ब्राज़ील में अमेज़न के वर्षावन में आग की हज़ारों घटनाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताई जा रही है।
अमेज़न के जंगल में लगी आग को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं का सामना कर रहे ब्राज़ील के राष्ट्रपति जैर बोलसोनारो ने स्वीकार किया है कि हो सकता है कि किसानों ने जानबूझकर इन घने जंगलों में आग लगाई हो।
हालांकि उन्होंने कहा कि विदेशी ताक़तों को इस मामले में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।
फ्रांसीसी राष्ट्रपति एमैनुअल मैक्रों और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने ट्विटर पर आग लगने की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की थी।
कहा जा रहा है कि पिछले एक दशक में अमेज़न के जंगलों में पहली बार इतनी भीषण आग लगी है। देश के उत्तरी राज्य रोरैमा, एक्रे, रोंडोनिया और अमेज़ोनास इस आग से बुरी तरह प्रभावित हैं।
दावा है कि हर मिनट एक फ़ुटबॉल मैदान के बराबर जंगल काटे जा रहे हैं। जनवरी में ब्राज़ील के नए राष्ट्रपति के तौर पर जेयर बोलसोनारो ने सत्ता संभाली थी तब से जंगलों के काटे जाने की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं।
धरती को 20 फ़ीसदी ऑक्सीजन ब्राज़ील के वर्षावनों से मिलती है।
हालांकि, सोशल मीडिया पर हैशटैग #PrayforAmazonas से आग की जो तस्वीरें साझा की जा रही हैं उनमें से कुछ दशकों पुरानी हैं या वो ब्राज़ील की हैं भी नहीं।
तो वहां पर असल में क्या हो रहा है और आग की ये घटनाएं कितनी ख़तरनाक़ हैं, आइए एक नज़र डालते हैं।
ब्राज़ील की अंतरिक्ष एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि अमेज़न के वर्षा वन में इस साल रिकॉर्ड आग की घटनाएं हुई हैं।
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च (एन आई एस आर) ने अपने सैटेलाइट आंकड़ों में दिखाया है कि 2018 के मुकाबले इसी दरम्यान आग की घटनाओं में 85 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल के शुरुआती आठ महीने में ब्राज़ील के जंगलों में आग की 75,000 घटनाएं हुईं। साल 2013 के बाद ये रिकॉर्ड है। साल 2018 में आग की कुल 39,759 घटनाएं हुई थीं।
जुलाई से अक्टूबर के बीच सूखे मौसम में ब्राज़ील के जंगलों में आग की घटनाएं होना आम बात हैं। यहां प्राकृतिक कारणों से भी आग लगती है लेकिन साथ ही किसान और लकड़ी काटने वाले भी आग लगाते हैं।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो की पर्यावरण विरोधी बयानबाज़ियों के चलते जंगल साफ़ करने की गतिविधियों में बढ़ोत्तरी हुई है।
पर्यावरण को लेकर लंबे समय से संशय रखने वाले जेयर बोलसोनारो ने गैर सरकार संस्थाओं (एनजीओ) पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए खुद ही जंगलों में आग लगाई है।
बाद में उन्होंने कहा कि आग को काबू करने में सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।
आग की घटनाओं का सबसे अधिक प्रभाव उत्तरी इलाक़ों में पड़ा है।
आग की घटनाओं में रोराइमा में 141%, एक्रे में 138%, रोंडोनिया में 115% और अमेज़ोनास में 81% वृद्धि हुई है। जबकि दक्षिण में मोटो ग्रोसो डूो सूल में आग की घटनाएं 114% बढ़ी हैं।
अमेज़ोनास ब्राज़ील का सबसे बड़ा राज्य है, जहां आपात स्थिति की घोषणा कर दी गई है।
आग से पैदा हुआ धुएं का विशाल गुबार पूरे अमेज़न में फैल गया है और इससे भी आगे बढ़ रहा है।
यूरोपीय संघ के कॉपर्निकस एटमास्फ़ियर मानिटरिंग सर्विस (सी ए एम एस) के अनुसार, धुआं अटलांटिक कोस्ट तक फैल रहा है। यहां तक कि 2000 मील दूर साओ पाउलो का आसमान धुएं से भर गया है।
आग से बड़े पैमाने पर कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा हो रहा है और सी ए एम एस के अनुसार, इस साल अभी तक 228 मेगाटन के बराबर कार्बन डाई ऑक्साइड पैदा हुई, जोकि 2010 के बाद सर्वाधिक है।
इसके अलावा कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस भी पैदा हो रही है, जोकि ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में लकड़ी के जलने से पैदा होती है।
सी ए एम एस के नक्शे में दिख रहा है कि बहुत ही ज़हरीली कार्बन मोनो ऑक्साइड दक्षिणी अमरीका के तटीय इलाकों से आगे जा रही है।
वनस्पति और जीव जंतुओं की 30 लाख प्रजातियों और 10 लाख मूलनिवासियों के आवास वाले अमेज़न बेसिन जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, क्योंकि इसके जंगल हर साल लाखों टन कार्बन उत्सर्जन को सोख लेते हैं।
