भारत

लाइव : हरियाणा में जमीन घोटाले पर कांग्रेस मुख्यालय में पवन खेड़ा द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

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लाइव : बीजेपी के चुनावी खर्चों पर कांग्रेस मुख्यालय में अभिषेक मनु सिंघवी द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

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लाइव : एमटीएनएल और बीएसएनएल पर कांग्रेस मुख्यालय में पवन खेरा द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

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बढ़ते बैंक धोखाधड़ी पर कांग्रेस मुख्यालय में जयवीर शेरगिल द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

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लाइव : नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में रणदीप सिंह सुरजेवाला द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

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भारत सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं रहा

भारत की अर्थव्यवस्था पिछले पांच सालों में सबसे धीमी रफ़्तार से बढ़ी है। भारत सरकार की ओर से जारी किए गए हालिया आंकड़ों से ये बात साफ़ होती है।

ये रिपोर्ट बताती है कि ये आंकड़े दूसरी बार प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

पिछले वित्तीय वर्ष अप्रैल 2018 से मार्च 2019 तक आर्थिक वृद्धि दर 6.8% रही। वहीं जनवरी से मार्च तक की तिमाही में ये दर 5.8% तक ही रही। ये दर पिछले दो साल में पहली बार चीन की वृद्धि की दर से भी पीछे रह गई है।

इसका मतलब है कि भारत अब सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था नहीं रह गया है। भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के लिए ये एक बड़ी चुनौती साबित होगी। निर्मला सीतारमण मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में कॉमर्स और रक्षा जैसे मंत्रालय संभाल चुकी हैं।

मोदी सरकार के सामने मौजूदा चुनौती ये है कि वो अर्थव्यवस्था के प्रति लोगों का यकीन वापस ला सके। मोदी सरकार को अपनी शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म पॉलिसी के बीच सामंजस्य बैठाना होगा।

सरकार की सबसे पहली चुनौती रोज़गार होगी।

मोदी सरकार को उसके पहले कार्यकाल में सबसे ज्यादा रोज़गार के मुद्दे पर घेरा गया। सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2017-18 के बीच बेरोज़गारी 45 साल में सबसे ज़्यादा 7. 2 प्रतिशत  रही।
जानकार मानते हैं कि सरकार को अभी भवन निर्माण और कपड़ा इंडस्ट्री जैसे लेबर-सेक्टर पर फ़ोकस करने की ज़रूरत है, ताकि तत्काल प्रभाव से रोजगार पैदा किया जा सके। इसके अलावा सरकार को हेल्थ केयर जैसी इंडस्ट्री पर भी काम करना चाहिए ताकि लंबी अवधि वाली नौकरियां भी पैदा की जा सकें।

घटता निर्यात भी रोजगार के रास्ते में एक बड़ी रुकावट पैदा करता है।

अमेरिका ने 5 जून 2019 से भारत का स्पेशल ट्रेड स्टेटस ख़त्म कर दिया है। भारत कुल निर्यात का 16 प्रतिशत अमेरिका को निर्यात करता है। ऐसे में भारत की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इससे बेरोज़गारी बढ़ेगी।

अमेरिका ने ईरान पर 1 मई 2019 से प्रतिबन्ध लगा दिया है। भारत अब ईरान से पेट्रोलियम आयात नहीं कर सकता। भारत सबसे ज्यादा पेट्रोलियम ईरान से आयात करता था जिसका भुगतान भारत अपनी करेंसी रूपया में करता था। ईरान पर प्रतिबन्ध लगने से भारत बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गया है। भारत को अब पेट्रोलियम के लिए डॉलर में भुगतान करना होगा। ऐसे ही डॉलर के मुकाबले रूपया 69.58 के स्तर पर है। रूपया और नीचे गिरेगा। इससे महँगाई बढ़ेगी।

नई जीडीपी दर से साफ है कि भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से नीचे की ओर गिर रही है।

