म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान अपना घर-बार छोड़कर विस्थापित होने पर मजबूर हैं। हज़ारों की संख्या में रोहिंग्या मुसलमाम बांग्लादेश जा रहे हैं। सैंकड़ों की संख्या में ये मारे गए हैं।
भारत में भी रोहिंग्या मुसलमान प्रवासी के तौर पर रहे हैं। म्यांमार की नेता और शांति के नोबेल सम्मान से सम्मानित आंग सान सू ची पर भी सवाल उठ रहे हैं।
रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ जारी हिंसा पर हारवर्ड केनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट की रिसर्चर डॉ लेन क्यूओक की यह रिपोर्ट बताती है कि आख़िर किन अफ़वाहों के दम पर वहां के बौद्ध चार फ़ीसदी मुसलमानों से डरे हुए हैं। उनकी रिपोर्ट पढ़िए -
म्यांमार में बौद्धों और मुसलमानों के बीच तनाव का सीधा संबंध देश के पश्चिमी राज्य रखाइन की राजधानी सिटवे में मई 2012 से अरखनीज बौद्ध और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच भड़की हिंसा से है।
इसी साल अक्टूबर में रखाइन के अन्य इलाक़ों में हिंसा भड़की। आगे चलकर न केवल रोहिंग्या बल्कि अन्य मुसलमानों को भी निशाना बनाया जाने लगा। इस संघर्ष में अब तक सैकड़ों जानें गईं और हज़ारों लोग विस्थापित हुए हैं। यह आज भी डरावने तरीक़े से जारी है।
साल 2013 में म्यांमार के अन्य इलाक़ों में भी मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़की। संयुक्त राष्ट्र से लेकर दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा को नहीं रोक पाने में वहां की सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया। दूसरी तरफ़ म्यांमार की सरकार इन दावों को सिरे से ख़ारिज करती रही।
धार्मिक टकराव का ख़तरा न केवल म्यांमार में है बल्कि सरहद पार भी इसकी आग को महसूस किया जा सकता है। दक्षिण-पूर्वी एशिया धार्मिक रूप से काफ़ी विविध है। सामान्य तौर पर यह इलाक़ा अपनी सहिष्णुता के लिए जाना जाता है। जब म्यांमार में मुस्लिमों को निशाना बनाया गया तो इसकी प्रतिक्रिया मुस्लिम बहुल देशों में भी दिखी।
मलेशिया, बांग्लादेश और इंडोनेशिया में बौद्धों पर हमले हुए। जकार्ता में एक बौद्ध केंद्र को बम से उड़ा दिया गया। इंडोनेशिया स्थित म्यांमार के दूतावास में भी बम प्लांट करने की असफल कोशिश की गई थी। इस तरह की घटनाओं से पूरे इलाक़े में धार्मिक अविश्वास पैदा होने का ख़तरा बढ़ गया है।
म्यांमार में मुस्लिम विरोधी भावना कोई नई बात नहीं है। इसकी ज़ड़ें उपनिवेशवादी नीतियों में हैं। भारत से बड़ी संख्या में म्यांमार में मुस्लिम मज़दूरों को लाया गया था। 1930 में भारतीयों के विरोध में यहां दंगे हुए थे। इनकी मांग थी कि भारतीयों को वापस भेजा जाए।
शिपों में भारतीयों की बहाली के ख़िलाफ़ लोगों का ग़ुस्सा था। इन भारतीयों के ख़िलाफ़ 1938 में भी दंगा हुआ।1938 में भारतीय मुस्लिमों के ख़िलाफ़ दंगे का संबंध कथित रूप से उस किताब से था जिसे एक भारतीय मुस्लिम ने लिखी थी। कहा जाता है कि इस किताब में बौद्ध धर्म को अपमानित किया गया था।
म्यांमार में आज की तारीख़ में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ भावना और उफान पर है। रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति यहां असाधारण रूप से समर्थन का अभाव है।
यहां के बौद्धों और ईसाइयों का मानना है कि रोहिंग्या मुस्लिम अवैध बंगाली प्रवासी हैं। इनका कहना है कि म्यांमार के 1982 के नागरिकता के नियम के तहत ये अयोग्य हैं।