लेकिन जब पेड़ काटे या जलाए जाते हैं, उनके अंदर जमा हुआ कार्बन वायुमंडल में चला जाता है और वर्षावन की कार्बन अवशोषण की क्षमता भी जाती रहती है।
अमेज़न बेसिन के अन्य देशों में भी इस साल आग की घटनाएं बढ़ी हैं। इसमें वेनेज़ुएला दूसरे नंबर पर है जहां आग की 2600 घटनाएं सामने आई हैं, जबकि आग की 17000 घटनाओं के साथ बोलीविया तीसरे नंबर पर है।
देश के पूर्वी हिस्से में आग बुझाने के लिए बोलीविया की सरकार ने आग बुझाने वाले एयर टैंकरों को किराए पर लिया है। यहां आग अभी तक छह वर्ग किलोमीटर में फैल चुकी है।
इलाके में अतिरिक्त राहत और बचावकर्मी भेजे गये हैं और आग से बचकर निकलने वाले जानवरों के लिए अभ्यारण्य बनाए जा रहे हैं।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने बुधवार को कहा कि कश्मीर पर भारत से अब बातचीत का कोई मतलब नहीं है।
इमरान ख़ान ने कश्मीर पर दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच सैन्य टकराव का भी ख़तरा बताया है। न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में इमरान ख़ान ने कहा कि उन्होंने नरेंद्र मोदी से बातचीत के लिए कई बार कोशिश की लेकिन उन्होंने हर बार इनकार किया।
पीएम इमरान ख़ान ने अपने इंटरव्यू में कहा है, ''अब बात करने का कोई मतलब ही नहीं है। मैंने बातचीत की बहुत कोशिश की। दुर्भाग्य से मैं जब इन कोशिशों को पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उन्होंने इसे मान-मनौव्वल की तरह लिया। मैं इससे ज़्यादा अब कुछ नहीं कर सकता।''
इमरान ख़ान भारत के कश्मीर की स्वायत्तता ख़त्म करने को लेकर भारत की हिन्दू राष्ट्रवादी सरकार को लगातार निशाने पर ले रहे हैं। जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता ख़त्म करने के बाद से भारत ने घाटी में बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती कर रखी है।
पाकिस्तान इस मामले को संयुक्त राष्ट्र तक लेकर गया और भारत के भीतर भी विपक्ष भी मोदी सरकार के फ़ैसले की आलोचना कर रहा है।
भारत सरकार का कहना है कि कश्मीर में धीरे-धीरे सामान्य स्थिति बाहाल हो जाएगी। इमरान ख़ान के इस इंटरव्यू पर न्यूयॉर्क टाइम्स से संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत हर्षवर्द्धन श्रृंगला ने कहा कि इमरान ख़ान के सारे आरोप बेबुनियाद हैं।
हर्षवर्द्धन ने कहा, ''हम लोगों का पुराना अनुभव है कि जब भी हम बातचीत की टेबल पर जाते हैं तो उसका नतीजा बहुत बुरा हुआ है। हम पाकिस्तान से उम्मीद करते हैं कि वो आतंकवाद पर ठोस और भरोसेमंद और निर्णायक कार्रवाई करे। कश्मीर में हालात धीरे-धीरे सामान्य हो जाएंगे लेकिन यह ज़मीनी हालात पर निर्भर करता है।''
भारतीय राजदूत ने कहा ने कहा कि ज़रूरी सेवाएं बहाल कर दी गई हैं। उन्होंने कहा कि बैंक और हॉस्पिटल की सेवाएं बहाल कर दी गई हैं। हर्षवर्धन ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि संचार व्यवस्था सुरक्षा को देखते हुए पूरी तरह से बहाल नहीं की गई है।
कश्मीर के ज़्यादातर नेता अब भी नज़रबंद हैं। प्रधानमंत्री इमरान ख़ान मोदी सरकार की तुलना नाज़ी जर्मनी से कर रहे हैं। पीएम ख़ान ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार कश्मीर में जनसंहार करवा सकती है।
इमरान ख़ान पूरे मामले में भारत के मुसलमानों को लेकर भी टिप्पणी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत की मोदी सरकार मुसलमानों के साथ भेदभाव कर रही है।
भारत का कहना है कि कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और इसे लेकर बात भी होगी तो केवल द्विपक्षीय बात होगी न कि इसमें कोई तीसरा पक्ष शामिल होगा।
वहीं पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठा रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं। भारत ने कश्मीर की स्वायत्तता ख़त्म करने को अपना आंतरिक मामला बताया है और वहां सुरक्षा बलों की तैनाती ऐहतियात के तौर पर किया गया बताया है। इसे लेकर पाकिस्तानी मीडिया में पीएम मोदी को फासीवादी कहा जा रहा है।
इमरान ख़ान ने इंटरव्यू में कहा है, ''सबसे अहम बात यह है कि 80 लाख लोगों पर ख़तरा मंडरा रहा है। हम लोगों को डर है कि यहां जनसंहार कराया जा सकता है और धर्म के आधार पर हत्याएं हो सकती हैं।'' हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि कश्मीर में हालात विस्फोटक हैं।
