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तालिबान ने कहा, बातचीत रद्द करने से अमरीका को ज़्यादा नुक़सान

तालिबान ने अफ़ग़ान शांति वार्ता से पीछे हटने के अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के फ़ैसले की आलोचना करते हुए कहा है कि इससे ज़्यादा नुक़सान अमरीका को ही होगा।

तालिबान ने एक बयान जारी कर कहा है कि ये फ़ैसला परिपक्वता और अनुभव की कमी को दर्शाता है।

उन्होंने दावा किया कि कि अंतिम लम्हों तक सब सही जा रहा था।

अमरीकी राष्ट्रपति को रविवार को कैंप डेविड में तालिबान के वरिष्ठ नेताओं और अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी से मुलाक़ात करनी थी मगर इससे एक दिन पहले ट्रंप ने ट्वीट कर बैठक रद्द कर दी।

ट्रंप की तालिबान और अफ़ग़ान सरकार से अलग-अलग मुलाक़ात होनी थी क्योंकि तालिबान अफ़ग़ान सरकार को अमरीका की कठपुतली बताता है और उससे सीधे बात करने से इनकार करता है।

हालांकि अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने अमरीका के फ़ैसले का स्वागत करते हुए इसे सही वक़्त पर उठाया गया सही क़दम बताया है।

अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ शांति समझौते से पीछे हटने का ऐलान किया है।

ट्रंप ने एक के बाद एक कई ट्वीट कर कहा है कि उन्हें रविवार को कैंप डेविड में तालिबान नेताओं और अफ़ग़ान राष्ट्रपति के साथ एक गुप्त बैठक में हिस्सा लेना था मगर अब इसे रद्द कर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि काबुल में हुए कार बम धमाके के बाद यह क़दम उठाया जा रहा है जिसमें एक अमरीकी सैनिक समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी। तालिबान ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी।

अफ़ग़ानिस्तान के लिए विशेष अमरीकी राजदूत ज़ल्मे ख़लीलज़ाद ने गत सोमवार को तालिबान के साथ 'सैद्धांतिक तौर' पर एक शांति समझौता होने का एलान किया था।

प्रस्तावित समझौते के तहत अमरीका अगले 20 हफ़्तों के भीतर अफ़ग़ानिस्तान से अपने 5,400 सैनिकों को वापस लेने वाला था।

हालाँकि अमरीकी राजदूत ने कहा था कि समझौते पर अंतिम मुहर राष्ट्रपति ट्रंप को ही लगानी है।

गुरुवार को काबुल में हुए कार बम धमाके के बाद ये चिंता जताई जाने लगी थी कि तालिबान के साथ वार्ता के बावजूद अफ़ग़ानिस्तान में आए दिन होने वाली हिंसा बंद नहीं हो पाएगी।

2001 में अमरीकी सैन्य अभियान के बाद से फ़िलहाल पहली बार अफ़ग़ानिस्तान में एक बहुत बड़े हिस्से पर चरमपंथियों का नियंत्रण हो गया है।

तालिबान अभी तक अफ़ग़ान सरकार से बातचीत करने से ये कहते हुए इनकार करते रहे हैं कि वो अमरीका की कठपुतली है।

अमरीका और तालिबान के बीच क़तर में अब तक नौ दौर की शांतिवार्ता हो चुकी है।

प्रस्तावित समझौते में ये प्रावधान था कि अमरीकी सैनिकों की विदाई के बदले में तालिबान ये सुनिश्चित करता कि अफ़ग़ानिस्तान का इस्तेमाल कभी भी अमरीका और उसके सहयोगियों पर हमले के लिए नहीं किया जाएगा।

हालाँकि अफ़ग़ानिस्तान में कई लोगों को ये आशंका है कि इस समझौते के बाद कहीं दोबारा तालिबान के शासन में लगी पाबंदियों वाला दौर ना आ जाए।

तालिबान ने 1996 से 2001 तक अफ़ग़ानिस्तान पर शासन किया था।

अफ़ग़ानिस्तान में 2001 में अमरीका की अगुआई में शुरु हुए सैन्य अभियान के बाद से अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सेना के लगभग 3,500 सदस्यों की जान जा चुकी है जिनमें 2,300 अमरीकी हैं।

अफ़ग़ानिस्तान के आम लोगों, चरमपंथियों और सुरक्षाबलों की मौत की संख्या का अंदाज़ा लगाना कठिन है।

2019 में संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि वहाँ 32,000 से ज़्यादा आम लोगों की मौत हुई है।

वहीं ब्राउन यूनिवर्सिटी के वॉटसन इंस्टीच्यूट का कहना था कि वहाँ 58,000 सुरक्षाकर्मी और 42,000 विद्रोही मारे गए।

कश्मीर के लिए आख़िरी गोली, आख़िरी सिपाही, आख़िरी सांस तक लड़ेंगे: पाकिस्तान सेना

पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ़ गफ़ूर ने कहा है कि कश्मीर के लिए न चाह कर भी युद्ध करना हमारी मजबूरी होगी।

उन्होंने कहा, "कश्मीर के लिए हम आख़िरी गोली, आख़िरी सिपाही, आख़िरी सांस तक लड़ेंगे। अब चुनाव भारत और बाक़ी दुनिया को करना है।''

गफ़ूर ने कहा, "कश्मीरियों की तीसरी पीढ़ी के डीएनए में आज़ादी का जज्बा है। इसे जितना दबाएंगे वो उतना ही तेज़ होगा। जिस दिन कश्मीर से कर्फ़्यू हटा मानवाधिकार के उल्लंघन के कारण पूरे दुनिया की नज़र उस पर जाएगी।''

