स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत 2 अक्टूबर 2014 को हुई थी, मगर दो साल से भी ज्यादा का समय बीत जाने के बाद स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। इस बात की पुष्टि खुद एक सरकारी सर्वे ने की है।
एनएसएसओ के सर्वे के मुताबिक, देशभर में स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनाए गए लगभग 10 में से 6 टॉयलेट्स में पानी की पर्याप्त सप्लाई ही नहीं है।
यह सर्वे केंद्र की मोदी सरकार के 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने के मिशन की हकीकत को बयान करता है।
सर्वे के मुताबिक, 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद लगभग 3.5 करोड़ शौचालय बनाए गए। केंद्र सरकार ने लोगों को शौचालय बनवाने के लिए सब्सिडी दी। मगर सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में 55.4 फीसदी लोग आज भी खुले में शौच करने को मजबूर होते हैं क्योंकि शौचालयों में पानी की सप्लाई नहीं है।
एनएसएसओ ने 1 लाख घरों के सैंप्ल्स लेकर रिपोर्ट जारी की है।
वहीं रिपोर्ट के मुताबिक, शहरों की 7.5 फीसदी आबादी आज भी खुले में शौच करने को मजबूर है।
सर्वे के मुताबिक, स्वच्छता नहीं होने की वजह से ग्रामीण इलाकों में लगभग 833 मिलियन और शहरों में 377 मिलियन लोग बीमार पड़ने के खतरों से जूझते हैं।
बता दें इससे पहले भी कई घरों के शौचालयों में पानी की सप्लाई और ड्रेनेज की सुविधा नहीं होने की वजह से, कई लोगों के द्वारा अपने शौचालयों को स्टोर रूम में बदल देने की खबरें सामने आई थीं।
इसके अलावा सर्वे में यह जानकारी भी सामने आई है कि पंजाब, असम और ओडिशा राज्यों में सार्वजनिक शौचालयों की साफ-सफाई या देखरेख के लिए भी कोई संस्था नहीं बनाई गई है।
सर्वे के मुताबिक, 40 फीसदी गांव के शौचालय किसी ड्रेनेज सिस्टम से जुड़े हुए थे ही नहीं। कई गांव में तो शौचालय का वेस्ट सीधे तालाबों या फिर नदियों के पानी मिल जाता है।
इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (ICSSR) का चेयरपर्सन चुनने की प्रक्रिया में हेराफेरी सामने आई है। इसके लिए बने कॉलेजियम ने प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक लिस्ट तैयार की थी जिसमें से एक को चेयरपर्सन चुना जाना था। लेकिन जो लिस्ट तैयार की गई थी, उसमें से 10 लोगों की मौत पहले ही हो गई थी। उनमें से सात तो ऐसे थे जिनकी मौत कोलेजियम के बनने से भी पहले हो चुकी थी।
ये बहुत बड़े हेराफेरी और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। सवाल उठता है कि मोदी सरकार में आईसीएसएसआर जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में चेयरपर्सन के चुनने का यही तरीका है?
इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च के नियमों के मुताबिक, कमेटी को इन लोगों में से तीन के नामों को फाइनल करके सरकार को भेजना था। फिर उन तीन नामों में से किसी एक नाम पर मानव संसाधन मंत्रालय (HRD) को मोहर लगानी थी।
दो मई को मानव संसाधन मंत्रालय ने बृज बिहारी कुमार के नाम को चेयरमैन के पद के लिए फाइनल किया। 76 साल के बृज बिहारी कुमार त्रैमासिक पत्रिका वार्ता और चिंतन श्रीजान के एडिटर रह चुके हैं। अब उन्हें तीन साल के लिए आईसीएसएसआर का नया चेयरमैन बनाया गया है।
बृज बिहारी कुमार को इसी प्रक्रिया द्वारा चुना गया है। अबतक ए के थोराट इस पद पर बने हुए थे जो कि पिछले महीने रिटायर हो गए। कुल 244 नामों की लिस्ट तैयार की गई थी। जिसमें से किसी एक को चुना जाना था। इस लिस्ट को थोराट के चेयरमैन रहते ही तैयार किया गया था।
हैरानी की बात है कि इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (ICSSR) का चेयरपर्सन चुनने की प्रक्रिया में दस ऐसे लोगों को शामिल किया गया जो पहले ही मर चुके थे। ये बहुत बड़े हेराफेरी और भ्रष्टाचार का प्रमाण है।
ये नाम हैं: इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्ट्रोरिकल रिसर्च (ICHR) के निहार रंजन राय (जिनकी 1981 में मौत हो गई थी), बी आर ग्रोवर (जिनकी 2001 में मौत हुई), के एस लाल (जिनका 2002 में निधन हुआ), आर कुलकर्णा (2009 में निधन हो गया था), आर एस शर्मा, (2011 में मौत), रविंदर कुमार (2001 में मौत) का नाम भी कोलेजियम में शामिल किया गया था। इसके अलावा भूगोलशास्त्री एल एस भट्ट का भी नाम कोलेजियम में शामिल था। जिनकी 2013 में मौत हो गई थी।
इतना ही नहीं, इस लिस्ट में इतिहासकार बिमल प्रसाद और आईसीएसएसआर के पूर्व प्रमुख रजनी कोठारी का भी नाम शामिल था। दोनों की 2015 में मौत हो गई थी। जावेद आलम का भी नाम शामिल था जिनकी 2016 में मौत हुई।
इस मामले पर इंडियन एक्सप्रेस ने HRD मिनिस्ट्री से बात करनी चाही, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। वहां मौजूद एक सूत्र ने इसे बेवकूफी भरा काम बताया।
आईसीएसएसआर के सचिव वीरेंद्र कुमार मल्होत्रा ने कहा कि काउंसिल 2014 में बनी थी और उस वक्त ही नाम भी दे दिए गए थे। उन्होंने कहा कि 200 नाम में से 10 नाम ही ऐसे होंगे जिनकी पहले मौत हो गई हो। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि 1981 में मरे हुए लोगों को क्यों शामिल किया गया तो उन्होंने कुछ साफ नहीं कहा।
भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इंदिरा गांधी को लोकतांत्रिक देश की अब तक की 'सबसे स्वीकार्य' प्रधानमंत्री बताते हुए उनकी निर्णायक क्षमता को याद किया।
प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस पार्टी नेतृत्व को सांगठनिक मामलों में तेजी से निर्णय लेने का परोक्ष संदेश देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के काम करने के निर्णायक तरीके को याद किया जिस कारण 1978 में कांग्रेस में दूसरा विभाजन होने के कुछ महीने बाद ही राज्य चुनावों में पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की।
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने विशिष्ट अतिथियों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कहा कि वह 20वीं सदी की महत्वपूर्ण हस्ती थीं। और भारत के लोगों के लिए अभी भी वह सर्वाधिक स्वीकार्य शासक या प्रधानमंत्री हैं।''
