विदेश

मेक्सिको में 200 से ज़्यादा लोगों की मौत, 7.1 तीव्रता का भूकंप

मेक्सिको की राजधानी मेक्सिको सिटी में आए शक्तिशाली भूकंप में 200 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई है और दर्जनों इमारतें जमींदोज़ हो गई हैं।

राहतकर्मी मलबों में जीवित बचे लोगों की तलाश का अभियान चला रहे हैं और अधिकारियों का कहना है कि मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है।

मेक्सिको सिटी के एक स्कूल के बारे में माना जा रहा है कि वहां बच्चे फंसे हो सकते हैं। बड़े पैमाने पर वॉलेंटियर्स आपातकालीन सेवाओं के लिए तैनात हैं।

मेक्सिको के राष्ट्रपति ने टीवी पर दिए एक संदेश में कहा कि सेना बुलाई गई है और बचाव और राहत कार्य रात में भी जारी रखा जाएगा।

रिक्टर पैमाने पर 7.1 की तीव्रता वाले भूकंप ने मेक्सिको सिटी, मोरलियोस और पुएब्ला प्रांतों में भारी तबाही मचाई है।

मेक्सिको में 32 साल पहले ठीक इसी तारीख को एक तबाही वाला भूकंप आया था जिसमें 10,000 लोग मारे गए थे।

मंगलवार को मेक्सिको सिटी में लोग भूकंप के समय बचाव कैसे किया जाए। उसका ड्रिल कर रहे थे। तभी ये तबाही हुई।

मेक्सिको सिटी के एयरपोर्ट पर थोड़ी देर के लिए विमान यातायात रोक दिया गया था और पूरे शहर की इमारतें खाली करवा ली गई थीं।

मेक्सिको में भूकंप की संभावना हमेशा रहती है।

इसी महीने रिक्टर पैमाने पर 8.1 की तीव्रता का भूकंप देश के दक्षिणी हिस्से में आया था जिसमें कम से कम 90 लोगों की मौत हो गई थी।

मंगलवार के भूकंप का केंद्र पुएब्ला प्रांत के एटेंसिगो के करीब था।

ये इलाका मेक्सिको सिटी से 120 किलोमीटर की दूरी है। अमरीकी जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक, भूकंप की गहराई 51 किलोमीटर थी।

अकेले मोरलियोस राज्य में 54 लोग मारे गए हैं और पुएब्लो में 26 लोगों के मारे जाने की ख़बर है।

मेक्सिको सिटी में 30 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, जबकि मेक्सिको प्रांत में नौ लोगों की मौत हुई है।

भूकंप स्थानीय समय के अनुसार एक बजकर 14 मिनट पर आया।

मेक्सिको के राष्ट्रपति एनरिक पेना निएटो ने लोगों से अपील की है कि वो सड़कों पर न रुकें ताकि इमरजेंसी सेवाएं आसानी से प्रभावित इलाकों में पहुंच सकें।

राजधानी के कई इलाकों में फ़ोन सेवा बाधित है और क़रीब 40 लाख लोग बिना बिजली के हैं।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने ट्वीट किया है, ''ईश्वर मेक्सिको सिटी के लोगों का ख़्याल रखें। हम आपके साथ हैं और हमेशा साथ रहेंगे।''

उत्तर कोरियाई रॉकेट मैन ख़ुदकुशी के मिशन पर है: डोनल्ड ट्रंप

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने मंगलवार को पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन को संबोधित किया। इस संबोधन को ट्रंप काल में अमरीका की विदेश नीति की झलक के तौर पर देखा जा रहा था।

ट्रंप ने साझा हितों में गठजोड़ की बात तो कही, लेकिन विदेशी ज़मीनों पर राष्ट्र-निर्माण के काम से अमरीका के अलग होने की ओर बढ़ने के संकेत भी दिए।

आठ महीने पहले अमरीका के राष्ट्रपति पद की कुर्सी संभालने वाले ट्रंप ने 193 सदस्य देशों वाले संयुक्त राष्ट्र के सालाना अधिवेशन में परमाणु सक्षम अस्थिर देशों के ख़तरे के प्रति विश्व नेताओं को सचेत किया और उत्तर कोरिया को सख़्त शब्दों में धमकी दी, लेकिन ट्रम्प ने म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा।

ट्रंप के संबोधन की अहम बातें ये हैं:

'उत्तर कोरिया को ट्रम्प की धमकी'
- अमरीका के पास बड़ी ताक़त और बड़ा धैर्य है, लेकिन वह अपनी और अपने सहयोगियों की रक्षा के लिए मजबूर है। हमारे पास उत्तर कोरिया को पूरी तरह तबाह करने के सिवा कोई विकल्प नहीं होगा।

- रॉकेट मैन अपने और अपने देश के लिए ख़ुदकुशी के मिशन पर है। अमरीका तैयार, सक्षम और तत्पर है, पर उम्मीद है कि उसकी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

- उत्तर कोरिया पर पाबंदी के प्रस्ताव के समर्थन के लिए चीन और रूस को धन्यवाद, लेकिन इससे भी कहीं ज़्यादा करने की ज़रूरत है।

- हमारी धरती का एक बड़ा संकट कुछ अस्थिर देशों का एक छोटा समूह है- जो हर उस सिद्धांत का उल्लंघन करता है जिस पर संयुक्त राष्ट्र की बुनियाद है। वे न अपने नागरिकों का सम्मान करते हैं और न ही दूसरे देशों की संप्रभुता का।

