आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत के अभियान को एक बड़ी जीत उस वक्त मिली, जब सोमवार को ब्रिक्स देशों ने लश्कर-ए-तैयबा (एल ई टी) और जैश-ए-मोहम्मद (जे ई एम) जैसे पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों का नाम अपने घोषणापत्र में शामिल किया और इनसे तथा इनके जैसे तमाम आतंकवादी संगठनों से निपटने के लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।
ऐसा कहा जाता है कि गोवा में बीते साल हुए आठवें ब्रिक्स सम्मेलन में चीन ने घोषणापत्र में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों को शामिल करने का विरोध किया था।
शियामेन घोषणापत्र में कहा गया है, ''हम क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति पर और तालिबान, इस्लामिक स्टेट (आई एस), अलकायदा और इससे संबद्ध संगठन ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, टी टी पी और हिज्बुल-तहरीर द्वारा की गई हिंसा पर चिंता व्यक्त करते हैं।''
इस सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ब्राजील के राष्ट्रपति मिशेल टेमर और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने शिरकत की।
जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर को भारतीय सेना के प्रतिष्ठानों पर घातक सीमा पार हमलों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। भारत ने अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का रुख किया था, लेकिन चीन ने बार-बार इस प्रस्ताव की राह में रोड़ा अटकाया है। 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के लिए लश्कर-ए-तैयबा जिम्मेदार है। इसमें 166 भारतीयों और विदेशी नागरिकों की मौत हो गई थी।
शियामेन घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों सहित दुनिया भर में हुए सभी आतंकवादी हमलों की निंदा की गई है। घोषणापत्र में कहा गया, ''आतंकवाद की सभी रूपों में निंदा की जाती है। आतंकवाद के किसी भी कृत्य का कोई औचित्य नहीं है।''
पाकिस्तान का नाम लिए बगैर घोषणापत्र में कहा गया है, 'हम इस मत की पुष्टि करते हैं कि जो कोई भी आतंकी कृत्य करता है या उसका समर्थन करता है या इसमें मददगार होता है, उसे इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।''
ब्रिक्स देशों का कहना है कि आतंकवाद करने वाले और इसमें सहयोग देने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
घोषणापत्र में आतकंवाद को रोकने और इससे निपटने के लिए देशों की प्राथमिक भूमिका और जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए जोर दिया गया कि देशों की संप्रभुता और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने का सम्मान करते हुए आतंक के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की जरूरत है।
घोषणापत्र में कहा गया है, ''हम आतंकवादी हमलों की निंदा करते हैं, जिस वजह से निर्दोष अफगान नागरिकों की मौत हुई है। इस हिंसा को तत्काल खत्म करने की जरूरत है। हम अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के तहत अफगानिस्तान में शांति की बहाली और राष्ट्रीय सुलह के लिए लोगों को सहयोग देने की प्रतिबद्धता जताते है। हम आतंकवादी संगठनों से निपटने के लिए अफगान सुरक्षाबलों के प्रयासों का समर्थन करते हैं।''
घोषणापत्र में कहा गया, ''हम सभी देशों से आतंकवाद से निपटने, कट्टरपंथ का खात्मा करने, आतंकवादी संगठनों में भर्तियों (विदेशी लड़ाकों सहित) को रोकने, आतंकवाद का वित्तपोषण बंद करने के लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान करते हैं। इनमें धनशोधन, हथियारों की आपूर्ति, नशीले पदार्थो की तस्करी और अन्य आपराधिक गतिविधियां रोकने, आतंकवादी अड्डों को ध्वस्त करना, आतंकवादियों द्वारा नवीनतम सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियों के जरिए सोशल मीडिया सहित इंटरनेट का दुरुपयोग रोकना शामिल हैं।''