1982 के नागरिकता क़ानून के तहत अगर आवेदक म्यांमार में आधिकारिक रूप से रजिस्टर्ड 135 जातीय समूह से ताल्लुक नहीं रखता है तो उसे नागरिता पाने का हक़ नहीं है। इसी नियम के कारण ग़रीब और हाशिए पर खड़े रोहिंग्या मुस्लिम दरबदर हैं। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ ग़ुस्से को उनकी नागरिकता से भी जोड़कर देखा जाता है। यहां मुस्लिमों के ख़िलाफ़ नफ़रत लगातार बढ़ती जा रही है।
म्यांमार में मुस्लिम विरोधी भावना के पीछे कारण काफ़ी जटिल है, लेकिन इनसे जुड़ी धारणाएं काफ़ी प्रबल हैं। म्यांमार में धारणा है कि मुस्लिम बहुत ज़्यादा हैं, बहुत अमीर हैं और बहुत अलग हैं। यहां के लोगों के मन में धारणा है कि मुस्लिम बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और अगर इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो भारत और इंडोनेशिया की तरह बौद्ध विरासत यहां भी ख़त्म हो जाएगी।
रखाइन में ज़्यादातर अरखनीज बौद्धों के मन में यह बात गहराई से पैठ गई है कि रखाइन का इस्लामीकरण और बर्मीकरण हो रहा है। मुस्लिमों के ख़िलाफ़ नफ़रत की दूसरी धारणा है कि मुस्लिम अपने धन का इस्तेमाल ज़मीन ख़रीदने में कर रहे हैं।
वे ऐसा करके बर्मीज महिलाओं को शादी के लिए आकर्षित करते हैं और शादी के बाद उनका धर्मांतरण करा मुसलमान बना देते हैं। इन ग़रीब रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि बेहतरीन घर, बंदूक और रॉकेट्स ख़रीद रहे हैं। इसके साथ ही इन पर मस्जिद बनाने का भी आरोप है।
अफ़वाहों के कारण मुस्लिमों के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा बढ़ रहा है। इनकी संपत्ति का नुक़सान भी लगातार हो रहा है। इन्हें प्रशासनिक अधिकारियों से ख़ुद को बचाने के लिए रिश्वत भी देनी पड़ती है। जुलाई 2013 में अमरीकी-एशियाई बिज़नेस काउंसिल में 969 मूवमेंट के बौद्ध भिक्षु ने तीसरा कारण भी बताया था।
उन्होंने कहा था कि ऐतिहासिक रूप से हिन्दुओं और ईसाइयों से अच्छे संबंधों की तुलना में मुस्लिमों से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। यहां के बौद्धों का मानना है कि मुस्लिमों की आस्था और परंपरा बिल्कुल अलग है हालांकि यह बात हिन्दू और ईसाई धर्म के बारे में भी कही जा सकती है।
टकराव की वजह अलग धर्म का होना नहीं है बल्कि मामला पहचान और अवधारणा का है। आज की तारीख़ में म्यांमार ऐतिहासिक संक्रमण काल के दौर से गुजर रहा है और इसमें साफ़ नहीं है कि कौन विजेता है और किसके हिस्से में शिकस्त है।
म्यांमार में यह भावना प्रबल हो चुकी है कि मुस्लिम बाहरी हैं और ये सोने के स्तूपों की ज़मीन पर अतिक्रमण फैला रहे हैं। इसी तर्क की पीठ पर सवार होकर म्यांमार में बौद्ध राष्ट्रवाद का प्रसार हो रहा है। ऐसी भावना तेजी से पैठ रही है कि बर्मीज का बौद्ध होना अनिवार्य है। बौद्ध राष्ट्रवाद की ज़मीन 969 मूवमेंट के दौरान ही तैयार हो गई थी।
कुछ लोगों का कहना है कि सरकार के भीतर के लोग ही मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा को हवा दे रहे हैं। अस्थिरता के तर्क पर फिर से म्यांमार में सैन्य तानाशाह के शासन को सही ठहराया जा सकता है। 2015 के चुनाव में विपक्ष की जीत हुई थी।
हालांकि इस्लाम और बौद्ध दोनों में ऊंच-नीच की भावना को सिरे से ख़ारिज किया गया है। यहां पर आध्यात्मिक श्रेष्ठता जैसी कोई चीज़ नहीं है और स्वीकार्यता को लेकर प्रतिबद्धता पर ज़ोर है।
म्यांमार की सरकार में बौद्ध संगठनों का अच्छा ख़ासा प्रभाव है। ऐसे में सरकार चाहे तो इस समस्या को सुलझा सकती है।