'अमरीका का हित सबसे ऊपर'
- आतंकियों और चरमपंथियों ने ताक़त जुटा ली है और वे पूरी धरती पर फैल गए हैं।

- अमरीका हमेशा पूरी दुनिया का, ख़ास तौर से अपने सहयोगियों का अच्छा मित्र रहेगा, लेकिन अब हमारा और फायदा नहीं उठाया जा सकता या हमें एकतरफ़ा समझौतों में नहीं धकेला जा सकता, जहां हमें रिटर्न में कुछ नहीं मिलता।

- जब तक मैं इस पद पर हूं, मैं अमरीका के हित को सबसे ऊपर रखूंगा।

'ईरान समझौता शर्मिंदगी की वजह बना'
- ईरान से 2015 में हुआ परमाणु समझौता अमरीका के लिए शर्मिंदगी है। ईरान हिंसा निर्यात करने वाला आर्थिक तौर पर जर्जर और अस्थिर देश है।

- अमरीका अपनी इच्छा दूसरे देशों पर नहीं थोपना चाहता और उनकी संप्रभुता का सम्मान करना चाहता है।

- मुझे ताक़त अपने पास रखने के लिए नहीं, बल्कि अमरीकी लोगों को ताक़त देने के लिए चुना गया है।

- राष्ट्रपति के तौर पर मैं हमेशा अमरीका को पहले रखूंगा। जैसे आप लोगों को भी अपने देश को सबसे पहले रखना चाहिए।

'वेनेज़ुएला में कार्रवाई के लिए तैयार'
- लोगों की ज़िंदग़ियां सुधारने के लिए राष्ट्र राज्य आज भी सबसे अच्छा ज़रिया है।

- यूक्रेन से लेकर दक्षिण चीन सागर तक हमें संप्रभुता पर आने वाली चुनौतियों को ख़ारिज़ करना होगा।

- सीरिया में हम तनाव की स्थिति दूर करना चाहते हैं और एक ऐसे राजनीतिक हल पर पहुंचना चाहते है, जिसमें सीरियाई लोगों का सम्मान हो।

- वेनेज़ुएला की सरकार अगर अपने देशवासियों का दमन करती रही तो अमरीका आगे की कार्रवाई के लिए तैयार है। वहां लोकतंत्र की पूरी तरह बहाली और राजनीतिक आज़ादी होनी चाहिए।

- कुछ देश नरक में जा रहे हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र इनमें से कुछ भयावह स्थितियों से उबरने में मदद कर सकता है।

- अमरीका संयुक्त राष्ट्र की फंडिंग का नाजायज़ बोझ उठाता है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकारों की रक्षा के लिए म्यांमार में सैनिक हस्तक्षेप करेगा

रोहिंग्या संकट के बीच म्यांमार की नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अधिवेशन में न शामिल होने का फैसला लिया। हालांकि, इसी दिन उन्होंने म्यांमार में ही अपने देशवासियों को संबोधित किया।

आख़िर क्या वजह रही कि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और लोकतंत्र समर्थक के तौर पर विख्यात रहीं आंग सान सू ची संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस अधिवेशन में नहीं पहुंचीं?

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार पुष्पेश पंत ने बीबीसी से कहा कि आंग सान सू ची के इस अधिवेशन में न जाने की वजह साफ है। उन्हें लगता है कि वहां उन्हें वे सारे राष्ट्र घेरने की कोशिश करेंगे जो रोहिंग्या मसले पर मानवीय मूल्यों के संरक्षक हैं और चूंकि वह नोबेल शांति पुरस्कार विजेता हैं तो निश्चय ही उनके लिए यह स्थिति असमंजस की होगी।

पुष्पेश पंत ने संयुक्त राष्ट्र संघ पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर आंग सान सू ची उस अधिवेशन में नहीं गईं तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट गया? आज संयुक्त राष्ट्र संघ क्या एक ऐसी संस्था है, जिसकी कोई सार्थकता या महत्व - सामरिक या किसी और तरह की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में है?

पुष्पेश पंत ने कहा, ''इस संस्था का 98 फीसदी बजट इसके अपने कर्मचारियों के पेंशन और भत्तों आदि पर ख़र्च होता है। सिवाय इसके कि सुरक्षा परिषद में कुछ निरर्थक चर्चाएं होती हैं और प्रस्ताव पारित होते हैं। वहां जाने न जाने से क्या फर्क पड़ता है, मुझे समझ नहीं आता।''

आगे पुष्पेश पंत ने कहा कि 40-42 बरस अंतरराष्ट्रीय संबंध पढ़ाने और पढ़ने के बाद मैंने ये पाया है कि युद्ध के बाद विजेताओं ने जिस मक़सद से संयुक्त राष्ट्र का गठन किया था, उसकी संरचनात्मक कमज़ोरियां इतनी विकट हैं कि आज के संसार में उसकी कोई सार्थकता रह नहीं गई है।

पुष्पेश पंत ने कहते हैं, ''अमरीका ने जो संयुक्त राष्ट्र में नौकरशाही को सरल करके ख़र्च में कटौती की बात कही है, वो मुझे लगता है कि बहुत सार्थक सुझाव है। मगर क्या अमरीका यह कर सकता है। अमरीका निश्चित तौर से संयुक्त राष्ट्र के बजट का सबसे बड़ा दाता है।''