कश्मीर के मुद्दे पर बात करने के लिए पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ़ गफ़ूर ने बुधवार को प्रेस वार्ता का आयोजन किया।

इस प्रेस वार्ता की शुरुआत उन्होंने यह कहते हुए की कि वे कश्मीर के हालात और राष्ट्रीय सुरक्षा पर इसके असर पर बात करेंगे।

इस दौरान उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की भौगौलिक स्थिति की दुनिया और क्षेत्रीय देश अनदेखी नहीं कर सकते।

इस दौरान गफ़ूर ने कहा कि कश्मीरियों को हम यह संदेश देना चाहते हैं कि हम आपके साथ खड़े हैं। आपकी मौजूदा मुश्किलों का हमें ऐतबार है।  आपको आपका हक़ मिल कर रहेगा, अब इसका वक्त आ कर रहेगा।

उन्होंने कहा, "पाकिस्तान की आज़ादी की जद्दोज़हद 1947 में नहीं, 1857 से शुरू हुई थी। कश्मीर की आज़ादी के लिए किसी भी तरह का समझौता नहीं होगा।''

गफ़ूर ने कहा कि भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश हैं, जहां हिटलर के अनुयायी सत्ता में हैं। विश्व समुदाय का भारत में दिलचस्पी है।

उन्होंने कहा कि चीन एक उभरती हुई विश्व शक्ति है। चीन को भी भारत के साथ कुछ समस्याएं हैं लेकिन दोनों के बीच स्थिर आर्थिक रिश्ते भी हैं। अफ़ग़ानिस्तान ने बीते कई वर्षों में युद्ध, शहादत और जानमाल के नुकसान के सिवा कुछ नहीं देखा है।

गफ़ूर ने कहा कि पाकिस्तान का ईरान के साथ अच्छा रिश्ता है लेकिन मध्य-पूर्व में जो हालात हैं उसकी वजह से ईरान कुछ समस्याओं का सामना कर रहा है। लेकिन क्षेत्रीय शांति में ईरान की बहुत बड़ी भूमिका है।

उन्होंने कहा कि भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) और नाज़ी विचारधारा सत्ता में है। उनकी वजह से मुसलमान और दलितों समेत अल्पसंख्यकों की सुरक्षा वहां ख़तरे में हैं। भारत में अभी ऐसे हालात हैं कि वहां धार्मिक और सामाजिक स्वतंत्रता नहीं है।

गफ़ूर ने कहा कि एक ओर भारत के कब्जे वाली कश्मीर में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फासीवादी सरकार ने नेहरू के कदमों को उखाड़ दिया है।

उन्होंने कहा कि वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के सशस्त्र बल देश में शांति बहाली और क्षेत्रीय शांति में अपनी भूमिका निभा रहा है।

गफ़ूर ने कहा कि कश्मीर में मौजूदा स्थिति के बावजूद हमने देश में हालात को काबू में रखा है।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पद संभालने के तुंरत बाद दिए अपने पहले भाषण में भारत को बातचीत का न्योता दिया था। इसके जवाब में उन्होंने दो लड़ाकू विमान भेजे, जिसका हमने माकूल जवाब दिया।

गफ़ूर ने कहा कि परमाणु संपन्न देश के पास युद्ध कोई रास्ता नहीं है।

उन्होंने कहा कि भारत ने परोक्ष रूप से पाकिस्तान पर हमला करना जारी रखा है जिसका एक उदाहरण भारतीय जासूस कुलभूषण जाधव था।

गफ़ूर ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में सुलह प्रक्रिया में हम एक भूमिका अदा कर रहे हैं। अगर अफ़ग़ानिस्तान में शांति बहाल हो जाती है तो पश्चिमी सीमा पर तैनात हमारे सैनिकों को धीरे धीरे हटा लिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि भारत यह सोच रहा है कि अगर पश्चिमी सीमा से पाकिस्तान की सेना हट गई तो इससे उन्हें ख़तरा होगा। इसलिए वो शायद यह सोच रहा है कि वो कुछ ऐसा काम कर दे कि जिसका पाकिस्तान भरपूर जवाब नहीं दे सके।

उन्होंने कहा कि भारत यह सोचता है कि वो हमारे ख़िलाफ़ कार्रवाई करके हमें कमज़ोर कर देगा। हम भारत को बताना चाहते हैं कि लड़ाइयां केवल हथियारों और अर्थव्यवस्था से नहीं बल्कि देशभक्ति और सिपाही की काबिलियत पर लड़ी जाती हैं।

गफ़ूर ने भारत को चेताते हुए कहा कि 27 फ़रवरी आपको याद रहनी चाहिए और हमारी सेना तैयार बैठी है।

उन्होंने कहा कि 5 अगस्त को मोदी सरकार ने कश्मीर में हालात और ख़राब कर दिए। 72 साल से अंतरराष्ट्रीय ताकत़ों ने इसको इतनी तवज्जो नहीं दी जितनी इसे मिलनी चाहिए थीं। अब इस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ध्यान देना ही पड़ेगा। अब यह मसला पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच एक ऐसा मसला बन गया है जिसका हल होना बेहद ज़रूरी है।

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को हटा कर भारत सरकार कश्मीर की मौजूदा स्थिति में इस तरह बदलाव करना चाहती है जिससे वहां कश्मीरियों का रहना मुश्किल हो जाए।

