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नोबेल शांति पुरस्कार: अकाल मानवता की दहलीज़ पर आ पहुँचा है - WFP

वर्ल्ड फू़ड प्रोग्राम को साल 2020 का नोबेल शांति पुरस्कार 10 दिसंबर 2020 को प्रदान किया गया।

वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के एग्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर डेविड बीज़ली ने नोबेल शांति पुरस्कार ग्रहण किया।

वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के एग्ज़िक्यूटिव डायरेक्टर डेविड बीज़ली ने कहा, ''ये कल्पना करना असंभव है कि 400 ईस्वी में रोम शहर में भीषण अकाल की वजह से पूरी आबादी के 90 प्रतिशत लोग मारे गए थे। उसी समय रोमन एम्पायर के पतन की शुरुआत हुई। सवाल ये है कि पतन की वजह से अकाल हुआ या अकाल की वजह से रोमन एम्पायर का पतन हुआ? मेरे विचार में दोनों का जवाब है- हां।''

डेविड बीज़ली ने कहा, ''इस धनी, आधुनिक, तकनीकी रूप से उन्नत दुनिया में ये कल्पना करना भी असंभव है कि हम उसी तरह के अकाल की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन आज मेरा कर्तव्य है कि मैं ये कहूं कि अकाल, मानवता की दहलीज़ पर आ पहुंचा है।''

उन्होंने कहा, ''अकाल को रोकने में विफल होने पर कई जानें जाएंगी और बड़ी तबाही होगी। हमारा मानना है कि खाद्य सुरक्षा में ही शांति का मार्ग निहित है। ये नोबेल पुरस्कार सिर्फ़ धन्यवाद के लिए नहीं, बल्कि क़दम उठाने के लिए है।''

वर्ल्ड फूड प्रोग्राम मानवीय मदद करने वाला विश्व का सबसे बड़ा संगठन है जो भुखमरी के ख़िलाफ़ खाद्य सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर काम करता है।

वर्ल्ड फूड प्रोग्राम, संयुक्त राष्ट्र का खाद्य कार्यक्रम है। इसका मुख्यालय रोम में है। 

सऊदी अरब-इजराइल सम्बन्ध: सऊदी अरब के प्रिंस ने इसराइल की कड़ी आलोचना की

सऊदी अरब के प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने 06 दिसंबर 2020 को हुई बहरीन सिक्यॉरिटी समिट में इसराइल की कड़ी आलोचना की है।

इसराइल के विदेश मंत्री गाबी अशकेनाज़ी इसमें ऑनलाइन शामिल हुए।  इस घटनाक्रम से अरब देशों और इसराइल के बीच आगे किसी बातचीत की राह में चुनौतियां सामने आई हैं।

समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक़, मनामा डायलॉग में प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल की कड़ी टिप्पणियों की वजह से इसराइल को हैरानी हुई है क्योंकि इसराइल के विदेश मंत्री को ऐसा होने की उम्मीद नहीं थी।

ख़ासतौर पर तब जबकि संबंधों को सामान्य बनाने वाले समझौतों के बाद बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात के अधिकारियों ने इसराइलियों का गर्मजोशी से स्वागत किया था।

इसराइल और फ़लस्तीनियों में दशकों से विवाद और संघर्ष रहा है।  फ़लस्तीनियों का विचार है कि ये समझौते उनके साथ धोखा है और इस तरह हैं जैसे उनके अरब साथियों ने पीठ में छुरा घोंप दिया हो।

प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने अपनी बात शुरू करते हुए 'इसराइल की शांति-प्रेमी और उच्च नैतिक मूल्य वाले देश' की धारणा को 'पश्चिमी औपनिवेशिक ताक़त' के तहत कहीं ज़्यादा स्याह फ़लस्तीनी हकीक़त बताया।

प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने कहा कि ''इसराइल ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए फ़लस्तीनियों को क़ैद में रखा जहां बुज़ुर्ग, आदमी-औरतें बिना किसी इंसाफ़ के एक तरह से सड़ रहे हैं। वो घरों को गिरा रहे हैं और चाहे जिसकी हत्या कर रहे हैं।''

प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने ''इसराइल के परमाणु हथियारों के अघोषित ज़ख़ीरे और इसराइली सरकार की सऊदी अरब को कमज़ोर करने की कोशिशों'' की भी भर्त्सना की।

प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने सऊदी अरब का आधिकारिक रुख़ दोहराया कि समस्या का समाधान 'अरब पीस इनिशिएटिव' को लागू करने में निहित है।

साल 2002 में सऊदी अरब प्रायोजित 'अरब पीस इनिशिएटिव' समझौते में इसराइल के अरब देशों के साथ हर तरह के रिश्तों के बदले साल 1967 में इसराइली क़ब्ज़े वाले इलाक़े को फ़लस्तीनी देश का दर्जा देने की मांग की गई थी।

उन्होंने कहा, ''आप खुले ज़ख़्म को दर्द निवारक दवाओं से ठीक नहीं कर सकते हैं।''

प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल के बात के फ़ौरन बाद इसराइली विदेश मंत्री गाबी अशकेनाज़ी ने कहा, ''सऊदी प्रतिनिधियों की टिप्पणियों पर मैं अपना खेद प्रकट करना चाहता हूं। मुझे नहीं लगता कि उनकी बातों में वो मर्म और बदलाव नज़र आते हैं जो मिडिल ईस्ट में हो रहे हैं।''

इसराइली विदेश मंत्री गाबी अशकेनाज़ी ने इसराइली रुख़ दोहराते हुए कहा कि ''शांति समझौता ना होने के लिए फ़लस्तीनी ज़िम्मेदार हैं।  फ़लस्तीनियों को लेकर हमारे पास विकल्प है कि हम इसका समाधान करें या ना करें या यूं ही आरोप-प्रत्यारोप करते रहें।''

बहरीन सिक्योरिटी समिट को देख-सुन रहे संयुक्त राष्ट्र में पूर्व राजदूत और नेतन्याहू के क़रीबी डोर गोल्ड ने प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल की टिप्पणियों पर कहा कि अतीत में भी कई झूठे आरोप लगाए गए हैं।

इस पर प्रिंस तुर्की अल-फ़ैसल ने उन्हें भी आड़े हाथों लिया।

सऊदी बनाम इसराइल

सऊदी अरब ऐतिहासिक रूप से इसराइल और इसके फ़लस्तीनी लोगों के साथ होने वाले बर्ताव का आलोचक रहा है और अरब मीडिया इसराइल को एक 'यहूदी देश' के तौर पर खारिज करते रहे हैं।

सऊदी अरब के दूर-दराज और देहाती इलाकों में लोग न सिर्फ इसराइल को बल्कि सभी यहूदी लोगों को अपने दुश्मन के तौर पर देखते आए हैं।

हालांकि, यहूदियों को लेकर कई तरह की भ्रामक थिअरीज़ अब नहीं दिखाई देतीं। इसकी एक वजह यह भी है कि सऊदी लोग काफी वक्त इंटरनेट पर बिताते हैं और इस वजह से दुनिया में चल रही चीजों के बारे में काफी जागरूक हैं।

