संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था के प्रमुख ने कहा है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों को निशाना बनाकर की जा रही सुरक्षा कार्रवाई 'जातीय नरसंहार का एक सटीक उदाहरण' है।
इसके साथ ही संस्था प्रमुख ज़ईद राद अल हुसैन ने म्यांमार से रखाइन प्रांत में 'क्रूर सैन्य कार्रवाई' को ख़त्म करने की अपील की।
पिछले महीने शुरू हुई हिंसा के बाद म्यांमार से तीन लाख से भी ज़्यादा रोहिंग्या मुसलमान पलायन कर चुके हैं।
म्यांमार की सेना का कहना है कि उसकी कार्रवाई केवल रोहिंग्या चरमपंथियों के ख़िलाफ़ है।
आम लोगों को किसी तरह से निशाना बनाने के आरोप से भी सेना इनकार करती है।
25 अगस्त को रखाइन के उत्तरी इलाके में रोहिंग्या चरमपंथियों ने पुलिस चौकियों को निशाना बनाया। इस हमले में 12 सुरक्षा कर्मी मारे गए थे।
इस घटना के बाद से ही वहां हिंसा भड़क गई और रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश की ओर मजबूरन पलायन करना पड़ा।
रोहिंग्या शरणार्थियों का कहना है कि म्यांमार की सेना रखाइन में उनके ख़िलाफ़ बर्बर अभियान चला रही है, गांव जलाए जा रहे हैं, उन्हें वहां से खदेड़ने के लिए आम लोगों पर हमले किए जा रहे हैं।
म्यांमार का बौद्ध बहुल रखाइन प्रांत बांग्लादेश की सीमा से लगता है और यहां रोहिंग्या मुसलमान अल्पसंख्यक हैं।
यूनाइटेड नेशन हाई कमिश्नर फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के प्रमुख ज़ईद राद अल हुसैन ने कहा कि रखाइन में मौजूदा कार्रवाई साफ़ तौर पर गैरवाजिब है।
आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना म्यांमार के उत्तरी सूबे रख़ाइन में सक्रिय एक सशस्त्र संगठन है। ये संगठन रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए सशस्त्र संघर्ष कर रहा है और इसके ज़्यादातर सदस्य बांग्लादेश से आए अवैध शरणार्थी बताए जाते हैं।
इस संगठन की अगुवाई अताउल्लाह नाम का एक शख़्स कर रहा है। अताउल्लाह वीडियो संदेशों के ज़रिए रखाइन में अपने संगठन की गतिविधियों के बारे में बताता रहता है।
म्यांमार की सरकार की नज़र में आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना एक चरमपंथी संगठन है।
अताउल्लाह विदेशी इस्लामी चरमपंथियों से संबंध रखने के आरोपों से इनकार करते हैं। अताउल्लाह का कहना है कि उनकी लड़ाई देश के बौद्ध बहुमत के दमन के ख़िलाफ़ है।
उन्होंने कहा, ''अगर हमें हमारे हक़ नहीं मिलते और अगर इस लड़ाई में लाखों रोहिंग्या मुसलमानों की जान चली जाती है तो हम मरते दम तक तानाशाह सैनिक सरकार के ख़िलाफ़ लड़ते रहेंगे। हम रात के वक़्त रोशनी नहीं जला सकते। हम दिन के वक़्त एक जगह से दूसरे जगह नहीं जा सकते। हर जगह नाकाबंदी है। ज़िंदगी जीने का ये तो कोई तरीका नहीं है।''
अगस्त में पुलिस चौकियों पर आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना के सशस्त्र हमलावरों ने कथित तौर पर हमला किया जिसके बाद रख़ाइन में रोहिंग्या मुसलमानों का संकट गहरा गया।
इसके बाद म्यांमार के सुरक्षा बलों की कार्रवाई शुरू और तब से हज़ारों मुसलमानों बांग्लादेश की तरफ़ पलायन कर गए हैं।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि म्यांमार के सुरक्षा बलों ने रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर नरसंहार और गैंग रेप को अंजाम दिया है।
संयुक्त राष्ट्र ने इसे मानवता के विरुद्ध अपराध करार दिया है।
हालांकि म्यांमार की सेना इन आरोपों से इनकार करती है और उसका कहना है कि उसने वैध तरीके से चरमपंथ विरोधी अभियान चलाया है।
