विदेश

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को मौत की सज़ा

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ को इस्लामाबाद की विशेष कोर्ट ने देशद्रोह के मामले में मौत की सज़ा सुनाई है।

मुशर्रफ़ अभी पाकिस्तान में नहीं हैं और दुबई में अपना इलाज करा रहे हैं।  कुछ दिन पहले मुशर्रफ़ ने एक वीडियो जारी कर अपने ख़राब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा था कि जाँच आयोग उनके पास आएं और देखें कि वो अभी किस हाल में हैं।

संविधान की अवहेलना और गंभीर देशद्रोह के मुक़दमे पर उन्होंने कहा था, "यह मामला मेरे विचार में पूरी तरह से निराधार है। देशद्रोह की बात छोड़ें, मैंने तो इस देश की बहुत सेवा की, युद्ध लड़े हैं और दस साल तक देश की सेवा की है।''

विशेष कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने बहुमत से ये फ़ैसला सुनाया।

मुशर्रफ़ ने वीडियो जारी करते हुए कहा था कि संविधान की अवहेलना के मामले में उनकी सुनवाई नहीं हो रही है।

उन्होंने कहा था, "न्यायालय मेरे वकील सलमान सफ़दर तक को नहीं सुन रही है। मेरे विचार में यह बहुत ज़्यादती हो रही है और मेरे साथ न्याय नहीं किया जा रहा।''

उन्होंने माँग की कि इस आयोग को न्यायालय में सुना जाए और उनके वकील को भी सुना जाए। उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें उम्मीद है कि उनके साथ न्याय किया जाएगा।

मुशर्रफ़ की क़ानूनी सलाहकार टीम के सदस्य अख़्तर शाह ने कोर्ट के बाहर संवाददाताओं से कहा, "ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। एक आदमी इस मुल्क के अंदर आना चाहता है, लेकिन उसे (परवेज़ मुशर्रफ़ को) आने नहीं दिया गया। उसके साथ सरकार ने ज्यादती की है।''

मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ ये मुक़दमा पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने किया था जब उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) 2013 में दोबारा सत्ता में आई थी।

छह साल तक चले मुक़दमे के बाद न्यायाधीश वक़ार सेठ ने तीन सदस्यों वाली विशेष सैन्य अदालत का फ़ैसला सुनाया। दो न्यायाधीशों में से एक ने मौत की सज़ा के फ़ैसले का विरोध किया।

मुशर्रफ़ अब तक केवल एक ही बार सुनवाई में शामिल हुए हैं जब उनके ख़िलाफ़ आरोप तय हुए थे।

अब उनके पास फ़ैसले को चुनौती देने के लिए 30 दिन का वक़्त है। मगर इसके लिए उन्हें अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।

इस्लामाबाद की विशेष न्यायालय ने 31 मार्च, 2014 को देशद्रोह के एक मामले में पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख और राष्ट्रपति जनरल (रिटायर्ड) परवेज़ मुशर्रफ़ को अभियुक्त बनाया था।

वह पाकिस्तान के इतिहास में पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिनके विरुद्ध संविधान की अवहेलना का मुक़दमा चला।

दरअसल, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) 2013 के चुनावों में जीत के बाद सरकार में आई। नवाज़ शरीफ ने प्रधानमंत्री बनने के बाद पूर्व सैनिक राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ संविधान की अवहेलना का मुक़दमा दायर किया।

पूर्व सैन्य राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ एक गंभीर देशद्रोह मामले की सुनवाई करने वाली विशेष न्यायालय के चार प्रमुख बदले गए थे।

परवेज़ मुशर्रफ़ केवल एक बार विशेष न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत हुए जब उन पर आरोप लगाया गया था। उसके बाद से वो कभी कोर्ट में पेश नहीं हुए।

इस बीच मार्च 2016 में स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर मुशर्रफ़ विदेश चले गए। तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) ने एक्ज़िट कंट्रोल लिस्ट से उनका नाम हटा लिया था जिसके बाद उन्हें देश छोड़कर जाने की अनुमति दे दी गई थी।

जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने अक्तूबर 1999 में सैन्य विद्रोह कर पाकिस्तान की सत्ता अपने हाथ में ले ली थी।

2001 के जून में जनरल मुशर्रफ़ ने सैन्य प्रमुख रहते हुए स्वयं को राष्ट्रपति घोषित कर दिया था।

2002 के अप्रैल में एक विवादास्पद जनमत संग्रह करवाकर मुशर्रफ़ और पाँच साल के लिए राष्ट्रपति बन गए।

2007 के अक्तूबर-नवंबर में मुशर्रफ़ ने फिर से राष्ट्रपति चुनाव जीता। मगर उनके चुनाव को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इसके बाद उन्होंने देश में आपातकाल लागू कर दिया और मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इफ़्तिख़ार चौधरी की जगह एक नया मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया जिसने उनके चुनाव पर मुहर लगा दी।