इसके बावजूद सऊदी आबादी के एक तबके में बाहरी लोगों को लेकर एक शक अभी भी कायम है। सऊदी अरब और खाड़ी देशों के फलस्तीन के साथ रिश्तों का एक विचित्र इतिहास रहा है।

खाड़ी देश आमतौर पर फलस्तीनी मुद्दे के समर्थक रहे हैं। दशकों से वे राजनीतिक और वित्तीय रूप से फलस्तीन की मदद कर रहे हैं। लेकिन, जब फलस्तीनी नेता यासिर अराफात ने 1990 में इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के कुवैत पर हमले और कब्जे का समर्थन किया तो उन्हें यह एक बड़ा धोखा जान पड़ा।

अमरीका की अगुवाई में ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म के बाद और 1991 में स्वतंत्र होने पर कुवैत ने अपने यहां मौजूद फलस्तीनियों की पूरी आबादी को बाहर निकाल दिया और उनकी जगह मिस्र के हजारों लोग बसा दिए गए।

इस इलाके के पुराने शासकों को अराफात के धोखे को भुलाने में लंबा वक्त लगा है।

ईरान परमाणु गतिविधि बढ़ाएगा, परमाणु वैज्ञानिक की मौत के बाद नया क़ानून बनाया

ईरान की संसद में एक नया कानून पारित किया गया है जिसके तहत देश के परमाणु केंद्रों पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से किए जाने वाले निरीक्षण पर रोक लगा दी गई है और साथ ही ईरान अब यूरेनियम संवर्धन को भी आगे बढ़ाएगा।

इस नए क़ानून के आने के बाद ईरान सरकार 20 फ़ीसदी तक यूरोनियम संवर्धन दोबारा शुरू कर सकेगी जिसे साल 2015 के परमाणु समझौते में 3.67% तक सीमित कर दिया गया था।

2015 के समझौते के अनुसार, ईरान अपनी संवेदनशील परमाणु गतिविधियों को सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को आने की अनुमति दी थी। इसके बदले में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को ख़त्म किया गया था।

हालाँकि, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने इस क़ानून को मंज़ूरी मिलने से पहले कहा कि वह इस नए कानून से असहमत हैं क्योंकि इससे कूटनीति को नुक़सान पहुँचेगा।

ईरानी सांसदों ने ये नया क़ानून ईरान के मुख्य परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की बीते 27 नवंबर 2020 को हुई हत्या के बाद बनाया है।

ईरान का मानना है कि इज़राइल और एक निर्वासित विपक्ष ने मिलकर एक रिमोट-कंट्रोल हथियार से फ़ख़रीज़ादेह पर हमला किया। फ़ख़रीज़ादेह को ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुख्य कर्ताधर्ता माना जाता था।

ईरान सरकार बार-बार इस बात पर ज़ोर देती रही है कि उसकी सभी परमाणु गतिविधियां शांतिपूर्ण ही रही हैं। पश्चिमी देशों ने कड़े प्रतिबंध के ज़रिए ईरान को परमाणु हथियारों को विकसित करने से रोका।

ईरान का नया क़ानून क्या कहता है?

ईरान के गार्डियन काउंसिल के पारित नए क़ानून के मुताबिक़ 2015 के समझौते में शामिल ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों को ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंध और आर्थिक प्रतिबंधों में ढील देने के लिए दो महीने का वक़्त दिया गया है।

ये प्रतिबंध 2018 में ट्रंप प्रशासन के परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद लगाए गए थे।

अगर दो महीने के भीतर इस दिशा में काम शुरू नहीं किया गया तो ईरान सरकार अपना यूरेनियम संवर्धन 20 फ़ीसदी तक बढ़ा देगी और अपने नतांज़ और फोरदो परमाणु केंद्र पर नई तकनीक से लैस अपकेंद्रण यंत्र बनाएगी जहां यूरोनियम का संवर्धन किया जाएगा।

इस कानून के तहत संयुक्त राष्ट्र, ईरान के परमाणु केंद्रों का निरीक्षण भी नहीं कर सकेगा।

ईरानी समाचार एजेंसी फ़ार्स के मुताबिक़ 02 दिसंबर 2020 को एक चिट्ठी के ज़रिए ईरान की संसद के प्रवक्ता ने औपचारिक तौर पर राष्ट्रपति रूहानी से इस नए कानून को लागू करने की अपील की है।

इस कानून को मंज़ूरी मिलने के पहले ही ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा था कि उनकी सरकार इस नए कानून से सहमत नहीं हैं। उन्होंने इस कानून को देश की ''कूटनीति के लिए नुक़सानदेह'' बताया था।

परमाणु डील पर डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडन की अलग राय

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 2018 में परमाणु समझौते को रद्द कर दिया था। उन्होंने कहा था कि वो ईरान से नया समझौता करना चाहते हैं जो उसके परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल के विकास पर अनिश्चितकालीन रोक लगाएगा। इसके बदले अमेरिका ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए।

वहीं दूसरी ओर अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि वह ओबामा सरकार के समय हुए परमाणु समझौते को दोबारा लागू करेंगे और अगर ईरान 'परमाणु समझौते का कड़ाई से पालन करता है' तो ईरान पर लगाए प्रतिबंध हटाए जाएंगे।

बाइडन 20 जनवरी, 2021 को अमेरिका के राष्ट्रपति की शपथ लेंगे।

जुलाई, 2019 में ही ईरान ने परमाणु हथियार बनाने के लिए 3.67 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम की सीमा बढ़ाकर 4.5% कर दी थी।

कम संवर्धित तीन से पाँच प्रतिशत घनत्व वाले यूरेनियम के आइसोटोप U-235 को ईंधन की तरह इस्तेमाल करके बिजली बनाई जा सकती है।

हथियार बनाने के लिए जो यूरेनियम इस्तेमाल होता है वह 90 प्रतिशत या इससे अधिक संवर्धित होता है।

साल 2015 की परमाणु डील ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए किया गया था और इसके बदले ईरान पर लगे प्रतिबंधों को ख़त्म किया गया था। इस परमाणु समझौते पर ईरान के साथ अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, जर्मनी, फ़्रांस और चीन ने भी दस्तख़त किये थे।

ईरान के परमाणु वैज्ञानिक को रिमोट नियंत्रित हथियार से किसने मारा?

