भारत

शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन पर आपत्ति जताने वाले फ़ैसले क़ानून की नज़र में ठीक नहीं थे: इलाहाबाद हाई कोर्ट

भारत में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि देश के नागरिकों को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का संवैधानिक अधिकार है चाहे वो किसी भी जाति, धर्म या पंथ से हो।

इंग्लिश डेली न्यूज़ पेपर हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन पर आपत्ति जताने वाले पिछले दो फ़ैसले क़ानून की नज़र में ठीक नहीं थे।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस पंकज नक़वी और विवेक अग्रवाल की दो जजों की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के कुशीनगर ज़िले के रहने वाले सलामत अंसारी और उनकी पत्नी प्रियंका खरवार उर्फ़ आलिया की याचिका पर सुनवाई के दौरान ये कहा।

प्रियंका ने अपना धर्म परिवर्तन किया था और उनके पिता ने पुलिस में इस बाबत शिकायत की थी। पुलिस की कार्रवाई को निरस्त करने के लिए पति-पत्नी दोनों ने अदालत की शरण ली।

हिंदुस्तान टाइम्स लिखता है कि यह फ़ैसला अदालत ने 11 नवंबर 2020 को ही दे दिया था लेकिन इसे सार्वजनिक 23 नवंबर 2020 को किया गया है।

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार अब जबकि उत्तर प्रदेश सरकार शादी के लिए धर्म परिवर्तन से जुड़ा एक क़ानून बनाने की योजना पर काम कर रही थी तो हाई कोर्ट का यह फ़ैसला उसके लिए समस्या पैदा कर सकता है।

हामिद अंसारी का 'धार्मिक कट्टरता' और 'आक्रामक राष्ट्रवाद' को महामारी कहने पर हंगामा

भारत के पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी के कुछ बयानों से दक्षिणपंथी रुझान रखने वाले वर्ग में थोड़ी नाराज़गी है।

दरअसल, एक वर्चुअल कार्यक्रम में 20 नवंबर 2020 को हामिद अंसारी ने कहा था कि 'कोरोना महामारी संकट' से पहले ही भारतीय समाज दो अन्य महामारियों- 'धार्मिक कट्टरता' और 'आक्रामक राष्ट्रवाद' का शिकार हो चुका था।

इसी में जोड़ते हुए अंसारी ने यह भी कहा था कि इन दोनों के मुक़ाबले 'देश प्रेम' ज़्यादा सकारात्मक अवधारणा है क्योंकि यह सैन्य और सांस्कृतिक रूप से रक्षात्मक है।

लेकिन उनका यह बयान एक ख़ास वर्ग को ख़राब लगा है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है। लोग लिख रहे हैं कि भारत के कुछ सबसे बड़े पदों पर रह चुके हामिद अंसारी की राष्ट्रवाद के बारे में यह सोच अशोभनीय है।

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश स्तर के प्रवक्ता गौरव गोयल ने ट्विटर पर लिखा है, ''कांग्रेस की हक़ीक़त एक बार फिर सामने आयी। ये वो शख़्स हैं जिन्हें पक्षपातपूर्ण रुख़ रखने वाली कांग्रेस पार्टी ने इस देश का उप-राष्ट्रपति बनाया था।''

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता देवेंद्र फडणवीस ने अंसारी के बयान पर कहा कि हिन्दुत्व कभी भी कट्टरपंथी नहीं रहा। हिन्दुत्व हमेशा सहिष्णु रहा है। हिन्दुत्व इस देश की एक प्राचीन जीवनशैली है। हिन्दुओं ने कभी किसी पर या किसी देश पर हमला नहीं किया।

हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने अंसारी के बयान को सही ठहराया है। कांग्रेस के नेता तारिक़ अनवर ने कहा कि बीजेपी को अंसारी के बयानों से ख़ास दिक़्क़त इसलिए है क्योंकि वो सीधे तौर पर बीजेपी और संघ परिवार के एजेंडे को निशाना बनाता है।

पूर्व उप-राष्ट्रपति अंसारी ने यह बातें कांग्रेस नेता शशि थरूर की नई क़िताब 'द बैटल ऑफ़ बिलॉन्गिंग' के डिजिटल विमोचन के मौक़े पर कही थीं।

क़िताब विमोचन के मौक़े पर उन्होंने भारत के मौजूदा हालात को लेकर चिंता ज़ाहिर की। साथ ही उन्होंने कहा था कि 'आज देश ऐसी विचारधाराओं से ख़तरे में दिख रहा है जो देश को 'हम और वो' की काल्पनिक श्रेणी के आधार पर बाँटने की कोशिश करती हैं'।

अंसारी ने कहा कि ''राष्ट्रवाद के ख़तरों के बारे में बहुत बार लिखा गया है।  इसे कुछ मौक़ों पर 'वैचारिक ज़हर' तक कहा गया है जिसमें व्यक्तिगत अधिकारों को हस्तांतरित करने और स्थानांतरित करने में कोई संकोच नहीं किया जाता।''

हामिद अंसारी ने कार्यक्रम में यह भी कहा था कि ''चार सालों के कम समय में भी भारत ने एक 'उदार राष्ट्रवाद' के बुनियादी नज़रिए से 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की एक ऐसी नई राजनीतिक परिकल्पना तक का सफ़र तय कर लिया जो सार्वजनिक क्षेत्र में मज़बूती से घर कर गई है।''

किताब विमोचन के मौक़े पर हुई चर्चा में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने भी हिस्सा लिया।

उन्होंने भी इस मौक़े पर कहा कि 1947 में हमारे पास मौक़ा था कि हम पाकिस्तान के साथ चले जाते, लेकिन मेरे पिता और अन्य लोगों ने यही सोचा था कि दो राष्ट्र का सिद्धांत हमारे लिए ठीक नहीं है।

फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने कहा कि मौजूदा सरकार देश को जिस तरह से देखना चाहती है उसे वो कभी स्वीकार करने वाले नहीं हैं। 

ई-फ़ार्मेसी प्लेटफ़ॉर्म से खतरा: क्या ई-फ़ार्मेसी कंपनियां रिटेलर्स और फ़ार्मासिस्ट के रोजगार छीन रहे हैं?

भारत में रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने हाल ही में चेन्नई आधारित ऑनलाइन फ़ार्मेसी कंपनी नेटमेड्स में 620 करोड़ रुपये का निवेश किया है।

रिलायंस रिटेल वेंचर्स ने विटालिक हेल्थ और इसकी सहयोगियों में ये निवेश किया है। इस समूह की कंपनियों को नेटमेड्स के तौर पर जाना जाता है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के ऑनलाइन फ़ार्मा कंपनी में इतने बड़े निवेश के साथ ही भारत में ऑनलाइन फ़ार्मेसी या ई-फ़ार्मेसी में ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा शुरू होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इसमें अमेज़न पहले ही प्रवेश कर चुका है। बेंगलुरु में इसकी फ़ार्मा सर्विस का पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो चुका है। वहीं, फ्लिपकार्ट भी इस क्षेत्र में आने की तैयारी में है।

नेटमेड्स एक ई-फ़ार्मा पोर्टल है जिस पर प्रिस्क्रिप्शन आधारित दवाओं और अन्य स्वास्थ्य उत्पादों की बिक्री की जाती है। ये कंपनी दवाओं की घर पर डिलवरी कराती है।

इसी तरह ई-फ़ार्मेसी के क्षेत्र में पहले से ही कई स्टार्टअप्स मौजूद हैं। जैसे 1mg, PharamaEasy, Medlife आदि।

इन बड़े प्लेयर्स के आने से पहले से विवादों में रहे ई-फ़ार्मेसी प्लेटफॉर्म को लेकर अब फिर से बहस छिड़ गई है।

रिटेलर्स और फ़ार्मासिस्ट का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं ने इससे लाखों लोगों का रोज़गार छिनने को लेकर चिंता जताई है। लेकिन, ई-फ़ार्मा कंपनियां इससे इनकार करती हैं।