पिछले महीने इमरान ख़ान अमरीका के दौरे पर गए थे और ट्रंप ने कहा था कि पाकिस्तान की सुरक्षा मदद में कटौती के बाद से पाकिस्तान से रिश्ते अच्छे हो गए हैं। दोनों नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस में एनबीसी के एक सवाल के जवाब में ट्रंप ने कहा था कि वो कश्मीर पर मध्यस्थता के लिए तैयार हैं।
इमरान ख़ान ने ये आशंका भी जताई है कि भारत कश्मीर में कोई बड़ा सैन्य कार्रवाई कर सकता है। उन्होंने कहा, ''भारत ऐसा करके पाकिस्तान में भी कार्रवाई को उचित ठहरा सकता है। इसके बाद हम भी जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर होंगे। आप इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं कि दो परमाणु शक्ति संपन्न देश आँख में आँख मिलाकर देखेंगे तो क्या होगा। इससे पूरी दुनिया को सतर्क होने की ज़रूरत है।''
भारत की अब तक की नीति रही है कि वो परमाणु हथियारों का इस्तेमाल पहले नहीं करेगा। लेकिन पिछले शुक्रवार को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत पहले इस्तेमाल नहीं करने की नीति पर कायम है लेकिन भविष्य में क्या होगा यह उस वक़्त के हालात पर निर्भर करेगा।
ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह ख़ामनेई ने बुधवार को भारत के कश्मीर में मुसलमानों को लेकर चिंता ज़ाहिर की है। ईरान की तरफ़ से यह प्रतिक्रिया जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता ख़त्म करने के दो हफ़्ते बाद आई है।
अतीत में भी ख़ामनेई कश्मीर को लेकर ईरान की सरकार की तुलना में ज़्यादा मुखर रहे हैं। लेकिन शायद यह पहली बार है जब ख़ामनेई ने केवल कश्मीर पर ट्वीट कर चिंता जताई है।
ख़ामनेई ने ट्वीट कर कहा है, ''कश्मीर में मुसलमानों की हालत को लेकर हम चिंतित हैं। भारत से हमारे अच्छे रिश्ते हैं लेकिन हम भारत सरकार से उम्मीद करते हैं वो कश्मीरियों के हक़ में नीतियां बनाए और इस इलाक़े में मुसलमानों पर जुल्म को रोका जाए।''
ख़ामनेई ने कश्मीर समस्या के लिए ब्रिटेन को भी ज़िम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि 1947 में ब्रिटिश उपनिवेश से भारत मुक्त हुआ तो जानबूझकर एक ज़ख़्म छोड़ दिया।
पाँच अगस्त को जब भारत ने जम्मू-कश्मीर को मिली संवैधानिक स्वायत्तता संसद में ख़त्म करने की घोषणा की तो प्रतिक्रिया में पाकिस्तान ने भारत से सारे संबंध तोड़ लिए थे।
ईरानी नेता के इस बयान को अंग्रेज़ी न्यूज़ सर्विस प्रेस टीवी ने प्रमुखता से जगह दी है। ईरान ने कहा है कि संवाद के ज़रिए ही कश्मीर समस्या का समाधान हो सकता है।
इससे पहले ईरान सरकार ने कश्मीर पर दो बयान जारी किए थे और कहा था कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर का राजनयिक हल तलाशें। ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि भारत और पाकिस्तान उसके दोस्त और साझेदार हैं और दोनों देश शांतिपूर्वक कोई राजनयिक हल की कोशिश करें।
इससे पहले 11 अगस्त को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से फ़ोन पर बात की थी। 2017 में भी ख़ामनेई ने ईद-उल-फ़ित्र पर मुस्लिम वर्ल्ड से कश्मीरियों के समर्थन की अपील की थी। ख़ामनेई 1980 के दशक में कश्मीर भी जा चुके हैं।
पाकिस्तान कश्मीर का मुद्दा दुनिया के अलग-अलग मंचों और अलग-अलग देशों के साथ उठा रहा है। पाकिस्तान की कोशिश रही है कि मुस्लिम देश कश्मीर मुद्दे पर उसका खुलकर साथ दें।
पाकिस्तान इस मामले को मुस्लिम देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक को-ऑपरेशन यानी ओआईसी में भी ले गया, जिसके दुनिया भर के 57 मुस्लिम बहुल देश सदस्य हैं। ओआईसी ने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन की निंदा की और कहा कि इसे सुलझाने के लिए बातचीत शुरू की जाए।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी भारत की शिकायत लेकर चीन गए। चीन ने भी कहा कि कश्मीर समस्या का समाधान दोनों देश मिलकर सुलझाएं और भारत को चाहिए कि यथास्थिति बनाए रखे। चीन लद्दाख पर अपना दावा पेश करता रहा है इसलिए लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने से उसे आपत्ति है।
उधर अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कश्मीर की स्थिति को 'विस्फोटक' और जटिल बताते हुए एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश की है।
डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि इस हफ़्ते के आख़िर में वह फ्रांस में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात करेंगे।