उन्होंने कहा कि बीते एक महीने से अधिकृत कश्मीर के हर घर के बाहर बंदूक लिए भारतीय सैनिक खड़े हैं और वहां स्कूल, अस्पताल, दफ़्तर सब बंद हैं। वहां ज़िंदगी रुकी हुई है।

उन्होंने कहा कि वहां के नेताओं को नज़रबंद रखा गया है, विपक्ष के नेताओं को भी वहां नहीं जाने दिया गया।

उन्होंने कहा कि दोनों देश परमाणु हथियार संपन्न हैं इसलिए यहां युद्ध नहीं हो सकता है।  कश्मीर पर भारत की इस कार्रवाई के बाद से पाकिस्तान में कूटनीति, अर्थव्यवस्था, सूचना, इंटेलिजेंस, क़ानून, वित्त सभी मोर्चों पर एक साथ काम चल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हम कश्मीर के मसले को संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में भी ले कर गए जहां 50 साल बाद इस मुद्दे पर चर्चा हुई।

उन्होंने कहा कि हमारे विदेश मंत्री ने 36 देशों के विदेश मंत्रियों से इस मुद्दे पर बात की और उसका नतीज़ा यह रहा कि अब दुनिया इस मसले पर बात कर रही है।

उन्होंने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने मध्यस्थता से इंकार किया है लेकिन वो ट्रंप से किस मसले पर बात कर रहे हैं?

अंत में उन्होंने कहा कि कश्मीर के लिए न चाह कर भी युद्ध करना पाकिस्तान की मजबूरी होगी।

पाकिस्तान ने कश्मीरियों का मुद्दा मालदीव में उठाया

मालदीव की राजधानी माले में आयोजित चौथे साउथ एशियन स्पीकर्स समिट में भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच तीखी झड़प हुई है।

भारत की ओर से राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश नारायण सिंह, लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला और पाकिस्तान की ओर से सीनेटर क़ुर्तुलऐन मर्री तथा पाक नेशनल असेम्बली के डिप्टी स्पीकर क़ासिम सूरी इस समिट में मौजूद थे।

समिट में पाकिस्तान ने जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 370 को ख़त्म किए जाने का मुद्दा उठाने की कोशिश की।

क़ासिम सूरी ने कहा कि 'कश्मीरियों पर हो रहे अत्याचार की अनदेखी नहीं की जा सकती।''

इस पर फौरन कड़ी आपत्ति जताते हुए हरिवंश सिंह ने कहा, ''हम यहां भारत के आंतरिक मुद्दे को उठाए जाने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हैं। हम इस मंच का राजनीतिकरण करने की कोशिश को भी खारिज़ करते हैं।''

इस पर हरिवंश नारायण सिंह को टोकते हुए पाकिस्तान की प्रतिनिधि क़ुर्तुलऐन मर्री ने कहा, ''पाकिस्तान खुद चरमपंथ का शिकार है, आप इस तरह की टिप्पणी कैसे कर सकते हैं? चरमपंथ की वजह से हमने सबसे ज़्यादा लोग खोए हैं?''

भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच माले की समिट में ये बहस ऐसे समय हुई है जब जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने के बाद कश्मीर घाटी में तनाव बना हुआ है।

इसके विरोध में पाकिस्तान में रैलियां और विरोध प्रदर्शन हुए हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान भी कह चुके हैं कि वो इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

इस्लामिक देशों के समूह का कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग

इस्लामिक देशों के समूह आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) ने एक बयान जारी कर कहा है कि वो कश्मीर के हालात पर नज़र रखे हुए है।

इस्लामिक सहयोग संगठन ने कहा है कि वो कश्मीर के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त स्थिति संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षित जनमत संग्रह के माध्यम से इसके अंतिम निपटान की पुष्टि करता है।

ओआईसी ने भारत के कश्मीर से तुंरत कर्फ्यू हटाने और संचार सेवाएं बहाल करने की मांग की है। ओआईसी ने कहा है कि कश्मीर मुद्दे का समाधान संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत ही किया जाना चाहिए।

एनआरसी को इमरान ख़ान ने मुसलमानों का नस्लीय सफ़ाया कहा

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में जारी राष्ट्रीय नागरिकता सूची को मोदी सरकार की बड़ी योजना का हिस्सा बताते हुए नस्लीय सफ़ाया कहा है।

एक ट्वीट में इमरान ख़ान ने कहा, "भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में आ रही मोदी सरकार की मुसलमानों के नस्लीय सफ़ाये की रिपोर्टों से दुनिया भर में चिंता पैदा होनी चाहिए कि कश्मीर पर अवैध क़ब्ज़ा मुसलमानों को निशाना बनाने की व्यापक नीति का हिस्सा है।''

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की एनआरसी से जुड़ी ख़बरों के लिंक भी ट्वीट किए हैं।

भारत के जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने के बाद से ही इमरान ख़ान लगातार कश्मीर के मुद्दे को उठा रहे हैं। इमरान ख़ान कह चुके हैं कि वो कश्मीर के लोगों के एंबेस्डर के तौर पर काम करते रहेंगे।

कश्मीर में भारत का क़दम अस्वीकार्य है: बर्नी सैंडर्स

अमरीका के वरिष्ठ नेता और डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की रेस में शामिल रहे बर्नी सैंडर्स ने कहा है कि कश्मीर में भारत का क़दम अस्वीकार्य है।

उन्होंने ये भी कहा है कि वो कश्मीर के हालात को लेकर चिंतित हैं।

वर्मोंट से सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने कहा है कि सुरक्षा के नाम पर कश्मीर में विरोध की आवाज़ को दबाने से स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच भी बाधित हुई है।