2008 के अगस्त में मुशर्रफ़ ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा दे दिया। दो मुख्य सत्ताधारी पार्टियों के द्वारा उनके ख़िलाफ़ महाभियोग लाने के कारण उन्होंने सहमति के बाद इस्तीफ़े का फ़ैसला किया।

भारतीय बेहतर जीवन के लिए बांग्लादेश आ रहे हैं: बांग्लादेश

बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमेन ने कहा है कि भारतीय नागरिक बांग्लादेश में अच्छी अर्थव्यवस्था और मुफ़्त में भोजन के लिए आ रहे हैं।

मोमेन ने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच संबंध बेहतर और मधुर हैं।

मोमेन ने कहा, ''भारत के लोग बांग्लादेश इसलिए आ रहे हैं क्योंकि हमारी स्थति बहुत अच्छी है। हमारी अर्थव्यवस्था की स्थिति मज़बूत है। जो यहां आ रहे हैं उन्हें नौकरी मिल रही है। हाशिए के लोगों को यहां मुफ़्त में भोजन मिलता है।''

मोमेन ने कहा कि जो भारतीय बांग्लादेश में अवैध रूप से रह रहे हैं उन्हें वापस भेजा जाएगा। बांग्लादेश के विदेश मंत्री से पत्रकारों ने सवाल पूछा था कि भारतीय बांग्लादेश में घुस रहे हैं।

मोमेन ने कहा, ''भारतीय इन्हीं वजहों बांग्लादेश के लिए आकर्षित हो रहे हैं। भारत की तुलना में हमारी अर्थव्यवस्था में ज़्यादा अच्छी है। भारतीयों को नौकरियां नहीं मिल रही हैं इसीलिए वो बांग्लादेश आ रहे हैं। कुछ बिचौलिए भारत के ग़रीबों को समझाते हैं कि बांग्लादेश में भारत के ग़रीबों को मुफ़्त में भोजन मिलेगा।''

बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने कहा, ''मैंने भारत से कहा है कि अगर कोई भी बांग्लादेशी अवैध रूप से वहां रह रहा है तो बताएं हम वापस बुलाएंगे।''

मोमेन ने ढाका में रविवार को भारतीय उच्चायुक्त के साथ बैठक की और द्विपक्षीय मुद्दों पर बात की।

उन्होंने भारतीय उच्चायुक्त से एनआरसी पर भी बात की। मोमेन से बांग्लादेश और भारत के संबंधों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ''हमारे संबंध बहुत मधुर हैं। ऐसे में निराशा की कोई बात नहीं है। बांग्लादेश के नागरिकों को अपने मुल्क लौटने का अधिकार है।''

मोमेन ने भारत दौरे को रद्द करने को लेकर पूछे गए सवाल पर कोई भी टिप्प्णी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने भारत के नए नागरिकता क़ानून पर भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

मोमेन ने यह भी कहा कि उनके भारत नहीं आने से दोनों देशों के संबंधों पर असर नहीं पड़ेगा।

मोमेन ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के आरोप पर कहा, ''बांग्लादेश में हमारी सरकार में अल्पसंख्यकों का कोई उत्पीड़न नहीं हुआ। हां, ये सही है कि सैन्य शासन और अन्य सरकारों के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों का छोटे स्तर पर उत्पीड़न हुआ है। 2001 में अल्पसंख्यकों के साथ हमारी पार्टी के कार्यकर्ताओं का भी उत्पीड़न हुआ है।''

विदेश मंत्री मोमेन ने यह भी कहा कि भारत की कुछ राजनीतिक पार्टियां अपने हित के लिए एनआरसी में बांग्लादेश का नाम ले रही हैं।

भारत में एनआरसी और नए नागरिकता क़ानून का मुद्दा बांग्लादेश की विपक्षी पार्टी बीएनपी भी उठा रही है। बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनल पार्टी के महासचिव मिर्ज़ा फ़खरुल इस्लाम आलमगीर ने कहा है कि भारत के असम राज्य में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न (एनआरसी) से बांग्लादेश की आज़ादी और संप्रभुता को ख़तरा है।

यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ बांग्लादेश के अनुसार बीएनपी नेता ने ये बात पत्रकारों से मीरपुर में एक कार्यक्रम में कही है।

इस्लाम आलमगीर ने कहा, ''हमलोग शुरू से कह रहे हैं कि भारत में एनआरसी को लेकर चिंतित हैं। हमलोग को लगता है कि भारत में एनआरसी से बांग्लादेश की आज़ादी और संप्रभुता ख़तरे में है।''  आलमगीर के साथ पार्टी के और कई बड़े नेता मौजूद थे।

उन्होंने कहा कि एनआरसी सिर्फ़ बांग्लादेश नहीं बल्कि पूरे उपमहाद्वीप को अस्थिर कर देगा। आलमगीर ने कहा, "एनआरसी इस उपमहाद्वीप में संघर्ष और हिंसा को बढ़ावा देगा।''

