भारत

राधिका-प्रणय पर कार्रवाई मीडिया को चेतावनी!

समाचार समूह एनडीटीवी ने अपने संस्थापकों राधिका और प्रणय रॉय के देश से बाहर यात्रा करने पर लगाई गई रोक को 'बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन' बताते हुए इसकी आलोचना की है। एक बयान में इसे 'मीडिया को चेतावनी' बताया गया है।

एनडीटीवी ने अपनी वेबसाइट पर जारी एक बयान में दावा किया है कि राधिका और प्रणय रॉय को भ्रष्टाचार के 'एक फ़र्ज़ी और बेबुनियाद मामले को आधार बनाकर' रोका गया।

ये भी बताया गया है कि ये मामला सीबीआई ने दो साल पहले दर्ज किया था और इस मामले को रॉय दंपति की कंपनी ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जहां ये दो साल से लंबित है।

दो साल पहले सीबीआई ने दिल्ली और देहरादून में एनडीटीवी के संस्थापक प्रणय रॉय के ख़िलाफ़ छापे की कार्रवाई भी की थी।

तब बताया गया था कि ये कार्रवाई एक निजी बैंक को कथित तौर पर नुकसान पहुंचाने के मामले में की गई है।

एनडीटीवी ने इस मामले में जारी बयान में कहा कि अधिकारियों ने कार्रवाई के बारे में कोर्ट और रॉय दंपति मे से किसी को जानकारी नहीं दी।

एनडीटीवी ने कहा है, "ये कार्रवाई मीडिया को एक चेतावनी है कि वो उनके पीछे चलें या नतीजा भुगतें।''

समाचार समूह के मुताबिक, राधिका और प्रणय रॉय एक सप्ताह के लिए देश से बाहर जा रहे थे। उनकी वापसी 15 अगस्त को होनी थी।  एनडीटीवी ने दावा किया है कि ये दोनों पहले भी देश के बाहर आते जाते रहे हैं।

"ऐसे में ये संकेत देना हास्यास्पद है कि उनका बाहर जाना ख़तरनाक हो सकता है।''

इस बारे में सरकार या अधिकारियों की ओर से कोई बयान सामने नहीं आया है।

क्या जम्मू-कश्मीर विकास के मोर्चे पर वाक़ई पिछड़ा है?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार शाम राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कि जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर को विकास से वंचित रखा गया है। इससे पहले सोमवार को राज्यसभा में विशेष दर्जा देने वाले प्रावधान को ख़त्म करने की घोषणा करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने भी यही दलील दी थी।

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के सरकार के फ़ैसले से राज्य में विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति बहाल करने में मदद मिलेगी।

लेकिन क्या वाक़ई जम्मू-कश्मीर स्वास्थ्य सेवाओं, विकास और शिक्षा के मामले में भारत के दूसरे राज्यों की तुलना में पिछड़ा हुआ है?

हमने भारत के अन्य राज्यों की तुलना करने के लिए कुछ संकेतकों को खंगाला।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के मुताबिक़, इन सभी संकेतकों में केरल सर्वश्रेष्ठ राज्य है।

यहां 6 साल और उससे अधिक उम्र की 95.4 फ़ीसदी महिलाओं ने स्कूली शिक्षा प्राप्त की है।

इसकी तुलना में, बिहार में इस वर्ग में केवल 56 फ़ीसदी महिलाएं ऐसी हैं जो कभी स्कूल गई हैं।

इस मामले में जम्मू-कश्मीर कहां है?

जम्मू-कश्मीर में इस वर्ग की महिलाओं की स्थिति बिहार (56.9%), उत्तर प्रदेश (63%) और आंध्र प्रदेश (62%) के मुक़ाबले कहीं बेहतर है। यहां इस वर्ग की 65.6 फ़ीसदी महिलाओं ने स्कूली शिक्षा ली है।

इसी तरह, कई भारतीय राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर में लिंगानुपात भी बेहतर है। जम्मू-कश्मीर में प्रति 1,000 पुरुषों पर 972 महिलाएं हैं। जबकि दिल्ली (854), उत्तर प्रदेश (912), बिहार (918), गुजरात (919) और महाराष्ट्र (952) जैसे राज्यों में लिंगानुपात जम्मू-कश्मीर से कहीं कम है।

