भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय बांग्लादेश दौरे पर शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को ढाका पहुंचे हैं।
वहीं, उनके इस दौरे के विरोध में बांग्लादेश के चटगांव में विरोध प्रदर्शन हुए जिस दौरान पुलिस के साथ हिंसक झड़प में कम से कम चार लोगों की मौत हुई है।
बीबीसी बांग्ला के अनुसार, एक पुलिसकर्मी ने पुष्टि की है कि चार घायलों को अस्पताल ले जाया गया था जिसके बाद उनकी अस्पताल में मौत हो गई।
ढाका में भी प्रदर्शन हुए
इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के विरोध में शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को जुमे की नमाज़ के बाद बांग्लादेश की राजधानी ढाका के बैतुल मुकर्रम इलाक़े में विरोध प्रदर्शन हुए थे।
इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई जिसमें कई पत्रकार भी घायल हुए।
बांग्लादेश की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चटगांव में जुमे की नमाज़ के बाद हथाज़री मदरसे से विरोध मार्च निकला जिसके बाद हिंसक झड़प हुई।
पुलिस के साथ इन झड़पों में कई लोग घायल हुए।
चटगांव मेडिकल कॉलेज के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी बांग्ला सेवा को बताया था कि अस्पताल लाए गए कम से कम चार घायल लोगों की मौत हो गई है।
हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम संगठन के नेता मुजिबुर रहमान हामिदी ने पुष्टि की है कि उनके कुछ प्रदर्शनकारियों की मौत हुई है।
उनका दावा है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं। हालांकि, इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है।
पुलिस स्टेशन पर पथराव
पुलिसकर्मियों के हवाले से ढाका के अख़बारों ने रिपोर्ट किया है कि प्रदर्शनों के दौरान कुछ लोगों ने हथाज़री पुलिस थाने पर पथराव किया।
हिंसक प्रदर्शनकारियों को भगाने के लिए पुलिस ने हवा में गोलियां चलाईं जिसमें कई लोग घायल हुए हैं।
बीते कुछ दिनों में कई मुस्लिम नेता और वामपंथी संगठन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के विरोध में रैलियां निकाल रहे हैं। उनका दावा है कि 'शेख़ मुजीबुर रहमान ने एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए संघर्ष किया जबकि मोदी सांप्रदायिक हैं'।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के निमंत्रण पर ढाका पहुंचे हैं।
वह यहां पर बांग्लादेश की स्वतंत्रता के 50 वर्ष और संस्थापक शेख़ मुजीबुर रहमान की जन्मशती के मौक़े पर आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करने आए हैं।
व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने कहा है कि 'क्वॉड देशों की पहली बैठक में राष्ट्रपति जो बाइडन ने भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के नेताओं के साथ चीन द्वारा उत्पन्न की गईं चुनौतियों पर चर्चा की'।
जेक ने प्रेस को बताया कि यह वर्चुअल बैठक चीन पर केंद्रित नहीं थी, लेकिन इसमें पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर पर भी चर्चा हुई।
अमेरिका की नज़र में क्वॉड नामक इस समूह को भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक शक्ति का मुक़ाबला करने के लिए बनाया गया है। इसके साथ-साथ, आपसी सहयोग को बढ़ाना इस समूह का मुख्य मक़सद रहेगा।
बताया गया है कि शुक्रवार, 12 मार्च, 2021 को हुई पहली बैठक में अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया के नेताओं ने सीओवीआईडी-19 के ख़िलाफ़ मिलकर काम करने की बात कही। साथ ही पर्यावरण और सुरक्षा के मुद्दों को भी बातचीत का हिस्सा बनाया गया।
पहली बैठक के बाद, इन तथाकथित क्वॉड देशों ने एक संयुक्त बयान में कहा, ''हम एक ऐसा क्षेत्र बनाने का प्रयास कर रहे हैं जो स्वतंत्र, खुला, समावेशी, स्वस्थ, लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा हो और जो ‘जोर-ज़बरदस्ती’ से प्रभावित ना हो।''
बताया गया है कि चारों देशों में सीओवीआईडी वैक्सीन से संबंधित एक साझेदारी बनाने को लेकर बात हुई है जिसका मक़सद सीओवीआईडी वैक्सीन के वितरण में तेज़ी लाना होगा, ताकि कोरोना महामारी पर जल्द से जल्द काबू पाया जा सके। दावा किया गया है कि इस साझेदारी से भारत-प्रशांत क्षेत्र में स्थित देशों को मदद मिलेगी।
व्हाइट हाउस ने कहा है कि अमेरिका साल 2022 के अंत तक सीओवीआईडी वैक्सीन की कम से कम एक अरब खुराक तैयार करने के लिए भारतीय दवा निर्माता बायोलॉजिकल ई लिमिटेड को आर्थिक सहायता देगा, ताकि उसकी क्षमता को बढ़ाया जा सके।
इसके अलावा, जापान भी भारत को रियायती दर पर ऋण देने के बारे में बात कर रहा है, ताकि भारत ज़्यादा से ज़्यादा टीके बनाकर उनका निर्यात कर सके।
बयान में यह भी कहा गया है कि क्वॉड देशों ने जलवायु से संबंधित मुद्दों से निपटने के लिए एक कार्यदल का गठन किया है, ताकि पेरिस जलवायु समझौते का मज़बूती से पालन किया जा सके। आने वाले समय में यह समूह इन देशों के बीच तकनीक, दूरसंचार और उपकरण आपूर्तिकर्ताओं के विविधीकरण के बारे में भी बयान जारी करेगा।
चीन ने कहा है कि 'देशों के बीच आदान-प्रदान और परस्पर सहयोग आपसी समझ और विश्वास को बेहतर करने के लिए होना चाहिए, ना कि किसी तीसरे पक्ष और उसके हितों को नुकसान पहुँचाने के लिए'।