उन्होंने कहा, "भारत में कई डॉक्टरों ने माना है कि कश्मीर में भारत सरकार की ओर लगाए गए प्रतिबंधों की वजह से मरीज़ों को जीवनरक्षक इलाज तक नहीं मिल पा रहा है।''

अमरीका में मुसलमानों के एक सम्मेलन में बोलते हुए सैंडर्स ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में संचार सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंध तुरंत हटाए जाने चाहिए। उन्होंने ये भी कहा कि अमरीकी सरकार को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के समर्थन में प्रखर होकर बोलना चाहिए।

एक दिन पहले ही अमरीकी सांसद एंडी लेविन ने भी कश्मीर को लेकर उठाए गए नरेंद्र मोदी सरकार के क़दम की आलोचना करते हुए कहा था कि मोदी ने लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों को चोट पहुंचाई है।

इसी बीच एक अमरीकी थिंक टैंक ने कहा है कि भारत के कश्मीर के हालात का असर अफ़ग़ानिस्तान में शांति वार्ता पर भी पड़ सकता है।  

इसी सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भी वीडियो कॉन्फ़्रेन्सिंग के ज़रिए भाषण दिया। इमरान ख़ान ने कहा कि भारत में जो हो रहा है उसके बारे में पश्चिमी दुनिया को बताने की ज़रूरत है।

इस्लामिक सोसायटी ऑफ़ नॉर्थ अमेरिका के 56वें अधिवेशन में बोलते हुए इमरान ख़ान ने कहा, "आपको पश्चिमी दुनिया को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में समझाना होगा।''

इमरान ख़ान ने अपने उस बयान को फिर दोहराया जिसमें वो कह चुके हैं कि आरएसएस हिंदुओं की नस्लीय श्रेष्ठता में यक़ीन रखती है और भारत से मुसलमानों का नस्लीय सफ़ाया करना चाहती है।

इमरान ख़ान ने कहा, "हाल के चुनावों में बीजेपी की जीत के बाद आरएसएस मज़बूत ताक़त बनकर उभरी है।''

उन्होंने कहा, "नाज़ी पार्टी ने साबित किया था कि एक छोटा बेहद व्यवस्थित विचारधारा समूह वास्तव में एक देश को नियंत्रण में ले सकता है। भारत में भी यही हुआ है। एक चरमपंथी विचारधारा ने भारत को नियंत्रण में ले लिया है।''

वीडियो लिंक के ज़रिए दिए अपने संदेश में इमरान ख़ान ने आईएसएनए (इस्लामिक सोसायटी ऑफ़ नॉर्थर्न अमेरिका) से कश्मीर के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय जगत में जागरूकता फैलाने की अपील भी की।

इसी बीच पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी उमरकोट में एक हिंदू मंदिर में पाकिस्तानी हिंदुओं को संबोधित करते हुए बताया कि यूरोपीय संघ में सोमवार को कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा होगी।

उन्होंने कहा, "भारत ने यूरोपीय संघ को पाकिस्तान की गुज़ारिश पर दो सितंबर को कश्मीर पर चर्चा करने से रोकने के नाकाम प्रयास किए।''

उन्होंने ये भी बताया कि लंदन के हाइड पार्क में लोग बड़ी तादाद में जमा होंगे और कश्मीर के मुद्दे पर भारतीय उच्चायुक्त, ब्रितानी सांसदों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से मिलेंगे।

क़ुरैशी ने ये भी कहा कि वो जल्द ही कश्मीर का मामला रखने के लिए जेनेवा भी जाएंगे।

हिंदू मंदिर में बोलते हुए क़ुरैशी ने कहा, "भारत सरकार ने कश्मीरी लोगों को नमाज़ पढ़ने से रोक दिया है लेकिन पाकिस्तान में सभी ग़ैरमुसलमान अपने धर्मस्थलों में पूजा करने के लिए पूरी तरह आज़ाद हैं।''

उन्होंने कहा, "आपने वहां मस्जिदों को खाली कर दिया है, लेकिन यहां मंदिरों का पूरा सम्मान है।''

पाकिस्तान ने 30 अगस्त को कश्मीर ऑवर क्यों मनाया?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की अपील पर भारत के कश्मीर के लोगों के साथ एकजुटता दर्शाने के लिए पाकिस्तान ने शुक्रवार 30 अगस्त को दोपहर 12 से 12.30 बजे तक कश्मीर ऑवर मनाया।

शिक्षण संस्थानों, सरकारी और निजी दफ़्तरें, बैंक, व्यापारी, वकील और सैन्य अधिकारियों ने इसमें भाग लिया। दोपहर में इस दौरान सभी ट्रैफिक सिग्नलों पर रेड सिग्नल रखा गया।

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में प्रधानमंत्री ऑफ़िस के बाहर बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए लोगों को इमरान ख़ान ने संबोधित किया।

इस दौरान प्रधानमंत्री की सूचना एवं प्रसारण मामलों की सलाहकार फिरदौस आशिक़ अवान और पीएम के विशेष सहायक नइमुल हक़ भी मौजूद थे।

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने भाषण की शुरुआत कश्मीर के लोगों के साथ एकजुटता दर्शाते हुए की। उन्होंने कहा, "आज हर पाकिस्तानी, चाहे वो कहीं भी हों, चाहे वो हमारे स्कूल या कॉलेज के स्टूडेंट्स हों या दुकानदार या मजदूर, सरकारी मुलाज़िम, हम सभी अपने कश्मीरियों के साथ खड़े हैं।''

