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भारत-चीन सीमा: गलवान घाटी की ताज़ा सैटेलाइट तस्वीर

भारत के तमाम बड़े अख़बारों ने आज एक ख़बर प्रमुखता से छापी है। यह ख़बर भारत-चीन सीमा पर तनाव से जुड़ी है।

इन ख़बरों में लद्दाख सीमा पर गलवान घाटी में 22 जून 2020 की सैटेलाइट तस्वीरों का ज़िक्र है। इन तस्वीरों के आधार पर अख़बारों ने छापा है कि 15-16 जून की रात गलवान घाटी में दोनों सेनाओं के बीच हिंसक झड़प हुई थी, वहाँ दोबारा चीनी सेना दिख रही हैं।

अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अख़बार की लीड लगाई है - सैटेलाइट इमेज बताते हैं, पीएलए ने संघर्ष की साइट पर कैंप लगा लिए हैं। हालाँकि अख़बार ने खब़र के साथ कोई सैटेलाइट इमेज नहीं लगाई है।

हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार कह रहा है - सैटेलाइट इमेज संकेत दे रहे हैं, कोई पीछे नहीं हटा है।

इंडियन एक्सप्रेस ने लीड लगाई है - सैटेलाइट तस्वीर में गलवान में चीनी सेना दिख रही है। इसी तरह की हेडलाइन कमोबेश हिंदी के अख़बारों और टीवी चैनलों में भी चल रही हैं।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने भी इन सैटेलाइट तस्वीरों को ट्वीट किया है।

ये सैटेलाइट तस्वीरें मैक्सार टेक्नोलॉजी ने खींची है।

क्या 2020 में सऊदी अरब हज का आयोजन करेगा?

कोरोना वायरस संक्रमण के दौर में भी 2020 में सऊदी अरब हज का आयोजन करेगा। लेकिन इस आयोजन में हाजियों की संख्या सीमित होगी।

सऊदी अरब सरकार के हज और उमरा मामलों के मंत्रालय ने सोमवार को बयान जारी करके बताया है कि कोरोना वायरस संक्रमण के चलते इस बार सीमित हाजियों को ही हज करने की इजाजत होगी।

इस बयान में कहा गया है कि इस साल केवल सऊदी अरब में रह रहे लोगों को हज यात्रा की इजाजत होगी।

बयान में कहा गया है कि लोगों में कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए दूसरे तमाम सुरक्षात्मक प्रावधान भी अपनाए जाएंगे।

इस्लामिक कैलेंडर चांद के हिसाब से बदलते रहते हैं लेकिन हज बकरीद के समय में होता है। इस बार हज का आयोजन अगस्त के पहले सप्ताह में हो रहा है।

इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभ हैं, इसमें सबसे आख़िरी हज माना जाता है। शारीरिक रूप से ठीक और आर्थिक रूप से संपन्न मुसलमान जीवन में कम से एक बार हज करने की इच्छा रखते हैं।

यही वजह है कि हर साल 20 लाख से ज़्यादा मुसलमान हज के लिए मक्का पहुंचते हैं। हालांकि इस बार दूसरे देशों से मुसलमान हज करने के लिए सऊदी अरब नहीं जा पाएंगे।

वैसे कोरोना संकट को देखते हुए इस साल हज यात्रा स्थगित होने के भी कयास लगाए जा रहे थे। अप्रैल महीने में हज मामलों के मंत्री मोहम्मद सालेह बंतेन ने कहा था कि सऊदी अरब हाजियों की सुरक्षा को लेकर फ़िक्रमंद है और लोगों से उन्होंने गुज़ारिश की है कि वे अपनी बुकिंग को लेकर किसी भी तरह की कोई जल्दबाज़ी न दिखाएं।

कोरोना वायरस के संक्रमण के ख़तरे को देखते हुए उमरा को भी बंद रखा गया था। उमरा के लिए यात्रा पर पाबंदी मार्च में कोरोना लॉकडाउन की पाबंदी के साथ ही लगाई गई थी।

जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार की बिगड़ती स्थिति पर ओआईसी ने चिंता ज़ाहिर की

इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन (ओआईसी) के कॉन्टैक्ट ग्रुप के विदेश मंत्रियों की आपातकालीन बैठक में कहा गया है कि भारत सरकार की ओर से 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर को लेकर जो फ़ैसला लिया गया है और नए डोमिसाइल नियम लागू किए गए हैं, वो संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव और अंतरराष्ट्रीय क़ानून जिसमें चौथा जिनेवा कंवेंशन भी शामिल है, उसका उल्लंघन है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव को मानने की भारत की प्रतिबद्धता का भी उल्लंघन है।

इसके साथ ही बैठक में संयुक्त राष्ट्र की उन दो रिपोर्टों का स्वागत किया गया है जिसमें यह गया है कि भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में वहां के लोगों के मानवाधिकार का व्यवस्थित तरीक़े से हनन किया गया है।

ये दोनों ही रिपोर्ट जून 2018 और जुलाई 2019 में आई थीं।

बैठक में 5 अगस्त, 2019 के बाद भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में बदतर हुए मानवाधिकार की स्थिति और हालात पर चिंता ज़ाहिर की गई।

ओआईसी का यह कॉन्टैक्ट ग्रुप जम्मू-कश्मीर के लिए 1994 में बना था।

इस कॉन्टैक्ट ग्रुप के सदस्य हैं- अज़रबैजान, नीज़ेर, पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की।

ओआईसी के महासचिव डॉक्टर यूसुफ़ अल-ओथइमीन ने कहा, ''ओआईसी इस्लामी समिट, विदेश मंत्रियों की कौंसिल और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के हिसाब से जम्मू-कश्मीर के मुद्दे का शांतिपूर्ण समाधान निकालने को लेकर प्रतिबद्ध है।''

बैठक में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की 16 अगस्त, 2019 और 15 जनवरी, 2020 की बैठक जो भारत की कार्रवाई को लेकर हुई थी, उसका स्वागत किया गया है।

ओआईसी ने जम्मू-कश्मीर पर अपने पुरानी स्थिति और प्रस्तावना को लेकर प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है और कश्मीरी अवाम के आत्मनिर्णय के अधिकार की क़ानूनी लड़ाई के समर्थन को फिर से दोहराया है।

ओआईसी ने भारत से ये पाच माँग की है-

- एकतरफ़ा और ग़ैर-क़ानूनी कार्रवाई रद्द करे और कश्मीरी अवाम को स्वेच्छापूर्ण तरीक़े से उनके आत्मनिर्णय के अधिकार का संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में जनमत-संग्रह के तहत पालन करने दे।

- मानवाधिकार हनन को रोका जाए। फ़ौज के ग़लत इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए जिसके तहत फ़ौज पैलेट-गन का इस्तेमाल करती है। फ़ौज की अभेद घेराबंदी और अमानवीय लॉकडाउन को हटाया जाए। कठोर आपातकालीन क़ानून को भंग किया जाए। मौलिक स्वतंत्रता के अधिकार को बहाल किया जाए और ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को छोड़ा जाए।

- भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की आबादी में किसी भी प्रकार की संरचनात्मक बदलाव को रोका जाए क्योंकि ये ग़ैर-क़ानूनी हैं और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन है, ख़ासतौर पर चौथे जिनेवा कंवेंशन का।

- ओआईसी, आईपीएचआरसी और संयुक्त राष्ट्र फ़ैक्ट फाइंडिंग मिशन, ओआईसी महासचिव के जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष दूत और अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर बिना रोकटोक के मानवाधिकार की उल्लंघन की जाँच-पड़ताल की इजाज़त हो।

-ओएचसीएचआर की रिपोर्ट में कश्मीर में हो रहे मानवाधिकारों के हनन को लेकर स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच बिठाने की माँग पर सहमति जताया जाए।

जम्मू-कश्मीर का भारत ने पिछले साल विशेष दर्जा ख़त्म किया तो पाकिस्तान का ओआईसी पर दबाव था कि वो भारत के ख़िलाफ़ कुछ कड़ा बयान जारी करे।

हालाँकि उस वक़्त ऐसा हुआ नहीं और ओआईसी लगभग तटस्थ रहा। दरअसल, ओआईसी को सऊदी अरब के प्रभुत्व वाला संगठन माना जाता है। बिना सऊदी अरब के समर्थन के ओआईसी में कुछ भी कराना असंभव सा माना जाता है।

भारत और सऊदी के व्यापक साझे हित हैं और सऊदी अरब कश्मीर को लेकर भारत के ख़िलाफ़ बोलने से बचता रहा है। अनुच्छेद 370 हटाने पर भी सऊदी अरब ने कोई बयान नहीं जारी किया था।

