उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री री योंग-हो ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पर उनके देश के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का आरोप लगाया है।
योंग-हो ने कहा है कि यूएस बॉम्बर्स को मार गिराने का अधिकार उनके पास है।
उन्होंने कहा कि यूएस बॉम्बर्स को उस हालत में भी मार गिराया जा सकता है, जबकि वो उत्तर कोरिया के वायु क्षेत्र में न हों। दुनिया को 'ये साफ़-साफ़ याद रखना चाहिए' कि युद्ध की घोषणा अमरीका ने पहले की है।
व्हाइट हाउस ने उत्तर कोरिया के इस बयान को बेतुका बताते हुए खारिज कर दिया है।
अमरीकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने उत्तर कोरिया को चेतावनी दी है कि वो उकसाने वाली कार्रवाई बंद कर दे।
वहीं संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने कहा है कि दोनों देशों के बीच चल रही आक्रामक बातचीत से नुक़सानदेह ग़लतफहमियां हो सकती हैं।
उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया था। इसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति ने ट्वीट कर कहा था, ''अभी संयुक्त राष्ट्र में उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री का भाषण सुना। अगर वो भी लिटिल रॉकेट मैन के सुर में सुर मिलाते रहे तो, वो ज़्यादा समय तक टिक नहीं पाएंगे।''
ट्रंप के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए उत्तर कोरिया मंत्री ने कहा, ''बहुत जल्द ही उनका देश इस बात का जवाब दे देगा कि कौन ज़्यादा दिनों तक नहीं बचा रहेगा।''
उत्तर कोरिया मंत्री के बयान के बाद पेंटागन के प्रवक्ता कर्नल रॉबर्ट मैनिंग ने कहा, ''अगर उत्तर कोरिया अपनी आक्रामक गतिविधयां नहीं रोकता है तो आप जानते हैं कि हम सुनिश्चित करेंगे कि राष्ट्रपति के पास उत्तर कोरिया से निबटने के सभी विकल्प मौजूद रहें।''
वहीं संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि इस संकट का समाधान सिर्फ़ कूटनीतिक तरीके से ही हो सकता है।
पिछले कुछ समय से अमरीका और उत्तर कोरिया एक-दूसरे पर जुबानी हमले कर रहे हैं।
हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि तीखी होती जुबानी जंग के बावजूद दोनों देशों के बीच आमने-सामने का संघर्ष होने की संभावना बहुत कम है।
भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव और तमाम पाबंदियों के बावजूद उत्तर कोरिया ने पिछले हफ्तों में बैलेस्टिक मिसाइलों का परीक्षण जारी रखा था।
उत्तर कोरिया के नेताओं का कहना है कि उनके परमाणु हथियार केवल सुरक्षा के लिए हैं और उन ताक़तों के ख़िलाफ़ हैं, जो उसे बर्बाद करने की नीयत रखते हैं।
इसी महीने की शुरुआत में ताक़तवर परमाणु परीक्षण करने के बाद संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ नई पाबंदियों का ऐलान किया था।
इराक़ के कुर्दिस्तान क्षेत्र की आज़ादी के लिए जनमत संग्रह में क्षेत्र के तीन राज्यों के लोगों ने मतदान किया है।
इराक़ की सरकार और कुर्द लोग जिस विवादित क्षेत्र पर दावा करते हैं, वहां भी वोटिंग हुई। इराक़ के प्रधानमंत्री हैदर अल अबादी ने जनमत संग्रह को 'अंसवैधानिक' बताते हुए इसकी निंदा की है।
इराक़ के कुछ पड़ोसी देशों ने भी जनमत संग्रह की आलोचना की है।
कुर्द नेताओं का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि जनमत संग्रह में 'हां' के पक्ष में नतीजे आएंगे और इससे उन्हें अलगाव के लिए लंबी बातचीत का जनादेश मिलेगा।
मध्य पूर्व में कुर्द चौथा सबसे बड़ा जातीय समूह है, लेकिन वो कभी कोई स्थायी राष्ट्र हासिल नहीं कर सके हैं।
इराक़ की कुल आबादी में कुर्दों की हिस्सेदारी 15 से 20 फीसदी के बीच है। साल 1991 में स्वायत्तता हासिल करने के पहले उन्हें दशकों तक दमन का सामना करना पड़ा।