उन्होंने कहा, "हमारे कश्मीरी बहुत मुश्किल वक्त से गुज़र हैं। तकरीबन 80 लाख कश्मीरी, तकरीबन चार हफ़्ते से कर्फ़्यू में बंद हैं। आज का मक़सद, अपने कश्मीरियों को यह बताना है कि हम सब उनके साथ खड़े हैं, उनके दुख दर्द में पूरी तरह शामिल हैं।''

"आज पाकिस्तान से यह पैगाम जाएगा कि जब तक हमारे कश्मीरियों को आज़ादी नहीं मिलती पाकिस्तानी कौम उनके साथ खड़ी है, आख़िरी दम तक हम उनके साथ खड़े रहेंगे।''

इमरान ने कहा, "हम सब को यह समझना ज़रूरी है कि आज हिंदुस्तान में किस तरह की हुकूमत है। इसको समझने के लिए हमें आरएसएस की विचारधारा समझनी होगी।''

उन्होंने कहा, "1925 में बने राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की विचारधारा में मुसलमानों के प्रति नफ़रत भरी है। वो समझती है कि हिंदू सर्वश्रेष्ठ हैं।  हिटलर की नाज़ी पार्टी से मुतासिर (प्रभावित) हो कर ये पार्टी बनी थी।''

इमरान ने कहा कि जिस तरह हिटलर की नाज़ी पार्टी यह समझती थी कि जर्मनी में जर्मन को छोड़ कर बाक़ी सभी लोगों का या तो क़त्ल कर दें या बाहर निकाल दें।

उन्होंने कहा, "इनका घोषणापत्र था कि मुसलमानों को या तो हिंदुस्तान से निकाल देना चाहिए या वो दूसरे दर्जे के नागरिक बन कर रहेंगे, बराबर का हक़ उन्हें नहीं मिलना चाहिए। वो नज़र आ रही है आज, जो ये मकबूज़ा कश्मीर पर ये जुल्म कर रहे हैं।''

प्रधानमंत्री इमरान ने कहा, "आज भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का नज़रिया कब्ज़ा कर बैठा है। ठीक उसी तरह जिस तरह नाज़ी पार्टी ने जर्मनी पर कब्जा किया था।''

"आज सारी दुनिया देख रही है कि कश्मीर में क्या हो रहा है। अगर हमारे कश्मीरी मुसलमान न होते तो पूरी दुनिया में आवाज़ उठती, पूरी दुनिया उनके साथ खड़ी होती, लेकिन मुझे बहुत अफ़सोस के साथ यह कहना पड़ता है कि जब मुसलमानों पर जुल्म होता है तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय, जैसे कि संयुक्त राष्ट्र खामोश रहता है।''

"आरएसएस का नज़रिया केवल मुसलमानों के लिए बुरा नहीं है बल्कि ये ईसाइयों के लिए भी बुरा है, उन पर हिंदुस्तान में आज जुल्म हो रहे हैं।''

इमरान ने कहा, "नेहरू और गांधी की जो धर्म निरपेक्षता थी, वो कहती थी कि हिंदुस्तान की बुनियाद धर्म निरपेक्षता है। वे सभी धर्म को बराबर मानते थे।''

"आरएसएस की विचारधारा में नेहरू और गांधी की कोई जगह नहीं है। ये न अंतरराष्ट्रीय क़ानून को मानते हैं, न सुप्रीम कोर्ट, न हाई कोर्ट को मानते हैं, वे सिर्फ़ हिंदुवाद को मानते हैं।''

इमरान ख़ान ने कहा कि वे जितने भी नेताओं से मिले हैं चाहे वो संयुक्त राष्ट्र संघ हो, यूरोप हो, जर्मनी या फ़्रांस या ट्रंप या अपने मुसलमान नेता।  सभी को मैंने बताया है कि अगर आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय नरेंद्र मोदी की फासीवाद सरकार के ख़िलाफ़ नहीं खड़ा होता तो पूरी दुनिया पर इसका असर दिखेगा।

इमरान ने कहा, "जब तक कश्मीर आज़ाद नहीं होता मैं हर फोरम पर कश्मीर की जंग लड़ूंगा।''

इसी दौरान इमरान ने कहा, "मैं नरेंद्र मोदी को साफ़ बताना चाहता हूं कि, अगर भारत आज़ाद कश्मीर (पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर) में कोई कार्रवाई करता है तो हम ईंट का जवाब पत्थर से देंगे। आपने कश्मीर में कुछ भी किया तो हमारी फौज तैयार है। लेकिन जब दो ऐसे मुल्क जिनके पास परमाणु हथियार हों अगर वो लड़ते हैं तो उसके केवल उन दोनों को नुकसान नहीं होता बल्कि पूरी दुनिया को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। मैं यह दुनिया के सभी बड़े नेताओं को बता रहा हूं।''

"कश्मीर से कर्फ़्यू हटाने के लिए हम पूरी दुनिया में आंदोलन चलाएंगे।''

"श्रीनगर में न मीडिया को जाने देते हैं, न विपक्ष के नेताओं को जाने दिया।  इससे यह पता चलना चाहिए कि वहां किस तरह का जुल्म हो रहा है।''

अपने भाषण के अंत में इमरान ख़ान ने कहा कि, "नरेंद्र मोदी ने अपने तकब्बुर (अभिमान) में जो कश्मीर में कर बैठे हैं, जो आखिरी पत्ता उन्होंने खेला है, इसके बाद कश्मीर आज़ाद होगा।''