ट्रंप का कहना है कि कश्मीर एक जटिल समस्या है। ट्रंप ने कहा कि वो भारत और पाकिस्तान के नेताओं के साथ संपर्क में हैं।
अमरीका ने बताया है कि उसने हाल ही में एक नई मध्यम दूरी की क्रूज़ मिसाइल का सफल परीक्षण किया है।
रूस के साथ की गई आईएनएफ़ संधि से बाहर आने के बाद अमरीका का यह पहला ऐसा कदम है।
आईएनएफ़ संधि पर दोनों देशों ने तीन दशक पहले हस्ताक्षर किया था ताकि यूरोप को परमाणु हथियार मुक्त किया जा सके।
यह संधि परमाणु हथियार ले जा सकने वाले इस तरह के हथियारों के परीक्षण और उत्पादन पर रोक लगाती थी।
विश्लेषकों का कहना है कि इससे अमरीका और रूस के बीच हथियारों की नई होड़ शुरू हो जाएगी।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने रविवार को एक के बाद एक पांच ट्वीट करते हुए भारत के कश्मीर में कर्फ़्यू के बहाने मोदी सरकार और भारत के परमाणु हथियारों पर सवाल खड़े किए हैं।
इमरान ख़ान ने कहा है कि दुनिया को भारत के परमाणु हथियारों की सुरक्षा के बारे में विचार करना चाहिए। उन्होंने मोदी सरकार की जर्मनी के नाज़ी शासन से तुलना की है और परमाणु हथियारों की सुरक्षा पर चिंता जताई है।
भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शनिवार को कहा था कि भारत परमाणु हथियारों के 'पहले इस्तेमाल न' करने की नीति पर अभी भी कायम है लेकिन 'भविष्य में क्या होता है यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।'
इस बयान के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर भारत के परमाणु हथियारों पर चिंता जताई थी।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने पहले ट्वीट में लिखा, "जर्मनी पर जैसे नाज़ियों ने क़ब्ज़ा किया था वैसे ही भारत पर अब फ़ासीवादी, जातिवादी हिंदू वर्चस्ववादियों की विचारधारा और नेतृत्व ने क़ब्ज़ा कर लिया है। दो सप्ताह से भारत के क़ब्जे वाले कश्मीर में 90 लाख कश्मीरी घेरेबंदी में डरे हुए हैं। इस ख़तरे की घंटी के बारे में दुनिया को पता चलना चाहिए और संयुक्त राष्ट्र को अपने पर्यवेक्षक यहां भेजने चाहिए।''
इमरान ख़ान ने इसके बाद अगला ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने लिखा है, "यह ख़तरा न केवल पाकिस्तान को है बल्कि नेहरू-गांधी के विचारों के भारत और अल्पसंख्यकों को भी है। कोई भी आसानी से आरएसएस-बीजेपी के संस्थापकों की नरसंहार की विचारधारा और नाज़ियों की ख़ास समुदाय के नरसंहार की विचारधारा के बीच संबंध को केवल गूगल करके समझ सकता है।''
इमरान ख़ान केवल कश्मीर पर ही नहीं रुके बल्कि उन्होंने भारत के मुस्लिमों पर भी ट्वीट किया। उन्होंने एनआरसी का नाम लिए बिना कहा कि भारत के 40 लाख मुस्लिमों पर हिरासत केंद्र में जाने का ख़तरा मंडरा रहा है।
उन्होंने ट्वीट किया, "पहले से 40 लाख भारतीय मुस्लिम हिरासत केंद्र और नागरिकता छिन जाने के ख़तरे का सामना कर रहे हैं। दुनिया को इस बारे में देखना चाहिए कि आरएसएस के बदमाशों के साथ नफ़रत और नरसंहार के सिद्धांत का जिन्न बोतल से बाहर आ रहा है। जब तक कि यह फैले अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इसे रोकना होगा।''
इसके साथ ही इमरान ख़ान ने परमाणु हथियारों पर चिंता जताते हुए कहा है कि दुनिया को भारत के परमाणु हथियारों की सुरक्षा के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि यह फ़ासीवादी मोदी सरकार के नियंत्रण में है।
इमरान ख़ान ने बार-बार मोदी सरकार को हिंदू वर्चस्ववादी और फ़ासीवादी बताया है। उन्होंने कहा है कि यह मुद्दा सिर्फ़ क्षेत्र को ही नहीं बल्कि दुनिया को प्रभावित करेगा।
अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल में एक शादी समारोह में बम धमाका हुआ है।
इस हमले में 63 लोग मारे गए हैं जबकि 180 से ज़्यादा लोग घायल हो गए हैं। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बीबीसी को बताया कि एक आत्मघाती हमलावर ने खचाखच भरे रिसेप्शन हॉल में ख़ुद को विस्फोटकों से उड़ा लिया।
ये हमला शहर के शिया बहुल इलाक़े में किया गया है। हमला ,स्थानीय समयानुसार रात क़रीब दस बजकर चालीस मिनट पर हुआ।
अभी तक किसी भी संगठन ने इस हमले की ज़िम्मेदारी नहीं ली है लेकिन तालिबान का कहना है कि उसका इस हमले से कोई लेना-देना नहीं है।
सोशल मीडिया पर साझा की गई तस्वीरों में घटनास्थल के बाहर महिलाएं विलाप करती दिख रही हैं।
हाल के दिनों में अफ़ग़ानिस्तान में कई बड़े आत्मघाती हमले हुए हैं।
