नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के बीच पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने एनपीआर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) के अपडेशन का काम रोक दिया है।
इस बाबत ममता सरकार ने सभी ज़िलाधिकारियों को निर्देश भेज दिए हैं।
सोमवार को जारी इस आदेश को जनहित में लिया गया फ़ैसला बताया गया है।
ममता पहले यह लगातार कहती रही हैं कि वो अपने राज्य में एनआरसी और नागरिकता संशोधन क़ानून लागू नहीं होने देंगी, लेकिन एनपीआर को लेकर उहापोह की स्थिति में थी।
एनआरसी का विरोध और एनपीआर का समर्थन करने के कारण बीजेपी को छोड़कर विपक्षी पार्टियां ममता बनर्जी की खिंचाई करती रही हैं।
अब ममता के नए फ़ैसले का सीपीएम ने स्वागत किया है।
वहीं बीजेपी का कहना है कि एनपीआर का काम राष्ट्रीय जनगणना अधिनियम के तहत हो रहा था लिहाजा ममता बनर्जी का फ़ैसला असंवैधानिक है।
एनपीआर पर अस्थायी रोक की वजह क्या है? ममता बनर्जी एनआरसी के ख़िलाफ़ हैं। बंगाल में अल्पसंख्यक बड़ा वोट बैंक है और वे निर्णायक स्थिति में हैं। तीन दशकों से भी अधिक समय तक ये वोट बैंक वामदल के साथ था। 2011 में जब ममता सत्ता में आईं तो ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों के साथ उन्हें अल्पसंख्यक वोट बैंक का भी समर्थन मिला और बंगाल में ये लगभग 30 फ़ीसदी हैं।
असम में एनआरसी की लिस्ट जब आई और उसमें क़रीब 19 लाख लोग बाहर रहे तो उसका असर बंगाल पर भी पड़ा। ममता तब से एनआरसी का मुखर विरोध करती रही हैं।
घुसपैठ की समस्या असम से ज़्यादा बंगाल में है। इसकी लंबी सीमा बांग्लादेश के साथ सटी हुई है। विभाजन के बाद से ही हिन्दू बंगाली यहां आते रहे हैं। 1971 में बांग्लादेश के गठन के साथ ही वहां से बड़ी संख्या में हिन्दू बंगाली यहां आए।
सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने कहा कि राज्य में विरोध प्रदर्शन और हिंसा हो रही है उसको देखते हुए सरकार ने अस्थायी तौर पर यह फ़ैसला किया है ताकि लोगों में और डर न फैले।
बंगाल सरकार के इस फ़ैसले से उपजी स्थिति के मद्देनज़र चलिए जानते हैं कि क्या है एनपीआर, एनआरसी और जनगणना और ये एक-दूसरे से कैसे अलग हैं?
आखिर जनगणना क्यों करवाई जाती है? दरअसल, देश के प्रत्येक नागरिक की सामाजिक, आर्थिक स्थिति का आकलन करने और इसके आधार पर किसी क्षेत्र विशेष में विकास कार्यों को लेकर सरकारी नीतियों का निर्धारण करने के लिए लोगों की गिनती (जनगणना) हर 10 साल में की जाती है।
इसमें गांव, शहर में रहने वालों की गिनती के साथ साथ उनके रोज़गार, जीवन स्तर, आर्थिक स्थिति, शैक्षणिक स्थिति, उम्र, लिंग, व्यवसाय इत्यादि से जुड़े आंकड़े इकट्ठे किए जाते हैं। इन आंकड़ों का इस्तेमाल केंद्र और राज्य सरकारें नीतियां बनाने के लिए करती हैं।
जनगणना कराने की ज़िम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आने वाले भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के दफ़्तर की होती है।
इसे वैधानिक दर्जा देने के लिए 1948 में जनगणना अधिनियम पारित किया गया था।
भारत के गृह मंत्रालय के मुताबिक अंग्रेजों ने ब्रिटिश इंडिया में पहली बार 1872 में जनगणना की थी। तब से लेकर 1941 की जनगणना तक इसमें नागरिकों की जाति पूछी जाती थी लेकिन 1947 में भारत की आज़ादी के बाद 1951 की जनगणना से जाति को हटा दिया गया।
वैसे जनगणना में यह सवाल ज़रूर पूछा जाता रहा है कि क्या आप किसी अनुसूचित जाति से संबंधित हैं और इसमें आपकी जाति क्या है? हालांकि, इसके पक्ष में तर्क यह दिया जाता है कि अनुसूचित जाति को आबादी के अनुपात में राजनीतिक आरक्षण दिया जाएगा, यह संविधान में प्रावधान है। इसलिए उनकी आबादी को जानना एक संवैधानिक ज़रूरत है।
आज़ादी के बाद 1951 में पहली जनगणना करवाई गई। प्रत्येक 10 साल में होने वाली जनगणना आज़ादी के बाद अब तक कुल 7 बार करवाई जा चुकी है।
अभी 2011 में की गई जनगणना के डेटा उपलब्ध हैं और 2021 की जनगणना का काम चल रहा है।
इसे तैयार करने में क़रीब तीन साल का समय लगता है। सबसे पहले जनगणना के लिए अधिकारी निर्धारित किए जाते हैं जो घर-घर जाकर निजी आंकड़े जमा करते हैं और लोगों से सवाल पूछकर जनगणना फॉर्म भरते हैं।
इसमें आयु, लिंग, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति, धर्म, व्यवसाय आदि से जुड़े सवाल होते हैं। 2011 की जनगणना में ऐसे कुल 29 सवाल पूछे गए।
इन आंकड़ों से ही पता चलता है कि देश में जनसंख्या क्या है, इनमें कितनी महिलाएं और कितने पुरुष हैं, ये किस आयु वर्ग के हैं, कौन सी भाषाएं बोलते हैं, किस धर्म का पालन करते हैं, उनके शिक्षा का स्तर क्या है, कितने लोग शादीशुदा हैं, बीते 10 सालों में कितने बच्चों को जन्म हुआ, कितने लोग रोज़गार में हैं, कितने लोगों ने बीते 10 सालों में अपने रहने का स्थान बदल लिया है, इत्यादि। नियमानुसार, लोगों की इन निजी सूचनाओं को सरकार गोपनीय रखती है।
इन आंकड़ों से देश के नागरिकों की वास्तविक स्थिति सरकारों तक पहुंचती है और वो इसके आधार पर वो अपनी नीतियां तैयार करती हैं।
अब सरकार ने जनगणना का डिजिटलीकरण करने का फ़ैसला किया है। भारत के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 18 नवंबर को बताया कि इस बार जनगणना में मोबाइल ऐप का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें डिजिटल तरीके से डेटा एकत्र किए जाएंगे। यानी यह कागजों से डिजिटल फॉर्मेट की तरफ बढ़ने की शुरुआत होगी।
एनआरसी से अलग कैसे है एनपीआर? केंद्र सरकार भारत के नागरिकों की बायोमेट्रिक और वंशावली डेटा तैयार करना चाहती है और इसकी अंतिम सूची जारी करने के लिए सितंबर 2020 का समय तय किया गया है।
यह प्रक्रिया किसी भी तरह से जनगणना (Census) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) से नहीं जुड़ी है।