प्रणब मुखर्जी ने अतीत को याद करते हुए कहा, ''1977 में कांग्रेस हार गयी थी। मैं उस समय कनिष्ठ मंत्री था। उन्होंने मुझसे कहा था कि प्रणब, हार से हतोत्साहित मत हो। यह काम करने का वक्त है और उन्होंने काम किया।''
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मंच पर मौजूद थे। प्रणब मुखर्जी ने इस अवसर पर इंदिरा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके जीवन और कार्यों पर एक पुस्तक का विमोचन किया। उन्होंने हामिद अंसारी द्वारा विमोचित 'इंडियाज इंदिरा - ए सेंटेनियल ट्रिब्यूट' की पहली प्रति ग्रहण की। कांग्रेस इंदिरा गांधी की शताब्दी जयंती मना रही है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा द्वारा संपादित इस पुस्तक में इंदिरा गांधी के कार्यों और उनके जीवन की घटनाओं का संकलन है तथा इसकी प्रस्तावना सोनिया गांधी ने लिखी है जो खराब स्वास्थ्य के कारण इस कार्यक्रम में शमिल नहीं हो सकीं।
राहुल गांधी ने सोनिया गांधी की ओर से उनका भाषण पढ़ा। भाषण में कहा गया, ''मैंने इंदिरा गांधी में देशभक्ति का जो जज्बा देखा, वह श्रेष्ठ था जो उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से आत्मसात किया था।'' सोनिया ने कहा कि इंदिरा गांधी एक मित्र और सलाहकार थीं और ''अपनी इच्छाएं मेरे ऊपर नहीं थोपें, इसको लेकर वह बेहद सतर्क थीं।''
राहुल ने कांग्रेस अध्यक्ष की ओर से कहा, ''इंदिरा गांधी पद, जाति और संप्रदाय जैसे भेदभाव को नापसंद करती थीं। उनके पास दंभ या आडंबर के लिए कोई वक्त नहीं था। वह पाखंड अथवा धोखेबाजी को तत्काल पहचान जाती थीं। उन्हें भारतीय होने का गर्व था, साथ ही वह वृहद एंव सहिष्णु विचारों वाली एक वैश्विक नागरिक थीं।''
कांग्रेस में 1978 में दूसरे विभाजन को याद करते हुए राष्ट्रपति मुखर्जी ने कहा कि इंदिरा गांधी को दो जनवरी 1978 को पार्टी अध्यक्ष चुना गया और 20 जनवरी तक कुछ दिनों के अंदर उन्होंने कार्य समिति के गठन को पूरा कर लिया, संसदीय बोर्ड, पीसीसी और एआईसीसी का गठन किया और पार्टी को महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, असम और नेफा विधानसभा चुनावों का सामना करने के लिए तैयार किया।
उन्होंने कहा कि इसके तुरंत बाद उनके नेतृत्व में पार्टी ने आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में दो तिहाई बहुमत से जीत दर्ज की और महाराष्ट्र में अपनी पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बनाया, जहां पार्टी ने कांग्रेस से अलग हो चुके धड़े के साथ मिलकर सरकार बनाई।
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि राजनीति के अपने सबसे खराब वक्त में इंदिराजी अपने-आप को ज्यादा कामों में लगाए रखतीं थीं। इस दौरान उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा देश हित में लिए गए अनेक कठोर निर्णयों को भी याद किया।
प्रणब मुखर्जी ने स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों से मुक्त कराने के लिए उनके निर्णय का खास तौर पर जिक्र किया।
भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपने संक्षिप्त भाषण में कहा कि वह देश, विदेश और विश्व में बदलाव और उथल-पुथल के दौर में रहीं और नियति ने उन पर प्रधान नायक की भूमिका अदा करने की जिम्मेदारी अर्पित कर दी।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, ''इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री भर नहीं थी बल्कि विकासशील देशों की स्वीकृत नेता भी थीं। वह वैश्विक शांति में विश्वास करतीं थीं और उनकी बात को बेहद आदर के साथ सुना जाता था।''