म्यांमार के उत्तर पश्चिमी इलाके के रखाइन प्रांत में दस लाख से ज़्यादा रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं, लेकिन उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी नागरिक अधिकारों से मरहूम रखा गया है।
नार्वे के नोबेल संस्थान ने आज कहा कि म्यांमार की नेता आंग सांग सू ची को वर्ष 1991 में दिये गये पुरस्कार को वापस नहीं लिया जा सकता।
नॉर्वे के नोबेल संस्थान के प्रमुख ओलव जोल्सताद ने एक ईमेल के जरिये एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि ना ही पुरस्कार के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल के वसीयत के अनुसार और ना ही नोबेल फाउंडेशन के नियमों के अनुसार प्राप्तकर्ताओं से पुरस्कार वापस लेने का कोई प्रावधान है।
उन्होंने कहा है, ''एक बार नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किये जाने के बाद प्राप्तकर्ता से पुरस्कार वापस नहीं लिया जा सकता।''
ओलव ने कहा, ''स्टॉकहोम और ओस्लो की किसी भी पुरस्कार समिति ने पुरस्कार प्रदान किये जाने के बाद उसे वापस लेने के बारे में विचार नहीं किया है।''
बता दें कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हो रहे कथित उत्पीड़न को लेकर करीब 3,86,000 लोगों ने ऑनलाइन पिटीशन पर हस्ताक्षर कर सू ची से नोबेल पुरस्कार वापस लेने की मांग की है। सू ची म्यांमार की सुप्रीम लीडर हैं। उन्हें म्यांमार की भाषा में स्टेट काउंसलर कहा जाता है।
इधर संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि ने कहा है कि म्यांमार के राखिने प्रांत में अबतक एक हजार से ज्यादा लोगों के मारे जाने की आशंका है जिनमें ज्यादातर रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के सदस्य हैं।
यह संख्या सरकारी आंकड़ों से लगभग दुगुनी है। म्यांमार में मानवाधिकारों के संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक, यांघी ली ने कहा, ''मुमकिन है कि अबतक एक हजार या उससे ज्यादा लोगों की जान गई हों। इसमें दोनों तरफ के लोग हो सकते हैं, लेकिन ज्यादा बड़ी संख्या रोहिंग्या की होगी।
पिछले केवल दो सप्ताह में 1,64,000 नागरिक भागकर बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में चले गए हैं। इनमें से ज्यादातर रोहिंग्या हैं। यह शिविर पहले से ही लोगों से खचाखच भरे हुए हैं।
कई अन्य की मौत राखिने में हो रही हिंसा से बचने के क्रम में भागने के दौरान हुई।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि यहां रोहिंग्या चरमपंथियों द्वारा 25 अगस्त को श्रृंखलाबद्ध तरीके से शुरू किए गए हमलों के कारण सेना की जवाबी कार्रवाई शुरू हुई जिसमें समूचे गांव जल गए।
रोहिंग्या मुसलमानों को बौद्ध वर्चस्व वाले म्यांमार में लंबे समय से भेदभाव का सामना करना पड़ा है। म्यांमार में कई पीढ़ियों से निवास करने के बावजूद उन्हें यहां की नागरिकता से वंचित रखा गया है और उनको बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों के तौर पर देखा जाता रहा है।
ली द्वारा दिए गए यह आंकड़े आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज्यादा हैं जिसके मुताबिक मृतकों की कुल संख्या 475 ही है।
बृहस्पतिवार को अधिकारियों द्वारा जारी किए गए नए आंकड़ों के मुताबिक, म्यांमार की ओर से बताया गया है कि 25 अगस्त से अब तक रोहिंग्या के 6,600 घर और गैर-मुसलमानों के 201 घर जलकर खाक हो गए हैं।
उन्होंने बताया कि इस संघर्ष में 30 नागरिक मारे गए जिनमें सात रोहिंग्या, सात हिंदू और 16 राखिने बौद्ध शामिल थे।