एनआरसी की तरह एनपीआर नागरिकों की गणना नहीं है। इसमें वो विदेशी भी जोड़ लिया जाएगा जो देश के किसी हिस्से में 6 महीने से रह रहा हो।
एनपीआर का लक्ष्य देश के प्रत्येक नागरिक की पहचान का डेटा तैयार करना है।
एनपीआर क्या है? एनपीआर देश के सामान्य नागरिकों की सूची है। 2010 से सरकार ने देश के नागरिकों के पहचान का डेटाबेस जमा करने के लिए राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर की शुरुआत की।
गृह मंत्रालय के अनुसार सामान्य नागरिक वो है जो देश के किसी भी हिस्से में कम से कम 6 महीने से स्थायी निवासी हो या किसी जगह पर उसका अगले 6 महीने रहने की योजना हो।
गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक एनपीआर को सभी के लिए अनिवार्य किया जाएगा। इसमें पंचायत, ज़िला, राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर गणना की जा रही है।
डेमोग्राफिक डेटा में 15 कैटेगरी हैं जिनमें नाम से लेकर जन्म स्थान, शैक्षिक योग्यता और व्यवसाय आदि शामिल हैं।
इसके लिए डेमोग्राफिक और बायोमेट्रिक दोनों तरह का डेटा एकत्र किए जाएंगे।
बायोमेट्रिक डेटा में आधार को शामिल किया गया है जिससे जुड़ी हर जानकारी सरकार के पास पहुंचेगी।
विवाद भी इसी बात पर है कि इससे आधार का डेटा सुरक्षित नहीं रह जाएगा।
2011 में जब एक व्यापक डेटाबेस तैयार किया गया तो उसमें आधार, मोबाइल नंबर और राशन कार्ड की जानकारी इकट्ठा की गई थी।
लेकिन 2015 में इसे अपडेट किया गया और नागरिकों को अब इसमें अपना नाम दर्ज करवाने के लिए पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आईडी और पासपोर्ट की जानकारी भी देनी होगी।
नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 14(ए) के तहत वैध नागरिक बनने के लिए इसमें नाम दर्ज करना अनिवार्य है।
इसमें असम को शामिल नहीं किया जाएगा क्योंकि वहां एनआरसी लागू कर दिया गया है।
एनआरसी क्या है? नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स (एनआरसी) से पता चलेगा कि कौन भारत का नागरिक है और कौन नहीं।
पूर्वोत्तर राज्य असम में बांग्लादेश से आने वाले अवैध लोगों के मुद्दे पर वहां कई हिंसक आंदोलन हुए हैं।
1985 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने असम गण परिषद से समझौता किया जिसे असम समझौता कहते हैं जिसके तहत 25 मार्च 1971 के पहले जो बांग्लादेशी असम में आए हैं केवल उन्हें ही नागरिकता दी जाएगी।
लेकिन लंबे वक्त तक इसे ठंडे बस्ते में रखा गया। फिर 2005 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने इस पर काम शुरू किया।
2015 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस काम में तेज़ी आई और एनआरसी को तैयार किया गया।
यानी मूल रूप से एनआरसी को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से असम के लिए लागू किया गया है।
अगस्त 2019 में एनआरसी प्रकाशित की गई। लेकिन क़रीब 19 लाख लोगों के पास उचित दस्तावेज़ नहीं पाए जाने की वजह से उन्हें प्रकाशित रजिस्टर से बाहर रखा गया।
जिन्हें इस सूची से बाहर रखा गया उन्हें वैध प्रमाण पत्र के साथ अपनी नागरिकता साबित करने के लिए वक्त दिया गया।
हालांकि इसे लेकर सड़क से संसद तक हड़कंप मच गया।
भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की मोदी सरकार को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर फ़िलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है।
इस मामले में अगली सुनवाई 22 जनवरी को होगी।
सुप्रीम कोर्ट में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ कुल मिलाकर 59 याचिकाएं दाखिल की गई थी।
याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस के नेता जयराम रमेश, एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी, तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा, राष्ट्रीय जनता दल के मनोज झा के अलावा जमीयत उलेमा-ए-हिंद, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग शामिल हैं।
ज्यादातर याचिकाओं में धर्म के आधार पर शरणार्थियों को नागरिकता देने वाले क़ानून को संविधान के ख़िलाफ़ बताया गया है।
इस क़ानून के मुताबिक़ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से शरण के लिए भारत आए हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है।
सरकार का पक्ष रखते हुए डॉक्टर राजीव धवन ने कहा कि क़ानून पर रोक लगाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि क़ानून अभी अमल में नहीं आया है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस सूर्य कांत ने नागरिकता संशोधन क़ानून पर रोक लगाने से फ़िलहाल इनकार कर दिया और कहा कि वो इस मामले की सुनवाई जनवरी में करेंगे।
अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा कि ऐसे चार फ़ैसले हैं जिनके मुताबिक इस क़ानून पर रोक नहीं लगाई जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने केंद्र सरकार को नोटिस को जारी करते हुए जवाब मांगा है।
नागरिकता संशोधन क़ानून में पड़ोसी देशों पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से ग़ैर-मुसलमान अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए नियमों में ढील देने का प्रावधान है।
दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त आलोक कुमार ने कहा है कि सीलमपुर की घटना में 21 लोग घायल हुए हैं, जिनमें 12 दिल्ली पुलिस के और तीन रैपिड एक्शन फ़ोर्स के हैं। पाँच लोगों को हिरासत में लिया गया है। दो पुलिस बूथ को नुक़सान पहुँचा है। पुलिस ने कोई लाठीचार्ज नहीं किया है। न ही कोई गोली चलाई गई है। सिर्फ़ आंसू गैस के गोले छोड़े गए हैं। स्थिति अब नियंत्रण में है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस के पूर्व विधायक आसिफ़ ख़ान के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है।