शुक्रवार, 12 मार्च, 2021 को भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच बने 'क्वॉड समूह' की पहले बैठक से कुछ घंटे पहले चीन की ओर से यह बयान आया।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लिजियान ने क्वॉड-बैठक से संबंधित एक प्रश्न के जवाब में कहा, ''हमें उम्मीद है कि ये देश खुलेपन और समावेशी नज़रिये का ध्यान रखेंगे, ताकि सबका भला हो। इसके अलावा ये किसी 'एक्सक्लूसिव ब्लॉक' को बनाने से बचेंगे और उन्हीं कामों को करेंगे जो क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के अनुकूल हैं।''
क्वॉड समूह की पहली बैठक को चीन में बहुत बारीकी से कवर किया गया। चीन के सरकारी मीडिया ने इस पर कई रिपोर्ट लिखी हैं जिनमें व्यापक रूप से इसे 'अमेरिका के नेतृत्व वाला एक प्रयास बताया गया है, ताकि मिलकर चीन को रोका जा सके'।
वहीं, कुछ चीनी विशेषज्ञों ने इस बैठक पर कम ऊर्जा ख़र्च करने की सलाह दी है और कहा है कि 'क्वॉड की बैठक को ज़्यादा गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है'।
पीपल्स लिब्रेशन आर्मी के पूर्व वरिष्ठ कर्नल चाऊ बो, जो चीन में रणनीतिक मामलों के नामी टिप्पणीकार भी हैं, उन्होंने सरकारी प्रसारक 'चाइना ग्लोबल टीवी नेटवर्क' से बातचीत में कहा कि ''चीन को इसे बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।''
उन्होंने कहा, ''मैं आपको एक वाक्य में क्वॉड पर अपनी टिप्पणी दे सकता हूँ। इन चार देशों में से कोई भी अन्य तीन देशों के हितों के लिए अपने स्वयं के हितों (चीन के संबंध में) का बलिदान नहीं करना चाहेगा।''
उन्होंने चारों देशों के चीन के साथ मौजूदा व्यापारिक संबंधों का हवाला देते हुए यह बात कही।
उन्होंने कहा, ''अगर आप क्वॉड में शामिल चारों देशों से पूछते हैं कि 'क्या आप चीन के ख़िलाफ़ हैं' या 'एक चीन-विरोधी क्लब हैं', तो वो साफ़ इनकार करते हैं। ऐसे में मेरा निष्कर्ष यह है कि क्वॉड निश्चित रूप से चीन की वजह से स्थापित किया गया है, पर वो ये कह नहीं सकते कि यह चीन के ख़िलाफ़ है। इसे अगर एक सैन्य गठबंधन के रूप में देखा जाये, तो भारत साफ़तौर पर इससे पूरी तरह इनकार करेगा।''
''क्वॉड अभी विकसित हो रहा है और अपना आकार ले रहा है। मगर फ़िलहाल यह तय नहीं है कि ये सैन्य या आर्थिक, किस रास्ते पर जायेगा।''
बहरहाल, 18 मार्च 2021 को चीन और अमेरिका के बीच एक उच्च-स्तरीय बैठक होने वाली है जिसमें दोनों सरकारों के विदेश मंत्रालयों के प्रतिनिधि आपस में बात करेंगे। चीनी विदेश मंत्रालय ने इसे एक 'उच्च-स्तरीय रणनीतिक वार्ता' कहा है।
चीन ने कहा है कि वो बाइडन प्रशासन के साथ नये सिरे से बातचीत करना चाहता है, लेकिन पिछले चार वर्षों के तनावपूर्ण संबंधों का दोष उसने अमेरिका पर ही डाला है।
वहीं, बाइडन प्रशासन ने अब तक के अपने बयानों में यह संकेत दिये हैं कि वो चीन के संबंध में पिछले प्रशासन की कुछ नीतियों को जारी रख सकता है।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लिजियान के अनुसार, अमेरिका-चीन रिश्तों पर चीन की स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है।
उन्होंने कहा, ''हम चाहते हैं कि अमेरिका, चीन के साथ अपने संबंधों को उद्देश्यपूर्ण और तर्कसंगत तरीक़े से देखे। शीत-युद्ध की स्थिति को दरकिनार करे और चीन की संप्रभुता, सुरक्षा और विकास से जुड़े हितों का सम्मान करना सीखे। साथ ही वो चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना बंद कर दे।''
म्यांमार की सेना ने देश की सर्वोच्च नेता आंग सान सू ची समेत कई नेताओं को गिरफ़्तार करने के बाद सत्ता अपने हाथ में ले ली है।
म्यांमार में सोमवार, 01 फरवरी 2021 की तड़के नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद म्यांमार की सेना के टीवी चैनल पर कहा गया कि देश में एक साल तक आपातकाल रहेगा।
म्यांमार की राजधानी नेपीटाव और मुख्य शहर यंगून में सड़कों पर सैनिक मौजूद हैं।
म्यांमार में सरकार और सेना के बीच नवंबर 2020 में हुए चुनाव के नतीजों को लेकर बीते कुछ समय से तनाव था। चुनाव में सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी ने भारी अंतर से जीत हासिल की थी लेकिन सेना का दावा है कि चुनाव में धोखाधड़ी हुई।
सेना ने सोमवार, 01 फरवरी 2021 को संसद की बैठक को स्थगित करने का आह्वान किया था।
भारत के विदेश मंत्रालय ने म्यांमार की स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि वो स्थिति पर नज़र रख रहा है।
म्यांमार में 2011 में लोकतांत्रिक सुधारों से पहले तक सैन्य सरकार थी।
सेना ने सोमवार, 01 फरवरी 2021 को कहा कि उसने सत्ता सैन्य प्रमुख मिन आंग लाइंग को सौंप दी है।
बीबीसी दक्षिण-पूर्व एशिया के संवाददाता जॉनथन हेड का कहना है कि सेना का ये क़दम दस साल पहले उसी के बनाए संविधान का उल्लंघन है। उनका कहना है कि सेना ने पिछले शनिवार, 30 जनवरी 2021 को ही कहा था कि वो संविधान का पालन करेगी।
इस संविधान के तहत सेना को आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार है लेकिन आंग सान सू ची जैसे नेताओं को हिरासत में लेना एक ख़तरनाक और उकसाने वाला कदम हो सकता है जिसका कड़ा विरोध देखा जा सकता है।
बीबीसी बर्मा सेवा ने बताया कि राजधानी में टेलीफ़ोन और इंटरनेट सेवाएं काट दी गई हैं।
चुनाव में क्या हुआ था?
