भारत ने इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में पास किए गए प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है। इस प्रस्ताव में कश्मीर का भी ज़िक्र किया गया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि ओआईसी में पास किए गए प्रस्ताव में भारत का संदर्भ तथ्यात्मक रूप से ग़लत, अकारण और अनुचित है।
नाइजर की राजधानी नियामे में 27 और 28 नवंबर 2020 को ओआईसी के काउंसिल ऑफ फॉरन मिनिस्टर्स (सीएफ़एम) की बैठक थी और इसी बैठक में जो प्रस्ताव पास किया गया है उसमें कश्मीर का भी ज़िक्र है।
पाकिस्तान भी ओआईसी का सदस्य है। इस बैठक में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी शामिल हुए और उन्होंने कश्मीर का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया था।
पाकिस्तान ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक में पास किए गए प्रस्ताव में कश्मीर के ज़िक्र से ख़ुश है। इस प्रस्ताव को नियामे डेक्लरेशन कहा जा रहा है और पाकिस्तान ने इसका स्वागत किया है।
भारत ने पाँच अगस्त 2019 को कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म कर दिया था। तब से पाकिस्तान अंतराराष्ट्रीय मंच पर इस मुद्दे को उठा रहा है लेकिन अब तक कोई ठोस सफलता नहीं मिली है। ओआईसी भी इसे लेकर अब तक बहुत सक्रिय नहीं रहा है।
ओआईसी के सीएफ़एम में पास किए गए प्रस्ताव को लेकर भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान ने कहा है, ''हम नाइजर की राजधानी नियामे में ओआईसी के 47वें सीएफ़एम में तथ्यात्मक रूप से ग़लत, अनुचित और अकारण रूप से पास किए गए प्रस्ताव में भारत के ज़िक्र को ख़ारिज करते हैं। हमने हमेशा से कहा है कि ओआईसी को भारत के आंतरिक मामलों पर बोलने का कोई हक़ नहीं है। जम्मू-कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है और ओआईसी को इस पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है।''
भारत ने अपने बयान में कहा है, ''यह खेदजनक है कि ओआईसी किसी एक देश को अपने मंच का दुरुपयोग करने की अनुमति दे रहा है। जिस देश को ओआईसी ऐसा करने दे रहा है, उसका धार्मिक सहिष्णुता, अतिवाद और अल्पसंख्यकों के साथ नाइंसाफ़ी का घिनौना रिकॉर्ड है। वो देश हमेशा भारत विरोधी प्रॉपेगैंडा में लगा रहा है। हम ओआईसी को गंभीरता से सलाह दे रहे हैं कि वो भविष्य में भारत को लेकर ऐसी बात कहने से बचे।''
नियामे में ओआईसी के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में पास किए गए प्रस्ताव में कश्मीर को भी शामिल किया गया है।
हालांकि कश्मीर ओआईसी के सीएफ़म के एजेंडे में शामिल नहीं था। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान की ज़िद के कारण इसमें महज़ शामिल किया गया है। प्रस्ताव में कहा गया है कि कश्मीर विवाद पर ओआईसी का रुख़ हमेशा से यही रहा है कि इसका शांतिपूर्ण समाधान संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुसार होना चाहिए।
हालांकि ये बात भी कही जा रही है कि ओआईसी के प्रस्ताव में कश्मीर का ज़िक्र रस्मअदायगी भर है और ये भारत के लिए हैरान करने वाला नहीं है। पाकिस्तान के भारी दबाव के बावजूद इस बैठक में कश्मीर को एक अलग एजेंडे के तौर पर शामिल नहीं किया गया।
ओआईसी में सऊदी अरब और यूएई का दबदबा है। पाकिस्तान के इन दोनों देशों से रिश्ते ख़राब चल रहे हैं। सऊदी अरब चाहता है कि पाकिस्तान उसके क़र्ज़ों का भुगतान जल्दी करे। ख़ास करके तब से जब पाकिस्तानी पीएम इमरान ख़ान ने ओआईसी के समानांतर तुर्की, ईरान और मलेशिया के साथ मिलकर एक संगठन खड़ा करने की कोशिश की थी। पिछले हफ़्ते यूएई ने पाकिस्तानी नागिरकों के लिए नया वीज़ा जारी करने पर अस्थायी रूप से प्रतिबंध लगा दिया था।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने इस मुद्दे को भी ओआईसी की बैठक में अलग से यूएई के विदेश मंत्री के सामने उठाया लेकिन अभी तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है।
नियामे डेक्लरेशन में कश्मीर का ज़िक्र क्या पाकिस्तान की जीत है?
मार्च 2019 में अबू धाबी में यह बैठक हुई थी। इस बैठक में भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भी यूएई ने बुलाया था।
पाकिस्तान ने सुषमा स्वराज के बुलाए जाने का विरोध किया था और उसने उद्घाटन समारोह का बहिष्कार किया था। सुषमा स्वराज ने तब ओआईसी के सीएफएम की बैठक को संबोधित किया था।
इस बैठक में जो प्रस्ताव पास किया गया था उसमें कश्मीर का कोई ज़िक्र नहीं था। इसमें पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के उस फ़ैसले का स्वागत किया गया था जिसमें उन्होंने भारत के विंग कमांडर अभिनंदन को वापस भेजा था।
ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद आने वाले प्रस्ताव में कश्मीर का ज़िक्र कोई नई बात नहीं है। इसे पहले भी ज़िक्र होता रहा है। इस बार के प्रस्ताव को नियामे डेक्लेरेशन कहा जा रहा है। इसके ऑपरेटिव पैराग्राफ़ आठ में कहा गया है कि ओआईसी जम्मू-कश्मीर विवाद का समाधान यूएन सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के हिसाब से शांतिपूर्ण चाहता है और उसका यही रुख़ हमेशा से रहा है।
पाँच अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के बाद ओआईसी के विदेश मंत्रियों की यह पहली बैठक थी। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इस बार भारत के ख़िलाफ़ कश्मीर को लेकर कोई कड़ा बयान जारी किया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
भारत में पाकिस्तान के राजदूत रहे अब्दुल बासित ने ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट किया है और उन्होंने इसमें नियामे डेक्लरेशन को लेकर कई बातें कही हैं।
बासित ने कहा है, ''पाँच अगस्त के बाद ओआईसी के विदेश मंत्रियों की यह पहली बैठक थी और हमें उम्मीद थी कि भारत को लेकर कुछ कड़ा बयान जारी किया जाएगा। हमें लगा था कि भारत के फ़ैसले की निंदा की जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। डेक्लरेशन में पाकिस्तान के लिए बहुत ख़ुश करने वाली बात नहीं है।''
उन्होंने कहा, ''जिस तरह से इस डेक्लरेशन में फ़लस्तीन, अज़रबैजान और आतंकवाद को लेकर ज़िक्र है वैसा कश्मीर का नहीं है। पिछले साल की तुलना में इस बात से ख़ुश हो सकते हैं कि चलो इस बार कम से कम ज़िक्र तो हुआ। पाँच अगस्त को भारत ने जो किया उसकी निंदा होनी चाहिए थी लेकिन ये ऐसा नहीं हुआ। नाइजर के भारत के साथ अच्छे ताल्लुकात हैं और जिस कन्वेंशन सेंटर में यह कॉन्फ़्रेंस हुई है वो भारत की मदद से ही बना है।''