जम्मू-कश्मीर अन्य संकेतकों जैसे घरों में बिजली की उपलब्धता के मामले में बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से भी आगे है।

वहीं जम्मू-कश्मीर में बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र की तुलना में कहीं बेहतर सफ़ाई सुविधाओं का इस्तेमाल किया जाता है।

जम्मू-कश्मीर उन कुछ राज्यों में से है जहां शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। सर्वे यह भी बताता है कि राज्य में मृत्यु दर बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और गुजरात की तुलना में कम है।

बात जब टीकाकरण की आती है तो, यहां 12-23 महीने की आयु वर्ग के 75 फ़ीसदी बच्चों का पूरी तरह टीकाकरण होता है। जबकि गुजरात में यह दर 50 फ़ीसदी है।

अनुच्छेद 370 पर कौन देश हैं भारत के साथ और कौन देश हैं ख़िलाफ़

भारत ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करते हुए राज्य का पुनर्गठन किया है।

अब जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम के दो अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए हैं। इसके साथ ही सात दशक पुराना कश्मीर का मसला एक बार फिर पूरी दुनिया में चर्चा के केंद्र में आ गया है।

भारत के क़दम की सबसे कड़ी प्रतिक्रिया आई पाकिस्तान की ओर से जिसने इसे 'अवैध' क़दम बताते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मामला उठाने की बात कही है।

पाकिस्तान ने भारत के साथ राजनयिक संबंध निलंबित करते हुए द्विपक्षीय व्यापार रोकने जैसे क़दम उठाए हैं। उधर चीन ने भी इस हालात पर चिंता जताई है।

इस्लामिक सहयोग संगठन ने भी इस मामले में पाकिस्तान की अपील के बाद चिंता जताते हुए भारत के क़दम की निंदा की है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए हर मंच पर इस मामले को उठाने और दुनिया के अन्य देशों को अपने पक्ष में करने की हर संभव कोशिश करने की बात कही है।

भारत के पड़ोसी श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने भारत के क़दम को उसका आंतरिक मामला बताया है। उन्होंने ट्वीट करके कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इससे लद्दाख का विकास होगा।

उन्होंने लिखा, "पता चला है कि लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बनने जा रहा है। 70 प्रतिशत से अधिक बौद्ध आबादी वाला लद्दाख भारत का पहला बौद्ध बहुल राज्य होगा। लद्दाख का गठन और इसके लिए होने वाला पुनर्गठन भारत का आंतरिक मामला है।''

बांग्लादेश ने कहा है कि अनुच्छेद 370 को हटाना भारत का आंतरिक मामला है, ऐसे में उसके पास किसी और के अंदरूनी मामलों पर बोलने का अधिकार नहीं है।

वहीं मालदीव ने भी इसे भारत का अंदरूनी मामला बताया है। मालदीव सरकार के बयान के अनुसार, सभी संप्रभु राष्ट्रों को ज़रूरत के अनुसार अपने क़ानून बदलने का अधिकार है।

कुछ देशों ने भारत के क़दम की आलोचना की है तो कुछ ने सुझाव दिया है कि दोनों देशों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए।

भारत जम्मू-कश्मीर को लेकर किए बदलाव को अपना आंतरिक मामला बताता है, जबकि पाकिस्तान इसे संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का उल्लंघन मानता है। ऐसे में यूएनएससी के रेजॉल्यूशंस को मानने की सलाह देने वाले बयानों को पाकिस्तान की ओर झुकाव भरा माना जा रहा है।

चीन ने गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि भारत ने यथास्थिति में एकतरफ़ा बदलाव किया है जो इस क्षेत्र में तनाव को इतना बढ़ा सकता है कि चीन भारत के आंतरिक मामलों में दख़ल देने लगे।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, "चीन अपनी पश्चिमी सीमा के इलाक़े को भारत के प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल किए जाने का हमेशा ही विरोध करता रहा है।''

यह समझना आसान है कि चीन ने यह बात क्यों दोहराई। मगर चीन की चिंताएं उसके इस कथन से प्रकट होती हैं- "हाल ही में भारत ने अपने एकतरफ़ा क़ानून बदलकर चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को कम आंकना जारी रखा है। यह अस्वीकार्य है और यह प्रभाव में नहीं आएगा।''