म्यांमार में 8 नवंबर 2020 को आए चुनावी नतीजों में नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी ने 83% सीटें जीत ली थीं। इस चुनाव को कई लोगों ने आंग सान सू ची सरकार के जनमत संग्रह के रूप में देखा। साल 2011 में सैन्य शासन ख़त्म होने के बाद से ये दूसरा चुनाव था।
लेकिन म्यांमार की सेना ने इन चुनावी नतीजों पर सवाल खड़े किए हैं। सेना की ओर से सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और चुनाव आयोग के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ शिकायत की गई है।
हाल ही में सेना द्वारा कथित भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करने की धमकी देने के बाद तख़्तापलट की आशंकाएं पैदा हो गई थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों का खंडन किया।
आंग सान सू ची कौन हैं?
आंग सान सू ची म्यांमार की आज़ादी के नायक रहे जनरल आंग सान की बेटी हैं। 1948 में ब्रिटिश राज से आज़ादी से पहले ही जनरल आंग सान की हत्या कर दी गई थी। सू ची उस वक़्त सिर्फ दो साल की थीं।
सू ची को दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली महिला के रूप में देखा गया जिन्होंने म्यांमार के सैन्य शासकों को चुनौती देने के लिए अपनी आज़ादी त्याग दी।
साल 1991 में नजरबंदी के दौरान ही सू ची को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया। 1989 से 2010 तक सू ची ने लगभग 15 साल नज़रबंदी में गुजारे।
साल 2015 के नवंबर महीने में सू ची के नेतृत्व में नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी ने एकतरफा चुनाव जीत लिया। ये म्यांमार के इतिहास में 25 सालों में हुआ पहला चुनाव था जिसमें लोगों ने खुलकर हिस्सा लिया।
म्यांमार का संविधान उन्हें राष्ट्रपति बनने से रोकता है क्योंकि उनके बच्चे विदेशी नागरिक हैं। लेकिन 75 वर्षीया सू ची को म्यांमार की सर्वोच्च नेता के रूप में देखा जाता है।
लेकिन म्यांमार की स्टेट काउंसलर बनने के बाद से आंग सान सू ची ने म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में जो रवैया अपनाया उसकी काफ़ी आलोचना हुई।
साल 2017 में रखाइन प्रांत में म्यांमार की सेना की कार्रवाई से बचने के लिए लाखों रोहिंग्या मुसलमानों ने पड़ोसी देश बांग्लादेश में शरण ली थी।
इसके बाद सू ची के अंतरराष्ट्रीय समर्थकों ने बलात्कार, हत्याएं और संभावित नरसंहार को रोकने के लिए ताकतवर सेना की निंदा नहीं की और ना ही अत्याचारों को स्वीकार किया।
कुछ लोगों ने तर्क दिया कि वह एक समझदार राजनेता हैं जो कि एक ऐसे बहु-जातीय देश का शासन चलाने की कोशिश कर रही हैं जिसका इतिहास काफ़ी जटिल है।
लेकिन सू ची ने 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान जो सफाई पेश की, उसके बाद उनकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति ख़त्म हो गई।
हालांकि, म्यांमार में आंग सान सू ची को द लेडी की उपाधि हासिल है और बहुसंख्यक बौद्ध आबादी में वह अभी भी काफ़ी लोकप्रिय हैं। लेकिन ये बहुसंख्यक समाज रोहिंग्या समाज के लिए बेहद कम सहानुभूति रखता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की एक फ़ोन रिकॉर्डिंग सामने आई है जिसमें वो जॉर्जिया प्रांत के शीर्ष चुनाव अधिकारी को अपने जीतने लायक वोटों की व्यवस्था करने के लिए कह रहे हैं।
वाशिंगटन पोस्ट ने ये रिकॉर्डिंग जारी की है। इसमें राष्ट्रपति ट्रंप रिपब्लिकन सेक्रेट्री ऑफ़ स्टेट ब्रेड रेफ़ेनस्पर्जर से कह रहे हैं, 'मैं बस 11780 वोट खोजना चाहता हूं।'
वहीं रेफ़ेनस्पर्जर ट्रंप से कह रहे हैं कि जॉर्जिया के नतीजे सहीं हैं।
डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बाइडेन ने राष्ट्रपति चुनावों में जॉर्जिया प्रांत में जीत हासिल की थी।
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन ने कुल 306 इलेक्टोरल वोट जीते थे जबकि ट्रंप को 232 वोट मिले थे।
मतदान के बाद से ही राष्ट्रपति ट्रंप चुनावों में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होने का आरोप लगा रहे हैं। हालांकि उन्होंने कोई सबूत पेश नहीं किया है।
अमेरिका के सभी 50 प्रांतों ने अब चुनावी नतीजों को प्रमाणित कर दिया है। कुछ प्रांतों में दोबारा गिनती और अपीलों के बाद ये किया गया है।
अमेरिका की अदालतें अब तक जो बाइडेन की जीत के ख़िलाफ़ दायर 60 याचिकाएं रद्द कर चुकी हैं।
अमेरिकी कांग्रेस 6 जनवरी 2021 को चुनाव नतीजों को स्वीकार करेगी।
जो बाइडेन 20 जनवरी 2021 को अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे।
वहीं जॉर्जिया में सीनेट की दो सीटों के लिए 05 जनवरी 2021 को मतदान होगा। इन सीटों के नतीजे जॉर्जिया प्रान्त में सत्ता के संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
यदि डेमोक्रेट पार्टी के दोनों उम्मीदवार जीत गए तो सीनेट में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के बराबर प्रतिनिधि होंगे और तब निर्णायक वोट उप-राष्ट्रपति चुनी गईं कमला हैरिस के पास होगा।
वहीं कांग्रेस के निचले सदन में पहले से ही डेमोक्रेट पार्टी का बहुमत है।
कॉल रिकॉर्डिंग में क्या है?