इस कार्यक्रम में कांग्रेस के कई पूर्व केन्द्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों सहित वरिष्ठ नेता मौजूद थे। अतिथियों में गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, जनार्दन द्विवेदी, पी चिदंबरम, शीला दीक्षित सहित अनेक नेता मौजूद थे।
कश्मीर घाटी में बुरहान वानी के बाद आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन की कमान संभालने वाले जाकिर मुसा ने शनिवार को संगठन से अलग होने की घोषणा की।
मुसा का यह कदम उनके संगठन द्वारा उनके उस बयान से पल्ला झाड़ने के बाद आया है जिसमें उसने चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर हुर्रियत नेताओं ने कश्मीर मामले को 'राजनीतिक' बताया तो वह उनके सिर काटकर उन्हें लाल चौक पर लटका देगा।
पिछले साल जुलाई में संगठन की कमान संभालने वाले मुसा ने घोषणा की है कि शनिवार के बाद उनका हिजबुल मुजाहिदीन से कोई नाता नहीं होगा।
सोशल मीडिया पर जारी एक नए ऑडियो संदेश में मुसा ने कहा, ''मेरे अंतिम ऑडियो संदेश के बाद, कश्मीर में काफी उलझन हो गई है। मैं अपने बयान और संदेश पर कायम हूं।''
मुसा ने शुक्रवार को कहा था कि अगर हुर्रियत नेताओं ने कश्मीर मुद्दे को 'इस्लामिक संघर्ष' न बताकर 'राजनीतिक मुद्दा' करार दिया तो वह हुर्रियत नेताओं के सिर काटकर उन्हें श्रीनगर के लाल चौक पर लटका देगा।
हिजबुल मुजाहिदीन ने हालांकि शनिवार को कहा कि मुसा के बयान से संगठन इत्तेफाक नहीं रखता। हिजबुल के प्रवक्ता सलीम हाशमी ने कश्मीर की एक स्थानीय समाचार एजेंसी को भेजे गए एक ई-मेल बयान में कहा, ''इस तरह का बयान (मुसा का) हमारे लिए अस्वीकार्य है। इसमें जाकिर मुसा की निजी राय झलकती है।''
हिजबुल के बयान पर प्रतिक्रिया जताते हुए मुसा ने ऑडियो संदेश में कहा, ''हिजबुल मुजाहिदीन ने कहा है कि उसका जाकिर मुसा के बयान से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए अगर हिजबुल मुजाहिदीन मेरा प्रतिनिधित्व नहीं करता, तो मैं भी उनका प्रतिनिधित्व नहीं करता हूं। आज के बाद से मेरा हिजबुल मुजाहिदीन से कोई लेना-देना नहीं है।''
मुसा ने कहा कि उसने किसी खास व्यक्ति या हुर्रियत कांफ्रेंस के अध्यक्ष सैयद अली शाह गिलानी के बारे में कुछ नहीं कहा। उसने कहा, ''मैंने केवल उस शख्स के विरुद्ध कहा है जो इस्लाम के खिलाफ है और एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के गठन के लिए आजादी की बात करता है।''
उसने कहा, ''हम इस्लाम की खातिर आजादी की जंग लड़ रहे हैं। मेरा रक्त इस्लाम के लिए बहेगा, न कि किसी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए।''
उल्लेखनीय है कि शुक्रवार को सोशल मीडिया पर वायरल एक ऑडियो संदेश में जाकिर ने कहा, ''मैं उन सभी पाखंडी हुर्रियत नेताओं को चेतावनी दे रहा हूं। उन्हें हमारी इस्लामिक लड़ाई में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अगर वे ऐसा करते हैं, तो हम उनके सिर काटकर उन्हें लाल चौक पर लटका देंगे।''
उसने कहा कि कश्मीर में शरीयत लागू करने को लेकर उसकी लड़ाई का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है, न कि वह कश्मीर मुद्दे को राजनीतिक संघर्ष बताकर उसका समाधान चाहता है।
माना जा रहा है कि इस सप्ताह की शुरुआत में कश्मीरी सैन्य अधिकारी उमर फैयाज की हत्या में हिजबुल मुजाहिदीन का हाथ है।
नेशनल हेराल्ड केस में गांधी परिवार की तीसरी शख्सियत प्रियंका गांधी भी जांच के दायरे में आ गई हैं। आयकर विभाग की ओर से यंग इंडियन (YI) प्राइवेट लिमिटेड को भेजी गई नोटिस के मुताबिक, प्रियंका गांधी ने एसोसिएट जर्नल लिमिटेड (AJL) में यंग इंडियन की 100 फीसदी हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के शेयर खरीदे।
