विदेश

भारत-चीन तनाव: चीन ने भारत से तनाव के बीच तिब्बत को लेकर अहम घोषणा की

भारत से सरहद पर तनाव के बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक 'नए आधुनिक समाजवादी तिब्बत' के निर्माण की कोशिश करने का आह्वान किया है।

इससे पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने तिब्बत का दौरा किया था और भारत से लगी सीमा पर निर्माण कार्यों का जायज़ा लिया था।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और चीन के सेंट्रल मिलिटरी कमिशन के चेयरमैन शी जिनपिंग ने बीजिंग में तिब्बत को लेकर हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में यह टिप्पणी की।

उन्होंने कहा कि चीन को तिब्बत में स्थिरता बनाए रखने और राष्ट्रीय एकता की रक्षा करने के लिए और कोशिशें करने की ज़रूरत है।

चीन ने 1950 में तिब्बत पर अपना नियंत्रण स्थापित किया था।

निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के साथ खड़े होने वाले आलोचकों का कहना है कि 'चीन ने तिब्बत के लोगों और वहाँ की संस्कृति के साथ बुरा किया'।

तिब्बत के भविष्य के शासन पर कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों की इस बैठक में शी जिनपिंग ने उपलब्धियों की प्रशंसा की और फ्रंटलाइन पर काम कर रहे अधिकारियों की भी तारीफ़ की, लेकिन उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में एकता को बढ़ाने, उसे फिर से जीवंत और मज़बूत करने के लिए और प्रयासों की आवश्यकता है।

चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, शी जिनपिंग ने बैठक में कहा कि 'तिब्बत के स्कूलों में राजनीतिक और वैचारिक शिक्षा पर और ज़ोर दिए जाने की ज़रूरत है ताकि वहाँ हर युवा के दिल में चीन के लिए प्यार का बीज बोया जा सके'।

शी जिनपिंग ने कहा कि तिब्बत में कम्युनिस्ट पार्टी की भूमिका को मज़बूत करने और जातीय समूहों को बेहतर ढंग से एकीकृत करने की आवश्यकता है।

इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि ''हमें एकजुट, समृद्ध, सभ्य, सामंजस्यपूर्ण और सुंदर, आधुनिक, समाजवादी तिब्बत बनाने का संकल्प लेना होगा।''

उन्होंने कहा कि 'तिब्बती बौद्ध धर्म को भी समाजवाद और चीनी परिस्थितियों के अनुकूल बनाए जाने की ज़रूरत है'।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि 'अगर चीन से तिब्बत को वाक़ई इतना फ़ायदा हुआ होता, जितना शी जिनपिंग ने बैठक में दावा किया, तो चीन को अलगाववाद का डर नहीं होता और ना ही चीन तिब्बत के लोगों में शिक्षा के ज़रिए 'नई राजनीतिक चेतना' भरने की बात करता'।

अमरीका और चीन तनाव के बीच भी तिब्बत को लेकर बात उठी थी।

जुलाई में, अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ ने कहा था कि अमरीका तिब्बत में 'राजनयिक पहुँच को रोकने और मानवाधिकारों के हनन में लिप्त' कुछ चीनी अधिकारियों के वीज़ा को प्रतिबंधित करेगा।

उन्होंने यह भी कहा कि अमरीका तिब्बत की 'सार्थक स्वायत्तता' का समर्थन करता है।

चीन के कब्ज़े में तिब्बत कब और कैसे आया?

मुख्यतः बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के इस सुदूर इलाक़े को 'संसार की छत' के नाम से भी जाना जाता है। चीन में तिब्बत का दर्जा एक स्वायत्तशासी क्षेत्र के तौर पर है।

चीन का कहना है कि इस इलाके पर सदियों से उसकी संप्रभुता रही है, जबकि बहुत से तिब्बती लोग अपनी वफ़ादारी अपने निर्वासित आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के प्रति रखते हैं।

दलाई लामा को उनके अनुयायी एक जीवित ईश्वर के तौर पर देखते हैं तो चीन उन्हें एक अलगाववादी ख़तरा मानता है।

तिब्बत का इतिहास बेहद उथल-पुथल भरा रहा है। कभी वो एक खुदमुख़्तार इलाक़े के तौर पर रहा, तो कभी मंगोलिया और चीन के ताक़तवर राजवंशों ने उस पर हुकूमत की।

लेकिन साल 1950 में चीन ने इस इलाके पर अपना झंडा लहराने के लिए हज़ारों की संख्या में सैनिक भेज दिए। तिब्बत के कुछ इलाक़ों को स्वायत्तशासी क्षेत्र में बदल दिया गया और बाक़ी इलाक़ों को इससे लगने वाले चीनी प्रांतों में मिला दिया गया।

लेकिन साल 1959 में चीन के ख़िलाफ़ हुए एक नाकाम विद्रोह के बाद 14वें दलाई लामा को तिब्बत छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी, जहाँ उन्होंने निर्वासित सरकार का गठन किया।

साठ और सत्तर के दशक में चीन की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान तिब्बत के ज़्यादातर बौद्ध विहारों को नष्ट कर दिया गया। माना जाता है कि दमन और सैनिक शासन के दौरान हज़ारों तिब्बतियों की जाने गई थीं।

चीन तिब्बत विवाद कब शुरू हुआ?

चीन और तिब्बत के बीच विवाद, तिब्बत की क़ानूनी स्थिति को लेकर है।

चीन कहता है कि तिब्बत तेरहवीं शताब्दी के मध्य से चीन का हिस्सा रहा है लेकिन तिब्बतियों का कहना है कि तिब्बत कई शताब्दियों तक एक स्वतन्त्र राज्य था और चीन का उस पर निरंतर अधिकार नहीं रहा।

मंगोल राजा कुबलई ख़ान ने युआन राजवंश की स्थापना की थी और तिब्बत ही नहीं बल्कि चीन, वियतनाम और कोरिया तक अपने राज्य का विस्तार किया था।

फिर सत्रहवीं शताब्दी में चीन के चिंग राजवंश के तिब्बत के साथ संबंध बने।

260 साल के रिश्तों के बाद चिंग सेना ने तिब्बत पर अधिकार कर लिया, लेकिन तीन साल के भीतर ही उसे तिब्बतियों ने खदेड़ दिया और 1912 में तेरहवें दलाई लामा ने तिब्बत की स्वतन्त्रता की घोषणा की।

फिर 1951 में चीनी सेना ने एक बार फिर तिब्बत पर नियन्त्रण कर लिया और तिब्बत के एक शिष्टमंडल से एक संधि पर हस्ताक्षर करा लिए जिसके अधीन तिब्बत की प्रभुसत्ता चीन को सौंप दी गई।

दलाई लामा भारत भाग आये और तभी से वे तिब्बत की स्वायत्तता के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

जब चीन ने तिब्बत पर क़ब्ज़ा किया तो उसे बाहरी दुनिया से बिल्कुल काट दिया। इसके बाद तिब्बत के चीनीकरण का काम शुरू हुआ और तिब्बत की भाषा, संस्कृति, धर्म और परम्परा - सबको निशाना बनाया गया।

क्या तिब्बत चीन का हिस्सा है?

चीन-तिब्बत संबंधों से जुड़े कई सवाल हैं जो लोगों के मन में अक्सर आते हैं। जैसे कि क्या तिब्बत चीन का हिस्सा है? चीन के नियंत्रण में आने से पहले तिब्बत कैसा था? और इसके बाद क्या बदल गया?