वरिष्ठ बीएनपी नेता ने कहा कि एनआरसी का प्रमुख मक़सद उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति को नष्ट करके सांप्रदायिक राजनीति को स्थापित करना है। आलमगीर ने कहा कि उनकी पार्टी अध्यक्ष ख़ालिदा ज़िया को मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने 'प्रताड़ित' किया था।

बीएनपी नेता ने एनआरसी का ज़िक्र करते हुए बांग्लादेश की मौजूदा हसीना सरकार पर भी निशाना साधा।

उन्होंने कहा, "मौजूदा सरकार ने लोकतंत्र के ख़ात्मे के साथ ही बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों और मुक्तिसंग्राम की मूल भावना को नष्ट कर दिया है। सरकार ने देश के तौर पर हमारी सभी उपलब्धियों को भी ख़त्म कर दिया है। हमने अपना लोकतंत्र और अपने अधिकार गंवा दिए हैं।''

पाकिस्तान ने ग़ैर-मुस्लिम आबादी पर अमित शाह के दावों को ख़ारिज किया

पाकिस्तान ने भारत के गृह मंत्री अमित शाह के उन दावों को ख़ारिज कर दिया है कि उसके यहां अल्पसंख्यकों की आबादी में लगातार कमी आई है।

भारतीय संसद में नागरिकता संशोधन बिल पर बहस के दौरान अमित शाह ने कहा था कि 1947 में पाकिस्तान की कुल आबादी में धार्मिक अल्पसंख्यक 23 फ़ीसदी थे, जो 2011 में कम होकर 3.7 फ़ीसदी हो गए।

भारत सरकार ने संसद से नागरिकता संशोधन बिल पास किया है जिसके तहत पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए अवैध ग़ैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता दी जाएगी।

नए क़ानून में इन प्रवासियों में मुसलमानों को छोड़कर सभी धर्मावलंबियों को नागरिकता देने के प्रावधान हैं। बीजेपी सरकार का कहना है कि इन देशों में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हुए हैं और उनकी संख्या लगातार कम हो रही है।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता डॉक्टर मोहम्मद फ़ैसल ने पाकिस्तानी अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून से शनिवार को कहा कि अमित शाह का दावा ऐतिहासिक तथ्यों और जनगणना के नतीजों से मेल नहीं खाता है।  

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में ग़ैर-मुस्लिमों की आबादी में कमी बांग्लादेश बनने के कारण हुई है और पाकिस्तान में ग़ैर-मुस्लिमों को सताने की बात झूठ के सिवाय कुछ नहीं है।  

डॉक्टर फ़ैसल ने कहा, ''पाकिस्तान के राष्ट्र ध्वज में सफ़ेद रंग हरे रंग की तरह ही है। हमारे राष्ट्र ध्वज में सफ़ेद रंग मुल्क के अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी को दर्शाता है। अमित शाह ने जो आंकड़ा बताया है वो तब का है जब पाकिस्तान का विभाजन नहीं हुआ था।''

पाकिस्तानी अख़बार के मुताबिक़ 1947 में बँटवारे के वक़्त पाकिस्तान में कितने अल्पसंख्यक थे इसका कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है।

हालांकि पाकिस्तान की 1951 की जनगणना के अनुसार देश में अल्पसंख्यक 14.20 फ़ीसदी थे लेकिन तब बांग्लादेश नहीं बना था।

पाकिस्तान में 2017 में धर्म के आधार पर जनगणना हुई है लेकिन इसका डेटा अभी जारी नहीं किया गया है।

1998 की पाकिस्तान की जनगणना के अनुसार पाकिस्तान की कुल आबादी में अल्पसंख्यक की आबादी 3.7 फ़ीसदी थी।

एनआरसी से बांग्लादेश की आज़ादी और संप्रभुता को ख़तरा है: बांग्लादेश की विपक्षी पार्टी

बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनल पार्टी के महासचिव मिर्ज़ा फ़खरुल इस्लाम आलमगीर ने कहा है कि भारत के असम राज्य में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न (एनआरसी) से बांग्लादेश की आज़ादी और संप्रभुता को ख़तरा है।

यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ बांग्लादेश के अनुसार बीएनपी नेता ने ये बात पत्रकारों से मीरपुर में एक कार्यक्रम में कही है।

इस्लाम आलमगीर ने कहा, ''हमलोग शुरू से कह रहे हैं कि भारत में एनआरसी को लेकर चिंतित हैं। हमलोग को लगता है कि भारत में एनआरसी से बांग्लादेश की आज़ादी और संप्रभुता ख़तरे में है।'' आलमगीर के साथ पार्टी के और कई बड़े नेता मौजूद थे।

उन्होंने कहा कि एनआरसी सिर्फ़ बांग्लादेश नहीं बल्कि पूरे उपमहाद्वीप को अस्थिर कर देगा। आलमगीर ने कहा, "एनआरसी इस उपमहाद्वीप में संघर्ष और हिंसा को बढ़ावा देगा।''