मोदी सरकार में केंद्रीय रेल राज्य मंत्री सुरेश अंगड़ी ने कहा है कि वे ज़िला प्रशासन और रेलवे अधिकारियों को चेतावनी देते हैं कि अगर कोई भी सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुँचाता है, तो मैं एक मंत्री होने के नाते उन्हें निर्देश देता हूँ कि उन्हें देखते ही गोली मार दें।
दिल्ली के सीलमपुर इलाक़े में मंगलवार को प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। पुलिस को प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर फेंके। रविवार को जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जुलेना, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, भरत नगर और मथुरा रोड इलाके में काफ़ी हंगामा हुआ था।
दिल्ली के साकेत कोर्ट ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हुई हिंसा के मामले में छह अभियुक्तों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तरुण गोगोई ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में ध्रुवीकरण के लिए जिन्ना का रास्ता अपना रहे हैं। नागरिकता संशोधन क़ानून के माध्यम से केंद्र हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश कर रहा है।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि पुलिस ने जिस तरह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की, उससे उन्हें काफ़ी पीड़ा हुई है।
दिल्ली पुलिस के पीआरओ एम एस रंधावा ने सीलमपुर में हुई झड़प पर कहा कि सीलमपुर में हालात नियंत्रण में हैं। हालात पर हमलोग की नज़र बनी हुई है। हमलोग इलाक़े का सीसीटीवी फुटेज देख रहे हैं। वीडियो रिकॉर्डिंग भी हुआ है।
भारत के राष्ट्रपति से मिलने गईं कांग्रेस प्रेजिडेंट सोनिया गांधी ने कहा कि नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर पूर्वोत्तर भारत में शुरू हुआ विरोध-प्रदर्शन पूरे देश में फैल गया है। सोनिया ने कहा कि बहुत ही गंभीर हालात हैं और डर है कि हालात बेकाबू न हो जाएं। कांग्रेस प्रमुख ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के साथ पुलिस ग़लत तरीक़ा अपना रही है।
दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के बीच विपक्षी पार्टियों के नेता कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिले। सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति से मोदी सरकार की शिकायत की और कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को सरकार कुचलने की कोशिश कर रही है। सोनिया गांधी ने कहा कि लोकतंत्र में लोगों की आवाज़ नहीं दबाई जा सकती।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सीलमपुर वालों से शांति की अपील की। नए नागरिकता संशोधन क़ानून पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, ''मेरी सभी दिल्लीवासियों से अपील है कि शांति बनाए रखें। एक सभ्य समाज में किसी भी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती। हिंसा से कुछ हासिल नहीं होगा। अपनी बात शांति से कहनी है।''
पुलिस का कहना है कि हालात नियंत्रण में हैं लेकिन तनाव अब भी बना हुआ है। कई मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए हैं। पुलिस का कहना है कि इलाक़े की शांति समिति ने लोगों से घर में रहने की अपील की है।
दिल्ली के जॉइंट सीपी आलोक कुमार ने कहा, ''सीलमपुर टी पॉइंट पर एक घंटे तक शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों में से ही कुछ लोगों ने पत्थरबाजी शुरू की। मदरसों और मस्जिदों से शांति की अपील की गई है। अब हालात नियंत्रण में हैं। कुछ पुलिस वाले ज़ख़्मी हुए हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक हज़ार से ज़्यादा प्रदर्शनकारी सड़क पर उतरे थे। प्रदर्शन के दौरान ही पुलिस और प्रदर्शनकारियों में झड़प हुई। डीएमआरसी के अनुसार सीलमपुर और गोकुलपुरी मेट्रो स्टेशन की एंट्री और एग्ज़िट को बंद कर दिया गया है।
इसके अलावा वेलकम, जाफ़राबाद, मौज़पुर और बाबरपुर मेट्रो स्टेशन भी बंद कर दिए गए हैं। डीटीसी की एक बस को भी नुकसान पहुंचाया गया है।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार इस झड़प में दो पुलिसकर्मी ज़ख़्मी हुए हैं। कहा जा रहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन क़ाबू से बाहर हो गया। टीवी फुटेज में दिख रहा है कि पुलिसकर्मियों के सामने लोगों की भारी भीड़ है। बसों और कारों को नुक़सान पहुंचा है और सड़क पर ईंट-पत्थर बिखरे हुए हैं। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के इस इलाक़े में सड़कों पर कई बैरिकेड लगाए गए हैं।
दिल्ली के सीलमपुर में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो गया है। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई है। इस दौरान एक स्कूल बस को नुक़सान पहुंचा है और एक पुलिस चौकी में आग लगा दी गई है। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज किया है और आंसू गैस के गोले छोड़े गए हैं।
दिल्ली के सीलमपुर इलाक़े में मंगलवार को प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। पुलिस को प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर फेंके। रविवार को जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जुलेना, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, भरत नगर और मथुरा रोड इलाके में काफ़ी हंगामा हुआ था।
दिल्ली के साकेत कोर्ट ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हुई हिंसा के मामले में छह अभियुक्तों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तरुण गोगोई ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में ध्रुवीकरण के लिए जिन्ना का रास्ता अपना रहे हैं। नागरिकता संशोधन क़ानून के माध्यम से केंद्र हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश कर रहा है।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि पुलिस ने जिस तरह शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की, उससे उन्हें काफ़ी पीड़ा हुई है।
