विदेश

मोदी के दौरे पर बांग्लादेश में हुई हिंसा पर बांग्लादेश के गृह मंत्री ने क्या कहा?

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश दौरे के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में हुई हिंसा पर बांग्लादेश के गृह मंत्री असदुज़्ज़मां ख़ान ने नाराज़गी जताई है और कहा है कि ''कुछ समूह धार्मिक उन्माद फैला रहे हैं और सरकारी संपत्ति और लोगों की जान का नुक़सान कर रहे हैं।''

उन्होंने रविवार, 28 मार्च 2021 को कहा कि हिंसा तुरंत रोकी जाए नहीं तो सरकार को कड़े क़दम उठाने होंगे।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के ख़िलाफ़ ब्राह्मणबरिया में रविवार, 28 मार्च 2021 को लगातार तीसरे दिन झड़पें हुईं।

हिंसक प्रदर्शनों में अब तक कम से कम 12 लोगों की मौत हुई है।  

बांग्लादेश के गृह मंत्री ने कहा, ''पिछले तीन दिनों से कुछ उपद्रवी लोग और समूह धार्मिक उन्माद के चलते कुछ इलाक़ों में सरकारी संपत्ति को नुक़सान पहुंचा रहे हैं।''

प्रदर्शनों में शामिल लोगों ने कथित तौर पर उपज़िला परिषद, थाना भवन, सरकारी भूमि कार्यालय, पुलिस चौकी, रेलवे स्टेशन, राजनीतिक हस्तियों के घर और प्रेस क्लब को नुक़सान पहुंचाया है।

उन्होंने कहा, ''हम सबंधित लोगों से इस तरह के नुक़सान और किसी भी तरह की अव्यवस्था को रोकने के लिए कह रहे हैं। नहीं तो सरकार लोगों की ज़िंदगियों और संपत्ति को बचाने के लिए कड़े क़दम उठाएगी।''

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन 'हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम' भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के ख़िलाफ़ हुए कई प्रदर्शनों के बाद रविवार, 28 मार्च 2021 को हड़ताल पर चला गया।

हड़ताल की वजह से कई जगहों पर नाकेबंदी और झड़पें हुईं, लेकिन सबसे ज़्यादा हिंसा ब्राह्मणबरिया में हुई।

बांग्लादेश के गृह मंत्री ने कहा, ''कुछ स्वार्थी लोग अनाथ बच्चों को सड़कों पर ला रहे हैं, और उन्हें परेशान कर रहे हैं।''

उन्होंने साथ ही कहा कि सोशल मीडिया पर अफ़वाहें और फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाकर तनाव का माहौल बनाया जा रहा है।

बांग्लादेश के गृह मंत्री ने कहा, ''हमें लगता है कि ये देश के ख़िलाफ़ जा रहा है। हम आपसे इसे रोकने के लिए कह रहे हैं, नहीं तो हम क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई करेंगे।''

उन्होंने कहा कि सरकार ये सुनिश्चित करने के लिए क़दम उठाएगी कि जो इस सब से प्रभावित हुए हैं उन्हें और परेशानी ना हो।

उन्होंने कहा कि तीन दिन तक क़ानूनी एजेंसियों ने बहुत संयम दिखाया।  

हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम ने हिंसा की ज़िम्मेदारी से इनकार किया

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन 'हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम' ने हाल की हिंसा में उसके समर्थकों पर लगाए गए आरोपों का खंडन किया है।

हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम ने एक बयान में कहा कि प्रदर्शनकारियों पर सरकार के लोगों और पुलिस ने हमला किया था।

हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम के संयुक्त महासचिव, नसीरुद्दीन मुनीर ने बीबीसी से कहा कि सरकारी इमारतों पर हमले के लिए उनके समर्थकों पर आरोप लगाना सही नहीं है।

उन्होंने कहा, ''बैतूल मुकर्रम में शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को हिंसा हुई थी। ख़बर ऑनलाइन फैलने के बाद हमारे मदरसे के कई छात्रों में गुस्सा था।''

उन्होंने कहा, ''जुमे की नमाज़ के एक घंटे बाद छात्रों ने शांतिपूर्ण मार्च शुरू किया। जब पुलिस स्टेशन के नज़दीक से निकले तो, कुछ लड़के, जो मदरसे के छात्र नहीं थे, वो उपद्रवी लोग मार्च में शामिल हो गए। वो पुलिस स्टेशन पर ईंटें फेंक रहे थे। पुलिस की तरफ से गोलियां बरसा दी गईं।''

हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम के संयुक्त महासचिव, नसीरुद्दीन मुनीर ने बीबीसी से कहा, ''हमारे छात्रों ने पुलिस स्टेशन के अंदर हमला नहीं किया। मैं आपको इसके लिए 100 प्रतिशत आश्वासन दे सकता हूं।''

सरकार ने अतीत में कई बार हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम की मांगों को माना है, जिसमें किताबों में बदलाव करना और बांग्लादेश में मूर्तियों को हटाना शामिल है।

नरेंद्र मोदी के दौरे के बाद भी बांग्लादेश में हिंसा जारी

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के बाद बांग्लादेश का ब्राह्मणबरिया रविवार, 28 मार्च 2021 को तीसरे दिन भी अशांत रहा।

ब्राह्मणबरिया के स्थानीय अस्पताल के अधिकारियों ने कहा कि रविवार, 28 मार्च 2021 को दो और लोगों की मौत हुई है।