वाशिंगटन पोस्ट ने कॉल रिकॉर्डिंग जारी की है। इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जॉर्जिया के सेक्रेट्री ऑफ़ स्टेट पर दबाव बनाते सुने जा सकते हैं।
वो ज़ोर देकर कहते हैं कि जॉर्जिया का चुनाव उन्होंने जीत लिया है और ये कहने में कुछ गलत नहीं होगा कि दोबारा गिनती की गई है।
वहीं रेफ़ेनस्पर्जर जवाब देते हैं, ''राष्ट्रपति महोदय, आपके सामने चुनौती ये है कि जो डाटा आप दिखा रहे हैं वह ग़लत है।''
राष्ट्रपति ट्रंप अधिकारी को संभावित क़ानूनी नतीजों की धमकी भी देते हैं।
वो कहते हैं, ''तुम्हें पता है कि उन्होंने क्या किया है और इस बारे में जानकारी न देना अपराध है। तुम ऐसा होने नहीं दे सकते हो। ये तुम्हारे और तुम्हारे अधिवक्ता रियान के लिए बड़ा ख़तरा है।''
राष्ट्रपति ट्रंप ने रेफ़ेनस्पर्जर से कहा कि वो राज्य के नतीजों की दोबारा समीक्षा करें।
व्हाइट हाउस ने अभी तक कॉल रिकॉर्डिंग जारी किए जाने पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
पूर्व रक्षा मंत्रियों की ट्रंप से अपील
अमेरिका में जीवित सभी दस पूर्व रक्षा मंत्रियों ने राष्ट्रपति ट्रंप से चुनाव नतीजों पर सवाल न करने और सेना को इस विवाद में शामिल न करने की अपील की है।
वाशिंगटन पोस्ट के लिए लिखे गए लेख में पूर्व मंत्रियों ने कहा कि अमेरिकी सेना को चुनावों के विवाद को सुलझाने में शामिल करने के प्रयास देश को ख़तरनाक, ग़ैर क़ानूनी और अंसवैधानिक ज़मीन पर ले जाएंगे।
लेख में उन्होंने कहा है कि रक्षा विभाग में सत्ता परिवर्तन का पारदर्शी तरीके से होना महत्वपूर्ण है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसराइल पर कड़ी टिप्पणी करने वाले और फ़लस्तीनियों के अधिकारों की बात करने वाले तुर्की के राष्ट्रपति रिचैप तैय्यप अर्दोआन की सरकार ने दो साल से लगभग समाप्त इसराइल के साथ राजनयिक संबंधों को अचानक बहाल करने की घोषणा की है।
तुर्की ने 15 दिसंबर 2020 को इसराइल के लिए अपना राजदूत नियुक्त किया है। 2018 में ग़ज़ा में फ़लस्तीनी प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ इसराइल की हिंसक कार्रवाइयों के विरोध में तुर्की ने अपना राजदूत तेल अवीव से वापस बुला लिया था।
ये प्रदर्शन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से येरुशलम भेजने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हो रहे थे।
तुर्की के नेता अर्दोआन इसराइल को 'दहशतगर्द और बच्चों का क़ातिल' कह चुके हैं, लेकिन अब वो अपने राजदूत को इसराइल भेज रहे हैं। इस फ़ैसले के अर्थ को समझने के लिए हालिया घटनाक्रमों और इसराइल-तुर्की के लंबे ऐतिहासिक संबंधों को समझना ज़रूरी है।
तुर्की की ओर से अपने राजदूत को तैनात करने का फ़ैसला 15 दिसंबर 2020 को आया है जब 14 दिसंबर 2020 को अमेरिका ने तुर्की पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाए हैं।
रूस से एस-400 मिसाइल डिफेन्स सिस्टम ख़रीदने के बाद अमेरिका ने 2020 की शुरुआत में तुर्की को अपने एफ़-35 लड़ाकू विमान बेचने और तुर्की के एविएटर ट्रेनिंग प्रोग्राम समेत कई योजनाओं पर रोक लगा दी थी।
अमेरिकी दबाव के बावजूद तुर्की ने रूसी मिसाइल सिस्टम की ख़रीदारी से पीछे हटने से मना कर दिया था। अब जाते-जाते ट्रंप प्रशासन ने तुर्की पर नई पाबंदियां लागू कर दी हैं।
ग़ौरतलब है कि तुर्की अमेरिका और यूरोप के रक्षा गठबंधन नेटो का एक अहम सदस्य भी है।
मध्य पूर्व में नई गुटबाज़ियां और 'जियो स्ट्रेटेजिक' बदलाव ऐसे समय में हो रहे हैं जब पूरी दुनिया ऐतिहासिक रूप से कोरोना वायरस महामारी से जूझ रही है।
दुनियाभर के देशों की आर्थिक कठिनाइयां बढ़ रही हैं और अरब देशों के लिए बड़ी मुश्किल का समय है क्योंकि पूरी दुनिया की तेल पर निर्भरता कम हुई है जिसके कारण उनका आर्थिक बोझ ज़्यादा बढ़ गया है।
अरब देश आर्थिक स्थिरता के कारण अपनी पारंपरिक नीतियों की समीक्षा करते हुए अपनी नई आर्थिक संभावनाओं को खोज रहे हैं।
वहीं अमेरिका में भी राजनीतिक बदलाव आ रहा है और नए राष्ट्रपति जो बाइडन का प्रशासन 20 जनवरी 2021 से पदभार संभालने जा रहा है।
तुर्की और इसराइल के संबंधों में उतार-चढ़ाव
तुर्की और इसराइल के बीच संबंधों में हमेशा फ़लस्तीन एक तरह केंद्र बिंदु बना रहा है। पहले भी तीन बार तुर्की इसराइल के साथ अपने राजनयिक संबंध निचले स्तर पर लाने या उन्हें ख़त्म करने की कोशिशें कर चुका है और हर बार इसके केंद्र में फ़लस्तीन ही रहा है।
सबसे पहले 1956 में जब स्वेज़ नहर के मुद्दे पर इसराइल ब्रिटेन और फ़्रांस के समर्थन के बाद सिनाई रेगिस्तान में हमलावर हुआ तो तुर्की ने उस पर विरोध जताते हुए अपने राजनयिक संबंधों को घटा दिया था।
इसके बाद 1958 में उस वक़्त के इसराइली प्रधानमंत्री डेविड बेन गोरियान और तुर्की के प्रमुख अदनान मेंदरेस के बीच एक ख़ुफ़िया मुलाक़ात हुई और दोनों देशों के बीच रक्षा और ख़ुफ़िया सहयोग स्थापित करने पर सहमति हुई।