ईरान का मानना है कि इसराइल और निर्वासित विपक्षी समूह ने उसके शीर्ष के परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह को 27 नवंबर 2020 को मारने के लिए एक रिमोट नियंत्रित हथियार का इस्तेमाल किया था।

तेहरान में फ़ख़रीज़ादेह की अंत्येष्टि के दौरान ईरान के सुरक्षा प्रमुख अली शामख़ानी ने कहा कि हमलावरों ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का इस्तेमाल किया और वे वारदात स्थल पर मौजूद नहीं थे।

हालांकि उन्होंने इसे लेकर और जानकारी नहीं दी। शुरुआत में ईरानी रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि फ़ख़रीज़ादेह की कार को कुछ बंदूकधारियों ने निशाना बनाया था और उसी दौरान उन्हें गोली मारी गई थी।

इसराइल ने ईरान के इन दावों पर अभी कोई टिप्पणी नहीं की है। 2000 के दशक की शुरुआत में फ़ख़रीज़ादेह ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम में अहम भूमिका अदा की थी।

सबसे अहम बात यह है कि हाल ही में इसराइल ने फ़ख़रीज़ादेह को लेकर कहा था कि वो ईरान के गोपनीय परमाणु हथियार को विकसित करने में लगे हुए हैं।

ईरान हमेशा से कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम हथियार विकसित करने के लिए नहीं है। फ़ख़रीज़ादेह की अंत्येष्टि का कार्यक्रम तेहरान स्थित ईरान के रक्षा मंत्रालय के कैंपस में हुआ। अंत्येष्टि के कुछ अवशेष उत्तरी तेहरान में स्थित एक क़ब्रिस्तान को सौंपा गया।

ईरान के सरकारी टीवी में दिखा कि ईरानी राष्ट्रध्वज में लिपटे फ़ख़रीज़ादेह के ताबूत को सैनिकों और सीनियर अधिकारी उठाए आगे बढ़ रहे थे। इनमें ख़ुफ़िया मंत्री महमूद अलावी, रिवॉल्युशनरी कोर कमांडर जनरल हुसैन सलामी और परमाणु प्रोग्राम के प्रमुख अली अकबर सालेही ने फ़ख़रीज़ादेह की श्रद्धांजलि में नमाज़ अदा की।

ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्यॉरिटी काउंसिल के सचिव एडमिरल शामख़ानी ने फ़ख़रीज़ादेह की अंत्येष्टि कार्यक्रम में कहा कि ईरानी ख़ुफ़िया और सुरक्षा सेवाओं को फ़ख़रीज़ादेह की हत्या की साज़िश का अंदेशा पहले से ही था।

शामख़ानी ने कहा, ''उनकी सुरक्षा को लेकर ज़रूरी उपाय किए गए थे लेकिन दुश्मनों ने बिल्कुल नया तरीक़ा इस्तेमाल किया। इस हत्या को अंजाम पेशेवर और ख़ास तरीक़े से दिया गया है। दुर्भाग्य से हमारे दुश्मन इसमें सफल रहे। यह बहुत ही जटिल मिशन था क्योंकि इसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का इस्तेमाल किया गया है। वारदात स्थल पर कोई भी मौजूद नहीं था।''

एडमिरल शामख़ानी ने कहा कि इस हत्या को अंजाम देने वालों का कुछ सुराग़ मिला है। उन्होंने कहा, ''इसमें यहूदी शासन और मोसाद के साथ निर्वासित ईरानी विपक्षी समूह मुजाहिदीन-ए-ख़ाल्क़ (एमकेओ) निश्चित तौर पर शामिल रहा है।''

मोसाद इसराइल की ख़ुफ़िया एजेंसी है और यहूदी शासन इसराइल के लिए इस्तेमाल किया गया है। एमकेओ ईरान का निर्वासित विपक्षी धड़ा है जो मुल्क में वर्तमान सरकार के ढाँचे का विरोध करता है। ईरान की ओर से यह बयान तब आया है जब वहां की फार्स न्यूज़ एजेंसी ने फ़ख़रीज़ादेह की हत्या में रीमोट-कंट्रोल मशीन गन के इस्तेमाल की बात कही है।

अरबी भाषा के अल-अलाम टीवी की रिपोर्ट के अनुसार इस तरह के हथियार का इस्तेमाल सैटेलाइलट कंट्रोल के ज़रिए किया जाता है। 27 नवंबर 2020 को जब ईरानी परमाणु वैज्ञानिक की हत्या हुई तो रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि पूर्वी तेहरान में हथियारबंद आतंकवादियों ने फ़ख़रीज़ादेह की कार को निशाना बनाकर हमला किया था।

मंत्रालय ने कहा था कि फ़ख़रीज़ादेह को उनके सुरक्षा गार्ड और हमलावरों के बीच की गोलाबारी में गोली लगी थी और इसी दौरान उनकी मौत हो गई। सोशल मीडिया पर जो तस्वीरें पोस्ट की गई हैं उनमें दिख रहा है कि गोलियों से छलनी हुई कार के साथ मलबे और ख़ून बिखरे पड़े हैं।

30 नवंबर 2020 को फ़ख़रीज़ादेह की अंत्येष्टि में ईरान के रक्षा मंत्री जनरल आमिर हतामी ने संकल्प दोहराया कि इस हत्या का बदला लिया जाएगा।

आमिर ने कहा, ''दुश्मनों को पता है और एक सैनिक के तौर पर मैं उन्हें कह रहा हूं ईरान के लोग हर एक का जवाब देंगे।''

ईरानी रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ डिफेंसिव इनोवेशन एंड रिसर्च में फ़ख़रीज़ादेह अहम काम कर रहे थे। यहां परमाणु सुरक्षा को लेकर ईरान काम कर रहा है।

फ़ारसी में इस ऑर्गेनाइज़ेशन को SPND कहा जाता है। ईरानी रक्षा मंत्री ने कहा कि SPND का बजट दोगुना किया जाएगा ताकि 'शहीद डॉक्टर' की राह को और तेज़ी से हासिल किया जा सके।

ईरान के मीडिया का दो चीज़ों पर ज़ोर है। पहला ईरानी वैज्ञानिक की हत्या का बदला लेना और दूसरा ये कि ईरान को इसराइल के झाँसे में नहीं फँसना चाहिए क्योंकि वो तनाव बढ़ाकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को चौपट करना चाहता है।

क्या मुस्लिम देशों के संगठन ओआईसी में कश्मीर का ज़िक्र पाकिस्तान की जीत है?

भारत ने इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में पास किए गए प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया है। इस प्रस्ताव में कश्मीर का भी ज़िक्र किया गया है।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि ओआईसी में पास किए गए प्रस्ताव में भारत का संदर्भ तथ्यात्मक रूप से ग़लत, अकारण और अनुचित है।

नाइजर की राजधानी नियामे में 27 और 28 नवंबर 2020 को ओआईसी के काउंसिल ऑफ फॉरन मिनिस्टर्स (सीएफ़एम) की बैठक थी और इसी बैठक में जो प्रस्ताव पास किया गया है उसमें कश्मीर का भी ज़िक्र है।

पाकिस्तान भी ओआईसी का सदस्य है। इस बैठक में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी शामिल हुए और उन्होंने कश्मीर का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया था।

पाकिस्तान ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक में पास किए गए प्रस्ताव में कश्मीर के ज़िक्र से ख़ुश है। इस प्रस्ताव को नियामे डेक्लरेशन कहा जा रहा है और पाकिस्तान ने इसका स्वागत किया है।

भारत ने पाँच अगस्त 2019 को कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म कर दिया था। तब से पाकिस्तान अंतराराष्ट्रीय मंच पर इस मुद्दे को उठा रहा है लेकिन अब तक कोई ठोस सफलता नहीं मिली है। ओआईसी भी इसे लेकर अब तक बहुत सक्रिय नहीं रहा है।