मालदीव भी ओआईसी का सदस्य है। इस बैठक में मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद शामिल हुए। अब्दुल्ला ने 27 नंवबर 2020 को एक ट्वीट किया था जिसमें नियामे के उस कॉन्फ़्रेंस सेंटर की तस्वीरें पोस्ट की थीं। इन तस्वीरों के साथ अब्दुल्ला ने अपने ट्वीट में लिखा है, ''ओआईसी की 47वीं सीएफ़एम की बैठक नियामे के ख़ूबसूरत महात्मा गाँधी इंटरनेशनल कॉन्फ़्रेंस सेंटर में हो रही है। जब दुनिया कई चुनौतियों और संकट से जूझ रही है ऐसे में साथ मिलकर ही इनका सामना किया जा सकता है।''
हालांकि पाकिस्तान कश्मीर का ज़िक्र भर होने से अपनी जीत के तौर पर देख रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने ट्वीट कर कहा है, ''नियामे डेक्लरेशन में जम्मू-कश्मीर विवाद को शामिल किया जाना बताता है कि ओआईसी कश्मीर मुद्दे पर हमेशा से साथ खड़ा है।''
भारत ने कश्मीर का विशेष दर्जा जब से ख़त्म किया है तब से पाकिस्तान ओआईसी के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक बुलाने की मांग कर रहा था लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ था।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने अगस्त 2020 में ओआईसी से अलग होकर कश्मीर का मुद्दा उठाने की धमकी दे डाली थी। इससे सऊदी अरब नाराज़ हो गया था और पाकिस्तान को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था। लेकिन तब तक बात बिगड़ गई थी और इसे संभालने के लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा को सऊदी का दौरा करना पड़ा था।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अगर इलेक्टोरल कॉलेज जो बाइडन के अमेरिका का अगला राष्ट्रपति बनने की आधिकारिक पुष्टि कर देता है तो वो व्हाइट हाउस छोड़ देंगे।
राष्ट्रपति ट्रंप ने तीन नवंबर 2020 के मतदान में मिली हार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और 26 नवंबर 2020 को पत्रकारों से कहा कि ये स्वीकार करना 'कठिन' होगा।
उन्होंने एक बार फिर मतदान में धांधली के निराधार दावों को दोहराया। अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव करने के लिए अपनाई जाने वाली पद्धति के तहत बाइडन को अब तक 306 वोट जबकि ट्रंप को उनसे कम 232 वोट मिले हैं। जीत के लिए 270 वोट की ज़रूरत होती है। कुल मतों के हिसाब से भी बाइडन 60 लाख मतों से आगे हैं।
इलेक्टोरल कॉलेज मतों पर आख़िरी फ़ैसला करने के लिए अगले महीने बैठक करेगा। 14 दिसंबर 2020 को अमेरिकी इलेक्टोरल कॉलेज बाइडन की जीत की पुष्टि कर देगा।
उनकी पुष्टि के बाद जो बाइडन 20 जनवरी 2021 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे।
राष्ट्रपति ट्रंप और उनके समर्थकों ने चुनाव को लेकर कई मुक़दमे भी दर्ज कराए हैं, लेकिन इनमें से ज़्यादातर को ख़ारिज कर दिया गया।
इस हफ़्ते की शुरुआत में, ट्रंप ने अनिश्चितता के कई हफ्तों के बाद अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन की टीम को औपचारिक रूप से सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की। इस फ़ैसले का मतलब है कि 20 जनवरी 2021 को शपथ ग्रहण करने जा रहे बाइडन अब शीर्ष स्तर पर सुरक्षा अधिकारियों से जानकारी ले सकेंगे और प्रमुख सरकारी अधिकारियों और लाखों डॉलर के फंड के मामले में भी उनकी पहुंच होगी।
ट्रंप ने क्या कहा?
26 नवंबर 2020 को जब ट्रंप से पूछा गया कि अगर 14 दिसंबर 2020 के इलेक्टोरल कॉलेज के वोट में वो हारते हैं तो व्हाइट हाउस छोड़ने पर राज़ी होंगे? इस पर ट्रंप ने जवाब दिया, ''निश्चित रूप से मैं करूंगा, निश्चित रूप से मैं करूंगा और आप ये जानते हैं।''
हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि ''अगर वो करते हैं (जो बाइडन का चुनाव), तो वो ग़लती करेंगे।''
इसके साथ ही ट्रंप ने कहा, ''ये चीज़ स्वीकार करना बहुत मुश्किल होगा।'' उन्होंने बिना कोई सबूत दिए फिर से चुनाव के दौरान ''बड़ी धांधली'' होने के दावों को दोहराया।
अमरीका के इलेक्टोरल सिस्टम के तहत मतदाता अगले राष्ट्रपति का चुनाव सीधे नहीं करते हैं। इसके बजाए वो 538 उम्मीदवारों के लिए मतदान करते हैं। इन उम्मीदवारों की संख्या अमरीकी राज्यों की आबादी के आधार पर अलग-अलग होती है। ये इलेक्टोरल तक़रीबन हमेशा उस उम्मीदवार को वोट देते हैं जिसने उनके राज्यों के ज़्यादातर वोट जीते होते हैं। हालांकि संभव है कि कुछ मतदाताओं के चुनाव की अनदेखी करे। लेकिन इस तरह से आज तक नतीजे में उलटफेर नहीं हुआ है।
ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा है कि देश के वरिष्ठ परमाणु वैज्ञानिक की हत्या से देश के परमाणु कार्यक्रम की रफ्तार धीमी नहीं पड़ेगी।
शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या के लिए हसन रूहानी ने इसराइल पर आरोप लगाया और कहा कि ये कदम बताता है कि वो कितना परेशान हैं और हमसे कितनी घृणा करते हैं।
इससे पहले ईरान ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव और सुरक्षा परिषद से अपने शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या की निंदा करने की अपील की थी।
अब तक मिली जानकारी के मुताबिक़ फ़ख़रीज़ादेह पर राजधानी तेहरान से सटे शहर अबसार्ड में बंदूकधारियों ने घात लगाकर हमला किया। हालांकि अब तक किसी हमलावर के पकड़े जाने की कोई ख़बर नहीं मिली है।
ईरान के संयुक्त राष्ट्र के लिए राजदूत माजिद तख्त रवांची ने कहा कि मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसे क्षेत्र में अशांति फैलाने के मक़सद से अंजाम दिया गया।
वहीं संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने इस मामले में संयम बरतने की अपील की है।
रॉयटर्स के मुताबिक़, गुटेरेश के प्रवक्ता फरहान हक ने 27 नवंबर 2020 को कहा, ''हमने आज तेहरान के पास हुई एक ईरानी परमाणु वैज्ञानिक की हत्या की ख़बरों को नोट किया है। हम संयम बरतने और ऐसी किसी भी कार्रवाई से बचने का आग्रह करते हैं जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है।''
अन्य ईरानी अधिकारियों ने इसराइल पर हत्या के आरोप लगाए हैं और बदला लेने की चेतावनी दी है।
इसराइल ने अब तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन वो पहले मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह पर एक गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगा चुका है।
पूरा मामला क्या है?