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन से फ़ोन पर बात की थी और दावा किया था कि तुर्की इस मामले में पाकिस्तान के साथ है।

बाद में अर्दोआन ने कहा था कि मंगलवार को उनकी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से "सफल" बातचीत हुई थी। उन्होंने यह भी कहा था कि वह क्षेत्र से तनाव कम करने के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संपर्क करेंगे।

ऐसा ही बयान मलेशिया की ओर से भी आया है। प्रधानमंत्री महातीर बिन मोहम्मद के कार्यालय की ओर से बयान जारी करके कहा गया है कि उनकी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से बात हुई थी।

बयान में कहा गया है, "मलेशिया चाहता है कि इस मामले के सभी पक्ष संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का पालन करें ताकि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और शांति बनी रहे।''

भारत और पाकिस्तान दोनों को अपना सहयोगी बताते हुए मलेशिया ने उम्मीद जताई है कि दोनों संवाद के माध्यम से इस पुराने मसले को हल करें।

ताज़ा विवाद पर कई देशों का रुख़ और प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हो पाई है जिनमें नेपाल, भूटान, अफ़ग़ानिस्तान, म्यांमार, जापान, रूस और इसराइल शामिल हैं। मगर कुछ देश ऐसे हैं, जिन्होंने संतुलित प्रतिक्रिया दी है।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अब्बास मौसावी ने कहा कि ईरान ने भारत और पाकिस्तान दोनों के पक्षों को सुना है। वह चाहते हैं कि वे लोगों के हितों की रक्षा और शांति के लिए आपस में संवाद करें।

ब्रितानी विदेश मंत्री डोमिनिक रॉब ने कहा है कि उन्होंने भारतीय विदेश मंत्री से कश्मीर के हालात पर चर्चा की और ब्रिटेन की गहरी चिंताएं ज़ाहिर कीं।

उन्होंने कहा, "मैंने भारतीय विदेश मंत्री से बात की है। हमने स्थिति को लेकर अपनी कुछ चिंताएं ज़ाहिर की हैं और शांति की अपील की है। लेकिन हमने भारत के नज़रिए से स्थिति को भी समझा है।''

संयुक्त अरब अमीरात ने भी सधी हुई प्रतिक्रिया दी है और हालात पर गहरी चिंता जताई है। यूएई की ओर से दोनों पक्षों से धैर्य और संयम बरतने की अपील की गई है।

विदेश मंत्री डॉक्टर अनवर बिन मोहम्मद गारगश की ओऱ से जारी बयान में कहा गया है, "शांति बनाए रकने के लिए दोनों पक्षों को वार्ता का सहारा लेना चाहिए।''

सऊदी अरब की ओर से आधिकारिक बयान नहीं आया है, मगर सऊदी अख़बारों ने आधिकारिक सूत्रों के हवाले से लिखा है कि सऊदी अरब मसले का समाधान शांतिपूर्ण ढंग से चाहता है।

जम्मू-कश्मीर पर चीन की प्रतिक्रिया को नज़रअंदाज नहीं करे भारत

जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के भारत सरकार के क़दम को लेकर कई हलकों से बहुत गंभीर प्रतिक्रियाएं आई हैं।

सबसे अहम प्रतिक्रिया भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन से आई, जो जम्मू-कश्मीर प्रांत के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण रखते हैं। भारत इन हिस्सों पर अपना दावा करता है।

इसे याद रखना महत्वपूर्ण है कि ये दोनों ही पड़ोसी मुल्क परमाणु शक्ति संपन्न हैं और इनके बीच आपसी ताल्लुकात भी विशेष हैं। ये दोनों भारत के साथ युद्ध भी लड़ चुके हैं।

सीमा विवाद और अन्य तनावों के कारण इन दोनों देशों के साथ भारत के संबंध लंबे वक़्त से प्रतिकूल रहे हैं।

यह पृष्ठभूमि ही इतना बताने के लिए काफ़ी है कि आख़िर क्यों पाकिस्तानी नेतृत्व ने पहले तो अपने कमांडरों और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के साथ गहन विचार-विमर्श किया और फिर अपनी संसद का संयुक्त सत्र बुलाया।