चीन के अलग भारत की आर्थिक वृद्धि का सबसे बड़ा कारक यहां की घरेलू खपत है। पिछले 15 सालों से घरेलू खपत ही अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में सबसे अहम भूमिका निभाता रहा है। लेकिन हालिया डेटा से साफ़ है कि उपभोक्ताओं की खरीदने की क्षमता में कमी आई है।

कारों-एसयूवी की बिक्री पिछले सात सालों के सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है। ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल, स्कूटर की बिक्री में भी कमी हुई है। बैंक से कर्ज़ लेने की मांग भी तेज़ी से बढ़ी है। हालिया तिमाहियों में हिंदुस्तान यूनिलीवर की आय वृद्धि में भी कमी आई है। इन तथ्यों को देखते हुए ये समझा जा सकता है कि उपभोक्ता की खरीदने की क्षमता में कमी आई है।

बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में वादा किया कि वह मध्यम आय वाले परिवारों के हाथों में अधिक नकदी और अधिक क्रय शक्ति सुनिश्चित करने के लिए आय करों में कटौती करेगी।

एक ब्रोकरेज कंपनी के वाइस प्रेसिटेंड गौरांग शेट्टी का मानना है कि सरकार को अपने अगले बजट (जुलाई) में पर्सनल और कॉरपोरेट टैक्स में भी कटौती करनी चाहिए।

वो कहते हैं कि ये कदम अर्थव्यवस्था के लिए एक उत्तेजक की तरह काम करेगा।

लेकिन भारत के 3.4% बजट घाटे यानी सरकारी व्यय और राजस्व के बीच का अंतर मोदी सरकार को ऐसा करने से रोक सकता है।

जानकारों का मानना है कि बढ़ता वित्तीय घाटा शॉर्ट और लॉन्ग टर्म वृद्धि को रोक सकता है।

भारत में बढ़ता कृषि संकट नरेंद्र मोदी के लिए उनके पहले कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रहा।  देश भर के किसान दिल्ली-मुंबई सहित भारत के कई हिस्सों में सड़कों पर अपनी फ़सल के उचित दाम की मांग के साथ उतरे।

बीजेपी ने अपनी पहली सरकार में चुनिंदा किसानों को 6000 रुपये सालाना देने का फ़ैसला किया था, हालांकि मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की पहली मंत्रिमंडल की बैठक में सभी किसानों के लिए ये स्कीम लागू कर दी है।

यह योजना कुछ वक्त के लिए राहत देगी, लेकिन लंबे वक्त में ये काम नहीं आएगी। कृषि क्षेत्र की संरचना को सुधारने की ज़रूरत है।

वर्तमान समय में किसान अपनी फ़सल राज्य सरकार की एजेंसियों को बेचते हैं। जबकि किसानों को सीधे बाज़ार में मोलभाव करने की सहूलियत देनी चाहिए।

बीजेपी के चुनावी वादों में से एक था कि वह रेलवे, सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर पर 1.44 ट्रिलियन डॉलर खर्च करेंगे। लेकिन इतनी बड़ी रकम कहां से आएगी? जानकार मानते हैं कि मोदी इसके लिए निजीकरण की राह अपना सकते हैं।

मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में सरकारी उद्यमों को बेचने के अपने वादों पर धीमी गति से काम किया है। एयर इंडिया लंबे वक्त से कर्ज़ में डूबी है। सरकार ने इसके शेयर बेचने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन कोई ख़रीददार नहीं मिला और एयर इंडिया नहीं बिक सकी।

पिछले कुछ सालों से निजी निवेश पिछड़ रहा है और पिछले एक दशक में भारत की प्रभावशाली आर्थिक वृद्धि काफी हद तक सरकारी खर्चों पर ही चल रही है।

अपनी पहली सरकार में नरेंद्र मोदी ने लाइसेंसी राज में कुछ कमी की जिसकी मदद से भारत विश्व बैंक की व्यापार करने की सहूलियत वाली सूची में 77वें पायदान पर पहुंच सका, जो साल 2014 में 134वें स्थान पर था।

