उत्तर कोरिया के हालिया मिसाइल परीक्षण ने विश्व की महाशक्तियों के बीच दरार डाल दी है।
कुछ दिन पहले ही उत्तर कोरिया पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध को लेकर ये महाशक्तियां एकजुट थीं।
अमरीका ने कहा है कि उत्तर कोरिया को समझाने की ज़िम्मेदारी रूस और चीन की है।
चीन उत्तर कोरिया का मुख्य सहयोगी है, जबकि रूस के रिश्ते प्योंगयांग से बहुत अच्छे हैं।
लेकिन चीन ने कहा है कि अमरीका अपनी ज़िम्मेदारी से बचना चाहता है, जबकि रूस ने अमरीका की उकसाऊ बयानबाज़ी की निंदा की है।
जापान की ओर छोड़ी गई मिसाइल की इतनी रेंज है कि वो अमरीकी इलाक़े गुआम तक मार कर सकती है।
दक्षिण कोरिया की सेना के मुताबिक़, इस मिसाइल ने आसमान में 770 किलोमीटर की ऊंचाई हासिल की और जापान के उत्तरी द्वीप होक्काइडो के ऊपर से गुजरती हुई 3,700 किलोमीटर की दूरी तय की।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटजिक स्टडीज़ के जोसफ़ डेम्पसे ने ट्वीट कर कहा कि उत्तर कोरिया की ये सबसे अधिक लंबी दूरी तय करने वाली मिसाइल है।
अमरीका के मुख्य सहयोगी और उत्तर कोरिया के पड़ोसी देश दक्षिण कोरिया ने कुछ ही मिनटों बाद दो मिसाइल छोड़ी।
अमरीका और जापान की अपील पर न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक होने वाली है।
जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने कहा है कि उनका देश इस तरह के उकसावे वाली कार्रवाईयों को बर्दाश्त नहीं करेगा। अमरीका, चीन और रूस ने भी इसकी निंदा की है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और फ़्रांसीसी राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि संकट को कम करने के लिए प्योंगयांग से सीधी बातचीत करनी चाहिए।
बीते सोमवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों ने, सितम्बर की शुरुआत में परमाणु परीक्षण करने के ख़िलाफ़ उत्तर कोरिया को किए जाने वाले तेल निर्यात और कपड़ा निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
हालांकि अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने साफ़ किया है कि वॉशिंगटन का मानना है कि अब प्योंगयांग को नियंत्रण में लाने की ज़िम्मेदारी चीन और रूस पर है।
लंदन के दक्षिण-पश्चिम इलाके में भूमिगत ट्रेन में एक धमाका हुआ है। इस धमाके में कम से कम 22 लोग घायल हुए हैं।
चरमपंथ निरोधक सूत्रों ने बीबीसी को बताया है कि इस धमाके को एक चरमपंथी घटना के तौर पर देखा जा रहा है।
पुलिस का कहना है कि धमाके के लिए इम्प्रूवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस यानी आई ई डी का इस्तेमाल किया गया है।
ट्रेन में ये डिवाइस रखने वाले शख्स की तलाश की जा रही है।
ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने धमाके को कायरतापूर्ण हमला बताया है, उन्होंने कहा कि धमाके का मकसद बड़ा नुकसान पहुंचाना था।
कोब्रा इमरजेंसी कमेटी की बैठक के बाद टेरीज़ा मे ने कहा कि लंदन के परिवहन नेटवर्क में पुलिस की मौजूदगी बढ़ाई जाएगी।
धमाके की जांच में एम आई-5 के ख़ुफ़िया अधिकारी लगाए गए हैं।
अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इस हमले की निंदा की है, उन्होंने ट्वीट किया जिसमें उन्होंने कहा कि बीमार और विकृत लोग इसके पीछे हैं जो मेट्रोपोलिटन पुलिस की नज़र में थे।
हालांकि टेरीज़ा मे ने कहा कि जांच के बारे में इस तरह के कयास लगाना मददगार नहीं होगा।
घटनास्थल से ली गई तस्वीर में एक सुपरमार्केट बैग में रखी एक सफ़ेद बालटी में आग की लपटें नज़र आ रही हैं, और इसमें कुछ तार भी नज़र आ रहे हैं।
बीबीसी का मानना है कि इस डिवाइस में टाइमर लगाया गया था।
बीबीसी के रक्षा मामलों के संवाददाता फ्रैंक गार्डनर के मुताबिक, विस्फोटक पदार्थ के जानकारों का मानना है कि पार्सन्स ग्रीन स्टेशन पर धमाके के लिए जिस डिवाइस का प्रयोग किया गया, उसे इस हिसाब से बनाया गया था कि धमाका बड़ा हो और कई लोग मारे जाएं, लेकिन डिवाइस में ठीक तरह से धमाका नहीं हुआ।
लंदन के भूमिगत ट्रेन नेटवर्क के एक खुले हिस्से में बने पार्सन्स ग्रीन स्टेशन पर यात्रियों का कहना है कि ट्रेन के एक डिब्बे में कुछ धमाका सा हुआ जिसके बाद लपटें उठीं।