प्रोफेसर पुष्पेश पंत ने कहा, ''वैसे संयुक्त राष्ट्र में सुधार के सुझाव पहली बार नहीं आए हैं। मुझे याद है जब मैं लड़कपन में था तो ख्रुश्चेव ने 'ट्रॉयका' वाला एक सुझाव दिया था कि तीन घोड़े गाड़ी को अलग-अलग दिशाओं में खींचेंगे। मगर मुझे लगता है कि तब से अब तक 60 वर्ष बीत गए हैं, पर कहीं कोई अंतर तो पड़ा नहीं है। मेरे ख़्याल में वहां आंग सान सू ची का न जाना समझ में आता है, लेकिन उसके पक्ष में पेश करने के लिए मैं यह बात नहीं कह रहा हूं।''

पुष्पेश पंत ने सवाल उठाते हुए कहा, ''जो कार्रवाई अभी आंग सान सू ची से अपेक्षित है, वो वह नहीं करतीं तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के पास क्या विकल्प है? सारे आर्थिक प्रतिबंध लगाने के बाद जब आप उत्तर कोरिया को नहीं रोक पाए तो आप क्या सू ची का क्या बिगाड़ लेंगे? क्या आप उनके ख़िलाफ़ आर्थिक प्रतिबंध लगाएंगे? क्या मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सैनिक हस्तक्षेप की बात कहेंगे?

पश्चिमी देशों की आलोचना करते हुआ प्रोफेसर पुष्पेश पंत कहते हैं, इन्हीं सू ची का पश्चिम ने मानवाधिकारों की रक्षिका के रूप में महिमामंडन किया था। आज भस्मासुर की तरह उन्हीं के गले पड़ गया है।

पुष्पेश पंत कहते हैं, रोहिंग्या समस्या मानवीय और मार्मिक तो है, मगर ये इतनी सीधी और सरल नहीं है। भारत में जिस तरह इसे हिंदुत्व, मुसलमानों और धर्मनिरपेक्षता की नीति के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। ये कौन सा शरणार्थियों को शरण देने का तर्क है कि वो बड़ी संख्या में प्रवेश भी करेंगे और वो उन जगहों पर रहेंगे, जहां वे रहना चाहते हैं। यह बात समझ में नहीं आती कि जम्मू-कश्मीर राज्य में वह कैसे पहुंच जाते हैं?

पुष्पेश पंत कहते हैं, ''रोहिंग्या मासूम हो सकते हैं, निर्दोष हो सकते हैं। मगर रोहिंग्याओं को राज्यविहीन व्यक्ति आंग सान सू ची ने नहीं बनाया है। इसका इतिहास 50-60 साल पुराना है। मेरा ख़्याल है कि आंग सान सू ची को ज़रूरत से ज़्यादा दोष देना निरर्थक है।''

अब चीन को रोकना भारत और जापान के लिए आसान नहीं है

पिछले हफ़्ते जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे के भारत दौरे को विदेशी मीडिया ने काफी तवज़्ज़ो दिया। इस दौरे को लेकर चीनी मीडिया में भी काफ़ी हलचल रही।

चीनी मीडिया ने इस दौरे को शक के नज़रिए से देखा। हालांकि यह भी कहा कि चीन को इस दोस्ती से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। दूसरी तरफ़ चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और चीन के सीमा विवाद में किसी तीसरे पक्ष को नहीं आना चाहिए।

ग्लोबल टाइम्स चीन की सत्ताधारी कॉम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र है। कहा जाता है कि यह अख़बार चीन के रुख को ही सामने रखता है।

सोमवार को ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे पिछले चार सालों में तीन बार भारत के दौरे पर जा चुके हैं।

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''नंवबर 2016 में भारत और जापान में असैन्य परमाणु करार हुआ है. अबे का भारत दौरा इसलिए भी महत्वूर्ण था. जापान ने जानबूझकर भारत के साथ यह क़रार किया, जबकि उसे पता है कि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है।''

''अबे ने भारत को यूएस-2 ऐम्फिबीअन एयरक्राफ्ट देने को भी मंजूरी दे दी है। यह भारत के साथ सबसे अहम सुरक्षा समझौता है। भारत जापान से विकास कार्यों में सबसे ज़्यादा मदद पाने वाला देश बन गया है।''

ग्लोबल टाइम्स ने आगे लिखा है, ''भारत औऱ जापान के नेताओं की हर मुलाक़ात में चीन प्राथमिकता के स्तर पर आता है। भारतीय मीडिया में इस यात्रा को डोकलाम विवाद के कारण काफ़ी तवज्जो मिली। भारत को जापान जिस तरह से चीन के ख़िलाफ़ भ्रमित कर रहा है, उसे लेकर सतर्क रहना चाहिए।''

अख़बार ने लिखा है, ''चीन के मसले पर भारत से जापान फ़ायदा उठा रहा है। इसी साल मई महीने में अमरीका और जापान चीन के वन बेल्ट वन रोड में शामिल हुए थे, जबकि भारत ने इसका बहिष्कार किया था। भारत इसे मिसाल के तौर पर देख सकता है कि जिसका उसने बहिष्कार किया, उसमें जापान शरीक हुआ।

वहीं फ़ोर्ब्स ने लिखा है कि हिन्द महासागर के ट्रेड रूट्स में चीन के फैलाव को देखते हुए भारत और जापान अब साथ आए हैं।