मोदी ने शुरू किया है और हम ख़त्म करेंगे: पाकिस्तान

पाकिस्तान एक बार फिर से भारत के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद करने का फ़ैसला करने जा रहा है। इसकी घोषणा पाकिस्तान के विज्ञान और तकनीक मंत्री फ़वाद हुसैन चौधरी ने की।

चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान अपना हवाई क्षेत्र पूरी तरह से भारत के लिए बंद करने पर विचार कर रहा है। फ़वाद चौधरी ने ये भी कहा कि अफ़ग़ानिस्तान के साथ कारोबार में भारत पाकिस्तानी ज़मीन का इस्तेमाल करता है और इस पर भी वो पाबंदी लगाएगा। उन्होंने कहा कि इसमें क़ानूनी औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं और जल्द ही ये प्रभाव में आ जाएगा।

फ़वाद हुसैन चौधरी ने लिखा है, ''प्रधानमंत्री भारत के लिए पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहे हैं। इसके साथ ही अफ़ग़ानिस्तान के साथ कारोबार में भारत पाकिस्तानी रूट का इस्तेमाल करता है और इस पर भी पाबंदी लगाने की बात कैबिनेट की मीटिंग में उठी। कुछ क़ानूनी औपचारिकताएं बाक़ी हैं। ये फ़ैसले विचाराधीन हैं। मोदी ने शुरू किया है और हमलोग ख़त्म करेंगे।''

फ़वाद चौधरी का यह बयान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के राष्ट्र के नाम संबोधन के बाद आया है। इमरान ख़ान ने अपने संबोधन में कहा था कि पाकिस्तान कश्मीर को लेकर चुप नहीं बैठेगा।

हालांकि फ़वाद चौधरी के बयान पर भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने निशाना साधा है। बासित ने ट्वीट कर कहा, ''इन बातों को फ़ैसले से पहले ही आप सार्वजनिक क्यों कर रहे हैं? ये नासमझ राजनीति और लापरवाह डिप्लोमैसी की पहचान है।''

इससे पहले भारत के द्वारा बालाकोट में एयरस्ट्राइक के बाद पाकिस्तान ने अपने हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल पर भारत के लिए पाबंदी लगा दी थी।

पाँच अगस्त को भारत ने जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्वायत्तता ख़त्म करने की घोषणा कर दी थी। इस फ़ैसले से पाकिस्तान नाराज़ है और वो इसके ख़िलाफ़ दुनिया के हर मंच पर अपना विरोध दर्ज करा रहा है। इसी की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान ने भारत से कारोबारी और राजनयिक संबंध भी तोड़ लिए थे।

क्या अमेरिका और ईरान में परमाणु समझौता होगा?

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा है कि वो सही वक़्त पर ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी से मिलना चाहेंगे।

फ़्रांस में जी 7 की बैठक में रविवार को अचानक ईरान के विदेश मंत्री पहुंचे थे। उसके बाद ट्रंप का ये बयान आया।

ईरान के परमाणु गतिविधियों पर अंकुश लगाने वाले 2015 के समझौते से पिछले साल अमरीका के एकतरफ़ा हट जाने के बाद से ही दोनों देशों के रिश्तों में काफ़ी तनाव आ गया है।

हालांकि सोमवार को ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ एक नए परमाणु समझौते की संभावनाओं को लेकर आशान्वित हैं।

जी 7 के संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में फ्रांसीसी नेता इमैनुएल मैक्रां के साथ मौजूद ट्रंप ने कहा, "जब मैं ढाई साल पहले राष्ट्रपति बना था, उस समय जैसा ईरान था अब वो वैसा नहीं है।''

उन्होंने कहा, "मैं वाकई मानता हूं कि ईरान एक महान राष्ट्र हो सकता है... लेकिन वह परमाणु हथियार नहीं रख सकते।''

इससे पहले सोमवार को रुहानी ने कहा था कि अगर उन्हें लगता है कि ईरान को फ़ायदा पहुंचेगा तो वो किसी से भी मिलने को तैयार हैं।

उन्होंने कहा, "अगर मुझे ये पक्का हो जाए कि किसी से मुलाक़ात करने से मेरे देश के विकास में मदद मिलेगी और जनता की समस्याएं हल होंगी तो मैं ऐसा करने से पीछे नहीं हटूंगा।''

ट्रंप की ये टिप्पणी जी 7 देशों के शिखर सम्मेलन की समाप्ति पर आया है। इस बैठक में कनाडा, फ़्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमरीका शामिल हुए थे।

इस बैठक में विश्व व्यापार, अमेज़न के जंगलों में आग और यूक्रेन, लीबिया, हांग कांग के घटनाक्रमों समेत कई मसलों पर बातचीत हुई।

असल में ईरान के साथ परमाणु समझौते से अलग होने के बाद अमरीका ने ईरान पर नए प्रतिबंध लगा दिए थे।

इस समझौते में ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, रूस और चीन भी शामिल रहे हैं। इन देशों ने परमाणु समझौते को बचाने की पूरी कोशिश की।

बीते रविवार को ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जव्वाद ज़रीफ़ ने कहा कि बैठक से अलग फ्रांस के विदेश मंत्री और फ़्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रां के साथ उनकी बातचीत बहुत सकारात्मक रही।

इस समझौते को बचाने में मैक्रां ने काफ़ी सक्रिय भूमिका निभाई थी।  उन्होंने कहा कि उनका मानना था कि ट्रंप और रुहानी के बीच मुलाक़ात के हालात बन चुके हैं।