ईरान के रक्षा मंत्रालय ने जानकारी दी थी कि उसके एक शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या कर दी गई है। हमले के बाद फ़ख़रीज़ादेह को स्थानीय अस्पताल में ले जाया गया लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।
ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने फ़ख़रीज़ादेह की हत्या की निंदा करते हुए इसे 'राज्य प्रायोजित आतंक की घटना क़रार दिया'।
पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों का मानना है कि ईरान के ख़ुफ़िया परमाणु हथियार कार्यक्रम के पीछे मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह का ही हाथ था।
विदेशी राजनयिक उन्हें 'ईरानी परमाणु बम के पिता' कहते थे। ईरान कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण मक़सद के लिए है।
साल 2010 और 2012 के बीच ईरान के चार परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या की गई थी और ईरान ने इसके लिए इसराइल को ज़िम्मेदार ठहराया था।
मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या कैसे हुई?
ईरान के रक्षा मंत्रालय ने 27 नवंबर 2020 को एक बयान जारी कर कहा, ''हथियारबंद आतंकवादियों ने रक्षा मंत्रालय के शोध और नवोत्पाद विभाग के प्रमुख मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह को ले जा रही कार को निशाना बनाया।''
मंत्रालय के मुताबिक़, ''आतंकवादियों और फ़ख़रीज़ादेह के अंगरक्षकों के बीच हुई झड़प में वो बुरी तरह घायल हो गए और उन्हें स्थानीय अस्पताल ले जाया गया लेकिन दुर्भाग्य से उनको बचाने की मेडिकल टीम की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं।''
ईरान की समाचार एजेंसी फ़ारस के अनुसार चश्मदीदों ने पहले धमाके और फिर मशीनगन से फ़ायरिंग की आवाज़ सुनी थी।
एजेंसी के अनुसार चश्मदीदों ने तीन-चार चरमपंथियों के भी मारे जाने की बात कही है।
क्या इस हत्या में इसराइल का हाथ है?
ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने ट्वीट कर कहा, ''आतंकवादियों ने आज ईरान के एक प्रमुख वैज्ञानिक की हत्या कर दी है। ये बुज़दिल कार्रवाई, जिसमें इसराइल के हाथ होने के गंभीर संकेत हैं, हत्यारों की जंग करने के इरादे को दर्शाता है।''
ज़रीफ़ ने कहा, ''ईरान अंतरराष्ट्रीय समुदायों, ख़ासकर यूरोपीय संघ से गुज़ारिश करता है कि वो अपने शर्मनाक दोहरे रवैये को ख़त्म करके इस आतंकी कदम की निंदा करें।''
उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा, ''ईरान एक बार फिर आतंकवाद का शिकार हुआ है। आतंकवादियों ने ईरान के एक महान विद्वान की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी है। हमारे नायकों ने दुनिया और हमारे इलाके में स्थिरता और सुरक्षा के लिए हमेशा आतंकवाद का सामना किया है। ग़लत काम करने वालों की सज़ा अल्लाह का क़ानून है।''
ईरानी सेना के इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने कहा है कि ईरान अपने वैज्ञानिक की हत्या का बदला ज़रूर लेगा।
इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के मेजर जनरल हुसैन सलामी ने कहा, ''परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या करके हमें आधुनिक विज्ञान तक पहुँचने से रोकने की स्पष्ट कोशिश की जा रही है।''
मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह कौन थे?
मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह ईरान के सबसे प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक थे और आईआरजीसी के वरिष्ठ अधिकारी थे। पश्चिमी देशों के सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार वो ईरान में बहुत ही ताक़तवर थे और ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम में उनकी प्रमुख भूमिका थी।
इसराइल ने साल 2018 में कुछ ख़ुफ़िया दस्तावेज़ हासिल करने का दावा किया था जिनके अनुसार मोहसिन ने ही ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम की शुरुआत की थी।
उस समय नेतन्याहू ने प्रेसवार्ता में मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह को ईरान के परमाणु कार्यक्रम का प्रमुख वैज्ञानिक क़रार देते हए कहा था, ''उस नाम को याद रखें।''
साल 2015 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की तुलना जे रॉबर्ट ओपनहाइमर से की थी। ओपनहाइमर वो वैज्ञानिक थे जिन्होंने मैनहट्टन परियोजना की अगुवाई की थी जिसने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पहला परमाणु बम बनाया था।
इसराइल ने फ़ख़रीज़ादेह की हत्या पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह को निशाना क्यों बनाया गया?