घोषणापत्र में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से व्यापक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी गठबंधन की स्थापना करने और इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की समन्वयक की भूमिका के लिए समर्थन जताने का आह्वान किया गया है।
घोषणापत्र में कहा गया है, ''हम जोर देकर कहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार होनी चाहिए। इसमें संयुक्त राष्ट्र का घोषणापत्र, अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी और मानवीय कानून, मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रता भी शामिल हैं।''
इसके मुताबिक, ''हम संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि (सी सी आई टी) को अंतिम रूप देने और इसे पेश करने का आह्वान करते हैं।''
उत्तर कोरिया ने मंगलवार को जापान के ऊपर से मिसाइल दागकर इलाके में तनाव बढ़ा दिया है। यह मिसाइल जापान के होक्काइदो द्वीप के प्रशांत सागर में जा गिरी।
जापान के चीफ कैबिनेट सेकेट्ररी योशीहिदे सुगा ने बताया कि उत्तर कोरिया के पश्चिमी तट से सुबह लगभग 5.58 बजे मिसाइल परीक्षण किया और मिसाइल ने होक्काइदो के केप एरिमो को सुबह लगभग 6.06 बजे पार किया।
उत्तर कोरिया ने अपने आक्रामक रवैये से अमेरिका और उसके करीबी सहयोगी को स्पष्ट कर दिया है कि वॉर गेम में वह पीछे नहीं हटेगा।
समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने योशीहिदे सुगा के हवाले से बताया कि मिसाइल ने 2,700 किलोमीटर का सफर तय किया और सुबह लगभग 6.12 बजे प्रशांत सागर में जा गिरीं।
योशीहिदे सुगा ने बताया कि यह भी संभव है कि मिसाइल तीन हिस्सों में टूटकर जापान सागर में जा गिरी। जापान सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए है।
जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने कहा कि इस मिसाइल परीक्षण से क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को खतरा है और जापान इसका पुरजोर विरोध करता है।
उन्होंने कहा कि जापान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक की मांग करेगा। उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण के बाद जापान सरकार ने राष्ट्रीय परिषद की बैठक बुलाई।
इधर जापान ने अमेरिका से उत्तर कोरिया पर दबाव बढ़ाने को भी कहा है।
प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने कहा कि जापानी लोगों की सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।
वहीं सियोल के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टॉफ ने कहा कि नॉर्थ कोरिया की इस मिसाइल ने 2,700 किलोमीटर की दूरी तय की और 550 किलोमीटर की अधिकतम ऊंचाई तक गई। मिसाइल को उत्तरी जापान के होकाइदो द्वीप के ऊपर से दागा गया।
माना जा रहा है कि 2009 के बाद यह पहली बार है जब नॉर्थ कोरिया की मिसाइल ने जापान को पार किया है।
बता दें कि इस साल नॉर्थ कोरिया ने लगातार और तेजी से मिसाइल परीक्षण किए हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि उत्तरी कोरिया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल खत्म होने से पहले ऐसा हथियार हासिल कर सकता है, जिसके जरिए वह अमेरिका को निशाना बना सकता है।
भारत में बीजेपी की नरेंद्र मोदी सरकार ने चीन के सामने घुटने टेकते हुए डोकलाम से भारतीय सेना को हटा लिया है। इससे भारत-चीन संघर्ष का फ़िलहाल अंत हो गया है।
चीन ने सोमवार को कहा कि भारत ने डोकलाम से अपनी सेनाएं हटा दी हैं, लेकिन चीन की सेनाएं क्षेत्र में बनी रहेंगी और क्षेत्र में अपनी संप्रभुता कायम रखेंगी।
चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीन के सीमाबल डोकलाम में गश्त जारी रखेंगे। चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हु चुनयिंग ने कहा कि 28 अगस्त की दोपहर भारत ने डोकलाम की सीमा से अपनी सेनाएं और उपकरण हटा दिए। चीन के सुरक्षाकर्मियों ने इसकी पुष्टि की है।
चुनयिंग ने आगे कहा कि चीन ऐतिहासिक समझौते के आधार पर अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखेगा।
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने करीब ढाई महीने बाद डोकलाम विवाद सुलझाने वाले इस कदम का स्वागत किया है। इसके साथ ही चीन ने भारत को इस विवाद से सीख लेने की भी नसीहत दी है।
चीन ने कहा है कि वो सतर्क रहेगा, साथ ही मुल्क की संप्रभुता की रक्षा करता रहेगा।
चीनी रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि चाईनीज मिलिट्री सतर्क रहेगी। देश की संप्रभुता की रक्षा दृढ़ता की जाएगी।
चीनी रक्षा मंत्रालय ने आगे कहा, ''हम डोकलाम विवाद की समाप्ति का स्वागत करते हैं। चीन-भारत सीमा पर शांति क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को लेकर है। ये सरहद के दोनों तरफ लोगों के समान हितों के साथ संबंध को लेकर है।''
बयान में आगे कहा गया कि हम भारत को याद दिला दें कि उसे डोकलाम विवाद से सीखने की जरूरत है। भारत स्थापित संधियों और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के बुनियादी सिद्धातों का पालन करे। साथ ही दोनों देशों की शांति के लिए भारत चीन के साथ मिलकर काम करे। हम दोनों देशों की सेनाओं के स्वास्थ्य विकास को बढ़ावा देते हैं।
भारत के साथ डोकलाम में जारी गतिरोध के बीच चीन ने एक बार फिर से भारत को धमकी दी है। करीब दो महीनों से भी ज्यादा वक्त से जारी गतिरोध के बीच चीन ने भारत को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर उसके सैनिक भारत में घुस गए तो भयंकर अव्यवस्था फैल जाएगी।
मंगलवार को चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत का यह तर्क हास्यास्पद और विद्वेषपूर्ण है कि डोकलाम में सीमा पर चीन द्वारा सड़क बनाने से नई दिल्ली को खतरा है।
चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीन किसी भी देश या व्यक्ति को अपनी सीमाई संप्रभुता के उल्लंघन की इजाजत नहीं देगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ चनयिंग ने कहा, ''भारतीय पक्ष ने चीन द्वारा रोड बनाने को बहाना बनाकर गैरकानूनी तरीके से सीमा को पार किया है। यह वजह हास्यास्पद और विद्वेषपूर्ण है।''
चनयिंग ने कहा, ''आप इसके बारे में सोच सकते हैं। अगर हम भारत के इस हास्यास्पद तर्क को सहन करते हैं तो कोई भी जिसे अपने पड़ोसी के काम पसंद न हो तो वह अपने पड़ोसी के घर में घुस जाएगा। भारत सीमा पर बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का विकास कर रहा है जो चीन के लिए खतरा है। तो क्या चीन को भारतीय क्षेत्र में घुस जाना चाहिए? अगर ऐसा होगा तो बहुत अव्यवस्था फैल जाएगी।"
बता दें कि भारत-चीन सीमा पर सिक्किम के डोकलाम में भारत और चीनी सेनाओं के बीच तीन महीने से गतिरोध जारी है। जून में भारतीय सेनाओं ने डोकलाम में चीन द्वारा किए जा रहे सड़क निर्माण कार्य को रोक दिया था।
भारत का कहना है कि यह विवादित क्षेत्र है। भारत और भूटान का कहना है कि डोकलाम भूटान का है, लेकिन चीन उस पर अपना दावा जताता है। उधर, चीन उस इलाके को अपना डोका ला या डोंगलोंग बताते हुए दावा करता है।
डोकलाम क्षेत्र सिक्किम के पास भारत-चीन-भूटान ट्राइजंक्शन पर स्थित है। यह इलाका भूटान की सीमा में पड़ता है। दरअसल, चीन जिस जगह के पास सड़क बना रहा है, वह भारत का 'चिकंस नेक' कहलाने वाले सिलीगुड़ी गलियारे के बेहद करीब स्थित है।
