए-2 यूएई को बेच दिया है, पाकिस्तान और सऊदी अरब से साथ इसकी बिक्री पर चर्चा चल रही है।

हांगकांग स्थित न्यूज़पेपर साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा कि चीन सऊदी अरब में ड्रोन उत्पादन के कारखाने भी लगा सकता है।

और मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि लीबिया और यमन में हाल के संघर्षों के दौरान कथित तौर पर चीन में बने ड्रोन का उपयोग किया गया था।

चीन ने ऐसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं जो ड्रोन और छोटी मिसाइलों के इसके निर्यात को नियंत्रित करते हों। उदाहरण के लिए, यह उन 35 देशों में नहीं है जो मिसाइल टेकनोलॉजी नियंत्रण योजना के पक्षकार हैं।

जापानी एसोसिएशन ऑफ डिफेंस इंडस्ट्री (JADI) की पत्रिका के एक लेख में कहा गया है कि यूएवी डेवलपमेंट के लिए चीन का बजट 2018 में 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2019 में 1.4 अरब डॉलर हो गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस आधार पर यूएवी को बनाने में चीनी निवेश 2025 तक 2.6 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा।

जानकारों के मुताबिक़, 2016 में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने यूएवी के अनुसंधान और विकास को कम्युनिस्ट पार्टी के एक नए समूह- सेंट्रल मिलिट्री कमिशन सब्सिडियरी को सौंप दिया और चूंकि सेंट्रल मिलिट्री कमिशन के प्रमुख राष्ट्रपति होते हैं लिहाजा यूएवी विकास कार्यक्रम अब शी जिनपिंग की सीधी निगरानी में आता है।

चीन चेहरे की पहचान (फेशियल रिकग्निशन) की निगरानी करने वाली तकनीक के आपूर्तिकर्ता के रूप में भी तेज़ी से उभरा है, इसकी मांग कई देशों में बढ़ रही है।

चीन की निगरानी करने वाली इस तकनीक के पास बहुत बड़ी संख्या में डेटाबेस हैं।

माना जाता है कि सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय फ़ेशियल रिकग्निशन का एक सबसे बड़ा डेटाबेस तैयार कर रहा है। यह अपना फोकस शिनजियांग प्रांत पर लगाये हुए है।

सेंस टाइम, चीन की एक स्टार्टअप है जिसने शिनजियांग में पुलिस को सर्विलांस तकनीक दी है। हालांकि इसके उपयोग को लेकर इसका विरोध भी किया जा रहा है। कंपनी ने हाल ही में अपने शेयर तांगली तकनीक को बेचे हैं।

युद्ध की योजना बनाने वाला सॉफ्टवेयर : आधिकारिक समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, 2007 से चीन सेंट्रल एक्गोरिथ्म पर आधारित एक ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित कर रहा है जो युद्ध के मैदान में तेज़ गति और सटीकता के साथ फ़ैसले लेने में मददगार साबित होगा।

हालांकि, चीन इस पर कितना आगे बढ़ा है, यह पता लगाना मुश्किल है, लेकिन अमरीका और नाटो जिनके पास उन्नत तकनीक मौजूद है। उन्हें चुनौती देने के लिए नई तकनीक का विकास करने में इसकी बहुत बारीक जानकारी होना आवश्यक है।

बताया जाता है कि इस क्षेत्र में चीन की कोशिशें अमरीका की अफ़ग़ानिस्तान में गतिविधियों पर आधारित हैं।

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन सरकार ने बेल्जियम की कंपनी लुसिएड से लुसीडलाइट्स्पीड सॉफ्टवेयर का अधिग्रहण किया है, जो भौगोलिक स्थिति के संदर्भ में स्पष्ट इमेजरी, जीपीएस, सैटेलाइट फ़ोटोग्राफ़ी के साथ ही डेटा भी देता है और इसका इस्तेमाल नाटो की सेना करती है।

2015 में, शिन्हुआ ने राष्ट्रीय रक्षा प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में चीफ़ इंजीनियर लियू झोंग का प्रोफ़ाइल किया, जो 'सूचना इंजीनियरिंग प्रणाली की मुख्य प्रयोगशाला' के प्रभारी थे।