1980 में इसराइल ने पूर्वी येरुशलम पर क़ब्ज़ा किया तो तुर्की ने दोबारा उसके साथ अपने राजनयिक संबंधों को घटा दिया। इस दौरान दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध ठंडे रहे लेकिन 90 के दशक में ओस्लो शांति समझौते के बाद दोनों देशों के बीच संबंध बहाल हो गए।
इस दौरान दोनों मुल्कों के संबंध जिसे 'ज़बरदस्ती की शादी' भी कहा जाता था वह बिना किसी उलझन के चलते रहे और इस दौरान पारस्परिक व्यापार और रक्षा क्षेत्र में सहयोग के कई समझौते भी हुए।
जनवरी 2000 में इसराइल ने तुर्की से पानी ख़रीदने का एक समझौता किया लेकिन यह समझौता ज़्यादा दिन नहीं चल सका। इसके बाद दोनों देशों के बीच कई रक्षा समझौते हुए जिनमें तुर्की को ड्रोन और निगरानी के उपकरण देना भी शामिल था।
रक्षा क्षेत्र में संबंधों के बनने की बड़ी वजह थी - तुर्की की रक्षा ज़रूरतें और इसराइल को अपना सामान बेचने के लिए ख़रीदार ढूंढना।
तुर्की में नवंबर 2002 में जब रिचैप तैय्यप अर्दोआन की दक्षिणपंथी जस्टिस एंड डिवेलपमेंट पार्टी (एकेपी) सत्ता में आई तो दोनों देशों के बीच संबंधों में नया मोड़ आना शुरू हुआ। 2005 में अर्दोआन ने इसराइल का दौरा भी किया और उस वक़्त के इसराइली प्रधानमंत्री एहुद ओलमर्त को तुर्की के दौरे की दावत दी।
दिसंबर 2008 में हालात ने एक और करवट ली और इसराइली प्रधानमंत्री शिमॉन पेरेज़ के अंकारा दौरे के तीन दिन बाद ही इसराइल ने ग़ज़ा में 'ऑपरेशन कास्ट लेड' के नाम से चढ़ाई शुरू कर दी।
हमास से हमदर्दी रखने वाले अर्दोआन को इसराइल की इस कार्रवाई से ज़बर्दस्त धक्का लगा और उसको 'स्पष्ट रूप से धोखा' क़रार दिया।
2010 में इसराइली फ़ौज की ग़ज़ा में घेराबंदी के दौरान मावी मरमरा की घटना हुई। तुर्की के एक मानवाधिकार संगठन की ओर से मावी मरमरा जहाज़ मानवीय सहायता लेकर जा रहा था जिस पर इसराइली फ़ौज ने धावा बोल दिया। इस घटना में 10 तुर्क नागरिक मारे गए थे।
इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच संबंध ख़त्म हो गए।
अमेरिकी कोशिश
अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने दो मित्र देशों के बीच में तनाव को कम करने और राजनयिक संबंधों को बहाल कराने के लिए कोशिशें जारी रखीं।
इसके लिए अर्दोआन ने तीन शर्तें सामने रखीं जिनमें मावी मरमरा पर हमले के लिए माफ़ी मांगने, मारे गए लोगों को मुआवज़ा देने और ग़ज़ा की घेराबंदी समाप्त करने जैसी शर्तें शामिल थीं।
इसराइल के लिए सबसे बड़ी शर्त माफ़ी मांगना था और इसराइल भी तुर्की को हमास के कुछ नेताओं को देश से बाहर करने की मांग कर रहा था।
अमेरिकी कोशिशों के तहत ही 2013 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अर्दोआन और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के बीच फ़ोन पर बातचीत कराई। टेलिफ़ोन पर हुई बातचीत के दौरान नेतन्याहू माफ़ी मांगने और मारे गए लोगों के लिए मुआवज़ा देने को तैयार हो गए।
इसके बावजूद इस क्षेत्र में लगातार होने वाली घटनाओं के कारण दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य होने में देरी होती रही और आख़िरकार सन 2016 में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध बहाल हो सके।
वर्ल्ड फू़ड प्रोग्राम को साल 2020 का नोबेल शांति पुरस्कार 10 दिसंबर 2020 को प्रदान किया गया।
वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के एग्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर डेविड बीज़ली ने नोबेल शांति पुरस्कार ग्रहण किया।
वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के एग्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर डेविड बीज़ली ने कहा, ''ये कल्पना करना असंभव है कि 400 ईस्वी में रोम शहर में भीषण अकाल की वजह से पूरी आबादी के 90 प्रतिशत लोग मारे गए थे। उसी समय रोमन एम्पायर के पतन की शुरुआत हुई। सवाल ये है कि पतन की वजह से अकाल हुआ या अकाल की वजह से रोमन एम्पायर का पतन हुआ? मेरे विचार में दोनों का जवाब है- हां।''
डेविड बीज़ली ने कहा, ''इस धनी, आधुनिक, तकनीकी रूप से उन्नत दुनिया में ये कल्पना करना भी असंभव है कि हम उसी तरह के अकाल की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन आज मेरा कर्तव्य है कि मैं ये कहूं कि अकाल, मानवता की दहलीज़ पर आ पहुंचा है।''
उन्होंने कहा, ''अकाल को रोकने में विफल होने पर कई जानें जाएंगी और बड़ी तबाही होगी। हमारा मानना है कि खाद्य सुरक्षा में ही शांति का मार्ग निहित है। ये नोबेल पुरस्कार सिर्फ़ धन्यवाद के लिए नहीं, बल्कि क़दम उठाने के लिए है।''
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम मानवीय मदद करने वाला विश्व का सबसे बड़ा संगठन है जो भुखमरी के ख़िलाफ़ खाद्य सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर काम करता है।