चीन अपनी सेना में 'आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस' लाने को पूरी तरह तैयार

चीन अपनी सेना में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग में महारथ हासिल करने पर अपनी नज़रें टिकाई हैं। एशिया के इस विशाल देश का अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के मामले में आगे बढ़ने का यह प्रयास बेहद महत्वपूर्ण है।

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर चाइना एकेडमी ऑफ़ इनफॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन के एक श्वेत पत्र में कहा गया है, ''आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए हथियारों के प्रयोग से दूर बैठे ही भविष्य में युद्ध को नियंत्रित किया जा सकता है, यह युद्ध की सटीकता को बनाने के साथ ही युद्धक्षेत्र को भी सीमित रख सकता है।

2017 में चीन की स्टेट काउंसिल ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें दोहरे उपयोग वाले सिविल और मिलिट्री तकनीक के एकीकृत उपकरणों के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने का विचार दिया गया और इसके लिए आधुनिक 'आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस' पर बल दिया गया था।

सिविल-मिलिट्री मेल का उद्देश्य निजी क्षेत्र सहित चीन की प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों को 'आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस' संबंधित सहयोग के जरिये सैन्य औद्योगिक उत्पादन के दायरे में लाना था।

2018 में चीन की दो मल्टीनेशनल टेकनोलॉजी कंपनियों ने बाइदु (2,368) और टेनसेंट (1,168) इसकी ज़िम्मेदारी ली और चीन के भीतर 'आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस' के अनुसंधान और विकास से जुड़े अधिकतम अमरीकी पेटेंट हासिल किये। लेकिन चीन इससे भी आगे बढ़ा और उसने अनुसंधान के ढांचे विकसित करने के लिए स्टार्ट अप्स में निवेश किये और उन्हें सरकारी योजनाओं के तहत अनुसंधानों से जोड़ने की रणनीति पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन की सेना और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस में लगी कंपनियों के बीच सहयोग है। यह इस बात से भी समझा जा सकता है कि चाइना आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एसोसिएशन के प्रमुख चीन की सेना के मेजर जनरल ली डेई हैं।

चीन के राष्ट्रीय ख़ुफ़िया क़ानून के मुताबिक़, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों पर कंपनियों को 'राष्ट्रीय ख़ुफ़िया कार्यों में सहयोग और सहायता' करना चाहिए।

इन प्रयासों से परिणाम भी मिलने लगे। मार्च 2019 में चीन ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की नई तकनीक को लेकर पेटेंट के मामले में अमरीका को पछाड़ दिया।

और अपनी उपलब्धियों को दिखाने के लिए, बीते चार वर्षों से वह एक सालाना सिविल-मिलिट्री इंटीग्रेशन एक्सपो का आयोजन कर रहा है। इस शो में बड़े पैमाने पर ड्रोन, कमांड-कंट्रोल सिस्टम, ट्रेनिंग सिमुलेशन उपकरण और मानव रहित युद्ध हार्डवेयर्स जैसी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले सैन्य उत्पादों को प्रदर्शित किया जाता है।

ड्रोन एक ऐसा क्षेत्र है, जहां आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से बहुत बड़े पैमाने पर सुधार लाया जा सकता है। अन्य चीज़ों के अलावा, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस एक ड्रोन को युद्ध के मैदान में अपने बल पर मानव रहित विमानों को पहचानने और उन्हें मार गिराने की क्षमता प्रदान करेगा।

ज़ियान यूएवी और चेंग्दू एयरक्राफ्ट इंडस्ट्री ग्रुप जैसी चीनी कंपनियां जे-10, जे-11 और जे-20 जैसे चीनी फ़ाइटर जेट बनाती हैं, जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले ड्रोन बनाने में निवेश कर रही हैं।