शिन्हुआ ने कहा, ''प्रोफेसर झोंग को एक नई प्रौद्योगिकी को विकसित करने पर लगाया गया है जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बल पर सेना की योजना बनाने की गति को तेज़ करता है।''

युद्ध क्षेत्र में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से फ़ैसले लेने के सॉफ्टवेयर के मामले में झोंग चीन के प्रमुख विशेषज्ञों में से एक हैं।

मिसाइल : चीन एआई-संचालित मिसाइलों को विकसित कर रहा है जो लक्ष्य का पता लगा कर बिना किसी मानवीय सहायता के उस पर हमला कर सकती है।

जेएडीआई की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन ने एआई को अपनी डोंगफेंग 21डी, एक मध्यम दूरी की मिसाइल के साथ जोड़ा है। चीनी सरकार के न्यूज़पेपर पीपुल्स डेली में कहा गया है कि डीएफ़-21डी 'एक (विमान) वाहक जहाज' को डुबो सकता है और रास्ते में इसे रोक पाना भी मुश्किल है।

पीपुल्स डेली ने यह भी बताया है कि डीएफ-21डी के पुराने संस्करण डीएफ-26, 'ज़मीन पर बड़े आकार के स्थिर लक्ष्य और यहां तक कि 4,000 किलोमीटर की दूरी पर पानी पर भी लक्ष्य को निशाना बना सकता है', हालांकि रिपोर्ट में इस बात का जिक्र नहीं है कि क्या यह मिसाइल आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से चलती है।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि बैलिस्टिक मिसाइल प्रणालियों के साथ काम करने के लिए एआई-संचालित ड्रोन विकसित किए जाएंगे ताकि उनकी मारक क्षमता में सुधार हो सके।

फ़िलीपींस में वैज्ञानिकों को मिली इंसान की एक और प्रजाति, नाम है - होमो लूज़ोनेसिस

मानव प्रजाति की सूची में एक और नया नाम जुड़ गया है जिसके अवशेष फ़िलीपीन्स की एक गुफ़ा में मिले हैं।

विलुप्त हो चुकी इस नई प्रजाति के अवशेष फिलीपीन्स के सबसे बड़े द्वीप लूज़ोन में पाए गए हैं जिसके बाद इस प्रजाति का नाम होमो लूज़ोनेसिस रखा गया है।

इस प्रजाति में पाए जाने वाली कुछ-कुछ भौतिक विशेषताएं प्राचीन मानव प्रजातियों और आज की मानव प्रजाति से मिलती-जुलती हैं।

अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि प्राचीन मानव के ये सम्बन्धी अफ़्रीका से जुड़े हो सकते हैं जो बाद में दक्षिण पूर्व एशिया में आकर बस गए होंगे। इन अवशेषों की खोज से पहले ऐसा होना लगभग असंभव माना जा रहा था। इस खोज के बाद अब ये माना जा रहा है कि फ़िलिपीन्स और इस प्रांत में मानव प्रजाति का विकास बेहद पेचीदा रहा हो सकता है क्योंकि यहां पहले से ही तीन या फिर उससे अधिक मानव प्रजातियां रह रही थीं।

इनमें से एक थे नाटे कद वाले 'हॉबिट' या होमो फ्लोरेसीन्सिस  जो इंडोनेशिया के फ्लोर्स नाम के द्वीप में करीब 50 हज़ार साल तक थे।

लंदन के नैचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम के प्रोफ़ेसर क्रिस स्ट्रिंगर का कहना है, ''2004 में नाटे कद वाली मानव प्रजाति होमो फ्लोरेसीन्सिस के बारे में जानकारी प्रकाशित हुई थी। उस वक्त मैंने कहा था कि मानव प्रजाति खोजने का जो काम फ्लोर्स पर किया गया है उसे इलाके के और द्वीपों में भी क्या जाना चहिए।''