तिब्बत की निर्वासित सरकार का कहना है, ''इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में तिब्बत विभिन्न विदेशी शक्तियों के प्रभाव में रहा। मंगोलों, नेपाल के गोरखाओं, चीन के मंचू राजवंश और भारत पर राज करने वाले ब्रितानी शासक, सभी की तिब्बत के इतिहास में कुछ भूमिकाएं रही हैं। लेकिन इतिहास के दूसरे कालखंडों में वो तिब्बत था जिसने अपने पड़ोसियों पर ताक़त और प्रभाव का इस्तेमाल किया और इन पड़ोसियों में चीन भी शामिल था।''

''दुनिया में आज कोई ऐसा देश खोजना मुश्किल है, जिस पर इतिहास के किसी दौर में किसी विदेशी ताक़त का प्रभाव या अधिपत्य ना रहा हो। तिब्बत के मामले में विदेशी प्रभाव या दखलंदाज़ी तुलनात्मक रूप से बहुत ही सीमित समय के लिए रही थी।''

लेकिन चीन का कहना है कि ''सात सौ साल से भी ज़्यादा समय से तिब्बत पर चीन की संप्रभुता रही है और तिब्बत कभी भी एक स्वतंत्र देश नहीं रहा। दुनिया के किसी भी देश ने कभी भी तिब्बत को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं दी।''

जब भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना

साल 2003 के जून महीने में भारत ने ये आधिकारिक रूप से मान लिया था कि तिब्बत चीन का हिस्सा है।

चीन के राष्ट्रपति जियांग जेमिन के साथ भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मुलाक़ात के बाद भारत ने पहली बार तिब्बत को चीन का अंग माना।

उस समय भारत में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के नेता थे। इससे साफ जाहिर होता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते बीजेपी और भारत की निकटता चीन के साथ बढ़नी शुरू हो गई। यह भारत के विदेश नीति में आमूल चूल बदलाव दिखता है। इससे पहले कांग्रेस पार्टी की सरकार ने कभी ऐसी गलती नहीं की। कांग्रेस ने तिब्बत पर चीन के कब्जे को कभी मान्यता नहीं दी और तिब्बत को हमेशा आज़ाद मुल्क माना।

हालांकि तब ये कहा गया था कि ये मान्यता परोक्ष ही है, लेकिन दोनों देशों के बीच रिश्तों में इसे एक महत्वपूर्ण क़दम के तौर पर देखा गया था।

वाजपेयी-जियांग जेमिन की वार्ता के बाद चीन ने भी भारत के साथ सिक्किम के रास्ते व्यापार करने की शर्त मान ली थी। तब इस क़दम को यूँ देखा गया कि चीन ने भी सिक्किम को भारत के हिस्से के रूप में स्वीकार कर लिया है।

भारतीय अधिकारियों ने उस वक़्त ये कहा था कि भारत ने पूरे तिब्बत को मान्यता नहीं दी है जो कि चीन का एक बड़ा हिस्सा है, बल्कि भारत ने उस हिस्से को ही मान्यता दी है जिसे स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र माना जाता है।

तुर्की-ग्रीस तनाव: तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने फ़्रांस-ग्रीस को चेतावनी दी

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने रविवार को फ़्रांस और ग्रीस पर जमकर निशाना साधा है। अर्दोआन ने उन्हें लालची और अयोग्य करार दिया।

पूर्वी भूमध्यसागर में तुर्की के ऊर्जा खोज अभियान को फ़्रांस और ग्रीस ने चुनौती दी है। इसे लेकर अर्दोआन ग़ुस्से में हैं।

पूर्वी भूमध्यसागर में ऊर्जा भंडार की खोज को लेकर ग्रीस और तुर्की में काफ़ी तनातनी चल रही है। तुर्की के ख़िलाफ़ फ़्रांस भी खुलकर ग्रीस के साथ आ गया है।

यहां तक कि यूरोप में तुर्की के ख़िलाफ़ एक किस्म की गोलबंदी बनती दिख रही है। ग्रीस, फ़्रांस और तुर्की तीनों नेटो के सदस्य हैं। ऐसे में नेटो सदस्य ही आपस में उलझ गए हैं।

समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार अर्दोआन ने अपने अधिकारियों से कहा है, ''ग्रीस और फ़्रांस को अपने लालची और अक्षम नेताओं के कारण भुगतना पड़ेगा।''

10 अगस्त को तुर्की के रिसर्च पोत ग्रीस के जलक्षेत्र में चले गए थे। इसके बाद से ही दोनों देशों की नौसेना हरकत में हैं। दोनो देशों की नौसेनाएं युद्धाभ्यास भी कर रही हैं।

फ़्रांस के फाइटर्स जेट ग्रीस के पक्ष में खड़े हैं। फ़्रांस ने तुर्की को चेतावनी भी दी है कि वो ख़तरों से ना खेले। फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा था कि तुर्की को बातचीत का रास्ता समझ में नहीं आता है।

अर्दोआन ने रविवार को कहा, ''अगर फ़्रांस और ग्रीस दोनों से लड़ने का वक़्त आएगा तो हम बलिदान देने में संकोच नहीं करेंगे। सवाल यह है कि भूमध्यसागर में ये हमारे ख़िलाफ़ खड़े होंगे तो क्या ये बलिदान के लिए तैयार हैं?"

शनिवार को तुर्की ने घोषणा की थी कि वो उत्तरी साइप्रस में सैन्य अभ्यास करने जा रहा है।

इससे पहले तुर्की और ग्रीस ने घोषणा की थी वे मंगलवार को ग्रीस के क्रीट द्वीप के पास एक-दूसरे के विरोध में सैन्य अभ्यास करेंगे।

दोनों देशों के बीच पूर्वी भूमध्यसागर में तेल और गैस भंडारों पर दावों को लेकर विवाद बढ़ गया है। तुर्की ने अधिकारिक चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि जहाज़ इस क्षेत्र से दूर रहें।

तुर्की के अपने खोजी मिशन को आगे बढ़ाने का ऐलान करने के बाद ग्रीस ने भी सैन्य अभ्यास का ऐलान किया था। क्रीट और साइप्रस के पास विवादित जलक्षेत्र में तेल और गैस के भंडार मिलने के बाद से ही ग्रीस और तुर्की के बीच तनाव बढ़ा हुआ है।

राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा था, ''तुर्की ओरुक रीस और उसे एस्कॉर्ट कर रहे जंगी जहाज़ों की गतिविधियों से एक क़दम भी पीछे नहीं हटेगा।''

उन्होंने कहा कि ग्रीस ने अपने आप को ऐसी मुसीबत में डाल लिया है जिससे बाहर निकलने का रास्ता उसे नहीं मिल रहा है।

बीते महीने जब तुर्की ने अपने जहाज़ को भेजते समय नौसैन्य चेतावनी नेवटेक्स जारी की थी तब भी ग्रीस ने आक्रामक रवैया अपनाया था। ग्रीस ने तुर्की से कहा था कि वह पूर्वी भूमध्य सागर में तेल की खोज में निकले अपने जहाज़ को वापस बुला ले।

तुर्की-ग्रीस तनाव: तुर्की एक क़दम भी पीछे नहीं हटेगा - प्रेसिडेंट अर्दोआन

तुर्की और ग्रीस ने घोषणा की है कि वे मंगलवार को ग्रीस के क्रीट द्वीप के पास एक-दूसरे के विरोध में सैन्य अभ्यास करेंगे।

दोनों देशों के बीच पूर्वी भूमध्यसागर में तेल और गैस भंडारों पर दावों को लेकर विवाद बढ़ गया है।

तुर्की ने आधिकारिक चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि जहाज़ इस क्षेत्र से दूर रहें।

तुर्की के अपने खोजी मिशन को आगे बढ़ाने का ऐलान करने के बाद ग्रीस ने भी सैन्य अभ्यास का ऐलान किया है।

इसी बीच जर्मनी के विदेश मंत्री हीको मास मंगलवार को एथेंस और अंकारा पहुंच रहे हैं जहां वो तनाव कम करने के लिए वार्ताएं करेंगे।

हीको मास पहले एथेंस में ग्रीस के प्रधानमंत्री किरयाकोस मिट्सोटाकिस से बात करेंगे और फिर अंकारा में तुर्की के विदेश मंत्री के साथ वार्ता करेंगे।