मुकेश अंबानी को लिखा पत्र

ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन (एआईओसीडी) ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी को पत्र लिखकर उनके नेटमेड्स में निवेश को लेकर आपत्ति जताई है।

इस पत्र में लिखा है, ''रिलायंस इंडस्ट्री के स्तर की कंपनी को एक अवैध उद्योग में निवेश करते देखना बेहद दुखद है।'' पत्र कहता है कि ई-फ़ार्मेसी उद्योग औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम (ड्रग्स एंड कॉस्मैटिक्स एक्ट) के तहत नहीं आता, जो दवाइयों के आयात, निर्माण, बिक्री और वितरण को विनियमित करता है।

एआईओसीडी ने ऐसा ही एक पत्र अमेज़न को लिखा है। ये पत्र भारत के पीएम नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और अन्य मंत्रालयों को भी भेजा गया है।

वर्किंग मॉडल से नौकरियों पर ख़तरा

बड़ी-बड़ी कंपनियों के ई-फ़ार्मेसी उद्योग में क़दम रखने के साथ ही रिटेलर्स और फ़ार्मासिस्ट की चिंताएं बढ़ गई हैं। उनका प्रतिनिधित्व करने वाले संस्थान ई-फ़ार्मेसी को लेकर दो तरह से आपत्ति जता रहे हैं।

पहला, उनका मानना है कि ई-फ़ार्मेसी प्लेटफ़ॉर्म्स के वर्किंग मॉडल से लाखों रिटेलर्स और फ़ार्मासिस्ट की नौकरियां जा सकती हैं। उनका कारोबार बंद पड़ सकता है।

दूसरा, वो ई-फ़ार्मा कंपनियों के संचालन के क़ानूनी पक्ष को लेकर सवाल उठाते हैं।

इंडियन फ़ार्मासिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अभय कुमार कहते हैं कि ई-फ़ार्मा प्लेटफ़ॉर्म का जो वर्किंग मॉडल है वो फ़ार्मासिस्ट की नौकरियों को धीरे-धीरे ख़त्म कर देगा।

अभय कुमार कहते हैं, ''ई-फ़ार्मा प्लेटफॉर्म्स अपने स्टोर, वेयरहाउस या इनवेंट्री बनाएंगे, जहां वो सीधे कंपनियों या वितरक से दवाएं लेकर स्टोर करेंगे और फिर ख़ुद वहां से दवाइयां सप्लाई करेंगे। ऐसे में जो स्थानीय केमिस्ट की दुकान है उसकी भूमिका ख़त्म हो जाएगी।''

''फ़ार्मासिस्ट की नौकरियों पर तो पहले ही संकट है। अस्पतालों में फ़ार्मासिस्ट के जो ख़ाली पद हैं वो भरे नहीं जाते। तीन साल की पढ़ाई के बाद युवा ख़ुद को बेरोज़गार पाते हैं। ऐसे में केमिस्ट के तौर पर जो उनके पास कमाई का ज़रिया है क्या आप उसे भी छीन लेना चाहते हैं?"

ई-फ़ार्मा कंपनियों का बहुत ज़्यादा डिस्काउंट देना भी रिटेलर्स के लिए चिंता का कारण बना हुआ है। एआईओसीडी के अध्यक्ष जे.एस. शिंदे कहते हैं कि ई-फ़ार्मा कंपनियां जिस तरह ज़्यादा डिस्काउंट देती हैं एक छोटा रिटेलर उनसे मुक़ाबला नहीं कर पाएगा।

जे.एस. शिंदे ने बताया, ''रिटेलर को 20 प्रतिशत और होलसेलर को 10 प्रतिशत मार्जिन मिलता है। लेकिन, ई-फ़ार्मेसी में आए नए प्लेयर्स 30 से 35 प्रतिशत तक डिस्काउंट दे रहे हैं। ये डीप डिस्काउंट दे सकते हैं, कुछ नुक़सान भी उठा सकते हैं लेकिन, सामान्य रिटेलर के पास इतनी पूंजी नहीं है। इससे ग्राहकों को भी समस्या होगी क्योंकि जब रिटेलर्स बाज़ार से हट जाएंगे तो इनका एकाधिकार हो जाएगा और क़ीमतों पर नियंत्रण मुश्किल होगा।''  

वह बताते हैं कि पूरे देश में क़रीब साढ़े आठ लाख रिटेलर्स हैं और डेढ़ लाख स्टॉकिस्ट और सबस्टॉकिस्ट हैं, जिनकी रोज़ी-रोटी छीनने वाली है।  इसमें काम करने वाले लोग और उनका परिवार मिलाकर क़रीब 1.9 करोड़ लोग बेसहारा हो जाएंगे। कोरोना वायरस के चलते मंदी की मार झेल रहे लोगों पर ये दोहरी मार होगी।

क्या कहती हैं ई-फ़ार्मा कंपनियां

लेकिन, ई-फ़ार्मा कंपनियां इन सभी आरोपों से पूरी तरह इनकार करती हैं।  उनका कहना है कि उनके वर्किंग मॉडल को लेकर लोगों में भ्रांतियां हैं। उनका काम करने का तरीक़ा नौकरियां लेने की बजाय ग्राहकों के लिए सुविधा बढ़ाएगा, दवाइयों तक पहुंच आसान बनाएगा और फ़ार्मासिस्ट के लिए मांग बढ़ाएगा।

दवाओं की ऑनलाइन सेलिंग में दो तरह के बिज़नस मॉडस काम करते हैं।  एक मार्केटप्लेस और दूसरा इनवेंट्री लेड हाइब्रिड (ऑनलाइन/ऑफलाइन) मॉडल।

मार्केटप्लेस मॉडल में ई-फ़ार्मेसी प्लेटफॉर्म ग्राहक से ऑनलाइन प्रेसक्रिप्शन लेते हैं। ये प्रेसक्रिप्शन सीधे वेबसाइट या ऐप पर अपलोड करके, व्हाट्सऐपस, ई-मेल या फैक्स के ज़रिए दे सकते हैं। फिर उस प्रेसक्रिप्शन को स्थानीय लाइसेंस प्राप्त फ़ार्मासिस्ट (केमिस्ट) के पास पहुंचाया जाता है, वहां से दवाई लेकर ग्राहक को डिलीवरी की जाती है।

वहीं, इनवेंट्री मॉडल में ई-फ़ार्मेसी प्लटेफॉर्म चलाने वाली कंपनी ख़ुद दवाइयों का स्टॉक रखती हैं और प्रेसक्रिप्शन के आधार पर दवाएं डिलिवर करती हैं। वो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ही एक तरह से केमिस्ट का काम करता है।

कुछ कंपनियां हाइब्रिड मॉडल पर काम कर रही हैं। वो दवाओं के वेयरहाउस या स्टोर भी रखती हैं और स्थानीय केमिस्ट से संपर्क के ज़रिए भी दवाएं पहुंचाती हैं। उनके पास दवाओं का वेयरहाउस या स्टोर बनाने का लाइसेंस होता है।

अब रिटेलर्स और फ़ार्मासिस्ट की चिंताएं इनवेंट्री या हाइब्रिड मॉडल को लेकर है क्योंकि इसमें केमिस्ट की दुकानों की भूमिका ख़त्म हो जाएगी।

लेकिन, प्रमुख ई-फ़ार्मेसी कंपनियों के एसोसिएशन डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म का कहना है कि ई-फ़ार्मा प्लेटफॉर्म पूरी तरह मार्केटप्लेस मॉडल पर काम करेंगे।

डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म के संयोजक डॉक्टर वरुण गुप्ता ने बताया, ''ई-फार्मेसी मॉडल को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं। ई-फार्मेसी मार्केटप्लेस मॉडल मौजूदा फार्मेसी को ऑनलाइन सेवाएं देने में मदद करेगा। यह अलग-अलग फार्मेसी को एक प्लेटफॉर्म पर जोड़कर एक नेटवर्क तैयार करेगा। इससे, इंवेंट्री प्रबंधन बेहतर होगा, पहुंच बढ़ेगी, क़ीमतें कम होंगी और ग्राहकों को बेहतर सेवाएं मिलेंगी।''