ईरानी रक्षा मंत्रालय में रिसर्च ऐंड इनोवेंशन विभाग के प्रमुख के तौर पर मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह निश्चित तौर पर एक अहम शख़्सियत थे। यही वजह है कि इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने दो साल पहले चेतावनी भरे लहजे में कहा था 'उनका नाम याद रखिए'।
जबसे अमेरिका 2015 के ईरान परमाणु समझौते से अलग हुआ है, ईरान तेज़ी से आगे बढ़ा है। ईरान ने कम संवर्धन वाले यूरेनियम का भंडार इकट्ठा किया है और समझौते में तय हुए स्तर से ज़्यादा यूरेनियम का संवर्धन किया है।
ईरानी अधिकारी शुरू से ये कहते आए हैं कि संवर्धित यूरेनियम को नष्ट किया जा सकता है लेकिन शोध और विकास की दिशा में हुए कामों को मिटाना बेहद मुश्किल है।
इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) में ईरान के पूर्व राजदूत अली असग़र सुत्लानिया ने हाल ही में कहा था, ''हम वापस पीछे नहीं लौट सकते।''
अगर मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह वाक़ई ईरान के परमाणु कार्यक्रम के लिए वाक़ई उतने महत्वपूर्ण थे जितना कि इसराइल अपने आरोपों में बताया आया है, तो उनकी हत्या शायद ये बताती है कि कोई ईरान के आगे बढ़ने की गति पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहा है।
अमरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा था कि सत्ता में आने के बाद वो ईरान परमाणु समझौते में वापसी करेंगे। मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या ऐसी किसी संभावना को मुश्किल बनाने की एक कोशिश भी हो सकती है।
रूस ने कहा है कि उसके समुद्री इलाके में घुसने वाले अमेरिकी जहाज़ को वो तबाह कर देगा।
उसका कहना है कि उसके युद्धपोत ने जापान सागर के उसके इलाक़े में घुस आए अमेरिकी नौसेना के विध्वंसक जहाज़ का पीछा किया।
अमेरिकी नौसेना के इस विध्वंसक जहाज़ का नाम यूएसएस जॉन एस मैकेन है।
यूएसएस जॉन एस मैकेन उसकी समुद्री सीमा के पीटर द ग्रेट गल्फ़ के क्षेत्र में दो किलोमीटर भीतर तक चला आया था।
रूस का कहना है कि उसने इस जहाज़ को नष्ट करने की चेतावनी दी थी जिसके बाद ये जहाज़ उसके इलाक़े से चला गया।
हालाँकि अमेरिकी नौसेना ने किसी तरह की ग़लती करने से इनकार किया है और ये भी कहा है कि उसके जहाज़ को कहीं से जाने के लिए नहीं कहा गया था।
24 नवंबर 2020 को ये घटना जापान सागर में हुई। इस क्षेत्र को पूर्वी सागर के नाम से भी जानते हैं।
रूस के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि उसके प्रशांत क्षेत्र के बेड़े के विध्वंसक जहाज़ एडमिरल विनोग्रादोव ने इंटरनेशनल कम्युनिकेशन चैनल के ज़रिये अमेरिकी जहाज़ को चेतावनी दी।
धमकी में ये कहा गया था कि ''उसके समुद्री क्षेत्र में आने वाले घुसपैठिये को बाहर करने के लिए ताक़त का इस्तेमाल किया जा सकता है।''
हालाँकि अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े के प्रवक्ता लेफ़्टिनेंट जोए केली ने इस दावे के जवाब में कहा कि ''रूस ग़लतबयानी कर रहा है। यूएसएस जॉन एस मैकेन को किसी भी देश ने अपने क्षेत्र से जाने के लिए नहीं कहा था।''
उन्होंने कहा, ''समुद्री सीमाओं को लेकर किए गए अवैध दावों को अमेरिका कभी भी स्वीकार नहीं करेगा जैसा कि इस मामले में रूस ने किया था।''
समुद्र में ऐसी घटनाएं कभी-कभार ही होती हैं। हालाँकि एडमिरल विनोग्रादोव पूर्वी चीन सागर में एक अमेरिकी जहाज से लगभग उलझ ही गया था।
उस वक़्त भी रूस और अमेरिका ने एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए थे।
दोनों देशों के बीच समुद्र और वायु क्षेत्र में एक-दूसरे से संघर्ष की स्थिति समय-समय पर बनती रहती है।
साल 1988 में तत्कालीन सोवियत संघ के युद्धपोत बेज़्ज़ावेंटी ने अमेरिकी जहाज़ यॉर्कटाउन को ब्लैक सी में टक्कर मार दी थी।
तब भी सोवियत संघ ने अमेरिकी जहाज़ पर उसके समुद्री सीमा में घुसपैठ करने का आरोप लगाया था। रूस और अमेरिका के बीच संबंध उतार-चढ़ाव से गुज़रते रहे हैं।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अभी तक अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को उनकी जीत के लिए शुभकामनाएं नहीं दी हैं।
दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों के मुद्दे पर आख़िरी बचे हुए समझौते को अभी तक अंतिम रूपरेखा नहीं दी जा सकी है। इसकी डेडलाइन फरवरी तक है।
न्यू स्टार्ट ट्रीटी पर दोनों देशों ने 2010 में दस्तखत किए थे जिसके तहत दोनों देशों ने ये तय किया था कि वे लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम परमाणु हथियारों की संख्या को एक निश्चित सीमा तक कम करेंगे।
साल 2017 में यूएसएस जॉन एस मैकेन की सिंगापुर के पास मुठभेड़ हो गई थी जिसमें दस नाविक मारे गए थे।
लोकप्रिय मोबाइल गेम 'पबजी' को बनाने वाली कंपनी पबजी कॉरपोरेशन ने भारत में चीनी कंपनी टेनसेंट गेम्स की फ़्रैंचाइज़ी निलंबित करने का निर्णय लिया है जिसके बाद यह संभावना बनी है कि यह मोबाइल गेम अब एक बार फिर भारतीय यूज़र्स के मोबाइल में लौट आये।
बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण कोरियाई कंपनी पबजी कॉरपोरेशन ने मंगलवार को एक ब्लॉग में लिखा कि ''पबजी खेलने वालों के डेटा की सुरक्षा और उनकी प्राइवेसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने जो निर्णय लिया, हम उसका सम्मान करते हैं।''
''कंपनी के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि प्लेयर्स का डेटा पूरी तरह सुरक्षित रहे। इसके लिए कंपनी इस गेम से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारी अपने हाथ में ले रही है। साथ ही निकट भविष्य में कंपनी भारतीय प्लेयर्स को बेहतर गेमिंग एक्सपीरियंस मुहैया कराने पर काम करेगी।''
अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़, इस निर्णय के बाद भारत में पबजी गेम को संचालित करने का क़ानूनी हक़ चीनी कंपनी टेनसेंट गेम्स के पास नहीं रह जायेगा जिसके पास इस गेम के मोबाइल वर्जन की ग्लोबल फ़्रैंचाइज़ी है।
अब इस ऐप को बनाने वाली दक्षिण कोरिया कंपनी पबजी कॉरपोरेशन ही भारत में पबजी मोबाइल की पब्लिशर कंपनी होगी।
पिछले सप्ताह ही भारत सरकार ने डेटा सुरक्षा और प्राइवेसी को आधार बताते हुए पबजी समेत 118 चीनी मोबाइल ऐप्स पर बैन लगा दिया था।
अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि चीनी कंपनी टेनसेंट की ब्लूहोल स्टूडियो नाम की कंपनी में क़रीब 10 फ़ीसद की हिस्सेदारी है और ब्लूहोल स्टूडियो दक्षिण कोरिया के सिओल शहर में स्थित पबजी कॉरपोरेशन की पैरेंट कंपनी है।
कंपनी के अनुसार, दुनिया भर में 600 मिलियन से ज़्यादा लोगों ने पबजी डाउनलोड किया है और 50 मिलियन से ज़्यादा लोग इसके ऐक्टिव प्लेयर हैं। कंपनी के लिए भारत एक महत्वपूर्ण बाज़ार है क्योंकि भारत में क़रीब 33 मिलियन लोग इस गेम को खेलते रहे हैं।
अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव के बाद दक्षिण कोरियाई कंपनी पबजी कॉरपोरेशन की यह दलील तो मज़बूत हुई है कि 'इस गेम का अब चीनी कंपनी से कोई वास्ता नहीं', लेकिन जानकारों की राय है कि इस निर्णय के बाद भी पबजी की राह पूरी तरह आसान नहीं हो जाएगी क्योंकि पबजी कॉरपोरेशन को पहले भारत सरकार को संतुष्ट करना होगा कि टेनसेंट गेम्स से संबंधित उनके इस निर्णय से फ़र्क क्या पड़ने वाला है।
सऊदी अरब की एक अदालत ने सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी हत्या मामले में दोषी ठहराए गए पांच लोगों की मौत की सज़ा को बदल दिया है। पहले पाँच लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई थी मगर अब उसे सात से 20 साल तक जेल की सज़ा में बदल दिया गया है।
अभियोजन पक्ष का कहना है कि पत्रकार के परिवार ने दोषियों को माफ़ करने का फ़ैसला किया था जिसके बाद उनकी मौत की सज़ा को बदल दिया गया।
मगर ख़ाशोज्जी की मंगेतर हातिज जेंगीज़ ने इस फ़ैसले को इंसाफ़ का मज़ाक बताया है।
तुर्की के राष्ट्रपति कार्यालय ने भी इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए कहा है कि ये फ़ैसला तुर्की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता।
सऊदी सरकार के प्रमुख आलोचक ख़ाशोज्जी पर 2018 में तुर्की के इस्तांबुल शहर में स्थित सऊदी दूतावास में सऊदी एजेंट्स की एक टीम ने हमला किया और उनकी लाश के टुकड़े कर दिए गए थे जिन्हें कभी बरामद नहीं किया जा सका।
सऊदी सरकार ने कहा था कि जिस अभियान के तहत उन्हें मारा गया, उसे उसकी जानकारी नहीं थी। इसके एक साल बाद सऊदी के अभियोजकों ने 11 अनाम व्यक्तियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा शुरू किया था।
लेकिन उस वक़्त संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत एग्नस कॉलमार्ड ने ट्रायल को 'न्याय के विपरीत' बताकर ख़ारिज कर दिया था। उन्होंने निष्कर्ष निकाला था कि ख़ाशोज्जी की 'जानबूझकर और सोची-समझी साज़िश के तहत हत्या' की गई थी जिसके लिए सऊदी सरकार ज़िम्मेदार है।
कॉलमार्ड ने कहा था कि इस बात के विश्वसनीय सबूत हैं कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान समेत उच्च-स्तरीय अधिकारी व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार थे।
प्रिंस ने इस मामले में हाथ होने की बात से इनकार किया। हालांकि उनके दो पूर्व सहयोगियों पर ख़ाशोज्जी की पूर्व-नियोजित हत्या के लिए उकसाने के आरोप में तुर्की में मुक़दमा चलाया गया है।
तुर्की ने अन्य 18 सऊदी नागरिकों पर हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया था।
ख़ाशोज्जी की हत्या की रिकॉर्डिंग
59 साल के पत्रकार ख़ाशोज्जी ख़ुद सऊदी अरब छोड़कर 2017 में अमरीका चले गए थे। उन्हें आख़िरी बार 2 अक्टूबर 2018 को सऊदी के वाणिज्य दूतावास के अंदर जाते देखा गया था। दरअसल उन्हें अपनी तुर्क मंगेतर हतीजा जेंगिज़ से शादी करने के लिए कुछ कागज़ात की ज़रूरत थी, उसी के सिलसिले में वो दूतावास गए थे।
तुर्किश इंटेलिजेंस ने दूतावास के अंदर हुई बातचीत की कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी की थी। जिसे सुनने के बाद कॉलमार्ड निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ख़ाशोज्जी को उस दिन 'बेरहमी से मारा' गया था।
वहीं सऊदी के पब्लिक प्रॉसिक्यूशन ने निष्कर्ष निकाला कि हत्या सोची-समझी साज़िश नहीं थी।
उसने कहा था कि हत्या का आदेश उस टीम के प्रमुख ने दिया था जिसे 'ख़ाशोज्जी को मनाकर' सऊदी वापस लाने के लिए इस्तांबुल भेजा गया था।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक़ हाथापाई के बाद पत्रकार ख़ाशोज्जी को वहीं जबरन रोक लिया गया और इंजेक्शन लगा दिया गया जिसमें बहुत ज़्यादा दवाई थी और ओवरडोज़ की वजह से उनकी मौत हो गई।
उनके शरीर को अलग-अलग हिस्सों में दूतावास के बाहर स्थानीय 'सहयोगी' को दे दिया गया। उनके अवशेष कभी नहीं मिले।
वहीं तुर्की के अभियोजकों ने निष्कर्ष निकाला कि दूतावास में घुसते ही ख़ाशोज्जी का गला घोट दिया गया और उनके शव को नष्ट कर दिया गया।
2019 में सुनाई गई थी मौत की सज़ा
दिसंबर 2019 में रियाद के आपराधिक न्यायालय ने पांच लोगों को 'पीड़ित की हत्या को अंजाम देने और सीधे तौर पर उसमें शामिल होने' के लिए मौत की सज़ा सुनाई।
वहीं तीन अन्य को 'अपराध पर पर्दा डालने और क़ानून का उल्लंघन' करने के लिए कुल 24 साल की जेल की सज़ा सुनाई गई।
तीन लोगों को दोष मुक्त कर दिया गया। जिनमें सऊदी अरब के पूर्व डिप्टी इंटेलिजेंस प्रमुख अहमद असीरी भी शामिल थे।
सऊदी के पब्लिक प्रॉसिक्यूशन ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार सऊद अल-क़हतानी से पूछताछ की लेकिन उन्हें चार्ज नहीं किया गया।
सज़ा क्यों बदली गई?