उन्होंने कहा कि अभी कुछ पक्का नहीं है और चीज़ें अभी नाज़ुक दौर में है, लेकिन कुछ तकनीकी मसलों पर बातचीत शुरू हो चुकी है और उसमें प्रगति हो रही है।

मैक्रां ने कहा, "अगर वो राष्ट्रपति ट्रंप के साथ मुलाक़ात के लिए राज़ी हों तो मुझे लगता है कि किसी समझौते पर पहुंचा जा सकता है।''

साल 2015 के समझौते में ईरान को अपनी परमाणु गतिविधियां 10 से 15 साल के लिए धीमी करनी थी और इसके बदले प्रतिबंधों में छूट दी जाती।

इस समझौते में यूरेनियम संग्रह को सीमित करना और अंतरराष्ट्रीय जांच की इजाज़त देना शामिल था।

इसके अलावा ये भी कहा गया था कि ईरान को हैवी वॉटर रिएक्टर बनाना चाहिए ताकि हथियार बनाने लायक प्लूटोनियम का उत्पादन ये नहीं कर पाए।

अमरीका ने बीते साल मई में समझौते से अलग होने की घोषणा की थी और नए परमाणु समझौते और प्रतिबंधों को हटाने के लिए 12 शर्तें लगाई थीं।

इसमें ईरान से बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर अंकुश लगाने और इलाकाई संघर्षों में शामिल होने से मना किया गया था।

ईरान ने कहा था ये शर्तें उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं।

सोमवार को प्रेस कांफ्रेंस में ट्रंप ने कहा कि किसी भी नए समझौते के लिए वो चाहेंगे कि परमाणु हथियार और बैलिस्टिक मिसाइल बिल्कुल न हो और लंबे समय के लिए हो।

अभी साफ़ नहीं हुआ कि इन नई शर्तों को ईरान स्वीकार करेगा या नहीं।  ईरान के सरकारी प्रेस टीवी में बिना नाम ज़ाहिर किए एक सूत्र के हवाले से कहा गया है कि ईरान ने मिसाइल प्रोग्राम को रोकने की शर्त को ख़ारिज कर दिया है।

इस बीच मैक्रां ने कहा कि हमें इस बात को सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार नहीं पा सके लेकिन ईरानी इसके बदले किसी न किसी रूप में आर्थिक हर्जाना चाहते हैं।

ट्रंप - मोदी मुलाक़ात: कश्मीर मुद्दे पर क्या असर होगा?

फ़्रांस में जी-7 की बैठक से इतर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की मुलाक़ात हुई।

अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू कश्मीर का विशेष दर्ज़ा हटाए जाने के बाद ये मुद्दा चर्चा में रहा है और ट्रंप ने कई बार भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की थी।

मध्यस्थता की पेशकश वाले बयान से भारत और अमरीका के बीच एक बार थोड़ी असहजता भी आई लेकिन जब दोनों नेता मिले तो आपसी रिश्तों में एक सहजता दिखी।

दोनों नेताओं का सामना हुआ तो मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत पाकिस्तान के साथ मिलकर सभी मुद्दों को सुलझा लेगा और किसी तीसरे पक्ष को मध्यस्थता करने की ज़रूरत नहीं। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप भी मोदी के इस बात से सहमत नज़र आए।

भारत के पूर्व विदेश सचिव और कई देशों में राजदूत रह चुके मुचकुंद दुबे का कहना है कि 'ट्रंप ने जो पहले मध्यस्थता के बारे में कहा था वो सोच समझ कर नहीं कहा था और जैसा कि वो पहले कुछ कह देते हैं और फिर मुकर जाते हैं, ये वैसी ही बात थी'।

जम्मू कश्मीर को लेकर भारत के फैसले के तुरंत बाद अमरीका गए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से मिलने के बाद ट्रंप ने मध्यस्थता की बात कही थी।

अमरीका के डेलावेयर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान की राय में दक्षिण एशिया को लेकर ट्रंप प्रशासन की कोई ठोस रणनीति नहीं है इसीलिए उन्होंने ऐसी बात कह दी थी।

मुक्तदर ख़ान के अनुसार, "जब ट्रंप मोदी से मिलते हैं तो वो इतने प्रभावित होते हैं कि कहते हैं कि उन्हें भरोसा है कि कश्मीर का मुद्दा दोनों देश आपसी समझ से सुलझा लेंगे।''

लेकिन एक अंतरराष्ट्रीय मंच के शिखर सम्मेलन के दरम्यान कश्मीर पर बात करना कुछ हद तक इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने जैसा नहीं हो गया।

मुचकुंद दुबे कहते हैं, "भारत की ओर से किसी शीर्षस्थ नेता का अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाकर जम्मू कश्मीर को लेकर उठाए गए घरेलू कदमों पर सफ़ाई देना एक अभूतपूर्व बात है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था और जब कोई राष्ट्र बहुत कठिनाई में पड़ जाता है तभी वो इस तरह के कदम उठाता है।''

वो कहते हैं, "ये मुद्दा धीरे धीरे जटिल होता जा रहा है और आगे भी सफाई देनी पड़ सकती है। बेहतर तो ये होता कि हम अपनी समझ बूझ से इस मामले से निपटते, बनिस्बत कि अन्य देशों के बुलावे या अपनी पहलकदमी पर उन्हें सफाई देने के। क्योंकि वे देश भारत को अपनी नीति में बदलाव लाने का सुझाव देंगे और ज़रूरी नहीं कि वो भारत के हित में हो।''