बांग्लादेश में पिछले तीन दिनों से जारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों में कम से कम 12 लोग मारे जा चुके हैं।

ब्राह्मणबरिया सदर अस्पताल के डॉक्टर शौकत हुसैन ने बीबीसी को बताया कि हड़ताल के दौरान हुई झड़पों में घायल हुए दो लोगों को अस्पताल लाया गया जिन्होंने दम तोड़ दिया।

डॉक्टर शौकत हुसैन ने इसके अलावा कोई अन्य जानकारी नहीं दी।

'हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम'

स्थानीय संवाददाताओं का कहना है कि कट्टरपंथी इस्लामी संगठन 'हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम' के समर्थकों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हुई हैं।

इन झड़पों में कई लोग घायल हुए हैं।

नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा के ख़िलाफ़ कई विरोध प्रदर्शनों के बाद 'हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम' ने रविवार, 28 मार्च 2021 को हड़ताल बुलाई थी।

स्थानीय संवाददाता मसुक हृदय ने बीबीसी को बताया कि हड़ताल के समर्थकों ने विभिन्न सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमला बोला, वहां तोड़फोड़ की और उन्हें आग के हवाले कर दिया।

हमलावरों ने कथित तौर पर भूमि कार्यालय, सार्वजनिक पुस्तकालय और ज़िला शिल्पकला अकादमी सहित कई सरकारी और निजी भवनों में आग लगा दी।

यात्री ट्रेन पर हमला

मसुक हृदय ने आगे बताया कि प्रदर्शनकारियों ने एक यात्री ट्रेन पर भी हमला किया, जिसमें कई लोग घायल हो गए।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि 'हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम' के सैकड़ों समर्थकों ने रविवार, 28 मार्च 2021 को पूर्वी बांग्लादेश के हिंदू मंदिरों और एक ट्रेन पर हमला किया।

घटना के बाद से ब्राह्मणबारिया के लिए आने-जाने वाली ट्रेनों को निलंबित कर दिया गया है।

बांग्लादेश में सबसे ज़्यादा हिंसा ब्राह्मणबारिया और चटगांव के हाटहज़ारी में हुई है।

शनिवार, 27 मार्च 2021 को ब्राह्मणबारिया में पुलिस और सुरक्षाबलों के साथ संघर्ष में कम से कम पांच प्रदर्शनकारी मारे गए थे।

स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि छठे व्यक्ति की मौत रविवार, 28 मार्च 2021 को हुई। हालांकि बीबीसी स्वतंत्र सूत्रों से इन दावों की पुष्टि नहीं कर पाया है।

बांग्लादेश की आज़ादी की 50वीं सालगिरह के मौके पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को ढाका के दौरे पर पहुंचे थे। वहां कुछ इस्लामी संगठन उनके दौरे का विरोध कर रहे थे।

'बंगाल में बीजेपी जीती तो शेख़ हसीना के लिए चुनौतियाँ बढ़ेंगी'

'ढाका ट्रिब्यून' में नई दिल्ली स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के सीनियर फ़ेलो पार्थ एस घोष का नज़रिया लेख छपा है। इस लेख में कहा गया है कि अगर बीजेपी पश्चिम बंगाल में जीत जाती है तो शेख़ हसीना के लिए राजनीतिक चुनौतियां कई गुना बढ़ जाएंगी।

इस लेख में कहा गया है कि नरेंद्र मोदी का 'हिंदुत्व' और शेख़ हसीना की 'धर्मनिरपेक्षता' मौलिक रूप से एक-दूसरे से उलट हैं।

लेख के मुताबिक़, 27 मार्च 2021 से शुरू हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी के स्टार प्रचारक पीएम नरेंद्र मोदी हिंदू-मुस्लिम विभाजन की बात कर रहे हैं, जो पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहले कभी नहीं देखा गया।

इसमें लिखा है, ''मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के 2014 में सत्ता में आने के बाद से हिंदुत्व ने बंगाल की राजनीति में एंट्री ले ली। हाल में बीजेपी ने बंगाल की राजनीति में मज़बूत मौजूदगी दर्ज कराई और 2019 के लोकसभा चुनाव में 42 सीटों में से 18 अपने नाम कर ली।''

इस लेख में कहा गया है कि भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश को पश्चिम बंगाल के आठों चरणों की वोटिंग और फिर दो मई 2021 के नतीजों को लेकर सोचना पड़ेगा।

पार्था एस घोष लेख में याद करते हैं कि विभाजन के बाद जब भारत के अन्य हिस्से हिंदू-मुसलमान दंगों से जूझ रहे थे तब बंगाल शांति का प्रतीक बना हुआ था।

वो लिखते हैं, ''शेख़ हसीना और नरेंद्र मोदी के लिए साफ़ तौर पर अवसर एक से हैं, लेकिन गहराई में जाकर देखें तो गंभीर विरोधाभास उभरते हैं। बांग्लादेश भारत से ख़ुश है क्योंकि उसे आर्थिक फायदा हो रहा है। भारत के साथ उसके निर्यात में 300% बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भारत भी ख़ुश है क्योंकि बांग्लादेश उत्तरपूर्व स्थित उग्रवादियों को अपनी ज़मीन इस्तेमाल करने देने से रोक रहा है लेकिन संगम के इन बिंदुओं से परे एक विशाल और ख़तरनाक समुद्र है।''