दिल्ली पुलिस के पीआरओ एम एस रंधावा ने सीलमपुर में हुई झड़प पर कहा कि सीलमपुर में हालात नियंत्रण में हैं। हालात पर हमलोग की नज़र बनी हुई है। हमलोग इलाक़े का सीसीटीवी फुटेज देख रहे हैं। वीडियो रिकॉर्डिंग भी हुआ है।
भारत के राष्ट्रपति से मिलने गईं कांग्रेस प्रेजिडेंट सोनिया गांधी ने कहा कि नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर पूर्वोत्तर भारत में शुरू हुआ विरोध-प्रदर्शन पूरे देश में फैल गया है। सोनिया ने कहा कि बहुत ही गंभीर हालात हैं और डर है कि हालात बेकाबू न हो जाएं। कांग्रेस प्रमुख ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के साथ पुलिस ग़लत तरीक़ा अपना रही है।
दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के बीच विपक्षी पार्टियों के नेता कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिले। सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति से मोदी सरकार की शिकायत की और कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को सरकार कुचलने की कोशिश कर रही है। सोनिया गांधी ने कहा कि लोकतंत्र में लोगों की आवाज़ नहीं दबाई जा सकती।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सीलमपुर वालों से शांति की अपील की। नए नागरिकता संशोधन क़ानून पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, ''मेरी सभी दिल्लीवासियों से अपील है कि शांति बनाए रखें। एक सभ्य समाज में किसी भी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं की जा सकती। हिंसा से कुछ हासिल नहीं होगा। अपनी बात शांति से कहनी है।''
पुलिस का कहना है कि हालात नियंत्रण में हैं लेकिन तनाव अब भी बना हुआ है। कई मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए हैं। पुलिस का कहना है कि इलाक़े की शांति समिति ने लोगों से घर में रहने की अपील की है।
दिल्ली के जॉइंट सीपी आलोक कुमार ने कहा, ''सीलमपुर टी पॉइंट पर एक घंटे तक शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारियों में से ही कुछ लोगों ने पत्थरबाजी शुरू की। मदरसों और मस्जिदों से शांति की अपील की गई है। अब हालात नियंत्रण में हैं। कुछ पुलिस वाले ज़ख़्मी हुए हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक हज़ार से ज़्यादा प्रदर्शनकारी सड़क पर उतरे थे। प्रदर्शन के दौरान ही पुलिस और प्रदर्शनकारियों में झड़प हुई। डीएमआरसी के अनुसार सीलमपुर और गोकुलपुरी मेट्रो स्टेशन की एंट्री और एग्ज़िट को बंद कर दिया गया है।
इसके अलावा वेलकम, जाफ़राबाद, मौज़पुर और बाबरपुर मेट्रो स्टेशन भी बंद कर दिए गए हैं। डीटीसी की एक बस को भी नुकसान पहुंचाया गया है।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार इस झड़प में दो पुलिसकर्मी ज़ख़्मी हुए हैं। कहा जा रहा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन क़ाबू से बाहर हो गया। टीवी फुटेज में दिख रहा है कि पुलिसकर्मियों के सामने लोगों की भारी भीड़ है। बसों और कारों को नुक़सान पहुंचा है और सड़क पर ईंट-पत्थर बिखरे हुए हैं। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के इस इलाक़े में सड़कों पर कई बैरिकेड लगाए गए हैं।
दिल्ली के सीलमपुर में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो गया है। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई है। इस दौरान एक स्कूल बस को नुक़सान पहुंचा है और एक पुलिस चौकी में आग लगा दी गई है। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज किया है और आंसू गैस के गोले छोड़े गए हैं।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारत में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को नागरिकता संशोधन क़ानून और नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स (एनआरसी) पर खुली चुनौती दी है। उन्होंने कहा है कि अगर केंद्र चाहे तो उनकी सरकार को बर्खास्त कर सकता है, लेकिन वो नागरिकता संशोधन क़ानून को बंगाल में लागू नहीं होने देंगी।
ममता ने सोमवार को एक रैली में कहा, "यदि वह इसे लागू करेंगे तो यह मेरी लाश पर होगा।''
इस बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को पत्र लिखकर कहा कि यह राज्यपाल का दायित्व है कि वह राज्य में शांति बनाए रखने में राज्य सरकार का सहयोग करें, न कि उकसावे के जरिए स्थिति को भड़काएं।
राज्यपाल ने यह कहते हुए इसका जवाब दिया कि वह बनर्जी द्वारा अपनाए गए ''अनुचित दृष्टिकोण'' से बहुत पीड़ित हैं। उन्होंने लोगों के हित में मिलकर काम करने का आग्रह किया।
राज्यपाल ने ट्वीट कर कहा था कि मुख्यमंत्री और राज्य के अन्य मंत्रियो ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ रैली बुलाई है, वह असंवैधानिक है और संवैधानिक पद पर बैठा कोई भी व्यक्ति क़ानून का विरोध नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी से उनकी मंगलवार को मुलाक़ात होगी और उम्मीद है कि उसमें सभी अहम मसलों पर बातचीत होगी।
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ और लखनऊ से शुरू हुए उग्र प्रदर्शनों का असर राज्य के दूसरे शहरों में भी दिखने लगा है। मऊ ज़िले में सोमवार शाम जहां स्थानीय नागरिकों ने हिंसक प्रदर्शन किया। वहीं वाराणसी में नागरिकता क़ानून के समर्थकों और विरोधियों के बीच टकराव की स्थिति भी उत्पन्न हो गई। कई शहरों में आज भी प्रदर्शन हो रहे हैं।
