अर्थव्यवस्था

भारत की अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही है, और गिरेगी जीडीपी: क्रेडिट सुइस

भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय घने कोहरे के दौर से गुजर रही है। क्रेडिट सुइस ने यह बात कही है।

क्रेडिट सुइस इंडिया के इक्विटी रणनीतिकार नीलकंठ मिश्रा ने आज संवाददाताओं से कहा कि जीएसटी सहित विभिन्न संरचनात्मक सुधारों की वजह से निकट भविष्य में वृद्धि, वित्तीय सेहत, मुद्रास्फीति, मुद्रा और बैंकिंग प्रणाली को लेकर गहन अनिश्चितता की स्थिति पैदा हुई है।

नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि वृहद आर्थिक मोर्चे पर अनिश्चितता के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था घने कोहरे से होकर गुजर रही है। इससे निवेश प्रभावित होगा, जिससे वृद्धि नीचे आएगी, जीडीपी भी घटेगी तथा अगले वित्त वर्ष के लिए आय का अनुमान भी प्रभावित होगा।

मिश्रा ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कई संरचनात्मक बदलाव आए हैं, मसलन लाखों की संख्या में श्रमिक कृषि से हटे हैं, जीएसटी लागू किया गया है, रीयल एस्टेट नियमन एवं विकास कानून और दिवाला संहिता लागू की गई है। ये सब उस दुष्चक्र को तोड़ रहे हैं, जिसमें अर्थव्यवस्था जकड़ी हुई थी।

वित्तीय सेवा क्षेत्र की कंपनी ने निष्कर्ष निकाला कि सरकारी खर्च वृद्धि तेजी से कम हो रही है, जबकि आधी आबादी की आय वृद्धि काफी कमजोर है।

उन्होंने कहा, ''अच्छा मानसून रहने और 2016-17 में कृषि क्षेत्र में गतिविधियां बढ़ने के बावजूद खाद्यान्नों के दाम में नरमी से क्षेत्र के उत्पादन का सकल मूल्य कमजोर रहा है।''

रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती के बारे में पूछे जाने पर मिश्रा ने कहा कि अर्थव्यवस्था अनिश्चितता के दौर में है और ऐसे में अगले तीन-चार माह तक ब्याज दरों में कटौती नहीं होगी। हम ब्याज दरों में अर्थपूर्ण कटौती अगले नौ से 12 माह में ही देखेंगे।

रामदेव को कोर्ट का झटका: टीवी पर नहीं द‍िखा सकेंगे पतंजल‍ि साबुन का ऐड

रामदेव को दिल्ली हाई कोर्ट ने भी करारा झटका दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद को टीवी पर साबुन का विज्ञापन नहीं दिखाने का आदेश दिया है।

दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश डिटॉल बनाने वाली कंपनी रेकिट बेनकीजर द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के बाद आया है। याचिका में कहा गया है कि रामदेव की कंपनी पतंजलि आयुर्वेद का विज्ञापन डिटॉल ब्रांड की छवि खराब कर रहा है।

यह दूसरी बार है जब हाईकोर्ट ने पतंजलि को साबुन का विज्ञापन दिखाने से रोका है। रेकिट बेनकीजर से पहले हिन्दुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड भी पतंजलि के इस विज्ञापन पर रोक लगवा चुका है। तब बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाई थी।

रेकिट बेनकीजर ने याचिका में कहा है कि पतंजलि के विज्ञापन में जो साबुन दिखाया गया है वो शेप, साइज और कलर में डिटॉल साबुन जैसा है। इसके अलावा पतंजलि के एड में डिटॉल को ढिटॉल बताया गया है।

रेकिट बेनकीजर  के वकील के मुताबिक, हाईकोर्ट ने पतंजलि के साबुन पर अंतरिम रोक लगा दी है। बतौर वकील पतंजलि ने शुरू में इस विज्ञापन को यूट्यूब पर अपलोड किया गया था, बाद में इसका कॉमर्शियल एड टीवी पर आने लगा। उन्होंने बताया कि जब इस बावत हमने पतंजलि को ई-मेल भेजा तो कोई जवाब नहीं आया।