संसद में यह प्रस्ताव रखा गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से भारत की ओर से उठाए गए क़दम पर आपातकालीन सत्र बुलाने का आग्रह किया जाए।

पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा ने कश्मीरियों की मदद के लिए सेना के 'किसी भी हद तक जाने' के लिए तैयार होने की बात कही है।

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारत के इस फ़ैसले पर दो तरह की संभावनाओं की ओर इशारा किया। उन्होंने दोबारा 'पुलवामा' जैसे आत्मघाती हमले और भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध की बात की।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की दूसरी बैठक के बाद पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर कुछ नीतिगत फै़सलों का ऐलान किया- उच्चायुक्तों को वापस बुलाना, द्विपक्षीय व्यापार रोकना और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर नए सिरे से विचार करना।

अगर चीन के साथ उसके अहम रिश्ते को केंद्र में रखकर देखें तो पाकिस्तान की ये प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं। विशेषज्ञ पाकिस्तान को चीन के संरक्षण में रहते हुए उसी की भाषा बोलने वाला बताते हैं।

जैसा कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान होता आया है, इस बार भी चीन की प्रतिक्रिया ने ही पाकिस्तान का रुख़ तय किया।

भारत के मामले में चीन छद्म रूप से पाकिस्तान का इस्तेमाल करता आया है, जबकि ख़ुद हमेशा नपे-तुले क़दम चलता है। ऐसे में चीन की प्रतिक्रिया, जिसके गहरे मायने हैं, उसका गंभीर विश्लेषण और व्याख्या करने की ज़रूरत है।

सबसे पहले तो वैश्विक स्तर पर चीन आज एक बड़ा कद्दावर देश है जहां उसका एक छोटा से छोटा क़दम भी काफी वज़नदार लगता है। ख़ासकर बात जब एशियाई मामलों की आती है तो निश्चित तौर पर यहां वह हर मामले में सबसे बड़े देश के रूप में अपनी पहचान रखता है।

हाल के दिनों में दुनिया ने चीन की विस्तारवादी नीतियों को देखा है। अमरीका और उसके मित्र देश चीन की इन विस्तारवादी नीतियों का विरोध करते हैं।

जम्मू-कश्मीर प्रांत के अक्साई चिन के 38,000 वर्ग किलोमीटर और शक्सगाम घाटी के 5,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाक़े पर चीन का नियंत्रण है।

जम्मू-कश्मीर के इस पुनर्गठन के बाद आई चीन की प्रतिक्रिया ने दोनों देशों के बीच पहले से चले आ रहे सीमा विवाद को एक बार फिर उभार दिया है।

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, "चीन अपनी पश्चिमी सीमा के इलाक़े को भारत के प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल किए जाने का हमेशा ही विरोध करता रहा है।''

यह समझना आसान है कि चीन ने यह बात क्यों दोहराई। मगर चीन की चिंताएं उसके इस कथन से प्रकट होती हैं- "हाल ही में भारत ने अपने एकतरफ़ा क़ानून बदलकर चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को कम आंकना जारी रखा है। यह अस्वीकार्य है और यह प्रभाव में नहीं आएगा।''

ज़ाहिर है, अचानक इस तरह का बयान आया तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इसे 'भारत का आंतरिक मामला' बताते हुए कहा कि 'भारत अन्य देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता और उम्मीद करता है कि दूसरे देश भी ऐसा ही करेंगे।'

दूसरा, चीन हमेशा की तरह भारत-पाकिस्तान तनाव पर ध्यान केंद्रित करते एक बार फिर ख़ुद को थर्ड अंपायर की तरह पेश करने का मौक़ा तलाश रहा है।

अपने लिखित जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, "संबंधित पक्षों को संयम और एहतियात बरतते हुए विवेकपूर्ण तरीक़े से कार्य करने की आवश्यकता है। उन्हें ऐसे कार्य करने से बचना चाहिए जो एकतरफ़ा रूप से यथास्थिति को बदलकर तनाव बढ़ा सकते हैं। हम दोनों पक्षों से संबंधित विवाद पर संवाद और परामर्श के ज़रिए शांतिपूर्वक हल करने और क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बनाए रखने का आग्रह करते हैं।''