उधर पाकिस्तान लगातार कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। उसका कहना है कि वो इस मुद्दे को हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाएगा।

ऐसे में भारत को भी इस मसले पर सफ़ाई पेश करने की मज़बूरी होगी।

मुचकुंद दुबे का कहना है कि इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय जगत को सफ़ाई देने के हालात भारत ने खुद पैदा किए हैं।

वो कहते हैं, "अभी हाल फिलहाल तक इस मुद्दे पर किसी को सफाई देने की भारत की मज़बूरी नहीं थी लेकिन जबसे भारत ने जम्मू कश्मीर में जो फैसले लिए उससे हालत बिल्कुल बदल गए हैं।''

उनका कहना है कि 'संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इतिहास में 20-20 साल से इस मुद्दे को नहीं उठाया गया था। इसलिए हमारी अंदरूनी नीति से ये गहरे तौर पर जुड़ा हुआ है, ये भूलने वाली बात नहीं है।'

भारत के कश्मीर में क़रीब 22 दिन से स्थितियां ख़राब ही हैं, संचार व्यवस्था ठप है और कर्फ़्यू जैसे हालत हैं।

ऐसे में ये मुद्दा सिर्फ भारत की विदेश नीति ही नहीं आंतरिक नीति को भी प्रभावित कर रहा है।

मुचकुंद दुबे का कहना है कि 'कश्मीरियों ने इस बिना पर भारत में शामिल होने का निर्णय लिया था कि भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है। अब इसके उपर सवालात हो रहे हैं तो ये बेशक आंतरिक नीति से जुड़ा हुआ मामला बन जाता है।'

वो कहते हैं, "ये मामला आने वाले समय में और जटिल और विकराल रूप  धारण कर सकता है और ऐसी स्थिति में हम खुद इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण होने देने के लिए मज़बूर होंगे। प्रधानमंत्री मोदी की ये यात्रा उसी दिशा में पहला कदम है।''

उनके अनुसार, इससे पहले किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन के शिखर सम्मेलन में जाकर भारत को अपनी सफ़ाई पेश करने का मौका पहले कभी नहीं आया था।

वो कहते हैं "आज से 10 साल पहले जिस तरह मामले को सुलझाने की कोशिश की जा रही थी, भारत इस मामले में आगे जा सकता था क्योंकि इस बात पर सहमति बनती दिख रही थी कि सीमा में बदलाव करने की ज़रूरत नहीं है। ये एक ऐसा आधार था जिसपर भारत आगे बढ़ सकता था।''

"लेकिन अब जबकि सीमा ही ख़त्म कर दी गई और ये कहना कि अब ये द्विपक्षीय मुद्दा हल हो चुका है। अगर ऐसा ही है तो हम कैसे हर किसी को सफ़ाई देते हुए कह रहे हैं कि ये द्विपक्षीय मामला है।''

मुक्तदर ख़ान कहते हैं, "दशकों बाद ये मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठा और मीडिया में ख़ासी चर्चा का विषय बना, और भारत को कूटनीतिक रूप से झटका लगा।''

इस बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि 'कश्मीर के लिए किसी भी हद तक जाएंगे।'

मुक्तदर ख़ान कहते हैं, "पिछले 40-50 सालों में पाकिस्तान की लाख कोशिशों के बावजूद कश्मीर का मुद्दा कुर्दिस्तान या तिब्बत की तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं बन पाया। जबकि उसने संयुक्त राष्ट्र और ओआईसी के फ़ोरम पर जब जब मौका मिला इस मुद्दे को उठाया। लेकिन पहली बार है कि पश्चिम में इस मुद्दे पर मीडिया में काफ़ी कवरेज हो रहा है।''

वो कहते हैं, "एक तरह से कह सकते हैं कि अंतरराष्ट्रीयकरण का पाकिस्तान का मुद्दा आगे बढ़ गया है लेकिन वो इसलिए हुआ क्योंकि भारत सरकार ने कश्मीर को लेकर बहुत बड़ा कदम उठाया।''

मुक्तदर ख़ान का कहना है कि भारत भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कह रहा है कि आपसी मसलों को द्विपक्षीय तरीके से हल कर लिया जाएगा लेकिन कश्मीर के मसले पर उसने बिल्कुल उलट किया है।  

वो कहते हैं, "जम्मू कश्मीर के मामले में बिना वहां की जनता से पूछे, बिना पाकिस्तान से वार्ता किये एकतरफ़ा फैसला भारत ने ले लिया और साथ ही द्विपक्षीय वार्ता के ज़रिए मामलों को हल करने की बात भी की जा रही है।''

उनके अनुसार, अगर भारत जिस तरह कश्मीर में कड़ाई कर रहा है, अगर उसी तरह करता रहा तो दुनिया में फ़लस्तीन की तरह ये मुद्दा भी सिविल सोसायटी उठाने लगे। इसका दूसरा पहलू ये है कि अगर कश्मीरी जनता को लगेगा कि प्रदर्शनों से भारत की बदनामी बढ़ रही है तो वो इसे और बढ़ा देंगे।''

प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान कहते हैं कि भारत को चाहिए कि वो कश्मीर में इतने अच्छे हालात बनाए कि वहां के लोग खुशी खुशी भारत के साथ आना चाहें।

लेकिन हाल के दिनों में जो हालात बने हैं उससे लगता है कि इस फैसले की गूंज आने वाले काफी समय तक सुनाई देगी।