क्रीट और साइप्रस के पास विवादित जलक्षेत्र में तेल और गैस के भंडार मिलने के बाद से ही ग्रीस और तुर्की के बीच तनाव बढ़ा हुआ है।

ग्रीस यूरोपियन यूनियन का भी हिस्सा है, जिसने वार्ता की अपील की है लेकिन फ्रांस ग्रीस का साथ देता दिख रहा है। फ्रांस ने हाल ही में ग्रीस के साथ सैन्य अभ्यास भी किया है।

सोमवार को तुर्की ने घोषणा की थी कि उसका शोध जहाज़ ओरुक रीस 27 अगस्त 2020 तक अपना काम चारी रखेगा। माना जा रहा है कि ग्रीस इसी से नाराज़ है। ग्रीस तुर्की के सर्वेक्षण को ग़ैर क़ानूनी मान रहा है और अब तुर्की के विरोध में युद्धाभ्यास करने जा रहा है।

ग्रीस सरकार के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा है, ''ग्रीस शांति से जवाब दे रहा है और कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर जवाब के लिए तैयार है। राष्ट्रीय विश्वास के साथ, ग्रीस अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करेगा।''

तुर्की ने भी इसी भाषा में जवाब दिया है।

तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा है, ''तुर्की ओरुक रीस और उसे एस्कॉर्ट कर रहे जंगी जहाज़ों की गतिविधियों से एक क़दम भी पीछे नहीं हटेगा।''

उन्होंने कहा कि ग्रीस ने अपने आप को ऐसी मुसीबत में डाल लिया है जिससे बाहर निकलने का रास्ता उसे नहीं मिल रहा है।

बीते महीने जब तुर्की ने अपने जहाज़ को भेजते समय नौसैन्य चेतावनी नेवटेक्स जारी की थी तब भी ग्रीस ने आक्रामक रवैया अपनाया था।

ग्रीस ने तुर्की से कहा था कि वह पूर्वी भूमध्य सागर में तेल की खोज में निकले अपने जहाज़ को वापस बुला ले।

ग्रीस और तुर्की के बीच तनाव भड़कता रहता है, लेकिन गैस रिज़र्व और जलक्षेत्र अधिकारों को लेकर शुरू हुए इस ताज़ा विवाद के बड़े संघर्ष में बदलने का ख़तरा पैदा हो गया है।

जुलाई में जब तुर्की ने ग्रीस के द्वीप कास्टेलोरीज़ो के पास अपने सर्वे जहाज़ भेजने का ऐलान किया था तो जर्मनी ने मध्यस्थता करके संकट टाल दिया था। जर्मनी इस समय यूरोपीय यूनियन का अध्यक्ष है।

लेकिन अब ये जहाज़ और इसके साथ तुर्की की नौसेना के पाँच जंगी जहाज़ जलक्षेत्र में सर्वे कर रहे हैं और तनाव फिर से बढ़ गया है।

नेटो सदस्य ग्रीस और तुर्की के बीच ज़ुबानी जंग छिड़ गई है।

इसी विवाद में ग्रीस कहता रहा है कि वह अपनी संप्रभुता की रक्षा करेगा और यूरोपीय यूनियन ने कहा है कि दोनों देशों के बीच बातचीत होनी चाहिए।

तुर्की और ग्रीस के रिश्ते कैसे ख़राब हुए?

गैस भंडारों को लेकर तुर्की और ग्रीस के अपने-अपने दावे हैं और पूर्वी भूमध्यसागर के कई महत्वपूर्ण इलाक़ों को लेकर दोनों देशों के बीच भारी मतभेद हैं।

दोनों ही देश कई इलाक़ों पर अपने-अपने दावे इस तर्क के साथ ठोकते रहे हैं कि ये उनके महाद्वीपीय जलसीमा में आते हैं।

जुलाई में तुर्की ने नौसैनिक अलर्ट (नेवटेक्स) जारी किया था कि वह अपने शोध जहाज़ ओरुक रीस को ग्रीस के द्वीप कास्टेलोरीज़ो के पास सर्वे करने भेज रहा है।

ये द्वीप दक्षिण-पश्चिम तुर्की के तट से कुछ ही दूर स्थित है।  

इस सर्वे में तुर्की साइप्रस और क्रीट के बीच के इलाक़ों में गैस की खोज कर रहा है।

उस समय तुर्की के जहाज़ ने अंतालया के बंदरगाह से अपना लंगर नहीं उठाया था लेकिन ग्रीस की सेना में कास्टेलोरीज़ो द्वीप के नज़दीक संघर्ष की चिंता पैदा हो गई थी।

बीते कई महीनों से तुर्की और ग्रीस के रिश्ते ठंडे हैं। दोनों देशों के बीच प्रवासियों के ग्रीस में घुसने को लेकर भी विवाद है। और फिर तुर्की ने इस्ताबुंल के हागिया सोफ़िया म्यूज़ियम को फिर से मस्जिद बना दिया। ये इमारत कई सदियों तक ऑर्थोडॉक्स चर्च रही है। इससे भी ग्रीस को बुरा लगा।

जर्मनी के दख़ल के बाद दोनों देश बातचीत के लिए तैयार हुए और कुछ दिनों के लिए मामला ठंडा पड़ गया।

लेकिन इसी बीच अगस्त में ग्रीस ने मिस्र के साथ समझौता कर एक जलक्षेत्र बना लिया जिससे तुर्की भड़क गया है।

बातचीत टूट गई और तुर्की के जहाज़ ओरुक रीस ने दस अगस्त को बंदरगाह छोड़ दिया। अगले ही दिन ये क्रीट और साइप्रस के बीच के पानी में पहुंच गया।

अब क्यों बढ़ा तनाव?

पूर्वी भूमध्यसागर में ऊर्जा संसाधन विकसित करने की दौड़ में तुर्की और ग्रीस एक दूसरे के ख़िलाफ़ हैं।

हाल के सालों में साइप्रस के पास के पानी में बड़े गैस भंडार मिले हैं। साइप्रस, ग्रीस, इसराइल और मिस्र की सरकारें इनके दोहन के लिए एक साथ आई हैं। समझौते के तहत दो हज़ार किलोमीटर पाइपलाइन के ज़रिए यूरोप तक गैस भेजी जाएगी।

पिछले साल तुर्की ने साइप्रस के पश्चिम में तेल और गैस की खोज शुरू की थी। साइप्रस 1974 से बँटा हुआ है। तुर्की के नियंत्रण वाले उत्तरी साइप्रस को सिर्फ़ तुर्की ने ही मान्यता दे रखी है। तुर्की हमेशा ये तर्क देता रहा है कि इस द्वीप के प्राकृतिक संसाधनों पर उसका भी हक़ है और इनका बँटवारा होना चाहिए।  

और फिर नवंबर 2019 में तुर्की ने लीबिया के साथ एक समझौता करके तुर्की के दक्षिणी तट से लीबिया के उत्तर पूर्वी तट तक एक विशेष आर्थिक जलक्षेत्र का निर्माण कर लिया।

मिस्र ने कहा कि ये समझौता ग़ैरक़ानूनी है और ग्रीस ने कहा कि ये बेतुका है क्योंकि इसमें बीच में आने वाले ग्रीस के द्वीप क्रीट का संदर्भ नहीं लिया गया है।

फिर मई में तुर्की ने कहा कि वह अगले कुछ महीनों में पश्चिम की ओर अन्य इलाक़ों में तेल और गैस की खोज में खुदाई शुरू करेगा। इससे यूरोपीय यूनियन के सदस्य ग्रीस और साइप्रस में चिंताएं पैदा हो गईं।

तुर्की ने पूर्वी भूमध्यसागर में खुदाई करने के लिए टर्किश पेट्रोलियम को कई लाइसेंस जारी कर दिए हैं। इनमें ग्रीस के द्वीप क्रीट और रोड्स के आसपास खुदाई करने का लाइसेंस भी है।

जुलाई में तुर्की के उप-राष्ट्रपति फ़वात ओकताई ने कहा था, ''सभी को ये बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि इस क्षेत्र के ऊर्जा समीकरणों से तुर्की और टर्किश रिपब्लिक ऑफ़ नॉर्थ साइप्रस को अलग नहीं किया जा सकता है।''

फिर 6 अगस्त 2020 को  ग्रीस और मिस्र ने अपना समझौता करके तुर्की को जवाब दिया। दोनों ने विशेष आर्थिक ज़ोन का निर्माण करते हुए कहा कि इससे लीबिया के साथ तुर्की का समझौता रद्द हो जाएगा।

अब तुर्की ने अपने सर्वे जहाज़ को भेजने के अलावा ये भी कहा है कि इस महीने के अंत तक महाद्वीपीय शेल्फ़ के पश्चिमी क्षेत्र में तेल और गैस की खोज के लिए लाइसेंस जारी कर दिए जाएंगे।

क़ानूनी विवाद क्या हैं?

