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कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक: कांग्रेस मुख्यालय में एआईसीसी प्रेस वार्ता

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अरुणाचल प्रदेश : हमले में विधायक समेत 11 की मौत

भारत में अरुणाचल प्रदेश के तिराप ज़िले में हुए एक चरमपंथी हमले में नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के विधायक तिरोंग अबो सहित 11 लोगों की मौत हो गई है।

तिरोंग अबो मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा की पार्टी के विधायक थे। वे 56 साल के थे।

बताया जा रहा है कि इस हमले में विधायक तिरोंग अबो के बेटे की भी मौत हो गई। जबकि दो लोग घायल बताए जा रहे हैं।

अरुणाचल पुलिस ने इस घटना की पुष्टि की है। पुलिस की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार तिरोंग अबो अपने परिवार समेत सुरक्षा व्यवस्था के साथ असम से अरुणाचल जा रहे थे।

इस बीच खोनसा-देओमाली रोड में पहले से घात लगाकर बैठे कुछ बंदूकधारी हमलावरों ने उनके काफिले पर हमला कर दिया।

अरुणाचल प्रदेश का यह ज़िला तीन तरफ से असम, नागालैंड और म्यांमार से लगता है। इस इलाके में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड (एनएससीएन-आईएम) और एनएससीएन-के इन दोनों संगठनों की काफी सक्रियता रहती है।

गौर करने वाली बात है कि साल 2015 में जब प्रधानमंत्री मोदी नागालैंड गए थे तो उन्होंने एनएसीएन-आईएम के साथ संघर्ष विराम का समझौता किया था। इस संगठन के साथ अभी भी शांति प्रकिया के लिए बातचीत चल रही है।

अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी के उपाध्यक्ष डोमिनिक तादार ने बीबीसी से कहा है कि यह हमला जांच का मुद्दा है और इसके पीछे किस संगठन का हाथ है। यह बात सीधे तौर पर अभी नहीं कही जा सकती।

भारत के केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इस हमले की निंदा करते हुए ट्वीट किया।  उन्होंने लिखा है, ''अरुणाचल प्रदेश में विधायक तिरोंग अबो, उनके परिवार और अन्य लोगों की हत्या हैरान करने देने वाली है। यह उत्तर पूर्व की शांति और स्थिरता को बिगाड़ने वाला कदम है। इस जघन्य अपराध में शामिल लोगों को बख्शा नहीं जाएगा।

मेघालय के मुख्यमंत्री और एनपीपी के प्रमुख कॉनराड संगमा ने इस हमले पर गहरा दुख जताते हुए ट्वीट किया है कि गृह मंत्री और प्रधानमंत्री को हमला करने वालों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करनी चाहिए।

अबो इस बार एनपीपी से विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे। इससे पहले वह कांग्रेस से विधायक चुने गए थे। भारत के केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी हमले की निंदा की है और हमलावरों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्यवाही का भरोसा जताया है।

नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ़्यू रियो ने भी इस हमले की निंदा की है।

असम पुलिस भी इस हमले की निंदा कर चुकी है। अपने ट्विटर हैंडल पर असम पुलिस ने लिखा है कि अरुणाचल प्रदेश में हुए हमले में अपनी जान गंवाने वाले तिरोंग अबो सहित अन्य सुरक्षा बल के जवानों को श्रद्धांजलि।

ईवीएम : चुनाव आयोग से विपक्षी दल मिले, प्रणब मुखर्जी ने भी चिंता जताई

भारत में 23 मई को घोषित होने वाले लोकसभा चुनावों के नतीजों से ठीक दो दिन पहले, मंगलवार को 22 विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने चुनाव आयोग के सदस्यों से मिलकर उन्हें ईवीएम मशीनों से जुड़ी अपनी शिकायतों से अवगत कराया।

चुनाव आयोग के सदस्यों से मुलाक़ात के बाद मीडिया से बात करते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने बताया कि सभी विपक्षी पार्टियों ने मिलकर ईवीएम मशीनों से हो रही छेड़छाड़ की ख़बरों को लेकर अपनी चिंता चुनाव आयोग के सामने रखी।

उन्होंने आगे कहा कि इस मुलाक़ात के दौरान सभी विपक्षी पार्टियों के 23 मई को वोटों की गिनती के साथ-साथ वोटर वैरिफ़ाइड पेपर ट्रेल (वीवीपैट) स्लिप का मिलान करने की माँग भी रखी।

ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कहा, ''हमारी दो मोटी मांगे थीं। एक तो हर लोकसभा क्षेत्र में पाँच रैंडम पोलिंग बूथ चुनकर उन पर ईवीएम मशीनों के साथ-साथ वीवीपैट स्लिपों को भी गिना जाना चाहिए। यह सबसे पहले होना चाहिए और अगर किसी एक बूथ के वीवीपैट में कोई भी ग़लती निकल आए तो उस लोक सभा क्षेत्र की पूरी काउंटिंग दोबारा की जानी चाहिए।''

चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया के बारे में बात करते हुए उन्होंने आगे जोड़ते हुए कहा, ''चुनाव आयोग ने कहा कि वह इस मामले में एक बैठक करेंगे और फिर अंतिम निर्णय लेंगे। आयोग ने हमारे सुझावों और चिंताओं को खुले दिमाग़ से सुना और इस बारे में निर्णय लेने का आश्वासन भी दिया।''

वहीं कांग्रेस के ही एक और नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा कि विपक्षी दल यह मुद्दे को बीते डेढ़ महीने से उठा रहे हैं, लेकिन चुनाव आयोग ने उनकी आपत्तियों को नज़रअंदाज़ किया।

ईवीएम से कथित छेड़छाड़ की ख़बरों के बीच पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने चुनाव आयोग से उसकी संस्थागत विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की अपील की है।

प्रणब मुखर्जी ने ट्विटर पर एक बयान ज़ारी कर कहा है कि वे ईवीएम की सुरक्षा को लेकर आ रही ख़बरों को लेकर चिंतित हैं।

उन्होंने कहा, ''चुनाव आयोग की कस्टडी में जो ईवीएम हैं, उनकी सुरक्षा आयोग की ज़िम्मेदारी है। लोकतंत्र को चुनौती देने वाली अटकलों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। जनता का फैसला सबसे ऊपर है और इसे लेकर ज़रा सा भी संदेह नहीं होना चाहिए।''

प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि वे देश के संस्थानों पर विश्वास करते हैं। उन्होंने लिखा है, ''कोई संस्था कैसे काम करती है, यह फैसला वहां काम करने वालों का होता है। इस मामले में संस्थागत विश्वसनीयता को सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर है। उन्हें ऐसा करना चाहिए और इस तरह की सारी अटकलों पर विराम लगाना चाहिए।''

चुनावी नतीजों के बाद ग़ैर एनडीए सरकार बनाने की संभावनाएं तलाशने के लिए तमाम विपक्षी पार्टियां एकजुट हुई थीं।

बैठक में कांग्रेस के अहमद पटेल, ग़ुलाम नबी आज़ाद और अशोक गहलोत के साथ-साथ तेलुगूदेसम पार्टी के चंद्रबाबू नायडू, बहुजन समाजवादी पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा, सीपीआई (एम) के सीताराम येचुरी, सीपीआई के डी राजा, आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, तृणमूल कांग्रेस के डेरिक ऑब्राइन, समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव, डीएमके की कनिमोझी, राष्ट्रीय जनता दल के मनोज झा, भारतीय कांग्रेस पार्टी के मजीद मेमन, नेशनल कॉन्फ्रेंस के देविंदर राणा शामिल थे।

वहीं ईवीएम मशीनों से हुई छेड़छाड़ की ख़बरों को बेबुनियाद बताते हुए चुनाव आयोग ने कहा कि चुनाव के दौरान इस्तेमाल हुई इवीएम मशीनों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गयी है।

लोक सभा चुनाव 2019 : एग्जिट पोल पर भरोसा करना मुश्किल

भारत में विभिन्न सर्वेक्षण कंपनियों और न्यूज़ चैनल्स की ओर से कराए गए एग्ज़िट पोल में एनडीए सरकार की वापसी का रास्ता साफ़ दिखाया जा रहा है, लेकिन विपक्षी पार्टियों के अलावा राजनीतिक विश्लेषकों को भी ये विश्लेषण वास्तविकता से परे नज़र आ रहे हैं।

जानकारों के मुताबिक़, पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों और लोकसभा चुनावों के एग्ज़िट पोल भी वास्तविकता से काफ़ी दूर रहे हैं इसलिए इस बार ये कितने सही होंगे, इस पर विश्वास करना मुश्किल है।

लखनऊ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के राजनीतिक संपादक सुभाष मिश्र कहते हैं कि ज़मीन पर जो भी रुझान देखने को मिले हैं उन्हें देखते हुए सीटों की ये संख्या क़तई वास्तविक नहीं लग रही है।

वो कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में जिस तरीक़े की जातीय और क्षेत्रीय विविधता है, मतदान के तरीक़ों और रुझानों में जितनी विषमता है, उनके आधार पर इस तरह से सीटों का सही अनुमान लगाना बड़ा मुश्किल होता है। ज़्यादातर एग्ज़िट पोल बीजेपी के पक्ष में एकतरफ़ा नतीजा दिखा रहे हैं, जो संभव नहीं लगता है। जितना मैंने यूपी में ज़मीन पर देखा और समझा है, उसके अनुसार कह सकता हूँ कि गठबंधन अच्छा करेगा।''

हालांकि कुछ एग्ज़िट में सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को उत्तर प्रदेश में काफ़ी आगे दिखाया गया है, लेकिन ज़्यादातर में या तो बीजेपी के साथ उसका कड़ा संघर्ष देखने को मिल रहा है या फिर बीजेपी को काफ़ी आगे दिखाया जा रहा है।

सुभाष मिश्र कहते हैं कि हाल ही में तीन राज्यों में जो चुनाव हुए थे, ज़्यादातर एग्ज़िट पोल वहां भी सही नहीं निकले, इसलिए बहुत ज़्यादा भरोसा करना ठीक नहीं है।