म्यांमार की सरकार बहुसंख्यक बौद्धों के मन से इस डर को आसानी हटा सकती है कि मुसलमान उन पर हावी नहीं होंगे। म्यांमार में कुल आबादी के महज चार फ़ीसदी ही मुस्लिम हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने कहा है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान मानवीय आपदा का सामना कर रहे हैं। गुटेरेश ने कहा कि रोहिंग्या ग्रामीणों के घरों पर सुरक्षा बलों के कथित हमलों को किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने म्यांमार से सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की है।
म्यांमार की सेना ने आम लोगों को निशाना बनाने के आरोप से इनकार करते हुए कहा है कि वह चरमपंथियों से लड़ रही है।
म्यांमार में पिछले महीने शुरू हुई हिंसा के बाद से अब तक करीब 3,79,000 रोहिंग्या शरणार्थी सीमा पार करके बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। रखाइन प्रांत में उनके कई गांव जला दिए गए हैं।
बौद्ध बहुल रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। म्यांमार उन्हें अवैध शरणार्थी मानता है। कई पीढ़ियों से वह म्यांमार में रह रहे हैं, लेकिन उन्हें वहां की नागरिकता नहीं मिली है।
रोहिंग्या के ख़िलाफ कथित हिंसा और उससे उपजे शरणार्थी संकट पर थोड़ी देर में संयुक्त राष्ट्र की बैठक होनी है।
म्यांमार के अधिकारियों का कहना है कि देश की नेता आंग सान सू ची अगले हफ़्ते 19 सितंबर को होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक अहम चर्चा में शामिल नहीं होंगी। हालांकि इसी दिन वह देश को संबोधित करेंगी।
संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी का कहना है कि बांग्लादेश में अस्थायी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को मिल रही मदद नाकाफी है।
एंटोनियो गुटेरेश ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील की है। उन्होंने कहा, ''पिछले हफ़्ते बांग्लादेश भागकर आने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या एक लाख 25 हज़ार थी। अब यह संख्या तीन गुनी हो गई है।''
उन्होंने कहा, ''उनमें से बहुत सारे अस्थायी शिविरों में या मदद कर रहे लोगों के साथ रह रहे हैं, लेकिन महिलाएं और बच्चे भूखे और कुपोषित हालत में पहुंच रहे हैं।''
क्या इस संकट को जातीय नरसंहार कहा जा सकता है, पूछे जाने पर गुटेरेश ने कहा, ''एक तिहाई (रोहिंग्या) जनसंख्या को देश छोड़कर भागना पड़ा है। क्या आप इसके लिए कोई बेहतर शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं?''
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सेना से लड़ रहे लड़ाका संगठन अराकान रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी के हमलों की भी आलोचना की है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सेना की कार्रवाई पर भी रोक लगनी चाहिए और जो लोग अपना घर छोड़कर गए हैं, उन्हें वापस आने की इजाज़त दी जानी चाहिए।
इराक़ी कुर्दिस्तान के राष्ट्रपति मसूद बरज़ानी ने संकेत दिए हैं कि यदि इस महीने होने वाले जनमत संग्रह के नतीजे इराक़ सरकार ने स्वीकार नहीं किए तो वो भविष्य के कुर्दिस्तान की सीमाएं तय कर लेंगे।
कुर्दिस्तान में आज़ादी को लेकर इसी महीने जनमत संग्रह होना है।
मसूद बरज़ानी ने बीबीसी से कहा है कि यदि कुर्द अलग देश बनाने के लिए मतदान करते हैं तो वो केंद्रीय सरकार के साथ समझौता चाहते हैं।
वहीं, इराक़ के प्रधानमंत्री ने इस जनमत संग्रह को असंवैधानिक क़रार दिया है।
बरज़ानी ने चेतावनी दी है कि यदि कोई भी समूह किरकुक के हालात को ताक़त के दम पर बदलने की कोशिश करेगा तो कुर्द उससे लोहा लेंगे।