अंग्रेजी वेबसाइट न्यूज़ 18 के मुताबिक, 24 पन्ने के आयकर विभाग के इस नोटिस में सोनिया और प्रियंका को मुख्य लाभार्थी बताया गया है।
इस नोटिस के मुताबिक, प्रियंका गांधी ने रत्तन दीप ट्रस्ट और जनहित निधि ट्रस्ट के जरिये एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के अतिरिक्त शेयर खरीदे और इस तरह से यंग इंडियन का एसोसिएट जर्नल लिमिटेड पर पूरा स्वामित्व हो गया। यंग इंडियन के मेजोरिटी शेयर पहले से ही सोनिया और राहुल गांधी के पास थे।
आयकर की धारा 148 के तहत वित्तीय वर्ष 2010-11 में यंग इंडियन के रिवैल्युवेशन से पता चला कि टैक्स बचाने के लिए इस कंपनी ने फर्जी लेन-देन और गलत डाटा भी पेश किये।
बता दें कि यंग इंडियन को इसके प्रमोटरों ने गैर व्यावसायिक कंपनी के रूप में पेश किया। इस कंपनी का उद्देश्य लोकतंत्र और सामाजिक एकता के लिए काम करना था।
आयकर का नोटिस कहता है कि यंग इंडियन द्वारा एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के अधिग्रहण से यंग इंडियन के पास कई करोड़ स्थायी संपत्तियों के अधिकार आ गये, यंग इंडियन के पास एसोसिएट जर्नल लिमिटेड के कई संपत्तियों से करोड़ों रुपये किराया वसूलने का भी अधिकार आ गया।
चूंकि यंग इंडियन के 75 फीसदी से भी ज्यादा शेयर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास थे इसलिए वे इस लेन-देन के मुख्य लाभार्थी हुए। आई टी विभाग ने अपने जांच में पाया है कि इस लेन-देन में शामिल सभी लोग कॉमन थे और वे किसी ना किसी तरह से कांग्रेस, एसोसिएट जर्नल लिमिटेड या फिर यंग इंडियन से जुड़े हुए थे।
जमियत उलमा-ए-हिन्द के नेतृत्व में मुस्लिम बुद्धिजीवियों और धार्मिक नेताओं के प्रतिनिधि मंडल ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नौ मई को मुलाकात की थी। ये मुलाकात मुस्लिम समुदाय और सरकार के बीच 'चौड़ी होती खाई' को पाटने के लिए की गयी थी।
इस मुलाकात में गौरक्षा और लव जिहाद के नाम पर हो रही हिंसाओं से उपजे भय के वातावरण पर भी चर्चा हुई, लेकिन सरकारी प्रेस विज्ञप्ति में इनका कोई जिक्र नहीं था। जबकि जमियत उलमा-ए-हिन्द की तरफ से जारी बयान में इनका जिक्र किया गया था।
25 मुस्लिम धार्मिक नेताओं के इस प्रतिनिधि मंडल में शामिल जाहिर काजी अंजुमन-ए-इस्लाम के अध्यक्ष हैं। काजी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ''कई लोगों ने अलग-अलग स्वर में इस मुद्दे पर बात की। लेकिन कुल लबो-लबाब ये था कि समुदाय को लग रहा है कि उसे निशाना बनाया जा रहा है। चरमपंथी कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं। किसी को इसकी इजाजत नहीं होना चाहिए। हमने प्रधानमंत्री को बताया कि गौरक्षा और लव जिहाद से भय का वातावरण पैदा हो रहा है।''
मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी जोधपुर के वाइस-चांसलर अख्तरुल वासे ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, ''हमने प्रधानमंत्री से कहा कि उनके और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के उस बयान का असर जमीन पर नहीं दिख रहा है जिनमें उन दोनों ने कहा था कि किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी। कानून लागू करने वाली संस्थाएं अपना काम वाजिब ढंग से नहीं कर रही हैं।''