कुर्दों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सोमवार को 18 से अधिक उम्र वाले करीब 52 लाख कुर्द और गैर कुर्द लोगों के लिए मतदान शुरु हुआ। कुर्दिस्तान की रुडॉ समाचार एजेंसी के मुताबिक, मतदान बंद होने के करीब एक घंटे पहले 76 फीसदी लोग वोट डाल चुके थे।
इरबिल में वोटिंग के लिए लाइन में लगे एक व्यक्ति ने समाचार एजेंसी रायटर्स से कहा, ''हम सौ सालों से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे। ईश्वर की मदद से हम एक राज्य चाहते हैं। आज सभी कुर्दों के लिए जश्न का दिन है।''
हालांकि इसकी उम्मीद नहीं है कि सभी कुर्दों ने 'हां' के पक्ष में मतदान किया हो।
द चेंज मूवमेंट (गोरान) और कुर्दिस्तान इस्लामिक ग्रुप पार्टीज़ ने कहा कि वो आज़ादी का समर्थन करते हैं, लेकिन उन्हें जनमत संग्रह आयोजित करने के समय पर आपत्ति है।
अलगाव के आर्थिक और राजनीतिक जोखिमों की वजह से व्यापारी शसवार अब्दुलवाहिद क़ादिर ने 'नोफॉरनाऊ' अभियान चलाया।
विवादित शहर किरकुक में स्थानीय अरब और तुर्क समुदाय ने बहिष्कार का ऐलान किया। सोमवार रात मतदान ख़त्म होने के बाद अशांति की आशंका में गैर कुर्द ज़िलों में कर्फ्यू लगा दिया गया।
इराक़ के प्रधानमंत्री हैदर अल अबादी ने रविवार को चेतावनी दी थी कि जनमत संग्रह 'इराक की शांति और इराक के लोगों के सहअस्तित्व को जोखिम में डालेगा और ये क्षेत्र के लिए ख़तरा है।''
उन्होंने कहा कि वो 'देश की एकता और सभी इराकियों को सुरक्षित रखने के लिए कदम उठाएंगे।'
अबादी सरकार ने कहा है कि कुर्दिस्तान क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे और सीमा पार करने वाली चौकियां उनके नियंत्रण में आनी चाहिए। अबादी सरकार ने सभी देशों से कहा है कि वो 'तेल और सीमा के मुद्दों पर सिर्फ उनके साथ संपर्क करें।'
तुर्की और ईरान जैसे पड़ोसी देशों ने भी जनमत संग्रह पर जोरदार आपत्ति जाहिर की। उन्हें आशंका है कि इससे उनके देश के कुर्द अल्पसंख्यकों के बीच भी अलगाव की भावना पैदा हो सकती है।
चीन के साथ चल रहे संयुक्त अभ्यास के बीच, पाकिस्तान ने कहा कि उसने शनिवार को उत्तरी अरब सागर में सी किंग हेलीकॉप्टर से एंटी शिप मिसाइल का सफल परीक्षण किया।
एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि एंटी शिप मिसाइल ने अपने लक्ष्य को सफलतापूर्वक भेद दिया।
पाकिस्तानी नौसेना के प्रवक्ता के मुताबिक, नौसेना प्रमुख एडमिरल मुहम्मद जकाउल्ला इस मिसाइल परीक्षण के गवाह बने और उन्होंने कहा कि सफल परीक्षण पाकिस्तानी नौसेना की युद्धक तैयारी और पेशेवर क्षमता का एक प्रमाण है।
नौसेना प्रमुख ने समुद्र में तैनात नौसेना की इकाइयों का भी दौरा किया और नौसेना के बेड़े से जुड़े अभ्यास देखे।
जकाउल्ला ने कहा, ''मुझे पाकिस्तानी नौसेना के बेड़े की युद्धक तैयारी देखकर गर्व है।''
उन्होंने कहा कि नौसेना किसी भी कीमत पर समुद्री सीमाओं और पाकिस्तान के हितों की रक्षा करेगी।
चीनी और पाकिस्तानी वायुसेना के पायलटों ने उसी विमान में बैठकर मिसाइल का परीक्षण किया, जिसमें एक दिन पहले ही दोनों ने संयुक्त अभ्यास किया था।
सिन्हुआ ने कहा कि यह दो सेनाओं के बीच गहरे पारस्परिक विश्वास का प्रतीक है। 'शाहीन छह' नामक संयुक्त अभ्यास के दौरान, वायुसेना कर्मियों ने रणनीति तैयार करने और उन्हें क्रियान्वित करने में सहयोग किया, और साथ ही एक-दूसरे से सामरिक सिद्धांतों और रणनीति की सीख ली।
इससे पहले मार्च में, नौसेना ने एंटी शिप मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। यह परीक्षण तटीय क्षेत्र से किया गया था और मिसाइल ने समुद्र में एक लक्ष्य को भेदा था।