यात्रियों ने बताया कि धमाके के बाद अफ़रा-तफ़री मच गई। ट्रेन के दरवाज़े खुलने के बाद यात्रियों ने जल्दबाज़ी में निकलने की कोशिश की जिससे सीढ़ी पर भगदड़ मची और कई लोग घायल हो गए।
ट्रांसपोर्ट फॉर लंदन ने ट्वीट किया, ''हम पार्सन्स ग्रीन में हुई एक घटना की जांच कर रहे हैं।''
बीबीसी लंदन की एंकर रिज़ लतीफ़ ने बताया, ''लोग दहशत में ट्रेन से उतर रहे थे, सुनने में यह धमाके जैसा था।''
इस धमाके के चश्मदीद पीटर क्राउली ने बताया कि उन्होंने विंबलडन से ट्रेन का सफर शुरू किया था।
उन्होंने बताया कि उनके सिर पर आग का गोला गिरा और कई लोग इससे भी बुरी स्थिति में हैं।
बीबीसी रेडियो 5 लाइव पर एक ट्रेन यात्री क्रिस वाइल्डिश ने बताया कि उन्होंने सुपरमार्केट बैग में रखी एक बालटी देखी जिसमें से आग की लपटें निकल रही थीं।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि उसके पास इस बात के पक्के सबूत हैं कि म्यांमार की सेना ने योजनाबद्ध तरीक़े से रोहिंग्या मुसलमानों के घरों को आग लगाई है।
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों में म्यांमार के हिंसाग्रस्त रखाइन प्रांत में 80 से ज़्यादा जगहों पर भयंकर आग लगने का पता चलता है।
इसके मुताबिक़, प्रत्यक्षदर्शियों ने खुद बताया है कि म्यांमार की सेना और हमलावर गिरोहों ने घर जलाने के लिए पेट्रोल और रॉकेट लॉंचर का इस्तेमाल किया और अंधाधुंध गोलीबारी कर रोहिंग्या निवासियों की हत्याएं कीं।
एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़े रिसर्चर ओलफ़ ब्लूमक्विस्ट ने कहा, ''हमने अलग-अलग स्रोतों से जो जानकारियां जुटाई हैं, उससे ये साफ पता चलता है कि म्यांमार के सुरक्षा बलों की ओर से नस्लीय सफ़ाये का अभियान चलाया जा रहा है। रखाइन प्रांत जल रहा है।''
ओलफ़ ब्लूमक्विस्ट के अनुसार, ''हमने पूरे प्रांत में 80 से ज़्यादा जगहों पर आग लगने के सबूत इकट्ठा किए हैं।
इस बात से यही नतीजा निकलता है कि म्यांमार की सेना किसी भी तरह से रोहिंग्या लोगों को देश से बाहर करने के लिए अभियान चला रही है। सेना और हमलावर गिरोह मिलकर ये काम कर रहे हैं।''
हालांकि सेना ने इस बात से इनकार किया है और कहा है कि उसने रोहिंग्या चरमपंथियों के हमले की जवाबी कार्रवाई में सैन्य अभियान चलाया है।
म्यांमार से जान बचाकर हज़ारों की तादाद में रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश पहुंच रहे हैं। और इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थियों के पहुंचने से बांग्लादेश भी मुश्किल में है।
इस बीच अमरीका और ब्रिटेन ने भी म्यांमार की सेना को हिंसा बंद करने की हिदायत दी है। अमरीकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने कहा है कि रोहिंग्या लोगों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा तत्काल बंद होनी चाहिए।
ब्रिटेन के दौरे पर गए टिलरसन ने कहा, ''हम मानते हैं कि आंग सान सू ची बेहद मुश्किल और जटिल हालात का सामना कर रही हैं। और मुझे लगता है कि ये बहुत महत्वपूर्ण है कि दुनिया के बाकी देश भी इस पर बोलें। ये हिंसा तुरंत बंद होनी चाहिए।''
उन्होंने कहा, ''बहुत सारे लोग इसे नस्लीय नरसंहार का नाम दे रहे हैं। हमें सू ची और उनके नेतृत्व का समर्थन करना चाहिए, लेकिन सत्ता में साझेदारी करने वाली सेना को साफ तौर पर संदेश देना होगा कि ये हिंसा अस्वीकार्य है।
ब्रिटेन के विदेश मंत्री बोरिस जॉन्सन ने कहा है कि म्यांमार की शीर्ष नेता आंग सान सू ची को अपने नैतिक प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए।
उन्होंने कहा, ''लोकतंत्र के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया है, उसकी मैं बहुत इज़्ज़त करता हूं और मैं समझता हूं कि दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं, लेकिन मैं सोचता है कि अब ये ज़रूरी हो गया है कि उन्हें अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए और रखाइन प्रांत में लोगों की तकलीफ़ पर बोलना चाहिए।''