प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के अनुसार, पीएम ने उनसे कहा कि चाहे वो जिस भी पृष्ठभूमि से आते हों, अब वो भारत के 125 करोड़ लोगों के प्रधानमंत्री हैं और जाति और समुदाय से ऊपर वो सभी के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हैं।
काजी के अनुसार, पीएम मोदी ने उनसे कहा, ''ये मेरी जिम्मेदारी है कि कोई भी उत्पीड़ित न महसूस करे।''
लेकिन प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की तरफ से जारी बयान में इसका कोई जिक्र नहीं था।
पीआईबी के बयान में कहा गया, ''प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों ने प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण की प्रशंसा करते हुए आशा व्यक्त की कि पूरे राष्ट्र में लोगों का उनमें जो विश्वास है उससे समाज के हर तबके में सुख और समृद्धि सुनिश्चित होगी। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय न्यू इंडिया में बराबर का साझीदार बनने के लिए तैयार है।''
पीआईबी की तरफ से जारी किए गए ब्योरे में कहा गया कि प्रतिनिधि मंडल ने तीन तलाक के मुद्दे पर प्रधानमंत्री के प्रयासों की सराहना की।
प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य के अनुसार, तीन तलाक के मुद्दे पर पीआईबी ने जो कहा है, वह सही है।
प्रतिनिधि मंडल पीएम मोदी की इस बात से सहमत था कि तीन तलाक के मसले का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए और इसका समाधान समुदाय के अंदर से आना चाहिए और हम इससे सहमत थे।
आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन के चीफ ने कहा है कि शहीद लेफ्टिनेंट उमर फयाज की हत्या में उनके संगठन का कोई हाथ नहीं है। शुक्रवार को हिजबुल मुजाहिद्दीन चीफ सय्यद सलाहुद्दीन ने जम्मू-कश्मीर पुलिस के इस दावे को खारिज कर दिया कि ऑफिसर की हत्या में इस आतंकी संगठन के तीन लोग शामिल थे।
एक स्थानीय न्यूज एजेंसी को दिए बयान में सलाहुद्दीन ने कहा कि लेफ्टिनेंट फयाज की हत्या में हमारे लोग शामिल नहीं है। इस तरह की हत्या की निंदा होनी चाहिए।
हिजबुल मुजाहिद्दीन चीफ ने भारतीय एजेंसियों पर आफिसर की हत्या का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि हिजबुल मुजाहिद्दीन पर इस हत्या का आरोप इसलिए लगाया गया ताकि भारतीय एजेंसियों का असली चेहरा सामने ना आ पाए।
सलाहुद्दीन ने दावा किया कि भारत उग्रवादियों को बदनाम करने के लिए आईएसआईएस जैसे ग्रुप तैयार करने की कोशिश कर रहा है। कश्मीर को आजादी दिलाने की लड़ाई में अल कायदा, आईएसआईएस और तालिबान का कोई हाथ नहीं है।
बता दें कि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शुक्रवार को तीन कथित हिजबुल मुजाहिद्दीन के सदस्यों के पोस्टर जारी किए थे।
तीनों संदिग्धों के नाम इशफाक अहमद, ग्यस्सुल इस्लाम और अब्बास अहमद थे। संदिग्धों के पोस्टर दक्षिणी कश्मीर के कई इलाकों में लगाए गए थे। पुलिस ने इनकी जानकारी देने पर ईनाम भी रखा है।
बता दें कि शोपियां जिले में युवा कश्मीरी सैन्य अधिकारी उमर की मंगलवार रात हत्या कर दी गई। उमर अपने मामा मोहम्मद मकबूल की बेटी की शादी में शामिल होने के लिए आए थे, यहीं से उन्हें अगवा कर लिया गया था। अगली सुबह उनका गोलियों से छलनी शव मिला था।
उमर दो राजपुताना राइफल्स यूनिट की कमान संभाल रहे थे। ऐसा करने वाले वो सबसे कम उम्र के अधिकारी थे।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ के सामने तीन तलाक पर चल रही सुनवाई के दौरान शुक्रवार (12 मई) को पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि एक बार में तीन तलाक देना इस्लामी शरीयत के खिलाफ है और ये मुस्लिम महिलाओं को जिंदा दफनाने जैसा है।