वरिष्ठ बीएनपी नेता ने कहा कि एनआरसी का प्रमुख मक़सद उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति को नष्ट करके सांप्रदायिक राजनीति को स्थापित करना है।  

आलमगीर ने कहा कि उनकी पार्टी अध्यक्ष ख़ालिदा ज़िया को मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने 'प्रताड़ित' किया था।  

बीएनपी नेता ने एनआरसी का ज़िक्र करते हुए बांग्लादेश की मौजूदा हसीना सरकार पर भी निशाना साधा।

उन्होंने कहा, "मौजूदा सरकार ने लोकतंत्र के ख़ात्मे के साथ ही बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों और मुक्तिसंग्राम की मूल भावना को नष्ट कर दिया है। सरकार ने देश के तौर पर हमारी सभी उपलब्धियों को भी ख़त्म कर दिया है। हमने अपना लोकतंत्र और अपने हक़ गंवा दिए हैं।''

बांग्लादेश ने भारत के नागरिकता संशोधन क़ानून पर भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है। इतना ही नहीं, बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमिन और गृह मंत्री असदुज़्ज़मान ख़ान अपना भारत दौरा भी रद्द कर चुके हैं।

इससे पहले अब्दुल मोमिन ने भारतीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान का कड़ा विरोध किया था, जिसमें उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न की बात कही थी।   

मोमिन ने कहा था, ''जो वे हिंदुओं के उत्पीड़न की बात कह रहे हैं, वो ग़ैर-ज़रूरी और झूठ है। पूरी दुनिया में ऐसे देश कम ही हैं जहां बांग्लादेश के जैसा सांप्रदायिक सौहार्द है। हमारे यहां कोई अल्पसंख्यक नहीं है। हम सब बराबर हैं। एक पड़ोसी देश के नाते, हमें उम्मीद है कि भारत ऐसा कुछ नहीं करेगा जिससे हमारे दोस्ताना संबंध ख़राब हों। ये मसला हमारे सामने हाल ही में आया है। हम इसे ध्यान से पढ़ेंगे और उसके बाद भारत के साथ ये मुद्दा उठाएंगे।''

मोमिन ने कहा था कि धर्म के आधार पर नागरिकता के इस क़ानून से भारत का धर्मनिरपेक्ष रुख़ कमज़ोर होगा।

बांग्लादेश के अलावा पाकिस्तान भी भारत के नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध कर चुका है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र ने भी इस पर चिंता जताते हुए कहा था कि नया क़ानून बुनियादी रूप से भेदभावपूर्ण है।

मानवाधिकारों की स्थिति पर नज़र रखने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएचसीआर की ओर से शुक्रवार को एक बयान जारी कर कहा गया- "हम इस बात से चिंतित हैं कि भारत के नए नागरिकता संशोधन क़ानून की प्रकृति मूल रूप से भेदभाव करने वाली है।''

संस्था ने कहा है कि नया क़ानून अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में दमन से बचने के लिए आए धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात करता है मगर मुसलमानों को ये सुविधा नहीं देता।

यूएनएचसीआर ने लिखा है सारे प्रवासियों को, चाहे उनकी परिस्थिति कैसी भी हो, सम्मान, सुरक्षा और उनके मानवाधिकार हासिल करने का अधिकार है।

यूएनएचसीआर के प्रवक्ता की ओर से जारी बयान में उम्मीद जताई गई है कि सुप्रीम कोर्ट नए क़ानून की समीक्षा करेगा और इस बात की सावधानी से समीक्षा करेगा कि ये क़ानून अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों को लेकर भारत के दायित्वों के अनुरूप है या नहीं।

नागरिकता संशोध क़ानून का भारत के अलग-अलग हिस्सों में ज़ोरदार विरोध हो रहा है, ख़ासकर पूर्वोत्तर राज्यों में। 

जनवरी के आख़िर तक होगा ब्रेग्ज़िट : बोरिस जॉनसन

ब्रिटेन के आम चुनाव में सत्ताधारी कंज़र्वेटिव पार्टी को बड़ी जीत हासिल होने के बाद पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा है कि वो उम्मीद करते हैं कि इस ऐतिहासिक जीत से ब्रेग्ज़िट बहस को क्लोज़र यानी समापन मिलेगा।

बोरिस जॉनसन के मुताबिक़ ब्रिटेन अगले महीने के अंत तक यूरोपीय संघ से बाहर निकल जायेगा। डाउनिंग स्ट्रीट पर दिए अपने संबोधन में जॉनसन ब्रेग्ज़िट को अंजाम तक पहुंचाने में सभी के एकजुट होने का आह्वान किया।

उधर, ब्रसल्स में यूरोपीय संघ के नेताओं ने कहा है कि ब्रिटेन के साथ ब्रेग्ज़िट नीति अभी भी प्रमुख बाधाओं का सामना कर रही है।

मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन क़ानून पर संयुक्त राष्ट्र ने चिंता जताई

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग ने भारत में नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि नया क़ानून बुनियादी रूप से भेदभाव करने वाला है।