मऊ में सोमवार को बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों ने दोपहर बाद सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया, वहीं शाम को भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने क़रीब एक दर्जन वाहनों में तोड़फोड़ की और आग लगा दी। इसके अलावा भीड़ ने दक्षिण टोला थाने को भी आग के हवाले करने की कोशिश की। घटना की जानकारी होते ही ज़िले के आला अधिकारी वहां पहुंचे और भीड़ को क़ाबू करने की कोशिश की। प्रशासन ने लोगों को अनावश्यक घरों से न निकलने की भी चेतावनी दी गई।
मऊ के ज़िलाधिकारी ज्ञान प्रकाश त्रिपाठी ने बताया, "मिर्ज़ा हादीपुरा में कुछ युवकों ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस की कार्रवाई के विरोध में ज्ञापन देने की योजना बनाई थी। देखते ही देखते मौक़े पर भीड़ बढ़ने लगी। पुलिस ने भीड़ को हटाने का प्रयास किया लेकिन प्रदर्शनकारियों का कोई नेतृत्व नहीं कर रहा था इसलिए दिक़्क़त आ रही थी। अचानक भीड़ ने दक्षिण टोला थाने के आस-पास पथराव और आगज़नी शुरू कर दी। वीडियो फुटेज देखकर उपद्रवियों की धरपकड़ की जाएगी।''
ज्ञान प्रकाश त्रिपाठी का कहना है कि पूरे शहर में धारा 144 लगा दी गई है। उनका कहना था, "प्रदर्शनकारियों को डराने के लिए ये घोषणा की गई कि आप लोग शांत नहीं होंगे तो कर्फ़्यू लगा दिया जाएगा। अभी कर्फ़्यू लगाया नहीं गया है। लोगों से ये भी कहा गया कि जब तक ज़रूरत न हो लोग घरों से न निकलें।''
हालांकि स्थानीय लोगों के मुताबिक, शहर में देर रात तक पुलिस और प्रशासन वाले ये घोषणा करते रहे कि पूरे शहर में कर्फ़्यू लगा दिया गया है और जो भी बाहर निकलेगा उसे गिरफ़्तार करके उसके ख़िलाफ़ आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। सोमवार को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले भी छोड़े। पूरे शहर में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।
मऊ ज़िले के तमाम छात्र दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ते हैं। दोनों ही जगह छात्रों के ख़िलाफ़ हुई पुलिस कार्रवाई से युवाओं और स्थानीय लोगों में कई दिन से ग़ुस्सा था और लोग प्रदर्शन के लिए इकट्ठे होने की तैयारी कर रहे थे।
मऊ नगर पालिका के पूर्व चेयरमैन अरशद जमाल हिंसक प्रदर्शन के लिए कुछ असामाजिक तत्वों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, "जिस लड़ाई को शान्तिपूर्वक लड़ना था उसमें सेंध लगाकर आंदोलन की धार कुंद करने का काम किया गया है। इस काम को हम लोग राजनैतिक दलों के बैनर तले करने वाले थे। 19 दिसम्बर को वाम दलों और समाजवादी पार्टी का मार्च और धरना पहले से निर्धारित है जिसकी सूचना ज़िला प्रशासन को भी दी गई है।''
फ़िलहाल मऊ ज़िले में इंटरनेट सेवाएं बंद हैं। ज़िला प्रशासन का कहना है कि शहर के कुछ स्थानीय नेताओं ने सोशल मीडिया पर इस मामले में लोगों को भड़काने की कोशिश की थी जिसकी वजह से प्रदर्शन हिंसक हुआ है। डीएम के मुताबिक, यही वजह है कि कुछ समय के लिए इंटरनेट सेवाएं बाधित की गई हैं और जिन लोगों ने 'आग में घी' डालने का काम किया है, उनकी पहचान की जा रही है।
वहीं बीएचयू और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी सोमवार को नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए और आज भी दोनों जगह प्रदर्शन की घोषणा की गई है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने विश्वविद्यालय और संबद्ध कॉलेजों में प्रदर्शनों को देखते हुए दो दिन के अवकाश की घोषणा की है।
बीएचयू में सोमवार शाम सिंह द्वार पर नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ छात्रों ने मशाल जुलूस भी निकाला। एक जगह पर क़ानून का विरोध करने वाले छात्रों और समर्थन कर रहे छात्रों का आमना-सामना भी हुआ लेकिन कोई अप्रिय स्थिति नहीं उत्पन्न होने पाई।
उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच राज्य सरकार ने पश्चिमी यूपी में हाई अलर्ट जारी कर दिया है। अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर, कासगंज ज़िलों में इंटरनेट सेवाएं बाधित की गई हैं और तनाव को देखते हुए इन ज़िलों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की कंपनियां तैनात की गई हैं।
अलीगढ़ में रविवार को हुई हिंसा में क़रीब दो दर्जन लोग गिरफ़्तार किए गए हैं। इनकी रिहाई का दबाव बनाने के लिए कुछ बाज़ार भी सोमवार को बंद रखे गए। बताया जा रहा है कि कई छात्र लापता भी हैं, हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसकी पुष्टि नहीं की है।
सोमवार को लखनऊ के नदवा कॉलेज में हुए प्रदर्शन के बाद, कॉलेज को पांच जनवरी तक के लिए बंद कर दिया गया है। कॉलेज में रह रहे छात्रों को उनके घर भेज दिया गया है। वहीं एएमयू में 28 नवंबर से ही परीक्षाएं चल रही थीं जो 21 दिसंबर तक होनी थीं।
लेकिन हिंसा के बाद एएमयू कैंपस को बंद कर दिया गया है और छात्रावास खाली करा लिए गए हैं। पांच जनवरी तक एएमयू बंद कर दिया गया है और परीक्षाएं स्थगित कर दी गई हैं। एएमयू प्रशासन के मुताबिक एएमयू के किशनगंज, मुर्शिदाबाद और मल्लापुरम केंद्रों पर भी परीक्षाएं स्थगित कर दी गई हैं।
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों की आग दिल्ली भी पहुंच गई है। मथुरा रोड पर जामिया नगर से सटे इलाक़े में डीटीसी की बसों में आग लगाई गई।
चश्मदीदों के अनुसार नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ लोग प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और भीड़ में टकराव हुआ। प्रदर्शनकारियों ने कई बसें, कारें और दोपहिया वाहर फूंके।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के चीफ़ प्रॉक्टर ने कहा कि पुलिस जबरदस्ती कैंपस में घुसी। जामिया स्टूडेंट्स ने भी हिंसा की निंदा की।
रविवार शाम को दिल्ली से मथुरा जाने वाली सड़क पर प्रदर्शनकारियों ने कई बसों में आग लगा दी।