ओआईसी के सीएफ़एम में पास किए गए प्रस्ताव को लेकर भारत के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान ने कहा है, ''हम नाइजर की राजधानी नियामे में ओआईसी के 47वें सीएफ़एम में तथ्यात्मक रूप से ग़लत, अनुचित और अकारण रूप से पास किए गए प्रस्ताव में भारत के ज़िक्र को ख़ारिज करते हैं। हमने हमेशा से कहा है कि ओआईसी को भारत के आंतरिक मामलों पर बोलने का कोई हक़ नहीं है। जम्मू-कश्मीर भी भारत का अभिन्न अंग है और ओआईसी को इस पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है।''

भारत ने अपने बयान में कहा है, ''यह खेदजनक है कि ओआईसी किसी एक देश को अपने मंच का दुरुपयोग करने की अनुमति दे रहा है। जिस देश को ओआईसी ऐसा करने दे रहा है, उसका धार्मिक सहिष्णुता, अतिवाद और अल्पसंख्यकों के साथ नाइंसाफ़ी का घिनौना रिकॉर्ड है। वो देश हमेशा भारत विरोधी प्रॉपेगैंडा में लगा रहा है। हम ओआईसी को गंभीरता से सलाह दे रहे हैं कि वो भविष्य में भारत को लेकर ऐसी बात कहने से बचे।''

नियामे में ओआईसी के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में पास किए गए प्रस्ताव में कश्मीर को भी शामिल किया गया है।

हालांकि कश्मीर ओआईसी के सीएफ़म के एजेंडे में शामिल नहीं था। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान की ज़िद के कारण इसमें महज़ शामिल किया गया है। प्रस्ताव में कहा गया है कि कश्मीर विवाद पर ओआईसी का रुख़ हमेशा से यही रहा है कि इसका शांतिपूर्ण समाधान संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुसार होना चाहिए।

हालांकि ये बात भी कही जा रही है कि ओआईसी के प्रस्ताव में कश्मीर का ज़िक्र रस्मअदायगी भर है और ये भारत के लिए हैरान करने वाला नहीं है। पाकिस्तान के भारी दबाव के बावजूद इस बैठक में कश्मीर को एक अलग एजेंडे के तौर पर शामिल नहीं किया गया।

ओआईसी में सऊदी अरब और यूएई का दबदबा है। पाकिस्तान के इन दोनों देशों से रिश्ते ख़राब चल रहे हैं। सऊदी अरब चाहता है कि पाकिस्तान उसके क़र्ज़ों का भुगतान जल्दी करे। ख़ास करके तब से जब पाकिस्तानी पीएम इमरान ख़ान ने ओआईसी के समानांतर तुर्की, ईरान और मलेशिया के साथ मिलकर एक संगठन खड़ा करने की कोशिश की थी। पिछले हफ़्ते यूएई ने पाकिस्तानी नागिरकों के लिए नया वीज़ा जारी करने पर अस्थायी रूप से प्रतिबंध लगा दिया था।

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने इस मुद्दे को भी ओआईसी की बैठक में अलग से यूएई के विदेश मंत्री के सामने उठाया लेकिन अभी तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है।

नियामे डेक्लरेशन में कश्मीर का ज़िक्र क्या पाकिस्तान की जीत है?

मार्च 2019 में अबू धाबी में यह बैठक हुई थी। इस बैठक में भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भी यूएई ने बुलाया था।

पाकिस्तान ने सुषमा स्वराज के बुलाए जाने का विरोध किया था और उसने उद्घाटन समारोह का बहिष्कार किया था। सुषमा स्वराज ने तब ओआईसी के सीएफएम की बैठक को संबोधित किया था।

इस बैठक में जो प्रस्ताव पास किया गया था उसमें कश्मीर का कोई ज़िक्र नहीं था। इसमें पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के उस फ़ैसले का स्वागत किया गया था जिसमें उन्होंने भारत के विंग कमांडर अभिनंदन को वापस भेजा था।

ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद आने वाले प्रस्ताव में कश्मीर का ज़िक्र कोई नई बात नहीं है। इसे पहले भी ज़िक्र होता रहा है। इस बार के प्रस्ताव को नियामे डेक्लेरेशन कहा जा रहा है। इसके ऑपरेटिव पैराग्राफ़ आठ में कहा गया है कि ओआईसी जम्मू-कश्मीर विवाद का समाधान यूएन सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के हिसाब से शांतिपूर्ण चाहता है और उसका यही रुख़ हमेशा से रहा है।

पाँच अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के बाद ओआईसी के विदेश मंत्रियों की यह पहली बैठक थी। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इस बार भारत के ख़िलाफ़ कश्मीर को लेकर कोई कड़ा बयान जारी किया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

भारत में पाकिस्तान के राजदूत रहे अब्दुल बासित ने ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट किया है और उन्होंने इसमें नियामे डेक्लरेशन को लेकर कई बातें कही हैं।

बासित ने कहा है, ''पाँच अगस्त के बाद ओआईसी के विदेश मंत्रियों की यह पहली बैठक थी और हमें उम्मीद थी कि भारत को लेकर कुछ कड़ा बयान जारी किया जाएगा। हमें लगा था कि भारत के फ़ैसले की निंदा की जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। डेक्लरेशन में पाकिस्तान के लिए बहुत ख़ुश करने वाली बात नहीं है।''

उन्होंने कहा, ''जिस तरह से इस डेक्लरेशन में फ़लस्तीन, अज़रबैजान और आतंकवाद को लेकर ज़िक्र है वैसा कश्मीर का नहीं है। पिछले साल की तुलना में इस बात से ख़ुश हो सकते हैं कि चलो इस बार कम से कम ज़िक्र तो हुआ। पाँच अगस्त को भारत ने जो किया उसकी निंदा होनी चाहिए थी लेकिन ये ऐसा नहीं हुआ। नाइजर के भारत के साथ अच्छे ताल्लुकात हैं और जिस कन्वेंशन सेंटर में यह कॉन्फ़्रेंस हुई है वो भारत की मदद से ही बना है।''

मालदीव भी ओआईसी का सदस्य है। इस बैठक में मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद शामिल हुए। अब्दुल्ला ने 27 नंवबर 2020 को एक ट्वीट किया था जिसमें नियामे के उस कॉन्फ़्रेंस सेंटर की तस्वीरें पोस्ट की थीं। इन तस्वीरों के साथ अब्दुल्ला ने अपने ट्वीट में लिखा है, ''ओआईसी की 47वीं सीएफ़एम की बैठक नियामे के ख़ूबसूरत महात्मा गाँधी इंटरनेशनल कॉन्फ़्रेंस सेंटर में हो रही है। जब दुनिया कई चुनौतियों और संकट से जूझ रही है ऐसे में साथ मिलकर ही इनका सामना किया जा सकता है।''

हालांकि पाकिस्तान कश्मीर का ज़िक्र भर होने से अपनी जीत के तौर पर देख रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने ट्वीट कर कहा है, ''नियामे डेक्लरेशन में जम्मू-कश्मीर विवाद को शामिल किया जाना बताता है कि ओआईसी कश्मीर मुद्दे पर हमेशा से साथ खड़ा है।''