एजियन सागर और पूर्वी भूमध्यसागर में ग्रीस के कई द्वीप ऐसे है जो तुर्की के तट के बिल्कुल पास हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच जलक्षेत्र को लेकर जटिल विवाद हैं और कई बार दोनों देश युद्ध के मुहाने तक आ चुके हैं।

यदि ग्रीस अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अपने जलक्षेत्र को छह मील से लेकर 12 मील तक बढ़ाता है तो तुर्की का तर्क है कि इससे उसके कई समंदरी रास्ते बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तेयेप अर्दोआन ने हाल ही में कहा था, ''तुर्की ऐसे किसी भी प्रयास को सहमति नहीं देगा जो उसे उसके तट तक सीमित कर दे।''

लेकिन विवाद सिर्फ़ जलक्षेत्रों तक ही नहीं है बल्कि विशेष आर्थिक ज़ोन (ईईज़ेड) भी एक बड़ा मुद्दा है। जैसे तुर्की और लीबिया का ईईज़ेड, मिस्र और ग्रीस का ईईज़ेड और साइप्रस और लेबनान का ईईज़ेड, मिस्र और इसराइल का ईईज़ेड।

और अब इस ताज़ा विवाद में महाद्वीपीय जलसीमा भी शामिल है जो तट से दो सौ मील दूर तक हो सकती है।

ग्रीस का तर्क है कि तुर्की का सर्वे जहाज़ उसकी महाद्वीपीय जलसीमा का उल्लंघन कर रहा है। ग्रीस का द्वीप कास्टेलोरीज़ो तुर्की के तट से सिर्फ़ दो किलोमीटर दूर है।

एक ओर जहां ग्रीस ने तुर्की से कहा है कि वह उसकी महाद्वीपीय जलसीमा को तुरंत छोड़ दे, तुर्की का कहना है कि ऐसे द्वीप जो मुख्य भूभाग से दूर हैं और तुर्की के पास हैं उनकी महाद्वीपीय जलसीमा नहीं हो सकती है।

बीते महीने तुर्की के उपराष्ट्रपति ने कहा था कि तुर्की उन नक्शों को फाड़ रहा है जो उसे मुख्य भूभाग तक सीमित करने के लिए बनाए गए हैं।

तुर्की इस बात पर भी ज़ोर देता रहा है कि वह संयुक्त राष्ट्र के जलक्षेत्रों को लेकर क़ानूनों के तहत ही काम कर रहा है।  

इसकी प्रतिक्रिया क्या रही है?

ग्रीस के यूरोपीय सहयोगी देशों ने उसका पक्ष लिया है, हालांकि जर्मनी और यूरोपीय यूनियन बातचीत पर ज़ोर दे रहे हैं।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रो ने ग्रीस और साइप्रस को पूर्ण समर्थन देते हुए कहा है कि तुर्की इन देशों की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है।

हाल के महीनों में फ्रांस के रिश्ते तुर्की से ख़राब हुए हैं, ख़ासकर लीबिया को लेकर।

बढ़ते हुए तनाव के बीच फ्रांस ने कहा है कि वह क्षेत्र में अस्थायी रूप से एक फ्रीजेट और दो रफ़ाल विमान तैनात कर रहा है जो ग्रीस के साथ सैन्य अभ्यास भी करेंगे।

अमरीका ने दोनों ही पक्षों से बात करने के लिए कहा है और नेटो के महासचिव येंस स्टोलटेनबर्ग ने कहा है कि स्थिति को बातचीत के ज़रिए अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और नेटो भाइचारे का ध्यान रखते हुए सुलझाया जाए।

जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्कल तनाव कम करने की कोशिशें कर रहीं हैं और उन्होंने तुर्की और ग्रीस दोनों देशों के नेताओं से बात की है।

कुवैत में रह रहे लाखों भारतीयों का भविष्य अंधकार में डूबा, वापसी के आसार

कोरोना वायरस की महामारी ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की हालत ख़राब कर दी है। इसका असर लोगों के रोज़गार पर बहुत ही बुरा पड़ा है। तेल पर निर्भर अरब देशों की अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति और कमज़ोर हुई है। ऐसे में वहां की सरकारें प्रवासी कामगारों को लेकर नियम सख़्त कर रही हैं ताकि स्थानीय लोगों को रोज़गार मिल सके।

कुवैत टाइम्स दैनिक अख़बार के अनुसार कुवैत की नेशनल असेंबली ने प्रवासी कामगारों की संख्या सीमित करने के लिए मसौदा तैयार कर लिया है। इस मसौदे में कुछ ख़ास वीज़ा की मान्यता रद्द करने का भी प्रस्ताव है। अख़बार के अनुसार कुवैत में प्रवासी कामगारों की संख्या सीमित करने वाला क़ानून छह महीने के भीतर लागू हो जाएगा।

अख़बार का कहना है कि इस क़ानून की दस अलग-अलग श्रेणियों में कोटा सिस्टम पर छूट दी जाएगी। यह छूट घरों में काम करने वालों, मेडिकल स्टाफ़, शिक्षक और जीसीसी के नागरिकों को मिलेगी। यात्रा वीज़ा को वर्क वीज़ा में तब्दील करने की सुविधा को भी कुवैत प्रतिबंधित करने जा रहा है। इसके अलावा कोई डोमेस्टिक हेल्पर प्राइवेट या ऑइल सेक्टर में काम नहीं कर सकता है।

कुवैत प्रवासियों की संख्या कम करने के लिए कई स्तरों पर काम कर रहा है। पिछले हफ़्ते कुवैत ने घोषणा की थी कि बिना यूनिवर्सिटी की डिग्री के 60 साल से ऊपर की उम्र वालों को वर्क वीज़ा नहीं मिलेगा।

लार्सन एंड टर्बो में प्रतीक देसाई चीफ़ एग्जेक्युटिव हैं। वो 25 सालों से कुवैत में रह रहे हैं। लेकिन कुवैत सरकार के नए बिल से अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं।

प्रतीक देसाई ने बीबीसी से पिछले महीने कहा था, ''इस बिल के लागू होने के बाद आठ लाख भारतीयों को कुवैत छोड़ना पड़ सकता है। 40 लाख की आबादी में यहां 70 फ़ीसदी प्रवासी हैं। इस बिल का लक्ष्य प्रवासियों की तादाद 30 फ़ीसदी करना है।''

इन प्रवासियों में भारतीय सबसे ज़्यादा हैं। भारत के अलावा यहां पाकिस्तान, फ़िलीपीन्स, बांग्लादेश, श्रीलंका और मिस्र के लोग हैं।

भारत सरकार भी कुवैत के इस बिल को लेकर चिंतित है। पिछले महीने भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा था, ''भारतीयों की खाड़ी के देशों में अहम भूमिका रही है और इनके योगदान को वहां की सरकारें स्वीकार भी करती हैं। हमने कुवैत से इस मसले पर बात की है।''