पाकिस्तानी नौसेना ने मई में ब्रिटेन से बहु-भूमिका वाले सात अतिरिक्त वेस्टलैंड सी किंग हेलीकाप्टर प्राप्त किए थे, जिनका ठेका 2016 में दिया गया था।
भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में फंसे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके परिवार की संपत्ति को जब्त कर लिया गया है।
पाकिस्तान की शीर्ष भ्रष्टाचार निरोधी संस्था ने आज (22 सितंबर को) कार्रवाई करते हुए उनकी और परिवार की संपत्ति जब्त की है। 67 साल के शरीफ को पिछले 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने पनामा पेपर केस में दोषी ठहराते हुए पीएम पद से बर्खास्त कर दिया था और शरीफ और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार का केस चलाने का आदेश दिया था।
शरीफ के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले की सुनवाई करने वाले पाकिस्तान के उत्तरदायित्व न्यायालय ने आज सुनवाई करते हुए शरीफ, उनकी बेटी मरियम और दामाद कप्तान (सेवानिवृत्त) सफदर को 26 सितंबर को पेश होने के लिए बुलाया है।
नेशनल अकाउंटबिलिटी ब्यूरो के अधिकारियों ने शरीफ के रायविन्ड स्थित घर पर पहुंचकर कोर्ट का समन और अटैचमेंट ऑर्डर दिखाया और शरीफ परिवार की संपत्ति सीज कर ली।
बता दें कि नवाज शरीफ अपने बच्चों के साथ इन दिनों लंदन में हैं, जहां उनकी पत्नी कुलसुम का इलाज चल रहा है।
पाकिस्तान में इस बात की भी चर्चा है कि शायद नवाज शरीफ और उनका परिवार भ्रष्टाचार से जुड़े मुकदमों की पैरवी के लिए पाकिस्तान वापस ना आए।
हालांकि, सत्तारूढ़ पीएमएल (एन) का कहना है कि जब शरीफ की पत्नी की तबीयत थोड़ी ठीक हो जाएगी, तब शरीफ वतन वापस लौटेंगे।
इधर नेशनल अकाउंटबिलिटी ब्यूरो के अधिकारियों ने स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान और अन्य कॉमर्शियल बैंकों को पत्र लिखकर नवाज शरीफ और उनके परिवार के बैंक खातों पर नजर रखने को कहा है।
अंतर्राष्ट्रीय पीपुल्स ट्रिब्यूनल ने रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ नरसंहार के लिए म्यांमार को शुक्रवार को दोषी ठहराया और कहा कि म्यांमार की सेना द्वारा 'सुनियोजित तरीके से नागरिकों को निशाना बनाने' को और उनके दूसरे कृत्यों को युद्ध अपराध माना जाना चाहिए।
रोहिंग्या के खिलाफ राज्य में हो रहे कथित अत्याचार व अपराध पर सुनवाई कर रही परमानेंट पीपुल्स ट्रिब्यूनल (पीपीटी) की सात सदस्यीय पीठ ने कहा कि म्यांमार सेना 'आधिकारिक कर्तव्यों के संदर्भ' में अपराध कर रही है।
ट्रिब्यूनल के फैसले में कहा गया है, ''प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर ट्रिब्यूनल सहमति से इस फैसले पर पहुंचा है कि म्यांमार का रोहिंग्या लोगों और दूसरे मुस्लिम समूहों के नरसंहार का इरादा है। म्यांमार रोहिंग्या समूह के खिलाफ हो रहे नरसंहार का दोषी है। इसके अलावा रोहिंग्या के खिलाफ नरसंहार जारी है और इसे रोका नहीं गया तो भविष्य में नरसंहार के हताहतों की संख्या ज्यादा हो सकती है।''
पीपीटी ने कुआलालंपुर में यह सुनवाई ऐसे समय में आयोजित की और म्यांमार के पीड़ितों को सुना है, जब अपने देश में हो रहे उत्पीड़न से बचने के लिए लाखों रोहिंग्या मुस्लिम पलायन कर गए हैं।
पलायन कर चुके रोहिंग्या मुसलमानों के बयानों को 18 सितंबर से 22 सितंबर तक मलाया विश्वविद्यालय के कानून संकाय में दर्ज किया गया। इसके लिए कानून संकाय में अदालत जैसी व्यवस्था की गई थी।
रोम आधारित पीपीटी ट्रिब्यूनल का मकसद रोहिंग्या के खिलाफ कथित अमानवीय व्यवहार को उजागर करना और उनके खिलाफ अपराध को रोकना है।
ट्रिब्यूनल के फैसले को खास तौर से संयुक्त राष्ट्र सहित अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को भेजा जाएगा, जिससे म्यांमार में हिंसा खत्म करने के लिए आगे के कदम उठाए जाएं।