भारत ने कश्मीर का विशेष दर्जा जब से ख़त्म किया है तब से पाकिस्तान ओआईसी के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक बुलाने की मांग कर रहा था लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ था।

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने अगस्त 2020 में ओआईसी से अलग होकर कश्मीर का मुद्दा उठाने की धमकी दे डाली थी। इससे सऊदी अरब नाराज़ हो गया था और पाकिस्तान को स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था। लेकिन तब तक बात बिगड़ गई थी और इसे संभालने के लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा को सऊदी का दौरा करना पड़ा था।

अमेरिका चुनावः क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व्हाइट हाउस छोड़ने पर सहमत हैं?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अगर इलेक्टोरल कॉलेज जो बाइडन के अमेरिका का अगला राष्ट्रपति बनने की आधिकारिक पुष्टि कर देता है तो वो व्हाइट हाउस छोड़ देंगे।

राष्ट्रपति ट्रंप ने तीन नवंबर 2020 के मतदान में मिली हार को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और 26 नवंबर 2020 को पत्रकारों से कहा कि ये स्वीकार करना 'कठिन' होगा।

उन्होंने एक बार फिर मतदान में धांधली के निराधार दावों को दोहराया। अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव करने के लिए अपनाई जाने वाली पद्धति के तहत बाइडन को अब तक 306 वोट जबकि ट्रंप को उनसे कम 232 वोट मिले हैं। जीत के लिए 270 वोट की ज़रूरत होती है। कुल मतों के हिसाब से भी बाइडन 60 लाख मतों से आगे हैं।

इलेक्टोरल कॉलेज मतों पर आख़िरी फ़ैसला करने के लिए अगले महीने बैठक करेगा। 14 दिसंबर 2020 को अमेरिकी इलेक्टोरल कॉलेज बाइडन की जीत की पुष्टि कर देगा।

उनकी पुष्टि के बाद जो बाइडन 20 जनवरी 2021 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे।

राष्ट्रपति ट्रंप और उनके समर्थकों ने चुनाव को लेकर कई मुक़दमे भी दर्ज कराए हैं, लेकिन इनमें से ज़्यादातर को ख़ारिज कर दिया गया।

इस हफ़्ते की शुरुआत में, ट्रंप ने अनिश्चितता के कई हफ्तों के बाद अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन की टीम को औपचारिक रूप से सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की। इस फ़ैसले का मतलब है कि 20 जनवरी 2021 को शपथ ग्रहण करने जा रहे बाइडन अब शीर्ष स्तर पर सुरक्षा अधिकारियों से जानकारी ले सकेंगे और प्रमुख सरकारी अधिकारियों और लाखों डॉलर के फंड के मामले में भी उनकी पहुंच होगी।

ट्रंप ने क्या कहा?

26 नवंबर 2020 को जब ट्रंप से पूछा गया कि अगर 14 दिसंबर 2020 के इलेक्टोरल कॉलेज के वोट में वो हारते हैं तो व्हाइट हाउस छोड़ने पर राज़ी होंगे? इस पर ट्रंप ने जवाब दिया, ''निश्चित रूप से मैं करूंगा, निश्चित रूप से मैं करूंगा और आप ये जानते हैं।''

हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि ''अगर वो करते हैं (जो बाइडन का चुनाव), तो वो ग़लती करेंगे।''

इसके साथ ही ट्रंप ने कहा, ''ये चीज़ स्वीकार करना बहुत मुश्किल होगा।'' उन्होंने बिना कोई सबूत दिए फिर से चुनाव के दौरान ''बड़ी धांधली'' होने के दावों को दोहराया।

अमरीका के इलेक्टोरल सिस्टम के तहत मतदाता अगले राष्ट्रपति का चुनाव सीधे नहीं करते हैं। इसके बजाए वो 538 उम्मीदवारों के लिए मतदान करते हैं। इन उम्मीदवारों की संख्या अमरीकी राज्यों की आबादी के आधार पर अलग-अलग होती है। ये इलेक्टोरल तक़रीबन हमेशा उस उम्मीदवार को वोट देते हैं जिसने उनके राज्यों के ज़्यादातर वोट जीते होते हैं। हालांकि संभव है कि कुछ मतदाताओं के चुनाव की अनदेखी करे। लेकिन इस तरह से आज तक नतीजे में उलटफेर नहीं हुआ है।

क्या ईरान के वैज्ञानिक की हत्या से ईरान का परमाणु कार्यक्रम थम जायेगा?

ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने कहा है कि देश के वरिष्ठ परमाणु वैज्ञानिक की हत्या से देश के परमाणु कार्यक्रम की रफ्तार धीमी नहीं पड़ेगी।

शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या के लिए हसन रूहानी ने इसराइल पर आरोप लगाया और कहा कि ये कदम बताता है कि वो कितना परेशान हैं और हमसे कितनी घृणा करते हैं।

इससे पहले ईरान ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव और सुरक्षा परिषद से अपने शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या की निंदा करने की अपील की थी।

अब तक मिली जानकारी के मुताबिक़ फ़ख़रीज़ादेह पर राजधानी तेहरान से सटे शहर अबसार्ड में बंदूकधारियों ने घात लगाकर हमला किया। हालांकि अब तक किसी हमलावर के पकड़े जाने की कोई ख़बर नहीं मिली है।

ईरान के संयुक्त राष्ट्र के लिए राजदूत माजिद तख्त रवांची ने कहा कि मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसे क्षेत्र में अशांति फैलाने के मक़सद से अंजाम दिया गया।

वहीं संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने इस मामले में संयम बरतने की अपील की है।

रॉयटर्स के मुताबिक़, गुटेरेश के प्रवक्ता फरहान हक ने 27 नवंबर 2020 को कहा, ''हमने आज तेहरान के पास हुई एक ईरानी परमाणु वैज्ञानिक की हत्या की ख़बरों को नोट किया है। हम संयम बरतने और ऐसी किसी भी कार्रवाई से बचने का आग्रह करते हैं जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है।''

अन्य ईरानी अधिकारियों ने इसराइल पर हत्या के आरोप लगाए हैं और बदला लेने की चेतावनी दी है।

इसराइल ने अब तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन वो पहले मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह पर एक गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम का मास्टरमाइंड होने का आरोप लगा चुका है।

पूरा मामला क्या है?

ईरान के रक्षा मंत्रालय ने जानकारी दी थी कि उसके एक शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या कर दी गई है। हमले के बाद फ़ख़रीज़ादेह को स्थानीय अस्पताल में ले जाया गया लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।

ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने फ़ख़रीज़ादेह की हत्या की निंदा करते हुए इसे 'राज्य प्रायोजित आतंक की घटना क़रार दिया'।

पश्चिमी देशों की ख़ुफ़िया एजेंसियों का मानना है कि ईरान के ख़ुफ़िया परमाणु हथियार कार्यक्रम के पीछे मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह का ही हाथ था।

विदेशी राजनयिक उन्हें 'ईरानी परमाणु बम के पिता' कहते थे। ईरान कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण मक़सद के लिए है।

साल 2010 और 2012 के बीच ईरान के चार परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या की गई थी और ईरान ने इसके लिए इसराइल को ज़िम्मेदार ठहराया था।

मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या कैसे हुई?