डॉक्टर वरुण कहते हैं कि कोविड-19 महामारी ने दिखाया है कि कैसे दवाओं की बिक्री में दोनों माध्यम एक साथ काम कर सकते हैं। किसी भी शुरुआत को लेकर लोगों में असुरक्षा और चिंता होती है। नई तकनीक आने पर ऐसा ही विरोध पहले भी देखने को मिला है।

ऑनलाइन फ़ार्मेसी उद्योग से जुड़े एक विशेषज्ञ का ये भी कहना है कि वो बहुत ज़्यादा डिस्काउंट नहीं देते। अगर कोई लगातार इतना डिस्काउंट देगा तो वो बाज़ार में नहीं टिक पाएगा। ई-फ़ार्मेसी प्लेटफॉर्म अपना मार्जिन स्थानीय फार्मासिस्ट के साथ तय करते हैं।

अभय कुमार का कहना है कि अगर कंपनियां मार्केटप्लेस मॉडल अपनाती हैं और फ़ार्मासिस्ट के लिए अवसर पैदा करती हैं तो उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं लेकिन ऐसा होने की संभावना बहुत कम है। अब भी कुछ प्लेटफॉर्म हाइब्रिड मॉडल पर काम कर रहे हैं। इसमें उन्हें ज़्यादा फ़ायदा है। इसलिए हम इसका विरोध करते हैं।

ई-फ़ार्मेसी प्लेटफ़ॉर्म और मौजूदा क़ानून

ई-फ़ार्मा कंपनियां कई सालों से भारतीय बाज़ार में काम कर रही हैं लेकिन अभी बहुत छोटे स्तर पर हैं। कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन में ई-फ़ार्मा प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल भी बढ़ा है। ज़्यादातर क्रॉनिक दवाएं यानी लंबे समय से चली आ रही बीमारियों की दवाओं के लिए इनका उपयोग किया जाता है।

आंकड़ों की बात करें तो इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में साल 2023 तक ई-फ़ार्मेसीज के लिए दवाओं का बाज़ार 18.1 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। 2019 में ये 9.3 अरब डॉलर था।

लेकिन, ई-फ़ार्मेसी प्लेटफॉर्म की वैधता को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। यहां तक कि ये मामला कोर्ट भी पहुँच चुका है।

जे.एस. शिंदे कहते हैं, ''ई-फ़ार्मेसी फ़िलहाल औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम के तहत कवर नहीं होती है इसलिए इन्हें चलाना गैर-क़ानूनी है।  इस अधिनियम में दवाओं की ऑनलाइन बिक्री का ज़िक्र नहीं है। इसलिए इन पर निगरानी रखना और नियंत्रित करना मुश्किल है।''

वहीं, ई-फार्मा कंपनियां ये दावा करती आई हैं कि वो क़ानूनी दायरे में काम कर रहे हैं। डॉक्टर वरुण गुप्ता बताते हैं कि ई-फ़ार्मा का बिज़नस मॉडल इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 में बिचौलिए की अवधारणा के तहत आता है और लाइसेंस प्राप्त फ़ार्मासिस्ट (जो प्रेसक्रिप्शन से दवाएं देते हैं) ड्रग्स एंड कॉस्मैटिक एक्ट के तहत आते हैं। ई-फ़ार्मा कंपनियां इस मॉडल के तहत ही काम कर रही हैं।

ई-फ़ार्मेसी को लेकर बना ड्राफ़्ट

कई पक्षों के आपत्ति जताने के बाद 28 अगस्त 2018 में दवाओं की ऑनलाइन बिक्री के नियमन यानी उन्हें क़ानून के तहत लाने के लिए नियमों का एक ड्राफ़्ट तैयार किया गया था। इसके आधार पर ड्रग्स एंड कॉस्मैटिक रूल्स, 1945 में संशोधन किया जाना था। इस ड्राफ़्ट पर आम जनता/ हितधारकों से राय माँगी गई थी।

इस ड्राफ़्ट में ई-फ़ार्मा कंपनियों के रिजस्ट्रेशन, ई-फ़ार्मेसी के निरीक्षण, ई-फ़ार्मेसी के माध्यम से दवाओं के वितरण या बिक्री के लिए प्रक्रिया, ई-फ़ार्मेसी के माध्यम से दवाओं के विज्ञापन पर रोक, शिकायत निवारण तंत्र, ई-फ़ार्मेसी की निगरानी, आदि से जुड़े प्रावधान थे। लेकिन, आगे इस पर कुछ ख़ास नहीं हो पाया है।

दिसंबर 2018 में ये मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुँचा तो कोर्ट ने बिना लाइसेंस के दवाओं की ऑनलाइन बिक्री पर रोक लगाने का आदेश दिया।  इसके बाद मद्रास की सिंगल बेंच ने ड्राफ़्ट के नियम अधिसूचित होने तक दवाओं का ऑनलाइन कारोबार ना करने के निर्देश दिए। लेकिन, जनवरी 2019 में मद्रास की डिविजन बेंच ने इस निर्देश पर रोक लगा दी।

चर्चा है कि सरकार औषधि एवं सौदर्य प्रसाधन अधिनियम में संशोधन करने पर विचार कर रही है ताकि दवाओं की ऑनलाइन बिक्री को भी उसके दायरे में लाया जा सके।

लेकिन, फ़ार्मासिस्ट और रिटेलर्स एसोसिएशन इसे लेकर सभी पक्षों पर विचार करके इससे जुड़े नियम-क़ानून बनाने की माँग कर रहे हैं।

जे.एस. शिंदे कहते हैं कि जिन देशों में ई-फ़ार्मेसी उद्योग चल रहा है वहां इसके क्या प्रभाव पड़े हैं और उनसे बचने के लिए भारत में क्या किया जाए इसका अध्ययन किया जाना चाहिए। सभी पक्षों पर गौर किए बिना इसकी अनुमति ना दी जाए।

उन्होंने बताया कि हम सरकार को 21 दिनों का नोटिस देंगे कि वो हमारी चिंताएं सुने और कोई क़दम उठाए। अगर सरकार की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आती है तो सभी दवा विक्रेता हड़ताल पर जाएंगे।

भारत में कोरोना वायरस का कहर: कोरोना से हुई कुल मौतों में 70 प्रतिशत पांच राज्यों में

भारत में कोरोना वायरस से हुई कुल मौतों में से 70 प्रतिशत मौतें आंध्र प्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में हुई हैं।

वहीं, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में कोरोना वायरस के 62 प्रतिशत एक्टिव मामले हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना वायरस को लेकर की गई प्रेस कांफ्रेस में इस संबंध में जानकारी दी।

स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव राजेश भूषण ने बताया कि राजधानी दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलों और मौतों को देखते हुए दिल्ली सरकार से बात की जा रही है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार को कुछ विशेष निर्देश दिए गए हैं। अगर उनका पालन होता है तो मामले नियंत्रण में आ सकते हैं।

भारत में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को लेकर उन्होंने कहा, ''रोज़ाना पॉजिटिव मामले बढ़ रहे हैं। इसे पूरी जनसंख्या के संदर्भ में देखना चाहिए। सरकार ने पर्याप्त परीक्षण क्षमता सुनिश्चित करके, क्लीनिकल ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल के स्पष्ट दिशानिर्देश देकर और अस्पताल के बुनियादी ढांचे को बढ़ाते हुए अर्थव्यवस्था को खोलने के लिए एक श्रेणीबद्ध दृष्टिकोण अपनाया है।''

उन्होंने कहा कि दूसरे देशों से तुलना करने पर भारत में प्रति मिलियन (जनसंख्या) कोविड के मामले बहुत कम हैं। भारत में प्रति मिलियन मौतें भी बहुत कम हैं। यहां प्रति 10 लाख पर 49 मौतें हुई हैं। वहीं, कोरोना वायरस के प्रति दस लाख जनसंख्या पर 2,792 मामले हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने ये भी जानकारी दी कि पूरे भारत के 70 जिलों में दूसरा सीरो सर्वे शुरू हो चुका है। इसके नतीज़े अगले दो हफ़्तों में आ जाएंगे।