''मेरा अंदाज़ा सही था। उससे करीब 3 हज़ार किलोमीटर की दूरी पर मौजूद लूज़ोन द्वीप पर कामयाबी मिली है।''

नेचर पत्रिका के अनुसार, होमो लूज़ोनेसिस के अवशेष लूज़ोन के उत्तर में मौजूद कैलाओ गुफा में मिले हैं। बताया जा रहा है कि ये 67 हज़ार से 50 हज़ार साल पुराने हैं।

गुफा में मिलने वाले अवशेषों में मानव शरीर के तीन हिस्से मिले हैं जिनमें दांत, हाथ और पैरों की हड्डियां शामिल हैं। ये अवशेष चार लोगों के हैं जिनमें एक युवा का अवशेष है। इन्हें 2007 में गुफा की खुदाई के वक्त निकाला गया था।

होमो लूज़ोनेसिस की कुछ विशेषताएं आज के दौर की मानव प्रजाति से मिलती हैं, जबकि कई विशेषताएं जैसे कि ऑस्ट्रलोपिथेसीन की तरह सीधे खड़े होकर चलना और अफ्रीका में पाई गई बंदर से मिलती-जुलती मानव प्रजाति जैसी हैं जो करीब 20 से 40 लाख साल पहले पाए जाते थे। इनकी कुछ विशेषताएं प्राचीन होमो जाति से भी मिलती हैं।

हाथों और पैरों की उंगलियां भीतर की तरफ मुड़ी हुई हैं जो इस बात की ओर इशारा करती हैं कि ये लोग पेड़ों पर चढ़ते होंगे।

अगर इस बात के पुख़्ता सबूत मिलें कि ऑस्ट्रलोपिथेसीन जैसी प्रजातियां दक्षिण पूर्व एशिया तक पहुंच पाई थीं तो इससे इस बात का अंदाज़ा लग सकता है कि मानव इतिहास के कौन से वंशज अफ्रीका से सबसे पहले बाहर निकले थे।

माना जाता है कि होमो इरेक्टस वो पहली प्रजाति थी जो 19 लाख साल पहले अफ्रीका छोड़ कर बाहर आए थे।

लूज़ोन द्वीप चारों ओर से पानी से घिरा है और इस कारण नई खोज ने इस पर सवाल खड़े कर दिए हैं कि आख़िर वो इस द्वीप पर कैसे पहुंचे होंगे।

होमो लूज़ोनेसिस के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया में डेनिसोवन्स नाम की एक मानव प्रजाति भी पाई जाती थी।  माना जाता है कि इस इलाके में आने के बाद ये प्रजाति होमो सेपियन्स से घुल-मिल गई थी।

यह डीएनए विश्लेषण के आधार माना जाता है, क्योंकि इस इलाके में डेनिसोवन्स के कोई जीवाश्म नहीं पाए गए हैं।

इंडोनिशिया का फ्लोर्स द्वीप होमो फ्लोरेसीन्सिस का घर माना जाता है जिन्हें उनके नाटे कद के कारण हॉबिट्स भी कहा जाता है।

माना जाता है कि वो करीब एक लाख साल पहले धरती पर रहते थे और 50 हज़ार साल पहले ख़त्म हो गए थे। और उनके जाने के साथ ही आधुनिक मानव के धरती पर आने का वक्त शुरु हुआ था।

वैज्ञानिकों का मानना है कि होमो फ्लोरेसीन्सिस में पाई जाने वाली कुछ विशेषताएं ऑस्ट्रलोपिथेसीन में भी देखी गई थीं। लेकिन कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि होमो फ्लोरेसीन्सिस,  होमो इरेक्टस की वंशावली में आते हैं।

अब गंजेपन की समस्या दूर हो जाएगी, सिर पर फिर से बाल उगाए जा सकते हैं

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वे गंजेपन का इलाज ढूंढने के काफी करीब हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि उन्होंने ऐसा तरीका खोज निकाला है जिससे गंजेपन की समस्या को दूर कर फिर से सिर पर बाल उगाए जा सकते हैं।