तेल समृद्ध और तुर्क और अरब आबादी वाले किरकुक का नियंत्रण इस समय कुर्द पशमरगा बलों के हाथ में है।
शिया मिलिशिया लड़ाकों का कहना है कि किरकुक को किसी स्वतंत्र कुर्दिस्तान का हिस्सा नहीं बनने देंगे।
कुर्द मध्य पूर्व का चौथा सबसे बड़ा नस्लीय समुदाय है, लेकिन उनका कभी भी कोई स्थायी राष्ट्र नहीं रहा है।
इराक़ में कुर्दों की आबादी 15-20 प्रतिशत तक है, लेकिन यहां अरब समुदाय के नेतृत्व वाली सरकारों में उनका दशकों तक शोषण होता रहा।
1991 के खाड़ी युद्ध के बाद कुर्दों ने स्वायत्ता हासिल की थी।
कुर्दिस्तान की प्रांतीय सरकार और राजनीतिक दलों ने तीन महीने पहले स्वतंत्रता के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने का फ़ैसला लिया था।
25 सितंबर को इस जनमत संग्रह के लिए मतदान होना है।
कुर्द अधिकारियों का कहना है कि यदि लोग स्वतंत्र राष्ट्र के लिए मतदान करते हैं तो इसका मतलब तुरंत आज़ादी नहीं होगा बल्कि केंद्र सरकार के साथ अलग होने की लंबी बातचीत शुरू होगी।
बरज़ानी ने बीबीसी से कहा, ''ये पहला क़दम है। ये इतिहास में पहली बार होगा, जब कुर्द लोग अपना भविष्य स्वतंत्र होकर तय करेंगे।''
उन्होंने कहा, ''जनमत संग्रह के बाद हम बग़दाद के साथ सीमाओं, तेल संपदा और पानी के बंटवारे को लेकर बातचीत करेंगे।''
उन्होंने कहा, ''हम ये क़दम उठाएंगे, लेकिन अगर वो इसे स्वीकार नहीं करते हैं तो फिर ये अलग बात होगी।''
अमरीका और ब्रिटेन ने चेतावनी दी है कि जब इराक़ चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट से लड़ रहा है ऐसे समय में स्वतंत्रता एक बड़ा ख़तरा हो सकती है।
बरज़ानी ने इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा, ''इस क्षेत्र में कब हमारे पास स्थायित्व या सुरक्षा थी जिसे खोने का डर हमें हो? इराक़ कब इतना एकजुट था कि हमें उसकी एकता ख़त्म करने की चिंता हो। जो ऐसा कह रहे हैं वो सिर्फ़ हमें रोकने के बहाने खोज रहे हैं।''
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्विटर अकाउंट को लेकर उनकी आलोचना की जा रही है।
पीएम मोदी ट्विटर पर जिन्हें फॉलो करते हैं, उन्हें लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं।
अलग-अलग लेखों में कहा गया है कि मोदी उन लोगों को फॉलो करते हैं जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर फैला रहे हैं, महिला पत्रकारों को बलात्कार की धमकी दे रहे हैं, हिंसा फैलाने की बात कह रहे हैं।
दरअसल पांच सिंतबर (2017) को वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की बैंगलोर में उनके घर के बाहर अज्ञात अपराधियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
तब सोशल साइट्स पर बड़ी तादाद में हत्या का समर्थन किया गया। इनमें ऐसे लोग भी थे जिन्हें पीएम मोदी ट्विटर पर फॉलो करते हैं। उनमें निखिल दधिच का नाम चर्चा का विषय बना हुआ है। जिन्होंने पत्रकार की हत्या को कुत्ते की मौत मरना बताया था।
इस घटना के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पीएम मोदी पर सवाल उठाए गए।
द गार्जियन और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अंतर्राष्टीय मीडिया संस्थानों ने उनकी तीखी आलोचना करते हुए लिखा है, ''प्रधानमंत्री मोदी का ऐसे लोगों को गुप्त या खुले रूप में निरतंर समर्थन मिलता रहा।''
न्यूयॉर्क टाइम्स वर्ल्ड ट्विटर पर लिखता है, ''इस ट्वीट (दधिच) के बाद पीएम मोदी को क्या ऐसे लोगों को फॉलो करना चाहिए जिसमें एक पत्रकार की हत्या को कुत्ते की मौत बताया गया हो?''