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम, संयुक्त राष्ट्र का खाद्य कार्यक्रम है। इसका मुख्यालय रोम में है।
सऊदी अरब के प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने 06 दिसंबर 2020 को हुई बहरीन सिक्यॉरिटी समिट में इसराइल की कड़ी आलोचना की है।
इसराइल के विदेश मंत्री गाबी अशकेनाज़ी इसमें ऑनलाइन शामिल हुए। इस घटनाक्रम से अरब देशों और इसराइल के बीच आगे किसी बातचीत की राह में चुनौतियां सामने आई हैं।
समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक़, मनामा डायलॉग में प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल की कड़ी टिप्पणियों की वजह से इसराइल को हैरानी हुई है क्योंकि इसराइल के विदेश मंत्री को ऐसा होने की उम्मीद नहीं थी।
ख़ासतौर पर तब जबकि संबंधों को सामान्य बनाने वाले समझौतों के बाद बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात के अधिकारियों ने इसराइलियों का गर्मजोशी से स्वागत किया था।
इसराइल और फ़लस्तीनियों में दशकों से विवाद और संघर्ष रहा है। फ़लस्तीनियों का विचार है कि ये समझौते उनके साथ धोखा है और इस तरह हैं जैसे उनके अरब साथियों ने पीठ में छुरा घोंप दिया हो।
प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने अपनी बात शुरू करते हुए 'इसराइल की शांति-प्रेमी और उच्च नैतिक मूल्य वाले देश' की धारणा को 'पश्चिमी औपनिवेशिक ताक़त' के तहत कहीं ज़्यादा स्याह फ़लस्तीनी हकीक़त बताया।
प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने कहा कि ''इसराइल ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए फ़लस्तीनियों को क़ैद में रखा जहां बुज़ुर्ग, आदमी-औरतें बिना किसी इंसाफ़ के एक तरह से सड़ रहे हैं। वो घरों को गिरा रहे हैं और चाहे जिसकी हत्या कर रहे हैं।''
प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने ''इसराइल के परमाणु हथियारों के अघोषित ज़ख़ीरे और इसराइली सरकार की सऊदी अरब को कमज़ोर करने की कोशिशों'' की भी भर्त्सना की।
प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने सऊदी अरब का आधिकारिक रुख़ दोहराया कि समस्या का समाधान 'अरब पीस इनिशिएटिव' को लागू करने में निहित है।
साल 2002 में सऊदी अरब प्रायोजित 'अरब पीस इनिशिएटिव' समझौते में इसराइल के अरब देशों के साथ हर तरह के रिश्तों के बदले साल 1967 में इसराइली क़ब्ज़े वाले इलाक़े को फ़लस्तीनी देश का दर्जा देने की मांग की गई थी।
उन्होंने कहा, ''आप खुले ज़ख़्म को दर्द निवारक दवाओं से ठीक नहीं कर सकते हैं।''
प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल के बात के फ़ौरन बाद इसराइली विदेश मंत्री गाबी अशकेनाज़ी ने कहा, ''सऊदी प्रतिनिधियों की टिप्पणियों पर मैं अपना खेद प्रकट करना चाहता हूं। मुझे नहीं लगता कि उनकी बातों में वो मर्म और बदलाव नज़र आते हैं जो मिडिल ईस्ट में हो रहे हैं।''
इसराइली विदेश मंत्री गाबी अशकेनाज़ी ने इसराइली रुख़ दोहराते हुए कहा कि ''शांति समझौता ना होने के लिए फ़लस्तीनी ज़िम्मेदार हैं। फ़लस्तीनियों को लेकर हमारे पास विकल्प है कि हम इसका समाधान करें या ना करें या यूं ही आरोप-प्रत्यारोप करते रहें।''
बहरीन सिक्योरिटी समिट को देख-सुन रहे संयुक्त राष्ट्र में पूर्व राजदूत और नेतन्याहू के क़रीबी डोर गोल्ड ने प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल की टिप्पणियों पर कहा कि अतीत में भी कई झूठे आरोप लगाए गए हैं।
इस पर प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने उन्हें भी आड़े हाथों लिया।
सऊदी बनाम इसराइल
सऊदी अरब ऐतिहासिक रूप से इसराइल और इसके फ़लस्तीनी लोगों के साथ होने वाले बर्ताव का आलोचक रहा है और अरब मीडिया इसराइल को एक 'यहूदी देश' के तौर पर खारिज करते रहे हैं।
सऊदी अरब के दूर-दराज और देहाती इलाकों में लोग न सिर्फ इसराइल को बल्कि सभी यहूदी लोगों को अपने दुश्मन के तौर पर देखते आए हैं।
हालांकि, यहूदियों को लेकर कई तरह की भ्रामक थिअरीज़ अब नहीं दिखाई देतीं। इसकी एक वजह यह भी है कि सऊदी लोग काफी वक्त इंटरनेट पर बिताते हैं और इस वजह से दुनिया में चल रही चीजों के बारे में काफी जागरूक हैं।
इसके बावजूद सऊदी आबादी के एक तबके में बाहरी लोगों को लेकर एक शक अभी भी कायम है। सऊदी अरब और खाड़ी देशों के फलस्तीन के साथ रिश्तों का एक विचित्र इतिहास रहा है।
खाड़ी देश आमतौर पर फलस्तीनी मुद्दे के समर्थक रहे हैं। दशकों से वे राजनीतिक और वित्तीय रूप से फलस्तीन की मदद कर रहे हैं। लेकिन, जब फलस्तीनी नेता यासिर अराफात ने 1990 में इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के कुवैत पर हमले और कब्जे का समर्थन किया तो उन्हें यह एक बड़ा धोखा जान पड़ा।