''अगर बीजेपी पश्चिम बंगाल की सत्ता हासिल कर लेती है तो हसीना के लिए राजनीतिक चुनौतियां कई गुना बढ़ जाएंगी। हसीना-मोदी के संयुक्त बयान की अच्छी-अच्छी बातों का बहुत कम महत्व रह जाएगा।''

''रिश्ते बिगड़ सकते हैं क्योंकि ना तो नरेंद्र मोदी और ना ही अमित शाह दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय मानसिकता को समझते हैं। उनके लिए विदेश नीति एक तरह से घरेलू राजनीति ही है। हम सभी जानते हैं कि वो घरेलू राजनीति कैसी है।''

पीएम नरेंद्र मोदी के 'बांग्लादेश की आज़ादी के लिए सत्याग्रह' वाले दावे पर आरटीआई दाख़िल

'ढाका ट्रिब्यून' ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश की आज़ादी के लिए सत्याग्रह करने के दावे से जुड़ी एक दिलचस्प ख़बर को जगह दी है।

'ढाका ट्रिब्यून' की ख़बर में बताया गया है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक संयोजक ने आरटीआई दाख़िल कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश की आज़ादी के समर्थन में गिरफ़्तारी देने और जेल जाने के दावे से जुड़ी जानकारी मांगी है।

ख़बर के मुताबिक़, आईएनसी के सोशल मीडिया विभाग के संयोजक सरल पटेल ने ट्वीट कर बताया है कि उन्होंने शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को भारतीय प्रधानमंत्री के कार्यालय में आरटीआई आवेदन दिया है।

सरल पटेल ने ट्वीट में लिखा, ''मैं जानने के लिए उत्सुक हूं कि किस भारतीय क़ानून के तहत उन्हें गिरफ़्तार किया गया था और उन्हें किस जेल में रखा गया था। आप उत्सुक नहीं हैं?''

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को बांग्लादेश की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में कहा था कि उन्होंने और उनके कई साथियों ने बांग्लादेश के लोगों की आज़ादी के लिए 'सत्याग्रह' किया था।

बांग्लादेश में पीएम नरेंद्र मोदी के दौरे के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय बांग्लादेश दौरे पर शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को ढाका पहुंचे हैं।

वहीं, उनके इस दौरे के विरोध में बांग्लादेश के चटगांव में विरोध प्रदर्शन हुए जिस दौरान पुलिस के साथ हिंसक झड़प में कम से कम चार लोगों की मौत हुई है।

बीबीसी बांग्ला के अनुसार, एक पुलिसकर्मी ने पुष्टि की है कि चार घायलों को अस्पताल ले जाया गया था जिसके बाद उनकी अस्पताल में मौत हो गई।

ढाका में भी प्रदर्शन हुए

इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के विरोध में शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को जुमे की नमाज़ के बाद बांग्लादेश की राजधानी ढाका के बैतुल मुकर्रम इलाक़े में विरोध प्रदर्शन हुए थे।

इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई जिसमें कई पत्रकार भी घायल हुए।

बांग्लादेश की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चटगांव में जुमे की नमाज़ के बाद हथाज़री मदरसे से विरोध मार्च निकला जिसके बाद हिंसक झड़प हुई।

पुलिस के साथ इन झड़पों में कई लोग घायल हुए।

चटगांव मेडिकल कॉलेज के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी बांग्ला सेवा को बताया था कि अस्पताल लाए गए कम से कम चार घायल लोगों की मौत हो गई है।

हिफ़ाज़त-ए-इस्लाम संगठन के नेता मुजिबुर रहमान हामिदी ने पुष्टि की है कि उनके कुछ प्रदर्शनकारियों की मौत हुई है।

उनका दावा है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं। हालांकि, इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है।

पुलिस स्टेशन पर पथराव

पुलिसकर्मियों के हवाले से ढाका के अख़बारों ने रिपोर्ट किया है कि प्रदर्शनों के दौरान कुछ लोगों ने हथाज़री पुलिस थाने पर पथराव किया।

हिंसक प्रदर्शनकारियों को भगाने के लिए पुलिस ने हवा में गोलियां चलाईं जिसमें कई लोग घायल हुए हैं।

बीते कुछ दिनों में कई मुस्लिम नेता और वामपंथी संगठन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के विरोध में रैलियां निकाल रहे हैं। उनका दावा है कि 'शेख़ मुजीबुर रहमान ने एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए संघर्ष किया जबकि मोदी सांप्रदायिक हैं'।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार, 26 मार्च 2021 को बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के निमंत्रण पर ढाका पहुंचे हैं।

वह यहां पर बांग्लादेश की स्वतंत्रता के 50 वर्ष और संस्थापक शेख़ मुजीबुर रहमान की जन्मशती के मौक़े पर आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करने आए हैं।

भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया से चीन की चुनौती पर बात की: अमेरिका

व्हाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने कहा है कि 'क्वॉड देशों की पहली बैठक में राष्ट्रपति जो बाइडन ने भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के नेताओं के साथ चीन द्वारा उत्पन्न की गईं चुनौतियों पर चर्चा की'।

जेक ने प्रेस को बताया कि यह वर्चुअल बैठक चीन पर केंद्रित नहीं थी, लेकिन इसमें पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर पर भी चर्चा हुई।