इस विवाद की शुरुआत पतंजलि के उन विज्ञापनों से हुई थी जिसमें हिन्दुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड के साबुन ब्रैंड्स लक्स, पियर्स, लाइफबॉय और डव का नाम प्रत्यक्ष रूप से नहीं लेकर इन डायरेक्ट तरीके से उपभोक्ताओं को कहा जा रहा था कि 'केमिकल बेस्ड साबुनों' का इस्तेमाल ना करें। और  उनकी जगह प्राकृतिक साबुन अपनाएं।

पतंजलि आयुर्वेद का यह विज्ञापन 2 सितंबर से टीवी पर प्रसारित हो रहा था। विज्ञापन में डिटॉल को ढिटॉल बताने के अलावा एच यू एल के पियर्स को टियर्स, लाइफबॉय को लाइफजॉय बताया जा रहा था। लक्स पर निशाना साधा गया था। HUL के ब्रैंड लक्स पर अप्रत्यक्ष हमला करते हुए पतंजलि के ऐड में लाइन थी, 'फिल्मस्टार्स के केमिकल भरे साबुन न लगाओ।'

इंफोसिस की मुश्किलें बढ़ीं, अब अमेरिका में जांच शुरू

अमेरिका की चार कानून कंपनियों ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनी इंफोसिस के खिलाफ जांच शुरू की है। उन्होंने इंफोसिस के निवेशकों की तरफ से इन संभावित दावों की जांच शुरू की है कि क्या कंपनी या उसके अधिकारियों एवं निदेशकों ने संघीय सुरक्षा नियमों का उल्लंघन किया है?

यह जांच ऐसे समय में शुरू हुई है जब इंफोसिस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) विशाल सिक्का ने कंपनी संचालन में गड़बड़ी के आरोप लगाये जाने के कारण एक दिन पहले ही अपने पद से इस्तीफा दिया है।

जांच शुरू करने वाली कानून कंपनियां ब्रोंसटाइन, गेविर्ज एंड ग्रॉसमैन, रोसेन लॉ फर्म, पोमेरांत्ज लॉ फर्म और गोल्डबर्ग लॉ पीसी हैं।

रोसेन ने एक बयान में बताया कि वह इंफोसिस के शेयरधारकों की ओर से संभावित सुरक्षा दावों की जांच कर रही है। आरोप है कि इंफोसिस ने निवेशकों को गलत कारोबारी सूचनाएं दी थी।

बता दें कि वैश्विक सॉफ्टवेयर कंपनी इन्फोसिस ने शनिवार को 11.3 करोड़ शेयरों के बायबैक का ऐलान किया है जो 5 रुपये के फेस वैल्यू पर 1,150 रुपये प्रति शेयर के भाव पर किया जाएगा।

इन्फोसिस ने बंबई स्टॉक एक्सचेंज में दाखिल नियामकीय रिपोर्ट में कहा, ''निदेशक मंडल ने शेयरधारकों से 1,150 रुपये प्रतिशेयर के हिसाब से पांच रुपये के फेस वैल्यू के 11.3 करोड़ शेयर के बायबैक प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जो 13,000 करोड़ रुपये का होगा।''

यह ऑफर कुल प्रदत्त पूंजी और फ्री रिजर्व का 20.1 फीसदी है, जो 11.3 करोड़ शेयर या कुल शेयरों का 4.92 फीसदी है। इन्फोसिस ने अपने शेयरों का बायबैक कीमत 1,150 रुपये निश्चित किया है, जो शुक्रवार को सिक्का के इस्तीफा देने के बाद गिरकर 923.10 प्रति शेयर पर बंद हुआ था। सीईओ के इस्तीफा के बाद इंफोसिस के शेयर 9.6 फीसदी गिरे थे।