उत्तर पूर्वी राज्यों को भारत के बाकी हिस्से से जोड़ने वाला यह इलाका महज 20 किलोमीटर चौड़ा है और सामरिक रूप से भारत के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। इस जगह के आसपास चीनी गतिविधि भारत की सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक हैं।
चीन चाहता है कि भारत डोकलाम से अपनी सेनाएं हटा ले, जबकि भारत चाहता है चीनी सैनिक हटें, तभी भारतीय सैनिक भी साथ ही हटाए जाएंगे।
इधर, डोकलाम गतिरोध चल ही रहा था कि कुछ दिनों पहले 15 अगस्त को लद्दाख की पेंगोंग झील में घुसपैठ की कोशिश में नाकाम होते देख चीनी सैनिकों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी थी। पत्थरबाजी से दोनों तरफ के सैनिकों को हल्की चोटें आर्इं।
पी एल ए के सैनिक दो इलाकों- फिंगर फोर और फिंगर फाइव में सुबह छह से नौ के बीच भारत की सीमा में घुसने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन दोनों ही मौकों पर भारतीय जवानों ने उनकी कोशिश असफल कर दी। जिसके बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष और बढ़ गया है। डोकलाम गतिरोध 1987 के बाद दोनों देशों की सेनाओं के बीच सबसे लंबा गतिरोध है। 1987 में अरुणाचल प्रदेश के सोमोरडोंग चु घाटी में भी दोनों देशों की सेनाओं के बीच ऐसा ही गतिरोध हुआ था।
पिछले दो महीने से डोकलाम विवाद पर भारत और चीन के बीच तनातनी चल रही है। इस बीच, ऐसे कई मौके आए, जब लगा चीन भारत के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़ना चाहता है।
अभी हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने खुलासा किया कि चीन पिछले तीन महीने यानी मई से ही वाटर डाटा साझा नहीं कर रहा है। इससे पहले दोनों देश पानी के बारे में आंकड़े साझा करते रहे हैं।
चीन द्वारा आंकड़ा साझा नहीं करने और कितना पानी तिब्बत से निकलने वाली नदियों में छोड़ा जा रहा है, इसकी जानकारी नहीं देने से बिहार-बंगाल समेत भारत के पूर्वोत्तर इलाके में इन दिनों बाढ़ आई हुई है।
पर्यावरण विशेषज्ञ और सामरिक विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा कर चीन भारत पर छद्म रूप से वाटर बम फोड़ना चाहता है।
बता दें कि चीन ने भारत आने वाली नदियों पर चुपचाप कई बांध बना रखे हैं जो भारतीय भौगोलिक क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी है।
दरअसल, चीन के पास तिब्बत एक बड़ा हथियार है। तिब्बत, पानी और कीमती धातुओं सहित प्राकृतिक संसाधनों का खजाना है। यह चीन के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा औजार है। तिब्बत के विशाल पठार से ही एशिया की अधिकांश बड़ी नदियां निकलती हैं, जो भारत समेत अन्य देशों में बहती हैं।
भारत में भी तीन बड़ी नदी प्रणाली तिब्बत से निकलती है। पहली सबसे बड़ी नदी ब्रह्मपुत्र है, जिस पर चीन ने कई बांध बना रखे हैं। 2700 किलोमीटर लंबी यह नदी भारत में अरुणाचल प्रदेश और असम होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
वाडिया इन्स्टीच्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक संतोष राय मानते हैं कि चीन इस नदी का इस्तेमाल भारत के खिलाफ वाटर बम के रूप में कर सकता है। अगर चीन ने ब्रह्मपुत्र पर बने बांध को खोल दिया तो पूर्वोत्तर भारत में जल प्रलय आ सकता है और करोड़ों की आबादी मौत के मुंह में समा सकती है।
दूसरी बड़ी नदी सतलुज है, जो तिब्बत से निकलकर हिमाचल प्रदेश और पंजाब से गुजरते हुए पाकिस्तान में सिंधु नदी की सहायक नदी बन जाती है। इसी पर भाखड़ा नांगल डैम बना है।
तीसरी नदीं सिंधु है जो कश्मीर होते हुए पाकिस्तान में जाकर बहती है और अरब सागर में मिलती है। अगर चीन ने इन नदियों पर बने बांध को खोल दिया तो उत्तरी भारत के कई राज्यों में जल प्रलय आ सकता है।