अमेरिका की नज़र में क्वॉड नामक इस समूह को भारत-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक शक्ति का मुक़ाबला करने के लिए बनाया गया है। इसके साथ-साथ, आपसी सहयोग को बढ़ाना इस समूह का मुख्य मक़सद रहेगा।

बताया गया है कि शुक्रवार, 12 मार्च, 2021 को हुई पहली बैठक में अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया के नेताओं ने सीओवीआईडी-19 के ख़िलाफ़ मिलकर काम करने की बात कही। साथ ही पर्यावरण और सुरक्षा के मुद्दों को भी बातचीत का हिस्सा बनाया गया।

पहली बैठक के बाद, इन तथाकथित क्वॉड देशों ने एक संयुक्त बयान में कहा, ''हम एक ऐसा क्षेत्र बनाने का प्रयास कर रहे हैं जो स्वतंत्र, खुला, समावेशी, स्वस्थ, लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा हो और जो ‘जोर-ज़बरदस्ती’ से प्रभावित ना हो।''

बताया गया है कि चारों देशों में सीओवीआईडी वैक्सीन से संबंधित एक साझेदारी बनाने को लेकर बात हुई है जिसका मक़सद सीओवीआईडी वैक्सीन के वितरण में तेज़ी लाना होगा, ताकि कोरोना महामारी पर जल्द से जल्द काबू पाया जा सके। दावा किया गया है कि इस साझेदारी से भारत-प्रशांत क्षेत्र में स्थित देशों को मदद मिलेगी।

व्हाइट हाउस ने कहा है कि अमेरिका साल 2022 के अंत तक सीओवीआईडी वैक्सीन की कम से कम एक अरब खुराक तैयार करने के लिए भारतीय दवा निर्माता बायोलॉजिकल ई लिमिटेड को आर्थिक सहायता देगा, ताकि उसकी क्षमता को बढ़ाया जा सके।

इसके अलावा, जापान भी भारत को रियायती दर पर ऋण देने के बारे में बात कर रहा है, ताकि भारत ज़्यादा से ज़्यादा टीके बनाकर उनका निर्यात कर सके।

बयान में यह भी कहा गया है कि क्वॉड देशों ने जलवायु से संबंधित मुद्दों से निपटने के लिए एक कार्यदल का गठन किया है, ताकि पेरिस जलवायु समझौते का मज़बूती से पालन किया जा सके। आने वाले समय में यह समूह इन देशों के बीच तकनीक, दूरसंचार और उपकरण आपूर्तिकर्ताओं के विविधीकरण के बारे में भी बयान जारी करेगा।

क्वॉड समूह की बैठक को लेकर चीन ने क्या कहा?

चीन ने कहा है कि 'देशों के बीच आदान-प्रदान और परस्पर सहयोग आपसी समझ और विश्वास को बेहतर करने के लिए होना चाहिए, ना कि किसी तीसरे पक्ष और उसके हितों को नुकसान पहुँचाने के लिए'।

शुक्रवार, 12 मार्च, 2021 को भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच बने 'क्वॉड समूह' की पहले बैठक से कुछ घंटे पहले चीन की ओर से यह बयान आया।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लिजियान ने क्वॉड-बैठक से संबंधित एक प्रश्न के जवाब में कहा, ''हमें उम्मीद है कि ये देश खुलेपन और समावेशी नज़रिये का ध्यान रखेंगे, ताकि सबका भला हो। इसके अलावा ये किसी 'एक्सक्लूसिव ब्लॉक' को बनाने से बचेंगे और उन्हीं कामों को करेंगे जो क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के अनुकूल हैं।''

क्वॉड समूह की पहली बैठक को चीन में बहुत बारीकी से कवर किया गया।  चीन के सरकारी मीडिया ने इस पर कई रिपोर्ट लिखी हैं जिनमें व्यापक रूप से इसे 'अमेरिका के नेतृत्व वाला एक प्रयास बताया गया है, ताकि मिलकर चीन को रोका जा सके'।

वहीं, कुछ चीनी विशेषज्ञों ने इस बैठक पर कम ऊर्जा ख़र्च करने की सलाह दी है और कहा है कि 'क्वॉड की बैठक को ज़्यादा गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है'।

पीपल्स लिब्रेशन आर्मी के पूर्व वरिष्ठ कर्नल चाऊ बो, जो चीन में रणनीतिक मामलों के नामी टिप्पणीकार भी हैं, उन्होंने सरकारी प्रसारक 'चाइना ग्लोबल टीवी नेटवर्क' से बातचीत में कहा कि ''चीन को इसे बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।''

उन्होंने कहा, ''मैं आपको एक वाक्य में क्वॉड पर अपनी टिप्पणी दे सकता हूँ। इन चार देशों में से कोई भी अन्य तीन देशों के हितों के लिए अपने स्वयं के हितों (चीन के संबंध में) का बलिदान नहीं करना चाहेगा।''

उन्होंने चारों देशों के चीन के साथ मौजूदा व्यापारिक संबंधों का हवाला देते हुए यह बात कही।