कंपनी ने 16 अगस्त को अपने शेयरों को कारोबार के लिए बंद कर दिया था, क्योंकि बोर्ड की बैठक में बायबैक पर फैसला किया जाना था। अब इन्फोसिस के शेयर 22 अगस्त को खुलेंगे।

बायबैक ऑफर में शेयर हस्तांतरण कर, जीएसटी, स्टैंप शुल्क, फाइलिंग शुल्क, एडवाइजर्स शुल्क, ब्रोकरेज, सार्वजनिक घोषणा का खर्च, प्रिटिंग और भेजने का खर्च समेत अन्य खर्च शामिल नहीं हैं। इस बायबैक प्राइस में पिछले तीन महीनों के औसत बाजार मूल्य के साथ 19 फीसदी प्रीमियम दिया गया है।

नियामकीय रिपोर्ट में कंपनी ने कहा, ''यह बायबैक शेयरधारकों की मंजूरी के अधीन है, जिस पर जल्द ही वोटिंग के माध्यम से फैसला किया जाएगा।''

बोर्ड ने एक बायबैक समिति का गठन किया है जिसमें सह-अध्यक्ष रवि वेंकटेशन, विशाल सिक्का, अंतरिम सीईओ यू बी प्रवीण राव, मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) एम. डी. रंगनाथ, उप सीएफओ जयेश संघराजका, परामर्शदाता इंद्रप्रीत साहनी और कंपनी सचिव ए जी एस मणिकांथा शामिल हैं।

पहली जीएसटी रिटर्न फाइल करने में ही वेबसाइट बंद, पांच दिन बढ़ी समय-सीमा

भारत के व्यापारियों को शनिवार को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) फाइल करने वाली वेबसाइट ने जीएसटी रिटर्न दाखिल करने के अंतिम दिन से एक दिन पहले काम करना बंद कर दिया।

एसोचैम के अध्यक्ष (स्पेशल टास्क फोर्स ऑन जीएसटी) प्रतीक जैन ने आई ए एन एस को बताया, ''दोपहर 12 बजे के बाद से ही जीएसटी की वेबसाइट रुक-रुक कर चल रही थी। इससे व्यापारियों के बीच काफी उलझन पैदा हो गई। हमारे कई ग्राहकों ने बताया कि इस गड़बड़ी के कारण वे रिटर्न दाखिल नहीं कर सके। अगर ऐसा आगे भी जारी रहता है तो सरकार को जीएसटी रिटर्न दाखिल करने की तिथि अगले कुछ दिनों के लिए बढ़ा देनी चाहिए।''

जीएसटीआर-3बी दाखिल करने की तिथि जुलाई से लेकर 20 अगस्त तक ही है, जिसमें माल की आवाजाही और उधार/भुगतान के आंकड़े दाखिल करना है।

जीएसटी की वेबसाइट पर लगी नोटिस में कहा गया, ''यह सेवा 19 अगस्त को दोपहर 2 बजे से 2.45 बजे तक उपलब्ध नहीं है। कृपया बाद में आएं।''

अगस्त महीने के रिटर्न का विवरण दाखिल करने की अंतिम तिथि 20 सितंबर है। शनिवार को देर शाम तक सरकार ने परेशानियों को देखते हुए जीएसटी रिटर्न भरने की आखिरी तारीख पांच दिन बढ़ाते हुए 25 अगस्त कर दी है।

पुणे के चाटर्ड एकाउंटेंट प्रीतम महूरे ने आई ए एन एस को बताया, ''इस स्थिति से करदाता तनाव में है। महज दो हफ्ते पहले ही जीएसटीआर-3बी फार्म फाइलिंग के लिए उपलब्ध कराया गया था। उम्मीद के मुताबिक यह करदाताओं द्वारा फाइल किया गया पहला जीएसटी होता और इसी हफ्ते से करदाताओं ने जीएसटीआर-3बी फाइल करना शुरू किया था।''