उन्होंने कहा, ''कोई नहीं चाहेगा कि बर्मा में सैन्य शासन लौटे, लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि वो साफ़ कहें कि ये नफ़रत है और लोगों को वापस आने की अनुमति मिलनी चाहिए।''
बौद्ध बहुल म्यांमार में कई सालों से रोहिंग्या और बौद्धों के बीच संघर्ष चल रहा है। दसियों हज़ार रोहिंग्या जान बचाकर बांग्लादेश भाग चुके हैं और अभी पलायन जारी है।
इनमें से कुछ शरणार्थी भारत भी पहुंचे हैं, जहां उनको वापस भेजने की मांग हो रही है और इस मामले में भारत की सुप्रीम कोर्ट में एक मामला भी चल रहा है।
दूसरी तरफ़, ढाका की अपील पर भारत सरकार ने बांग्लादेश पहुंचे शरणार्थियों के लिए मदद का हाथ बढ़ाते हुए राहत सामग्री भेजने का फैसला लिया है।
मानवाधिकार समूह एमनेस्टी इंटरनेश्नल ने म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुस्लिमों के गांवों की सैटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं जिनसे गांवों को योजनाबद्ध तरीके से जलाए जाने के संकेत मिलते हैं।
एमनेस्टी का कहना है कि इस बात के सबूत हैं कि सुरक्षा बल अल्पसंख्यकों को देश से बाहर करने की कोशिश कर रही हैं।
जबकि म्यांमार की सेना का कहना है कि वो सिर्फ़ चरमपंथियों से लड़ रही हैं और नागरिकों को निशाना नहीं बनाया जा रहा है।
25 अगस्त को रखाइन प्रांत में शुरू हुई हिंसा के कारण 3,89,000 रोहिंग्या मुस्लिम भागकर बांग्लादेश पहुंचे हैं। कथित तौर पर म्यांमार में उन्हें लंबे समय से गैरक़ानूनी प्रवासियों के तौर पर यातनाएं दी जा रही हैं।
रोहिंग्या मुस्लिम कई पीढ़ियों से म्यांमार में रह रहे हैं, लेकिन उन्हें वहां की नागरिकता नहीं मिल रही है।
म्यांमार की सरकार के मुताबिक, रखाइन प्रांत में अब कम से कम 30 फ़ीसदी गांव खाली हो चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोहिंग्या संकट को लेकर म्यांमार को निंदा का सामना भी करना पड़ा है।
गुरुवार को अमरीका के विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने कहा है कि म्यांमार के लोकतंत्र के लिए ये एक निर्णायक घड़ी है।
उन्होंने लंदन में कहा, ''मैं मानता हूं कि ये अहम है कि वैश्विक समुदाय को किसी भी जाति के लोगों के साथ जिस बर्ताव की उम्मीद होती है, उसका हम समर्थन करें।''
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा है कि रोहिंग्या मुस्लिम विनाशकारी मानवीय संकट झेल रहे हैं और गांवों पर हमले स्वीकार नहीं किए जा सकते।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने हिंसा को ख़त्म करने के लिए तुरंत क़दम उठाने की अपील की है।
एमनेस्टी ने कहा है कि उसने फायर डिटेक्शन डेटा, सैटेलाइट इमेजरी, तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से नए सबूत जुटाए हैं, इसके अलावा चश्मदीदों के बयान भी हैं।
एमनेस्टी की अधिकारी तिराना हसन ने कहा, ''सबूतों को नकारा नहीं जा सकता है, म्यांमार के सुरक्षा बल रोहिंग्या मुस्लिमों को म्यांमार से बाहर धकेलने के लिए उत्तरी रखाइन प्रांत में आग लगाने का सुनियोजित अभियान चला रहे हैं। ये कहने में कोई भूल नहीं होगी कि ये जातीय नरसंहार है।''
एमनेस्टी ने कहा है कि सुरक्षा बल गांवों को घेर लेते हैं, भागते लोगों पर गोलियां चलाते हैं और उनके घरों को जला देते हैं। एमनेस्टी ने इसे मानवता के ख़िलाफ़ अपराध बताया है।
मानवाधिकार समूह का दावा है कि उसने 25 अगस्त से अब तक रिहाइशी इलाक़ों में आगज़नी की 80 बड़ी घटनाओं का पता लगाया है।
25 अगस्त को विद्रोही अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी ने कई पुलिस थानों में आग लगा दी है जिसके बाद वहां हिंसा शुरू हुई।
एमनेस्टी का कहना है कि उसके पास इस बात के सबूत हैं कि रोहिंग्या चरमपंथी स्थानीय रखाइन बौद्धों के गांव जला रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार के दूत ने रोहिंग्या मुस्लिम चरमपंथियों पर हिंसा का आरोप लगाया था।
वहीं सरकारी प्रवक्ता ज़ॉ ह्ते ने विस्थापितों से म्यांमार में अस्थाई शिविरों में शरण लेने को कहा गया है, लेकिन जो लोग बांग्लादेश भाग गए हैं उन्हें म्यांमार लौटने नहीं दिया जाएगा।