म्यांमार की सेना ने इससे पहले कहा था कि उन्होंने 430 रोहिंग्या आतंकियों को मार गिराया। अधिकारियों ने बताया था कि अगस्त के हमलों में 15 सुरक्षाकर्मियों की भी मौत हो गई थी।
अमेरिकी दूतावास ने बुधवार को वरिष्ठ कन्नड़ पत्रकार-सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या की निंदा की।
अमेरिकी दूतावास ने एक बयान में कहा, ''भारत में अमेरिकी मिशन भारत व दुनिया भर में प्रेस की आजादी के समर्थकों के साथ मिलकर बेंगलुरु में सम्मानित पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की निंदा करता है।''
इसमें कहा गया है, ''हम सुश्री लंकेश के परिवार, मित्रों व सहयोगियों के साथ संवेदना प्रकट करते हैं।''
गौरी लंकेश की तीन अज्ञात हमलावरों ने उस समय गोली मारकर हत्या कर दी, जब वह अपने कार्यालय से घर लौटी थीं। लंकेश लोकप्रिय कन्नड़ टेबलॉयड 'लंकेश पत्रिके' की संपादक थीं।
लंकेश की हत्या के विरोध में बुधवार को पूरे कर्नाटक में प्रदर्शन हुए। विरोध प्रदर्शन कर रही भीड़ में पत्रकार, कार्यकर्ता, लेखक, चिंतक और महिला संगठनों के कार्यकर्ता शामिल हैं। लोग यहां मौन विरोध प्रदर्शन करने के लिए टाउन हॉल में एकत्रित हुए और उन्होंने तख्तियां पकड़ रखी थी।
एक तख्ती पर लिखा था, ''आप किसी शख्स की हत्या कर सकते हैं, उसके विचारों की नहीं।''
विक्टोरिया अस्पताल परिसर में भी पत्रकारों ने मौन विरोध प्रदर्शन किया, जहां उनका (गौरी लंकेश) पोस्टमॉटर्म हुआ है। राज्य भर में मंगलुरू, कलबुरगी, धारवाड़, कोप्पल आदि क्षेत्रों में नागरिकों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया।
हत्या के विरोध में मैसूर में पत्रकारों ने अपने कंधों पर काले फीते बांधे और उपायुक्त कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया। नई दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और भारत के अन्य शहरों में भी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किये गए।
इस बीच, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी बुधवार को अपने सभी आधिकारिक कार्यक्रम रद्द कर दिए। मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी ने कहा, ''मुख्यमंत्री ने मंगलवार रात घटी घटनाओं के मद्देनजर केरल की एक दिन की यात्रा सहित अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं।''
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस हत्या पर हैरानी और चिंता जताते हुए बुधवार को कहा, ''इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।''
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बीजेपी पर असहमति जताने पर चुप कराने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह उनकी (बीजेपी) विचारधारा का हिस्सा है। उन्होंने कहा, ''जो भी बीजेपी के खिलाफ बोलता है, उसे चुप करा दिया जाता है....।''
म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार अभी जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अभी तक करीब 400 लोगों की मौत इस हिंसा में हो चुकी है।
रोहिंग्या मुस्लिमों की हत्या का आरोप म्यांमार के सैनिकों पर लगाया जा रहा है। अल्पसंख्यक समुदाय के वकील का कहना है कि इस नरसंहार के सबूत मिटाने के लिए म्यांमार के सैनिक और स्थानीय बौद्ध लोग साथ में लगे हुए हैं। ये लोग मारे गए रोहिंग्या मुस्लिमों की लाशों को इकट्ठा करते हैं और फिर जला देते हैं।
म्यांमार के राखिने क्षेत्र में हिंसा पर नजर रखने वाली एक संस्था अराकन प्रोजेक्ट की डायरेक्टर क्रिस लेवा ने बताया कि हमारे पास दस्तावेज हैं कि राथेडाउंग क्षेत्र में एक साथ 130 लोगों को मार दिया गया। साथ ही उन्होंने कहा कि अन्य तीन गांवों में भी दर्जनों लोगों को मार देने की खबर मिली है।