इस साल मई में ख़ाशोज्जी के बेटे सालाह ने घोषणा की कि वो और उनके भाई 'पिता की हत्या करने वालों को माफ़ कर रहे हैं', उन्होंने कहा कि इन दोषियों को सर्वशक्तिमान ईश्वर ही उनके किए का फल देंगे।
ख़ाशोज्जी के बेटों ने इस दलील को स्वीकार किया कि ये हत्या पूर्व नियोजित नहीं थी।
इसके बाद सऊदी क़ानून के तहत सज़ा की मौत पाने वाले पांच दोषियों की सज़ा कम होने का रास्ता खुल गया।
सोमवार को सऊदी के पब्लिक प्रॉसिक्यूशन ने घोषणा की कि रियाद आपराधिक न्यायालय ने पांचों की मौत की सज़ा को बदलकर 20 साल की जेल की सज़ा सुनाई है और तीन अन्य को सात से 10 साल के बीच की सज़ा दी है।
ये भी कहा गया कि ये अंतिम फ़ैसले हैं और अब आपराधिक मुक़दमा बंद कर दिया जाएगा।
जेंगिज़ ने एक बयान में कहा, ''सऊदी अरब में आज दिए गए फ़ैसले ने एक बार फिर न्याय का मज़ाक बना दिया है।''
उन्होंने कहा, ''सऊदी सरकार मामले को बंद कर रही है, बिना दुनिया को ये सच बताए कि उनकी मौत के लिए कौन ज़िम्मेदार था? किसने योजना बनाई थी, किसने आदेश दिया था, उनका शव कहां है? ये सबसे ज़्यादा बुनियादी और महत्वपूर्ण सवाल हैं जिनका बिल्कुल जवाब नहीं मिला।''
कॉलमार्ड ने मौत की सज़ा कम किए जाने का स्वागत किया, लेकिन साथ ही ये भी कहा कि इन फ़ैसलों के ज़रिए ''जो हुआ उसे दबाने की कोशिश नहीं की जा सकती''।
उन्होंने ट्वीट किया, ''ये फै़सला कोई क़ानूनी या नैतिक वैधता नहीं रखता। ये फ़ैसला उस प्रक्रिया के बाद आया जो ना तो निष्पक्ष था और ना पारदर्शी।''
कॉलमार्ड ने कहा कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद ''किसी भी तरह की सार्थक जांच से बचे रहे हैं''।
उन्होंने फिर से अमरीकी इंटेलिजेंस सर्विसेस को अपने उस कथित आंकलन को जारी करने की अपील की जिसमें कहा गया था कि क्राउन प्रिंस ने ख़ाशोज्जी की हत्या का आदेश दिया था।
भारत के अरुणाचल प्रदेश में बॉर्डर से चीन की सेना द्वारा पांच भारतीयों के कथित अपहरण करने के मामले में भारत के केंद्रीय राज्य मंत्री किरेन रिजिजू के सवाल का जवाब देते हुए चीन ने कड़ा जवाब दिया है। चीन ने कहा है कि वह अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा नहीं मानता बल्कि यह चीन के दक्षिणी तिब्बत का इलाका है।
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक़ चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लिजिएंग ने कहा, ''चीन ने कभी 'कथित' अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं दी, ये चीन के दक्षिणी तिब्बत का इलाका है। हमारे पास भारतीय सेना की ओर से इस इलाके से पांच लापता भारतीयों को लेकर सवाल आया है लेकिन अभी हमारे पास इसे लेकर कोई जानकारी नहीं है।''
भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी ज़िले से पांच लोगों के 'पीपुल्स लिबरेशन आर्मी' (पीएलए) के सैनिकों द्वारा कथित तौर पर अपहरण किए जाने के मुद्दे को चीनी सेना के समक्ष उठाया था।
रविवार की रात एक ट्विट के जरिए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इसकी जानकारी देते हुए लिखा था कि भारतीय सेना चीन के जवाब का इंतज़ार कर रही है। उन्होंने लिखा, ''भारतीय सेना ने पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी समकक्ष को संदेश भेजा है, जवाब का इंतज़ार किया जा रहा है।''
दरअसल, रिजिजू ने एक पत्रकार के ट्वीट के जवाब में ये बात लिखी थी। एक पत्रकार ने ट्वीट के ज़रिए पूछा था, ''पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी द्वारा अरुणाचल प्रदेश से पांच भारतीयों के कथित अपहरण को लेकर क्या अपडेट है? क्या विदेश मंत्रालय, किरेन रिजिजू, प्रेमा खांडू इस पर कोई अपडेट साझा करेंगे?''
इस साल जून में लद्दाख सीमा पर भारत और चीन के बीच हुई झड़प में 20 भारतीय जवानों की मौत हुई और इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है।
भारतीय सेना के एक रिटायर्ड जनरल ने नाम ना छापने की शर्त पर बीबीसी से बात करते हुए कहा, ''चीन का अरुणाचल प्रदेश को लेकर ये रूख़ बिल्कुल भी नया नहीं है। इससे पहले भी चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा मानता रहा है। चीन ने पहले ही साफ़ किया है कि वह मैकमोहन रेखा को नहीं मानता। यही वजह है कि तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा के भारत में रिफ्यूजी बनकर रहने पर चीन हमेशा नकारात्मक रहा है।''
''आम तौर पर भारत चीन-भारत सीमा के लगभग 70-80 किलोमीटर पीछे बेस कैंप रखता था लेकिन 1986-87 के दौर से भारतीय सेना सीमा से ये दूरी कम करते हुए अपने हिस्से में ही आगे बढ़ा। हालांकि चीन ने उस वक़्त कड़ी आपत्ति नहीं जताई क्योंकि उस समय भारत-चीन की विकास दर यानी जीडीपी लगभग समान थी लेकिन 2008 में जब भारत अमरीका के क़रीब आया और दोनों देशों के बीच परमाणु संधि हुई तो चीन को बात यकीनन खटकी। अब हालिया समय में भारत की ओर से सीमावर्ती इलाकों में निर्माण कार्य में तेज़ी आई है और यही वजह है कि चीन बॉर्डर को लेकर तनाव पैदा कर रहा है।''
29 अगस्त की रात भी हुई थी झड़प
इससे पहले 29-30 अगस्त की रात भारतीय सेना के मुताबिक़ दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। इसमें किसी के घायल होने की अब तक कोई सूचना नहीं मिली। भारतीय सेना ने बयान जारी कर कहा था कि चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए ने सीमा पर यथास्थिति बदलने की कोशिश की लेकिन सतर्क भारतीय सैनिकों ने ऐसा नहीं होने दिया।
इस बयान के मुताबिक़, ''भारतीय सैनिकों ने पैंगॉन्ग त्सो लेक में चीनी सैनिकों के उकसाने वाले क़दम को रोक दिया है। भारतीय सेना बातचीत के ज़रिए शांति बहाल करने की पक्षधर है लेकिन इसके साथ ही अपने इलाक़े की अखंडता की सुरक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध है। पूरे विवाद पर ब्रिगेड कमांडर स्तर पर बैठक जारी है।''
हालाँकि चीन ने अपने सैनिकों के एलएसी को पार करने की ख़बरों का खंडन किया।
चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीन की सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा का सख़्ती से पालन करती है और चीन की सेना ने कभी भी इस रेखा को पार नहीं किया है। दोनों देशों की सेना इस मुद्दे पर संपर्क में हैं।
दूसरी तरफ़ चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है, ''भारत-चीन सीमा पर स्थिरता बनाए रखने के लिए चीन प्रतिबद्ध है। स्थिति को तनावपूर्ण बनाने या उकसाने के लिए चीन कभी भी पहल नहीं करेगा।''
उन्होंने फ्रेंच इंस्ट्टीयूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन में भाषण देते हुए कहा, ''दोनों देशों के बीच अभी तक सीमा तय नहीं की गई है, इसलिए समस्याएँ हैं। चीन अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को मज़बूती से बनाए रखेगा, और भारतीय पक्ष के साथ बातचीत के माध्यम से सभी प्रकार के मुद्दों का हल निकालने के लिए तैयार है।''
उन्होंने ये भी कहा कि चीन 'गुड नेबरहुड' की नीति पर विश्वास रखता है, और अपने पड़ोसियों के साथ दोस्ताना और स्थिर संबंध चाहता है।
भारत और चीन के बीच 3,500 किलोमीटर लंबी सरहद है और दोनों देश सीमा की वर्तमान स्थिति पर सहमत नहीं हैं। इसे लेकर दोनों देशों में 1962 में जंग भी हो चुकी है।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपने उस कथित बयान के लिए काफ़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है जिसमें उन्होंने युद्ध में मारे गए अमरीकी सैनिकों को 'हारे हुए' और 'बुद्धू' बताया था।
ट्रंप का यह कथित बयान सबसे पहले 'द अटलांटिस' पत्रिका में छपा और उसके बाद उसके कुछ अंश को एसोसिएटेड प्रेस और फ़ॉक्स न्यूज़ ने प्रकाशित किया था।
हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके सहयोगियों ने इस बयान से इनकार किया है।
अमरीकी सेना के पूर्व सैनिकों ने इन रिपोर्टों के बाद डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना की है।
प्रगतिशील समूह वोटवेट्स ने एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें वे परिवार दिख रहे हैं जिनके बच्चे युद्ध में मारे गए हैं। एक ने लिखा है, ''आपको नहीं मालूम कि बलिदान क्या होता है?''