ज़ियान यूएवी ने ब्लोफिश ए-2 विकसित किया है, जो ऐसा ही एक ड्रोन है।

कंपनी की वेबसाइट में कहा गया है कि ब्लोफिश ए-2 अपने बल पर मिड-पॉइंट या फिक्स्ड-पॉइंट डिटेक्शन, फिक्स्ड-रेंज जासूसी और टारगेट स्ट्राइक समेत कहीं अधिक जटिल लड़ाकू मिशन पूरा करता है।

एक अन्य चीनी कंपनी, इहांग ने 184 एएवी नामक एक ड्रोन विकसित किया है, जो बिना किसी मानवीय सहायता के पहले से तय रास्ते पर 500 मीटर तक उड़ सकता है, यह अपने साथ एक पैसेंजर या सामान ले जाने में भी सक्षम है।

सिविल-मिलिट्री 'ड्रोन टैक्सी' के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है। यह सिविल-सैन्य एकीकरण की दिशा में उठाये गये चीन की एक बड़ी कोशिश का उदाहरण है।

सैन्य ड्रोन मानवरहित हवाई विमान (यूएवी) के रूप में युद्ध क्षेत्र में टोही विमान के रूप में काम करेगा और वहां से कमांड सेंटर में डेटा वापस भेज सकेगा।

एक बड़े क्षेत्र पर टोही विमान के रूप में काम करने की क्षमता यूएवी को एक ऐसी मशीन में बदल देंगे जो बिना मानवीय सहायता के निगरानी कर सकती हैं।

इसके अलावा, मशीन लर्निंग सिस्टम की क्षमता वाले ये ड्रोन युद्ध क्षेत्र में सही निर्णय लेने में सक्षम होंगे लिहाजा सैन्य जासूसी और भी अधिक सटीक तरीके से हो सकेगी।

इसके साथ ही 5G नेटवर्क तकनीक पर चीन की बढ़ती महारत से ड्रोन उस तेज़ी से डेटा भेज सकने में सक्षम हो सकेगा जो अब से पहले नहीं देखी गई है।

चीन दुनिया भर में यूएवी के एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है। यूएई, पाकिस्तान, लीबिया और सऊदी अरब जैसे देश इस तकनीक के लिए चीन की ओर नज़र लगाए हुए हैं।

ज़ियान यूएवी ने ब्लोफिश ए-2 यूएई को बेच दिया है, पाकिस्तान और सऊदी अरब से साथ इसकी बिक्री पर चर्चा चल रही है।

हांगकांग स्थित न्यूज़पेपर साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने लिखा कि चीन सऊदी अरब में ड्रोन उत्पादन के कारखाने भी लगा सकता है।

और मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि लीबिया और यमन में हाल के संघर्षों के दौरान कथित तौर पर चीन में बने ड्रोन का उपयोग किया गया था।

चीन ने ऐसे किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं जो ड्रोन और छोटी मिसाइलों के इसके निर्यात को नियंत्रित करते हों। उदाहरण के लिए, यह उन 35 देशों में नहीं है जो मिसाइल टेकनोलॉजी नियंत्रण योजना के पक्षकार हैं।

जापानी एसोसिएशन ऑफ डिफेंस इंडस्ट्री (JADI) की पत्रिका के एक लेख में कहा गया है कि यूएवी डेवलपमेंट के लिए चीन का बजट 2018 में 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2019 में 1.4 अरब डॉलर हो गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस आधार पर यूएवी को बनाने में चीनी निवेश 2025 तक 2.6 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा।

जानकारों के मुताबिक़, 2016 में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने यूएवी के अनुसंधान और विकास को कम्युनिस्ट पार्टी के एक नए समूह- सेंट्रल मिलिट्री कमिशन सब्सिडियरी को सौंप दिया और चूंकि सेंट्रल मिलिट्री कमिशन के प्रमुख राष्ट्रपति होते हैं लिहाजा यूएवी विकास कार्यक्रम अब शी जिनपिंग की सीधी निगरानी में आता है।

चीन चेहरे की पहचान (फेशियल रिकग्निशन) की निगरानी करने वाली तकनीक के आपूर्तिकर्ता के रूप में भी तेज़ी से उभरा है, इसकी मांग कई देशों में बढ़ रही है।