उन्होंने कहा, ''अगर आप क्वॉड में शामिल चारों देशों से पूछते हैं कि 'क्या आप चीन के ख़िलाफ़ हैं' या 'एक चीन-विरोधी क्लब हैं', तो वो साफ़ इनकार करते हैं। ऐसे में मेरा निष्कर्ष यह है कि क्वॉड निश्चित रूप से चीन की वजह से स्थापित किया गया है, पर वो ये कह नहीं सकते कि यह चीन के ख़िलाफ़ है। इसे अगर एक सैन्य गठबंधन के रूप में देखा जाये, तो भारत साफ़तौर पर इससे पूरी तरह इनकार करेगा।''

''क्वॉड अभी विकसित हो रहा है और अपना आकार ले रहा है। मगर फ़िलहाल यह तय नहीं है कि ये सैन्य या आर्थिक, किस रास्ते पर जायेगा।''

बहरहाल, 18 मार्च 2021 को चीन और अमेरिका के बीच एक उच्च-स्तरीय बैठक होने वाली है जिसमें दोनों सरकारों के विदेश मंत्रालयों के प्रतिनिधि आपस में बात करेंगे। चीनी विदेश मंत्रालय ने इसे एक 'उच्च-स्तरीय रणनीतिक वार्ता' कहा है।

चीन ने कहा है कि वो बाइडन प्रशासन के साथ नये सिरे से बातचीत करना चाहता है, लेकिन पिछले चार वर्षों के तनावपूर्ण संबंधों का दोष उसने अमेरिका पर ही डाला है।

वहीं, बाइडन प्रशासन ने अब तक के अपने बयानों में यह संकेत दिये हैं कि वो चीन के संबंध में पिछले प्रशासन की कुछ नीतियों को जारी रख सकता है।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लिजियान के अनुसार, अमेरिका-चीन रिश्तों पर चीन की स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है।

उन्होंने कहा, ''हम चाहते हैं कि अमेरिका, चीन के साथ अपने संबंधों को उद्देश्यपूर्ण और तर्कसंगत तरीक़े से देखे। शीत-युद्ध की स्थिति को दरकिनार करे और चीन की संप्रभुता, सुरक्षा और विकास से जुड़े हितों का सम्मान करना सीखे। साथ ही वो चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना बंद कर दे।''

म्यांमार: सेना ने तख़्तापलट किया, आंग सान सू ची गिरफ़्तार

म्यांमार की सेना ने देश की सर्वोच्च नेता आंग सान सू ची समेत कई नेताओं को गिरफ़्तार करने के बाद सत्ता अपने हाथ में ले ली है।

म्यांमार में सोमवार, 01 फरवरी 2021 की तड़के नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद म्यांमार की सेना के टीवी चैनल पर कहा गया कि देश में एक साल तक आपातकाल रहेगा।

म्यांमार की राजधानी नेपीटाव और मुख्य शहर यंगून में सड़कों पर सैनिक मौजूद हैं।

म्यांमार में सरकार और सेना के बीच नवंबर 2020 में हुए चुनाव के नतीजों को लेकर बीते कुछ समय से तनाव था। चुनाव में सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी ने भारी अंतर से जीत हासिल की थी लेकिन सेना का दावा है कि चुनाव में धोखाधड़ी हुई।

सेना ने सोमवार, 01 फरवरी 2021 को संसद की बैठक को स्थगित करने का आह्वान किया था।

भारत के विदेश मंत्रालय ने म्यांमार की स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि वो स्थिति पर नज़र रख रहा है।

म्यांमार में 2011 में लोकतांत्रिक सुधारों से पहले तक सैन्य सरकार थी।

सेना ने सोमवार, 01 फरवरी 2021 को कहा कि उसने सत्ता सैन्य प्रमुख मिन आंग लाइंग को सौंप दी है।

बीबीसी दक्षिण-पूर्व एशिया के संवाददाता जॉनथन हेड का कहना है कि सेना का ये क़दम दस साल पहले उसी के बनाए संविधान का उल्लंघन है। उनका कहना है कि सेना ने पिछले शनिवार, 30 जनवरी 2021 को ही कहा था कि वो संविधान का पालन करेगी।

इस संविधान के तहत सेना को आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार है लेकिन आंग सान सू ची जैसे नेताओं को हिरासत में लेना एक ख़तरनाक और उकसाने वाला कदम हो सकता है जिसका कड़ा विरोध देखा जा सकता है।

बीबीसी बर्मा सेवा ने बताया कि राजधानी में टेलीफ़ोन और इंटरनेट सेवाएं काट दी गई हैं।

चुनाव में क्या हुआ था?

म्यांमार में 8 नवंबर 2020 को आए चुनावी नतीजों में नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी ने 83% सीटें जीत ली थीं। इस चुनाव को कई लोगों ने आंग सान सू ची सरकार के जनमत संग्रह के रूप में देखा। साल 2011 में सैन्य शासन ख़त्म होने के बाद से ये दूसरा चुनाव था।

लेकिन म्यांमार की सेना ने इन चुनावी नतीजों पर सवाल खड़े किए हैं। सेना की ओर से सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति और चुनाव आयोग के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ शिकायत की गई है।

हाल ही में सेना द्वारा कथित भ्रष्टाचार पर कार्रवाई करने की धमकी देने के बाद तख़्तापलट की आशंकाएं पैदा हो गई थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन सभी आरोपों का खंडन किया।

आंग सान सू ची कौन हैं?