न्यूयॉर्क स्कूल ऑफ मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के भीतर एक मार्ग सक्रिय कर दिया है जिसका नाम 'सोनिक हेजहॉग' है। शिशु जब गर्भ में होता है तो यह मार्ग काफी ज्यादा सक्रिय रहता है जिससे बालों के रोम तैयार होते हैं। मगर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है या त्वचा में जख्म बढ़ते हैं तो यह रास्ता अवरुद्ध हो जाता है।

आंकड़े बताते हैं कि एक चौथाई पुरुषों के बाल 25 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उड़ने लगते हैं। ब्रिटेन के राजकुमार विलियम्स के बाल तो 22 की उम्र में ही उड़ने लगे थे। ऐसा नहीं है कि यह समस्या पुरुषों में ही है।

अमेरिकन एकडेमी ऑफ डार्मेटोलॉजी के मुताबिक, 40 फीसदी महिलाओं में 40 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बाल झड़ने की समस्या देखने को मिलने लगती है। डॉक्टर मायूमी इटो के नेतृत्व वाली टीम ने जो मार्ग सक्रिय किया है, वह कोशिकाओं के बीच संचार तंत्र का भी काम करता है।

वैज्ञानिकों ने लैब में चूहों की क्षतिग्रस्त त्वचा पर यह अध्ययन किया, जिसमें मुख्य फोकस 'फाइब्रोब्लास्ट' नाम की कोशिकाओं पर था। इस कोशिका से कालाजेन नाम के प्रोटीन का स्राव होता है। यह प्रोटीन त्चचा व बालों की मजबूती और आकार को बनाए रखता है। शोधकर्ताओं ने इस वजह से भी 'फाइब्रोब्लास्ट' पर फोकस किया क्योंकि इसमें जख्म को अपने-आप ठीक करने जैसे कई जैविक गुण भी होते हैं।

'नेचर कम्युनिकेशन' में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, मस्तिष्क की कोशिकाओं में आपस में संचार स्थापित करने के चार हफ्तों के भीतर ही चूहों के बाल फिर से उगने शुरू हो गए। बालों की जड़ और सरंचनाएं नौ हफ्तों के भीतर फिर से दिखाई देने लगीं। अभी तक वैज्ञानिक यही मानते थे कि क्षतिग्रस्त त्वचा की वजह से बाल फिर से नहीं उग पाते हैं। मगर अब इस सबूत ने इस क्षेत्र में नई दिशा दिखा दी है।

डॉक्टर इटो का कहना है, ''अब हमें पता है कि भ्रूण में यह मार्ग काफी सक्रिय होता है, जबकि उम्र बढ़ने के साथ यह प्रक्रिया धीमी होने लगती है। हमारा शोध बताता है कि सोनिक हेजहॉग के जरिए 'फाइब्रोब्लास्ट' को सही किया जा सकता है। इससे बाल दोबारा उगाए जा सकते हैं।''

जिंदगी में आने वाले कई बदलावों की वजह से आपके बाल गिरते हैं। घर बदलना, शोक या गर्भधारण के दौरान भी बाल कमजोर होने लगते हैं। इसके अलावा तनाव, खराब खानपान, पानी में घुले केमिकल, खाने में मौजूद कीटनाशक, गर्भ निरोधक गोलियां भी बाल गिरने के बड़े कारण होते हैं।

टीवी चैनल पर दिखने वाला एंकर असली है या नकली, पता करना मुश्किल होगा

चीन में यह पता लगाना मुश्किल होगा कि समाचार टीवी चैनल पर दिखाई देने वाला व्यक्ति असली है या फिर मशीन है। दरअसल चीन की सरकारी समाचार एजेंसी 'शिन्हुआ' में अब आभासी एंकर खबर पढ़ते नजर आएंगे। कंपनी ने दर्शकों के सामने गुरुवार को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एक आभासी समाचार वाचक पेश किया।