प्रतीक देसाई का कहना है कि यह मामला केवल जॉब जाने का नहीं है बल्कि यहां से वापस आने का है। वो कहते हैं, ''जब आप लंबे समय से किसी जगह पर रहते हैं तो एक किस्म का भावनात्मक संबंध विकसित हो जाता है। इस फ़ैसले से हम आर्थिक से ज़्यादा भावनात्मक रूप से प्रभावित होंगे।''

कुवैत से भारतीय कमाई कर अपने परिजनों को भेजते हैं और यह भारत के लिए विदेशी मुद्रा का अहम स्रोत रहा है। प्यू रिसर्च सेंटर के डेटा के अनुसार 2017 में कुवैत से भारतीयों ने 4.6 अरब डॉलर भारत भेजे थे। कुवैत में क़रीब तीन लाख भारतीय ड्राइवर, रसोइए और केयरटेकर का काम करते हैं।

सीडीएस जनरल बिपिन रावत: चीन से बातचीत नाकाम हुई तो सैन्य विकल्प मौजूद

भारत के चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत ने कहा है कि चीन के साथ अगर बातचीत फ़ेल हुई, तो भारत के पास सैन्य विकल्प मौजूद है।

भारत में दिल्ली से प्रकाशित होने वाली इंग्लिश न्यूज़ पेपर हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, रावत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पूर्वी लद्दाख में चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा किए गए अतिक्रमण से निपटने के लिए भारत के पास एक सैन्य विकल्प मौजूद है, लेकिन इसका इस्तेमाल तभी किया जाएगा जब दोनों देशों की सेनाओं के बीच बातचीत और राजनयिक विकल्प निष्फल साबित हो जायेंगे।

जनरल रावत ने अख़बार से बातचीत में कहा कि ''वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अतिक्रमण या सीमा-उल्लंघन उस क्षेत्र की अलग-अलग समझ होने पर होता है। डिफ़ेंस सेवाओं को ज़िम्मेदारी दी जाती है कि वो एलएसी की निगरानी करें और घुसपैठ को रोकने के लिए अभियान चलाएं। किसी भी ऐसी गतिविधि को शांतिपूर्वक हल करने और घुसपैठ को रोकने के लिए सरकार के संपूर्ण दृष्टिकोण को अपनाया जाता है। लेकिन सीमा पर यथास्थिति बहाल करने में सफलता नहीं मिलती तो फ़ौज सैन्य कार्यवाही के लिए हमेशा तैयार रहती है।''

उन्होंने कहा कि भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार सभी लोग इस उद्देश्य के साथ सभी विकल्पों की समीक्षा कर रहे हैं कि चीन की सेना लद्दाख में यथास्थिति बहाल करे।

साल 2017 में चीनी सेना के ख़िलाफ़ डोकलाम में 73 दिन के सैन्य गतिरोध के दौरान भारत के सेना प्रमुख रहे जनरल बिपिन रावत ने अख़बार से बातचीत में इस धारणा को भी ख़ारिज किया कि प्रमुख ख़ुफ़िया एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी है।

उन्होंने कहा कि भारत के हिन्द महासागर क्षेत्र के साथ-साथ उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर एक विशाल फ्रंट-लाइन है जिसकी सभी को लगातार निगरानी की आवश्यकता है।

उनके अनुसार सूचनाओं के संग्रहण और संयोजन के लिए ज़िम्मेदार सभी एजेंसियों के बीच नियमित रूप से बातचीत होती है।

उन्होंने कहा कि मल्टी-एजेंसी सेंटर हर रोज़ बैठकें कर रहा है जिनमें लगातार लद्दाख या भारतीय ज़मीन के किसी अन्य टुकड़े की स्थिति को लेकर बातचीत होती है।

जनरल रावत ने इस इंटरव्यू में किसी भी ऑपरेशन के डिटेल्स साझा करने से इनकार किया।

इससे पहले 11 अगस्त को बिपिन रावत ने एक संसदीय समिति को बताया था कि भारतीय सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे वक़्त तक चीन का मुक़ाबला करने और सर्दियों के दौरान पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में तैनाती के लिए तैयार है।

उन्होंने कहा था कि दोनों पक्षों के बीच तनाव कम होने में अधिक समय लग सकता है, लेकिन हम हर स्थिति का सामना करने के लिए तैयार हैं और लद्दाख में इसके इंतजाम भी कर लिए गए हैं।

पाकिस्तान: कश्मीर पर सऊदी अरब और चीन की राय एकदम स्पष्ट है

दो दिनों की चीन यात्रा से लौटने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमदू क़ुरैशी ने कहा है कि उनका ये चीन का दौरा बहुत ज़रूरी था और यह कह सकते हैं कि चीन का कश्मीर के मसले पर नज़रिया बिल्कुल स्पष्ट है जिसमें उन्हें कोई शक नहीं है।

शाह महमूद क़ुरैशी ने ये भी कहा कि कश्मीर के मसले पर इस्लामी देशों के संगठन ओआईसी के प्रस्तावों में कोई संदेह नहीं है और सऊदी अरब का दृष्टिकोण भी ओआईसी से अलग नहीं है।

क़ुरैशी ने सोमवार को इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान ये बातें कहीं। इसी महीने की 20-21 अगस्त को उन्होंने चीन का दौरा किया था।

उन्होंने कहा कि एक साल में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर के मुद्दे पर तीन बैठकें हुईं हैं जो कि चीन की मदद के बग़ैर संभव नहीं था।

उन्होंने कहा कि चीन ने बिल्कुल स्पष्ट तरीक़े से कहा है कि पाँच अगस्त 2019 को भारत के ज़रिए उठाया गया क़दम एकतरफ़ा कार्रवाई है जिसे चीन ख़ारिज करता है।

पाँच अगस्त, 2019 को भारत की मोदी सरकार ने भारतीय संविधान की धारा 370 के तहत कश्मीर को मिलने वाले विशेष राज्य के दर्जे को ख़त्म कर दिया था और उसके राज्य के दर्जे को भी ख़त्म करते हुए उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था।

पाकिस्तान ने भारत के इस क़दम को कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के ख़िलाफ़ क़रार दिया था।

क़ुरैशी के अनुसार चीन ने कहा है कि वो पाकिस्तान और चीन के द्विपक्षीय रणनीतिक हित को सुरक्षित रखेगा ताकि इस क्षेत्र की शांति और विकास को सुनिश्चित किया जा सके, जो कि उनके मुताबिक़ सीपेक (चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर) पर उठने वाले विरोध का जवाब है।

भारत की प्रतिक्रिया पर एतराज़

इस मौक़े पर शाह महमूद क़ुरैशी ने ये भी कहा कि उनकी चीन यात्रा के दौरान जारी किए गए संयुक्त बयान पर भारत की प्रतिक्रिया का कोई तुक नहीं है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने चीन-पाकिस्तान के साझा बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर का कुछ हिस्सा भारत के क्षेत्र में है जिस पर पाकिस्तान ने अवैध रूप से क़ब्ज़ा किया हुआ है।

उन्होंने कहा था, ''हम पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर के मामले में यथास्थिति बदलने की किसी भी देश की कोशिश का कड़े शब्दों में विरोध करते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि भारत के अंदरूनी मामलों में कोई देश हस्तक्षेप नहीं करेगा।''

सोमवार को पत्रकारों से बात करते हुए शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा कि चीन ने एक बार फिर ये साफ़ कह दिया है कि वो कश्मीर समस्या का समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और दो तरफ़ा (भारत और पाकिस्तान) समझौतों की रोशनी में चाहता है, जो कि उनके अनुसार बहुत ही महत्वपूर्ण बयान है।

उन्होंने कहा कि भारत की तरफ़ से पिछले एक साल में कश्मीरियों के उत्साह को तोड़ने की पूरी कोशिश की गई।