न्यूयॉर्क टाइम्स खबर में लिखता है, ''प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी जो दुनियाभर में मशहूर हैं, ट्विटर पर ऐसे शख्स को फॉलो करते हैं जो महिला पत्रकार की हत्या को कुत्ते की मौत मरना बताता है।''
खबर में आगे लिखा गया कि ये आपत्तिजनक ट्वीट निखिल दधिच के ट्विटर अकाउंट से किया गया। हालांकि इसे बाद में डिलीट कर दिया गया था। दधिच वहीं हैं जिन्हें पीएम मोदी फॉलो करते हैं, बल्कि घटना के बाद से भी उन्हें फॉलो किया जा रहा है।
दूसरी तरफ द गार्जियन में छपे लेख में पीएम मोदी की आलोचना की गई है। लेख में कहा गया, ''भारत की सत्तापक्ष पार्टी ने अब तक पीएम मोदी के ट्विटर अकाउंट का समर्थन किया जिसमें वो निखिल दधिच जैसे लोगों को फॉलो करते हैं। मोदी ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो एक पत्रकार की मौत पर खुशी मनाते हैं। पूरे भारत की विपक्षी पार्टियों ने पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का विरोध किया, लेकिन मोदी के समर्थकों ने हत्या को जस्टीफाई किया। मोदी जिन्हें फॉलो करते हैं, वो कहते हैं पत्रकार कुत्ते की मौत मरी।''
लेख में आगे कहा गया कि जबकि पीएम मोदी अपना ट्विटर अकाउंट खुद ऑपरेट करते हैं और ट्विटर पर 1779 लोगों को फॉलो करते हैं।
अमेरिकी मीडिया क्वार्ट्ज लिखता है, ''भारत में प्रधानमंत्री को लोग ब्लॉक कर रहे हैं। #BlockNarendraModi सात सिंतबर को ट्विटर पर टॉप ट्रेंडिंग में रहा।''
चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स लिखता हैं, ''पत्रकार की हत्या के बाद सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री मोदी का विरोध किया गया। मोदी पर आरोप है कि उन्होंने अभी तक पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की निंदा नहीं की।''
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ज़ईद राद अल हुसैन ने रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से वापस भेजने की मोदी सरकार की कोशिशों की निंदा की है।
अल हुसैन ने कहा कि भारत के गृह राज्य मंत्री ने कथित रूप से बयान दिया है कि चूंकि भारत रिफ्यूजी कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाला देश नहीं है इसलिए भारत इस मामले पर अंतर्राष्ट्रीय कानून से हटकर काम कर सकता है, लेकिन बुनियादी मानव करुणा के साथ।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख के मुताबिक, भारत का ये कदम अतंर्राष्ट्रीय कानूनों और प्रावधानों के अनुसार विधिसंगत नहीं होगा।
उन्होंने कहा, ''हालांकि प्रचलित कानून के आधार पर भारत रोहिंग्या मुसलमानों का उन देशों या उन इलाकों में सामूहिक निष्कासन नहीं कर सकता है, जहां उन पर अत्याचार होने की आशंका है या फिर उन्हें निशाना बनाया जा सकता है।''
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस वक्त भारत में 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं। इनमें से 16 हजार लोगों ने शरणार्थी दस्तावेज भी हासिल कर लिये हैं।
इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने ये भी कहा कि म्यांमार में अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ हिंसा और अन्याय 'नस्ली सफाये' की मिसाल मालूम पड़ती है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र को संबोधित करते हुए ज़ईद राद अल हुसैन ने पहले 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमले की बरसी का उल्लेख किया और फिर म्यांमार में मानवाधिकार की स्थिति को लेकर चिंता प्रकट की।
उन्होंने बुरूंडी, वेनेजुएला, यमन, लीबिया और अमेरिका में मानवाधिकार से जुड़ी चिंताओं के बारे में बात की।
ज़ईद राद अल हुसैन ने कहा कि हिंसा की वजह से म्यांमार से 270,000 लोग भागकर पड़ोसी देश बांग्लादेश पहुंचे हैं और उन्होंने 'सुरक्षा बलों और स्थानीय मिलीशिया द्वारा रोहिंग्या लोगों के गांवों को जलाए जाने' और न्याय से इतर हत्याएं किए जाने की खबरों और तस्वीरों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, ''चूंकि म्यांमार ने मानवाधिकार जांचकर्ताओं को जाने की इजाजत नहीं दी है, मौजूदा स्थिति का पूरी तरह से आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन यह स्थति नस्ली सफाए का उदाहरण प्रतीत हो रही है।''