मानवाधिकारों की स्थिति पर नज़र रखने वाली संस्था यूएनएचसीआर की ओर से शुक्रवार को एक बयान जारी कर कहा गया- "हम इस बात से चिंतित हैं कि भारत के नए नागरिकता संशोधन क़ानून की प्रकृति मूल रूप से भेदभाव करने वाली है।''  

संस्था ने कहा है कि नया क़ानून अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में दमन से बचने के लिए आए धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात करता है मगर मुसलमानों को ये सुविधा नहीं देता।

यूएनएचसीआर ने लिखा है सारे प्रवासियों को, चाहे उनकी परिस्थिति कैसी भी हो, सम्मान, सुरक्षा और उनके मानवाधिकार हासिल करने का अधिकार है।

यूएनएचसीआर के प्रवक्ता की ओर से जारी बयान में उम्मीद जताई गई है कि सुप्रीम कोर्ट नए क़ानून की समीक्षा करेगा और इस बात की सावधानी से समीक्षा करेगा कि ये क़ानून अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों को लेकर भारत के दायित्वों के अनुरूप है या नहीं।

बांग्लादेश के विदेश मंत्री और गृह मंत्री ने भारत दौरा क्यों रद्द किया?

बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमिन और गृह मंत्री असदुज़्ज़मान ख़ान ने अपना भारत दौरा रद्द कर दिया है।

बांग्लादेश के विदेश मंत्री अब्दुल मोमिन 12 से 14 दिसंबर तक अपनी दो दिवसीय यात्रा पर भारत दौरे पर आने वाले थे। वहीं असदुज़्ज़मान ख़ान भी 13 दिसंबर को एक पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत भारत आने वाले थे।

बांग्लादेश उच्चायुक्त के सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि गृह मंत्री असदुज़्ज़मान ख़ान की यात्रा भी रद्द हो गई है। उनका कार्यक्रम पहले से निर्धारित था, हालाँकि यात्रा रद्द होने की कोई वजह नहीं बताई गई है।

समाचार एजेंसी पीटीआई और एएनआई ने कूटनीतिक सूत्रों के हवाले से ये ख़बर दी है।  

हालाँकि, समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक विदेश मंत्री अब्दुल मोमिन ने अपना दौरा रद्द करने की वजह देश के अंदरूनी हालात को बताया है।

एएनआई ने मोमिन के हवाले से कहा, ''मुझे दिल्ली में हो रहे बुद्धिजीवी देबोश और विजय दिवस कार्यक्रमों में हिस्सा लेना था, लेकिन हमारे राज्य मंत्री मैड्रिड में हैं और विदेश सचिव हेग में। ऐसे में मुझे अपनी यात्रा रद्द करनी पड़ी है।''

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा, ''हमें ये मालूम है कि बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने दौरा रद्द किया है। उन्होंने अपने न आने की वजह भी बताई है। हमें उनकी बात को स्वीकार करना चाहिए। जहां तक दोनों देशों के रिश्तों की बात करें तो ये मज़बूत हैं। मुझे नहीं लगता कि दोनों देशों के रिश्तों में कोई फ़र्क़ पड़ेगा।''

जब रवीश कुमार से मोमिन के अमित शाह के बयान पर दी प्रतिक्रिया के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ''कैब को लेकर बांग्लादेश के विदेश मंत्री की टिप्पणी को लेकर कंफ्यूजन है। हमने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को लेकर जो कहा है, वो सैन्य शासन के लिए कहा गया था। ये मौजूदा सरकार पर टिप्पणी नहीं है।''

इससे पहले, मोमिन नागरिक संशोधन बिल यानी कैब को लेकर भारत के केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर विरोध जता चुके हैं।

अमित शाह ने कहा था कि बांग्लादेश में हिंदुओं का उत्पीड़न हो रहा है।  

इस पर मोमिन ने कहा, ''जो वे हिंदुओं के उत्पीड़न की बात कह रहे हैं, वो ग़ैर-ज़रूरी और झूठ है। पूरी दुनिया में ऐसे देश कम ही हैं जहां बांग्लादेश के जैसा सांप्रदायिक सौहार्द है। हमारे यहां कोई अल्पसंख्यक नहीं है। हम सब बराबर हैं। एक पड़ोसी देश के नाते, हमें उम्मीद है कि भारत ऐसा कुछ नहीं करेगा जिससे हमारे दोस्ताना संबंध ख़राब हों। ये मसला हमारे सामने हाल ही में आया है। हम इसे ध्यान से पढ़ेंगे और उसके बाद भारत के साथ ये मुद्दा उठाएंगे।''

मोमिन ने कहा था कि धर्म के आधार पर नागरिकता के इस क़ानून से भारत का सेक्यूलर स्टैंड कमज़ोर होगा।

इससे पहले मीडिया में ऐसी ख़बरें आईं थीं कि जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच गुवाहाटी में होने वाली बैठक को भी टाला जा सकता है या मुलाकात की जगह को बदला जा सकता है।

शिंजो आबे और मोदी के बीच 15 और 16 दिसंबर को गुवाहाटी में बैठक होनी है।

रवीश कुमार ने शिंजो आबे की भारत यात्रा को लेकर कहा, ''सच्चाई तो ये है कि फिलहाल मेरे पास इस मामले में कोई अपडेट नहीं है।''

ईरान ने क्यों कहा, 'भारत अपनी रीढ़ और मज़बूत करे'?