हालाँकि फ़ोर्ब्स ने लिखा है कि हिन्द महासागर में चीन के विस्तार को भारत और जापान के नए मिशन से रोकना आसान नहीं है।

फोर्ब्स ने लिखा है कि दोनों देशों ने काफ़ी देरी कर दी है और पर्याप्त संसाधन भी नहीं हैं।

फ़ोर्ब्स ने लिखा है, ''जापान भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर और उसकी परमाणु क्षमता को दुरुस्त करने में मदद कर रहा है। दोनों देश हिन्द महासागर में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास करने जा रहे हैं। इससे पहले दोनों देशों ने पिछले साल बंगाल की खाड़ी में नौसैनिक अभ्यास किया था।''

''हिन्द महासागर हमेशा से अफ़्रीका और मध्य पूर्व के साथ अन्य एशियाई देशों से व्यापार के लिए रणनीतिक जलक्षेत्र रहा है। हाल के वर्षों में चीन ने यहां अपना व्यापक पैमाने पर पांव फैलाया है।''

फ़ोर्ब्स ने आगे लिखा है, ''हिन्द महासागर में बिना मजबूत मौजूदगी के चीन साउथ चाइना सी में भी अपना प्रभुत्व नहीं जमा सकता है। इसका कारण यह है कि स्ट्रेट ऑफ मलाका एक ब्लॉकेड है। अमरीका और उसके सहयोगी मध्य-पूर्व से चीन की तेल आपूर्ति को बंद कर सकते हैं। इसके साथ ही चीन को अफ़्रीका से भी अलग किया जा सकता है।''

हालांकि फ़ोर्ब्स का कहना है कि भारत और जापान ने काफ़ी देरी कर दी है। चीन ने पहले ही श्रीलंका में हम्बनटोटा पोर्ट को हासिल कर लिया है। अब यह पोर्ट 99 सालों तक चीन के कब्ज़े में होगा। इसके साथ ही चीन मध्य-पूर्व और अफ़्रीका से जुड़ने के लिए पाकिस्तान के रास्ते इकनॉमिक कॉरिडोर बना रहा है।

फ़ोर्ब्स ने अपनी एक और रिपोर्ट में लिखा है कि भारत और जापान की दोस्ती चीन को परेशान कर रही है।

फ़ोर्ब्स ने लिखा है, ''हाल ही में डोकलाम में भारत और चीन की सेना आमने-सामने थी। चीन वहां सड़क बना रहा था और भारत ने उसे रोक दिया। 73 दिनों तक दोनों देशों की सेना 120 मीटर की दूरी पर आमने-सामने थी। अब भी यहां दोनों देशों के सैनिक 150 मीटर की दूरी पर आमने-सामने हैं।''

टाइम मैगज़ीन ने भी शिंज़ो अबे के भारत दौरे को काफ़ी तवज्जो दी है। टाइम ने लिखा है कि मोदी और अबे में अनौपचारिक संबंध को महसूस किया जा सकता है।

टाइम ने लिखा है, ''जापान और भारत एशिया में दूसरी और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। दोनों के बीच व्यापार अब भी छोटा है। 2013 में दोनों देशों के बीच व्यापार 15.8 अरब डॉलर का था जो कि चीन और भारत के व्यापार का मुश्किल से एक तिहाई है।''

''जापान का भारत में 2007 से 2013 के बीच सीधा निवेश 15.8 अरब डॉलर पहुंच गया है। भारत में निवेश करने के मामले में जापान एक बड़ा निवेशक बनकर सामने आया है। हालांकि अब भी वियतनाम और इंडोनेशिया में जापान का निवेश भारत के मुकाबले ज़्यादा है।''

टाइम ने लिखा है कि हो सकता है कि यह तस्वीर भविष्य में बदल जाए।

टाइम ने लिखा है कि चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत की सैन्य ताक़त को जापान की मदद से बढ़ाना चाहते हैं।

सिंधु जल विवाद पर वार्ता असफल, 2 हाइड्रो परियोजनाओं का भविष्य खतरे में

जम्मू और कश्मीर में दो जल विद्युत परियोजनाओं के डिजायन पर जारी गतिरोध को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच वाशिंगटन में चली दो दिनों की बातचीत में कोई हल नहीं निकल पाया।

विश्व बैंक के तत्वावधान में 1960 के सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अंर्तगत किशनगंगा और रैटल जल विद्युत संयंत्र के तकनीकी मुद्दों को लेकर यहां 14-15 सितंबर को हुई सचिव स्तर की बातचीत असफल रही।

भारत और पाकिस्तान के बीच हुई संधि में विश्व बैंक भी एक हस्ताक्षरकर्ता है। विश्व बैंक ने कहा है कि वह दोनों देशों को शांतिपूर्ण ढंग से मुद्दों को सुलझाने में सहयोग देना जारी रखेगा।

विश्व बैंक ने एक बयान में कहा, ''हालांकि इस बैठक में कोई समझौता नहीं हो पाया। लेकिन विश्व बैंक दोनों देशों के साथ मिलकर इस मुद्दे के समाधान के लिए संगत तरीके से और संधि के प्रावधानों के अनुरूप काम करता रहेगा।''