ईरान के रक्षा मंत्रालय ने 27 नवंबर 2020 को एक बयान जारी कर कहा, ''हथियारबंद आतंकवादियों ने रक्षा मंत्रालय के शोध और नवोत्पाद विभाग के प्रमुख मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह को ले जा रही कार को निशाना बनाया।''

मंत्रालय के मुताबिक़, ''आतंकवादियों और फ़ख़रीज़ादेह के अंगरक्षकों के बीच हुई झड़प में वो बुरी तरह घायल हो गए और उन्हें स्थानीय अस्पताल ले जाया गया लेकिन दुर्भाग्य से उनको बचाने की मेडिकल टीम की तमाम कोशिशें नाकाम रहीं।''

ईरान की समाचार एजेंसी फ़ारस के अनुसार चश्मदीदों ने पहले धमाके और फिर मशीनगन से फ़ायरिंग की आवाज़ सुनी थी।

एजेंसी के अनुसार चश्मदीदों ने तीन-चार चरमपंथियों के भी मारे जाने की बात कही है।

क्या इस हत्या में इसराइल का हाथ है?

ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने ट्वीट कर कहा, ''आतंकवादियों ने आज ईरान के एक प्रमुख वैज्ञानिक की हत्या कर दी है। ये बुज़दिल कार्रवाई, जिसमें इसराइल के हाथ होने के गंभीर संकेत हैं, हत्यारों की जंग करने के इरादे को दर्शाता है।''

ज़रीफ़ ने कहा, ''ईरान अंतरराष्ट्रीय समुदायों, ख़ासकर यूरोपीय संघ से गुज़ारिश करता है कि वो अपने शर्मनाक दोहरे रवैये को ख़त्म करके इस आतंकी कदम की निंदा करें।''

उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा, ''ईरान एक बार फिर आतंकवाद का शिकार हुआ है। आतंकवादियों ने ईरान के एक महान विद्वान की बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी है। हमारे नायकों ने दुनिया और हमारे इलाके में स्थिरता और सुरक्षा के लिए हमेशा आतंकवाद का सामना किया है। ग़लत काम करने वालों की सज़ा अल्लाह का क़ानून है।''

ईरानी सेना के इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने कहा है कि ईरान अपने वैज्ञानिक की हत्या का बदला ज़रूर लेगा।

इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के मेजर जनरल हुसैन सलामी ने कहा, ''परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या करके हमें आधुनिक विज्ञान तक पहुँचने से रोकने की स्पष्ट कोशिश की जा रही है।''

मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह कौन थे?

मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह ईरान के सबसे प्रमुख परमाणु वैज्ञानिक थे और आईआरजीसी के वरिष्ठ अधिकारी थे। पश्चिमी देशों के सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार वो ईरान में बहुत ही ताक़तवर थे और ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम में उनकी प्रमुख भूमिका थी।

इसराइल ने साल 2018 में कुछ ख़ुफ़िया दस्तावेज़ हासिल करने का दावा किया था जिनके अनुसार मोहसिन ने ही ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम की शुरुआत की थी।

उस समय नेतन्याहू ने प्रेसवार्ता में मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह को ईरान के परमाणु कार्यक्रम का प्रमुख वैज्ञानिक क़रार देते हए कहा था, ''उस नाम को याद रखें।''

साल 2015 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की तुलना जे रॉबर्ट ओपनहाइमर से की थी। ओपनहाइमर वो वैज्ञानिक थे जिन्होंने मैनहट्टन परियोजना की अगुवाई की थी जिसने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पहला परमाणु बम बनाया था।

इसराइल ने फ़ख़रीज़ादेह की हत्या पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह को निशाना क्यों बनाया गया?

ईरानी रक्षा मंत्रालय में रिसर्च ऐंड इनोवेंशन विभाग के प्रमुख के तौर पर मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह निश्चित तौर पर एक अहम शख़्सियत थे। यही वजह है कि इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने दो साल पहले चेतावनी भरे लहजे में कहा था 'उनका नाम याद रखिए'।

जबसे अमेरिका 2015 के ईरान परमाणु समझौते से अलग हुआ है, ईरान तेज़ी से आगे बढ़ा है। ईरान ने कम संवर्धन वाले यूरेनियम का भंडार इकट्ठा किया है और समझौते में तय हुए स्तर से ज़्यादा यूरेनियम का संवर्धन किया है।

ईरानी अधिकारी शुरू से ये कहते आए हैं कि संवर्धित यूरेनियम को नष्ट किया जा सकता है लेकिन शोध और विकास की दिशा में हुए कामों को मिटाना बेहद मुश्किल है।

इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) में ईरान के पूर्व राजदूत अली असग़र सुत्लानिया ने हाल ही में कहा था, ''हम वापस पीछे नहीं लौट सकते।''

अगर मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह वाक़ई ईरान के परमाणु कार्यक्रम के लिए वाक़ई उतने महत्वपूर्ण थे जितना कि इसराइल अपने आरोपों में बताया आया है, तो उनकी हत्या शायद ये बताती है कि कोई ईरान के आगे बढ़ने की गति पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहा है।

अमरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा था कि सत्ता में आने के बाद वो ईरान परमाणु समझौते में वापसी करेंगे। मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या ऐसी किसी संभावना को मुश्किल बनाने की एक कोशिश भी हो सकती है।

अमेरिका-रूस तनाव: रूस की धमकी, जापान सागर में अमेरिकी जहाज़ तबाह कर देंगे

रूस ने कहा है कि उसके समुद्री इलाके में घुसने वाले अमेरिकी जहाज़ को वो तबाह कर देगा।

उसका कहना है कि उसके युद्धपोत ने जापान सागर के उसके इलाक़े में घुस आए अमेरिकी नौसेना के विध्वंसक जहाज़ का पीछा किया।

अमेरिकी नौसेना के इस विध्वंसक जहाज़ का नाम यूएसएस जॉन एस मैकेन है।

यूएसएस जॉन एस मैकेन उसकी समुद्री सीमा के पीटर द ग्रेट गल्फ़ के क्षेत्र में दो किलोमीटर भीतर तक चला आया था।

रूस का कहना है कि उसने इस जहाज़ को नष्ट करने की चेतावनी दी थी जिसके बाद ये जहाज़ उसके इलाक़े से चला गया।

हालाँकि अमेरिकी नौसेना ने किसी तरह की ग़लती करने से इनकार किया है और ये भी कहा है कि उसके जहाज़ को कहीं से जाने के लिए नहीं कहा गया था।

24 नवंबर 2020 को ये घटना जापान सागर में हुई। इस क्षेत्र को पूर्वी सागर के नाम से भी जानते हैं।