आरिफ मोहम्मद खान ने सर्वोच्च अदालत से कहा, ''तीन तलाक से वो मुसलमान औरतों को जिंदा दफन कर देना चाहते हैं।''
तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार (11 मई) को सुनवाई शुरू हुई थी। शुक्रवार को लगातार दूसरे दिन इस मामले पर सुनवाई हुई।
आरिफ मोहम्मद खान ने 1986 में शाह बानो मसले पर विरोध जताने के लिए तत्कालीन राजीव गांधी सरकार से इस्तीफा दे दिया था।
आरिफ मोहम्मद खान ने तीन तलाक की तुलना सऊदी अरब में इस्लाम आने से पहले प्रचलित लड़कियों को जिंदा दफनाने के परंपरा से की।
आरिफ मोहम्मद खान ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि तीन तलाक उसी परंपरा का आधुनिक रूप है।
अदालत ने पूछा कि क्या तीन तलाक इस्लाम का आधारभूत अंग है? इस पर आरिफ मोहम्मद खान ने कहा, ''ये दूर-दूर तक आधारभूत या पवित्र नहीं है। ये कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है।''
आरिफ मोहम्मद खान ने आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की आलोचना करते हुए कहा, ''इसने इस्लामी कानून को हास्यास्पद स्तर तक पहुंचा दिया है।''
सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक और निकाह हलाला से जुड़ी सात याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। इनमें से पांच याचिकाएं मुस्लिम महिलाओं ने दायर की हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के पहले दिन ही साफ कर दिया कि इस सुनवाई में अदालत इस्लाम में प्रचलित बहुविवाह पर विचार नहीं करेगी।
आरिफ मोहम्मद खान ने अदालत से इस मामले में अदालत में पेश होने की इजाजत मांगी थी। आरिफ मोहम्मद खान ने विभिन्न इस्लामी शरियतों की भी आलोचना की। आरिफ मोहम्मद खान ने शीर्ष अदालत से कहा, ''ये इस्लाम की जरूरत के हिसाब से नहीं बनीं बल्कि सल्तनतों के हिसाब से बनी हैं .... पैगंबर की मृत्यु के बाद उनके द्वारा स्थापित राज्य लेने वालों ने सल्तनतें बनाईं।''
मामले की सुनवाई कर रही संविधान पीठ में चीफ जस्टिस खेहर के अलावा जस्टिस कूरियन जोसेफ, यूयू ललित, आरएफ नारीमन और अब्दुल नजीर शामिल हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी एक महिला याचिकाकर्ता और फोरम फॉर अवेयरनेस ऑफ नेशनल सिक्योरिटी नामक स्वयंसेवी संस्था की तरफ से पेश हुए। जेठमलानी ने सुनवाई के दौरान कहा, ''ये प्रचलन पैगंबर की शिक्षाओं के उलट है'' और ये भारतीय संविधान का उल्लंघन करती है।
जेठमलानी ने अदालत से कहा कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के तहत ये सरकार की जिम्मेदारी है कि वो समान नागरिक संहिता लागू करे। जेठमलानी ने अदालत से कहा, ''कम से कम पति और पत्नी के विवाह के समान कानून से शुरुआत तो करें।''
इस मामले में एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त किए गए पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने अदालत से कहा, ''तीन तलाक को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता, न ही इसे न्यायिक वैधता दी जा सकती है।''
मुख्य न्यायाधीश खेहर ने ये जानना चाहा कि क्या तीन तलाक भारत के बाहर अन्य देशों में प्रचलित है और क्या कोई गैर-इस्लामी देश है जिसने इसे खत्म किया हो। इस पर अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि कई इस्लामी देशों ने ये प्रथा खत्म कर दी है और गैर-इस्लामी देश श्रीलंका तीन तलाक पर रोक लगा चुका है।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में गड़बड़ी के आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने सर्वदलीय बैठक में कहा है कि जल्द ही सभी राजनीतिक दलों को ईवीएम टैम्परिंग करने की चुनौती दी जाएगी।