चीन की ये प्रतिक्रिया निश्चित ही शिमला समझौते की भावनाओं और लगातार दी गई भारत की उस सफ़ाई के ख़िलाफ़ जाती है कि भारत-पाकिस्तान तनाव में चीन मध्यस्थ या किसी और तरह की कोई भूमिका नहीं चाहता।

यही नहीं, यह चीन के मसले पर समय-समय पर चीनी नेताओं की ओर से दिए गए नीति आधारित बयानों के भी ख़िलाफ़ है। चीन के विदेश मंत्री छिएँन छीचेन के 1989 में नेपाल में दिए बयान से लेकर राष्ट्रपति चियांग चेमिन के 1996 में पाकिस्तानी सेनट में दिए भाषण का ही नतीजा था कि उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के कश्मीर के मुद्दे को सुरक्षा परिषद में उठाने से दो टूक मना कर दिया था।

कारगिल युद्ध वह दौर था जब भारत-पाकिस्तान तनाव को लेकर चीन की तटस्थता का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण देखने को मिला था। लेकिन 2019 में ऐसा नहीं होगा।

तीसरा, जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन को भारत-पाकिस्तान के बीच का मुद्दा बताने के पीछे चीन की मंशा यह है कि वह बताना चाहता है कि यह भारत का आंतरिक मामला नहीं है।

हाल ही में जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की भूमिका निभाने को कहा है, तब चीन ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि कश्मीर विवाद के निपटारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक रचनात्मक किरदार निभा सकता है।

इसे पाकिस्तान के साथ उसके विशेष रिश्ते और जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से पर उसके कब्ज़े को देखते हुए गंभीरता से लेना चाहिए।

चौथा, चीन ने इस पर अपनी गंभीर चिंता जताई है कि भारत ने यथास्थिति में एकतरफ़ा बदलाव किया है जो इस क्षेत्र में तनाव को इतना बढ़ा सकता है कि चीन भारत के आंतरिक मामलों में दख़ल देने लगे। अब भारत को चीन से सतर्क रहने की जरूरत है।

मार्च 1963 में चीन-पाकिस्तान के बीच हुए सीमा समझौते में पाकिस्तान ने अपने कब्ज़े वाली शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी थी।

उसी समझौते के अनुच्छेद-6 में यह लिखा गया है कि "पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर विवाद के निपटारे के बाद, सीमा को लेकर संप्रभुता की वार्ता पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार के साथ फिर शुरू होगी।''

क्या इसका यह मतलब नहीं निकलता कि चीन को तब तक शांत रहना चाहिए जब तक कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर पर द्विपक्षीय समाधान नहीं कर लेते?

बौद्ध बहुल लद्दाख को नया केंद्र शासित प्रदेश बनाने के भारत के फ़ैसले से भी चीन हैरान दिख रहा है, जिसकी सीमा तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र से लगी हुई है।

अब यह इलाक़ा सीधे भारत की केंद्र सरकार के अधीन हो रहा है जहां दलाई लामा समेत सैकड़ों की संख्या में तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं।

इसी कारण से नई दिल्ली में चीन के राजदूत याओ जिंग ने भारतीय मीडिया से कहा कि कश्मीर "अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र है" और सुरक्षा परिषद का स्थानीय सदस्य होने के नाते उसकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करे।''

भारत के जल संकट के अंदर: सूखे और सूखे नलों के साथ संघर्ष

इस साल भारत के बड़े हिस्से में दशकों में सबसे ज्यादा सूखा पड़ा है।

मानसून, जो आमतौर पर कुछ राहत प्रदान करता है, को हफ्तों देर हो गई थी और जब यह अंत में आया, तो यह एक बार फिर से कम हो गया था, उम्मीद से कम बारिश हुई।

हाल के वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि के बावजूद, यह दुनिया के सबसे असमान समाजों में से एक बना हुआ है। और यह कि असमानता को लोगों की जीवन की सबसे बुनियादी आवश्यकता जल तक पहुंच में देखा जा सकता है।

एक सरकारी रिपोर्ट में पाया गया कि 600 मिलियन भारतीय - लगभग आधी आबादी - तीव्र पानी की कमी का सामना कर रहे हैं।