उधर, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी ने कहा है कि म्यांमार के रखाइन प्रांत में ताजा हिंसा की वजह से 25 अगस्त से अब तक 3,13,000 रोहिंग्या बांग्लादेश की सीमा में दाखिल हो चुके हैं।
म्यांमार के मध्य हिस्से में एक मुस्लिम परिवार के मकान पर पथराव करने वाली भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने रबर की गोलियां चलाईं। भीड़ ने मागवे क्षेत्र में रविवार रात हमला किया।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था के प्रमुख ने कहा है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों को निशाना बनाकर की जा रही सुरक्षा कार्रवाई 'जातीय नरसंहार का एक सटीक उदाहरण' है।
इसके साथ ही संस्था प्रमुख ज़ईद राद अल हुसैन ने म्यांमार से रखाइन प्रांत में 'क्रूर सैन्य कार्रवाई' को ख़त्म करने की अपील की।
पिछले महीने शुरू हुई हिंसा के बाद म्यांमार से तीन लाख से भी ज़्यादा रोहिंग्या मुसलमान पलायन कर चुके हैं।
म्यांमार की सेना का कहना है कि उसकी कार्रवाई केवल रोहिंग्या चरमपंथियों के ख़िलाफ़ है।
आम लोगों को किसी तरह से निशाना बनाने के आरोप से भी सेना इनकार करती है।
25 अगस्त को रखाइन के उत्तरी इलाके में रोहिंग्या चरमपंथियों ने पुलिस चौकियों को निशाना बनाया। इस हमले में 12 सुरक्षा कर्मी मारे गए थे।
इस घटना के बाद से ही वहां हिंसा भड़क गई और रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश की ओर मजबूरन पलायन करना पड़ा।
रोहिंग्या शरणार्थियों का कहना है कि म्यांमार की सेना रखाइन में उनके ख़िलाफ़ बर्बर अभियान चला रही है, गांव जलाए जा रहे हैं, उन्हें वहां से खदेड़ने के लिए आम लोगों पर हमले किए जा रहे हैं।
म्यांमार का बौद्ध बहुल रखाइन प्रांत बांग्लादेश की सीमा से लगता है और यहां रोहिंग्या मुसलमान अल्पसंख्यक हैं।
यूनाइटेड नेशन हाई कमिश्नर फ़ॉर ह्यूमन राइट्स के प्रमुख ज़ईद राद अल हुसैन ने कहा कि रखाइन में मौजूदा कार्रवाई साफ़ तौर पर गैरवाजिब है।
आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना म्यांमार के उत्तरी सूबे रख़ाइन में सक्रिय एक सशस्त्र संगठन है। ये संगठन रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए सशस्त्र संघर्ष कर रहा है और इसके ज़्यादातर सदस्य बांग्लादेश से आए अवैध शरणार्थी बताए जाते हैं।
इस संगठन की अगुवाई अताउल्लाह नाम का एक शख़्स कर रहा है। अताउल्लाह वीडियो संदेशों के ज़रिए रखाइन में अपने संगठन की गतिविधियों के बारे में बताता रहता है।
म्यांमार की सरकार की नज़र में आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना एक चरमपंथी संगठन है।
अताउल्लाह विदेशी इस्लामी चरमपंथियों से संबंध रखने के आरोपों से इनकार करते हैं। अताउल्लाह का कहना है कि उनकी लड़ाई देश के बौद्ध बहुमत के दमन के ख़िलाफ़ है।
उन्होंने कहा, ''अगर हमें हमारे हक़ नहीं मिलते और अगर इस लड़ाई में लाखों रोहिंग्या मुसलमानों की जान चली जाती है तो हम मरते दम तक तानाशाह सैनिक सरकार के ख़िलाफ़ लड़ते रहेंगे। हम रात के वक़्त रोशनी नहीं जला सकते। हम दिन के वक़्त एक जगह से दूसरे जगह नहीं जा सकते। हर जगह नाकाबंदी है। ज़िंदगी जीने का ये तो कोई तरीका नहीं है।''
अगस्त में पुलिस चौकियों पर आराकान रोहिंग्या रक्षा सेना के सशस्त्र हमलावरों ने कथित तौर पर हमला किया जिसके बाद रख़ाइन में रोहिंग्या मुसलमानों का संकट गहरा गया।
इसके बाद म्यांमार के सुरक्षा बलों की कार्रवाई शुरू और तब से हज़ारों मुसलमानों बांग्लादेश की तरफ़ पलायन कर गए हैं।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि म्यांमार के सुरक्षा बलों ने रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर नरसंहार और गैंग रेप को अंजाम दिया है।
संयुक्त राष्ट्र ने इसे मानवता के विरुद्ध अपराध करार दिया है।
हालांकि म्यांमार की सेना इन आरोपों से इनकार करती है और उसका कहना है कि उसने वैध तरीके से चरमपंथ विरोधी अभियान चलाया है।
म्यांमार के उत्तर पश्चिमी इलाके के रखाइन प्रांत में दस लाख से ज़्यादा रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं, लेकिन उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी नागरिक अधिकारों से मरहूम रखा गया है।
नार्वे के नोबेल संस्थान ने आज कहा कि म्यांमार की नेता आंग सांग सू ची को वर्ष 1991 में दिये गये पुरस्कार को वापस नहीं लिया जा सकता।