इस बैठक में भारतीय पक्ष में जल संसाधन सचिव अमरजीत सिंह और विदेश मंत्रालय के पाकिस्तान डेस्क के प्रभारी संयुक्त सचिव दीपक मित्तल शामिल हुए। वहीं, पाकिस्तानी दल में जल संसाधन खंड के सचिव आरिफ अहमद खान के साथ जल और बिजली सचिव युसूफ नसीम खोखर शामिल हुए।

पाकिस्तान का भारत पर आरोप है कि उसके जलविद्युत संयंत्रों का डिजायन सिंधु जल समझौते का उल्लंघन करता है।

संधि के तहत आने वाली मौजूदा प्रक्रियाएं किशनगंगा (330 मेगावाट) और राटले (850 मेगावाट) पनबिजली संयंत्र से जुड़ी हैं। भारत इन संयंत्रों का निर्माण किशनगंगा और चेनाब नदियों पर कर रहा है। इनमें से किसी भी संयंत्र का वित्त पोषण विश्व बैंक नहीं कर रहा है।

विश्व बैंक ने कहा कि सिंधु जल संधि, 1960 को सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय संधियों में से एक संधि के रूप में देखा जाता है। यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के बावजूद भी बनी रही है।

सिंधु जल संधि में मध्यस्थता करने वाले विश्व बैंक ने सितंबर में कहा था कि भारत और पाकिस्तान ने उससे संपर्क किया था और वह संधि में तय अपनी सीमित और प्रक्रियात्मक भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया दे रहा है।

विश्व बैंक ने कहा था, ''भारत और पाकिस्तान ने विश्व बैंक को सूचित किया है कि दोनों ने ही सिंधु जल संधि 1960 से जुड़ी कार्यवाहियां शुरू कर दी हैं और विश्व बैंक समूह संधि में तय अपनी सीमित और प्रक्रियात्मक भूमिका के अनुरूप प्रतिक्रिया दे रहा है।''

यह संधि दोनों देशों के बीच नदियों के इस्तेमाल के संदर्भ में सहयोग एवं सूचना के आदान-प्रदान की प्रणाली तय करती है। इसे स्थायी सिंधु आयोग कहा जाता है और इसमें दोनों देशों से एक एक आयुक्त शामिल रहता है।

यह पक्षों के बीच पैदा हो सकने वाले कथित सवालों, मतभेदों और विवादों को सुलझाने की प्रक्रिया भी तय करता है।

प्योंगयांग को नियंत्रण में लाने की ज़िम्मेदारी चीन और रूस पर है: अमरीका

उत्तर कोरिया के हालिया मिसाइल परीक्षण ने विश्व की महाशक्तियों के बीच दरार डाल दी है।

कुछ दिन पहले ही उत्तर कोरिया पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध को लेकर ये महाशक्तियां एकजुट थीं।

अमरीका ने कहा है कि उत्तर कोरिया को समझाने की ज़िम्मेदारी रूस और चीन की है।

चीन उत्तर कोरिया का मुख्य सहयोगी है, जबकि रूस के रिश्ते प्योंगयांग से बहुत अच्छे हैं।

लेकिन चीन ने कहा है कि अमरीका अपनी ज़िम्मेदारी से बचना चाहता है, जबकि रूस ने अमरीका की उकसाऊ बयानबाज़ी की निंदा की है।

जापान की ओर छोड़ी गई मिसाइल की इतनी रेंज है कि वो अमरीकी इलाक़े गुआम तक मार कर सकती है।

दक्षिण कोरिया की सेना के मुताबिक़, इस मिसाइल ने आसमान में 770 किलोमीटर की ऊंचाई हासिल की और जापान के उत्तरी द्वीप होक्काइडो के ऊपर से गुजरती हुई 3,700 किलोमीटर की दूरी तय की।

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटजिक स्टडीज़ के जोसफ़ डेम्पसे ने ट्वीट कर कहा कि उत्तर कोरिया की ये सबसे अधिक लंबी दूरी तय करने वाली मिसाइल है।

अमरीका के मुख्य सहयोगी और उत्तर कोरिया के पड़ोसी देश दक्षिण कोरिया ने कुछ ही मिनटों बाद दो मिसाइल छोड़ी।

अमरीका और जापान की अपील पर न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक होने वाली है।

जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने कहा है कि उनका देश इस तरह के उकसावे वाली कार्रवाईयों को बर्दाश्त नहीं करेगा। अमरीका, चीन और रूस ने भी इसकी निंदा की है।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और फ़्रांसीसी राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि संकट को कम करने के लिए प्योंगयांग से सीधी बातचीत करनी चाहिए।

बीते सोमवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों ने, सितम्बर की शुरुआत में परमाणु परीक्षण करने के ख़िलाफ़ उत्तर कोरिया को किए जाने वाले तेल निर्यात और कपड़ा निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।

हालांकि अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने साफ़ किया है कि वॉशिंगटन का मानना है कि अब प्योंगयांग को नियंत्रण में लाने की ज़िम्मेदारी चीन और रूस पर है।

लंदन में भूमिगत ट्रेन में धमाका, कम से कम 22 लोग घायल

लंदन के दक्षिण-पश्चिम इलाके में भूमिगत ट्रेन में एक धमाका हुआ है। इस धमाके में कम से कम 22 लोग घायल हुए हैं।

चरमपंथ निरोधक सूत्रों ने बीबीसी को बताया है कि इस धमाके को एक चरमपंथी घटना के तौर पर देखा जा रहा है।