चीन की निगरानी करने वाली इस तकनीक के पास बहुत बड़ी संख्या में डेटाबेस हैं।

माना जाता है कि सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रालय फ़ेशियल रिकग्निशन का एक सबसे बड़ा डेटाबेस तैयार कर रहा है। यह अपना फोकस शिनजियांग प्रांत पर लगाये हुए है।

सेंस टाइम, चीन की एक स्टार्टअप है जिसने शिनजियांग में पुलिस को सर्विलांस तकनीक दी है। हालांकि इसके उपयोग को लेकर इसका विरोध भी किया जा रहा है। कंपनी ने हाल ही में अपने शेयर तांगली तकनीक को बेचे हैं।

युद्ध की योजना बनाने वाला सॉफ्टवेयर : आधिकारिक समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, 2007 से चीन सेंट्रल एक्गोरिथ्म पर आधारित एक ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित कर रहा है जो युद्ध के मैदान में तेज़ गति और सटीकता के साथ फ़ैसले लेने में मददगार साबित होगा।

हालांकि, चीन इस पर कितना आगे बढ़ा है, यह पता लगाना मुश्किल है, लेकिन अमरीका और नाटो जिनके पास उन्नत तकनीक मौजूद है। उन्हें चुनौती देने के लिए नई तकनीक का विकास करने में इसकी बहुत बारीक जानकारी होना आवश्यक है।

बताया जाता है कि इस क्षेत्र में चीन की कोशिशें अमरीका की अफ़ग़ानिस्तान में गतिविधियों पर आधारित हैं।

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन सरकार ने बेल्जियम की कंपनी लुसिएड से लुसीडलाइट्स्पीड सॉफ्टवेयर का अधिग्रहण किया है, जो भौगोलिक स्थिति के संदर्भ में स्पष्ट इमेजरी, जीपीएस, सैटेलाइट फ़ोटोग्राफ़ी के साथ ही डेटा भी देता है और इसका इस्तेमाल नाटो की सेना करती है।

2015 में, शिन्हुआ ने राष्ट्रीय रक्षा प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में चीफ़ इंजीनियर लियू झोंग का प्रोफ़ाइल किया, जो 'सूचना इंजीनियरिंग प्रणाली की मुख्य प्रयोगशाला' के प्रभारी थे।

शिन्हुआ ने कहा, ''प्रोफेसर झोंग को एक नई प्रौद्योगिकी को विकसित करने पर लगाया गया है जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बल पर सेना की योजना बनाने की गति को तेज़ करता है।''

युद्ध क्षेत्र में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से फ़ैसले लेने के सॉफ्टवेयर के मामले में झोंग चीन के प्रमुख विशेषज्ञों में से एक हैं।

मिसाइल : चीन एआई-संचालित मिसाइलों को विकसित कर रहा है जो लक्ष्य का पता लगा कर बिना किसी मानवीय सहायता के उस पर हमला कर सकती है।

जेएडीआई की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन ने एआई को अपनी डोंगफेंग 21डी, एक मध्यम दूरी की मिसाइल के साथ जोड़ा है। चीनी सरकार के न्यूज़पेपर पीपुल्स डेली में कहा गया है कि डीएफ़-21डी 'एक (विमान) वाहक जहाज' को डुबो सकता है और रास्ते में इसे रोक पाना भी मुश्किल है।

पीपुल्स डेली ने यह भी बताया है कि डीएफ-21डी के पुराने संस्करण डीएफ-26, 'ज़मीन पर बड़े आकार के स्थिर लक्ष्य और यहां तक कि 4,000 किलोमीटर की दूरी पर पानी पर भी लक्ष्य को निशाना बना सकता है', हालांकि रिपोर्ट में इस बात का जिक्र नहीं है कि क्या यह मिसाइल आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से चलती है।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि बैलिस्टिक मिसाइल प्रणालियों के साथ काम करने के लिए एआई-संचालित ड्रोन विकसित किए जाएंगे ताकि उनकी मारक क्षमता में सुधार हो सके।