जबकि लग्जरी होटलों में स्विमिंग पूल भरे हुए हैं, तीन चौथाई आबादी के घरों में पीने का पानी नहीं है।

सूखे के प्रभाव ग्रामीण भारत में सबसे स्पष्ट रूप से देखे जाते हैं। पिछले 25 वर्षों में लगभग 300,000 भारतीय किसानों ने खुद को मार लिया है, और कई लोगों ने बुजुर्गों को पीछे छोड़ते हुए काम की तलाश में शहरों में जाने के लिए अपनी फसलें उजाड़ दी हैं।

महाराष्ट्र राज्य सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से एक है।

वहां के ग्रामीण कभी-कभी पानी के ट्रक ले जाने वाले सरकारी टैंकरों का इंतजार करते हैं, जहां उनकी सख्त जरूरत होती है। लेकिन ट्रक केवल एक व्यक्ति को प्रति दिन लगभग 20 लीटर प्रदान करते हैं, जो लोग पीने, खाना पकाने, स्नान और घर के काम सहित सभी चीजों के लिए राशन लेते हैं।

अहीर वाडगांव गाँव की एक स्कूल टीचर सीताबाई गायकवाड़ कहती हैं, "पानी की स्थिति के कारण जीवन बहुत कठिन है।" "जब टैंकर आता है तो हमारे पास पानी होता है। जो लोग टैंकर में पाइप डालने का प्रबंध नहीं कर सकते हैं, उनके पास उस दिन पानी नहीं होता है।"

वह कहती हैं, "बूढ़े लोग पानी का प्रबंध नहीं करते। पानी की स्थिति के कारण हर कोई अपने बारे में चिंतित है।"

महाराष्ट्र में, प्रतिदिन 15,000 गाँवों में 6,000 से अधिक टैंकर पानी की आपूर्ति करते हैं - इनमें से 1,000 सरकारी टैंकर हैं जो मुफ्त में पानी प्रदान करते हैं।

अन्य निजी ऑपरेटर हैं जो लोगों और व्यवसायों को पानी बेचते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सूखे के बाद से उनसे पानी खरीदने की लागत बढ़ गई है।

गायकवाड़ कहती हैं, "लोग अपने वित्त के अनुसार पानी खरीदते हैं।" "कुछ इसे खरीदते हैं, लेकिन यह मुश्किल है क्योंकि इसकी कीमत हमें एक महीने के लिए 900 रुपये (13 डॉलर) है।"

"जब हमारे पास खुद को खिलाने के लिए पैसा नहीं है, जब हमारे पास भोजन और पानी नहीं है, तो हम पानी के लिए इतना भुगतान कैसे कर सकते हैं?" उसने पूछा।

हालांकि सरकारी टैंकर हर दिन पानी देने के लिए होते हैं, लेकिन ग्रामीणों की शिकायत है कि ऐसा हमेशा नहीं होता है। पानी की निगरानी और निगरानी के लिए सभी सरकारी ट्रकों पर जीपीएस ट्रैकिंग डिवाइस लगाए गए हैं।

इस बीच, महाराष्ट्र भर में, कई किसान पानी की कमी के कारण अपनी जमीन और गांवों को छोड़ रहे हैं, जो इन कृषक समुदायों में अक्सर काम की कमी का मतलब है।

पांडुरम मोर, एक मजदूर, अपने 40,000 वर्ग मीटर कपास के खेत को औरंगाबाद शहर में स्थानांतरित होने के लिए छोड़ दिया।

"कोई काम नहीं है, इसलिए मुझे यहां से पलायन करना पड़ा और इस छोटे से कमरे में रहना पड़ा," वे कहते हैं। "बारिश नहीं है, इसलिए भूमि का कोई फायदा नहीं है। हम कुछ भी नहीं उगा सकते हैं।"

आम लोगों के जीवन पर पड़ने वाले सूखे के प्रभाव को देखने के लिए भारत के महाराष्ट्र राज्य में गए।

जयराम रमेश की टिप्पणी | आधार और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2019

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अभिषेक मनु सिंघवी की टिप्पणी | आधार और अन्य कानून संशोधन विधेयक, 2019

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केंद्रीय बजट 2019 पर लोकसभा में शशि थरूर का भाषण

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