इसी महीने काबुल के बाहरी इलाक़े में एक पुलिस चौकी को निशाना बनाकर किए गए ट्रक बम हमले में चौदह लोग मारे गए थे। इस हमले में 150 से अधिक लोग घायल भी हुए थे।
उस हमले की ज़िम्मेदारी तालिबान ने ली थी।
इसके अलावा बीते शुक्रवार यानी 16 अगस्त को तालिबानी नेता हिबातुल्लाह अख़ुंदज़ादा के भाई की मौत भी एक बम धमाके में हो गई थी। अभी तक किसी भी समूह ने इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली है।
अफ़गानिस्तान के खुफ़िया विभाग के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि जिस मस्जिद में यह धमाका हुआ था, हिबातुल्ला वहां नमाज़ के लिए जाने वाले थे और संभव है कि वही बम धमाका करने वालों के निशाने पर भी थे।
एक ओर जहां तालिबान और अमरीका के बीच अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध समाप्त करने को लेकर वार्ता चल रही है। वहीं दूसरी ओर इस तरह के बड़े हमले हो रहे हैं, जिससे तनाव बना हुआ है।
वहीं रिपोर्टों के मुताबिक अमरीका और तालिबान जल्द ही शांति समझौते की घोषणा भी कर सकते हैं।
अफ़गानिस्तान के गृहमंत्री ने बम धमाके होने के कुछ घंटे बाद ही मौत के आंकड़ों की पुष्टि कर दी थी। सोशल मीडिया पर इस हादसे की जो तस्वीरें आई हैं उनमें साफ़ देखा जा सकता है कि एक बड़े से हॉल में चारों तरफ़ लाशें बिखरी पड़ी हैं।
अफ़गानिस्तान में होने वाली शादियों में अमूमन सैकड़ों की संख्या में लोग जमा होते हैं। जहां आमतौर पर पुरुष, महिलाओं और बच्चों से अलग रहते हैं।
शादी समारोह में शरीक हुए मोहम्मद फ़रहाग ने बताया कि जिस समय धमाका हुआ वो उस ओर थे जिधर महिलाओं का समूह खड़ा था। वो कहते हैं, "धमाका बहुत तेज़ था... इतना तेज़ कि उसे सुनते ही हम सभी बाहर की तरफ़ भागे।''
वो बताते हैं, "क़रीब 20 मिनट बाद पूरा हॉल धुएं से भरा हुआ था। पुरुषों वाले हिस्से में या तो लोग मर चुके थे और नहीं तो घायल थे। लाशें इतनी थीं कि दो घंटे बाद तक उन्हें बाहर निकाला जाता रहा।''
तालिबान के प्रवक्ता ने कहा है कि संगठन इस हमले की कड़े शब्दों में निंदा की है।
तालिबान और अमरीकी प्रतिनिधि कतर की राजधानी दोहा में शांति वार्ता कर रहे हैं और दोनों ही पक्षों का कहना है कि शांति वार्ता प्रगति की ओर है।
वहीं शुक्रवार को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट भी किया था और उम्मीद जताई थी कि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो जाए।
उन्होंने ट्वीट किया था, "अफ़गानिस्तान पर एक बहुत अच्छी बातचीत अभी अभी पूरी हुई। 19 साल से छिड़े इस युद्ध के तमाम विपरीत पहलुओं से हटकर हम एक समझौता करने के क़रीब हैं .. यदि संभव हुआ तो।''
भारत के कश्मीर को मिले विशेष दर्जे की संवैधानिक मान्यता ख़त्म करने के बाद से पड़ोसी देश पाकिस्तान से भारत के ख़िलाफ़ तीखी प्रतिक्रिया आने का सिलसिला जारी है।
शनिवार को एक बार फिर से पाकिस्तान ने कहा कि वो कश्मीर के लिए आख़िरी सैनिक और आख़िरी गोली तक लड़ेगा।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा, "पाकिस्तान की प्रोफ़ेशनल सेना भारत से टकराने के लिए तैयार है। हमारी सभी संस्थाएं भारत के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।''
क़ुरैशी ने ये बात पाकिस्तान में कश्मीर पर बनी विशेष समिति की बैठक के बाद कही।
इंटर-सर्विस पब्लिक रिलेशन के डायरेक्टर जनरल मेजर आसिफ़ ग़फ़ूर ने भी इस मौक़े पर कहा कि पाकिस्तान कश्मीर के लिए आख़िरी सैनिक और आख़िरी गोली तक लड़ेगा।
जनरल ग़फ़ूर ने कहा, "भारत आज़ाद कश्मीर के बारे में भूल जाए और अपने क़ब्ज़े वाले कश्मीर के बारे में बात करे। पाकिस्तान भारत के किसी भी दुःसाहस का जवाब देने के लिए तैयार है।''
क़ुरैशी ने कहा कि कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद की अनौपचारिक बैठक ऐतिहासिक रही। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा कि सुरक्षा परिषद के किसी भी स्थायी सदस्य ने इस बैठक का विरोध नहीं किया और यह पाकिस्तान की बड़ी उपल्बधि है।
जम्मू-कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद है। दोनों देश इस पर अपना दावा करते हैं। इसमें तीसरा देश चीन है। जम्मू-कश्मीर के 45 फ़ीसदी हिस्से पर भारत का नियंत्रण है, 35 फ़ीसदी पर पाकिस्तान का और 20 फ़ीसदी पर चीन का।
चीन के पास अक्साई चिन और ट्रांस काराकोरम (शक्सगाम घाटी) है। अक्साई चिन को चीन ने भारत से 1962 की जंग में अपने नियंत्रण में ले लिया था और ट्रांस काराकोरम को पाकिस्तान ने चीन को दे दिया है।