उन्होंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से बात करते हुए कहा, ''हम सोचते हैं कि 130 लोग मारे गए हैं, लेकिन यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है। सुरक्षाबल गांवों को घेर लेते हैं और फिर लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग करते है। पिछले साल अक्टूबर-नवंबर महीने में हुई हिंसा की इस बार की हिंसा से तुलना करें तो इस बार यह देखने को मिला है कि इस बार सेना के साथ स्थानीय बौद्ध लोग भी मिले हुए हैं। लोगों की हत्या के बाद हम देख रहे हैं कि सेना और आम लोग मिलकर मृतकों के शवों को इकट्ठा कर रहे हैं और उन्हें जला दते हैं, ताकि कोई सबूत ना रहें।''
वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यू एन एच सी आर) ने मंगलवार को कहा कि म्यांमार में हिंसा से बचने के लिए देश छोड़कर बांग्लादेश पलायन करने वाले रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की संख्या पूर्व में सोची गयी संख्या से कहीं ज्यादा 1,23,000 है।
यू एन एच सी आर की प्रवक्ता विवियन टैन ने कहा कि रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की यह संख्या कल की अनुमानित संख्या 87,000 से बढ़ायी गयी है जो स्थापित एवं अस्थायी शरणार्थी शिविरों से जुटाए गए ज्यादा सटीक आंकड़े पर आधारित है।
उन्होंने कहा कि इसका मतलब है कि सभी 36,000 नए शरणार्थियों ने पिछले 24 घंटे में प्रवेश किया। तब भी 'यह संख्या चिंताजनक है' और 'तेजी से बढ़ती जा रही है।'
रोहिंग्या मुस्लिमों का ताजा पलायन 25 अगस्त को तब शुरू हुआ, जब रोहिंग्या विद्रोहियों ने म्यांमार पुलिस की चौकियों पर हमले किए जिसके बाद सुरक्षाबलों ने जवाब में विद्रोहियों के सफाए के लिए अभियान शुरू किया।
आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत के अभियान को एक बड़ी जीत उस वक्त मिली, जब सोमवार को ब्रिक्स देशों ने लश्कर-ए-तैयबा (एल ई टी) और जैश-ए-मोहम्मद (जे ई एम) जैसे पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों का नाम अपने घोषणापत्र में शामिल किया और इनसे तथा इनके जैसे तमाम आतंकवादी संगठनों से निपटने के लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।
ऐसा कहा जाता है कि गोवा में बीते साल हुए आठवें ब्रिक्स सम्मेलन में चीन ने घोषणापत्र में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों को शामिल करने का विरोध किया था।
शियामेन घोषणापत्र में कहा गया है, ''हम क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति पर और तालिबान, इस्लामिक स्टेट (आई एस), अलकायदा और इससे संबद्ध संगठन ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, टी टी पी और हिज्बुल-तहरीर द्वारा की गई हिंसा पर चिंता व्यक्त करते हैं।''
इस सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ब्राजील के राष्ट्रपति मिशेल टेमर और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने शिरकत की।
जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर को भारतीय सेना के प्रतिष्ठानों पर घातक सीमा पार हमलों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। भारत ने अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का रुख किया था, लेकिन चीन ने बार-बार इस प्रस्ताव की राह में रोड़ा अटकाया है। 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के लिए लश्कर-ए-तैयबा जिम्मेदार है। इसमें 166 भारतीयों और विदेशी नागरिकों की मौत हो गई थी।