एस के पी बिजनेस कंसल्टिंग के भागीदार जिगर दोषी ने बताया, ''अगर समरी रिटर्न फाइल करने में सिस्टम बैठ गया है तो अगले कुछ महीनों में स्थिति काफी डरावनी प्रतीत हो रही है क्योंकि हमें अंदाजा नहीं है कि उस समय क्या होगा, जबकि करदाताओं द्वारा इनवाइस अपलोड करते हुए विस्तृत जीएसटी रिटर्न फाइल किया जाएगा।''

अगस्त महीने का समरी रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तिथि 20 सितंबर निर्धारित है, जिसे सरकार ने शनिवार को अगले 5 दिनों के लिए बढ़ा दिया है।

जीएसटीआर 3बी के अलावा करदाताओं को तीन फार्म और फाइल करने हैं जिनमें जीएसटीआर-1, जीएसटीआर-2 और जीएसटीआर-3 है। जुलाई माह के लिए ये तीनों फार्म क्रमश: 1 सितंबर से 5 सितंबर के बीच, 6 सितंबर से 19 सितंबर के बीच और 11 सितंबर से 15 सितंबर के बीच फाइल करने हैं।

नीति आयोग उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने इस्तीफा दिया

अर्थशास्त्री डॉ. अरविंद पनगढ़िया ने मंगलवार (1 अगस्त) को नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इस इस्तीफे के बाद अरविंद केवल 31 अगस्त तक ही उपाध्यक्ष पद का कार्य भार सम्भालेंगे और फिर नीति आयोग को दूसरा उपाध्यक्ष नियुक्त करना होगा।

नीति आयोग के कार्यों से फ्री होने के बाद अरविंद अमेरिका चले जाएंगे, जहां पर वे कॉलम्बिया विश्वविद्यालय में छात्रों को इकॉनोमिक्स पढ़ाएंगे। अरविंद 5 सितंबर यानि की शिक्षक दिवस पर विश्वविद्यालय ज्वाइन करेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अरविंद ने अपने इस्तीफे की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे दी है। फिलहाल अभी उनके इस्तीफा को स्वीकार नहीं गया है क्योंकि मोदी बाढ़ ग्रस्त इलाकों में दौरे पर गए हुए हैं और वहां से वापस आने के बाद ही अरविंद के इस्तीफे और नए उपाध्यक्ष नियुक्त करने को लेकर विचार-विमर्श किया जाएगा।

आपको बता दें कि अरविंद पनगढ़िया दुनिया के सबसे अनुभवी अर्थशास्त्रियों में से एक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अरविंद पहले भी कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर थे, चूंकि इस विश्वविद्यालय से किसी भी शिक्षक को रिटायर नहीं किया जाता है, इसलिए उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा दोबारा अपना पद सम्भालने के लिए नोटिस भेजा गया था। अरविंद से इस नोटिस में पूछा गया था कि क्या वे वापस आकर छात्रों को पढ़ाना चाहेंगे या नहीं क्योंकि उनकी गैर मौजूदगी में छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

सूत्रों का कहना है कि अरविंद की सबसे ज्यादा रुचि बच्चों को पढ़ाने में है और इस्तीफा देने के पीछे यही वजह है कि वे वापस विश्वविद्यालय जाकर छात्रों को इकॉनोमिक्स पढ़ाएंगे।

इससे पहले अरविंद पनगढ़िया एशियन डिवेलपमेंट बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री और मैरीलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और को-डायरेक्टर भी रह चुके हैं।

अरविंद ने प्रिंसटन विश्वविद्यालय से इकॉनोमिक्स में पीएचडी की थी। वे वर्ल्ड बैंक, इंटरनेशनल मोनेटरी फंड, वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइज़ेशन और यूएनसीटीएडी में अलग-अलग पद पर काम कर चुके हैं। अरविंद करीब 10 किताब लिखा और ठीक कर चुके हैं। उन्होंने अपनी आखिरी किताब 'इंडिया: द इमरजिंग जियांट' लिखी थी जिसे 2008 में ऑक्सफॉर्ड विश्वविद्यालय में पब्लिश किया गया था।