म्यांमार में सेना के जनरल मिन आंग ह्लैंग ने कहा कि रखाइन बौद्ध कई पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं।
सरकार ने माना है कि 176 रोहिंग्या गांव खाली हो चुके हैं।
रखाइन प्रांत पर सरकार का कड़ा नियंत्रण है और बीबीसी के जॉनाथन हेड उन पत्रकारों में शामिल थे जिन्हें सरकार ने एक नियंत्रित दौरे में रखाइन जाने दिया था। उन्होंने मुस्लिमों के गांवों को जलते देखा था। उनका कहना है कि आग को रोकने के लिए पुलिस कुछ नहीं कर रही थी।
रोहिंग्या समुदाय के करीब 10 लाख लोग म्यांमार में रहते हैं, मुस्लिमों के अलावा इनमें कई हिंदू भी हैं।
माना जाता है कि रोहिंग्या मुस्लिमों का उद्गम बांग्लादेश या पश्चिम बंगाल में था, लेकिन वो कई सदियों से म्यांमार में बसे हैं।
दक्षिणी इराक़ में हुए दो हमलों में कम से कम 60 लोगों की मौत हो गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने मृतकों की संख्या की जानकारी दी।
चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट ने इन हमलों की ज़िम्मेदारी ली है।
धिक़ार प्रांत की राजधानी नासीरिया के एक रेस्तरां में एक आत्मघाती हमलावर ने ख़ुद को उड़ा लिया और फिर कुछ बंदूकधारियों ने गोलीबारी की।
हमलावर चोरी के सैन्य वाहनों में आए थे। पुलिस कर्नल अली अब्दुल हुसैन ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, ''एक हमलावर ने विस्फोटक बेल्ट पहनी हुई थी। एक भीड़ भाड़ वाले रेस्तरां में उसने ख़ुद को उड़ा लिया, जबकि कुछ दूसरे बंदूकधारियों ने वहां खाना खा रहे लोगों पर ग्रेनेड फेंकना और गोलियां चलाना शुरू कर दिया।''
इसके थोड़ी ही देर बाद पास के एक चेकपॉइंट पर एक कार बम धमाके में उड़ गई। स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, मरने वालों में कम से कम सात ईरानी नागरिक हैं और 90 से ज़्यादा लोग घायल हुए हैं। उनमें से कई की हालत गंभीर है।
समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक, एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हमलावर इराक़ी सेना के साथ मिलकर इस्लामिक स्टेट से लड़ने वाले शिया संगठन हश्द-अल-शाबी के सदस्यों की वेशभूषा में थे।
अपुष्ट ख़बरों के मुताबिक, चेकपॉइंट पर हुए धमाके में कुछ पुलिसकर्मी हताहत हुए हैं। पर सिर्फ उस हमले में कितने लोगों की मौत हुई है, यह अभी साफ़ नहीं हो सका है।
बीबीसी के मध्यपूर्व संपादक एलन जॉन्सटन कहते हैं कि इस्लामिक स्टेट को इराक़ और सीरिया में एक के बाद एक हार मिल रही है, लेकिन आसान लक्ष्यों को निशाना बनाने में वे अब भी सक्षम हैं।
माना जाता है कि इस्लामिक स्टेट के लिए सैकड़ों चरमपंथी लड़ाके अब भी हमला करने को तैयार हैं।
हालांकि दक्षिणी इराक़ में अपेक्षाकृत तौर पर इस तरह के हमले कम हुए हैं। जहां यह हमला हुआ, वहां नजफ़ और करबला की ओर जाने वाले शिया श्रद्धालु और ईरान से आने वाले लोगों की ख़ासी भीड़ रहती है।
म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान अपना घर-बार छोड़कर विस्थापित होने पर मजबूर हैं। हज़ारों की संख्या में रोहिंग्या मुसलमाम बांग्लादेश जा रहे हैं। सैंकड़ों की संख्या में ये मारे गए हैं।
भारत में भी रोहिंग्या मुसलमान प्रवासी के तौर पर रहे हैं। म्यांमार की नेता और शांति के नोबेल सम्मान से सम्मानित आंग सान सू ची पर भी सवाल उठ रहे हैं।
रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ जारी हिंसा पर हारवर्ड केनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट की रिसर्चर डॉ लेन क्यूओक की यह रिपोर्ट बताती है कि आख़िर किन अफ़वाहों के दम पर वहां के बौद्ध चार फ़ीसदी मुसलमानों से डरे हुए हैं। उनकी रिपोर्ट पढ़िए -
म्यांमार में बौद्धों और मुसलमानों के बीच तनाव का सीधा संबंध देश के पश्चिमी राज्य रखाइन की राजधानी सिटवे में मई 2012 से अरखनीज बौद्ध और रोहिंग्या मुसलमानों के बीच भड़की हिंसा से है।
इसी साल अक्टूबर में रखाइन के अन्य इलाक़ों में हिंसा भड़की। आगे चलकर न केवल रोहिंग्या बल्कि अन्य मुसलमानों को भी निशाना बनाया जाने लगा। इस संघर्ष में अब तक सैकड़ों जानें गईं और हज़ारों लोग विस्थापित हुए हैं। यह आज भी डरावने तरीक़े से जारी है।