आंग सान सू ची म्यांमार की आज़ादी के नायक रहे जनरल आंग सान की बेटी हैं। 1948 में ब्रिटिश राज से आज़ादी से पहले ही जनरल आंग सान की हत्या कर दी गई थी। सू ची उस वक़्त सिर्फ दो साल की थीं।

सू ची को दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली महिला के रूप में देखा गया जिन्होंने म्यांमार के सैन्य शासकों को चुनौती देने के लिए अपनी आज़ादी त्याग दी।

साल 1991 में नजरबंदी के दौरान ही सू ची को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया। 1989 से 2010 तक सू ची ने लगभग 15 साल नज़रबंदी में गुजारे।

साल 2015 के नवंबर महीने में सू ची के नेतृत्व में नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी पार्टी ने एकतरफा चुनाव जीत लिया। ये म्यांमार के इतिहास में 25 सालों में हुआ पहला चुनाव था जिसमें लोगों ने खुलकर हिस्सा लिया।

म्यांमार का संविधान उन्हें राष्ट्रपति बनने से रोकता है क्योंकि उनके बच्चे विदेशी नागरिक हैं। लेकिन 75 वर्षीया सू ची को म्यांमार की सर्वोच्च नेता के रूप में देखा जाता है।

लेकिन म्यांमार की स्टेट काउंसलर बनने के बाद से आंग सान सू ची ने म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में जो रवैया अपनाया उसकी काफ़ी आलोचना हुई।

साल 2017 में रखाइन प्रांत में म्यांमार की सेना की कार्रवाई से बचने के लिए लाखों रोहिंग्या मुसलमानों ने पड़ोसी देश बांग्लादेश में शरण ली थी।

इसके बाद सू ची के अंतरराष्ट्रीय समर्थकों ने बलात्कार, हत्याएं और संभावित नरसंहार को रोकने के लिए ताकतवर सेना की निंदा नहीं की और ना ही अत्याचारों को स्वीकार किया।

कुछ लोगों ने तर्क दिया कि वह एक समझदार राजनेता हैं जो कि एक ऐसे बहु-जातीय देश का शासन चलाने की कोशिश कर रही हैं जिसका इतिहास काफ़ी जटिल है।

लेकिन सू ची ने 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान जो सफाई पेश की, उसके बाद उनकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति ख़त्म हो गई।

हालांकि, म्यांमार में आंग सान सू ची को द लेडी की उपाधि हासिल है और बहुसंख्यक बौद्ध आबादी में वह अभी भी काफ़ी लोकप्रिय हैं। लेकिन ये बहुसंख्यक समाज रोहिंग्या समाज के लिए बेहद कम सहानुभूति रखता है।

अमेरिकी चुनावः राष्ट्रपति ट्रंप ने अधिकारी को फ़ोन कर कहा मुझे 11780 वोट चाहिए

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की एक फ़ोन रिकॉर्डिंग सामने आई है जिसमें वो जॉर्जिया प्रांत के शीर्ष चुनाव अधिकारी को अपने जीतने लायक वोटों की व्यवस्था करने के लिए कह रहे हैं।

वाशिंगटन पोस्ट ने ये रिकॉर्डिंग जारी की है। इसमें राष्ट्रपति ट्रंप रिपब्लिकन सेक्रेट्री ऑफ़ स्टेट ब्रेड रेफ़ेनस्पर्जर से कह रहे हैं, 'मैं बस 11780 वोट खोजना चाहता हूं।'

वहीं रेफ़ेनस्पर्जर ट्रंप से कह रहे हैं कि जॉर्जिया के नतीजे सहीं हैं।

डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बाइडेन ने राष्ट्रपति चुनावों में जॉर्जिया प्रांत में जीत हासिल की थी।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन ने कुल 306 इलेक्टोरल वोट जीते थे जबकि ट्रंप को 232 वोट मिले थे।

मतदान के बाद से ही राष्ट्रपति ट्रंप चुनावों में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होने का आरोप लगा रहे हैं। हालांकि उन्होंने कोई सबूत पेश नहीं किया है।

अमेरिका के सभी 50 प्रांतों ने अब चुनावी नतीजों को प्रमाणित कर दिया है। कुछ प्रांतों में दोबारा गिनती और अपीलों के बाद ये किया गया है।

अमेरिका की अदालतें अब तक जो बाइडेन की जीत के ख़िलाफ़ दायर 60 याचिकाएं रद्द कर चुकी हैं।

अमेरिकी कांग्रेस 6 जनवरी 2021 को चुनाव नतीजों को स्वीकार करेगी।

जो बाइडेन 20 जनवरी 2021 को अमेरिका के राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे।

वहीं जॉर्जिया में सीनेट की दो सीटों के लिए 05 जनवरी 2021 को मतदान होगा। इन सीटों के नतीजे जॉर्जिया प्रान्त में सत्ता के संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।

यदि डेमोक्रेट पार्टी के दोनों उम्मीदवार जीत गए तो सीनेट में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के बराबर प्रतिनिधि होंगे और तब निर्णायक वोट उप-राष्ट्रपति चुनी गईं कमला हैरिस के पास होगा।

वहीं कांग्रेस के निचले सदन में पहले से ही डेमोक्रेट पार्टी का बहुमत है।

कॉल रिकॉर्डिंग में क्या है?