पुलिस का कहना है कि धमाके के लिए इम्प्रूवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस यानी आई ई डी का इस्तेमाल किया गया है।

ट्रेन में ये डिवाइस रखने वाले शख्स की तलाश की जा रही है।

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने धमाके को कायरतापूर्ण हमला बताया है, उन्होंने कहा कि धमाके का मकसद बड़ा नुकसान पहुंचाना था।

कोब्रा इमरजेंसी कमेटी की बैठक के बाद टेरीज़ा मे ने कहा कि लंदन के परिवहन नेटवर्क में पुलिस की मौजूदगी बढ़ाई जाएगी।

धमाके की जांच में एम आई-5 के ख़ुफ़िया अधिकारी लगाए गए हैं।

अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इस हमले की निंदा की है, उन्होंने ट्वीट किया जिसमें उन्होंने कहा कि बीमार और विकृत लोग इसके पीछे हैं जो मेट्रोपोलिटन पुलिस की नज़र में थे।

हालांकि टेरीज़ा मे ने कहा कि जांच के बारे में इस तरह के कयास लगाना मददगार नहीं होगा।

घटनास्थल से ली गई तस्वीर में एक सुपरमार्केट बैग में रखी एक सफ़ेद बालटी में आग की लपटें नज़र आ रही हैं, और इसमें कुछ तार भी नज़र आ रहे हैं।

बीबीसी का मानना है कि इस डिवाइस में टाइमर लगाया गया था।

बीबीसी के रक्षा मामलों के संवाददाता फ्रैंक गार्डनर के मुताबिक, विस्फोटक पदार्थ के जानकारों का मानना है कि पार्सन्स ग्रीन स्टेशन पर धमाके के लिए जिस डिवाइस का प्रयोग किया गया, उसे इस हिसाब से बनाया गया था कि धमाका बड़ा हो और कई लोग मारे जाएं, लेकिन डिवाइस में ठीक तरह से धमाका नहीं हुआ।

लंदन के भूमिगत ट्रेन नेटवर्क के एक खुले हिस्से में बने पार्सन्स ग्रीन स्टेशन पर यात्रियों का कहना है कि ट्रेन के  एक डिब्बे में कुछ धमाका सा हुआ जिसके बाद लपटें उठीं।

यात्रियों ने बताया कि धमाके के बाद अफ़रा-तफ़री मच गई। ट्रेन के दरवाज़े खुलने के बाद यात्रियों ने जल्दबाज़ी में निकलने की कोशिश की जिससे सीढ़ी पर भगदड़ मची और कई लोग घायल हो गए।

ट्रांसपोर्ट फॉर लंदन ने ट्वीट किया, ''हम पार्सन्स ग्रीन में हुई एक घटना की जांच कर रहे हैं।''

बीबीसी लंदन की एंकर रिज़ लतीफ़ ने बताया, ''लोग दहशत में ट्रेन से उतर रहे थे, सुनने में यह धमाके जैसा था।''

इस धमाके के चश्मदीद पीटर क्राउली ने बताया कि उन्होंने विंबलडन से ट्रेन का सफर शुरू किया था।

उन्होंने बताया कि उनके सिर पर आग का गोला गिरा और कई लोग इससे भी बुरी स्थिति में हैं।

बीबीसी रेडियो 5 लाइव पर एक ट्रेन यात्री क्रिस वाइल्डिश ने बताया कि उन्होंने सुपरमार्केट बैग में रखी एक बालटी देखी जिसमें से आग की लपटें निकल रही थीं।

म्यांमार में नस्लीय जनसंहार के पक्के सबूत हैं: एमनेस्टी इंटरनेशनल

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि उसके पास इस बात के पक्के सबूत हैं कि म्यांमार की सेना ने योजनाबद्ध तरीक़े से रोहिंग्या मुसलमानों के घरों को आग लगाई है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों में म्यांमार के हिंसाग्रस्त रखाइन प्रांत में 80 से ज़्यादा जगहों पर भयंकर आग लगने का पता चलता है।

इसके मुताबिक़, प्रत्यक्षदर्शियों ने खुद बताया है कि म्यांमार की सेना और हमलावर गिरोहों ने घर जलाने के लिए पेट्रोल और रॉकेट लॉंचर का इस्तेमाल किया और अंधाधुंध गोलीबारी कर रोहिंग्या निवासियों की हत्याएं कीं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़े रिसर्चर ओलफ़ ब्लूमक्विस्ट ने कहा, ''हमने अलग-अलग स्रोतों से जो जानकारियां जुटाई हैं, उससे ये साफ पता चलता है कि म्यांमार के सुरक्षा बलों की ओर से नस्लीय सफ़ाये का अभियान चलाया जा रहा है। रखाइन प्रांत जल रहा है।''

ओलफ़ ब्लूमक्विस्ट के अनुसार, ''हमने पूरे प्रांत में 80 से ज़्यादा जगहों पर आग लगने के सबूत इकट्ठा किए हैं।

इस बात से यही नतीजा निकलता है कि म्यांमार की सेना किसी भी तरह से रोहिंग्या लोगों को देश से बाहर करने के लिए अभियान चला रही है। सेना और हमलावर गिरोह मिलकर ये काम कर रहे हैं।''

हालांकि सेना ने इस बात से इनकार किया है और कहा है कि उसने रोहिंग्या चरमपंथियों के हमले की जवाबी कार्रवाई में सैन्य अभियान चलाया है।