मेक्सिको की राजधानी मेक्सिको सिटी में आए शक्तिशाली भूकंप में 200 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई है और दर्जनों इमारतें जमींदोज़ हो गई हैं।
राहतकर्मी मलबों में जीवित बचे लोगों की तलाश का अभियान चला रहे हैं और अधिकारियों का कहना है कि मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है।
मेक्सिको सिटी के एक स्कूल के बारे में माना जा रहा है कि वहां बच्चे फंसे हो सकते हैं। बड़े पैमाने पर वॉलेंटियर्स आपातकालीन सेवाओं के लिए तैनात हैं।
मेक्सिको के राष्ट्रपति ने टीवी पर दिए एक संदेश में कहा कि सेना बुलाई गई है और बचाव और राहत कार्य रात में भी जारी रखा जाएगा।
रिक्टर पैमाने पर 7.1 की तीव्रता वाले भूकंप ने मेक्सिको सिटी, मोरलियोस और पुएब्ला प्रांतों में भारी तबाही मचाई है।
मेक्सिको में 32 साल पहले ठीक इसी तारीख को एक तबाही वाला भूकंप आया था जिसमें 10,000 लोग मारे गए थे।
मंगलवार को मेक्सिको सिटी में लोग भूकंप के समय बचाव कैसे किया जाए। उसका ड्रिल कर रहे थे। तभी ये तबाही हुई।
मेक्सिको सिटी के एयरपोर्ट पर थोड़ी देर के लिए विमान यातायात रोक दिया गया था और पूरे शहर की इमारतें खाली करवा ली गई थीं।
मेक्सिको में भूकंप की संभावना हमेशा रहती है।
इसी महीने रिक्टर पैमाने पर 8.1 की तीव्रता का भूकंप देश के दक्षिणी हिस्से में आया था जिसमें कम से कम 90 लोगों की मौत हो गई थी।
मंगलवार के भूकंप का केंद्र पुएब्ला प्रांत के एटेंसिगो के करीब था।
ये इलाका मेक्सिको सिटी से 120 किलोमीटर की दूरी है। अमरीकी जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक, भूकंप की गहराई 51 किलोमीटर थी।
अकेले मोरलियोस राज्य में 54 लोग मारे गए हैं और पुएब्लो में 26 लोगों के मारे जाने की ख़बर है।
मेक्सिको सिटी में 30 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, जबकि मेक्सिको प्रांत में नौ लोगों की मौत हुई है।
भूकंप स्थानीय समय के अनुसार एक बजकर 14 मिनट पर आया।
मेक्सिको के राष्ट्रपति एनरिक पेना निएटो ने लोगों से अपील की है कि वो सड़कों पर न रुकें ताकि इमरजेंसी सेवाएं आसानी से प्रभावित इलाकों में पहुंच सकें।
राजधानी के कई इलाकों में फ़ोन सेवा बाधित है और क़रीब 40 लाख लोग बिना बिजली के हैं।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ट्वीट किया है, ''ईश्वर मेक्सिको सिटी के लोगों का ख़्याल रखें। हम आपके साथ हैं और हमेशा साथ रहेंगे।''
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मंगलवार को पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन को संबोधित किया। इस संबोधन को ट्रंप काल में अमरीका की विदेश नीति की झलक के तौर पर देखा जा रहा था।
ट्रंप ने साझा हितों में गठजोड़ की बात तो कही, लेकिन विदेशी ज़मीनों पर राष्ट्र-निर्माण के काम से अमरीका के अलग होने की ओर बढ़ने के संकेत भी दिए।
आठ महीने पहले अमरीका के राष्ट्रपति पद की कुर्सी संभालने वाले ट्रंप ने 193 सदस्य देशों वाले संयुक्त राष्ट्र के सालाना अधिवेशन में परमाणु सक्षम अस्थिर देशों के ख़तरे के प्रति विश्व नेताओं को सचेत किया और उत्तर कोरिया को सख़्त शब्दों में धमकी दी, लेकिन ट्रम्प ने म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा।
ट्रंप के संबोधन की अहम बातें ये हैं:
'उत्तर कोरिया को ट्रम्प की धमकी'
- अमरीका के पास बड़ी ताक़त और बड़ा धैर्य है, लेकिन वह अपनी और अपने सहयोगियों की रक्षा के लिए मजबूर है। हमारे पास उत्तर कोरिया को पूरी तरह तबाह करने के सिवा कोई विकल्प नहीं होगा।