यही नहीं, ज़्यादातर विश्लेषक ख़ुद एग्ज़िट पोल्स के बीच आ रही विविधता की वजह को भी इनकी प्रक्रिया और इनके परिणाम पर संदेह का कारण मानते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा अब तक कई चुनावों को कवर कर चुकी हैं। वो कहती हैं, ''एग्ज़िट पोल शुरू में जो आते थे, वो सत्यता के काफ़ी क़रीब होते थे। उसकी वजह ये थी कि उनमें उन प्रक्रियाओं का काफ़ी हद तक पालन किया जाता था जो कि सेफ़ोलॉजी में अपनाई जाती हैं। अब यदि इनके परिणाम सही नहीं आ रहे हैं तो उसकी एक बड़ी वजह ये है कि ज़्यादातर एग्ज़िट प्रायोजित होते हैं और ऐसी स्थिति में सही परिणाम आने की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।''

अमिता वर्मा भी ये मानती हैं कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें जो भी देखने को मिला है वो इन एग्ज़िट पोल्स में नहीं दिख रहा है।

वो कहती हैं, ''उत्तर प्रदेश में जिस तरह से सपा और बसपा के बीच वोट ट्रांसफ़र हुए हैं, उन्हें देखते हुए गठबंधन काफ़ी मज़बूत रहा है। हां, ये भी सही है कि बीजेपी को जिस तरह से काफ़ी बड़े नुक़सान की बात की जा रही थी, वैसा नहीं होगा। लेकिन एग्ज़िट पोल पर भरोसा करना थोड़ा मुश्किल हो रहा है।''

वहीं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण शुक्ल यूपी में बीजेपी के पक्ष में माहौल को देखने के बावजूद एग्ज़िट पोल्स पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

उनका कहना हैं, ''2017 के विधानसभा चुनाव को ही देख लीजिए। किसी ने नहीं कहा था कि बीजेपी इतने बड़े बहुमत से जीतेगी। हालांकि ज़मीन पर बीजेपी के पक्ष में काफ़ी माहौल था, लेकिन चुनाव पूर्व सर्वेक्षण इतनी सीटें तब क्यों नहीं देख पाए। इन सर्वेक्षणों के अनुमान तमाम लोगों के व्यक्तिगत अनुमानों से ज़्यादा अलग नहीं दिखते हैं। दरअसल, इन सर्वेक्षणों में जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, वो ज़मीनी हक़ीक़त को नहीं पहचान पाती। उत्तर प्रदेश का मतदाता काफ़ी परिपक्व है। वो इतनी जल्दी अपने रुझान को किसी के सामने स्पष्ट नहीं कर देता। और इस बार के चुनाव में तो ये बात ख़ासतौर पर देखने को मिली हैं।''

दरअसल, ज़मीनी स्तर पर चुनावी प्रक्रिया को कवर करने वाले ऐसे तमाम पत्रकार हैं जिनकी चुनाव परिणामों पर अपनी अलग-अलग राय है, लेकिन ये लोग भी एग्ज़िट पोल्स पर बहुत भरोसा नहीं कर पा रहे हैं।

श्रवण शुक्ल कहते हैं कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में ही कितना अंतर है, जो ये बताने के लिए पर्याप्त है कि किसी एक सर्वमान्य प्रक्रिया का पालन इसमें नहीं किया जाता है।

श्रवण शुक्ल साफ़ कहते हैं कि एग्ज़िट पोल्स के नतीजों को यूपी के संदर्भ में बिल्कुल नहीं माना जा सकता।

वो कहते हैं, ''ये पूरा खेल सिर्फ़ चैनलों की टीआरपी का है, इसके अलावा कुछ नहीं। 2007, 2012 और फिर 2017 के विधानसभा चुनाव में जिस तरह से पूर्ण बहुमत वाली सरकारें बनी हैं, उसने सभी चुनावी सर्वेक्षणों को ख़ारिज किया है। यहां तक कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भी। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि चुनावी सर्वेक्षणों के नतीजों पर बहुत भरोसा किया जाए।''

बहरहाल, सोशल मीडिया पर भी इन सर्वेक्षणों की जमकर चर्चा हो रही है और लोग अपनी तरह से मूल्यांकन कर रहे हैं। साथ में ये सलाह भी दी जा रही है कि वास्तविक परिणाम आने में अब दो दिन ही तो बचे हैं।

लाइव : कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस मुख्यालय में मीडिया को संबोधित किया

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लाइव : कांग्रेस मुख्यालय में रणदीप सिंह सुरजेवाला द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

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लाइव : कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हिमाचल प्रदेश के सोलन में जनसभा को संबोधित किया

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अभिषेक मनु सिंघवी ने चुनाव आयोग से मुलाकात के बाद मीडिया को संबोधित किया

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गोडसे पर भाजपा की प्रज्ञा ठाकुर की टिप्पणी पर रणदीप सिंह सुरजेवाला द्वारा एआईसीसी प्रेस वार्ता

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पटना, बिहार में जनसभा को संबोधित किया

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