शुक्रवार को सर्वदलीय बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने कहा कि हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में इस्तेमाल की गई ईवीएम में टैम्परिंग की चुनौती के साथ-साथ ये साबित करने का भी मौक़ा पार्टियों को मिलेगा कि चुनाव आयोग के ईवीएम में छेड़छाड़ संभव है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने ईवीएम में छेड़छाड़ का आरोप लगाया था।
इस बीच दिल्ली के उप मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया ने ट्वीट कर कहा है कि 'चुनाव आयोग ने 'हैकाथन' करने से मना किया।
मनीष सिसोदिया ने लिखा है, ''मैंने चुनाव आयोग से कहा है कि हमें पिछले चुनाव में इस्तेमाल मशीन दे दें, हम उसे भी टैम्पर करके दिखा देंगे, लेकिन अभी तक आयोग ने माना नहीं है। हैकाथन का मतलब है कि आओ हमारी ईवीएम टैम्पर करके दिखाओ। जबकि चुनाव आयोग चैलेंज देगा कि पिछले चुनाव में मशीन टेम्परिंग होने के सबूत दो।''
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी समेत कई पार्टियों ने इसकी जाँच की मांग की थी।
आम आदमी पार्टी ने गड़बड़ी का आरोप लगाया और उसके विधायक सौरभ भारद्वाज ने पिछले दिनों दिल्ली विधानसभा में एक डेमो देकर ये दावा किया कि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव है।
हालांकि उन्होंने ईवीएम जैसी मशीन पर ये डेमो दिया जिसे चुनाव आयोग ने ख़ारिज कर दिया।
शुक्रवार को हुई सर्वदलीय बैठक में सात राष्ट्रीय पार्टियों और 35 क्षेत्रीय दलों ने हिस्सा लिया।
मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने बैठक में कहा कि ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप आधारहीन हैं। उन्होंने राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को ये जानकारी दी कि कैसे चुनाव आयोग की ईवीएम को सुरक्षित बनाया गया है।
उन्होंने कहा कि इसमें सुधार के लिए वे राजनीतिक दलों की सलाह का स्वागत करेंगे।
नसीम ज़ैदी ने बताया कि आने वाले विधानसभा चुनावों में वीवीपैट के इस्तेमाल को सुनिश्चित किया जाएगा।
मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि आयोग सभी राजनीतिक पार्टियों से बराबर दूरी बनाकर रहता है और उसका कोई पसंदीदा दल नहीं।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक रैली के दौरान गुरुवार को (11 मई) कहा है कि उन्हें शर्म आती है कि वह इस धरती पर पैदा हुईं।
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, उन्होंने एक जन सभा में यह बात कही।
ममता बनर्जी का यह बयान भारतीय जनता पार्टी के नेता श्यामपदा मंडल के उस बयान के बाद आया है जिसमें भाजपा नेता ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि उन्हें यह समझ में नहीं आता है कि वो (ममता बनर्जी) महिला हैं या पुरुष।
ममता ने कहा, ''इस धरती पर पैदा होकर मैं आज शर्म महसूस कर रही हूं। सभी राज्य केन्द्र की बीजेपी सरकार की धमकियों से डर सकती है, लेकिन पश्चिम बंगाल कभी चुप नहीं रह सकता, चाहे आप जितना भय का माहौल बना लो।''
इसके अलावा ममता बनर्जी ने और भी कई बातें कही है। उन्होंने कहा, ''सभी धर्मों को मिलकर शांति बनाकर रखना चाहिए, न कि तलवारें धारना चाहिए।''
अपनी यह बात कहने के बाद ममता बनर्जी ने कहा, ''शर्म की बात है कि मैं इस धरती पर पैदा हुई।''