- रॉकेट मैन अपने और अपने देश के लिए ख़ुदकुशी के मिशन पर है। अमरीका तैयार, सक्षम और तत्पर है, पर उम्मीद है कि उसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
- उत्तर कोरिया पर पाबंदी के प्रस्ताव के समर्थन के लिए चीन और रूस को धन्यवाद, लेकिन इससे भी कहीं ज़्यादा करने की ज़रूरत है।
- हमारी धरती का एक बड़ा संकट कुछ अस्थिर देशों का एक छोटा समूह है- जो हर उस सिद्धांत का उल्लंघन करता है जिस पर संयुक्त राष्ट्र की बुनियाद है। वे न अपने नागरिकों का सम्मान करते हैं और न ही दूसरे देशों की संप्रभुता का।
'अमरीका का हित सबसे ऊपर'
- आतंकियों और चरमपंथियों ने ताक़त जुटा ली है और वे पूरी धरती पर फैल गए हैं।
- अमरीका हमेशा पूरी दुनिया का, ख़ास तौर से अपने सहयोगियों का अच्छा मित्र रहेगा, लेकिन अब हमारा और फायदा नहीं उठाया जा सकता या हमें एकतरफ़ा समझौतों में नहीं धकेला जा सकता, जहां हमें रिटर्न में कुछ नहीं मिलता।
- जब तक मैं इस पद पर हूं, मैं अमरीका के हित को सबसे ऊपर रखूंगा।
'ईरान समझौता शर्मिंदगी की वजह बना'
- ईरान से 2015 में हुआ परमाणु समझौता अमरीका के लिए शर्मिंदगी है। ईरान हिंसा निर्यात करने वाला आर्थिक तौर पर जर्जर और अस्थिर देश है।
- अमरीका अपनी इच्छा दूसरे देशों पर नहीं थोपना चाहता और उनकी संप्रभुता का सम्मान करना चाहता है।
- मुझे ताक़त अपने पास रखने के लिए नहीं, बल्कि अमरीकी लोगों को ताक़त देने के लिए चुना गया है।
- राष्ट्रपति के तौर पर मैं हमेशा अमरीका को पहले रखूंगा। जैसे आप लोगों को भी अपने देश को सबसे पहले रखना चाहिए।
'वेनेज़ुएला में कार्रवाई के लिए तैयार'
- लोगों की ज़िंदग़ियां सुधारने के लिए राष्ट्र राज्य आज भी सबसे अच्छा ज़रिया है।
- यूक्रेन से लेकर दक्षिण चीन सागर तक हमें संप्रभुता पर आने वाली चुनौतियों को ख़ारिज़ करना होगा।
- सीरिया में हम तनाव की स्थिति दूर करना चाहते हैं और एक ऐसे राजनीतिक हल पर पहुंचना चाहते है, जिसमें सीरियाई लोगों का सम्मान हो।
- वेनेज़ुएला की सरकार अगर अपने देशवासियों का दमन करती रही तो अमरीका आगे की कार्रवाई के लिए तैयार है। वहां लोकतंत्र की पूरी तरह बहाली और राजनीतिक आज़ादी होनी चाहिए।
- कुछ देश नरक में जा रहे हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र इनमें से कुछ भयावह स्थितियों से उबरने में मदद कर सकता है।
- अमरीका संयुक्त राष्ट्र की फंडिंग का नाजायज़ बोझ उठाता है।
रोहिंग्या संकट के बीच म्यांमार की नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में न शामिल होने का फैसला लिया। हालांकि, इसी दिन उन्होंने म्यांमार में ही अपने देशवासियों को संबोधित किया।
आख़िर क्या वजह रही कि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और लोकतंत्र समर्थक के तौर पर विख्यात रहीं आंग सान सू ची संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस अधिवेशन में नहीं पहुंचीं?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार पुष्पेश पंत ने बीबीसी से कहा कि आंग सान सू ची के इस अधिवेशन में न जाने की वजह साफ है। उन्हें लगता है कि वहां उन्हें वे सारे राष्ट्र घेरने की कोशिश करेंगे जो रोहिंग्या मसले पर मानवीय मूल्यों के संरक्षक हैं और चूंकि वह नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं तो निश्चय ही उनके लिए यह स्थिति असमंजस की होगी।
पुष्पेश पंत ने संयुक्त राष्ट्र संघ पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर आंग सान सू ची उस अधिवेशन में नहीं गईं तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट गया? आज संयुक्त राष्ट्र संघ क्या एक ऐसी संस्था है, जिसकी कोई सार्थकता या महत्व - सामरिक या किसी और तरह की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में है?