शियामेन घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों सहित दुनिया भर में हुए सभी आतंकवादी हमलों की निंदा की गई है। घोषणापत्र में कहा गया, ''आतंकवाद की सभी रूपों में निंदा की जाती है। आतंकवाद के किसी भी कृत्य का कोई औचित्य नहीं है।''
पाकिस्तान का नाम लिए बगैर घोषणापत्र में कहा गया है, 'हम इस मत की पुष्टि करते हैं कि जो कोई भी आतंकी कृत्य करता है या उसका समर्थन करता है या इसमें मददगार होता है, उसे इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।''
ब्रिक्स देशों का कहना है कि आतंकवाद करने वाले और इसमें सहयोग देने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
घोषणापत्र में आतकंवाद को रोकने और इससे निपटने के लिए देशों की प्राथमिक भूमिका और जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए जोर दिया गया कि देशों की संप्रभुता और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने का सम्मान करते हुए आतंक के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की जरूरत है।
घोषणापत्र में कहा गया है, ''हम आतंकवादी हमलों की निंदा करते हैं, जिस वजह से निर्दोष अफगान नागरिकों की मौत हुई है। इस हिंसा को तत्काल खत्म करने की जरूरत है। हम अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों के तहत अफगानिस्तान में शांति की बहाली और राष्ट्रीय सुलह के लिए लोगों को सहयोग देने की प्रतिबद्धता जताते है। हम आतंकवादी संगठनों से निपटने के लिए अफगान सुरक्षाबलों के प्रयासों का समर्थन करते हैं।''
घोषणापत्र में कहा गया, ''हम सभी देशों से आतंकवाद से निपटने, कट्टरपंथ का खात्मा करने, आतंकवादी संगठनों में भर्तियों (विदेशी लड़ाकों सहित) को रोकने, आतंकवाद का वित्तपोषण बंद करने के लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान करते हैं। इनमें धनशोधन, हथियारों की आपूर्ति, नशीले पदार्थो की तस्करी और अन्य आपराधिक गतिविधियां रोकने, आतंकवादी अड्डों को ध्वस्त करना, आतंकवादियों द्वारा नवीनतम सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकियों के जरिए सोशल मीडिया सहित इंटरनेट का दुरुपयोग रोकना शामिल हैं।''
घोषणापत्र में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से व्यापक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी गठबंधन की स्थापना करने और इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की समन्वयक की भूमिका के लिए समर्थन जताने का आह्वान किया गया है।
घोषणापत्र में कहा गया है, ''हम जोर देकर कहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार होनी चाहिए। इसमें संयुक्त राष्ट्र का घोषणापत्र, अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी और मानवीय कानून, मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रता भी शामिल हैं।''
इसके मुताबिक, ''हम संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि (सी सी आई टी) को अंतिम रूप देने और इसे पेश करने का आह्वान करते हैं।''
उत्तर कोरिया ने मंगलवार को जापान के ऊपर से मिसाइल दागकर इलाके में तनाव बढ़ा दिया है। यह मिसाइल जापान के होक्काइदो द्वीप के प्रशांत सागर में जा गिरी।
जापान के चीफ कैबिनेट सेकेट्ररी योशीहिदे सुगा ने बताया कि उत्तर कोरिया के पश्चिमी तट से सुबह लगभग 5.58 बजे मिसाइल परीक्षण किया और मिसाइल ने होक्काइदो के केप एरिमो को सुबह लगभग 6.06 बजे पार किया।