रक्षा विशेषज्ञ अनिल गुप्ता का मानना है कि अगर चीन इन नदियों पर बांध खोलकर जल युद्ध का आगाज करे तो पंजाब जलमग्न तो होगा ही, भाखड़ा डैम ठप हो जाएगा और परमाणु बम विस्फोट जैसी विभीषिका उत्पन्न हो जाएगी।
सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखे अपने ब्लॉग में कहा है कि अब जब डोकलाम विवाद तीसरे महीने में कदम रख चुका है तब भारत पर चीनी सैन्य हमले का खतरा बढ़ जाता है।
उन्होंने लिखा है कि भारत को हाइड्रोलॉजिकल डाटा ना देकर चीन ने इसका इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में करना शुरू कर दिया है। इस समय असम से लेकर उत्तर प्रदेश तक बाढ़ का कहर जारी है।
बता दें कि बाढ़ प्रभावित इलाके में जान-माल के नुकसान को कम करने, राहत सामग्री बांटने, बाढ़ की भविष्यवाणी और चेतावनी जारी करने के लिए वाटर डाटा जरूरी है।
डोकलाम गतिरोध को लेकर एक बार फिर से चीनी मीडिया भारत को लगातार आंख दिखा रही है। इस बार चीनी मीडिया ने भारत को जंग के लिए ललकारा है। चाईना डेली ने अपने संपादकीय में लिखा है, ''दो ताकतों के बीच टकराव होने की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। समय हाथ से निकलता जा रहा है।''
संपादकीय में यह भी लिखा है कि भारत को जल्द ही अपने सैनिक क्षेत्र से हटा लेने चाहिए ताकि दोनों मुल्कों के बीच बातचीत हो सके और किसी तरह का संघर्ष न हो। 'न्यू डेह्ली शुड कम टू इट्स सेंसिस वाइल इट हैड टाइम' शीर्षक से प्रकाशित इस संपादकीय में और भी कई बातें लिखी गई हैं।
संपादकीय में आगे लिखा गया है, ''बीजिंग के पास समय है और इसी लिए उसने दोबारा यह मैसेज भेजा कि भारत अगर संघर्ष नहीं चाहता तो वह अपने सारे जवान हटा ले।''
इसके अलावा संपादकीय में भारत को यह भी कहा गया है कि वह चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ताकत को कम न समझे।
बता दें यह पहली बार नहीं है, जब चीनी मीडिया ने डोकलाम गतिरोध को लेकर भारत को धमकाया हो। इससे पहले भी वह कई बार ऐसा कर चुका है। चीन के एक दैनिक समाचार पत्र ने लिखा था कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने सख्त रुख के चलते भारत को युद्ध की ओर धकेल रहे हैं और अपने देशवासियों के भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं।
चीन की सरकारी मीडिया 'ग्लोबल टाइम्स' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि मोदी को चीन की सेना की अपार शक्ति से वाकिफ होना चाहिए जो डोकलाम में भारतीय सैनिकों को तबाह करने की क्षमता रखता है।
इसके अलावा बीते महीने भी पीपुल्स डेली नाम के एक और मीडिया संस्थान भारत को 1962 में छपा एक संपादकीय दोबारा साझा कर भारत को धमकाया था। 22 सितंबर 1962 के उस संपादकीय को दोबारा प्रकाशित कर, भारत पर आरोप लगाए गए थे कि उसने चीन को पहले भी भड़काने का काम किया था जिसे वह अब दोहरा रहा है और इस उकसावे को चीनी लोग बरदाश्त नहीं करेंगे।
डोकलाम गतिरोध खत्म करने के लिए एक साथ दोनों देशों के सैनिकों को हटाने के भारत के सुझाव को खारिज करते हुए चीन ने मंगलवार (8 अगस्त) को धमकी देते हुए कहा कि अगर वह उत्तराखंड के कालापानी क्षेत्र या कश्मीर में घुस जाएगा, तब नयी दिल्ली क्या करेगा?
यह पहला मौका है जब किसी चीनी अधिकारी ने कश्मीर मुद्दे को उछाला है। हालांकि, चीन सरकार के द्वारा संचालित ग्लोबल टाइम्स में इस तरह की एक टिप्पणी की गई थी। भारतीय सैनिकों ने चीनी सेना को सिक्किम के डोकलाम सेक्टर में एक सड़क बनाने से रोक दिया जिसके बाद इलाके में 50 दिनों से भारत और चीन के बीच गतिरोध चल रहा है।
चीन ने दावा किया कि वह अपनी सरजमीं के अंदर सड़क बना रहा है और वह डोकलाम पठार से भारतीय सैनिकों को फौरन हटाने की मांग कर रहा है।