पुष्पेश पंत ने कहा, ''इस संस्था का 98 फीसदी बजट इसके अपने कर्मचारियों के पेंशन और भत्तों आदि पर ख़र्च होता है। सिवाय इसके कि सुरक्षा परिषद में कुछ निरर्थक चर्चाएं होती हैं और प्रस्ताव पारित होते हैं। वहां जाने न जाने से क्या फर्क पड़ता है, मुझे समझ नहीं आता।''
आगे पुष्पेश पंत ने कहा कि 40-42 बरस अंतरराष्ट्रीय संबंध पढ़ाने और पढ़ने के बाद मैंने ये पाया है कि युद्ध के बाद विजेताओं ने जिस मक़सद से संयुक्त राष्ट्र का गठन किया था, उसकी संरचनात्मक कमज़ोरियां इतनी विकट हैं कि आज के संसार में उसकी कोई सार्थकता रह नहीं गई है।
पुष्पेश पंत ने कहते हैं, ''अमरीका ने जो संयुक्त राष्ट्र में नौकरशाही को सरल करके ख़र्च में कटौती की बात कही है, वो मुझे लगता है कि बहुत सार्थक सुझाव है। मगर क्या अमरीका यह कर सकता है। अमरीका निश्चित तौर से संयुक्त राष्ट्र के बजट का सबसे बड़ा दाता है।''
प्रोफेसर पुष्पेश पंत ने कहा, ''वैसे संयुक्त राष्ट्र में सुधार के सुझाव पहली बार नहीं आए हैं। मुझे याद है जब मैं लड़कपन में था तो ख्रुश्चेव ने 'ट्रॉयका' वाला एक सुझाव दिया था कि तीन घोड़े गाड़ी को अलग-अलग दिशाओं में खींचेंगे। मगर मुझे लगता है कि तब से अब तक 60 वर्ष बीत गए हैं, पर कहीं कोई अंतर तो पड़ा नहीं है। मेरे ख़्याल में वहां आंग सान सू ची का न जाना समझ में आता है, लेकिन उसके पक्ष में पेश करने के लिए मैं यह बात नहीं कह रहा हूं।''
पुष्पेश पंत ने सवाल उठाते हुए कहा, ''जो कार्रवाई अभी आंग सान सू ची से अपेक्षित है, वो वह नहीं करतीं तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास क्या विकल्प है? सारे आर्थिक प्रतिबंध लगाने के बाद जब आप उत्तर कोरिया को नहीं रोक पाए तो आप क्या सू ची का क्या बिगाड़ लेंगे? क्या आप उनके ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबंध लगाएंगे? क्या मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सैनिक हस्तक्षेप की बात कहेंगे?
पश्चिमी देशों की आलोचना करते हुआ प्रोफेसर पुष्पेश पंत कहते हैं, इन्हीं सू ची का पश्चिम ने मानवाधिकारों की रक्षिका के रूप में महिमामंडन किया था। आज भस्मासुर की तरह उन्हीं के गले पड़ गया है।
पुष्पेश पंत कहते हैं, रोहिंग्या समस्या मानवीय और मार्मिक तो है, मगर ये इतनी सीधी और सरल नहीं है। भारत में जिस तरह इसे हिंदुत्व, मुसलमानों और धर्मनिरपेक्षता की नीति के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। ये कौन सा शरणार्थियों को शरण देने का तर्क है कि वो बड़ी संख्या में प्रवेश भी करेंगे और वो उन जगहों पर रहेंगे, जहां वे रहना चाहते हैं। यह बात समझ में नहीं आती कि जम्मू-कश्मीर राज्य में वह कैसे पहुंच जाते हैं?