साल 2013 में म्यांमार के अन्य इलाक़ों में भी मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़की। संयुक्त राष्ट्र से लेकर दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा को नहीं रोक पाने में वहां की सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया। दूसरी तरफ़ म्यांमार की सरकार इन दावों को सिरे से ख़ारिज करती रही।
धार्मिक टकराव का ख़तरा न केवल म्यांमार में है बल्कि सरहद पार भी इसकी आग को महसूस किया जा सकता है। दक्षिण-पूर्वी एशिया धार्मिक रूप से काफ़ी विविध है। सामान्य तौर पर यह इलाक़ा अपनी सहिष्णुता के लिए जाना जाता है। जब म्यांमार में मुस्लिमों को निशाना बनाया गया तो इसकी प्रतिक्रिया मुस्लिम बहुल देशों में भी दिखी।
मलेशिया, बांग्लादेश और इंडोनेशिया में बौद्धों पर हमले हुए। जकार्ता में एक बौद्ध केंद्र को बम से उड़ा दिया गया। इंडोनेशिया स्थित म्यांमार के दूतावास में भी बम प्लांट करने की असफल कोशिश की गई थी। इस तरह की घटनाओं से पूरे इलाक़े में धार्मिक अविश्वास पैदा होने का ख़तरा बढ़ गया है।
म्यांमार में मुस्लिम विरोधी भावना कोई नई बात नहीं है। इसकी ज़ड़ें उपनिवेशवादी नीतियों में हैं। भारत से बड़ी संख्या में म्यांमार में मुस्लिम मज़दूरों को लाया गया था। 1930 में भारतीयों के विरोध में यहां दंगे हुए थे। इनकी मांग थी कि भारतीयों को वापस भेजा जाए।
शिपों में भारतीयों की बहाली के ख़िलाफ़ लोगों का ग़ुस्सा था। इन भारतीयों के ख़िलाफ़ 1938 में भी दंगा हुआ।1938 में भारतीय मुस्लिमों के ख़िलाफ़ दंगे का संबंध कथित रूप से उस किताब से था जिसे एक भारतीय मुस्लिम ने लिखी थी। कहा जाता है कि इस किताब में बौद्ध धर्म को अपमानित किया गया था।
म्यांमार में आज की तारीख़ में मुस्लिमों के ख़िलाफ़ भावना और उफान पर है। रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति यहां असाधारण रूप से समर्थन का अभाव है।
यहां के बौद्धों और ईसाइयों का मानना है कि रोहिंग्या मुस्लिम अवैध बंगाली प्रवासी हैं। इनका कहना है कि म्यांमार के 1982 के नागरिकता के नियम के तहत ये अयोग्य हैं।
1982 के नागरिकता क़ानून के तहत अगर आवेदक म्यांमार में आधिकारिक रूप से रजिस्टर्ड 135 जातीय समूह से ताल्लुक नहीं रखता है तो उसे नागरिता पाने का हक़ नहीं है। इसी नियम के कारण ग़रीब और हाशिए पर खड़े रोहिंग्या मुस्लिम दरबदर हैं। म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ ग़ुस्से को उनकी नागरिकता से भी जोड़कर देखा जाता है। यहां मुस्लिमों के ख़िलाफ़ नफ़रत लगातार बढ़ती जा रही है।
म्यांमार में मुस्लिम विरोधी भावना के पीछे कारण काफ़ी जटिल है, लेकिन इनसे जुड़ी धारणाएं काफ़ी प्रबल हैं। म्यांमार में धारणा है कि मुस्लिम बहुत ज़्यादा हैं, बहुत अमीर हैं और बहुत अलग हैं। यहां के लोगों के मन में धारणा है कि मुस्लिम बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं और अगर इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो भारत और इंडोनेशिया की तरह बौद्ध विरासत यहां भी ख़त्म हो जाएगी।
रखाइन में ज़्यादातर अरखनीज बौद्धों के मन में यह बात गहराई से पैठ गई है कि रखाइन का इस्लामीकरण और बर्मीकरण हो रहा है। मुस्लिमों के ख़िलाफ़ नफ़रत की दूसरी धारणा है कि मुस्लिम अपने धन का इस्तेमाल ज़मीन ख़रीदने में कर रहे हैं।
वे ऐसा करके बर्मीज महिलाओं को शादी के लिए आकर्षित करते हैं और शादी के बाद उनका धर्मांतरण करा मुसलमान बना देते हैं। इन ग़रीब रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि बेहतरीन घर, बंदूक और रॉकेट्स ख़रीद रहे हैं। इसके साथ ही इन पर मस्जिद बनाने का भी आरोप है।
अफ़वाहों के कारण मुस्लिमों के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा बढ़ रहा है। इनकी संपत्ति का नुक़सान भी लगातार हो रहा है। इन्हें प्रशासनिक अधिकारियों से ख़ुद को बचाने के लिए रिश्वत भी देनी पड़ती है। जुलाई 2013 में अमरीकी-एशियाई बिज़नेस काउंसिल में 969 मूवमेंट के बौद्ध भिक्षु ने तीसरा कारण भी बताया था।