रोचक बात यह है कि इसे देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि यह वास्तविक इंसान नहीं है। यह एंकर ठीक पेशेवर न्यूज एंकर की तरह खबरें पढ़ सकता है। माना जा रहा है कि हमारी जिंदगी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मौजूदगी का यह नया अध्याय है। अंग्रेजी बोलने वाला यह न्यूज रीडर अपनी पहली रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बोलता है, 'हैलो, आप देख रहे हैं इंग्लिश न्यूज कार्यक्रम।'

सोगो ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
शिन्हुआ के लिए इस तकनीक को विकसित करने के लिए चीनी सर्च इंजन 'सोगो' ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आभासी समाचार वाचक अपने पहले वीडियो में कहता है, ''मैं आपको सूचनाएं देने के लिए लगातार काम करूंगा क्योंकि मेरे सामने लगातार शब्द टाइप होते रहेंगे। मैं आपके सामने सूचनाओं को एक नए ढंग से प्रस्तुत करने वाला अनुभव लेकर आऊंगा।''

3डी मॉडल पर आधारित
विशेषज्ञों ने असली इंसान के 3डी मॉडल का इस्तेमाल करते हुए आभासी एंकर तैयार किया और इसके बाद एआई तकनीक के माध्यम से आवाज और हावभाव को तैयार किया गया। दिखने में यह हूबहू इंसानों जैसा लगे, इसके लिए काफी मेहनत की गई है। कपड़ों से लेकर होंठों के हिलने जैसी छोटी-छोटी बातों पर भी काफी ध्यान दिया गया है।

24 घंटे काम करने में सक्षम
यह आभासी एंकर बिना थके 24 घंटे काम करने में समक्ष है। इसे तैयार करने के पीछे कंपनी की मंशा भी समाचार वाचकों को कम कर पैसा बचाना है। जिस ढंग से यह एंकर समाचार पढ़ता है, उसे देखकर इसे समाचार वाचकों की नौकरी पर खतरा माना जा सकता है।

अफवाह वाले संदेशों के स्रोत की जानकारी देने से व्हॉट्सएप का इंकार

सोशल नेटवर्किंग एप व्हॉट्सएप ने अपने प्लेटफॉर्म पर संदेश के मूल स्रोत का पता लगाने और इसकी जानकारी भारत को देने से इनकार कर दिया है। भारत सरकार ने व्हाट्सएप पर अफवाह फैलने से हिंसा की बढ़ती घटनाओं के बाद कंपनी से ऐसा तंत्र विकसित करने को कहा था, जिससे संदेश के मूल स्रोत का पता लगाया जा सके।

व्हाट्सएप के प्रवक्ता ने कहा कि ऐसा सॉफ्टवेयर बनाने से एक किनारे से दूसरे किनारे तक कूटभाषा प्रभावित होगी और व्हॉट्सएप की निजी प्रकृति पर भी असर पड़ेगा। साथ ही इसके दुरुपयोग की और ज्यादा संभावना पैदा होगी और हम निजता के संरक्षण को कमजोर करना नहीं चाहते हैं। लिहाजा कंपनी ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित नहीं कर सकती है। हमारा ध्यान भारत में दूसरों के साथ मिलकर काम करने और लोगों को गलत सूचना के बारे में शिक्षित करने पर है। इसके जरिये हम लोगों को सुरक्षित रखना चाहते हैं।

व्हाट्सएप के प्रमुख क्रिस डेनियल्स इसी सप्ताह भारत के सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद से मिले थे, जिसमें अफवाह वाले संदेशों को रोकने पर बातचीत हुई थी।

दुनियाभर में व्हाट्सएप के प्रयोगकर्ताओं की संख्या करीब डेढ़ अरब है। भारत कंपनी के लिए सबसे बड़ा बाजार है। भारत में इसका इस्तेमाल करने वालों की संख्या 20 करोड़ से अधिक है।

व्हाट्सएप की ओर से कहा गया कि संदेशों के मूल स्रोत का खुलासा होने से उपयोक्ताओं की निजता भंग हो जाएगी। लोग व्हॉट्सएप के जरिये सभी प्रकार की संवेदनशील सूचनाओं का आदान-प्रदान करने के लिए निर्भर हैं। चाहे वह उनके चिकित्सक हों, बैंक या परिवार के सदस्य हों। ऐसे में अगर इनके स्रोतों का खुलासा होगा तो निजी जानकारी लीक हो सकती है।