पुष्पेश पंत कहते हैं, ''रोहिंग्या मासूम हो सकते हैं, निर्दोष हो सकते हैं। मगर रोहिंग्याओं को राज्यविहीन व्यक्ति आंग सान सू ची ने नहीं बनाया है। इसका इतिहास 50-60 साल पुराना है। मेरा ख़्याल है कि आंग सान सू ची को ज़रूरत से ज़्यादा दोष देना निरर्थक है।''
पिछले हफ़्ते जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे के भारत दौरे को विदेशी मीडिया ने काफी तवज़्ज़ो दिया। इस दौरे को लेकर चीनी मीडिया में भी काफ़ी हलचल रही।
चीनी मीडिया ने इस दौरे को शक के नज़रिए से देखा। हालांकि यह भी कहा कि चीन को इस दोस्ती से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। दूसरी तरफ़ चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और चीन के सीमा विवाद में किसी तीसरे पक्ष को नहीं आना चाहिए।
ग्लोबल टाइम्स चीन की सत्ताधारी कॉम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र है। कहा जाता है कि यह अख़बार चीन के रुख को ही सामने रखता है।
सोमवार को ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे पिछले चार सालों में तीन बार भारत के दौरे पर जा चुके हैं।
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''नंवबर 2016 में भारत और जापान में असैन्य परमाणु करार हुआ है. अबे का भारत दौरा इसलिए भी महत्वूर्ण था. जापान ने जानबूझकर भारत के साथ यह क़रार किया, जबकि उसे पता है कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है।''
''अबे ने भारत को यूएस-2 ऐम्फिबीअन एयरक्राफ्ट देने को भी मंजूरी दे दी है। यह भारत के साथ सबसे अहम सुरक्षा समझौता है। भारत जापान से विकास कार्यों में सबसे ज़्यादा मदद पाने वाला देश बन गया है।''
ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा है, ''भारत औऱ जापान के नेताओं की हर मुलाक़ात में चीन प्राथमिकता के स्तर पर आता है। भारतीय मीडिया में इस यात्रा को डोकलाम विवाद के कारण काफ़ी तवज्जो मिली। भारत को जापान जिस तरह से चीन के ख़िलाफ़ भ्रमित कर रहा है, उसे लेकर सतर्क रहना चाहिए।''
अख़बार ने लिखा है, ''चीन के मसले पर भारत से जापान फ़ायदा उठा रहा है। इसी साल मई महीने में अमरीका और जापान चीन के वन बेल्ट वन रोड में शामिल हुए थे, जबकि भारत ने इसका बहिष्कार किया था। भारत इसे मिसाल के तौर पर देख सकता है कि जिसका उसने बहिष्कार किया, उसमें जापान शरीक हुआ।
वहीं फ़ोर्ब्स ने लिखा है कि हिन्द महासागर के ट्रेड रूट्स में चीन के फैलाव को देखते हुए भारत और जापान अब साथ आए हैं।
हालाँकि फ़ोर्ब्स ने लिखा है कि हिन्द महासागर में चीन के विस्तार को भारत और जापान के नए मिशन से रोकना आसान नहीं है।
फोर्ब्स ने लिखा है कि दोनों देशों ने काफ़ी देरी कर दी है और पर्याप्त संसाधन भी नहीं हैं।
फ़ोर्ब्स ने लिखा है, ''जापान भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर और उसकी परमाणु क्षमता को दुरुस्त करने में मदद कर रहा है। दोनों देश हिन्द महासागर में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास करने जा रहे हैं। इससे पहले दोनों देशों ने पिछले साल बंगाल की खाड़ी में नौसैनिक अभ्यास किया था।''
''हिन्द महासागर हमेशा से अफ़्रीका और मध्य पूर्व के साथ अन्य एशियाई देशों से व्यापार के लिए रणनीतिक जलक्षेत्र रहा है। हाल के वर्षों में चीन ने यहां अपना व्यापक पैमाने पर पांव फैलाया है।''
फ़ोर्ब्स ने आगे लिखा है, ''हिन्द महासागर में बिना मजबूत मौजूदगी के चीन साउथ चाइना सी में भी अपना प्रभुत्व नहीं जमा सकता है। इसका कारण यह है कि स्ट्रेट ऑफ मलाका एक ब्लॉकेड है। अमरीका और उसके सहयोगी मध्य-पूर्व से चीन की तेल आपूर्ति को बंद कर सकते हैं। इसके साथ ही चीन को अफ़्रीका से भी अलग किया जा सकता है।''
हालांकि फ़ोर्ब्स का कहना है कि भारत और जापान ने काफ़ी देरी कर दी है। चीन ने पहले ही श्रीलंका में हम्बनटोटा पोर्ट को हासिल कर लिया है। अब यह पोर्ट 99 सालों तक चीन के कब्ज़े में होगा। इसके साथ ही चीन मध्य-पूर्व और अफ़्रीका से जुड़ने के लिए पाकिस्तान के रास्ते इकनॉमिक कॉरिडोर बना रहा है।
फ़ोर्ब्स ने अपनी एक और रिपोर्ट में लिखा है कि भारत और जापान की दोस्ती चीन को परेशान कर रही है।