उत्तर कोरिया ने अपने आक्रामक रवैये से अमेरिका और उसके करीबी सहयोगी को स्पष्ट कर दिया है कि वॉर गेम में वह पीछे नहीं हटेगा।
समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने योशीहिदे सुगा के हवाले से बताया कि मिसाइल ने 2,700 किलोमीटर का सफर तय किया और सुबह लगभग 6.12 बजे प्रशांत सागर में जा गिरीं।
योशीहिदे सुगा ने बताया कि यह भी संभव है कि मिसाइल तीन हिस्सों में टूटकर जापान सागर में जा गिरी। जापान सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए है।
जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने कहा कि इस मिसाइल परीक्षण से क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा को खतरा है और जापान इसका पुरजोर विरोध करता है।
उन्होंने कहा कि जापान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक की मांग करेगा। उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण के बाद जापान सरकार ने राष्ट्रीय परिषद की बैठक बुलाई।
इधर जापान ने अमेरिका से उत्तर कोरिया पर दबाव बढ़ाने को भी कहा है।
प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने कहा कि जापानी लोगों की सुरक्षा के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।
वहीं सियोल के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टॉफ ने कहा कि नॉर्थ कोरिया की इस मिसाइल ने 2,700 किलोमीटर की दूरी तय की और 550 किलोमीटर की अधिकतम ऊंचाई तक गई। मिसाइल को उत्तरी जापान के होकाइदो द्वीप के ऊपर से दागा गया।
माना जा रहा है कि 2009 के बाद यह पहली बार है जब नॉर्थ कोरिया की मिसाइल ने जापान को पार किया है।
बता दें कि इस साल नॉर्थ कोरिया ने लगातार और तेजी से मिसाइल परीक्षण किए हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि उत्तरी कोरिया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल खत्म होने से पहले ऐसा हथियार हासिल कर सकता है, जिसके जरिए वह अमेरिका को निशाना बना सकता है।
भारत में बीजेपी की नरेंद्र मोदी सरकार ने चीन के सामने घुटने टेकते हुए डोकलाम से भारतीय सेना को हटा लिया है। इससे भारत-चीन संघर्ष का फ़िलहाल अंत हो गया है।
चीन ने सोमवार को कहा कि भारत ने डोकलाम से अपनी सेनाएं हटा दी हैं, लेकिन चीन की सेनाएं क्षेत्र में बनी रहेंगी और क्षेत्र में अपनी संप्रभुता कायम रखेंगी।
चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीन के सीमाबल डोकलाम में गश्त जारी रखेंगे। चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हु चुनयिंग ने कहा कि 28 अगस्त की दोपहर भारत ने डोकलाम की सीमा से अपनी सेनाएं और उपकरण हटा दिए। चीन के सुरक्षाकर्मियों ने इसकी पुष्टि की है।
चुनयिंग ने आगे कहा कि चीन ऐतिहासिक समझौते के आधार पर अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखेगा।
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने करीब ढाई महीने बाद डोकलाम विवाद सुलझाने वाले इस कदम का स्वागत किया है। इसके साथ ही चीन ने भारत को इस विवाद से सीख लेने की भी नसीहत दी है।
चीन ने कहा है कि वो सतर्क रहेगा, साथ ही मुल्क की संप्रभुता की रक्षा करता रहेगा।
चीनी रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि चाईनीज मिलिट्री सतर्क रहेगी। देश की संप्रभुता की रक्षा दृढ़ता की जाएगी।
चीनी रक्षा मंत्रालय ने आगे कहा, ''हम डोकलाम विवाद की समाप्ति का स्वागत करते हैं। चीन-भारत सीमा पर शांति क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को लेकर है। ये सरहद के दोनों तरफ लोगों के समान हितों के साथ संबंध को लेकर है।''