बसों में लगी आग बुझाने के लिए पहुंची फायर ब्रिग्रेड की गाड़ियों पर भी प्रदर्शनकारियों ने धावा बोला और तोड़ फोड़ की।
प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव दिल्ली के ओखला, जामिया और कालिंदी कुंज वाले इलाके में हुआ।
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों सहित प्रदर्शनकारियों ने कालिंदी कुंज रोड पर नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया।
मीडिया की ख़बरों में दावा किया जा रहा है कि हिंसा में जामिया के छात्र शामिल थे।
इन ख़बरों पर समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया के आला अधिकारियों ने ये दावा किया है कि हिंसा इसी इलाक़े में स्थानीय लोगों द्वारा किए गए प्रदर्शन के दौरान हुई, ना कि यूनिवर्सिटी के छात्रों के प्रदर्शन के समय।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में मौजूद बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने बताया कि इन घटनाओं के बाद दिल्ली पुलिस ने जामिया परिसर की घेराबंदी कर दी है।
यूनिवर्सिटी के चीफ़ प्रॉक्टर वसीम अहमद ख़ान ने ट्वीट किया कि दिल्ली पुलिस ने बिना अनुमति के परिसर में प्रवेश किया है। उनके कर्मचारियों और छात्रों को पीटा गया और परिसर छोड़ने पर मजबूर किया गया है।
जामिया टीचर एसोसिएशन ने छात्रों से अपील की है कि वो इलाक़े में स्थानीय नेताओं द्वारा किए जा रहे दिशाहीन प्रदर्शनों में कतई शामिल ना हों।
जामिया की वीसी नजमा अख्तर ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि पुस्तकालय के भीतर के छात्रों को बाहर निकाला गया और वो सुरक्षित हैं। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई की निंदा की।
घटनास्थल पर मौजूद बीबीसी संवाददाता बुशरा शेख ने बताया कि एक पुरुष पुलिसवाले ने ना सिर्फ़ उनका मोबाइल छीन कर तोड़ दिया बल्कि बदसलूकी भी की।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने की अपील की है।
उन्होंने कहा है कि किसी भी तरह की हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, हुआ ये कि जामिया के स्टूडेंट्स ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध मार्च निकाला था।
छात्रों का जुलूस जैसे ही न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के कम्यूनिटी सेंटर के पास से गुज़रा, वहां पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बैरीकेड्स लगा रखे थे।
वहां कुछ छात्र बैठ गए थे, इन छात्रों में जामिया के स्टूडेंट्स के अलावा भी दूसरे स्टूडेंट भी शामिल थे।
पुलिस की नाकेबंदी को देखते हुए छात्रों का समूह दूसरे रास्ते से आश्रम की तरफ़ बढ़ने लगा।
ये रास्ता जंतर मंतर की तरफ़ जाता था। हालांकि ये बात पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती कि छात्रों का ये समूह जंतर-मंतर की तरफ़ ही जा रहा था या कहीं और।
छात्रों ने आश्रम के पास रास्ता जाम कर दिया। ये सड़क दिल्ली-फरीदाबाद रोड थी।
पुलिस ने सड़क खाली कराने के लिए वहां लाठी चार्ज किया। इन छात्रों में लड़के-लड़कियां दोनों ही थे। पुलिस ने इन छात्रों की वहां पर पिटाई की।
इस दौरान दूसरी तरफ़ मौजूद प्रदर्शनकारियों की ओर से भी पुलिस पर पत्थरबाज़ी हुई।
फिर पुलिस ने वहां लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े। अभी भी पुलिस वहां आंसू गैस के गोले छोड़ रही है।
इससे पहले भी जामिया के छात्रों ने 13 दिसंबर को मार्च निकालने की कोशिश की थी लेकिन पुलिस ने उन्हें बैरीकेड लगाकर रोक दिया था।
पिछले दो-तीन दिनों से पुलिस ने न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के कम्यूनिटी सेंटर के पास बैरीकेड लगा रखा था।
दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) ने ट्वीट किया है कि सुरक्षा कारणों से वसंत विहार, मुनिरका और आर के पुरम मेट्रो स्टेशनों को फ़िलहाल बंद कर दिया गया है।
इसके अलावा पटेल चौक, विश्वविद्यालय, जीटीबी नगर, शिवाजी स्टेडियम मेट्रो स्टेशनों को भी बंद किया गया है।
डीएमआरसी ने सुखदेव विहार, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, ओखला विहार, जसोला और शाहीन बाग मेट्रो स्टेशनों को भी बंद करने का अपडेट जारी किया है।
दक्षिण-पूर्व दिल्ली के डीसीपी चिन्मय बिस्वाल ने कहा है कि प्रदर्शन में आई भीड़ बहुत आक्रामक थी। स्थिति को कंट्रोल करने के लिए हमने उग्र भीड़ को तितर-बितर किया था जिसके जवाब में पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाज़ी की गई। इसमें क़रीब छह पुलिसवाले घायल हुए हैं।
बिस्वाल ने कहा, "हमें जामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों से कोई शिक़ायत नहीं थी। पर कैंपस के अंदर से भी हम पर पथराव किया गया। हम यूनिवर्सिटी प्रशासन से कहेंगे कि वे उन छात्रों की पहचान करें।''
बिस्वाल ने कहा कि उग्र भीड़ ने डीटीसी की चार बसों और पुलिस के दो वाहनों समेत कुछ अन्य वाहनों में भी आग लगाई जिसकी वजह से पुलिस को आंसू गैस के गोले दागने पड़े।
दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि जामिया यूनिवर्सिटी और इससे सटे इलाक़ों में फ़िलहाल स्थिति नियंत्रण में है।
पुलिसिया कार्रवाई के बाद जामिया के छात्र दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों के समर्थन में सीपीआई नेता डी. राजा और सीपीएम नेता वृंदा करात आईटीओ पहुंची है।
वहीं, दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने ट्वीट करके बस जलाने के लिए बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहराया है।
मनीष सिसौदिया ने ट्वीट करके कल दक्षिण पूर्वी दिल्ली के ओखला, जामिया, न्यू फ्रैंड्स कॉलोनी, मदनपुर खादर क्षेत्र के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को बंद करने की घोषणा की है।