रूस के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि उसके प्रशांत क्षेत्र के बेड़े के विध्वंसक जहाज़ एडमिरल विनोग्रादोव ने इंटरनेशनल कम्युनिकेशन चैनल के ज़रिये अमेरिकी जहाज़ को चेतावनी दी।

धमकी में ये कहा गया था कि ''उसके समुद्री क्षेत्र में आने वाले घुसपैठिये को बाहर करने के लिए ताक़त का इस्तेमाल किया जा सकता है।''

हालाँकि अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े के प्रवक्ता लेफ़्टिनेंट जोए केली ने इस दावे के जवाब में कहा कि ''रूस ग़लतबयानी कर रहा है। यूएसएस जॉन एस मैकेन को किसी भी देश ने अपने क्षेत्र से जाने के लिए नहीं कहा था।''

उन्होंने कहा, ''समुद्री सीमाओं को लेकर किए गए अवैध दावों को अमेरिका कभी भी स्वीकार नहीं करेगा जैसा कि इस मामले में रूस ने किया था।''

समुद्र में ऐसी घटनाएं कभी-कभार ही होती हैं। हालाँकि एडमिरल विनोग्रादोव पूर्वी चीन सागर में एक अमेरिकी जहाज से लगभग उलझ ही गया था।

उस वक़्त भी रूस और अमेरिका ने एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए थे।

दोनों देशों के बीच समुद्र और वायु क्षेत्र में एक-दूसरे से संघर्ष की स्थिति समय-समय पर बनती रहती है।

साल 1988 में तत्कालीन सोवियत संघ के युद्धपोत बेज़्ज़ावेंटी ने अमेरिकी जहाज़ यॉर्कटाउन को ब्लैक सी में टक्कर मार दी थी।

तब भी सोवियत संघ ने अमेरिकी जहाज़ पर उसके समुद्री सीमा में घुसपैठ करने का आरोप लगाया था। रूस और अमेरिका के बीच संबंध उतार-चढ़ाव से गुज़रते रहे हैं।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अभी तक अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को उनकी जीत के लिए शुभकामनाएं नहीं दी हैं।

दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों के मुद्दे पर आख़िरी बचे हुए समझौते को अभी तक अंतिम रूपरेखा नहीं दी जा सकी है। इसकी डेडलाइन फरवरी तक है।

न्यू स्टार्ट ट्रीटी पर दोनों देशों ने 2010 में दस्तखत किए थे जिसके तहत दोनों देशों ने ये तय किया था कि वे लंबी दूरी तक मार करने में सक्षम परमाणु हथियारों की संख्या को एक निश्चित सीमा तक कम करेंगे।

साल 2017 में यूएसएस जॉन एस मैकेन की सिंगापुर के पास मुठभेड़ हो गई थी जिसमें दस नाविक मारे गए थे।

पबजी: क्या मोबाइल गेम पबजी भारतीय प्लेयर्स फिर से खेल पाएंगे?

लोकप्रिय मोबाइल गेम 'पबजी' को बनाने वाली कंपनी पबजी कॉरपोरेशन ने भारत में चीनी कंपनी टेनसेंट गेम्स की फ़्रैंचाइज़ी निलंबित करने का निर्णय लिया है जिसके बाद यह संभावना बनी है कि यह मोबाइल गेम अब एक बार फिर भारतीय यूज़र्स के मोबाइल में लौट आये।

बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण कोरियाई कंपनी पबजी कॉरपोरेशन ने मंगलवार को एक ब्लॉग में लिखा कि ''पबजी खेलने वालों के डेटा की सुरक्षा और उनकी प्राइवेसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने जो निर्णय लिया, हम उसका सम्मान करते हैं।''

''कंपनी के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि प्लेयर्स का डेटा पूरी तरह सुरक्षित रहे। इसके लिए कंपनी इस गेम से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारी अपने हाथ में ले रही है। साथ ही निकट भविष्य में कंपनी भारतीय प्लेयर्स को बेहतर गेमिंग एक्सपीरियंस मुहैया कराने पर काम करेगी।''

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़, इस निर्णय के बाद भारत में पबजी गेम को संचालित करने का क़ानूनी हक़ चीनी कंपनी टेनसेंट गेम्स के पास नहीं रह जायेगा जिसके पास इस गेम के मोबाइल वर्जन की ग्लोबल फ़्रैंचाइज़ी है।

अब इस ऐप को बनाने वाली दक्षिण कोरिया कंपनी पबजी कॉरपोरेशन ही भारत में पबजी मोबाइल की पब्लिशर कंपनी होगी।

पिछले सप्ताह ही भारत सरकार ने डेटा सुरक्षा और प्राइवेसी को आधार बताते हुए पबजी समेत 118 चीनी मोबाइल ऐप्स पर बैन लगा दिया था।

अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि चीनी कंपनी टेनसेंट की ब्लूहोल स्टूडियो नाम की कंपनी में क़रीब 10 फ़ीसद की हिस्सेदारी है और ब्लूहोल स्टूडियो दक्षिण कोरिया के सिओल शहर में स्थित पबजी कॉरपोरेशन की पैरेंट कंपनी है।

कंपनी के अनुसार, दुनिया भर में 600 मिलियन से ज़्यादा लोगों ने पबजी डाउनलोड किया है और 50 मिलियन से ज़्यादा लोग इसके ऐक्टिव प्लेयर हैं। कंपनी के लिए भारत एक महत्वपूर्ण बाज़ार है क्योंकि भारत में क़रीब 33 मिलियन लोग इस गेम को खेलते रहे हैं।

अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव के बाद दक्षिण कोरियाई कंपनी पबजी कॉरपोरेशन की यह दलील तो मज़बूत हुई है कि 'इस गेम का अब चीनी कंपनी से कोई वास्ता नहीं', लेकिन जानकारों की राय है कि इस निर्णय के बाद भी पबजी की राह पूरी तरह आसान नहीं हो जाएगी क्योंकि पबजी कॉरपोरेशन को पहले भारत सरकार को संतुष्ट करना होगा कि टेनसेंट गेम्स से संबंधित उनके इस निर्णय से फ़र्क क्या पड़ने वाला है।

जमाल ख़ाशोज्जी मर्डर केस: सऊदी अरब की अदालत ने जमाल ख़ाशोज्जी मामले में मौत की सज़ा को बदल दिया

सऊदी अरब की एक अदालत ने सऊदी पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी हत्या मामले में दोषी ठहराए गए पांच लोगों की मौत की सज़ा को बदल दिया है। पहले पाँच लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई थी मगर अब उसे सात से 20 साल तक जेल की सज़ा में बदल दिया गया है।

अभियोजन पक्ष का कहना है कि पत्रकार के परिवार ने दोषियों को माफ़ करने का फ़ैसला किया था जिसके बाद उनकी मौत की सज़ा को बदल दिया गया।

मगर ख़ाशोज्जी की मंगेतर हातिज जेंगीज़ ने इस फ़ैसले को इंसाफ़ का मज़ाक बताया है।

तुर्की के राष्ट्रपति कार्यालय ने भी इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए कहा है कि ये फ़ैसला तुर्की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता।