ईरान के विदेश मंत्री जावेद ज़ारिफ़ ने कहा है कि अगर संपूर्णता में चीज़ों को देखें तो इस्लामिक गणतांत्रिक सभ्यता ईरान और भारत के संबंध टूट नहीं सकते।

हालांकि जावेद ज़ारिफ़ ने कहा कि भारत को अपनी रीढ़ और मज़बूत करनी चाहिए ताकि हमारे ऊपर प्रतिबंधों को लेकर अमरीका के दबाव के सामने झुकने से इनकार कर सके।

ज़ारिफ़ ने भारत और ईरान के बीच सूफ़ी परंपरा के रिश्तों का भी ज़िक्र किया। ईरानी विदेश मंत्री तेहरान में पत्रकारों से बातचीत में ये बातें कह रहे थे। उन्होंने कहा कि अमरीकी प्रतिबंधों से पहले उन्हें उम्मीद थी कि भारत ईरान का सबसे बड़ा तेल ख़रीदार देश बनेगा। उन्होंने कहा कि अमरीकी दबाव के सामने भारत को और प्रतिरोध दिखाना चाहिए।

ज़ारिफ़ ने कहा, ''ईरान इस बात को समझता है कि भारत हम पर प्रतिबन्ध नहीं चाहता है लेकिन इसी तरह वो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को भी नाराज़ नहीं करना चाहता है। लोग चाहते कुछ और हैं और करना कुछ और पड़ रहा है। यह एक वैश्विक रणनीतिक ग़लती है और इसे दुनिया भर के देश कर रहे हैं। आप ग़लत चीज़ों को जिस हद तक स्वीकार करेंगे और इसका अंत नहीं होगा और इसी ओर बढ़ने पर मजबूर होते रहेंगे।  भारत पहले से ही अमरीका के दबाव में ईरान से तेल नहीं ख़रीद रहा है।''

जावेद ज़ारिफ़ ने ये बातें भारतीय महिला पत्रकारों के एक दल से कही।

पिछले साल ट्रंप ईरान के साथ हुए अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते से बाहर निकल गए थे। ट्रंप का कहना था कि ईरान परमाणु समझौते की आड़ में अपना परमाणु कार्यक्रम चला रहा है। इसी समझौते के तहत ईरान से 2015 में अमरीकी प्रतिबंध हटा था लेकिन ट्रंप ने फिर से इन प्रतिबंधों को लागू कर दिया था। अमरीकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से ठहर गई है। भारत ने भी इन्हीं प्रतिबंधों के कारण ईरान से तेल ख़रीदना बंद कर दिया।

जावेद ज़ारिफ़ ने कहा, "अगर आप हमसे तेल नहीं ख़रीदेंगे तो ईरान आपका चावल नहीं ख़रीदेगा।''

ईरान ने भारत को ये सुविधा दे रखी दी थी कि तेल का भुगतान अपनी मुद्रा रुपया में करे। यह भारत के लिए फ़ायदेमंद था क्योंकि इससे रुपये की मज़बूती भी बनी रहती थी और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव भी नहीं बढ़ता था। ज़ारिफ़ ने चाबहार पोर्ट के निर्माण में धीमी गति के लिए भी भारत से निराशा ज़ाहिर की।

ज़ारिफ़ ने कहा, "चाबहार भारत और ईरान के लिए काफ़ी अहम है।  चाबहार से क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित होगी। अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता आएगी और इसका मतलब है कि आतंकवाद पर नकेल कसा जा सकता है।''

ज़ारिफ़ ने कहा कि अमरीकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की 80 मिलियन आबादी भुगत रही है। 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान लगातार अमरीकी प्रतिबंध झेल रहा है। इस क्रांति से ईरान में पश्चिम समर्थित शासक शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन का अंत हो गया था।

गोटाभाया के श्रीलंका का राष्ट्रपति चुने जाने से मुसलमान क्यों चिंतित हैं?