कश्मीर पर भारत के हालिया फ़ैसले से चीन भी सहमत नहीं है। इस मामले को पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में लेकर गया तो इसके स्थायी सदस्य चीन का भी समर्थन मिला। चीन और पाकिस्तान की दोस्ती जग-ज़ाहिर है और इसे भारत के लिए चुनौती के तौर पर भी देखा जाता है।
16 अगस्त को सुरक्षा परिषद के सदस्यों के बीच कश्मीर पर अनौपचारिक बैठक हुई थी। कश्मीर को लेकर सुरक्षा परिषद में 90 मिनट तक बैठक चली। इस बैठक को पाकिस्तान अपनी जीत बता रहा है।
उसका कहना है कि किसी स्थायी सदस्य ने इस बैठक का विरोध नहीं किया और ये उसकी बड़ी जीत है।
न्यूयॉर्क में सीएनएन से एक राजनयिक ने कहा है कि यह सुरक्षा परिषद की सबसे निचले स्तर की बैठक थी, जिसमें एक बयान तक नहीं जारी किया गया। कुछ लोगों का मानना था कि किसी भी तरह के बयान से तनाव और बढ़ेगा।
लेकिन चीन के राजदूत झांग जुन ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि सदस्य देश कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर चिंतित हैं।
सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार बैठक में इस बात पर ज़ोर रहा कि मामले को द्विपक्षीय संवाद के ज़रिए सुलझाया जाए। भारत भी इसमें द्विपक्षीय संवाद की ही बात करता है लेकिन पाकिस्तान किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की बात करता है।
कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को ख़त लिखा था, जिसके बाद ही यह बैठक हुई।
इस बैठक के बाद संयुक्त राष्ट्र में रूसी राजदूत दिमित्री पोलियांस्की ने यूएनएससी मीटिंग से पहले पत्रकारों से बात करते हुए कश्मीर के विषय पर द्विपक्षीय वार्ता का समर्थन किया।
उन्होंने कहा, "हम इस मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय वार्ता का समर्थन करते हैं। इस मुद्दे पर हमारे रुख़ में कोई बदलाव नहीं आया है। इस बैठक में हम विचारों के आदान-प्रदान के मक़सद से आए हैं।''
जब उनसे पूछा गया कि क्या आपको नहीं लगता है कि आपने काफ़ी लंबे समय से इस मुद्दे की सुध नहीं ली है, क्योंकि 1971 में काउंसिल ने इस पर बात की थी।
इस सवाल पर दिमित्री ने कहा, "मैं 1971 में पैदा भी नहीं हुआ था। ऐसे में मुझे इस बारे में नहीं पता है। हम देखेंगे।''
यह बैठक बंद कमरे में हुई। बैठक में पाकिस्तान और भारत शामिल नहीं हुए क्योंकि ये दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य नहीं हैं।
इससे पहले दिसंबर 1971 में भारत-पाकिस्तान का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पहुंचा था। जब दोनों देशों के बीच बांग्लादेश को बनाए जाने को लेकर युद्ध छिड़ा हुआ था।
साल 1965 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई के दौरान भी दोनों देशों का मामला संयुक्त राष्ट्र पहुंचा था। लेकिन इस बार साल 2019 में यह बैठक पाकिस्तान के ख़त लिखने के बाद हुई है। लेकिन अभी तक यह स्पष्ट तौर पर पता नहीं चला है कि आख़िर उस बैठक में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने भारत-पाकिस्तान से कहा क्या?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ओर से इस बैठक के संदर्भ में अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। इस बैठक के बाद से भारत लगातार इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि अनुच्छेद 370 और 35ए के तहत जम्मू-कश्मीर को मिला विशिष्ट राज्य का दर्जा और उससे जुड़े विभिन्न पहलू भारत के आंतरिक मामले हैं।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत सैयद अकबरुद्दीन ने पाकिस्तान और चीन पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे इस बैठक को तूल देने में लगे हुए हैं। कश्मीर घाटी में मौजूदा हालात को लेकर सवाल उठ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दा पहली बार एक जनवरी 1948 को आया वो भी भारत के आग्रह पर।
वर्ष 1947 में क़बायली आक्रमण के बाद जम्मू-कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने भारत के साथ सम्मिलन की संधि पर हस्ताक्षर किए। भारतीय फ़ौज मदद के लिए पहुंची और वहां उसका पश्तून क़बायलियों और पाकिस्तानी फ़ौज से संघर्ष हुआ।
भारत इस मसले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लेकर गया जहां साल 1948 में इस पर पहला प्रस्ताव आया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सूची में यह प्रस्ताव नंबर 38 था। इसके बाद इसी साल प्रस्ताव 39, प्रस्ताव 47 और प्रस्ताव 51 के रूप में तीन प्रस्ताव और आए।