साथ ही बताया कि पिछले 24 घंटों में कोरोना वायरस के 11 लाख टेस्ट किए जा चुके हैं। पूरे देश में अब तक 4.5 करोड़ से ज़्यादा टेस्ट हो चुके हैं।

कुछ राज्यों में कोरोना के मामले में कमी भी देखने को मिली है। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक आंध्र प्रदेश में एक्टिव मामलों में 13.7 प्रतिशत की साप्ताहिक कमी हुई है। इसी तरह कर्नाटक में 16.1 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 6.8 प्रतिशत और तमिलनाडु में 23.9 प्रतिशत और उत्तर प्रेदश में 17.1 प्रतिशत की साप्ताहिक कमी आई है।

महाराष्ट्र में पिछले तीन हफ़्तों में कोरोना वायरस के मामलों में 7 प्रतिशत की कमी देखी गई है।

भारत में मंदी: भारत में युवा नौकरी जाने की सबसे बुरी मार झेल रहे हैं

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में लॉकडाउन लगने के एक महीने के बाद से क़रीब 12 करोड़ लोग अपने काम गंवा चुके हैं। अधिकतर लोग असंगठित और ग्रामीण क्षेत्र से हैं।

भारत की चालीस करोड़ नौकरियों में से अधिकांश असंगठित क्षेत्रों में ही हैं।

सीएमआईई के मुताबिक़, लॉकडाउन के दौरान अप्रैल के महीने में ऐसे सात करोड़ लोगों ने जिन्होंने अपना काम-धंधा गंवाया था, वो वापस काम पर लौट चुके हैं।

दोबारा आर्थिक गतिविधियों के शुरू होने और फ़सल की अच्छी पैदावर की वजह से ऐसा हो पाया है क्योंकि इससे ना सिर्फ़ बड़े पैमाने पर लोगों को काम मिला है बल्कि कृषि क्षेत्र में भी लोगों को अतिरिक्त काम मिला है।

राष्ट्रीय स्तर पर चलने वाली जॉब गारंटी योजना ने भी इसमें मदद की है लेकिन यह ख़ुशख़बरी यहीं तक सीमित है।

सीएमआईई के आकलन के मुताबिक़, वेतन पर काम करने वाले संगठित क्षेत्र में 1.9 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरियां लॉकडाउन के दौरान खोई हैं।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और एशियन डेवलपमेंट बैंक की एक अन्य रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया है कि 30 की उम्र के नीचे के क़रीब चालीस लाख से अधिक भारतीयों ने अपनी नौकरियाँ महामारी की वजह से गंवाई हैं। 15 से 24 साल के लोगों पर सबसे अधिक असर पड़ा है।

सीएमआईई के मैनेजिंग डायरेक्टर महेश व्यास का कहना है, ''ज़्यादातर 30 साल से कम उम्र वाले प्रभावित हुए हैं। कंपनियाँ अनुभवी लोगों को रख रही हैं और नौजवानों पर इसकी मार पड़ रही है।''

कई लोग मानते हैं कि यह भारत की धीमी होती अर्थव्यवस्था का सबसे चिंताजनक पहलू है।

महेश व्यास बताते हैं, ''ट्रेनी और प्रोबेशन पर काम करने वाले अपनी नौकरियाँ गंवा चुके हैं। कंपनियाँ कैंपस में जाकर नौकरियां नहीं दे रही हैं। किसी भी तरह की कोई नियुक्ति नहीं हो रही है। जब 2021 में काम की तलाश करने वाले युवाओं का अगला बैच ग्रेजुएट होगा तो वो बेरोज़गारों की फ़ौज में शामिल होंगे।''

नए ग्रेजुएट हुए लोगों को नौकरी नहीं देने का मतलब होगा आमदनी, शिक्षा और बचत पर विपरीत प्रभाव पड़ना।

महेश व्यास कहते हैं, ''इससे नौकरी की तलाश करने वालों, उनके परिवार, अर्थव्यवस्था सब पर असर होगा।''

सैलरी में कटौती और मांग में सुस्ती आने से घरेलू आय पर भी नकारात्मक असर होगा।

पिछले साल के सीएमआईई के सर्वे में पाया गया था कि क़रीब 35 प्रतिशत लोग मानते थे कि उनकी आय पिछले साल की तुलना में बेहतर हुई है जबकि इस साल सिर्फ़ दो फ़ीसद लोगों का ऐसा मानना है।

निम्न वर्ग से लेकर उच्च मध्यम वर्ग तक के लोगों की आमदनी में कटौती हुई है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक़, वेतनभोगी लोगों ने लॉकडाउन के चार महीनों में क़रीब चार अरब डॉलर अपने ज़रूरी बचत से निकाला ताकि वो नौकरी जाने और सैलरी में हुई कटौती की भारपाई कर सकें।

महेश व्यास कहते हैं, ''आय में आई कमी की ख़ासतौर पर मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग पर मार पड़ी है।''

नौकरी नहीं रहने की वजह से ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के हाथ से काम-धंधा छीन रहा है। लेकिन यह कोई अचानक से आयी तब्दीली नहीं है।

अर्थशास्त्री विनोज अब्राहम की ओर से 2017 में किए गए अध्ययन में यह बात साफ़ तौर पर सामने आयी थी कि 2013-14 और 2015-16 के बीच रोज़गार में आज़ादी के बाद संभवत: पहली बार इतनी भारी गिरावट आई है। यह अध्ययन श्रम ब्यूरो से इकट्ठा किए गए डेटा को आधार बनाकर किया गया था।

श्रम भागीदारी से अर्थव्यवस्था में सक्रिय कार्यबल का पता चलता है। सीएमआईई के मुताबिक़, यह श्रम भागीदारी 8 नवंबर 2016 में लागू की गई नोटबंदी के बाद 46 फ़ीसद से घटकर 35 फ़ीसद तक पहुँच गई थी। इसने भारत की अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया। वर्तमान में मौजूदा 8 फ़ीसद की बेरोज़गारी दर इस बदतर स्थिति की हक़ीक़त बयां नहीं करती है।

महेश व्यास कहते हैं, ''ऐसा तब होता है जब नौकरी की तलाश करना बेकार हो जाता है क्योंकि नौकरी रहती ही नहीं है।''

आर्थिक असुरक्षा भारत में काफ़ी बढ़ चुकी है।

शोधकर्ता मैरिएन बर्ट्रेंड, कौशिक कृष्णन और हीथर स्कॉफिल्ड ने इस पर अध्ययन किया है कि भारतीय, लॉकडाउन की चुनौतियों से कैसे निपट रहे हैं?

इन शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया है कि सिर्फ़ 66 फ़ीसद घरों के पास आर्थिक संकट का सामना करने के लिए दूसरे हफ्ते से ज़्यादा का संसाधन मौजूद है।

भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी कह चुकी हैं कि सरकार नौकरी जाने की बात से इनकार नहीं करती है।

पिछले वित्त वर्ष के मासिक औसत की तुलना में जून में नई नौकरियों की संख्या में भी 60 फ़ीसद की गिरावट आई है।

पिछले हफ़्ते निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा, ''भारत एक दैवीय घटना जैसी असामान्य स्थिति से गुज़र रहा है ... इस दौरान हम अर्थव्यवस्था में संकुचन देख सकते हैं।''

भारत में कोरोना संक्रमण के मामले 38 लाख के क़रीब होने जा रहे हैं और अर्थव्यवस्था ठप पड़ी हुई है। अर्थव्यवस्था में पूरी तरह से सुधार की गुंजाइश अभी दूर की कौड़ी नज़र आ रही है। असंगठित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ रही है।

लॉकडाउन के दौरान जिन लोगों के काम छूट गए थे और जो अपने गांव लौट चुके थे, वो अब लॉकडाउन की पाबंदियाँ हटने के साथ ही अपने काम की जगहों पर लौटना शुरू कर चुके हैं।