भारत में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने बाबरी मस्जिद-अयोध्या मामले में दाख़िल सभी 18 पुनर्विचार याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया है।
बंद चैंबर में पाँच जजों की संवैधानिक बेंच ने सभी याचिकाओं पर सुनवाई की और उन्हें ख़ारिज कर दिया। यानी बाबरी मस्जिद-अयोध्या केस के फैसले का रिव्यू नहीं होगा।
बीबीसी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के 9 नंवबर 2019 के बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि फ़ैसले पर दिए गए फ़ैसले पर पुनर्विचार करने की माँग करते हुए 18 याचिकाएं दायर की गई थीं। इनमें से 9 याचिकाएं पक्षकार की ओर से थीं, जबकि 9 अन्य याचिकाएं अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से लगाई गई थीं। इन सभी याचिकाओं की मेरिट पर गुरुवार को विचार किया गया।
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार संवैधानिक बेंच ने बंद चैंबर में कुल 18 पुनर्विचार याचिकाओं पर विचार किया। इस मामले में सबसे पहले 2 दिसंबर को पुनर्विचार याचिका मूल वादी एम सिद्दकी के क़ानूनी वारिस मौलाना सैयद अशहद रशीदी ने दायर की थी।
इसके बाद 6 दिसंबर को मौलाना मुफ़्ती हसबुल्ला, मोहम्मद उमर, मौलाना महफ़ूज़ुर्रहमान, हाजी महबूब और मिसबाहुद्दीन ने छह याचिकाएं दायर कीं। इन सभी पुनर्विचार याचिकाओं को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का समर्थन प्राप्त था।
इसके बाद 9 दिसंबर को दो और पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। इनमें से एक याचिका अखिल भारत हिंदू महासभा की थी, जबकि दूसरी याचिका 40 से अधिक लोगों ने संयुक्त रूप से दायर की थी।
संयुक्त याचिका दायर करने वालों में इतिहासकार इरफ़ान हबीब, अर्थशास्त्री व राजनीतिक विश्लेषक प्रभात पटनायक, मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर, नंदिनी सुंदर और जॉन दयाल शामिल थे।
हिंदू महासभा ने अदालत में पुनर्विचार याचिका दायर करके मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ भूमि उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को आवंटित करने के आदेश पर सवाल उठाये थे।
साथ ही हिंदू महासभा ने फ़ैसले से उस अंश को हटाने का अनुरोध किया था जिसमें बाबरी मस्जिद ढांचे को मस्जिद घोषित किया गया है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ये स्पष्ट कर दिया कि इनमें से किसी भी दलील के आधार पर वो अपने फ़ैसले को रिव्यू नहीं करेगा।
अयोध्या केस पर फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनाया था जिसमें कुल पाँच जज थे। यह फ़ैसला सभी जजों ने सर्वसम्मति से सुनाया था।
जस्टिस गोगोई अब रिटायर हो चुके हैं। उनकी जगह जस्टिस एस ए बोबडे ने ली है।
पुनर्विचार की याचिकाओं पर एकमुश्त फ़ैसला भी पाँच जजों की बेंच ने ही सुनाया है।
मुख्य न्यायाधीश बोबडे सहित चार वो जज हैं जिन्होंने नौ नवंबर को फ़ैसला सुनाया था। जबकि जस्टिस संजीव खन्ना को पाँचवें जज के तौर पर शामिल किया गया।
इस फ़ैसले पर पुनर्विचार की माँग ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, हिंदू महासभा, निर्मोही अखाड़ा और कई एक्टिविस्टों ने की थी। उनका कहना था कि इस निर्णय में कई ग़लतियाँ हैं।
अपने नौ नवंबर के फ़ैसले में पाँच जजों की बेंच ने बाबरी मस्जिद की जमीन को राम मंदिर बनाने के लिए देने का आदेश दिया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने तीन महीने के भीतर मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाने और मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही कहीं और पाँच एकड़ ज़मीन देने का आदेश दिया था।
नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में स्थिति बिगड़ती जा रही है। असम के कई इलाक़ों में हिंसा की कई घटनाएँ हुई हैं। कई इलाक़ों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों की भिड़ंत हुई है।
डिब्रूगढ़ में कर्फ़्यू की परवाह किए बग़ैर सड़कों पर निकले प्रदर्शनकारियों पर पुलिस फ़ायरिंग हुई है। डिब्रूगढ़ के पुलिस अधीक्षक गौतम बोरा ने बीबीसी को बताया कि पुलिस को इसलिए फ़ायरिंग करनी पड़ी, क्योंकि प्रदर्शनकारी काफ़ी उग्र हो गए थे और पुलिस पर हमला कर रहे हैं।
स्थानीय पत्रकार अलख निरंजन सहाय के मुताबिक़ फ़ायरिंग में कुछ लोगों को गोलियाँ लगी हैं। घायलों को विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।
गुवाहाटी समेत असम के अधिकतर इलाक़ों में इंटरनेट सेवाएँ भी बंद करा दी गई हैं।
असम के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) संजय कृष्ण ने कहा है कि यह प्रतिबंध फ़िलहाल आज शाम 7 बजे तक के लिए ही है। इसका असर सभी मोबाइल और डेटा कंपनियों की इंटरनेट सेवाओं पर पड़ा है। इंटरनेट पूरी तरह बंद है।
कई इलाक़ों में इंटरनेट सेवा बंद होने के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर असम के लोगों को आश्वस्त किया है कि उन्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
अपने ट्वीट में मोदी ने कहा है- कोई भी आपका अधिकार, आपकी विशेष पहचान और सुंदर संस्कृति को आपसे ले नहीं सकता। मैं असम के बहनों और भाइयों को भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि उन्हें नागरिकता विधेयक से चिंतित होने की आवश्यकता नहीं।
इससे पहले आक्रोशित लोगों ने वहाँ के आरएसएस दफ़्तर में तोड़फोड़ की और वहाँ आगज़नी की कोशिशें की। गुवाहाटी में सेना की दो टुकड़ियाँ फ़्लैग मार्च कर रही है। डिब्रूगढ़ में भी सेना तैनात की गई है। सेना के जनसंपर्क अधिकारी लेफ़्टिनेंट कर्नल पी खोंगसाई ने बीबीसी को यह जानकारी दी है।
स्थानीय मीडिया में यह खबर भी है कि कश्मीर में तैनात पारा मिलिट्री के पाँच हज़ार जवान असम और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों में भेजे जा रहे हैं।