उन्होंने कहा था कि ऐतिहासिक रूप से हिन्दुओं और ईसाइयों से अच्छे संबंधों की तुलना में मुस्लिमों से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं। यहां के बौद्धों का मानना है कि मुस्लिमों की आस्था और परंपरा बिल्कुल अलग है हालांकि यह बात हिन्दू और ईसाई धर्म के बारे में भी कही जा सकती है।
टकराव की वजह अलग धर्म का होना नहीं है बल्कि मामला पहचान और अवधारणा का है। आज की तारीख़ में म्यांमार ऐतिहासिक संक्रमण काल के दौर से गुजर रहा है और इसमें साफ़ नहीं है कि कौन विजेता है और किसके हिस्से में शिकस्त है।
म्यांमार में यह भावना प्रबल हो चुकी है कि मुस्लिम बाहरी हैं और ये सोने के स्तूपों की ज़मीन पर अतिक्रमण फैला रहे हैं। इसी तर्क की पीठ पर सवार होकर म्यांमार में बौद्ध राष्ट्रवाद का प्रसार हो रहा है। ऐसी भावना तेजी से पैठ रही है कि बर्मीज का बौद्ध होना अनिवार्य है। बौद्ध राष्ट्रवाद की ज़मीन 969 मूवमेंट के दौरान ही तैयार हो गई थी।
कुछ लोगों का कहना है कि सरकार के भीतर के लोग ही मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिंसा को हवा दे रहे हैं। अस्थिरता के तर्क पर फिर से म्यांमार में सैन्य तानाशाह के शासन को सही ठहराया जा सकता है। 2015 के चुनाव में विपक्ष की जीत हुई थी।
हालांकि इस्लाम और बौद्ध दोनों में ऊंच-नीच की भावना को सिरे से ख़ारिज किया गया है। यहां पर आध्यात्मिक श्रेष्ठता जैसी कोई चीज़ नहीं है और स्वीकार्यता को लेकर प्रतिबद्धता पर ज़ोर है।
म्यांमार की सरकार में बौद्ध संगठनों का अच्छा ख़ासा प्रभाव है। ऐसे में सरकार चाहे तो इस समस्या को सुलझा सकती है।
म्यांमार की सरकार बहुसंख्यक बौद्धों के मन से इस डर को आसानी हटा सकती है कि मुसलमान उन पर हावी नहीं होंगे। म्यांमार में कुल आबादी के महज चार फ़ीसदी ही मुस्लिम हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने कहा है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान मानवीय आपदा का सामना कर रहे हैं। गुटेरेश ने कहा कि रोहिंग्या ग्रामीणों के घरों पर सुरक्षा बलों के कथित हमलों को किसी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने म्यांमार से सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की है।
म्यांमार की सेना ने आम लोगों को निशाना बनाने के आरोप से इनकार करते हुए कहा है कि वह चरमपंथियों से लड़ रही है।
म्यांमार में पिछले महीने शुरू हुई हिंसा के बाद से अब तक करीब 3,79,000 रोहिंग्या शरणार्थी सीमा पार करके बांग्लादेश में शरण ले चुके हैं। रखाइन प्रांत में उनके कई गांव जला दिए गए हैं।
बौद्ध बहुल रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। म्यांमार उन्हें अवैध शरणार्थी मानता है। कई पीढ़ियों से वह म्यांमार में रह रहे हैं, लेकिन उन्हें वहां की नागरिकता नहीं मिली है।
रोहिंग्या के ख़िलाफ कथित हिंसा और उससे उपजे शरणार्थी संकट पर थोड़ी देर में संयुक्त राष्ट्र की बैठक होनी है।
म्यांमार के अधिकारियों का कहना है कि देश की नेता आंग सान सू ची अगले हफ़्ते 19 सितंबर को होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक अहम चर्चा में शामिल नहीं होंगी। हालांकि इसी दिन वह देश को संबोधित करेंगी।
संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी का कहना है कि बांग्लादेश में अस्थायी शिविरों में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को मिल रही मदद नाकाफी है।
एंटोनियो गुटेरेश ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील की है। उन्होंने कहा, ''पिछले हफ़्ते बांग्लादेश भागकर आने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या एक लाख 25 हज़ार थी। अब यह संख्या तीन गुनी हो गई है।''
उन्होंने कहा, ''उनमें से बहुत सारे अस्थायी शिविरों में या मदद कर रहे लोगों के साथ रह रहे हैं, लेकिन महिलाएं और बच्चे भूखे और कुपोषित हालत में पहुंच रहे हैं।''
क्या इस संकट को जातीय नरसंहार कहा जा सकता है, पूछे जाने पर गुटेरेश ने कहा, ''एक तिहाई (रोहिंग्या) जनसंख्या को देश छोड़कर भागना पड़ा है। क्या आप इसके लिए कोई बेहतर शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं?''