17 जनवरी 1948 को प्रस्ताव 38 में दोनों पक्षों से अपील की गई कि वे हालात को और न बिगड़ने दें, इसके लिए दोनों पक्ष अपनी शक्तियों के अधीन हरसंभव कोशिश करें। साथ ही ये भी कहा गया कि सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों को बुलाएं और अपने मार्गदर्शन में दोनों पक्षों में सीधी बातचीत कराएं।
20 जनवरी 1948 को प्रस्ताव संख्या 39 में सुरक्षा परिषद ने एक तीन सदस्यीय आयोग बनाने का फ़ैसला किया, जिसमें भारत और पाकिस्तान की ओर से एक-एक सदस्य और एक सदस्य दोनों चुने हुए सदस्यों की ओर से नामित किया जाना तय किया गया। इस आयोग को तुरंत मौक़े पर पहुंचकर तथ्यों की जांच करने का आदेश दिया।
1947-48 में भारत-पाकिस्तान की जंग एक युद्धविराम के साथ ख़त्म हुई लेकिन कश्मीर समस्या का समाधान अटका ही रहा। जनवरी 1949 में यूनएन मिलिटरी ऑब्ज़र्वर ग्रुप को भारत और पाकिस्तान में भेजा गया। इस ग्रुप को भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम का जायज़ा लेना था।
तब युद्धविराम की शिकायतें मिल रही थीं और इस पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को रिपोर्ट सौंपनी थी। युद्धविराम के तहत दोनों देशों को अपने सैनिकों को वापस बुलाना था और जनमत संग्रह कराने की बात थी ताकि जम्मू-कश्मीर के लोग आत्मनिर्णय कर सकें।
भारत का तर्क था कि पूरा कश्मीर उसके पास नहीं है इसलिए जनमत संग्रह वो नहीं करा सकता। उधर पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का पालन नहीं करते हुए अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाया। भारत का तर्क था कि 1948-49 के यूएन के प्रस्ताव की प्रासंगिकता नहीं रह गई है क्योंकि जम्मू-कश्मीर की मूल भौगोलिक स्थिति पर नियंत्रण बदल चुका था। पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से को चीन को सौंप दिया था और उसके नियंत्रण वाले कश्मीर में डेमाग्रफ़ी भी बदल गई थी।
1971 में दोनों देशों की सेनाओं के बीच जंग के बाद साल 1972 में शिमला समझौता हुआ। इसमें सुनिश्चित कर दिया गया कि कश्मीर से जुड़े विवाद पर बातचीत में संयुक्त राष्ट्र सहित किसी तीसरे पक्ष का दखल मंज़ूर नहीं होगा और दोनों देश मिलकर ही इस मसले को सुलझाएंगे।
उस समय इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फ़िक़ार अली भुट्टो थे।
भारत सरकार ने कहा कि कश्मीर की स्थिति और विवाद के बारे में पहले हुए तमाम समझौते शिमला समझौता होने के बाद बेअसर हो गए हैं। ये भी कहा गया कि कश्मीर मुद्दा अब संयुक्त राष्ट्र के स्तर से हटकर द्विपक्षीय मुद्दे के स्तर पर आ गया है।
पाकिस्तान ने कहा है कि वह शिमला समझौते की समीक्षा करेगा। इसकी समीक्षा के लिए एक आयोग का गठन करेगा।
भारत के कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शुक्रवार को हुई अनौपचारिक बैठक को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने बड़ा क़दम बताया है।
उन्होंने इस बैठक का स्वागत करते हुए कहा कि लंबे अरसे बाद ऐसा हुआ है जब संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दे पर चर्चा हुई।
उन्होंने ट्वीट करके लिखा है, "मैं कब्ज़े वाले जम्मू और कश्मीर की गंभीर स्थिति पर चर्चा के लिए हुई संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक का स्वागत करता हूं। 50 सालों में यह पहली बार हुआ है जब दुनिया के सर्वोच्च कूटनीतिक मंच ने यह मुद्दा उठाया है।''
इसके साथ ही इमरान ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर पर 11 प्रस्ताव हैं और शुक्रवार को हुई बैठक इन्हीं को समर्थन देती है।
वह लिखते हैं, "संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 11 प्रस्ताव हैं जो कश्मीरियों के आत्मनिर्णय के अधिकार को दोहराते हैं।''
"संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मीटिंग इन्हीं प्रस्तावों को दोहराती है। इसलिए कश्मीर के लोगों की पीड़ा को दूर करने और इस विवाद को हल करने की ज़िम्मेदारी इसी वैश्विक संस्था पर है।''
पाकिस्तान के पत्र के बाद बुलाई गई यह बैठक बंद कमरे में हुई। भारत और पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य नहीं हैं ऐसे में वे इसमें शामिल नहीं हुए।
जब बैठक ख़त्म हुई तो संयुक्त राष्ट्र में भारत, चीन और पाकिस्तान के राजदूतों ने पत्रकारों से बात की। उस दौरान पाकिस्तान की राजदूत मलीहा लोधी ने भी वही कहा था, जो अब इमरान ख़ान ने ट्वीट करके लिखा है।