गुवाहाटी के पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने बीबीसी को बताया कि कर्फ़्यू के दौरान जरुरी सेवाओं को प्रतिबंधित नहीं किया गया है। एम्बुलेंस, मीडिया और विशेष आवश्यकता में घरों से निकले लोगों के अनुमति पास देखने के बाद पुलिस उन्हें नहीं रोक रही है।
असम की हिंसा के बीच बुधवार को ये विधेयक राज्यसभा से भी पारित हो गया। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ये विधेयक क़ानून बन जाएगा।
डिब्रूगढ़ में भी कर्फ़्यू लगा दिया गया है। वहाँ प्रदर्शनकारियों ने असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल और मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रामेश्वर तेली के घर को निशाना बनाया। असम के मुख्यमंत्री के घर पर पथराव किया गया। केंद्रीय मंत्री के घर पर हमले में संपत्ति को भी नुक़सान पहुँचा है।
असम जाने वाली कई ट्रेनें या तो रद्द कर दी गई हैं या फिर उनका रास्ता बदल दिया गया है। बुधवार रात प्रदर्शनकारियों ने डिब्रुगढ़ ज़िले के चाबुआ में एक रेलवे स्टेशन को आग लगा दी।
तिनसुकिया में पानीटोला रेलवे स्टेशन को भी आग लगा दी गई। असम के अलावा पड़ोसी त्रिपुरा में असम राइफ़ल्स के जवानों को तैनात किया गया है।
त्रिपुरा में भी सेना की दो टुकड़ियाँ तैनात की गई हैं। गुरुवार को विपक्षी कांग्रेस ने त्रिपुरा में बंद का आह्वान किया है।
11 दिसंबर की सुबह सड़कों पर रोज़ की तरह आवाजाही रही। लोग अपने-अपने दफ्तरों और दुकानों के लिए निकल गए। लेकिन, दोपहर 12 बजे के बाद गुवाहाटी के फैंसी बाज़ार, क्रिश्चियन बस्ती, नेटपी हाउस, गुवाहाटी यूनिवर्सिटी, चांदमारी, पलटन बाज़ार जैसे इलाक़ों में छात्र-छात्राओं की अलग-अलग टुकड़ियां नो कैब की तख्तियां लेकर निकलने लगीं।
प्रदर्शनकारियों ने दिसपुर चलो का आह्वान किया और महज़ दो घंटे के अंदर गुवाहाटी-शिलांग हाईवे (जीएस रोड) पर हज़ारों प्रदर्शनकारी जमा हो गए। आक्रोशित लोगों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के पुतले फूंके और दर्जनों जगहों पर आगज़नी कर सड़क को जाम कर दिया। इस कारण कई किलोमीटर तक सैकड़ों मोटर गाड़ियों की क़तारें लग गईं। पुलिस को वहां लाठीचार्ज करना पड़ा और आँसू गैस के गोले भी छोड़े गए।
इसके बावजूद लोगों का ग़ुस्सा कम नहीं हुआ और प्रदर्शनकारियों की भीड़ लगातार बढ़ती चली गई। लोगों ने जीएस रोड फ्लाइओवर पर रखे गमले तोड़ दिए और पास की खुली दुकानों पर पत्थरबाज़ी की।
शाम होने के बाद हालात और बिगड़ गए और ऐसा लगा मानो हर जगह आग लगी हो। शहर की मुख्य सड़कों और उनको जोड़ने वाली सब्सिडियरी सड़कों पर टायरों और प्लास्टिक की बनी बैरिकेटिंग्स में आग लगाकर जाम कर दिया गया। तब सैकडों गाड़ियां जहां-तहां फंस गईं। इस दौरान गाड़ियों में तोड़फोड़ भी की गई। अंधेरा ढलने के बाद हर जगह जलते हुए टायरों से निकलती आग की लपटें दिखायी देने लगीं और फ़ायरिंग और विस्फोट की आवाज़ें भी सुनी गईं।
ऑल असम गोरखा स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष प्रेम तमांग ने बीबीसी को बताया कि 11 दिसंबर के बंद का आह्वान किसी संगठन ने नहीं किया था। यह स्वतः स्फूर्त है और इसका नेतृत्व कोई नहीं कर रहा है। यह दरअसल जन आंदोलन है। लोगों को लगता है कि कैब के कारण असमिया विरासत और वजूद पर संकट आ जाएगा। इस कारण लोग आंदोलन कर रहे हैं।
जीएस रोड पर प्रदर्शन में शामिल पंकज हातकर ने बीबीसी से कहा कि असम में लोगों के पास पहले से ही बहुत समस्याएं हैं। अब जब सरकार बाहरी लोगों को यहां का नागरिक बना देगी, तब हमलोग कहां जाएंगे। हम पहले से ही बेरोज़गारी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
भारत में इंडियन मुस्लिम लीग ने नागरिकता संशोधन विधेयक के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। गुरुवार को उसकी ओर से एक याचिका दायर की गई है।
सोमवार को लोकसभा ने और बुधवार को राज्यसभा ने इस बिल को बहुमत से मंज़ूर किया है, यह बिल 1955 के नागरिकता क़ानून में बदलाव के लिए लाया गया है।
इस बदलाव के बाद भारत के तीन पड़ोसी देशों पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई, बौद्ध और सिखों को भारत की नागरिकता दिए जाने का रास्ता खुल गया है।
मुस्लिम लीग के सांसदों पी के कुन्हालिकुट्टी, ईटी मोहम्मद बशीर, अब्दुल वहाब और के एन कनी ने सामूहिक तौर पर यह याचिका दायर की है।
याचिका दायर करने वालों का कहना है कि वे किसी को शरण दिए जाने के ख़िलाफ़ नहीं हैं लेकिन इस सूची से मुसलमानों को अलग रखना उनके साथ धर्म के आधार पर भेदभाव है जिसकी अनुमति भारत का संविधान नहीं देता।
याचिका दायर करने वाले के वकीलों का कहना है कि यह संशोधन संविधान की मूल भावना के ख़िलाफ़ है, संविधान की प्रस्तावना में लिखा गया है कि भारत एक सेकुलर देश है नागरिकता को धर्म से जोड़ा जा रहा है जो सही नहीं है।
भारत के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मोदी सरकार से जुड़े लोगों ने बार-बार दावा किया है कि इसका भारत के अल्पसंख्यकों से कोई संबंध नहीं है, इससे उन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, यह संशोधन तीन देशों में बसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए है और मुसलमान इन तीन देशों में अल्पसंख्यक नहीं हैं।
याचिका में श्रीलंका के तमिल हिंदुओं और बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों को शामिल न किए जाने पर एतराज़ किया गया है और इसे भेदभाव बताया गया है।
याचिका दायर करने वालों की मांग है कि इस संशोधन विधेयक को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया जाए।
लोकसभा और राज्यसभा से पारित होने के बाद अब इस बिल को क़ानून का रूप देने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाना है।