श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में जैसे ही गोटाभाया राजपक्षे के जीतने की ख़बर आई, उनके समर्थक और पार्टी कार्यकर्ता पार्टी मुख्यालय पर इकट्ठा हो गए। लोगों के भाव सतर्कता से भरे थे लेकिन अधिकतर इस बात को लेकर संतुष्ट थे कि राजपक्षे परिवार फिर से सत्ता में आ गया है।

यह एक परिवार का मामला रहा है। गोटाभाया के भाई और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे 10 सालों तक यहां रहे और ऐसा अनुमान है कि वह अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। दोनों भाई पोस्टर्स और बैनर्स में एक साथ नज़र आते हैं।

राजपक्षे के लिए अभियान चलाने वाले वकीलों के एक समूह में शामिल सगाला अभयाविक्रमे कहती हैं, "ये हमारी जीत का दिन है। मैंने इसके लिए चार साल से अधिक समय तक काम किया है।''

वो साफ़तौर पर कहती हैं कि गोटाभाया ही ऐसे व्यक्ति हैं जो चीज़ें ठीक कर सकते हैं।

"हमने उन्हें रक्षा मंत्री के तौर पर देखा है, उन्होंने 30 साल तक चलने वाले गृह युद्ध को ख़त्म किया।''

सगाला अभयाविक्रमे 10 साल पहले एलटीटीई को हराने की लड़ाई का श्रेय भी राजपक्षे टीम को देती हैं। वो कहती हैं कि अगर गोटाभाया राजपक्षे होते तो ईस्टर हमला नहीं होता।

राजपक्षे की एक दूसरी समर्थक जनाका अरुणाशंथा कहती हैं, "मुझे लगता है कि यह श्रीलंका के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ है।''

"अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर मेरा मानना है कि अगले पांच सालों में देश हर मामले में बेहतर होगा। हमारी उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं।''

सात महीने पहले इस्लामी चरमपंथियों द्वारा किए गए सिलसिलेवार बम धमाकों से श्रीलंका अभी भी दहला हुआ है। इन हमलों ने उसकी अर्थव्यवस्था को ही नहीं बल्कि इस द्वीप के नाज़ुक सांप्रदायिक संबंधों के भी तहस-नहस कर दिया था। इस घटना ने सरकार में जनता के विश्वास में अंतिम कील का काम किया।

हालांकि, गोटाभाया राजपक्षे के जीतने की ख़बर इस देश के अल्पसंख्यक समुदाय के लिए बेचैनी भरी रही होगी जिन्होंने उनके प्रतिद्वंद्वी सजीता प्रेमदासा को वोट दिया था।

श्रीलंका का मुस्लिम समुदाय सजीता प्रेमदासा को अधिक उदार मानते हैं। श्रीलंका का उत्तरी इलाक़ा जो तमिल बहुसंख्यक है, वहां प्रेमदासा को वोट मिले हैं। विभिन्न समुदायों को एकजुट रखना और युद्ध के बाद मेल-मिलाप की कोशिश करना एक कठिन काम होगा।

बीते सात महीनों में कई मुसलमानों का कहना है कि कट्टरपंथी बौद्ध समुदायों ने हाल के सालों में उनके ख़िलाफ़ अभियान चलाया है जो अब खुलकर दिखाई दे रहा है।

मुसलमानों का कहना है कि उनकी दुकानों और व्यवसायों का बहिष्कार किया जा रहा है और सड़कों पर खुलेआम उन्हें अपमानित किया जाता है, उनके बच्चों को स्कूलों में ख़ास नामों से बुलाया जाता है।

बहुत से लोग सरेआम बोलने से घबराते हैं लेकिन वो विश्वास से कहते हैं कि वो राजपक्षे की जीत से डरे हैं। राजपक्षे बहुसंख्यक बौद्ध समुदायों के हितों को बढ़ावा देते नज़र आए हैं। साथ ही उनके आलोचक उन पर मुस्लिम विरोधी चरमपंथियों को बचाने का आरोप लगाते हैं।

एक मुस्लिम महिला ने अपनी चिंता ज़ाहिर की। मुसलमानों की इस बेचैनी को मैंने चुनाव के दौरान लगातार महसूस किया है।

वो महिला कहती हैं, "गोटाभाया राजपक्षे अगर जीतते हैं तो मैं हिंसा और नस्लवाद देखूंगी। कई नस्लवादी समूह इस पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं।''  

रविवार को जब चुनावी नतीजे आए तो राजधानी कोलंबो की सड़कें सुनसान और शांत थीं। अधिकारियों ने प्रदर्शनों और लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाया हुआ था। नेता शांति की अपील कर रहे थे।

साथ ही राजपक्षे भी एकता बनाए रखने का वादा कर चुके हैं। यह प्रतिक्रिया उस डर के बाद आई है जो अल्पसंख्यक समुदायों ने बताया है।  उनका कहना है कि नागरिक स्वतंत्रता की कीमत पर सुरक्षा को लेकर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

भले ही राजनीतिक इरादा वास्तविक हो लेकिन चुनावी परिणामों ने दिखाया है कि श्रीलंका कितना ध्रुवीकृत है। इसलिए एकता हासिल करना कठिन दिखता है। 

क्या ट्रंप ने महाभियोग की सुनवाई में गवाहों को धमकाने की कोशिश की?

अमरीकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ महाभियोग जांच से जुड़ी सार्वजनिक सुनवाई का दूसरा दिन था और इसकी शुरुआत एक बार फिर धमाकेदार रही।

अमरीका के राष्ट्रपति सुनवाई के दौरान कक्ष में मौजूद नहीं थे, इसके बावजूद वहां उनकी मौजूदगी महसूस की गई।

ये सुनवाई टीवी पर लाइव चल रही थी। यूक्रेन के लिए अमरीका की पूर्व राजदूत मैरी योवानोविच जब सुनवाई के दौरान अपना बयान दे रही थीं, उसी वक्त राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्विटर के ज़रिए उन पर हमला बोला।

ट्वीट में उन्होंने मैरी योवानोविच पर सोमालिया में उथल-पुथल मचाने का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा, "हर जगह मैरी योवानोविच द्वेषपूर्ण होती है। सोमालिया में भी मैरी ने यही किया था। वहां क्या हुआ?"

उनके इस ट्वीट की जानकारी सभा में भी पहुंची। महाभियोग की जांच देख रही इंटेलिजेंस कमिटी के चेयरमैन एडम शिफ ने योवानोविच को इसकी जानकारी दी।  

इस पर योवानोविच ने कहा कि ये धमकी देने जैसा है। सोमालिया वाले आरोप पर योवानोविच ने कहा, "मुझे नहीं लगता मेरे पास इतनी ताक़त है। ना मोगादिशु में, ना सोमालिया में और नहीं कहीं और।''

उनका ये जवाब भी टीवी पर लाइव प्रसारित किया गया।

चेयरमैन एडम शिफ ने भी कहा कि ट्रंप के ट्वीट को चश्मदीदों को डराने-धमकाने का तरीका कहा जा सकता है।

हालांकि ट्रंप ने कहा कि उनके ट्वीट किसी को धमकाने के लिए नहीं थे।

ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उन्होंने महाभियोग से जुड़ी सुनवाई देखी और "ये अपमानजनक है"।

रिपब्लिकन सांसदों ने भी धमकाने के दावों को खारिज किया। सांसद जिम जॉर्डन ने कहा, "चश्मदीद अपना बयान दे रही थी। अगर शिफ उन्हें ट्वीट पढ़कर नहीं बताते तो उन्हें इसके बारे में पता ही नहीं चलता।''

महाभियोग जांच में ये देखा जा रहा है कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य मदद इसलिए रोकी थी, क्योंकि वो अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी जो बाइडन के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में जांच शुरू करनावा चाहते थे और इसी के लिए वो दबाव बना रहे थे।

हालांकि ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया। उनका कहना है कि ये कार्यवाही "राष्ट्रपति का उत्पीड़न" करने के लिए हो रही है।

मैरी योवानोविच को मई में यूक्रेन के राजदूत के पद से हटा दिया गया था।  यानी उन्हें राष्ट्रपति ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति के बीच उस विवादित फोन कॉल के दो महीने पहले हटा दिया गया था, जिसकी वजह से ये जांच शुरू हुई है।

एक मोटे तौर पर लिखी गई ट्रांसक्रिप्ट से पता चला कि ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर ज़ेलिन्स्की से बाइडन और उनके बेटे के खिलाफ आरोपों की जांच करने की अपील की थी। दरअसल वे यूक्रेन की एक गैस कंपनी के बोर्ड में शामिल थे।

एक अमरीकी राजनयिक सहयोगी ने महाभियोग की जांच के दौरान बताया कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप और यूरोपीय संघ के लिए अमरीका के राजदूत गोर्डन सोंडलैंड के बीच की बात को सुना था, जिसमें कहा जा रहा है कि "जांचों" के बारे में चर्चा हो रही थी।

विदेश मंत्रालय के अधिकारी डेविड होल्म्स ने बंद दरवाज़ों के पीछे शुक्रवार को हुई सुनवाई में बयान दिया कि सोंडलैंड ने ट्रंप को यूक्रेन के एक रेस्टोरेंट से फोन किया था।

सीबीएस न्यूज़ के मुताबिक उनके पास बयान की कॉपी है, जिसमें होल्म्स ने कहा है, "मैंने सुना कि राष्ट्रपति ट्रंप ने पूछा, क्या वो (यूक्रेन के राष्ट्रपति) जांच करेंगे?"

राजदूत सोंडलैंड ने जवाब में कहा कि 'वो करेंगे', उन्होंने कहा कि 'राष्ट्रपति ज़ेलिन्स्की हर वो चीज़ करेंगे, जो आप चाहते हो'।  

वहीं यूक्रेन के लिए अमरीका के राजदूत बिल टेलर ने अपने बयान में कहा कि उनके एक सहयोगी ने भी यही बातचीत सुनी है।

टेलर के मुताबिक सोंडलैंड ने सहयोगी से कहा कि राष्ट्रपति को यूक्रेन से जुड़े किसी भी मामलों में सिर्फ बाइडन के खिलाफ जांच से मतलब है।

ट्रंप ने कहा है कि उन्हें इस कॉल के बारे में कोई जानकारी नहीं है। कहा जा रहा है कि ये फ़ोन 26 जुलाई को किया गया था, यानी ट्रंप-ज़ेलिन्स्की के विवादित फोन कॉल के एक दिन बाद।