भारत सरकार की मंशा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मसलन फेसबुक, ट्विटर और व्हॉट्सएप से फर्जी खबरों के प्रसार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की है। पिछले कुछ माह में व्हाट्सएप के मंच से कई फर्जी सूचनाओं का प्रसार हुआ जिससे भारत में भीड़ की हिंसा के मामले बढ़ गए।

वायु प्रदूषण की वजह से डेढ़ साल कम हो रही है भारतीयों की उम्र

वायु प्रदूषण से एक आम भारतीय की उम्र डेढ़ साल तक कम हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हवा की बेहतर गुणवत्ता से दुनियाभर में मनुष्य की उम्र बढ़ सकती है।

यह पहली बार है जब वायु प्रदूषण और जीवन अवधि पर डाटा का एक साथ अध्ययन किया गया है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इसमें वैश्विक अंतर कैसे समग्र जीवन प्रत्याशा पर असर डालता है।

अमेरिका के ऑस्टिन में टेक्सास विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने वायुमंडल में पाए जाने वाले 2.5 माइक्रोन से छोटे कण (पी एम) से वायु प्रदूषण का अध्ययन किया। ये सूक्ष्म कण फेफड़ों में प्रवेश कर सकते हैं और इससे दिल का दौरा पड़ने, स्ट्रोक्स, सांस संबंधी बीमारियां और कैंसर होने का खतरा होता है। पी एम 2.5 प्रदूषण बिजली संयंत्रों, कारों, ट्रकों, आग, खेती और औद्योगिक उत्सर्जन से होता है।

वैज्ञानिकों ने पाया कि वायु प्रदूषण से बांग्लादेश में 1.87 वर्ष, मिस्र में 1.85, पाकिस्तान में 1.56, सऊदी अरब में 1.48, नाइजीरिया में 1.28 और चीन में 1.25 वर्ष तक लोगों की उम्र कम होती है। अध्ययन के अनुसार, वायु प्रदूषण से भारत में व्यक्ति की औसत आयु 1.53 वर्ष तक कम होती है।

चंद्रयान-1 से मिली जानकारी ने चंद्रमा पर बर्फ की मौजूदगी की पुष्टि की : नासा

नासा ने आज कहा कि वैज्ञानिकों ने चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों के अंधेरे और ठंडे हिस्सों में जमा हुआ पानी मिलने का दावा किया है। यह दावा चंद्रयान-1 से प्राप्त जानकारी के आधार पर किया गया है। चंद्रयान-1 का प्रक्षेपण भारत ने 10 वर्ष पहले किया था।

समाचार एजेंसी भाषा के अनुसार, सतह पर कुछ मिलीमीटर तक बर्फ मिलने से यह संभावना बनती है कि उस पानी का इस्तेमाल भविष्य की चंद्र यात्राओं में संसाधन के रूप में किया जा सकता है।

जर्नल पीएनएएस में प्रकाशित शोध के मुताबिक, यह बर्फ कुछ-कुछ दूरी पर है और संभवत: बहुत पुरानी है।

सी-बबल : पानी में चलने वाली दुनिया की पहली कार लॉन्च

पानी में चलने वाली कार का अविष्कार पेरिस ने किया है। यह दुनिया की पहली वाटर कार है जिसे पेरिस ने लॉन्च किया है। अभी हाल ही में इसका टेस्ट वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया गया है।

लॉन्चिंग से पहले इसका टेस्ट ड्राइव लिया गया जिसमें यह अपने मानकों पर खरी उतरी है। कार पानी की सतह से थोड़ा ऊपर उड़ते हुए चलती है। यह संभव हो पाया कार में लगे सी-बबल के जरिए। और सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस टैक्सी का नाम सी-बबल रखा गया है।