अमरीकी सेना की ओर से इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान में तैनात रहे पूर्व सैनिक पॉल रेचॉफ़ ने ट्वीट किया है, ''इससे वास्तव में अचरज किसको हुआ है?''
विश्लेषकों का मानना है कि इससे डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने की उम्मीदों को झटका लग सकता है क्योंकि उन्हें सैनिकों के परिवार के मतों की ज़रूरत है।
'द अटलांटिस' के मुताबिक़, ट्रंप ने पेरिस में 2018 में अमरीकी सैनिकों के स्मारक स्थल पर जाने का दौरा 'हारे हुए लोगों से भरी जगह' कहते हुए रद्द कर दिया था।
इस पत्रिका को चार स्रोतों ने बताया कि है उन्होंने वहां जाना इसलिए रद्द किया था क्योंकि बारिश हो रही थी और इससे उनके बालों के बिगड़ जाने का डर था, साथ ही युद्ध में मारे गए अमरीकियों का सम्मान करना उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था।
इसी दौरे पर, अमरीकी राष्ट्रपति ने कथित तौर पर बेलेयूवुड में मारे गए 1800 अमरीकी सैनिकों को बुद्धू बताया था। इस युद्ध के चलते ही पहले विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सेना पेरिस तक नहीं पहुंच पायी। इन सैनिकों को अमरीकी मरीन कार्प्स ने सम्मानित किया हुआ है।
'द अटलांटिस' ने अपनी रिपोर्टिंग में गोपनीय सूत्रों का हवाला दिया है लेकिन एसोसिएटेड प्रेस ने कहा है कि उसने स्वतंत्र रूप से इन बयानों की पुष्टि की है। वहीं फॉक्स न्यूज़ की संवाददाता ने कहा है कि उन्होंने कुछ बयानों की पुष्टि की है।
इस कार्यक्रम को रद्द किए जाने पर 2018 में अमरीकी व्हाइट हाउस ने कहा था कि ख़राब मौसम के चलते राष्ट्रपति का हेलिकॉप्टर नहीं उड़ पाया था। इस बात की पुष्टि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने हाल में लिखी किताब में की है, हालांकि वो ट्रंप के मुखर आलोचक हैं।
बज़फ़ीड के रिपोर्टर जैसन लियोपोल्ड के सूचना की आज़ादी क़ानून के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में अमरीकी नौसेना ने भी कहा कि ट्रंप समाधि स्थल पर इसलिए न जा पाने की वजह बारिश थी।
ट्रंप के बयान की आलोचना करने वालों में नवंबर में राष्ट्रपति पद के लिए उनकी दावेदारी को चुनौती देने जा रहे जो बाइडन ने कहा कि ट्रंप देश का नेतृत्व करने में अनफ़िट हैं।
उन्होंने कहा है, ''अगर वह आलेख सही है। अन्य बातों के आधार पर ऐसा प्रतीत भी होता है। उन्होंने जो कहा है वह अभद्र है, अपमान जैसा है।''
अमरीकी सेना में रह चुकीं डेमोक्रेटिक सीनेटर टैमी डकवर्थ इराक में तैनाती के दौरान अपने दोनों पैर गवां चुकीं हैं। उन्होंने कहा, ''डोनाल्ड ट्रंप अपनी इगो के लिए अमरीकी सेना का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं।''
इराक में मारे गए एक सैनिक के पिता खिज़्र ख़ान ने टिम डकवर्थ की अपील का समर्थन किया है। वो 2016 में भी ट्रंप की आलोचना कर चुके हैं। उन्होंने कहा, ''जब दूसरों की सेवा में अपनी जान गंवाने वालों को ट्रंप लूज़र कह सकते हैं तो इससे हम ट्रंप की आत्मा को समझ रहे हैं।''
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस ख़बर को फ़ेक़ न्यूज़ बताया है।
उन्होंने कहा, ''हमारी सेना के ख़िलाफ़ मैं निगेटिव बयान दे सकता हूं, अपने हीरो के ख़िलाफ़ बयान दे सकता हूं, ऐसा सोचने से पहले यह देखें कि मैंने बजट में जो किया है वो किसी ने नहीं किया है। सैन्य बजट को बढ़ाया, सैन्यकर्मियों का वेतन बढ़ाया है। यह एक पत्रिका की ओर से घृणित क़दम है और ये पत्रिका एकदम बेकार पत्रिका है।''
शुक्रवार को संवाददाताओं से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि इस स्टोरी के सोर्स व्हाइट हाउस के पूर्व चीफ़ ऑफ़ स्टॉफ़ जॉन कैली हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अमरीका के पूर्व मरीन जनरल इस काम के दबाव को संभालने में सक्षम नहीं हैं।
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने फ़ॉक्स न्यूज़ से शुक्रवार की सुबह बताया कि वो राष्ट्रपति के साथ इस दौरे पर थे और उन्होंने कभी ऐसे शब्द नहीं सुने।
वहीं अमरीकी रक्षा मंत्री मार्क इस्पर ने पोलिटिको पत्रिका से कहा है कि ट्रंप देश के सैनिकों, उनके परिवार के सदस्यों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवार के प्रति काफ़ी सम्मान रखते हैं। हालांकि उन्होंने इस ख़बर का स्पष्ट तौर पर खंडन नहीं किया है।
इसके अलावा व्हाइट हाउस के पूर्व चीफ़ ऑफ़ स्टॉफ़ मिक मुलवेने और पूर्व प्रेस सचिव सारा हकाबी सैंडर्स ने भी इस ख़बर को ग़लत बताया है। ये दोनों भी ट्रंप समर्थक माने जाते हैं।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमूमन दावा करते रहे हैं कि उन्हें सैन्य बिरादरी का मज़बूत समर्थन हासिल है। पिउ रिसर्च सेंटर ने बीते साल एक सर्वे में पाया था कि पूर्व सैनिक ट्रंप को कमांडर इन चीफ़ मानते हैं और क़रीब 57 फ़ीसदी पूर्व सैनिकों का समर्थन ट्रंप को हासिल है। इतना ही नहीं हर पांच पूर्व सैनिकों में तीन रिपब्लिकन समर्थक बताए गए थे।
हालांकि सेना को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के बयानों पर विवाद पहले भी हुए हैं। वियतनाम युद्ध के क़ैदी रहे और बाद में सीनेटर बने जॉन मैक्कन पर टिप्पणी करते हुए ट्रंप ने कहा था, ''वो युद्ध के हीरो नहीं थे। मैं उन लोगों को पसंद करता हूं जो क़ैदी नहीं बने।''