त्रिपुरा में हुई हिंसा पर पवन खेरा और प्रद्योत देब बर्मन द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

त्रिपुरा में हुई हिंसा पर पवन खेरा और प्रद्योत देब बर्मन द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

लाइव : कांग्रेस मुख्यालय में पवन खेरा और प्रद्योत देब बर्मन द्वारा एआईसीसी की प्रेस वार्ता

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राहुल गांधी के इस्तीफ़े की पेशकश, कांग्रेस कार्यसमिति ने ख़ारिज किया

भारत में लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद शुक्रवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफ़े की पेशकश की जिसे कार्यसमिति ने ख़ारिज कर दिया।

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी समेत पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भाग लिया।

लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस कई राज्यों में अपना खाता भी नहीं खोल सकी और चुनावों में उसे 52 सीटें ही मिली हैं। इस निराशाजनक प्रदर्शन के बाद राहुल की नेतृत्व क्षमता को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे।

बैठक के बाद कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस की जिसमें उन्होंने बताया कि कार्यसमिति के सदस्यों ने अपने विचार रखे और एक प्रस्ताव पास किया जिसमें कहा गया कि कांग्रेस कार्यसमिति लोकसभा चुनावों के नतीजों को स्वीकार करती है।

उन्होंने प्रस्ताव को पढ़कर सुनाया। सुरजेवाला ने कहा, ''कांग्रेस पार्टी एक ज़िम्मेदार और सकारात्मक विपक्ष के रूप में अपनी भूमिका निभाएगी। कांग्रेस अध्यक्ष ने इस्तीफ़े की पेशकश की, लेकिन कांग्रेस कार्यसमिति ने एक स्वर में इसे ख़ारिज कर दिया क्योंकि इस समय उनके नेतृत्व की आवश्यकता है।''

''कांग्रेस कार्यसमिति विफलताओं को स्वीकार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष को यह अधिकार देती है कि वह पार्टी के ढांचे में बदलाव करें या पूरी तरह परिवर्तन करें। इसके लिए योजना जल्द से जल्द लागू की जाए।''

सुरजेवाला ने कहा, ''कांग्रेस पार्टी ने चुनाव हारा है, लेकिन हमारा अदम्य साहस, हमारी संघर्ष की भावना और हमारे सिद्धांतों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता पहले से ज़्यादा मज़बूत है। कांग्रेस पार्टी नफ़रत और विभाजन की ताक़तों से लोहा लेने के लिए सदैव कटिबद्ध है। कांग्रेस कार्यसमिति ने देश के समक्ष मौजूदा समय में अनेकों चुनौतियों का संज्ञान लिया, जिनका हल नई सरकार को ढूंढना है।''

उन्होंने ईरान पर प्रतिबंध लगने के बाद तेल की बढ़ती कीमतें, बढ़ती महंगाई का भी ज़िक्र किया। सुरजेवाला ने कहा, ''बैंकिंग प्रणाली गंभीर स्थिति में है और एनपीए पिछले पाँच सालों में अनियंत्रित तरीके से बढ़कर 12 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गए हैं, जिससे बैंकों की स्थिरता ख़तरे में है। नौकरियों के संकट का कोई समाधान नहीं निकल रहा, जिससे युवाओं का भविष्य ख़तरे में है।''

साथ ही कांग्रेस प्रवक्ता ने देश में सामाजिक सद्भाव व भाईचारे पर लगातार आक्रमण की बात भी कि उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार को इन पर ध्यान देते हुए इन समस्याओं का तत्काल समाधान किया जाए।

सुरजेवाला ने कहा कि कांग्रेस पार्टी इन समस्याओं का समाधान करने में सकारात्मक और सहयोगात्मक भूमिका अदा करेगी, कांग्रेस कार्यसमिति को उम्मीद है कि केंद्र की बीजेपी सरकार इन समस्याओं को सर्वोच्च प्राथमिकता से सुलझाएगी।