अमरीका की अगुवाई में ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म के बाद और 1991 में स्वतंत्र होने पर कुवैत ने अपने यहां मौजूद फलस्तीनियों की पूरी आबादी को बाहर निकाल दिया और उनकी जगह मिस्र के हजारों लोग बसा दिए गए।
इस इलाके के पुराने शासकों को अराफात के धोखे को भुलाने में लंबा वक्त लगा है।
ईरान की संसद में एक नया कानून पारित किया गया है जिसके तहत देश के परमाणु केंद्रों पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से किए जाने वाले निरीक्षण पर रोक लगा दी गई है और साथ ही ईरान अब यूरेनियम संवर्धन को भी आगे बढ़ाएगा।
इस नए क़ानून के आने के बाद ईरान सरकार 20 फ़ीसदी तक यूरोनियम संवर्धन दोबारा शुरू कर सकेगी जिसे साल 2015 के परमाणु समझौते में 3.67% तक सीमित कर दिया गया था।
2015 के समझौते के अनुसार, ईरान अपनी संवेदनशील परमाणु गतिविधियों को सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को आने की अनुमति दी थी। इसके बदले में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को ख़त्म किया गया था।
हालाँकि, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने इस क़ानून को मंज़ूरी मिलने से पहले कहा कि वह इस नए कानून से असहमत हैं क्योंकि इससे कूटनीति को नुक़सान पहुँचेगा।
ईरानी सांसदों ने ये नया क़ानून ईरान के मुख्य परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की बीते 27 नवंबर 2020 को हुई हत्या के बाद बनाया है।
ईरान का मानना है कि इज़राइल और एक निर्वासित विपक्ष ने मिलकर एक रिमोट-कंट्रोल हथियार से फ़ख़रीज़ादेह पर हमला किया। फ़ख़रीज़ादेह को ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुख्य कर्ताधर्ता माना जाता था।
ईरान सरकार बार-बार इस बात पर ज़ोर देती रही है कि उसकी सभी परमाणु गतिविधियां शांतिपूर्ण ही रही हैं। पश्चिमी देशों ने कड़े प्रतिबंध के ज़रिए ईरान को परमाणु हथियारों को विकसित करने से रोका।
ईरान का नया क़ानून क्या कहता है?
ईरान के गार्डियन काउंसिल के पारित नए क़ानून के मुताबिक़ 2015 के समझौते में शामिल ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों को ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंध और आर्थिक प्रतिबंधों में ढील देने के लिए दो महीने का वक़्त दिया गया है।
ये प्रतिबंध 2018 में ट्रंप प्रशासन के परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद लगाए गए थे।
अगर दो महीने के भीतर इस दिशा में काम शुरू नहीं किया गया तो ईरान सरकार अपना यूरेनियम संवर्धन 20 फ़ीसदी तक बढ़ा देगी और अपने नतांज़ और फोरदो परमाणु केंद्र पर नई तकनीक से लैस अपकेंद्रण यंत्र बनाएगी जहां यूरोनियम का संवर्धन किया जाएगा।
इस कानून के तहत संयुक्त राष्ट्र, ईरान के परमाणु केंद्रों का निरीक्षण भी नहीं कर सकेगा।
ईरानी समाचार एजेंसी फ़ार्स के मुताबिक़ 02 दिसंबर 2020 को एक चिट्ठी के ज़रिए ईरान की संसद के प्रवक्ता ने औपचारिक तौर पर राष्ट्रपति रूहानी से इस नए कानून को लागू करने की अपील की है।
इस कानून को मंज़ूरी मिलने के पहले ही ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा था कि उनकी सरकार इस नए कानून से सहमत नहीं हैं। उन्होंने इस कानून को देश की ''कूटनीति के लिए नुक़सानदेह'' बताया था।
परमाणु डील पर डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडन की अलग राय
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 2018 में परमाणु समझौते को रद्द कर दिया था। उन्होंने कहा था कि वो ईरान से नया समझौता करना चाहते हैं जो उसके परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल के विकास पर अनिश्चितकालीन रोक लगाएगा। इसके बदले अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए।
वहीं दूसरी ओर अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि वह ओबामा सरकार के समय हुए परमाणु समझौते को दोबारा लागू करेंगे और अगर ईरान 'परमाणु समझौते का कड़ाई से पालन करता है' तो ईरान पर लगाए प्रतिबंध हटाए जाएंगे।
बाइडन 20 जनवरी, 2021 को अमेरिका के राष्ट्रपति की शपथ लेंगे।
जुलाई, 2019 में ही ईरान ने परमाणु हथियार बनाने के लिए 3.67 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम की सीमा बढ़ाकर 4.5% कर दी थी।
कम संवर्धित तीन से पाँच प्रतिशत घनत्व वाले यूरेनियम के आइसोटोप U-235 को ईंधन की तरह इस्तेमाल करके बिजली बनाई जा सकती है।
हथियार बनाने के लिए जो यूरेनियम इस्तेमाल होता है वह 90 प्रतिशत या इससे अधिक संवर्धित होता है।
साल 2015 की परमाणु डील ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए किया गया था और इसके बदले ईरान पर लगे प्रतिबंधों को ख़त्म किया गया था। इस परमाणु समझौते पर ईरान के साथ अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, जर्मनी, फ़्रांस और चीन ने भी दस्तख़त किये थे।