म्यांमार से जान बचाकर हज़ारों की तादाद में रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश पहुंच रहे हैं। और इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों के पहुंचने से बांग्लादेश भी मुश्किल में है।

इस बीच अमरीका और ब्रिटेन ने भी म्यांमार की सेना को हिंसा बंद करने की हिदायत दी है। अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने कहा है कि रोहिंग्या लोगों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा तत्काल बंद होनी चाहिए।

ब्रिटेन के दौरे पर गए टिलरसन ने कहा, ''हम मानते हैं कि आंग सान सू ची बेहद मुश्किल और जटिल हालात का सामना कर रही हैं। और मुझे लगता है कि ये बहुत महत्वपूर्ण है कि दुनिया के बाकी देश भी इस पर बोलें। ये हिंसा तुरंत बंद होनी चाहिए।''

उन्होंने कहा, ''बहुत सारे लोग इसे नस्लीय नरसंहार का नाम दे रहे हैं। हमें सू ची और उनके नेतृत्व का समर्थन करना चाहिए, लेकिन सत्ता में साझेदारी करने वाली सेना को साफ तौर पर संदेश देना होगा कि ये हिंसा अस्वीकार्य है।

ब्रिटेन के विदेश मंत्री बोरिस जॉन्सन ने कहा है कि म्यांमार की शीर्ष नेता आंग सान सू ची को अपने नैतिक प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए।

उन्होंने कहा, ''लोकतंत्र के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया है, उसकी मैं बहुत इज़्ज़त करता हूं और मैं समझता हूं कि दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं, लेकिन मैं सोचता है कि अब ये ज़रूरी हो गया है कि उन्हें अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए और रखाइन प्रांत में लोगों की तकलीफ़ पर बोलना चाहिए।''

उन्होंने कहा, ''कोई नहीं चाहेगा कि बर्मा में सैन्य शासन लौटे, लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि वो साफ़ कहें कि ये नफ़रत है और लोगों को वापस आने की अनुमति मिलनी चाहिए।''

बौद्ध बहुल म्यांमार में कई सालों से रोहिंग्या और बौद्धों के बीच संघर्ष चल रहा है। दसियों हज़ार रोहिंग्या जान बचाकर बांग्लादेश भाग चुके हैं और अभी पलायन जारी है।

इनमें से कुछ शरणार्थी भारत भी पहुंचे हैं, जहां उनको वापस भेजने की मांग हो रही है और इस मामले में भारत की सुप्रीम कोर्ट में एक मामला भी चल रहा है।

दूसरी तरफ़, ढाका की अपील पर भारत सरकार ने बांग्लादेश पहुंचे शरणार्थियों के लिए मदद का हाथ बढ़ाते हुए राहत सामग्री भेजने का फैसला लिया है।

एमनेस्टी इंटरनेश्नल ने रोहिंग्या मुस्लिम गांवों को जलाने की सैटेलाइट तस्वीरें जारी की

मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेश्नल ने म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुस्लिमों के गांवों की सैटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं जिनसे गांवों को योजनाबद्ध तरीके से जलाए जाने के संकेत मिलते हैं।

एमनेस्टी का कहना है कि इस बात के सबूत हैं कि सुरक्षा बल अल्पसंख्यकों को देश से बाहर करने की कोशिश कर रही हैं।

जबकि म्यांमार की सेना का कहना है कि वो सिर्फ़ चरमपंथियों से लड़ रही हैं और नागरिकों को निशाना नहीं बनाया जा रहा है।

25 अगस्त को रखाइन प्रांत में शुरू हुई हिंसा के कारण 3,89,000 रोहिंग्या मुस्लिम भागकर बांग्लादेश पहुंचे हैं। कथित तौर पर म्यांमार में उन्हें लंबे समय से गैरक़ानूनी प्रवासियों के तौर पर यातनाएं दी जा रही हैं।

रोहिंग्या मुस्लिम कई पीढ़ियों से म्यांमार में रह रहे हैं, लेकिन उन्हें वहां की नागरिकता नहीं मिल रही है।

म्यांमार की सरकार के मुताबिक, रखाइन प्रांत में अब कम से कम 30 फ़ीसदी गांव खाली हो चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोहिंग्या संकट को लेकर म्यांमार को निंदा का सामना भी करना पड़ा है।

गुरुवार को अमरीका के विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने कहा है कि म्यांमार के लोकतंत्र के लिए ये एक निर्णायक घड़ी है।

उन्होंने लंदन में कहा, ''मैं मानता हूं कि ये अहम है कि वैश्विक समुदाय को किसी भी जाति के लोगों के साथ जिस बर्ताव की उम्मीद होती है, उसका हम समर्थन करें।''

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है कि रोहिंग्या मुस्लिम विनाशकारी मानवीय संकट झेल रहे हैं और गांवों पर हमले स्वीकार नहीं किए जा सकते।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हिंसा को ख़त्म करने के लिए तुरंत क़दम उठाने की अपील की है।

एमनेस्टी ने कहा है कि उसने फायर डिटेक्शन डेटा, सैटेलाइट इमेजरी, तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से नए सबूत जुटाए हैं, इसके अलावा चश्मदीदों के बयान भी हैं।