नरेंद्र मोदी सरकार ने छोटे निवेशकों को दिया झटका

भारत में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने छोटे निवेशकों को झटका दिया है। सरकार ने स्मॉल सेविंग स्कीम के तहत आने वाले पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (पीपीएफ) अकाउंट, किसान विकास पत्र (केवीपी) और राष्ट्रीय बचत पत्र (एन एस सी) पर मिलने वाले ब्याज में कटौती की है। शुक्रवार (30 जून) को सरकार ने इन छोटे निवेशों पर 10 बेसिस प्वाइंट इन्टेरेस्ट रेट में कटौती की है।

अब पीपीएफ और एनएससी पर 7.8 फीसदी ब्याज मिलेगा, जबकि केवीपी पर 7.5 फीसदी ब्याज मिलेंगे। इनके अलावा वरिष्ठ नागरिकों की बचत योजनाओं और सुकन्या समृद्धि योजना की ब्याज दरें भी फिर से निर्धारित की गई हैं। इकॉनोमिक टाइम्स की खबर के मुताबिक, इसे 8.3 फीसदी रखा गया है। नई दरें एक जुलाई से लागू होगी।

इससे पहले एनएससी और पीपीएफ खातों पर 7.9 फीसदी और किसान विकास पत्र पर 7.6 फीसदी ब्याज दिया जा रहा था। मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी सुकन्या समृद्धि योजना पर इससे पहले 8.4 फीसदी ब्याज दिया जा रहा था। इससे पहले 31 मार्च को भी ब्याज दरों में कटौती की गई थी। उस समय भी ब्याज दरों में 0.1 फीसदी की कटौती की गई थी।

गौरतलब है कि पीपीएफ को टैक्‍स बचाने का सबसे सुरक्षित जरिया माना जाता है। इस योजना में ब्‍याज दर सरकार निर्धारित करती है जिसके चलते हर साल बदलाव आता है। वर्तमान में पीपीएफ पर 7.9 प्रतिशत सालाना की दर से ब्‍याज मिलता था। कोई भी व्‍यक्ति किसी भी राष्‍ट्रीय बैंक, प्राइवेट बैंक या पोस्‍ट ऑफिस में 15 साल के लिए पीपीएफ खाता खुलवा सकता है। इसमें न्‍यूनतम 500 से लेकर डेढ़ लाख रुपये सालाना तक जमा करा सकता है। तीसरे साल से इस राशि पर लोन लिया जा सकता है। पीपीएफ पर मिलने वाले ब्‍याज पर भी टैक्‍स नहीं लगता है। खाता खुलाने के छह साल बाद आप एक तय राशि निकाल सकते हैं।

सातवें वेतन आयोग: केंद्र सरकार ने एचआरए व अन्‍य भत्‍तों को दी मंजूरी

भारत में केंद्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग द्वारा भत्‍तों से जुड़ी सिफारिशों को मंजूरी दे दी है। इससे 47 लाख केन्‍द्रीय कर्मचारियों को फायदा होगा। नए भत्ते और पेंशन 1 जुलाई 2017 से लागू होंगे।

केंद्रीय वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में इसका ऐलान किया। नए भत्ते और पेंशन से सरकार पर लगभग 30 हजार करोड़ का अतिरिक्त खर्च आएगा। तीन देशों की यात्रा से लौटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैबिनेट बैठक में यह फैसला लिया।

सरकार ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को 34 संशोधनों के साथ मंजूरी दी है। उन्‍होंने कहा, ''जो पे कमीशन के सुझाव थे कर्मचारियों के पक्ष में, उनकों स्‍वीकार करके उनमें सुधार किया गया।''

केंद्र ने नए बेसिक पे का 24 फीसदी, 16 फीसदी और 8 फीसदी बतौर एचआरए देने का फैसला किया है। शहर के आधार पर एचआरए का प्रतिशत तय किया जाएगा। चूंकि न्‍यूनतम वेतन 18,000 रुपए है इसलिए शहर के आधार पर कम से कम 5400, 3600 और 1800 रुपए से कम एचआरए नहीं मिलेगा। इससे करीब 7.5 लाख कर्मचारियों को फायदा होगा।