इनमें से कुछ को ज़्यादा पैसे भी दिए जा रहे हैं क्योंकि उनको काम पर रखने वाले जल्दी से जल्दी अपना व्यवसाय फिर से शुरू करना चाहते हैं।

लेबर इकोनॉमिस्ट के आर श्याम सुंदर का कहना है, ''इस साल के अंत तक अर्थव्यवस्था खुलने के साथ ही बहुत सारे लोग अपने काम पर लौट आएंगे लेकिन वेतन पर काम करने वाले लोगों को समय लगेगा।''

भारत में अगस्त में भी सर्विस सेक्टर में सुधार नहीं, जा रही हैं नौकरियां

कोरोना महामारी के चलते कारोबारी गतिविधियों में रुकावट आने और मांग कम होने के चलते भारत के सेवा क्षेत्र (सर्विस सेक्टर) में लगातार छठे महीने गिरावट देखने को मिली है।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एक इंडस्ट्री सर्वे के हवाले से रिपोर्ट दी है कि कारोबारी गतिविधियां प्रभावित होने से अगस्त में भी नौकरियां जाने का सिलसिला जारी है।

सर्वे कहता है कि अर्थव्यवस्था के अप्रैल से लेकर जून दूसरी तिमाही में सिकुड़ने के बाद सर्विस सेक्टर में सुधार में लंबा समय लगेगा।

आईएचएस मार्किट में अर्थशास्त्री श्रेया पटेल ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स को बताया, ''भारत के सर्विस सेक्टर में अगस्त में भी कारोबार संचालन की स्थितियां चुनौतिपूर्ण बनी हुई हैं। घरेलू और विदेशी बाज़ारों में लॉकडाउन के प्रतिबंधों का उद्योग पर बहुत बुरा असर पड़ा है।''

अर्थव्यवस्था को और नुक़सान से बचाने के लिए सरकार ने कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के बीच भी अंडरग्राउंड ट्रेन नेटवर्क्स खोलने, खेल से जुड़े और धार्मिक आयोजनों की सीमित अनुमति दी है।

हालांकि, माना जा रहा है कि प्रतिबंधों में ढील के बावजूद भी आर्थिक गतिविधियों के फिर से सामान्य होने में काफी समय लगेगा क्योंकि लोग खुद भी घर से बाहर कम निकल रहे हैं और मॉल, सिनेमा हॉल, रेस्तरां और होटल जाने से बच रहे हैं।

घरेलू और विदेशी दोनों स्तर पर मांग कम होने से उत्पादन कम हो रहा है और इसके कारण अब भी लोगों की नौकरियां जा रही हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार: क्या पीएम नरेंद्र मोदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को जर्जर किया?

भारत में केंद्रीय सांख्यिकी मंत्रालय ने सोमवार को जीडीपी के आंकड़े जारी कर दिए जो - 23.9 फ़ीसदी रही है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में इसे सबसे बड़ा ऐतिहासिक गिरावट माना गया है और इसका प्रमुख कारण कोरोना वायरस और उसके कारण लगाए गए देशव्यापी लॉकडाउन को बताया जा रहा है।

दुनिया में एक समय सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था रहे भारत के इस नए नकारात्मक जीडीपी आंकड़े से जुड़ी ख़बरों को दुनियाभर के तमाम अख़बारों और मीडिया हाउसेज़ ने अपने यहां कवरेज दी है।

अमरीकी मीडिया हाउस सीएनएन ने अपने यहां 'भारतीय अर्थव्यवस्था रिकॉर्ड रूप से सबसे तेज़ी से डूबी' शीर्षक से ख़बर लगाई है।

इस ख़बर में कैपिटल इकोनॉमिक्स के शीलन शाह कहते हैं कि इसके कारण अधिक बेरोज़गारी, कंपनियों की नाकामी और बिगड़ा हुआ बैंकिंग सेक्टर सामने आएगा जो कि निवेश और खपत पर भारी पड़ेगा।

जापान के बिजनेस अख़बार निकेई एशियन रिव्यू में भारतीय वित्त आयोग के पूर्व सहायक निदेशक रितेश कुमार सिंह ने एक लेख लिखा है जिसका शीर्षक है, 'नरेंद्र मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को जर्जर बनाया'।

इसमें लिखा गया है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यापार समर्थित छवि होने के बावजूद वो अर्थव्यवस्था संभालने में अयोग्य साबित हो रहे हैं, 2025 तक अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन (खरब) डॉलर की इकोनॉमी बनाने का सपना अब पूरा होता नहीं दिख रहा है।

''भारत के सबसे आधुनिक औद्योगिक शहर से आने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने वादा किया था कि वो अर्थव्यवस्था सुधारेंगे और हर साल 1.2 करोड़ नौकरियां पैदा करेंगे। छह साल तक दफ़्तर से आशावाद की लहर चलाने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था जर्जर हो गई है। जिसमें जीडीपी चार दशकों में पहली बार इतनी गिरी है और बेरोज़गारी अब तक के चरम पर है। विकास के बड़े इंजन, खपत, निजी निवेश या निर्यात ठप्प पड़े हैं। ऊपर से यह है कि सरकार के पास मंदी से बाहर निकलने और ख़र्च करने की क्षमता नहीं है।''

लेख में लिखा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी की इकलौती चूक सिर्फ़ अर्थव्यवस्था संभालना नहीं है बल्कि वो भ्रष्टाचार समाप्त करने के मामले में फ़ेल हुए हैं।

''मोदी ने विनाशकारी नोटबंदी की घोषणा की थी जिसका मक़सद काले धन को समाप्त करना था। इसने अराजकता का माहौल बनाया, इस योजना ने लाखों किसानों और मंझोले एवं छोटे उद्योगों के मालिकों को तबाह कर दिया। हालांकि, उनके समर्थकों का कहना था कि यह सब थोड़े समय के लिए है और भ्रष्टाचार से लड़ने में यह आगे फ़ायदा देगा।''

इस लेख में अर्थव्यवस्था के नीचे जाने की वजह जीएसटी के अलावा, एफ़डीआई, 3600 उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाना और प्रधानमंत्री मोदी का सिर्फ़ कुछ ही नौकरशाहों पर यकीन करना बताया गया है।

अमरीकी अख़बार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी अपने यहां इस ख़बर को जगह दी है।

भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बुरी तरह बिगड़ी है। अमरीका की अर्थव्यवस्था में जहां इसी तिमाही में 9.5 फ़ीसदी की गिरावट है, वहीं जापान की अर्थव्यवस्था में 7.6 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

अर्थव्यवस्था का नुक़सान इन आंकड़ों से अधिक? अख़बार द न्यूयॉर्क टाइम्स लिखता है कि अर्थव्यवस्था के आंकड़ों के मामले में भारत की तस्वीर कुछ अलग है क्योंकि यहां अधिकतर लोग 'अनियमित' रोज़गार में लगे हैं जिसमें काम के लिए कोई लिखित क़रार नहीं होता और अकसर ये लोग सरकार के दायरे से बाहर होते हैं, इनमें रिक्शावाले, टेलर, दिहाड़ी मज़दूर और किसान शामिल हैं।

अर्थशास्त्री मानते हैं कि आधिकारिक आंकड़ों में अर्थव्यवस्था के इस हिस्से को नज़रअंदाज़ करना होता है जबकि पूरा नुक़सान तो और भी अधिक हो सकता है।

अख़बार आगे लिखता है कि 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश की अर्थव्यवस्था कुछ ही सालों पहले 8 फ़ीसदी की विकास दर से बढ़ रही थी जो दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक थी।

लेकिन कोरोना वायरस महामारी से पहले ही इसमें गिरावट शुरू हुई। उदाहरण के लिए पिछले साल अगस्त में कार बिक्री में 32 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई जो दो दशकों में सबसे अधिक थी।

सोमवार को आए आंकड़ों में उपभोक्ता ख़र्च, निजी निवेश और आयात बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

व्यापार, होटल और ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्र में 47 फ़ीसदी की गिरावट आई है। एक समय भारत का सबसे मज़बूत रहा निर्माण उद्योग 39 फ़ीसदी तक सिकुड़ गया है।