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने सेना से लड़ रहे लड़ाका संगठन अराकान रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी के हमलों की भी आलोचना की है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सेना की कार्रवाई पर भी रोक लगनी चाहिए और जो लोग अपना घर छोड़कर गए हैं, उन्हें वापस आने की इजाज़त दी जानी चाहिए।
इराक़ी कुर्दिस्तान के राष्ट्रपति मसूद बरज़ानी ने संकेत दिए हैं कि यदि इस महीने होने वाले जनमत संग्रह के नतीजे इराक़ सरकार ने स्वीकार नहीं किए तो वो भविष्य के कुर्दिस्तान की सीमाएं तय कर लेंगे।
कुर्दिस्तान में आज़ादी को लेकर इसी महीने जनमत संग्रह होना है।
मसूद बरज़ानी ने बीबीसी से कहा है कि यदि कुर्द अलग देश बनाने के लिए मतदान करते हैं तो वो केंद्रीय सरकार के साथ समझौता चाहते हैं।
वहीं, इराक़ के प्रधानमंत्री ने इस जनमत संग्रह को असंवैधानिक क़रार दिया है।
बरज़ानी ने चेतावनी दी है कि यदि कोई भी समूह किरकुक के हालात को ताक़त के दम पर बदलने की कोशिश करेगा तो कुर्द उससे लोहा लेंगे।
तेल समृद्ध और तुर्क और अरब आबादी वाले किरकुक का नियंत्रण इस समय कुर्द पशमरगा बलों के हाथ में है।
शिया मिलिशिया लड़ाकों का कहना है कि किरकुक को किसी स्वतंत्र कुर्दिस्तान का हिस्सा नहीं बनने देंगे।
कुर्द मध्य पूर्व का चौथा सबसे बड़ा नस्लीय समुदाय है, लेकिन उनका कभी भी कोई स्थायी राष्ट्र नहीं रहा है।
इराक़ में कुर्दों की आबादी 15-20 प्रतिशत तक है, लेकिन यहां अरब समुदाय के नेतृत्व वाली सरकारों में उनका दशकों तक शोषण होता रहा।
1991 के खाड़ी युद्ध के बाद कुर्दों ने स्वायत्ता हासिल की थी।
कुर्दिस्तान की प्रांतीय सरकार और राजनीतिक दलों ने तीन महीने पहले स्वतंत्रता के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने का फ़ैसला लिया था।
25 सितंबर को इस जनमत संग्रह के लिए मतदान होना है।
कुर्द अधिकारियों का कहना है कि यदि लोग स्वतंत्र राष्ट्र के लिए मतदान करते हैं तो इसका मतलब तुरंत आज़ादी नहीं होगा बल्कि केंद्र सरकार के साथ अलग होने की लंबी बातचीत शुरू होगी।
बरज़ानी ने बीबीसी से कहा, ''ये पहला क़दम है। ये इतिहास में पहली बार होगा, जब कुर्द लोग अपना भविष्य स्वतंत्र होकर तय करेंगे।''
उन्होंने कहा, ''जनमत संग्रह के बाद हम बग़दाद के साथ सीमाओं, तेल संपदा और पानी के बंटवारे को लेकर बातचीत करेंगे।''
उन्होंने कहा, ''हम ये क़दम उठाएंगे, लेकिन अगर वो इसे स्वीकार नहीं करते हैं तो फिर ये अलग बात होगी।''
अमरीका और ब्रिटेन ने चेतावनी दी है कि जब इराक़ चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट से लड़ रहा है ऐसे समय में स्वतंत्रता एक बड़ा ख़तरा हो सकती है।
बरज़ानी ने इस चेतावनी को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा, ''इस क्षेत्र में कब हमारे पास स्थायित्व या सुरक्षा थी जिसे खोने का डर हमें हो? इराक़ कब इतना एकजुट था कि हमें उसकी एकता ख़त्म करने की चिंता हो। जो ऐसा कह रहे हैं वो सिर्फ़ हमें रोकने के बहाने खोज रहे हैं।''
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्विटर अकाउंट को लेकर उनकी आलोचना की जा रही है।
पीएम मोदी ट्विटर पर जिन्हें फॉलो करते हैं, उन्हें लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं।
अलग-अलग लेखों में कहा गया है कि मोदी उन लोगों को फॉलो करते हैं जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर फैला रहे हैं, महिला पत्रकारों को बलात्कार की धमकी दे रहे हैं, हिंसा फैलाने की बात कह रहे हैं।
दरअसल पांच सिंतबर (2017) को वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की बैंगलोर में उनके घर के बाहर अज्ञात अपराधियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
तब सोशल साइट्स पर बड़ी तादाद में हत्या का समर्थन किया गया। इनमें ऐसे लोग भी थे जिन्हें पीएम मोदी ट्विटर पर फॉलो करते हैं। उनमें निखिल दधिच का नाम चर्चा का विषय बना हुआ है। जिन्होंने पत्रकार की हत्या को कुत्ते की मौत मरना बताया था।
इस घटना के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पीएम मोदी पर सवाल उठाए गए।
द गार्जियन और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अंतर्राष्टीय मीडिया संस्थानों ने उनकी तीखी आलोचना करते हुए लिखा है, ''प्रधानमंत्री मोदी का ऐसे लोगों को गुप्त या खुले रूप में निरतंर समर्थन मिलता रहा।''
न्यूयॉर्क टाइम्स वर्ल्ड ट्विटर पर लिखता है, ''इस ट्वीट (दधिच) के बाद पीएम मोदी को क्या ऐसे लोगों को फॉलो करना चाहिए जिसमें एक पत्रकार की हत्या को कुत्ते की मौत बताया गया हो?''