कुरैशी के अनुसार भारत प्रशासित कश्मीर की छह पार्टियों की तरफ़ से जारी किए गए संयुक्त बयान (गुप्कर प्रस्ताव) से घाटी के लोगों के संघर्ष को एक नई ताक़त मिली है।

शनिवार को पीडीपी, नेशनल कॉन्फ़्रेंस, पीपल्स कॉन्फ़्रेंस और कुछ दूसरी पार्टियों ने एक संयुक्त बयान जारी किया था जिसमें उन्होंने कश्मीर के विशेष दर्जे को बहाल करने की माँग को सबसे ऊपर रखा था।

सऊदी अरब के साथ संबंध

शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा कि कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान का एक ख़ास नज़रिया है और इसलिए वो अपने दोस्तों से कुछ उम्मीदें रखता है।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ संबंध स्थिर हैं और रहेंगे।

एक सवाल के जवाब में कि क्या सऊदी अरब ने पाकिस्तान को दिए गए पैसे वापस माँगे हैं, इस पर कु़रैशी ने कहा कि ये मनगढ़ंत और काल्पनिक सवाल है।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने कश्मीर पर अपने नज़रिए को पूरी दुनिया के सामने रख दिया है और प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि पाकिस्तान इस मामले में किसी भी दबाव में नहीं आएगा।

कश्मीर के मुद्दे पर सऊदी अरब के नज़रिए के बारे में कु़रैशी ने कहा कि इस बारे में सोशल मीडिया पर नकारात्मक धारणा पेश की गई थी।

सऊदी अरब के बारे में क़ुरैशी ने कहा, ''सऊदी अरब का इस बारे में नज़रिया बिल्कुल स्पष्ट है और अब देखना है कि उसे आगे कैसे लेकर चलना है।''

क़ुरैशी का ये बयान इसलिए अहम है क्योंकि पिछले दिनों सऊदी अरब और ओआईसी के बारे में दिए गए उनके बयान से काफ़ी बवाल मच गया था।

सऊदी अरब पर क़ुरैशी का पिछला बयान

पाँच अगस्त, 2020 को भारत प्रशासित कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म होने के एक साल पूरा होने पर पाकिस्तान जब प्रताड़ना दिवस मना रहा था तो शाह महमूद कुरैशी ने एक निजी न्यूज़ चैनल एआरवाई पर एक प्रोग्राम में बात करते हुए किसी पब्लिक प्लेटफ़ॉर्म पर पहली बार सऊदी अरब की नीति पर खुल कर मायूसी ज़ाहिर की थी।

उन्होंने कहा था, ''सऊदी अरब और हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं। इज़्ज़त और मोहब्बत का रिश्ता है। पाकिस्तानी मक्का और मदीना की सुरक्षा के लिए जान देने को तैयार हैं। आज मैं उसी मित्र देश (सऊदी अरब) से कह रहा हूँ कि पाकिस्तान का मुसलमान और वो पाकिस्तानी जो आपके लिए लड़ने मरने के लिए तैयार है, आज वो आप से कह रहा है कि आप (कश्मीर के मामले पर) उस नेतृत्व की भूमिका निभाएँ, जो मुसलमान आपसे उम्मीद कर रहे हैं और अगर न किया तो मैं इमरान ख़ान से कहूंगा कि अब और इंतज़ार नहीं हो सकता। हमें आगे बढ़ना होगा। सऊदी अरब के साथ या उसके बिना।''

पाकिस्तान के विदेश मंत्री की तरफ़ से खुले आम सऊदी अरब से शिकायत पर कूटनीतिक हलक़ों में तहलका मच गया था। क़ुरैशी ने सऊदी अरब और ओआईसी पर जमकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की थी।

उन्होंने कहा था, ''मैं एक बार फिर ओआईसी से विनम्रतापूर्वक अनुरोध करूँगा कि अगर आप विदेश मंत्रियों की परिषद की बैठक नहीं बुला सकते हैं, तो मैं मजबूरन अपने प्रधानमंत्री से कहूँगा कि वो मुस्लिम देश जो कश्मीर के मुद्दे पर हमारे साथ खड़ा होना चाहते हैं और कश्मीर के पीड़ितों का साथ देना चाहते हैं, उनका सत्र बुला लें चाहे वो ओआईसी के फ़ोरम पर हों या न हों।''

उनके इस बयान के बाद मीडिया और राजनीतिक हलक़ों में तहलका मच गया था। कई लोगों ने इसे उनका निजी बयान बताकर ख़ारिज कर दिया।  यहां तक कि इमरान ख़ान को भी कहना पड़ा कि सऊदी अरब के साथ कोई मतभेद नहीं है और उनके साथ मज़बूत भाईचारे के संबंध बने हुए हैं।

शाह महमूद क़ुरैशी के इस बयान के बाद परदे के पीछे की कूटनीति हरकत में आ गई।

इस्लामाबाद स्थित सऊदी राजदूत ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा से रावलपिंडी में पाकिस्तान के सेना मुख्यालय में मुलाक़ात की और फिर जनरल बाजवा ने सऊदी अरब का दौरा किया।

सोमवार को शाह महमूद क़ुरैशी का ये कहना कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सब कुछ सामान्य है, दरअसल उनके बयान से पैदा हुए तनाव को कम करने की एक कोशिश है।

इसराइल से समझौता कर यूएई ने मुसलमानों को धोखा दिया है: ईरान

ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने शनिवार को दिए एक भाषण में कहा है कि संयुक्त अरब अमीरात ने इसराइल के साथ समझौता कर भारी ग़लती की है।

यूएई पर निशाना साधते हुए अपने आक्रामक भाषण में रूहानी ने कहा कि यूएई ने धोखा दिया है।

वहीं ईरान के कट्टरवादी अख़बार कायहान के मुख्य संपादक ने कहा है, ''यूएई ने अपने आप को विरोध का वैध निशाना बना लिया है।''

कायहान के संपादक की नियुक्ति ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातोल्लाह ख़मेनई ही करते हैं।

गुरुवार को अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसराइल और यूएई के बीच समझौते की घोषणा की थी।

माना जा रहा है कि इस समझौते का मक़सद क्षेत्रीय शक्तिशाली देश ईरान के ख़िलाफ़ गठजोड़ को मज़बूत करना है।

टीवी पर दिए अपने भाषण में रूहानी ने यूएई को चेतावनी देते हुए कहा है कि मध्य पूर्व में इसराइल के पैर मज़बूत करने के गंभीर परिणाम होंगे।

उन्होंने कहा, ''वो (यूएई) सावधान रहें। उन्होंने बहुत बड़ी ग़लती कर दी है। एक विश्वासघाती क़दम उठाया है। हमें उम्मीद है कि उन्हें अपनी ग़लती का अहसास होगा और वो ये ग़लत रास्ता छोड़ देंगे।''

वहीं पहले पन्ने पर प्रकाशित टिप्पणी में कायहान अख़बार ने कहा है, ''संयुक्त अरब अमीरात ने फ़लस्तीन के लोगों को बड़ा धोखा दिया है। ये धोखा इस छोटे से अमीर देश को जो अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर है 'रेज़िस्टेंस' का वैध निशाना बना देगा।''

ईरान आमतौर पर अमरीका और इसराइल के ख़िलाफ़ हथियार उठाने वाले चरमपंथी संगठनों को रेजिस्टेंस फ्रंट ही कहता है।

रूहानी ने ये भी कहा कि इस समझौते का मक़सद नवंबर में होने जा रहे अमरीकी चुनावों में राष्ट्रपति ट्रंप की उम्मीदवारी को मज़बूत करना है। उन्होंने कहा कि इसलिए ही इस समझौते की घोषणा वॉशिंगटन से की गई है।

रूहानी ने कहा, ''ये समझौता अब क्यों हुआ है? अगर ये समझौता ग़लत नहीं है तो फिर इसकी घोषणा एक तीसरे देश में क्यों हुई है? वो भी अमरीका में? ताकि वॉशिंगटन में बैठा वो व्यक्ति वोट बटोर सके। आपने अपने देश को, अपने लोगों को, मुसलमानों को और अरब दुनिया को धोखा दिया?''