अख़बार लिखता है कि सिर्फ़ कृषि क्षेत्र से ही अच्छी ख़बर आई है जो मानसून की अच्छी बारिश के कारण 3 फ़ीसदी से 3.4 फ़ीसदी के दर से विकसित हुआ है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि वो 2024 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन USD की इकोनॉमी बनाना चाहते हैं। 2024 में आम चुनाव हैं और संभवतः वो तीसरी बार चुनाव लड़ें। 2018 में भारत की जीडीपी 2.719 ट्रिलियन USD की थी जो अमरीका, चीन, जापान, जर्मनी, इंग्लैंड और फ्रांस के बाद दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी। हालांकि, कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था 10 फ़ीसदी छोटी हो जाएगी।''

फ़ाइनेंशियल टाइम्स अख़बार का शीर्षक है 'भारतीय अर्थव्यवस्था एक तिमाही के बराबर सिकुड़ी'।

अख़बार लिखता है कि भारत की अर्थव्यवस्था कोरोना वायरस की मार से पहले ही कमज़ोर हालत में थी लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लॉकडाउन में मैन्युफ़ैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन जैसे उद्योगों पर बड़ा असर डाला और व्यावसायिक गतिविधियां तकरीबन ठप्प पड़ गईं।

अख़बार ने लिखा है कि आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने इंटरव्यू के दौरान बेहद विश्वास से कहा था कि आरबीआई कमज़ोर आर्थिक स्थिरता या बैंकिंग प्रणाली को महामारी के झटके से बचा सकता है, इसमें अगले स्तर का आर्थिक प्रोत्साहन दिए जाने का अनुमान लगाया गया है।

फेसबुक द्वारा सोशल मीडिया का दुरूपयोग: क्या भारत में संसदीय समिति फेसबुक पर कार्रवाई करेगी?

भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना तकनीक पर बनी 30 सदस्यों वाली संसदीय समिति ने बुधवार को सोशल मीडिया साइट फेसबुक पर लग रहे आरोपों की सुनवाई की।

इस समिति के समक्ष विभाग से जुड़े अधिकारी मौजूद थे। साथ ही भारत में फेसबुक के प्रबंध निदेशक अजीत मोहन ने भी अपनी बात रखी।

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार फेसबुक की तरफ़ से दलील रखी गयी कि उसने हमेशा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर पारदर्शिता रखी है।

फेसबुक का ये भी कहना था कि उसने बिना किसी राजनीतिक दबाव के लोगों को अपनी अभिव्यक्ति प्रकट करने का माध्यम भी दिया है।

ये विवाद तब शुरू हुआ जब एक अमरीकी समाचार पत्र वॉलस्ट्रीट जर्नल ने भारत में फेसबुक के बारे में आरोप लगाए कि वो सत्तारूढ़ दल यानी भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में ज़्यादा काम करता है।

समाचार पत्र में ये भी आरोप लगाया गया कि फेसबुक पर अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत भड़काने वाली पोस्ट पर भी कोई नियंत्रण नहीं है। ये भी आरोप लगाये गए कि उन कथित भड़काऊ पोस्ट को फेसबुक ने तब हटाया जब अख़बार ने उनके बारे में जानकारी दी।

इन आरोपों पर बीबीसी को फेसबुक ने ईमेल के ज़रिये अपना जवाब दिया, ''किसी भी तरह की हिंसा या नफ़रत फैलाने वाली सामग्री फेसबुक पर प्रतिबंधित है। ये मायने नहीं रखता कि पोस्ट लिखने वाले का राजनीतिक रुझान किस तरफ़ है।''

कांग्रेस के सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता और सोशल मीडिया पर नज़र रखने वाले एक समूह के प्रतिनिधि को भी अपनी मदद के लिए कार्यवाही में शामिल किया।

संसद के सूत्रों का कहना है कि संसदीय समिति की बैठक बंद कमरे में ज़रूर हुई मगर पूरी कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग की गयी है।

समिति की सुनवाई काफ़ी लंबी चली। इस दौरान बंद कमरे में क्या कुछ हुआ इसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने फ़िलहाल चुप्पी साध रखी है।

समिति में संसद के दोनों सदनों के सदस्य शामिल हैं जिसमें ज़्यादा संख्या सत्ता पक्ष के सदस्यों की है।

लेकिन समिति की बैठक से पहले ही कांग्रेस ने फेसबुक के सीईओ मार्क ज़करबर्ग को दो-दो चिठ्ठियां लिखीं जिसमें फेसबुक के लिए भारत में काम करने वाले दो प्रतिनिधियों के आचरण और उनके द्वारा की गई पोस्ट का हवाला दिया गया।

चिठ्ठी के बाद समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने फेसबुक को नोटिस भेजा तो भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे और राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने थरूर को समिति के अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की।

दुबे का लिखित आरोप है कि शशि थरूर सोशल मीडिया के इस प्लेटफॉर्म के ज़रिये खुद के और अपनी पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

मगर लोकसभा के अध्यक्ष ने चिठ्ठी का कोई जवाब नहीं दिया।

समिति की बैठक से ठीक एक दिन पहले केंद्रीय विधि एवं न्याय, संचार एंव इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मार्क ज़करबर्ग को चिठ्ठी लिखकर आरोप लगाया कि उनका सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वालों की पोस्ट को सेंसर कर रहा है।

रविशंकर प्रसाद का ये भी आरोप था कि अमरीकी अख़बार में जो लिखा गया है दरअसल वो उल्टी छवि पेश कर रहा है। उन्होंने ये भी कहा कि 'भारत की राजनीतिक व्यवस्था में अफ़वाहें फैला कर दख़लंदाज़ी करना निंदनीय है'।

भारत में फेसबुक के लगभग 30 करोड़ यूज़र्स हैं और रविशंकर प्रसाद का ये भी आरोप है कि 2019 में हुए आम चुनावों में फेसबुक ने भारतीय जनता पार्टी को लोगों तक ठीक से अपनी बात पहुँचाने नहीं दी।

राजनीतिक दलों के बीच चल रहे इस वाकयुद्ध की वजह से फेसबुक लगातार चर्चा में बना हुआ है लेकिन संसदीय समिति में क्या कुछ हुआ, इसकी किसी को जानकारी नहीं है।

राज्यसभा के उपाध्यक्ष हरिवंश नारायण सिंह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि कुल मिलाकर 24 संसदीय समितियां हैं जो विभिन्न विभागों या मुद्दों को लेकर बनायी गयी हैं। इनमें लोकसभा और राज्यसभा के सांसद शामिल रहते हैं लेकिन ज़्यादातर समितियों के अध्यक्ष लोकसभा के सदस्य हैं।

संसद किस तरह चलेगी इसके लिए पहले से ही स्पष्ट रूपरेखा निर्धारित है। विधायी कार्यों के नियम भी स्पष्ट हैं जिन पर कोई बहस नहीं की जा सकती है क्योंकि वो पहले से ही निर्धारित संसदीय परंपरा का हिस्सा हैं।

हरिवंश नारायण कहते हैं, ''संसदीय समिति की बैठक पूरी तरह से गोपनीय होती है जिसके बारे में समिति के सदस्यों को बाहर बोलने की अनुमति नहीं है। न सिर्फ़ सदस्य बल्कि जिनको समिति नोटिस भेजकर बुलाती है वो भी बाहर कुछ नहीं कह सकते। अगर वो ऐसा करते हैं तो ये विशेषाधिकार हनन का मामला बनता है।''

सांसद मनोज कुमार झा कहते हैं कि जब तक समिति की रिपोर्ट को संसद के पटल पर नहीं रखा जाता, तब तक उसे सार्वजनिक भी नहीं किया जा सकता है। वो कहते हैं कि संसदीय समिति के सदस्यों और उनके सामने पेश होने वाले लोग शपथ से भी बंधे हुए हैं।