कोलेस्ट्रॉल कम होने से कैंसर होने का खतरा बढ़ सकता है

कोलेस्ट्रॉल का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में दिल की बीमारी का ख्याल आ जाता है। शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने से दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन यह हमेशा हमारी सेहत के लिए नुकसानदेह नहीं होता। कोलेस्ट्रॉल हमारे शरीर की अनेक प्रक्रियाओं के संचालन के लिए बेहद जरूरी होता है। पोषक तत्वों के शरीर में अवशोषण से लेकर तमाम हार्मोन्स के प्रोडक्शन तक में कोलेस्ट्रॉल बेहद जरूरी है।

दरअसल कोलेस्ट्रॉल दो तरह के होते हैं - बैड कोलेस्ट्रॉल और गुड कोलेस्ट्रॉल। शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना हमारी सेहत के लिए नुकसानदेह होता है। सामान्यतः कोलेस्ट्रॉल लेवल कम होना ज्यादा बेहतर माना जाता है। नियमित एक्सरसाइज और खान-पान की बदौलत कोलेस्ट्रॉल कम किया जा सकता है। लेकिन जब शरीर में कोलेस्ट्रॉल के लेवल में ज्यादा कमी आती है तो यह कई तरह के स्वास्थ्य समस्याओं के खतरे बढ़ाती है।

कई तरह के कैंसर से लड़ने में बैड कोलेस्ट्रॉल अहम भूमिका निभाता है। ऐसे में जब हमारे शरीर में इसकी ज्यादा कमी होती है तो कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा लो कोलेस्ट्रॉल आपको कैंसर से प्रभावी तरीके से लड़ने से रोकता है।

तमाम शोधों में यह बताया गया है कि कोलेस्ट्रॉल का कम स्तर गुस्सा बढ़ाने में मददगार होता है। इसके अलावा यह लोगों में हिंसक प्रवृत्ति को भी बढ़ावा दे सकता है।

कोलेस्ट्रॉल याद्दाश्त के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में कोलेस्ट्रॉल लेवल में कमी याद्दाश्त को कमजोर करने का काम करती है। कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं दिमाग की क्षमता को कम करने के लिए जानी जाती हैं।

2011 में हुए एक अध्ययन में बताया गया है कि कोलेस्ट्रॉल का कम स्तर जल्दी मरने का खतरा बढ़ा देता है।

कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं हमारे संक्रमण से लड़ने की क्षमता को प्रभावित करती हैं। एक शोध में यह बताया गया है कि कोलेस्ट्रॉल टीबी के मरीजों के लिए मददगार हो सकता है।

दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में गिरा चीन का अनियंत्रित स्पेस स्टेशन

चीन का बेकाबू हो चुका स्पेस स्टेशन तियांगोंग-1 सोमवार को दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में धरती के वायुमंडल में पहुंचते ही नष्ट हो गया। चीनी स्पेस अथॉरिटी ने इसकी पुष्टि की।

वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, यह यान सुबह 8 बजकर 15 मिनट पर धरती के वायुमंडल में आया और इसका अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट हो गया।

हालांकि, इसके कुछ हिस्से अब धरती पर गिरेंगे, लेकिन पेइचिंग के मुताबिक, कोई भी हिस्सा ज्यादा बड़ा नहीं होगा।

चीन ने 10.4 मीटर लंबा यह स्पेसक्राफ्ट साल 2011 में लॉन्च किया था। चीन की स्पेस एजेंसी चाइना नेशनल स्पेस ऐडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक तियांगोंग-1 से मार्च 2016 से संपर्क टूट चुका था। जिसके बाद से यह अंतरिक्ष में घूम रहा था।

बता दें कि साढ़े आठ टन वजन वाला यह स्पेस स्टेशन साल 2016 में ही अपना नियंत्रण खो चुका था और तब से ही यह धरती की तरफ गिर रहा है। वैज्ञानिकों ने पहले ही अनुमान लगाया था कि इस स्पेसक्राफ्ट का अधिकतर हिस्सा गिरते समय जलकर खाक हो जाएगा, लेकिन 10 से 40 प्रतिशत हिस्सा मलबे के रूप में बचा रह सकता है और इसमें खतरनाक केमिकल्स हो सकते हैं।