हालांकि केंद्रीय कर्मचारियों की मांग थी कि 30 फीसदी, 24 फीसदी और 16 फीसदी एचआरए दिया जाए।

इसके अलावा जिन भत्‍तों पर कैबिनेट ने फैसला लिया है, वे इस प्रकार हैं:

सियाचीन अलाउंस
वित्त मंत्रालय के मुताबिक, सेना के जवानों के लिए सियाचीन भत्ता को 14 हजार रुपये प्रति महीना से बढ़ाकर 30 हजार रुपये प्रति महीना कर दिया गया है। जबकि सेना के अफसरों के लिए ये भत्ता 21 हजार रुपये से बढ़ाकर 42 हजार 500 रुपये हर महीना कर दिया गया है।

नर्सों और मंत्रालय के अस्पताल के स्टाफ के लिए
केन्द्र सरकार ने नर्सिंग भत्ता को बढ़ा दिया है, अब नर्सिंग भत्ता 4800 रुपये से बढ़कर 7200 रुपये प्रति महीना हो गया है। ऑपरेशन थियेटर अलाउंस को 360 रुपये प्रति महीना से बढ़ाकर 540 रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा पेशेंट केयर भत्ता को 2070-2100 रुपये प्रति महीना से बढ़ाकर 4100-5300 रुपये हर महीना कर दिया गया है।

पेंशन भोगियों के लिए
पेंशन भोगियों के लिए स्थायी मेडिकल अलाउंस को 500 रुपये प्रति महीना से बढ़ाकर 1000 रुपये कर दिया गया है। इसके अलावा पूर्ण अशक्तता पर कॉन्सटेंट अटेंडेंस अलाउंस को 4500 रुपये प्रति महीना से बढ़ाकर 6750 रुपये कर दिया गया है।

खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट से महंगाई दर में भारी गिरावट दर्ज की गई

खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट से महंगाई दर में मई महीने में भारी गिरावट दर्ज की गई है। खुदरा अथवा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित महंगाई दर मई में घटकर 2.18 फीसदी रही जो पिछले साल के इसी महीने में 5.76 फीसदी थी।

आधिकारिक आंकड़ों से सोमवार को मिली जानकारी के अनुसार, अप्रैल में महंगाई दर 2.99 फीसदी रही थी। उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचंकाक में (सीएफपीआई) मई में अपस्फीति देखी गई और यह नकारात्मक 1.05 फीसदी रही, जबकि साल 2016 की समान अवधि में यह 7.45 फीसदी पर थी।

इसमें कमी आने का मुख्य कारण दालों, अनाजों और खराब होने वाली वस्तुओं की कीमतों में गिरावट है। मई में सब्जियों की कीमतों में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 13.44 फीसदी की गिरावट आई, दालों की कीमत में 19.44 फीसदी की तेज गिरावट आई। समीक्षाधीन माह में खाद्य पदार्थ और बेवरेज की कीमतों में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 0.22 फीसदी की गिरावट आई।

गैर खाद्य पदार्थ श्रेणी में 'ईधन और बिजली' के क्षेत्र में सबसे ज्यादा 5.46 फीसदी की मुद्रास्फीति दर रही। ग्रामीण सीपीआई की दर मई में बढ़कर 2.30 फीसदी रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में खुदरा महंगाई दर 2.13 फीसदी रही। साल 2012 के बाद से मुद्रास्फीति की दर में यह सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।

इस संबंध में पिछले हफ्ते भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने वित्त वर्ष 2017-18 की अपनी दूसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में प्रमुख ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं किया और इसे 6.25 फीसदी पर बरकरार रखा था।

अब महंगाई दर के नये आंकड़े आने के बाद रिजर्व बैंक पर ब्याज दर घटाने का दबाव बढ़ सकता है। अगर रिजर्व बैंक ब्याज दर घटाता है तो बैंकों को आरबीआई से अधिक नगदी मिल सकेगी और इस वजह से कस्टमर्स को भी सस्ते लोन मिल सकेंगे।