इसलिए लगभग तीन घंटों तक चली इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना तकनीक की संसदीय समिति की बैठक की कार्यवाही का लेखा-जोखा आम लोगों की जानकारी के लिए तब तक उपलब्ध नहीं है जब तक कि संसद इसका अनुमोदन नहीं कर देती। यही विधायी कार्यप्रणाली है।

भारत-चीन तनाव: चीन में बने पबजी समेत 118 और मोबाइल ऐप्स को भारत ने बैन किया

भारत सरकार ने चीन में विकसित 118 मोबाइल ऐप्स को बैन कर दिया है जिनमें गेमिंग ऐप पबजी भी शामिल है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि इन ऐप्स को इसलिए बैन किया गया है, क्योंकि वे भारत की संप्रभुता और अखंडता, देश की रक्षा और लोक व्यवस्था के विरूद्ध गतिविधियों में लिप्त थे।

मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, ''इस क़दम से भारत के करोड़ों मोबाइल और इंटरनेट यूज़र्स के हितों की रक्षा होगी। ये फ़ैसला भारत के साइबर स्पेस की सुरक्षा और संप्रभुता को सुनिश्चित करने के इरादे से लिया गया है।''

बयान के अनुसार भारत सरकार को इन ऐप्स के बारे में विभिन्न स्रोतों से शिकायतें मिल रही थीं, जिनमें ऐसी रिपोर्टें भी थीं कि एंड्रॉयड और आइओएस पर उपलब्ध कुछ मोबाइल ऐप्स से यूज़र्स के डेटा अनाधिकृत तौर पर चोरी कर भारत से बाहर स्थित सर्वर में भेजे जा रहे थे।

चीन के 118 ऐप्स को बैन करने का फ़ैसला ऐसे समय लिया गया है जब भारत और चीन के बीच एक बार फिर से लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा या एलएसी पर दोनों देशों के बीच तनाव की ख़बरें आ रही हैं।

भारत सरकार ने इससे पहले जून में भी चीन से जुड़े 59 ऐप्स को बैन किया था। इनमें टिकटॉक भी शामिल था।

पिछली बार 59 चीनी ऐप्स को बैन करने का फ़ैसला गलवान घाटी में 15 जुलाई को भारत-चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के कुछ दिनों बाद लिया गया था।

भारत की अर्थव्यवस्था में मंदी: भारत की जीडीपी 23.9 फ़ीसदी गिरी

भारत के सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी की विकास दर में लॉकडाउन के शुरूआती महीनों वाली तिमाही में ज़बरदस्त गिरावट हुई है।

भारत में केंद्र सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार 2020-21 वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच विकास दर में 23.9 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

ऐसा अनुमान लगाया गया था कि कोरोना वायरस महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन के कारण भारत की जीडीपी की दर पहली तिमाही में 18 फ़ीसदी तक गिर सकती है।

वहीं, भारत के सबसे बड़े सरकारी बैंक एसबीआई का अनुमान था कि यह दर 16.5 फ़ीसदी तक गिर सकती है लेकिन ताज़ा आंकड़े चौंकाने वाले हैं।

जनवरी-मार्च तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था में 3.1 फ़ीसदी की वृद्धि देखी गई थी जो आठ साल में सबसे कम थी।

जीडीपी के आंकड़े बताते हैं कि मार्च तिमाही में उपभोक्ता ख़र्च धीमा हुआ, निजी निवेश और निर्यात कम हुआ। वहीं, बीते साल इसी जून तिमाही की दर 5.2 फ़ीसदी थी।

जीडीपी के इन नए आंकड़ों को साल 1996 के बाद से ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़ी गिरावट बताया गया है।

इन आंकड़ों पर सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण आर्थिक गतिविधियों के अलावा आंकड़ा इकट्ठा करने के तंत्र पर भी असर पड़ा है। सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा है कि 25 मार्च से देश में लॉकडाउन लगाया गया जिसके बाद आर्थिक गतिविधियों पर रोक लग गई।

सांख्यिकी मंत्रालय ने कहा है कि अधिकतर निकायों ने क़ानूनी रिटर्न दाख़िल करने की समयसीमा बढ़ा दी थी। इन परिस्थितियों में जीएसटी जैसे आंकड़े के स्रोत सीमित हो गए थे।

क्या है जीडीपी

ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट यानी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) किसी एक साल में देश में पैदा होने वाले सभी सामानों और सेवाओं की कुल वैल्यू को कहते हैं।

रिसर्च और रेटिंग्स फ़र्म केयर रेटिंग्स के अर्थशास्त्री सुशांत हेगड़े का कहना है कि जीडीपी ठीक वैसी ही है, जैसे 'किसी छात्र की मार्कशीट' होती है।

जिस तरह मार्कशीट से पता चलता है कि छात्र ने सालभर में कैसा प्रदर्शन किया है और किन विषयों में वह मज़बूत या कमज़ोर रहा है? उसी तरह जीडीपी आर्थिक गतिविधियों के स्तर को दिखाता है और इससे यह पता चलता है कि किन सेक्टरों की वजह से इसमें तेज़ी या गिरावट आई है?

इससे पता चलता है कि सालभर में अर्थव्यवस्था ने कितना अच्छा या ख़राब प्रदर्शन किया है। अगर जीडीपी डेटा सुस्ती को दिखाता है, तो इसका मतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था सुस्त हो रही है और देश ने इससे पिछले साल के मुक़ाबले पर्याप्त सामान का उत्पादन नहीं किया और सेवा क्षेत्र में भी गिरावट रही।

भारत में सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफ़िस (सीएसओ) साल में चार दफ़ा जीडीपी का आकलन करता है। यानी हर तिमाही में जीडीपी का आकलन किया जाता है। हर साल यह सालाना जीडीपी ग्रोथ के आँकड़े जारी करता है।

भारत-चीन तनाव: चीन ने भारत से तनाव के बीच तिब्बत को लेकर अहम घोषणा की

भारत से सरहद पर तनाव के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक 'नए आधुनिक समाजवादी तिब्बत' के निर्माण की कोशिश करने का आह्वान किया है।

इससे पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने तिब्बत का दौरा किया था और भारत से लगी सीमा पर निर्माण कार्यों का जायज़ा लिया था।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और चीन के सेंट्रल मिलिटरी कमिशन के चेयरमैन शी जिनपिंग ने बीजिंग में तिब्बत को लेकर हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में यह टिप्पणी की।

उन्होंने कहा कि चीन को तिब्बत में स्थिरता बनाए रखने और राष्ट्रीय एकता की रक्षा करने के लिए और कोशिशें करने की ज़रूरत है।

चीन ने 1950 में तिब्बत पर अपना नियंत्रण स्थापित किया था।

निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के साथ खड़े होने वाले आलोचकों का कहना है कि 'चीन ने तिब्बत के लोगों और वहाँ की संस्कृति के साथ बुरा किया'।

तिब्बत के भविष्य के शासन पर कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों की इस बैठक में शी जिनपिंग ने उपलब्धियों की प्रशंसा की और फ्रंटलाइन पर काम कर रहे अधिकारियों की भी तारीफ़ की, लेकिन उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में एकता को बढ़ाने, उसे फिर से जीवंत और मज़बूत करने के लिए और प्रयासों की आवश्यकता है।

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, शी जिनपिंग ने बैठक में कहा कि 'तिब्बत के स्कूलों में राजनीतिक और वैचारिक शिक्षा पर और ज़ोर दिए जाने की ज़रूरत है ताकि वहाँ हर युवा के दिल में चीन के लिए प्यार का बीज बोया जा सके'।

शी जिनपिंग ने कहा कि तिब्बत में कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका को मज़बूत करने और जातीय समूहों को बेहतर ढंग से एकीकृत करने की आवश्यकता है।

इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि ''हमें एकजुट, समृद्ध, सभ्य, सामंजस्यपूर्ण और सुंदर, आधुनिक, समाजवादी तिब्बत बनाने का संकल्प लेना होगा।''

उन्होंने कहा कि 'तिब्बती बौद्ध धर्म को भी समाजवाद और चीनी परिस्थितियों के अनुकूल बनाए जाने की ज़रूरत है'।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि 'अगर चीन से तिब्बत को वाक़ई इतना फ़ायदा हुआ होता, जितना शी जिनपिंग ने बैठक में दावा किया, तो चीन को अलगाववाद का डर नहीं होता और ना ही चीन तिब्बत के लोगों में शिक्षा के ज़रिए 'नई राजनीतिक चेतना' भरने की बात करता'।

अमरीका और चीन तनाव के बीच भी तिब्बत को लेकर बात उठी थी।

जुलाई में, अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने कहा था कि अमरीका तिब्बत में 'राजनयिक पहुँच को रोकने और मानवाधिकारों के हनन में लिप्त' कुछ चीनी अधिकारियों के वीज़ा को प्रतिबंधित करेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि अमरीका तिब्बत की 'सार्थक स्वायत्तता' का समर्थन करता है।

चीन के कब्ज़े में तिब्बत कब और कैसे आया?