न्यूयॉर्क टाइम्स खबर में लिखता है, ''प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी जो दुनियाभर में मशहूर हैं, ट्विटर पर ऐसे शख्स को फॉलो करते हैं जो महिला पत्रकार की हत्या को कुत्ते की मौत मरना बताता है।''
खबर में आगे लिखा गया कि ये आपत्तिजनक ट्वीट निखिल दधिच के ट्विटर अकाउंट से किया गया। हालांकि इसे बाद में डिलीट कर दिया गया था। दधिच वहीं हैं जिन्हें पीएम मोदी फॉलो करते हैं, बल्कि घटना के बाद से भी उन्हें फॉलो किया जा रहा है।
दूसरी तरफ द गार्जियन में छपे लेख में पीएम मोदी की आलोचना की गई है। लेख में कहा गया, ''भारत की सत्तापक्ष पार्टी ने अब तक पीएम मोदी के ट्विटर अकाउंट का समर्थन किया जिसमें वो निखिल दधिच जैसे लोगों को फॉलो करते हैं। मोदी ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो एक पत्रकार की मौत पर खुशी मनाते हैं। पूरे भारत की विपक्षी पार्टियों ने पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का विरोध किया, लेकिन मोदी के समर्थकों ने हत्या को जस्टीफाई किया। मोदी जिन्हें फॉलो करते हैं, वो कहते हैं पत्रकार कुत्ते की मौत मरी।''
लेख में आगे कहा गया कि जबकि पीएम मोदी अपना ट्विटर अकाउंट खुद ऑपरेट करते हैं और ट्विटर पर 1779 लोगों को फॉलो करते हैं।
अमेरिकी मीडिया क्वार्ट्ज लिखता है, ''भारत में प्रधानमंत्री को लोग ब्लॉक कर रहे हैं। #BlockNarendraModi सात सिंतबर को ट्विटर पर टॉप ट्रेंडिंग में रहा।''
चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स लिखता हैं, ''पत्रकार की हत्या के बाद सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री मोदी का विरोध किया गया। मोदी पर आरोप है कि उन्होंने अभी तक पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की निंदा नहीं की।''
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ज़ईद राद अल हुसैन ने रोहिंग्या मुसलमानों को भारत से वापस भेजने की मोदी सरकार की कोशिशों की निंदा की है।
अल हुसैन ने कहा कि भारत के गृह राज्य मंत्री ने कथित रूप से बयान दिया है कि चूंकि भारत रिफ्यूजी कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाला देश नहीं है इसलिए भारत इस मामले पर अंतर्राष्ट्रीय कानून से हटकर काम कर सकता है, लेकिन बुनियादी मानव करुणा के साथ।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख के मुताबिक, भारत का ये कदम अतंर्राष्ट्रीय कानूनों और प्रावधानों के अनुसार विधिसंगत नहीं होगा।
उन्होंने कहा, ''हालांकि प्रचलित कानून के आधार पर भारत रोहिंग्या मुसलमानों का उन देशों या उन इलाकों में सामूहिक निष्कासन नहीं कर सकता है, जहां उन पर अत्याचार होने की आशंका है या फिर उन्हें निशाना बनाया जा सकता है।''
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस वक्त भारत में 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं। इनमें से 16 हजार लोगों ने शरणार्थी दस्तावेज भी हासिल कर लिये हैं।
इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख ने ये भी कहा कि म्यांमार में अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ हिंसा और अन्याय 'नस्ली सफाये' की मिसाल मालूम पड़ती है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र को संबोधित करते हुए ज़ईद राद अल हुसैन ने पहले 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमले की बरसी का उल्लेख किया और फिर म्यांमार में मानवाधिकार की स्थिति को लेकर चिंता प्रकट की।
उन्होंने बुरूंडी, वेनेजुएला, यमन, लीबिया और अमेरिका में मानवाधिकार से जुड़ी चिंताओं के बारे में बात की।
ज़ईद राद अल हुसैन ने कहा कि हिंसा की वजह से म्यांमार से 270,000 लोग भागकर पड़ोसी देश बांग्लादेश पहुंचे हैं और उन्होंने 'सुरक्षा बलों और स्थानीय मिलीशिया द्वारा रोहिंग्या लोगों के गांवों को जलाए जाने' और न्याय से इतर हत्याएं किए जाने की खबरों और तस्वीरों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, ''चूंकि म्यांमार ने मानवाधिकार जांचकर्ताओं को जाने की इजाजत नहीं दी है, मौजूदा स्थिति का पूरी तरह से आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन यह स्थति नस्ली सफाए का उदाहरण प्रतीत हो रही है।''
उधर, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी ने कहा है कि म्यांमार के रखाइन प्रांत में ताजा हिंसा की वजह से 25 अगस्त से अब तक 3,13,000 रोहिंग्या बांग्लादेश की सीमा में दाखिल हो चुके हैं।
म्यांमार के मध्य हिस्से में एक मुस्लिम परिवार के मकान पर पथराव करने वाली भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने रबर की गोलियां चलाईं। भीड़ ने मागवे क्षेत्र में रविवार रात हमला किया।