ईरान के शक्तिशाली सैन्य संगठन रिवॉल्युश्नरी गार्ड्स कोर ने एक बयान में कहा है कि यूएई-इसराइल समझौते के बाद 'बच्चों की हत्या करने वाले यहूदी शासन के विनाश की प्रक्रिया और तेज़ हो जाएगी'।

वहीं एक बायन में संयुक्त अरब अमीरात ने कहा है कि इसराइल के साथ उसके समझौते का मक़सद ईरान को जवाब देना नहीं है।

यूएई ने तुर्की की ओर से समझौते की आलोचना को भी ख़ारिज किया है।

यूएई के विदेश मंत्री अनवर गरगाश ने ब्लूमबर्ग से कहा, ''ये समझौता ईरान के बारे में नहीं है। ये यूएई, इसराइल और अमरीका के बारे में हैं। इसका मक़सद किसी भी तरह से ईरान के ख़िलाफ़ कोई समूह बनाना नहीं है।''

ट्रंप प्रशासन और इसराइल ने यूएई के साथ समझौते को ईरान को किनारे करने की कोशिश के तौर पर दिखाया है लेकिन यूएई ने संकेत दिए हैं कि वो अपने पड़ोसी ईरान को उकसाना नहीं चाहता है।

गरगाश ने कहा, ''ईरान के साथ हमारा रिश्ता बहुत जटिल है। हमारी कुछ चिंताएं ज़रूर हैं लेकिन हमें लगता है कि इन मुद्दों को तनाव कम करके और कूटनीतिक तरीक़ों से ही सुलझाया जा सकता है।''

इसी बीच तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यब अर्दोआन ने शुक्रवार को कहा था कि तुर्की यूएई से अपने राजदूत को वापस बुला सकता है।

अर्दोआन का कहना था कि इसराइल के साथ समझौते से फ़लस्तीनी लोगों के अधिकारों को झटका लगा है।

गरगाश ने तुर्की के इस रुख़ को आडंबर कहकर ख़ारिज कर दिया। तुर्की के इसराइल के साथ व्यापारिक रिश्ते हैं।

गरगाश ने कहा, ''सालाना पाँच लाख इसराइली पर्यटक तुर्की आते हैं। दोनों देशों के बीच दो अरब डॉलर का कारोबार है और तुर्की का इसराइल में अपना दूतावास भी है। और अब मैं पूछता हूं कि क्या उनका ये पक्ष नैतिक है?''

यूएई के साथ समझौते के तहत इसराइल ने वेस्ट बैंक के इलाक़ों पर क़ब्ज़े की अपनी योजना को टाल दिया है।

संयुक्त अरब अमीरात का कहना है, ''हम क़ब्ज़े के मुद्दे के लेकर बहुत चिंतित हैं। हमने इस कल्पनात्मक उद्घोषणा के माध्यम से कम से कम वार्ता के लिए जगह तो बनाई ही है।''

तुर्की भी नाराज़

तुर्की ने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात को इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा। तुर्की ने कहा कि यह यूएई का पाखंडपूर्ण व्यवहार है।

तुर्की के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इतिहास और क्षेत्र के लोगों की अंतरात्मा इसराइल के साथ समझौते पर संयुक्त अरब अमीरात के 'ढोंगी व्यवहार' को कभी नहीं भूल पाएगी क्योंकि अपने हितों के लिए उसने यह निर्णय लिया है।

एक लिखित बयान में कहा गया है कि 'फ़लस्तीनी लोग और प्रशासन इस समझौते के ख़िलाफ़ एक सख़्त प्रतिक्रिया देने को लेकर सही थे।'

''ये बेहद चिंताजनक है, यूएई को अरब लीग द्वारा विकसित 'अरब शांति योजना' के साथ चलना चाहिए था। यह ज़रा भी विश्वसनीय नहीं है कि इस तीन-तरफ़ा घोषणा को फ़लस्तीनी लोगों के फ़ायदे का बताया जा रहा है।''

तुर्की के इसराइल के साथ राजनयिक और व्यापारिक संबंध हैं, लेकिन वर्षों से ये संबंध तनावपूर्ण हैं।

2010 में इसराइल के सैनिकों ने ग़ज़ा पट्टी पर एक नाकाबंदी को तोड़ने की कोशिश कर रहे 10 तुर्क कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी जो फ़लस्तीनी इस्लामवादी आंदोलन- हमास द्वारा शासित है।

अरब देशों में यूएई इसराइल के साथ संबंध बहाल करने वाला मिस्र (1979) और जॉर्डन (1994) के बाद तीसरा देश बन गया है।

व्हाइट हाउस के बाहर गोली चली: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि व्हाइट हाउस के बाहर किसी को गोली मारी गई है।

राष्ट्रपति ट्रंप व्हाइट हाउस में प्रेसवार्ता के दौरान पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे, उसी दौरान उनके सुरक्षाकर्मी ने उन्हें कुछ कहा और वो प्रेसवार्ता बीच में हो छोड़कर अंदर चले गए।

लेकिन तक़रीबन नौ मिनट के बाद राष्ट्रपति ट्रंप अंदर से बाहर आए और पत्रकारों से कहा, ''लगता है स्थिति नियंत्रण में है।''

ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें लगता है कि अमरीकी सिक्रेट सर्विस के लोगों ने किसी हथियारबंद संदिग्ध पर गोली चलाई है।

उनके मुताबिक़ इस घटना के बाद किसी को अस्पताल ले जाया गया है।

उन्होंने कहा कि ये एक असामान्य स्थिति है लेकिन उन्होंने सिक्रेट सर्विस के लोगों के पेशेवराना तरीक़े से काम करने की तारीफ़ की।

ट्रंप ने कहा, ''व्हाइट हाउस के बाहर गोली चली थी। लगता है कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। लेकिन सचमुच में गोली चली थी और किसी को अस्पताल ले जाया गया है। मैं उस व्यक्ति की हालत के बारे में नहीं जानता।''

उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है कि कोई किसी ग़लत इरादे के साथ आया था, शायद इससे उनका कोई लेना-देना नहीं है।

उन्होंने आगे कहा, ''यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दुनिया ऐसी है, लेकिन दुनिया हमेशा से एक ख़तरनाक जगह रही है। यह कोई अनोखी बात नहीं है।''

उन्होंने कहा कि उस घटना के दौरान उन्हें ब्रीफ़िंग रूम से बाहर निकालकर उनके दफ़्तर तक उन्हें सुरक्षित ले जाया गया था। उनके अनुसार गोली चलने की घटना व्हाइट हाउस के बाहर जो फ़ेंसिंग है वहां पर हुई थी।

वित्त मंत्री के अलावा एक और अधिकारी को वहां से सुरक्षित हटाया गया था।

बेरूत धमाके के बाद लेबनान की सरकार ने इस्तीफ़ा दिया

लेबनान के प्रधानमंत्री हसन दियाब ने बेरूत में गत मंगलवार को हुए धमाके की वजह से अपनी पूरी कैबिनेट के साथ इस्तीफ़ा दे दिया है।

प्रधानमंत्री हसन दियाब ने सोमवार शाम राष्ट्रीय टेलीविज़न पर राष्ट्र के नाम अपने संदेश में ख़ुद इसकी घोषणा की।

हालांकि इससे पहले समाचार एजेंसियों के अनुसार ये ख़बर आ गई थी कि उन्होंने अपना इस्तीफ़ा लेबनान के राष्ट्रपति माइकल आउन को सौंप दिया है और इसकी आधिकारिक घोषणा जल्द ही होने वाली है।