मुख्यतः बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के इस सुदूर इलाक़े को 'संसार की छत' के नाम से भी जाना जाता है। चीन में तिब्बत का दर्जा एक स्वायत्तशासी क्षेत्र के तौर पर है।

चीन का कहना है कि इस इलाके पर सदियों से उसकी संप्रभुता रही है, जबकि बहुत से तिब्बती लोग अपनी वफ़ादारी अपने निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के प्रति रखते हैं।

दलाई लामा को उनके अनुयायी एक जीवित ईश्वर के तौर पर देखते हैं तो चीन उन्हें एक अलगाववादी ख़तरा मानता है।

तिब्बत का इतिहास बेहद उथल-पुथल भरा रहा है। कभी वो एक खुदमुख़्तार इलाक़े के तौर पर रहा, तो कभी मंगोलिया और चीन के ताक़तवर राजवंशों ने उस पर हुकूमत की।

लेकिन साल 1950 में चीन ने इस इलाके पर अपना झंडा लहराने के लिए हज़ारों की संख्या में सैनिक भेज दिए। तिब्बत के कुछ इलाक़ों को स्वायत्तशासी क्षेत्र में बदल दिया गया और बाक़ी इलाक़ों को इससे लगने वाले चीनी प्रांतों में मिला दिया गया।

लेकिन साल 1959 में चीन के ख़िलाफ़ हुए एक नाकाम विद्रोह के बाद 14वें दलाई लामा को तिब्बत छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी, जहाँ उन्होंने निर्वासित सरकार का गठन किया।

साठ और सत्तर के दशक में चीन की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान तिब्बत के ज़्यादातर बौद्ध विहारों को नष्ट कर दिया गया। माना जाता है कि दमन और सैनिक शासन के दौरान हज़ारों तिब्बतियों की जाने गई थीं।

चीन तिब्बत विवाद कब शुरू हुआ?

चीन और तिब्बत के बीच विवाद, तिब्बत की क़ानूनी स्थिति को लेकर है।

चीन कहता है कि तिब्बत तेरहवीं शताब्दी के मध्य से चीन का हिस्सा रहा है लेकिन तिब्बतियों का कहना है कि तिब्बत कई शताब्दियों तक एक स्वतन्त्र राज्य था और चीन का उस पर निरंतर अधिकार नहीं रहा।

मंगोल राजा कुबलई ख़ान ने युआन राजवंश की स्थापना की थी और तिब्बत ही नहीं बल्कि चीन, वियतनाम और कोरिया तक अपने राज्य का विस्तार किया था।

फिर सत्रहवीं शताब्दी में चीन के चिंग राजवंश के तिब्बत के साथ संबंध बने।

260 साल के रिश्तों के बाद चिंग सेना ने तिब्बत पर अधिकार कर लिया, लेकिन तीन साल के भीतर ही उसे तिब्बतियों ने खदेड़ दिया और 1912 में तेरहवें दलाई लामा ने तिब्बत की स्वतन्त्रता की घोषणा की।

फिर 1951 में चीनी सेना ने एक बार फिर तिब्बत पर नियन्त्रण कर लिया और तिब्बत के एक शिष्टमंडल से एक संधि पर हस्ताक्षर करा लिए जिसके अधीन तिब्बत की प्रभुसत्ता चीन को सौंप दी गई।

दलाई लामा भारत भाग आये और तभी से वे तिब्बत की स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

जब चीन ने तिब्बत पर क़ब्ज़ा किया तो उसे बाहरी दुनिया से बिल्कुल काट दिया। इसके बाद तिब्बत के चीनीकरण का काम शुरू हुआ और तिब्बत की भाषा, संस्कृति, धर्म और परम्परा - सबको निशाना बनाया गया।

क्या तिब्बत चीन का हिस्सा है?

चीन-तिब्बत संबंधों से जुड़े कई सवाल हैं जो लोगों के मन में अक्सर आते हैं। जैसे कि क्या तिब्बत चीन का हिस्सा है? चीन के नियंत्रण में आने से पहले तिब्बत कैसा था? और इसके बाद क्या बदल गया?

तिब्बत की निर्वासित सरकार का कहना है, ''इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में तिब्बत विभिन्न विदेशी शक्तियों के प्रभाव में रहा। मंगोलों, नेपाल के गोरखाओं, चीन के मंचू राजवंश और भारत पर राज करने वाले ब्रितानी शासक, सभी की तिब्बत के इतिहास में कुछ भूमिकाएं रही हैं। लेकिन इतिहास के दूसरे कालखंडों में वो तिब्बत था जिसने अपने पड़ोसियों पर ताक़त और प्रभाव का इस्तेमाल किया और इन पड़ोसियों में चीन भी शामिल था।''

''दुनिया में आज कोई ऐसा देश खोजना मुश्किल है, जिस पर इतिहास के किसी दौर में किसी विदेशी ताक़त का प्रभाव या अधिपत्य ना रहा हो। तिब्बत के मामले में विदेशी प्रभाव या दखलंदाज़ी तुलनात्मक रूप से बहुत ही सीमित समय के लिए रही थी।''

लेकिन चीन का कहना है कि ''सात सौ साल से भी ज़्यादा समय से तिब्बत पर चीन की संप्रभुता रही है और तिब्बत कभी भी एक स्वतंत्र देश नहीं रहा। दुनिया के किसी भी देश ने कभी भी तिब्बत को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं दी।''

जब भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना

साल 2003 के जून महीने में भारत ने ये आधिकारिक रूप से मान लिया था कि तिब्बत चीन का हिस्सा है।

चीन के राष्ट्रपति जियांग जेमिन के साथ भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मुलाक़ात के बाद भारत ने पहली बार तिब्बत को चीन का अंग माना।

उस समय भारत में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के नेता थे। इससे साफ जाहिर होता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते बीजेपी और भारत की निकटता चीन के साथ बढ़नी शुरू हो गई। यह भारत के विदेश नीति में आमूल चूल बदलाव दिखता है। इससे पहले कांग्रेस पार्टी की सरकार ने कभी ऐसी गलती नहीं की। कांग्रेस ने तिब्बत पर चीन के कब्जे को कभी मान्यता नहीं दी और तिब्बत को हमेशा आज़ाद मुल्क माना।

हालांकि तब ये कहा गया था कि ये मान्यता परोक्ष ही है, लेकिन दोनों देशों के बीच रिश्तों में इसे एक महत्वपूर्ण क़दम के तौर पर देखा गया था।

वाजपेयी-जियांग जेमिन की वार्ता के बाद चीन ने भी भारत के साथ सिक्किम के रास्ते व्यापार करने की शर्त मान ली थी। तब इस क़दम को यूँ देखा गया कि चीन ने भी सिक्किम को भारत के हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया है।

भारतीय अधिकारियों ने उस वक़्त ये कहा था कि भारत ने पूरे तिब्बत को मान्यता नहीं दी है जो कि चीन का एक बड़ा हिस्सा है, बल्कि भारत ने उस हिस्से को ही मान्यता दी है जिसे स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र माना जाता है।