नॉर्वे के नोबेल संस्थान के प्रमुख ओलव जोल्सताद ने एक ईमेल के जरिये एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि ना ही पुरस्कार के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल के वसीयत के अनुसार और ना ही नोबेल फाउंडेशन के नियमों के अनुसार प्राप्तकर्ताओं से पुरस्कार वापस लेने का कोई प्रावधान है।
उन्होंने कहा है, ''एक बार नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किये जाने के बाद प्राप्तकर्ता से पुरस्कार वापस नहीं लिया जा सकता।''
ओलव ने कहा, ''स्टॉकहोम और ओस्लो की किसी भी पुरस्कार समिति ने पुरस्कार प्रदान किये जाने के बाद उसे वापस लेने के बारे में विचार नहीं किया है।''
बता दें कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हो रहे कथित उत्पीड़न को लेकर करीब 3,86,000 लोगों ने ऑनलाइन पिटीशन पर हस्ताक्षर कर सू ची से नोबेल पुरस्कार वापस लेने की मांग की है। सू ची म्यांमार की सुप्रीम लीडर हैं। उन्हें म्यांमार की भाषा में स्टेट काउंसलर कहा जाता है।
इधर संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि ने कहा है कि म्यांमार के राखिने प्रांत में अबतक एक हजार से ज्यादा लोगों के मारे जाने की आशंका है जिनमें ज्यादातर रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के सदस्य हैं।
यह संख्या सरकारी आंकड़ों से लगभग दुगुनी है। म्यांमार में मानवाधिकारों के संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक, यांघी ली ने कहा, ''मुमकिन है कि अबतक एक हजार या उससे ज्यादा लोगों की जान गई हों। इसमें दोनों तरफ के लोग हो सकते हैं, लेकिन ज्यादा बड़ी संख्या रोहिंग्या की होगी।
पिछले केवल दो सप्ताह में 1,64,000 नागरिक भागकर बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में चले गए हैं। इनमें से ज्यादातर रोहिंग्या हैं। यह शिविर पहले से ही लोगों से खचाखच भरे हुए हैं।
कई अन्य की मौत राखिने में हो रही हिंसा से बचने के क्रम में भागने के दौरान हुई।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि यहां रोहिंग्या चरमपंथियों द्वारा 25 अगस्त को श्रृंखलाबद्ध तरीके से शुरू किए गए हमलों के कारण सेना की जवाबी कार्रवाई शुरू हुई जिसमें समूचे गांव जल गए।
रोहिंग्या मुसलमानों को बौद्ध वर्चस्व वाले म्यांमार में लंबे समय से भेदभाव का सामना करना पड़ा है। म्यांमार में कई पीढ़ियों से निवास करने के बावजूद उन्हें यहां की नागरिकता से वंचित रखा गया है और उनको बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों के तौर पर देखा जाता रहा है।
ली द्वारा दिए गए यह आंकड़े आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज्यादा हैं जिसके मुताबिक मृतकों की कुल संख्या 475 ही है।
बृहस्पतिवार को अधिकारियों द्वारा जारी किए गए नए आंकड़ों के मुताबिक, म्यांमार की ओर से बताया गया है कि 25 अगस्त से अब तक रोहिंग्या के 6,600 घर और गैर-मुसलमानों के 201 घर जलकर खाक हो गए हैं।
उन्होंने बताया कि इस संघर्ष में 30 नागरिक मारे गए जिनमें सात रोहिंग्या, सात हिंदू और 16 राखिने बौद्ध शामिल थे।
म्यांमार की सेना ने इससे पहले कहा था कि उन्होंने 430 रोहिंग्या आतंकियों को मार गिराया। अधिकारियों ने बताया था कि अगस्त के हमलों में 15 सुरक्षाकर्मियों की भी मौत हो गई थी।
अमेरिकी दूतावास ने बुधवार को वरिष्ठ कन्नड़ पत्रकार-सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या की निंदा की।
अमेरिकी दूतावास ने एक बयान में कहा, ''भारत में अमेरिकी मिशन भारत व दुनिया भर में प्रेस की आजादी के समर्थकों के साथ मिलकर बेंगलुरु में सम्मानित पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की निंदा करता है।''
इसमें कहा गया है, ''हम सुश्री लंकेश के परिवार, मित्रों व सहयोगियों के साथ संवेदना प्रकट करते हैं।''
गौरी लंकेश की तीन अज्ञात हमलावरों ने उस समय गोली मारकर हत्या कर दी, जब वह अपने कार्यालय से घर लौटी थीं। लंकेश लोकप्रिय कन्नड़ टेबलॉयड 'लंकेश पत्रिके' की संपादक थीं।
लंकेश की हत्या के विरोध में बुधवार को पूरे कर्नाटक में प्रदर्शन हुए। विरोध प्रदर्शन कर रही भीड़ में पत्रकार, कार्यकर्ता, लेखक, चिंतक और महिला संगठनों के कार्यकर्ता शामिल हैं। लोग यहां मौन विरोध प्रदर्शन करने के लिए टाउन हॉल में एकत्रित हुए और उन्होंने तख्तियां पकड़ रखी थी।