वाशिंगटन पोस्ट ने कॉल रिकॉर्डिंग जारी की है। इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जॉर्जिया के सेक्रेट्री ऑफ़ स्टेट पर दबाव बनाते सुने जा सकते हैं।

वो ज़ोर देकर कहते हैं कि जॉर्जिया का चुनाव उन्होंने जीत लिया है और ये कहने में कुछ गलत नहीं होगा कि दोबारा गिनती की गई है।

वहीं रेफ़ेनस्पर्जर जवाब देते हैं, ''राष्ट्रपति महोदय, आपके सामने चुनौती ये है कि जो डाटा आप दिखा रहे हैं वह ग़लत है।''

राष्ट्रपति ट्रंप अधिकारी को संभावित क़ानूनी नतीजों की धमकी भी देते हैं।

वो कहते हैं, ''तुम्हें पता है कि उन्होंने क्या किया है और इस बारे में जानकारी न देना अपराध है। तुम ऐसा होने नहीं दे सकते हो। ये तुम्हारे और तुम्हारे अधिवक्ता रियान के लिए बड़ा ख़तरा है।''

राष्ट्रपति ट्रंप ने रेफ़ेनस्पर्जर से कहा कि वो राज्य के नतीजों की दोबारा समीक्षा करें।

व्हाइट हाउस ने अभी तक कॉल रिकॉर्डिंग जारी किए जाने पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

पूर्व रक्षा मंत्रियों की ट्रंप से अपील

अमेरिका में जीवित सभी दस पूर्व रक्षा मंत्रियों ने राष्ट्रपति ट्रंप से चुनाव नतीजों पर सवाल न करने और सेना को इस विवाद में शामिल न करने की अपील की है।

वाशिंगटन पोस्ट के लिए लिखे गए लेख में पूर्व मंत्रियों ने कहा कि अमेरिकी सेना को चुनावों के विवाद को सुलझाने में शामिल करने के प्रयास देश को ख़तरनाक, ग़ैर क़ानूनी और अंसवैधानिक ज़मीन पर ले जाएंगे।

लेख में उन्होंने कहा है कि रक्षा विभाग में सत्ता परिवर्तन का पारदर्शी तरीके से होना महत्वपूर्ण है।

तुर्की-इसराइल सम्बन्ध: क्या तुर्की और इसराइल फिर एक दूसरे के क़रीब आ रहे हैं?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसराइल पर कड़ी टिप्पणी करने वाले और फ़लस्तीनियों के अधिकारों की बात करने वाले तुर्की के राष्ट्रपति रिचैप तैय्यप अर्दोआन की सरकार ने दो साल से लगभग समाप्त इसराइल के साथ राजनयिक संबंधों को अचानक बहाल करने की घोषणा की है।

तुर्की ने 15 दिसंबर 2020 को इसराइल के लिए अपना राजदूत नियुक्त किया है। 2018 में ग़ज़ा में फ़लस्तीनी प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ इसराइल की हिंसक कार्रवाइयों के विरोध में तुर्की ने अपना राजदूत तेल अवीव से वापस बुला लिया था।

ये प्रदर्शन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी दूतावास को तेल अवीव से येरुशलम भेजने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हो रहे थे।

तुर्की के नेता अर्दोआन इसराइल को 'दहशतगर्द और बच्चों का क़ातिल' कह चुके हैं, लेकिन अब वो अपने राजदूत को इसराइल भेज रहे हैं। इस फ़ैसले के अर्थ को समझने के लिए हालिया घटनाक्रमों और इसराइल-तुर्की के लंबे ऐतिहासिक संबंधों को समझना ज़रूरी है।

तुर्की की ओर से अपने राजदूत को तैनात करने का फ़ैसला 15 दिसंबर 2020 को आया है जब 14 दिसंबर 2020 को अमेरिका ने तुर्की पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाए हैं।

रूस से एस-400 मिसाइल डिफेन्स सिस्टम ख़रीदने के बाद अमेरिका ने 2020 की शुरुआत में तुर्की को अपने एफ़-35 लड़ाकू विमान बेचने और तुर्की के एविएटर ट्रेनिंग प्रोग्राम समेत कई योजनाओं पर रोक लगा दी थी।

अमेरिकी दबाव के बावजूद तुर्की ने रूसी मिसाइल सिस्टम की ख़रीदारी से पीछे हटने से मना कर दिया था। अब जाते-जाते ट्रंप प्रशासन ने तुर्की पर नई पाबंदियां लागू कर दी हैं।

ग़ौरतलब है कि तुर्की अमेरिका और यूरोप के रक्षा गठबंधन नेटो का एक अहम सदस्य भी है।

मध्य पूर्व में नई गुटबाज़ियां और 'जियो स्ट्रेटेजिक' बदलाव ऐसे समय में हो रहे हैं जब पूरी दुनिया ऐतिहासिक रूप से कोरोना वायरस महामारी से जूझ रही है।

दुनियाभर के देशों की आर्थिक कठिनाइयां बढ़ रही हैं और अरब देशों के लिए बड़ी मुश्किल का समय है क्योंकि पूरी दुनिया की तेल पर निर्भरता कम हुई है जिसके कारण उनका आर्थिक बोझ ज़्यादा बढ़ गया है।

अरब देश आर्थिक स्थिरता के कारण अपनी पारंपरिक नीतियों की समीक्षा करते हुए अपनी नई आर्थिक संभावनाओं को खोज रहे हैं।

वहीं अमेरिका में भी राजनीतिक बदलाव आ रहा है और नए राष्ट्रपति जो बाइडन का प्रशासन 20 जनवरी 2021 से पदभार संभालने जा रहा है।