भूटान ने कहा है कि डोकलाम उसका क्षेत्र है, लेकिन चीन ने इस इलाके को अपना होने का दावा किया है और कहा है कि थिम्पू का बीजिंग के साथ इस मुद्दे पर कोई विवाद नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय में सीमा और सागर मामलों की उप महानिदेशक वांग वेनली ने कहा कि एक दिन के लिए भी यदि सिर्फ एक भारतीय सैनिक भी रहता है तो भी यह हमारी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन है।
यह पूछे जाने पर कि क्या भारत के साथ चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है, वांग ने कहा, ''मैं सिर्फ इतना कह सकती हूं कि पीएलए और चीन सरकार के लिए, हमारे पास प्रतिबद्धता है। इसलिए, यदि भारत गलत रास्ते पर जाने का फैसला करता है या इस घटना के बारे में कोई भ्रम रखता है तो हमारे अधिकारों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक हमारे पास कोई भी कार्रवाई करने का अधिकार है। वांग एक भारतीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल को संबोधित कर रही थी।
उन्होंने कहा कि इस वक्त भारत के साथ वार्ता करना असंभव होगा। हमारे लोग सोचेंगे कि हमारी सरकार अक्षम है। जब तक कि भारत चीनी सरजमीं से सैनिकों को वापस नहीं बुला लेता है हमारे बीच कोई ठोस वार्ता नहीं हो सकती। उन्होंने भारत को छेड़ते हुए कश्मीर का मुद्दा उठाया और भारत और नेपाल के बीच के कालापानी विवाद का जिक्र किया।
उन्होंने कहा कि हमें लगता है कि भारत के लिए ट्राई जंक्शन का इस्तेमाल करना कोई बहाना नहीं हो सकता। उन्होंने भारत के विदेश मंत्रालय के इस बयान का जिक्र किया जिसके तहत भारत ने कहा कि देश के मुख्य हिस्से को पूर्वोत्तर से जोड़ने वाले संकरे इलाके में चीन, भारत और भूटान ट्राई जंक्शन में सड़क का निर्माण यथास्थिति को बदल रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत के भी कई ट्राई जंक्शन हैं। क्या होगा जब हम यही बहाना बनाएंगे और चीन, भारत और नेपाल के बीच कालापानी क्षेत्र में घुस जाएंगे या भारत और पाकिस्तान के बीच के कश्मीर क्षेत्र में घुस जाएंगे। वांग ने कहा कि ट्राई जंक्शन का इस्तेमाल और अधिक संकट पैदा करेगा।
पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पीएमएल-एन के कुछ नेताओं का कहना है कि नवाज शरीफ ने पारिवारिक राजनीति की वजह से अपने छोटे भाई शहबाज शरीफ को बड़ी चतुराई से प्रधानमंत्री बनने से वंचित कर दिया, हालांकि इस पद के लिए शहबाज के नाम का ऐलान किया गया था।
बीते 28 जुलाई को पनामा पेपर्स मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद नवाज ने ऐलान किया था कि 45 दिनों के लिए शाहिद खाकान अब्बासी के अंतरिम प्रधानमंत्री रहने के बाद 10 महीने के शेष कार्यकाल के लिए शहबाज प्रधानमंत्री होंगे।
परदे के पीछे बातचीत करने पर कुछ पीएमएल-एन नेताओं का कहना है कि शहबाज प्रधानमंत्री बनने का सुनहरा मौका चूक गए क्योंकि अब इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि 2018 में पार्टी का चुनाव जीतने पर वह प्रधानमंत्री बनेंगे।
पीएमएल-एन के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि शरीफ की बेटी मरियम भ्रष्टाचार के मामले में बरी नहीं होती हैं तो अगले साल होने वाले आम चुनाव में पीएमएल-एन की जीत होने पर शरीफ की पत्नी कुलसुम प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार होंगी।
इस नेता ने कहा, ''शायद शहबाज प्रधानमंत्री बनने का सुनहरा मौका चूक गए, यह उनके बड़े भाई की चतुराई भरी राजनीति की वजह से हुआ। कौन जानता है कि 2018 के चुनाव का नतीजा क्या होगा और उस वक्त परिवार की राजनीति क्या होगी। शरीफ को डर है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद शहबाज पार्टी पर कब्जा कर लेंगे और पंजाब की सत्ता अपने बेटे हमजा को सौंप देंगे।''