डोनाल्ड ट्रंप कभी अमरीका सेना में शामिल नहीं हुए। वियतनाम युद्ध के दौरान उन्हें पांच मौकों पर सेना में शामिल नहीं किया गया, चार बार अकादमिक वजहों से और एक बार एड़ी की हड्डियों में तकलीफ़ के चलते।
संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी एजेंसी ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते के तहत ईरान जितना संवर्धित यूरेनियम रख सकता है, उसने उससे 10 गुना से भी अधिक यूरेनियम इकट्ठा कर लिया है।
इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) ने कहा है कि ईरान के पास एनरिच किये गए यूरेनियम का भंडार अब 2,105 किलो हो गया है, जबकि 2015 के समझौते के तहत यह 300 किलोग्राम से अधिक नहीं हो सकता था।
ईरान ने बीते साल जुलाई में कहा था कि उसने यूरेनियम संवर्धन के लिए नए और उन्नत तकनीक वाले सेंट्रीफ़्यूज उपकरणों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
सेंट्रीफ़्यूज का इस्तेमाल यूरेनियम के रासायनिक कणों को एक-दूसरे से अलग करने के लिए किया जाता है।
ईरान में दो जगहों- नतांज़ और फ़ोर्दो में यूरेनियम का संवर्धन किया जाता है।
संवर्धन के बाद इसका उपयोग परमाणु ऊर्जा या फिर परमाणु हथियारों को विकसित करने के लिए भी किया जा सकता है।
ईरान लंबे वक़्त से इस बात पर ज़ोर देता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ़ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।
ईरान ने आईएईए के पर्यवेक्षकों को अपने दो पूर्व संदिग्ध परमाणु ठिकानों में से एक की जाँच करने की इजाज़त दी थी।
अब एजेंसी ने कहा है कि वह इसी महीने दूसरे ठिकाने से भी सैंपल लेगी।
पिछले साल ईरान ने जानबूझकर और खुलकर 2015 में हुए परमाणु समझौते के वादों का उल्लंघन शुरू कर दिया था।
इस परमाणु समझौते पर ईरान के साथ अमरीका, ब्रिटेन, रूस, जर्मनी, फ़्रांस और चीन ने भी दस्तख़त किये थे।
ईरान ने 2019 में अनुमति से अधिक यूरेनियम का संवर्धन शुरू कर दिया था। हालांकि, यह परमाणु हथियार बनाने के लिए ज़रूरी स्तर से काफ़ी कम था।
क्या इससे परमाणु हथियार बना सकता है ईरान?
परमाणु हथियार बनाने के लिए ईरान को 3.67 प्रतिशत संवर्धित 1,050 किलो यूरेनियम की ज़रूरत होगी। मगर अमरीका के एक समूह 'आर्म्स कंट्रोल एसोसिएशन' का कहना है कि बाद में इसे 90 प्रतिशत और संवर्धित किया जाना होगा।
कम संवर्धित तीन से पाँच प्रतिशत घनत्व वाले यूरेनियम के आइसोटोप U-235 को ईंधन की तरह इस्तेमाल करके बिजली बनाई जा सकती है।
हथियार बनाने के लिए जो यूरेनियम इस्तेमाल होता है वह 90 प्रतिशत या इससे अधिक संवर्धित होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ईरान चाहे भी, तो भी उसे एनरिचमेंट की प्रक्रिया पूरी करने में लंबा समय लगेगा।
पिछले सप्ताह ईरान ने कहा था कि उसने 'सद्भाव' में हथियार पर्यवेक्षकों को अपने ठिकानों की जाँच करने दी है, ताकि परमाणु सुरक्षा से जुड़े मसलों का समाधान किया जा सके।
आईएईए ने इस बात को लेकर ईरान की आलोचना की थी कि वह दो ठिकानों की जाँच की अनुमति नहीं दे रहा और गोपनीय ढंग से रखी गई परमाणु सामग्री और इससे जुड़ी गतिविधियों को लेकर सवालों के जवाब नहीं दे रहा।
अब इस अंतरराष्ट्रीय निगरानी एजेंसी ने एक बयान जारी करके कहा है कि ''ईरान ने एजेंसी के पर्यवेक्षकों को सैंपल लेने दिये हैं। इन नमूनों की एजेंसी के नेटवर्क की प्रयोगशालाओं में जाँच होगी।''
ईरान ने पिछले साल अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते की शर्तों का पालन करना बंद कर दिया था। उसने यह क़दम अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से इस समझौते से हटने का एलान करने के बाद उठाया था।
भारत सरकार ने चीन में विकसित 118 मोबाइल ऐप्स को बैन कर दिया है जिनमें गेमिंग ऐप पबजी भी शामिल है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि इन ऐप्स को इसलिए बैन किया गया है, क्योंकि वे भारत की संप्रभुता और अखंडता, देश की रक्षा और लोक व्यवस्था के विरूद्ध गतिविधियों में लिप्त थे।
मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, ''इस क़दम से भारत के करोड़ों मोबाइल और इंटरनेट यूज़र्स के हितों की रक्षा होगी। ये फ़ैसला भारत के साइबर स्पेस की सुरक्षा और संप्रभुता को सुनिश्चित करने के इरादे से लिया गया है।''
बयान के अनुसार भारत सरकार को इन ऐप्स के बारे में विभिन्न स्रोतों से शिकायतें मिल रही थीं, जिनमें ऐसी रिपोर्टें भी थीं कि एंड्रॉयड और आइओएस पर उपलब्ध कुछ मोबाइल ऐप्स से यूज़र्स के डेटा अनाधिकृत तौर पर चोरी कर भारत से बाहर स्थित सर्वर में भेजे जा रहे थे।
चीन के 118 ऐप्स को बैन करने का फ़ैसला ऐसे समय लिया गया है जब भारत और चीन के बीच एक बार फिर से लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा या एलएसी पर दोनों देशों के बीच तनाव की ख़बरें आ रही हैं।
भारत सरकार ने इससे पहले जून में भी चीन से जुड़े 59 ऐप्स को बैन किया था। इनमें टिकटॉक भी शामिल था।
पिछली बार 59 चीनी ऐप्स को बैन करने का फ़ैसला गलवान घाटी में 15 जुलाई को भारत-चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के कुछ दिनों बाद लिया गया था।