बयान में आगे कहा गया कि हम भारत को याद दिला दें कि उसे डोकलाम विवाद से सीखने की जरूरत है। भारत स्थापित संधियों और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के बुनियादी सिद्धातों का पालन करे। साथ ही दोनों देशों की शांति के लिए भारत चीन के साथ मिलकर काम करे। हम दोनों देशों की सेनाओं के स्वास्थ्य विकास को बढ़ावा देते हैं।
भारत के साथ डोकलाम में जारी गतिरोध के बीच चीन ने एक बार फिर से भारत को धमकी दी है। करीब दो महीनों से भी ज्यादा वक्त से जारी गतिरोध के बीच चीन ने भारत को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर उसके सैनिक भारत में घुस गए तो भयंकर अव्यवस्था फैल जाएगी।
मंगलवार को चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत का यह तर्क हास्यास्पद और विद्वेषपूर्ण है कि डोकलाम में सीमा पर चीन द्वारा सड़क बनाने से नई दिल्ली को खतरा है।
चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीन किसी भी देश या व्यक्ति को अपनी सीमाई संप्रभुता के उल्लंघन की इजाजत नहीं देगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ चनयिंग ने कहा, ''भारतीय पक्ष ने चीन द्वारा रोड बनाने को बहाना बनाकर गैरकानूनी तरीके से सीमा को पार किया है। यह वजह हास्यास्पद और विद्वेषपूर्ण है।''
चनयिंग ने कहा, ''आप इसके बारे में सोच सकते हैं। अगर हम भारत के इस हास्यास्पद तर्क को सहन करते हैं तो कोई भी जिसे अपने पड़ोसी के काम पसंद न हो तो वह अपने पड़ोसी के घर में घुस जाएगा। भारत सीमा पर बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का विकास कर रहा है जो चीन के लिए खतरा है। तो क्या चीन को भारतीय क्षेत्र में घुस जाना चाहिए? अगर ऐसा होगा तो बहुत अव्यवस्था फैल जाएगी।"
बता दें कि भारत-चीन सीमा पर सिक्किम के डोकलाम में भारत और चीनी सेनाओं के बीच तीन महीने से गतिरोध जारी है। जून में भारतीय सेनाओं ने डोकलाम में चीन द्वारा किए जा रहे सड़क निर्माण कार्य को रोक दिया था।
भारत का कहना है कि यह विवादित क्षेत्र है। भारत और भूटान का कहना है कि डोकलाम भूटान का है, लेकिन चीन उस पर अपना दावा जताता है। उधर, चीन उस इलाके को अपना डोका ला या डोंगलोंग बताते हुए दावा करता है।
डोकलाम क्षेत्र सिक्किम के पास भारत-चीन-भूटान ट्राइजंक्शन पर स्थित है। यह इलाका भूटान की सीमा में पड़ता है। दरअसल, चीन जिस जगह के पास सड़क बना रहा है, वह भारत का 'चिकंस नेक' कहलाने वाले सिलीगुड़ी गलियारे के बेहद करीब स्थित है।
उत्तर पूर्वी राज्यों को भारत के बाकी हिस्से से जोड़ने वाला यह इलाका महज 20 किलोमीटर चौड़ा है और सामरिक रूप से भारत के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। इस जगह के आसपास चीनी गतिविधि भारत की सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक हैं।
चीन चाहता है कि भारत डोकलाम से अपनी सेनाएं हटा ले, जबकि भारत चाहता है चीनी सैनिक हटें, तभी भारतीय सैनिक भी साथ ही हटाए जाएंगे।
इधर, डोकलाम गतिरोध चल ही रहा था कि कुछ दिनों पहले 15 अगस्त को लद्दाख की पेंगोंग झील में घुसपैठ की कोशिश में नाकाम होते देख चीनी सैनिकों ने पत्थरबाजी शुरू कर दी थी। पत्थरबाजी से दोनों तरफ के सैनिकों को हल्की चोटें आर्इं।
पी एल ए के सैनिक दो इलाकों- फिंगर फोर और फिंगर फाइव में सुबह छह से नौ के बीच भारत की सीमा में घुसने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन दोनों ही मौकों पर भारतीय जवानों ने उनकी कोशिश असफल कर दी। जिसके बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष और बढ़ गया है। डोकलाम गतिरोध 1987 के बाद दोनों देशों की सेनाओं के बीच सबसे लंबा गतिरोध है। 1987 में अरुणाचल प्रदेश के सोमोरडोंग चु घाटी में भी दोनों देशों की सेनाओं के बीच ऐसा ही गतिरोध हुआ था।