अगर किसानों का कर्ज माफ किया तो बढ़ेगी महंगाई: आरबीआई

राज्य सरकारों द्वारा किसानों के कर्ज माफ करने पर चिंता जताते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बुधवार को कहा कि ऐसे कदम से वित्तीय घाटा और महंगाई में वृद्धि का खतरा बढ़ जाएगा।

आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने रेपो रेट को यथावत रखने की जानकारी देते हुए संवाददाताओं से कहा, मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के प्रस्ताव में कहा गया है कि अगर बड़े पैमाने पर किसानों के ऋण माफ किए गए तो इससे वित्तीय घाटा बढ़ने का खतरा है।

उन्होंने कहा कि जब तक राज्यों के बजट में वित्तीय घाटा सहने की क्षमता नहीं आ जाती, तब तक किसानों के ऋण माफ करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह पिछले 2-3 साल में हुए वित्तीय लाभ को घटा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि वित्तीय घाटा बढ़ने से जल्द ही महंगाई भी बढ़ने लगेगी। पटेल ने कहा कि पहले भी देखा गया है कि किसानों के ऋण माफ करने से महंगाई बढ़ी है।

उन्होंने कहा, ''इसलिए हमें बेहद सावधानी से कदम रखने चाहिए, इससे पहले कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाए।''

उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी राज्य के इतिहास में सबसे बड़े कृषि ऋण माफी की घोषणा की है।

वहीं दूसरी ओर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति ने नीतिगत समीक्षा से पहले वित्त मंत्रालय के चर्चा के आग्रह को खारिज कर दिया। आरबीआई के गर्वनर उर्जित पटेल ने बुधवार को यह खुलासा किया। आरबीआई ने सरकार की उम्मीद को धता बताते हुए लगातार चौथी मौद्रिक नीति समीक्षा में प्रमुख ब्याज दर को 6.25 फीसदी पर यथावत रखा है।

पटेल ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा की घोषणा करते हुए संवाददाताओं से कहा, ''जहां तक वित्त मंत्रालय द्वारा एमपीसी सदस्यों को बैठक के लिए दिए गए आमंत्रण का सवाल है। तो एमपीसी के सभी सदस्यों ने वित्त मंत्रालय के अनुरोध को ठुकरा दिया।''

हालांकि पटेल ने यह नहीं बताया कि वित्त मंत्रालय से यह आमंत्रण कब मिला था। पटेल से यह पूछा गया कि क्या मंत्रालय ने आरबीआई की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर हमला किया था। उन्होंने कहा, समिति ने इस आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया। छह सदस्यीय एमपीसी ने पिछले साल अक्टूबर से दरों पर निर्णय लेने का काम शुरू किया है। यह पहली बार है कि सदस्यों के बीच सर्वसम्मति से निर्णय नहीं लिया गया। पांच सदस्यों ने दर यथावत रखने और एक सदस्य ने इसके विरोध में मतदान किया था। एमपीसी के छह सदस्यों में से तीन सरकार द्वारा नामित किए गए हैं, जबकि तीन सदस्य आरबीआई के हैं।

महंगाई की मार: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में की गई बढ़ोत्तरी

भारत में महंगाई की मार झेल रही जनता को पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर फिर से झटका लगा है।

भारत में बुधवार (31 मई) को पेट्रोल और डीजल की कीमतों को बढ़ाने का फैसला लिया गया।

पेट्रोल की कीमत में 1.23 रुपए प्रति लीटर और डीजल की कीमतों में 0.89 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि की गई है।

बढ़ी हुई कीमतें आधी रात के बाद से लागू हो गई।

इससे पहले 16 मई को ईधन की कीमतों की समीक्षा की गई थी। इस समय पेट्रोल और डीजल के दामों में कटौती की गई थी। पेट्रोल की कीमत में प्रति लीटर 2.16 रुपए और डीजल में 2.10 रुपए की कमी की गई थी।