उनके इस्तीफ़ा देने से पहले उनके कई मंत्रियों ने भी अपना इस्तीफ़ा दिया था। हालाँकि, ऐसी माँग उठ रही थीं कि पूरी सरकार ही इस्तीफ़ा दे।

लेबनान की जनता सरकार पर भ्रष्टाचार और अयोग्य होने का आरोप लगा रही थी।

नाराज़ लोग लगातार तीसरे दिन भी प्रदर्शन कर रहे थे और पुलिस के साथ लोगों की झड़प भी हुई।

बरसों से बंदरगाह पर असुरक्षित तरीक़े से रखे हुए 2750 टन अमोनियम नाइट्रेट के विस्फोट कर जाने के कारण धमाका हुआ जिसमें 200 से ज़्यादा लोगों की जान चली गई थी और हज़ारों लोग घायल हुए थे।

राष्ट्रपति ने सरकार से जब तक नई कैबिनेट का गठन नहीं हो जाता है उस वक़्त तक पद पर बने रहने के लिए कहा है।

प्रधानमंत्री हसन दियाब को इसी साल जनवरी में कई महीनों के गतिरोध के बाद प्रधानमंत्री बनाया गया था।

उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने देश को बचाने के लिए बहुत आगे बढ़ कर एक रोडमैप तैयार किया था, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण ऐसा नहीं हो सका।

किसी का नाम लिए बग़ैर प्रधानमंत्री ने कहा, ''लेबनान में भ्रष्टाचार 'राष्ट्र से भी बड़ा है' और एक बहुत ही मज़बूत और कंटीली दीवार बदलाव से हमें अलग करती है। एक ऐसी दीवार जो कि ऐसे वर्ग के ज़रिए चारों तरफ़ से घेर दी गई है जो वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए हर गंदे तरीक़े अपना रहा है।''

उन्होंने आगे कहा कि ''उन लोगों को पता था कि हमलोग उनके लिए ख़तरा हैं और अगर ये सरकार कामयाब होती तो इसका अर्थ था कि लंबे अर्से से सत्ताधारी इस वर्ग में सचमुच बदलाव होता जिसके भ्रष्टाचार ने देश का गला घोंट रखा है।''

उन्होंने अपने संदेश में कहा, ''उस त्रासदी के लिए (जो कि सात साल से छुपी हुई थी) ज़िम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने और असली बदलाव की लोगों की इच्छा का हमलोग आज पालन कर रहे हैं।''

संसद को अब नया प्रधानमंत्री चुनना होगा, जिसमें बीबीसी संवाददाता के अनुसार वहीं संकीर्ण राजनीति की प्रक्रिया अपनाई जाएगी जो कि समस्या की जड़ है।

लेबनान में विभिन्न धार्मिक गुटों की नुमाइंदगी कर रहे लोगों के बीच सत्ता का बंटवारा होता है।

1975 से लेकर 1990 तक चले गृहयुद्ध के कारण कई लड़ाके सरदारों ने राजनीति में क़दम रखा था और अब भी लेबनान के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में उनका काफ़ी दबदबा है।

सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे कई लोग देश में भ्रष्टाचार के लिए इसी सिस्टम को ज़िम्मेदार मानते हैं।

पिछले सप्ताह मंगलवार को लेबनान की राजधानी बेरूत में हुए धमाके में मरने वालों की संख्या बढ़कर 220 हो गई है और बेरूत के गवर्नर मरवान अबूद के अनुसार अभी भी 110 लोग लापता हैं। इनमें से अधिकांश विदेशी कर्मचारी और ट्रक ड्राइवर हैं।

इस धमाके में क़रीब छह हज़ार लोग घायल भी हुए हैं।

इस धमाके के बाद लेबनान में आर्थिक संकट भी गहराता जा रहा है। इस धमाके की वजह लेबनान के राजनीतिक वर्ग में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुशासन को माना जा रहा है, शहर के मुख्य हिस्से में विस्फोटक रखने की वजहों को लेकर भी सवाल पूछा जा रहा है।

इस वजह से बेरूत की सड़कों पर हज़ारों लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। सोमवार को भी लगातार तीसरे दिन प्रदर्शनकारियों और पुलिस में हिंसक झड़प देखने को मिली है।

लेबनान के प्रधानमंत्री बता चुके हैं कि धमाके की वजह बेरूत बंदरगाह पर पिछले छह सालों से रखा गया अमोनियम नाइट्रेट था। बेरूत बंदरगाह पर 2,750 टन अमोनियम नाइट्रेट मौजूद था, जिसमें आग लगने के चलते धमाका हुआ था।

इस धमाके के चलते बेरूत में कम से कम तीन अरब डॉलर के नुक़सान का अंदेशा जताया जा रहा है, लेकिन इस धमाके के असर के चलते पूरे लेबनान की अर्थव्यवस्था को 15 अरब डॉलर का नुक़सान होने की आशंका जताई जा रही है।

लेबनान के संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां भी मानवीय सहायता मुहैया करा रहीं हैं जबकि फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमुएनल मैक्रों के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने लेबनान को 29.7 करोड़ डॉलर की मदद देने का फ़ैसला भी लिया है।

महिंदा राजपक्षे ने चौथी बार श्रीलंका के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली

श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) के 74 वर्षीय नेता महिंदा राजपक्षे ने रविवार को चौथी बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

श्रीलंका की नौवीं संसद के लिए उत्तरी कोलंबो के उप-नगर केलानिया में मौजूद ऐतिहासिक बौद्ध मंदिर 'राजमहा विहार' में शपथ ग्रहण कार्यक्रम आयोजित किया गया।

महिंदा राजपक्षे के छोटे भाई और श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने उन्हें प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। इसके बाद दोनों भाईयों ने साथ में राजमहा विहार में प्रार्थना की।

इस पूरे कार्यक्रम को श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के आधिकारिक फ़ेसबुक पेज से लाइव प्रसारित किया गया। इस अवसर पर पूरा राजपक्षे परिवार राजमहा विहार में मौजूद था।

बीते दो दशक से राजपक्षे परिवार की श्रीलंका की राजनीति पर अच्छी पकड़ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब श्रीलंका की सत्ता पर उनकी पकड़ और मज़बूत हो जाएगी।

उनकी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने श्रीलंका के आम चुनाव में दो-तिहाई बहुमत हासिल कर शानदार जीत दर्ज की है। श्रीलंका में 68 लाख मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया और मतदान प्रतिशत 59.9 रहा था।

माना जा रहा है कि सत्ता पर राजपक्षे परिवार की पकड़ और मजबूत करने को लेकर संविधान संशोधन के लिये यह दो-तिहाई बहुमत महत्वपूर्ण साबित होगा।

स्थानीय मीडिया के अनुसार, सोमवार को श्रीलंका में नए मंत्रिमंडल के सदस्यों का शपथग्रहण कार्यक्रम होगा जिसके बाद राज्य एवं उप-मंत्री शपथग्रहण करेंगे। नव निर्वाचित सरकार ने मंत्रिमंडल में मंत्रियों की संख्या 26 तक सीमित रखने का निर्णय लिया है।

हालांकि 19वें संविधान संशोधन के प्रावधानों के तहत इसे बढ़ाकर 30 किया जा सकता है।

राजपक्षे परिवार के उत्तराधिकारी और महिंदा राजपक्षे के बेटे नमल राजपक्षे को भी पाँच अगस्त को हुए आम चुनाव में हम्बनटोटा से जीत मिली है।

श्रीलंका के संसदीय चुनाव में सबसे बड़ा झटका पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे की यूनाटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) को लगा है जो सिर्फ़ एक सीट ही जीत सकी।

श्रीलंका की सबसे पुरानी पार्टी 22 ज़िलों में एक भी सीट जीत पाने में नाकाम रही है।

चार बार प्रधानमंत्री रहे इसके नेता को 1977 के बाद पहली बार शिकस्त का सामना करना पड़ा है।