मलीहा ने कहा था, "कई दशकों के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यह मुद्दा उठा है और इस मंच पर उठने के बाद यह साबित हो गया है कि यह भारत का आंतरिक नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मामला है।''
उधर संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत सैयद अकबरुद्दीन ने अनुच्छेद 370 को आंतरिक मुद्दा बताते हुए कहा था कि भारत सरकार का हालिया फ़ैसला वहां की आर्थिक, सामाजिक विकास के लिए है।
वहीं संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत झांग जुन ने बैठक को लेकर जानकारी देते हुए कहा था कि यूएनएससी की सदस्य देश भारत के कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर भी चिंतित हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शुक्रवार को भारत के कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर अनौपचारिक बैठक हुई। यह अनौपचारिक बैठक पाकिस्तान द्वारा लिखे गए ख़त के बाद आयोजित की गई थी।
यह बैठक बंद कमरे में हुई लेकिन बैठक समाप्त होने के बाद संयुक्त राष्ट्र में भारत, चीन और पाकिस्तान के राजदूतों ने पत्रकारों से बात की।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के राजदूत सैयद अकबरुद्दीन ने कहा कि अनुच्छेद 370 का मुद्दा आंतरिक मुद्दा है और इसका बाहरी लोगों से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत सरकार का हालिया फ़ैसला वहां की आर्थिक, सामाजिक विकास के लिए है।
उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में हालात सामान्य करने के लिए आज कई फ़ैसले लिए गए हैं। इस दौरान अकबरुद्दीन ने पाकिस्तान को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि एक देश जिहाद और हिंसा की बात कर रहा है और हिंसा किसी मसले को नहीं सुलझा सकती है।
अकबरुद्दीन ने कहा कि अगर पाकिस्तान को भारत से बात करनी है तो उसे पहले आतंकवाद को रोकना होगा।
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में मौजूद संवाददाता सलीम रिज़वी ने बीबीसी हिंदी को बताया कि चीन के राजदूत ने कहा है कि सुरक्षा परिषद के देशों ने माना है कि इस मसले को शांतिपूर्ण तरीक़े से सुलझाया जाना चाहिए और एक तरफ़ा फ़ैसले नहीं लिए जाने चाहिए।
साथ ही चीन ने कहा है कि उसका मानना है कि इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के तहत सुलझाया जाना चाहिए और कश्मीर में बहुत ख़तरनाक स्थिति होने जा रही है।
बैठक के बाद संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत झांग जुन ने कहा कि सदस्यों देश वहां मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर भी चिंतित हैं।
उन्होंने कहा, "महासचिव ने भी कुछ दिन पहले बयान जारी किया था। और सुरक्षा परिषद की बैठक की चर्चा जो मैंने सुनी है उसके आधार पर कहा जाए तो, सदस्यों ने जम्मू-कश्मीर की ताज़ा स्थिति को लेकर गंभीर चिंताएं ज़ाहिर की हैं।''
उन्होंने कहा, "वो वहां के मानवाधिकार हालातों को लेकर भी चिंतित हैं। और सदस्यों की ये आम राय भी है कि संबंधित पक्ष कोई भी ऐसा इकतरफ़ा क़दम उठाने से बचे जिससे तनाव और अधिक बढ़ जाए। क्योंकि वहां तनाव पहले से ही बहुत ज़्यादा है और बहुत ख़तरनाक है।
इस दौरान चीन ने लद्दाख का मुद्दा भी उठाया। उसने कहा कि अनुच्छेद 370 लद्दाख से भी हटी है और वह इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है।
वहीं, पाकिस्तान ने कहा है कि उसने कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया है। पाकिस्तान की राजदूत मलीहा लोधी ने कहा कि कई दशकों के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यह मुद्दा उठा है और इस मंच पर उठने के बाद यह साबित हो गया है कि यह भारत का आंतरिक नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मामला है।
मलीहा ने कहा, "मुझे लगता है कि आज की बैठक ने भारत के इस दावे को खारिज कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर उसका आंतरिक मामला है। जैसा की चीनी राजदूत ने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति पर ज़ोर दिया, वहां मानवाधिकारों की स्थिति बहुत ख़राब है और भारत बेरोकटोक इनका उल्लंघन कर रहा है। इस पर भी आज सुरक्षा परिषद ने चर्चा की है।''
इस बैठक में पाकिस्तान और भारत शामिल नहीं हुए क्योंकि ये दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य नहीं हैं।