फ़ोर्ब्स ने लिखा है, ''हाल ही में डोकलाम में भारत और चीन की सेना आमने-सामने थी। चीन वहां सड़क बना रहा था और भारत ने उसे रोक दिया। 73 दिनों तक दोनों देशों की सेना 120 मीटर की दूरी पर आमने-सामने थी। अब भी यहां दोनों देशों के सैनिक 150 मीटर की दूरी पर आमने-सामने हैं।''
टाइम मैगज़ीन ने भी शिंज़ो अबे के भारत दौरे को काफ़ी तवज्जो दी है। टाइम ने लिखा है कि मोदी और अबे में अनौपचारिक संबंध को महसूस किया जा सकता है।
टाइम ने लिखा है, ''जापान और भारत एशिया में दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। दोनों के बीच व्यापार अब भी छोटा है। 2013 में दोनों देशों के बीच व्यापार 15.8 अरब डॉलर का था जो कि चीन और भारत के व्यापार का मुश्किल से एक तिहाई है।''
''जापान का भारत में 2007 से 2013 के बीच सीधा निवेश 15.8 अरब डॉलर पहुंच गया है। भारत में निवेश करने के मामले में जापान एक बड़ा निवेशक बनकर सामने आया है। हालांकि अब भी वियतनाम और इंडोनेशिया में जापान का निवेश भारत के मुकाबले ज़्यादा है।''
टाइम ने लिखा है कि हो सकता है कि यह तस्वीर भविष्य में बदल जाए।
टाइम ने लिखा है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की सैन्य ताक़त को जापान की मदद से बढ़ाना चाहते हैं।
जम्मू और कश्मीर में दो जल विद्युत परियोजनाओं के डिजायन पर जारी गतिरोध को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच वाशिंगटन में चली दो दिनों की बातचीत में कोई हल नहीं निकल पाया।
विश्व बैंक के तत्वावधान में 1960 के सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अंर्तगत किशनगंगा और रैटल जल विद्युत संयंत्र के तकनीकी मुद्दों को लेकर यहां 14-15 सितंबर को हुई सचिव स्तर की बातचीत असफल रही।
भारत और पाकिस्तान के बीच हुई संधि में विश्व बैंक भी एक हस्ताक्षरकर्ता है। विश्व बैंक ने कहा है कि वह दोनों देशों को शांतिपूर्ण ढंग से मुद्दों को सुलझाने में सहयोग देना जारी रखेगा।
विश्व बैंक ने एक बयान में कहा, ''हालांकि इस बैठक में कोई समझौता नहीं हो पाया। लेकिन विश्व बैंक दोनों देशों के साथ मिलकर इस मुद्दे के समाधान के लिए संगत तरीके से और संधि के प्रावधानों के अनुरूप काम करता रहेगा।''
इस बैठक में भारतीय पक्ष में जल संसाधन सचिव अमरजीत सिंह और विदेश मंत्रालय के पाकिस्तान डेस्क के प्रभारी संयुक्त सचिव दीपक मित्तल शामिल हुए। वहीं, पाकिस्तानी दल में जल संसाधन खंड के सचिव आरिफ अहमद खान के साथ जल और बिजली सचिव युसूफ नसीम खोखर शामिल हुए।
पाकिस्तान का भारत पर आरोप है कि उसके जलविद्युत संयंत्रों का डिजायन सिंधु जल समझौते का उल्लंघन करता है।
संधि के तहत आने वाली मौजूदा प्रक्रियाएं किशनगंगा (330 मेगावाट) और राटले (850 मेगावाट) पनबिजली संयंत्र से जुड़ी हैं। भारत इन संयंत्रों का निर्माण किशनगंगा और चेनाब नदियों पर कर रहा है। इनमें से किसी भी संयंत्र का वित्त पोषण विश्व बैंक नहीं कर रहा है।
विश्व बैंक ने कहा कि सिंधु जल संधि, 1960 को सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय संधियों में से एक संधि के रूप में देखा जाता है। यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के बावजूद भी बनी रही है।
सिंधु जल संधि में मध्यस्थता करने वाले विश्व बैंक ने सितंबर में कहा था कि भारत और पाकिस्तान ने उससे संपर्क किया था और वह संधि में तय अपनी सीमित और प्रक्रियात्मक भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया दे रहा है।
विश्व बैंक ने कहा था, ''भारत और पाकिस्तान ने विश्व बैंक को सूचित किया है कि दोनों ने ही सिंधु जल संधि 1960 से जुड़ी कार्यवाहियां शुरू कर दी हैं और विश्व बैंक समूह संधि में तय अपनी सीमित और प्रक्रियात्मक भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया दे रहा है।''
यह संधि दोनों देशों के बीच नदियों के इस्तेमाल के संदर्भ में सहयोग एवं सूचना के आदान-प्रदान की प्रणाली तय करती है। इसे स्थायी सिंधु आयोग कहा जाता है और इसमें दोनों देशों से एक एक आयुक्त शामिल रहता है।
यह पक्षों के बीच पैदा हो सकने वाले कथित सवालों, मतभेदों और विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया भी तय करता है।