सऊदी सरकार के प्रमुख आलोचक ख़ाशोज्जी पर 2018 में तुर्की के इस्तांबुल शहर में स्थित सऊदी दूतावास में सऊदी एजेंट्स की एक टीम ने हमला किया और उनकी लाश के टुकड़े कर दिए गए थे जिन्हें कभी बरामद नहीं किया जा सका।

सऊदी सरकार ने कहा था कि जिस अभियान के तहत उन्हें मारा गया, उसे उसकी जानकारी नहीं थी। इसके एक साल बाद सऊदी के अभियोजकों ने 11 अनाम व्यक्तियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा शुरू किया था।

लेकिन उस वक़्त संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत एग्नस कॉलमार्ड ने ट्रायल को 'न्याय के विपरीत' बताकर ख़ारिज कर दिया था। उन्होंने निष्कर्ष निकाला था कि ख़ाशोज्जी की 'जानबूझकर और सोची-समझी साज़िश के तहत हत्या' की गई थी जिसके लिए सऊदी सरकार ज़िम्मेदार है।

कॉलमार्ड ने कहा था कि इस बात के विश्वसनीय सबूत हैं कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान समेत उच्च-स्तरीय अधिकारी व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार थे।

प्रिंस ने इस मामले में हाथ होने की बात से इनकार किया। हालांकि उनके दो पूर्व सहयोगियों पर ख़ाशोज्जी की पूर्व-नियोजित हत्या के लिए उकसाने के आरोप में तुर्की में मुक़दमा चलाया गया है।

तुर्की ने अन्य 18 सऊदी नागरिकों पर हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया था।

ख़ाशोज्जी की हत्या की रिकॉर्डिंग

59 साल के पत्रकार ख़ाशोज्जी ख़ुद सऊदी अरब छोड़कर 2017 में अमरीका चले गए थे। उन्हें आख़िरी बार 2 अक्टूबर 2018 को सऊदी के वाणिज्य दूतावास के अंदर जाते देखा गया था। दरअसल उन्हें अपनी तुर्क मंगेतर हतीजा जेंगिज़ से शादी करने के लिए कुछ कागज़ात की ज़रूरत थी, उसी के सिलसिले में वो दूतावास गए थे।

तुर्किश इंटेलिजेंस ने दूतावास के अंदर हुई बातचीत की कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग जारी की थी। जिसे सुनने के बाद कॉलमार्ड निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ख़ाशोज्जी को उस दिन 'बेरहमी से मारा' गया था।

वहीं सऊदी के पब्लिक प्रॉसिक्यूशन ने निष्कर्ष निकाला कि हत्या सोची-समझी साज़िश नहीं थी।

उसने कहा था कि हत्या का आदेश उस टीम के प्रमुख ने दिया था जिसे 'ख़ाशोज्जी को मनाकर' सऊदी वापस लाने के लिए इस्तांबुल भेजा गया था।

अभियोजन पक्ष के मुताबिक़ हाथापाई के बाद पत्रकार ख़ाशोज्जी को वहीं जबरन रोक लिया गया और इंजेक्शन लगा दिया गया जिसमें बहुत ज़्यादा दवाई थी और ओवरडोज़ की वजह से उनकी मौत हो गई।

उनके शरीर को अलग-अलग हिस्सों में दूतावास के बाहर स्थानीय 'सहयोगी' को दे दिया गया। उनके अवशेष कभी नहीं मिले।

वहीं तुर्की के अभियोजकों ने निष्कर्ष निकाला कि दूतावास में घुसते ही ख़ाशोज्जी का गला घोट दिया गया और उनके शव को नष्ट कर दिया गया।

2019 में सुनाई गई थी मौत की सज़ा

दिसंबर 2019 में रियाद के आपराधिक न्यायालय ने पांच लोगों को 'पीड़ित की हत्या को अंजाम देने और सीधे तौर पर उसमें शामिल होने' के लिए मौत की सज़ा सुनाई।

वहीं तीन अन्य को 'अपराध पर पर्दा डालने और क़ानून का उल्लंघन' करने के लिए कुल 24 साल की जेल की सज़ा सुनाई गई।

तीन लोगों को दोष मुक्त कर दिया गया। जिनमें सऊदी अरब के पूर्व डिप्टी इंटेलिजेंस प्रमुख अहमद असीरी भी शामिल थे।

सऊदी के पब्लिक प्रॉसिक्यूशन ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार सऊद अल-क़हतानी से पूछताछ की लेकिन उन्हें चार्ज नहीं किया गया।

सज़ा क्यों बदली गई?

इस साल मई में ख़ाशोज्जी के बेटे सालाह ने घोषणा की कि वो और उनके भाई 'पिता की हत्या करने वालों को माफ़ कर रहे हैं', उन्होंने कहा कि इन दोषियों को सर्वशक्तिमान ईश्वर ही उनके किए का फल देंगे।

ख़ाशोज्जी के बेटों ने इस दलील को स्वीकार किया कि ये हत्या पूर्व नियोजित नहीं थी।

इसके बाद सऊदी क़ानून के तहत सज़ा की मौत पाने वाले पांच दोषियों की सज़ा कम होने का रास्ता खुल गया।

सोमवार को सऊदी के पब्लिक प्रॉसिक्यूशन ने घोषणा की कि रियाद आपराधिक न्यायालय ने पांचों की मौत की सज़ा को बदलकर 20 साल की जेल की सज़ा सुनाई है और तीन अन्य को सात से 10 साल के बीच की सज़ा दी है।

ये भी कहा गया कि ये अंतिम फ़ैसले हैं और अब आपराधिक मुक़दमा बंद कर दिया जाएगा।

जेंगिज़ ने एक बयान में कहा, ''सऊदी अरब में आज दिए गए फ़ैसले ने एक बार फिर न्याय का मज़ाक बना दिया है।''

उन्होंने कहा, ''सऊदी सरकार मामले को बंद कर रही है, बिना दुनिया को ये सच बताए कि उनकी मौत के लिए कौन ज़िम्मेदार था? किसने योजना बनाई थी, किसने आदेश दिया था, उनका शव कहां है? ये सबसे ज़्यादा बुनियादी और महत्वपूर्ण सवाल हैं जिनका बिल्कुल जवाब नहीं मिला।''

कॉलमार्ड ने मौत की सज़ा कम किए जाने का स्वागत किया, लेकिन साथ ही ये भी कहा कि इन फ़ैसलों के ज़रिए ''जो हुआ उसे दबाने की कोशिश नहीं की जा सकती''।

उन्होंने ट्वीट किया, ''ये फै़सला कोई क़ानूनी या नैतिक वैधता नहीं रखता। ये फ़ैसला उस प्रक्रिया के बाद आया जो ना तो निष्पक्ष था और ना पारदर्शी।''

कॉलमार्ड ने कहा कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद ''किसी भी तरह की सार्थक जांच से बचे रहे हैं''।

उन्होंने फिर से अमरीकी इंटेलिजेंस सर्विसेस को अपने उस कथित आंकलन को जारी करने की अपील की जिसमें कहा गया था कि क्राउन प्रिंस ने ख़ाशोज्जी की हत्या का आदेश दिया था।