एमनेस्टी की अधिकारी तिराना हसन ने कहा, ''सबूतों को नकारा नहीं जा सकता है, म्यांमार के सुरक्षा बल रोहिंग्या मुस्लिमों को म्यांमार से बाहर धकेलने के लिए उत्तरी रखाइन प्रांत में आग लगाने का सुनियोजित अभियान चला रहे हैं। ये कहने में कोई भूल नहीं होगी कि ये जातीय नरसंहार है।''

एमनेस्टी ने कहा है कि सुरक्षा बल गांवों को घेर लेते हैं, भागते लोगों पर गोलियां चलाते हैं और उनके घरों को जला देते हैं। एमनेस्टी ने इसे मानवता के ख़िलाफ़ अपराध बताया है।

मानवाधिकार समूह का दावा है कि उसने 25 अगस्त से अब तक रिहाइशी इलाक़ों में आगज़नी की 80 बड़ी घटनाओं का पता लगाया है।

25 अगस्त को विद्रोही अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी ने कई पुलिस थानों में आग लगा दी है जिसके बाद वहां हिंसा शुरू हुई।

एमनेस्टी का कहना है कि उसके पास इस बात के सबूत हैं कि रोहिंग्या चरमपंथी स्थानीय रखाइन बौद्धों के गांव जला रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार के दूत ने रोहिंग्या मुस्लिम चरमपंथियों पर हिंसा का आरोप लगाया था।

वहीं सरकारी प्रवक्ता ज़ॉ ह्ते ने विस्थापितों से म्यांमार में अस्थाई शिविरों में शरण लेने को कहा गया है, लेकिन जो लोग बांग्लादेश भाग गए हैं उन्हें म्यांमार लौटने नहीं दिया जाएगा।

म्यांमार में सेना के जनरल मिन आंग ह्लैंग ने कहा कि रखाइन बौद्ध कई पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं।

सरकार ने माना है कि 176 रोहिंग्या गांव खाली हो चुके हैं।

रखाइन प्रांत पर सरकार का कड़ा नियंत्रण है और बीबीसी के जॉनाथन हेड उन पत्रकारों में शामिल थे जिन्हें सरकार ने एक नियंत्रित दौरे में रखाइन जाने दिया था। उन्होंने मुस्लिमों के गांवों को जलते देखा था। उनका कहना है कि आग को रोकने के लिए पुलिस कुछ नहीं कर रही थी।

रोहिंग्या समुदाय के करीब 10 लाख लोग म्यांमार में रहते हैं, मुस्लिमों के अलावा इनमें कई हिंदू भी हैं।

माना जाता है कि रोहिंग्या मुस्लिमों का उद्गम बांग्लादेश या पश्चिम बंगाल में था, लेकिन वो कई सदियों से म्यांमार में बसे हैं।

इराक़: चरमपंथी हमलों में 60 से ज़्यादा की मौत, इस्लामिक स्टेट ने ज़िम्मेदारी ली

दक्षिणी इराक़ में हुए दो हमलों में कम से कम 60 लोगों की मौत हो गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने मृतकों की संख्या की जानकारी दी।

चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट ने इन हमलों की ज़िम्मेदारी ली है।

धिक़ार प्रांत की राजधानी नासीरिया के एक रेस्तरां में एक आत्मघाती हमलावर ने ख़ुद को उड़ा लिया और फिर कुछ बंदूकधारियों ने गोलीबारी की।

हमलावर चोरी के सैन्य वाहनों में आए थे। पुलिस कर्नल अली अब्दुल हुसैन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, ''एक हमलावर ने विस्फोटक बेल्ट पहनी हुई थी। एक भीड़ भाड़ वाले रेस्तरां में उसने ख़ुद को उड़ा लिया, जबकि कुछ दूसरे बंदूकधारियों ने वहां खाना खा रहे लोगों पर ग्रेनेड फेंकना और गोलियां चलाना शुरू कर दिया।''

इसके थोड़ी ही देर बाद पास के एक चेकपॉइंट पर एक कार बम धमाके में उड़ गई। स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, मरने वालों में कम से कम सात ईरानी नागरिक हैं और 90 से ज़्यादा लोग घायल हुए हैं। उनमें से कई की हालत गंभीर है।

समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक, एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हमलावर इराक़ी सेना के साथ मिलकर इस्लामिक स्टेट से लड़ने वाले शिया संगठन हश्द-अल-शाबी के सदस्यों की वेशभूषा में थे।

अपुष्ट ख़बरों के मुताबिक, चेकपॉइंट पर हुए धमाके में कुछ पुलिसकर्मी हताहत हुए हैं। पर सिर्फ उस हमले में कितने लोगों की मौत हुई है, यह अभी साफ़ नहीं हो सका है।

बीबीसी के मध्यपूर्व संपादक एलन जॉन्सटन कहते हैं कि इस्लामिक स्टेट को इराक़ और सीरिया में एक के बाद एक हार मिल रही है, लेकिन आसान लक्ष्यों को निशाना बनाने में वे अब भी सक्षम हैं।

माना जाता है कि इस्लामिक स्टेट के लिए सैकड़ों चरमपंथी लड़ाके अब भी हमला करने को तैयार हैं।

हालांकि दक्षिणी इराक़ में अपेक्षाकृत तौर पर इस तरह के हमले कम हुए हैं। जहां यह हमला हुआ, वहां नजफ़ और करबला की ओर जाने वाले शिया श्रद्धालु और ईरान से आने वाले लोगों की ख़ासी भीड़ रहती है।