उल्लेखनीय है कि नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी करार दिया गया है। उनको प्रधानमंत्री के पद से हटा दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने उनको दोषी करार दिया। नवाज का नाम पनामा पेपर में आया था। यह मामला 1990 के दशक में उस वक्त धनशोधन के जरिए लंदन में सपंत्तियां खरीदने से जुड़ा है जब शरीफ दो बार प्रधानमंत्री बने थे।
शरीफ के परिवार की लंदन में इन संपत्तियों का खुलासा पिछले साल पनामा पेपर्स लीक मामले से हुआ। इन संपत्तियों के पीछे विदेश में बनाई गई कंपनियों का धन लगा हुआ है और इन कंपनियों का स्वामित्व शरीफ की संतानों के पास है। इन संपत्तियों में लंदन स्थित चार महंगे फ्लैट शामिल हैं।
चीन के एक दैनिक समाचार पत्र ने लिखा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने सख्त रुख के चलते भारत को युद्ध की ओर धकेल रहे हैं और अपने देशवासियों के भविष्य को दांव पर लगा रहे हैं।
चीन की सरकारी स्वामित्व वाली 'ग्लोबल टाइम्स' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया है कि मोदी को चीन की सेना की अपार शक्ति से वाकिफ होना चाहिए जो डोकलाम में भारतीय सैनिकों को तबाह करने की क्षमता रखता है। भारत के साथ चल रहे सीमा विवाद पर बीते कुछ दिनों से चीन और चीनी मीडिया का रुख तीखा होता जा रहा है।
इस बीच चीन के रक्षा मंत्री ने भी बयान दिया है कि भारत, चीन के धैर्य का इम्तहान न ले।
वहीं भारत हमेशा नपी-तुली प्रतिक्रिया देता रहा है और सिक्किम सेक्टर को लेकर उपजे सीमा विवाद के सामाधान के लिए वार्ता का आह्वान करता रहा है।
चीनी अखबार लिखता है कि भारत ने ऐसे देश को चुनौती दी है जो ताकत में उससे कहीं अधिक दमदार है।
संपादकीय में कहा गया है, ''यह एक ऐसा युद्ध होगा, जिसका परिणाम पहले से तय है।''
वहीं अखबर यह भी कहता है कि भारत ने अपने रुख से चीन को हैरान किया है। संपादकीय में कहा गया है, ''सीमा पर तैनात भारतीय सैनिक चीनी सेना के दुश्मन नहीं हैं। अगर युद्ध छिड़ता है तो पीएलए सीमा पर तैनात भारत के सभी सैनिकों को तबाह करने में सक्षम है। मोदी सरकार का सख्त रवैया न तो कानूनी रूप से और न ही ताकत के आधार पर कहीं टिकता है। मोदी सरकार लापरवाही से अंतर्राष्ट्रीय नियमों को तोड़ती आ रही है और भारत की राष्ट्रीय गरिमा और शांतिपूर्ण विकास को खतरे में डाल रही है।''
चीनी अखबार आगे कहता है, ''क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए इसकी (भारतीय सेना की) गतिविधियां गैर-जिम्मेदाराना हैं और भारत के भविष्य और अपने देशवासियों के हित को दांव पर लगाने वाली हैं। अगर मोदी सरकार यहीं नहीं रुकी तो वह अपने देश को युद्ध की ओर धकेल देगी, जिसका नियंत्रण भारत के हाथ में नहीं होगा।''
संपादकीय में कहा गया है कि भारत दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तरह चीन को नहीं भड़का सकता।
गौरतलब है कि एक दिन पहले ही चीन के रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि डोकलाम मुद्दे पर भारत को चीन के धैर्य की परीक्षा नहीं लेनी चाहिए और हमारा धैर्य अब खत्म होने को है।
चीन के रक्षा मंत्रालय ने भारत को विवाद को टालने की रणनीति छोड़ने की चेतावनी भी दी। रक्षा मंत्रालय वहीं शांति की बात भी करता है, ''हम शांति स्थापित होने का अवसर देना चाहते हैं और भारत को इसके गंभीर परिणामों का अहसास करने का वक्त देना चाहते हैं।''
डोकलाम मुद्दे पर चीन की ओर से लगातार भड़काऊ बयान आने के बावजूद भारत लगातार कहता रहा है कि वह सीमा विवाद के समाधान के लिए बीजिंग के साथ कूटनीतिक संपर्क बनाए रखेगा और युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं होता।
भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गुरुवार को संसद में कहा था, ''भारत का हमेशा मानना है कि भारत-चीन सीमा पर शांति हमारे द्विपक्षीय संबंधों के सुचारू विकास के लिए महत्वपूर्ण शर्त है। हम कूटनीतिक माध्यमों के जरिए चीनी पक्ष से अस्ताना में अपने नेताओं में हुए सहमति पर पारस्परिक स्वीकार्य हल के लिए लगातार संपर्क जारी रखेंगे।''
उन्होंने कहा था, ''इस संदर्भ में भूटान के साथ पारंपरिक व अद्वितीय दोस्ती बनाए रखते हुए हम भूटान की राजशाही के साथ भी गहन परामर्श व समन्वय बनाए रखेंगे।''
चीन के एक सैन्य विशेषज्ञ ने कहा है कि उनका देश डोकलाम से अपने सैनिकों को वापस नहीं हटाएगा क्योंकि अगर वह ऐसा करता है तो भारत को भविष्य में उसके लिए समस्या खड़ी करने का प्रोत्साहन मिलेगा।
नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी ऑफ द पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के इंटरनेशनल कॉलेज ऑफ डिफेंस में सहायक प्राध्यापक यू दोंगशियोम ने कहा कि अगर भारतीय रणनीतिकार और नीति निर्माता यह सोचते हैं कि चीन वापस लौट जाएगा तो वह गलती कर रहे हैं।
यू ने कहा कि भारतीय सैनिकों को बिना शर्त तत्काल वापस हो जाना चाहिए। चीन की आधिकारिक समाचार एजेंसी सिन्हुआ में यू ने लिखा कि बीजिंग डोकलाम से सैनिकों को वापस नहीं बुलाएगा क्योंकि यह क्षेत्र चीन से संबंधित है और ब्रिटेन और चीन के बीच 1890 की संधि इस बात का प्रमाण है।
यू ने कहा, ''अगर चीन अभी पीछे हटता है, तो भारत भविष्य में और अधिक समस्याएं पैदा करने के लिए प्रोत्साहित होगा। बीजिंग और नई दिल्ली के बीच कई सीमाओं पर मतभेद हैं, लेकिन डोकलाम इनमें शामिल नहीं है।''
वहीं, भारत ने कहा है कि अगर चीन अपनी सेना वापस लेता है तो वह भी अपने सैनिकों को वहां से हटा लेगा।
यू ने कहा, ''कुछ भारतीय रणनीतिकार और नीतिकार इस गलतफहमी में हैं कि चीन निहित स्वार्थो, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में अधूरे सुधारों और चीन-अमेरिका रणनीति में भारत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, यह सोचकर वापस लौट जाएगा।''
गौरतलब है कि चीन और भूटान के बीच डोकलाम एक विवादित क्षेत्र है। भारत और भूटान इसे भूटानी क्षेत्र मानते हैं। डोकलाम में 16 जून को चीनी सेना द्वारा सड़क निर्माण को लेकर भारतीय व चीनी सैनिकों के बीच गतिरोध शुरू हुआ था। डोकलाम पर स्वामित्व पर कोई फैसला न होने का हवाला देते हुए भारतीय सैनिकों ने चीन के सड़क निर्माण कार्य को रोक दिया था।
यू ने कहा, ''भारत के लिए सैन्य अधिकारियों को चीनी क्षेत्र में भेजना अवैध है, फिर चाहे वह भूटान की सुरक्षा चिंताओं या संरक्षण के बहाने भी क्यों न हो। भारत ने अपनी कार्रवाई के संबंध में कोई कानूनी आधार प्रदान नहीं किया है।''
यू के अनुसार, ''भारत भूटान की रक्षा के नाम पर अपनी कार्रवाई को जायज साबित करने का प्रयास कर रहा है और तर्क दे रहा है कि डोकलाम भूटानी क्षेत्र है। अगर यही मामला है तो भारत कैसे अपने सैनिकों को वहां भेजने का दावेदार बन गया है।''
भारत के लिए डोकलाम का बड़ा रणनीतिक महत्व है क्योंकि यह उसके बेहद महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी गलियारे के करीब है जो शेष भारत को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है।
यू ने कहा कि भारत की अपनी सुरक्षा चिंताएं पड़ोसी देश पर सैन्य कब्जे की गारंटी नहीं दे सकती हैं। अगर उन्होंने ऐसा किया तो कोई भी देश विशुद्ध रूप से अपनी आंतरिक सुरक्षा चिंताओं के तहत किसी भी पड़ोसी देश में अपने सैन्य बलों को भेज सकता है। उन्होंने कहा, ''चीन विदेशी सैन्य दबाव के समक्ष कभी नहीं झुकेगा और हर कीमत पर अपनी मिट्टी की रक्षा करेगा।''