पिछले दो महीने से डोकलाम विवाद पर भारत और चीन के बीच तनातनी चल रही है। इस बीच, ऐसे कई मौके आए, जब लगा चीन भारत के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़ना चाहता है।
अभी हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने खुलासा किया कि चीन पिछले तीन महीने यानी मई से ही वाटर डाटा साझा नहीं कर रहा है। इससे पहले दोनों देश पानी के बारे में आंकड़े साझा करते रहे हैं।
चीन द्वारा आंकड़ा साझा नहीं करने और कितना पानी तिब्बत से निकलने वाली नदियों में छोड़ा जा रहा है, इसकी जानकारी नहीं देने से बिहार-बंगाल समेत भारत के पूर्वोत्तर इलाके में इन दिनों बाढ़ आई हुई है।
पर्यावरण विशेषज्ञ और सामरिक विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा कर चीन भारत पर छद्म रूप से वाटर बम फोड़ना चाहता है।
बता दें कि चीन ने भारत आने वाली नदियों पर चुपचाप कई बांध बना रखे हैं जो भारतीय भौगोलिक क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी है।
दरअसल, चीन के पास तिब्बत एक बड़ा हथियार है। तिब्बत, पानी और कीमती धातुओं सहित प्राकृतिक संसाधनों का खजाना है। यह चीन के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा औजार है। तिब्बत के विशाल पठार से ही एशिया की अधिकांश बड़ी नदियां निकलती हैं, जो भारत समेत अन्य देशों में बहती हैं।
भारत में भी तीन बड़ी नदी प्रणाली तिब्बत से निकलती है। पहली सबसे बड़ी नदी ब्रह्मपुत्र है, जिस पर चीन ने कई बांध बना रखे हैं। 2700 किलोमीटर लंबी यह नदी भारत में अरुणाचल प्रदेश और असम होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
वाडिया इन्स्टीच्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक संतोष राय मानते हैं कि चीन इस नदी का इस्तेमाल भारत के खिलाफ वाटर बम के रूप में कर सकता है। अगर चीन ने ब्रह्मपुत्र पर बने बांध को खोल दिया तो पूर्वोत्तर भारत में जल प्रलय आ सकता है और करोड़ों की आबादी मौत के मुंह में समा सकती है।
दूसरी बड़ी नदी सतलुज है, जो तिब्बत से निकलकर हिमाचल प्रदेश और पंजाब से गुजरते हुए पाकिस्तान में सिंधु नदी की सहायक नदी बन जाती है। इसी पर भाखड़ा नांगल डैम बना है।
तीसरी नदीं सिंधु है जो कश्मीर होते हुए पाकिस्तान में जाकर बहती है और अरब सागर में मिलती है। अगर चीन ने इन नदियों पर बने बांध को खोल दिया तो उत्तरी भारत के कई राज्यों में जल प्रलय आ सकता है।
रक्षा विशेषज्ञ अनिल गुप्ता का मानना है कि अगर चीन इन नदियों पर बांध खोलकर जल युद्ध का आगाज करे तो पंजाब जलमग्न तो होगा ही, भाखड़ा डैम ठप हो जाएगा और परमाणु बम विस्फोट जैसी विभीषिका उत्पन्न हो जाएगी।
सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखे अपने ब्लॉग में कहा है कि अब जब डोकलाम विवाद तीसरे महीने में कदम रख चुका है तब भारत पर चीनी सैन्य हमले का खतरा बढ़ जाता है।
उन्होंने लिखा है कि भारत को हाइड्रोलॉजिकल डाटा ना देकर चीन ने इसका इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में करना शुरू कर दिया है। इस समय असम से लेकर उत्तर प्रदेश तक बाढ़ का कहर जारी है।
बता दें कि बाढ़ प्रभावित इलाके में जान-माल के नुकसान को कम करने, राहत सामग्री बांटने, बाढ़ की भविष्यवाणी और चेतावनी जारी करने के लिए वाटर डाटा जरूरी है।