तुर्की और इसराइल के संबंधों में उतार-चढ़ाव

तुर्की और इसराइल के बीच संबंधों में हमेशा फ़लस्तीन एक तरह केंद्र बिंदु बना रहा है। पहले भी तीन बार तुर्की इसराइल के साथ अपने राजनयिक संबंध निचले स्तर पर लाने या उन्हें ख़त्म करने की कोशिशें कर चुका है और हर बार इसके केंद्र में फ़लस्तीन ही रहा है।

सबसे पहले 1956 में जब स्वेज़ नहर के मुद्दे पर इसराइल ब्रिटेन और फ़्रांस के समर्थन के बाद सिनाई रेगिस्तान में हमलावर हुआ तो तुर्की ने उस पर विरोध जताते हुए अपने राजनयिक संबंधों को घटा दिया था।

इसके बाद 1958 में उस वक़्त के इसराइली प्रधानमंत्री डेविड बेन गोरियान और तुर्की के प्रमुख अदनान मेंदरेस के बीच एक ख़ुफ़िया मुलाक़ात हुई और दोनों देशों के बीच रक्षा और ख़ुफ़िया सहयोग स्थापित करने पर सहमति हुई।

1980 में इसराइल ने पूर्वी येरुशलम पर क़ब्ज़ा किया तो तुर्की ने दोबारा उसके साथ अपने राजनयिक संबंधों को घटा दिया। इस दौरान दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध ठंडे रहे लेकिन 90 के दशक में ओस्लो शांति समझौते के बाद दोनों देशों के बीच संबंध बहाल हो गए।

इस दौरान दोनों मुल्कों के संबंध जिसे 'ज़बरदस्ती की शादी' भी कहा जाता था वह बिना किसी उलझन के चलते रहे और इस दौरान पारस्परिक व्यापार और रक्षा क्षेत्र में सहयोग के कई समझौते भी हुए।

जनवरी 2000 में इसराइल ने तुर्की से पानी ख़रीदने का एक समझौता किया लेकिन यह समझौता ज़्यादा दिन नहीं चल सका। इसके बाद दोनों देशों के बीच कई रक्षा समझौते हुए जिनमें तुर्की को ड्रोन और निगरानी के उपकरण देना भी शामिल था।

रक्षा क्षेत्र में संबंधों के बनने की बड़ी वजह थी - तुर्की की रक्षा ज़रूरतें और इसराइल को अपना सामान बेचने के लिए ख़रीदार ढूंढना।

तुर्की में नवंबर 2002 में जब रिचैप तैय्यप अर्दोआन की दक्षिणपंथी जस्टिस एंड डिवेलपमेंट पार्टी (एकेपी) सत्ता में आई तो दोनों देशों के बीच संबंधों में नया मोड़ आना शुरू हुआ। 2005 में अर्दोआन ने इसराइल का दौरा भी किया और उस वक़्त के इसराइली प्रधानमंत्री एहुद ओलमर्त को तुर्की के दौरे की दावत दी।

दिसंबर 2008 में हालात ने एक और करवट ली और इसराइली प्रधानमंत्री शिमॉन पेरेज़ के अंकारा दौरे के तीन दिन बाद ही इसराइल ने ग़ज़ा में 'ऑपरेशन कास्ट लेड' के नाम से चढ़ाई शुरू कर दी।

हमास से हमदर्दी रखने वाले अर्दोआन को इसराइल की इस कार्रवाई से ज़बर्दस्त धक्का लगा और उसको 'स्पष्ट रूप से धोखा' क़रार दिया।

2010 में इसराइली फ़ौज की ग़ज़ा में घेराबंदी के दौरान मावी मरमरा की घटना हुई। तुर्की के एक मानवाधिकार संगठन की ओर से मावी मरमरा जहाज़ मानवीय सहायता लेकर जा रहा था जिस पर इसराइली फ़ौज ने धावा बोल दिया। इस घटना में 10 तुर्क नागरिक मारे गए थे।

इस घटना के बाद दोनों देशों के बीच संबंध ख़त्म हो गए।

अमेरिकी कोशिश

अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपने दो मित्र देशों के बीच में तनाव को कम करने और राजनयिक संबंधों को बहाल कराने के लिए कोशिशें जारी रखीं।

इसके लिए अर्दोआन ने तीन शर्तें सामने रखीं जिनमें मावी मरमरा पर हमले के लिए माफ़ी मांगने, मारे गए लोगों को मुआवज़ा देने और ग़ज़ा की घेराबंदी समाप्त करने जैसी शर्तें शामिल थीं।

इसराइल के लिए सबसे बड़ी शर्त माफ़ी मांगना था और इसराइल भी तुर्की को हमास के कुछ नेताओं को देश से बाहर करने की मांग कर रहा था।

अमेरिकी कोशिशों के तहत ही 2013 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अर्दोआन और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के बीच फ़ोन पर बातचीत कराई। टेलिफ़ोन पर हुई बातचीत के दौरान नेतन्याहू माफ़ी मांगने और मारे गए लोगों के लिए मुआवज़ा देने को तैयार हो गए।

इसके बावजूद इस क्षेत्र में लगातार होने वाली घटनाओं के कारण दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य होने में देरी होती रही और आख़िरकार सन 2016 में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध बहाल हो सके।