ईरान का मानना है कि इसराइल और निर्वासित विपक्षी समूह ने उसके शीर्ष के परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह को 27 नवंबर 2020 को मारने के लिए एक रिमोट नियंत्रित हथियार का इस्तेमाल किया था।
तेहरान में फ़ख़रीज़ादेह की अंत्येष्टि के दौरान ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली शामख़ानी ने कहा कि हमलावरों ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का इस्तेमाल किया और वे वारदात स्थल पर मौजूद नहीं थे।
हालांकि उन्होंने इसे लेकर और जानकारी नहीं दी। शुरुआत में ईरानी रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि फ़ख़रीज़ादेह की कार को कुछ बंदूकधारियों ने निशाना बनाया था और उसी दौरान उन्हें गोली मारी गई थी।
इसराइल ने ईरान के इन दावों पर अभी कोई टिप्पणी नहीं की है। 2000 के दशक की शुरुआत में फ़ख़रीज़ादेह ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम में अहम भूमिका अदा की थी।
सबसे अहम बात यह है कि हाल ही में इसराइल ने फ़ख़रीज़ादेह को लेकर कहा था कि वो ईरान के गोपनीय परमाणु हथियार को विकसित करने में लगे हुए हैं।
ईरान हमेशा से कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम हथियार विकसित करने के लिए नहीं है। फ़ख़रीज़ादेह की अंत्येष्टि का कार्यक्रम तेहरान स्थित ईरान के रक्षा मंत्रालय के कैंपस में हुआ। अंत्येष्टि के कुछ अवशेष उत्तरी तेहरान में स्थित एक क़ब्रिस्तान को सौंपा गया।
ईरान के सरकारी टीवी में दिखा कि ईरानी राष्ट्रध्वज में लिपटे फ़ख़रीज़ादेह के ताबूत को सैनिकों और सीनियर अधिकारी उठाए आगे बढ़ रहे थे। इनमें ख़ुफ़िया मंत्री महमूद अलावी, रिवॉल्युशनरी कोर कमांडर जनरल हुसैन सलामी और परमाणु प्रोग्राम के प्रमुख अली अकबर सालेही ने फ़ख़रीज़ादेह की श्रद्धांजलि में नमाज़ अदा की।
ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्यॉरिटी काउंसिल के सचिव एडमिरल शामख़ानी ने फ़ख़रीज़ादेह की अंत्येष्टि कार्यक्रम में कहा कि ईरानी ख़ुफ़िया और सुरक्षा सेवाओं को फ़ख़रीज़ादेह की हत्या की साज़िश का अंदेशा पहले से ही था।
शामख़ानी ने कहा, ''उनकी सुरक्षा को लेकर ज़रूरी उपाय किए गए थे लेकिन दुश्मनों ने बिल्कुल नया तरीक़ा इस्तेमाल किया। इस हत्या को अंजाम पेशेवर और ख़ास तरीक़े से दिया गया है। दुर्भाग्य से हमारे दुश्मन इसमें सफल रहे। यह बहुत ही जटिल मिशन था क्योंकि इसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का इस्तेमाल किया गया है। वारदात स्थल पर कोई भी मौजूद नहीं था।''
एडमिरल शामख़ानी ने कहा कि इस हत्या को अंजाम देने वालों का कुछ सुराग़ मिला है। उन्होंने कहा, ''इसमें यहूदी शासन और मोसाद के साथ निर्वासित ईरानी विपक्षी समूह मुजाहिदीन-ए-ख़ाल्क़ (एमकेओ) निश्चित तौर पर शामिल रहा है।''
मोसाद इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी है और यहूदी शासन इसराइल के लिए इस्तेमाल किया गया है। एमकेओ ईरान का निर्वासित विपक्षी धड़ा है जो मुल्क में वर्तमान सरकार के ढाँचे का विरोध करता है। ईरान की ओर से यह बयान तब आया है जब वहां की फार्स न्यूज़ एजेंसी ने फ़ख़रीज़ादेह की हत्या में रीमोट-कंट्रोल मशीन गन के इस्तेमाल की बात कही है।
अरबी भाषा के अल-अलाम टीवी की रिपोर्ट के अनुसार इस तरह के हथियार का इस्तेमाल सैटेलाइलट कंट्रोल के ज़रिए किया जाता है। 27 नवंबर 2020 को जब ईरानी परमाणु वैज्ञानिक की हत्या हुई तो रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि पूर्वी तेहरान में हथियारबंद आतंकवादियों ने फ़ख़रीज़ादेह की कार को निशाना बनाकर हमला किया था।
मंत्रालय ने कहा था कि फ़ख़रीज़ादेह को उनके सुरक्षा गार्ड और हमलावरों के बीच की गोलाबारी में गोली लगी थी और इसी दौरान उनकी मौत हो गई। सोशल मीडिया पर जो तस्वीरें पोस्ट की गई हैं उनमें दिख रहा है कि गोलियों से छलनी हुई कार के साथ मलबे और ख़ून बिखरे पड़े हैं।
30 नवंबर 2020 को फ़ख़रीज़ादेह की अंत्येष्टि में ईरान के रक्षा मंत्री जनरल आमिर हतामी ने संकल्प दोहराया कि इस हत्या का बदला लिया जाएगा।
आमिर ने कहा, ''दुश्मनों को पता है और एक सैनिक के तौर पर मैं उन्हें कह रहा हूं ईरान के लोग हर एक का जवाब देंगे।''
ईरानी रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ डिफेंसिव इनोवेशन एंड रिसर्च में फ़ख़रीज़ादेह अहम काम कर रहे थे। यहां परमाणु सुरक्षा को लेकर ईरान काम कर रहा है।
फ़ारसी में इस ऑर्गेनाइज़ेशन को SPND कहा जाता है। ईरानी रक्षा मंत्री ने कहा कि SPND का बजट दोगुना किया जाएगा ताकि 'शहीद डॉक्टर' की राह को और तेज़ी से हासिल किया जा सके।
ईरान के मीडिया का दो चीज़ों पर ज़ोर है। पहला ईरानी वैज्ञानिक की हत्या का बदला लेना और दूसरा ये कि ईरान को इसराइल के झाँसे में नहीं फँसना चाहिए क्योंकि वो तनाव बढ़ाकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को चौपट करना चाहता है।