एक तख्ती पर लिखा था, ''आप किसी शख्स की हत्या कर सकते हैं, उसके विचारों की नहीं।''
विक्टोरिया अस्पताल परिसर में भी पत्रकारों ने मौन विरोध प्रदर्शन किया, जहां उनका (गौरी लंकेश) पोस्टमॉटर्म हुआ है। राज्य भर में मंगलुरू, कलबुरगी, धारवाड़, कोप्पल आदि क्षेत्रों में नागरिकों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया।
हत्या के विरोध में मैसूर में पत्रकारों ने अपने कंधों पर काले फीते बांधे और उपायुक्त कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया। नई दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और भारत के अन्य शहरों में भी बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किये गए।
इस बीच, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी बुधवार को अपने सभी आधिकारिक कार्यक्रम रद्द कर दिए। मुख्यमंत्री कार्यालय के एक अधिकारी ने कहा, ''मुख्यमंत्री ने मंगलवार रात घटी घटनाओं के मद्देनजर केरल की एक दिन की यात्रा सहित अपने सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं।''
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस हत्या पर हैरानी और चिंता जताते हुए बुधवार को कहा, ''इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।''
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बीजेपी पर असहमति जताने पर चुप कराने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह उनकी (बीजेपी) विचारधारा का हिस्सा है। उन्होंने कहा, ''जो भी बीजेपी के खिलाफ बोलता है, उसे चुप करा दिया जाता है....।''
म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार अभी जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अभी तक करीब 400 लोगों की मौत इस हिंसा में हो चुकी है।
रोहिंग्या मुस्लिमों की हत्या का आरोप म्यांमार के सैनिकों पर लगाया जा रहा है। अल्पसंख्यक समुदाय के वकील का कहना है कि इस नरसंहार के सबूत मिटाने के लिए म्यांमार के सैनिक और स्थानीय बौद्ध लोग साथ में लगे हुए हैं। ये लोग मारे गए रोहिंग्या मुस्लिमों की लाशों को इकट्ठा करते हैं और फिर जला देते हैं।
म्यांमार के राखिने क्षेत्र में हिंसा पर नजर रखने वाली एक संस्था अराकन प्रोजेक्ट की डायरेक्टर क्रिस लेवा ने बताया कि हमारे पास दस्तावेज हैं कि राथेडाउंग क्षेत्र में एक साथ 130 लोगों को मार दिया गया। साथ ही उन्होंने कहा कि अन्य तीन गांवों में भी दर्जनों लोगों को मार देने की खबर मिली है।
उन्होंने बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से बात करते हुए कहा, ''हम सोचते हैं कि 130 लोग मारे गए हैं, लेकिन यह आंकड़ा इससे भी ज्यादा है। सुरक्षाबल गांवों को घेर लेते हैं और फिर लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग करते है। पिछले साल अक्टूबर-नवंबर महीने में हुई हिंसा की इस बार की हिंसा से तुलना करें तो इस बार यह देखने को मिला है कि इस बार सेना के साथ स्थानीय बौद्ध लोग भी मिले हुए हैं। लोगों की हत्या के बाद हम देख रहे हैं कि सेना और आम लोग मिलकर मृतकों के शवों को इकट्ठा कर रहे हैं और उन्हें जला दते हैं, ताकि कोई सबूत ना रहें।''
वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यू एन एच सी आर) ने मंगलवार को कहा कि म्यांमार में हिंसा से बचने के लिए देश छोड़कर बांग्लादेश पलायन करने वाले रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की संख्या पूर्व में सोची गयी संख्या से कहीं ज्यादा 1,23,000 है।
यू एन एच सी आर की प्रवक्ता विवियन टैन ने कहा कि रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों की यह संख्या कल की अनुमानित संख्या 87,000 से बढ़ायी गयी है जो स्थापित एवं अस्थायी शरणार्थी शिविरों से जुटाए गए ज्यादा सटीक आंकड़े पर आधारित है।
उन्होंने कहा कि इसका मतलब है कि सभी 36,000 नए शरणार्थियों ने पिछले 24 घंटे में प्रवेश किया। तब भी 'यह संख्या चिंताजनक है' और 'तेजी से बढ़ती जा रही है।'
रोहिंग्या मुस्लिमों का ताजा पलायन 25 अगस्त को तब शुरू हुआ, जब रोहिंग्या विद्रोहियों ने म्यांमार पुलिस की चौकियों पर हमले किए जिसके बाद सुरक्षाबलों ने जवाब में विद्रोहियों के सफाए के लिए अभियान शुरू किया।