संयुक्त अरब अमीरात ने कहा था कि यह भारत का आंतरिक मुद्दा है। सऊदी अरब और यूएई के इस रुख़ को पाकिस्तान के लिए झटका माना जा रहा था और भारत की कूटनीतिक कामयाबी। लेकिन एक बार फिर ओआईसी में इस तरह की बैठक होना पाकिस्तान इसे अपनी कामयाबी से जोड़कर देखेगा। इससे पहले पिछले साल सितंबर में ऐसी बैठक हुई थी।

कश्मीर पर ओआईसी की तटस्थता को लेकर पाकिस्तान ने तुर्की, मलेशिया, ईरान के साथ गोलबंद होने की कोशिश की थी। इसके लिए तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन, ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी, मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद और पाकिस्तान के पीएम इमरान ख़ान ने कुआलालंपुर समिट में एकजुट होने की योजना बनाई थी लेकिन सऊदी अरब ने इसे ओआईसी को चुनौती के तौर पर लिया था और पाकिस्तान को इस मुहिम में शामिल होने से रोक दिया था।

तुर्की और मलेशिया कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ खड़े दिखे जबकि बाक़ी के इस्लामिक देश तटस्थ रहे थे। हाल के दिनों में मालदीव ने भी ओआईसी में भारत का साथ दिया है।

ओआईसी की बैठक उस वक्त हो रही है जब भारत और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन के बीच तनाव है। सरहद पर भारत के 20 सैनिकों की मौत हुई है। नेपाल के साथ भी सीमा पर विवाद चल रहा है और पाकिस्तान के साथ तनाव तो पहले से ही है। ऐसे में ओआईसी की बैठक काफ़ी अहम मानी जा रही है।

ईरान, मलेशिया और तुर्की की लंबे समय से शिकायत रही है कि ओआईसी इस्लामिक देशों की ज़रूरतों और महत्वकांक्षा को जगह देने में नाकाम रहा है। ईरान, तुर्की और मलेशिया की कोशिश रही है कि कोई ऐसा संगठन बने जो सऊदी के प्रभुत्व से मुक्त हो।

जम्मू कश्मीर पर ओआईसी के इस कॉन्टैक्ट ग्रुप में सऊदी अरब भी है। अगर सऊदी बैठक नहीं चाहता तो शायद ही यह हो पाती। कहा जाता है कि सऊदी अरब के बिना ओआईसी में एक पत्ता भी नहीं हिलता है।

पाकिस्तान के भीतर इस बात की आलोचना होती रही है कि सऊदी और यूएई इस्लामिक देश हैं लेकिन वो कश्मीर के मसले पर भारत के साथ हैं।

अगर इस बैठक से कोई प्रस्ताव पास किया जाता है तो सऊदी से ही भारत उम्मीद कर सकता है कि वो उस प्रस्ताव की भाषा को किस हद तक संतुलित करवा पाता है।

चीन ने भारत के सैनिकों को मारने की हिम्मत कैसे की?

भारत-चीन सीमा के गलवान वैली में मारे गए सैनिकों के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और 15 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने दो मिनट का मौन रखा।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-चीन सीमा पर मारे गए सैनिकों के बारे में कहा है कि जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। उन्होंने कहा कि भारत शांति चाहता है लेकिन उकसाने पर जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम है।

भारतीय सेना ने मारे गए अधिकारी-जवानों के नाम जारी किए। भारतीय सेना ने भारत-चीन सीमा पर तैनात 20 अधिकारियों-सैनिकों के नाम जारी कर दिए हैं। इसमें बिहार के पांच जवान शामिल हैं।

इस हिंसक झड़प में भारत के जो सैनिक मारे गए हैं, उनके नाम और रैंक इस तरह से हैं -

1. कर्नल बी. संतोष बाबू - हैदराबाद, तेलंगाना

2. नायक सुबेदार नुदुरम सोरेन - मयूरभंज, ओड़िसा

3. नायक सुबेदार मंदीप सिंह - पटियाला, पंजाब

4. नायक सुबेदार सतनाम सिंह - गुरदासपुर, पंजाब

5. हवलदार के पालानी - मदुरई, तमिलनाडु

6. हवलदार सुनील कुमार - पटना, बिहार

7. हवलदार बिपुल राय - मेरठ सिटी, उत्तर प्रदेश

8. नायक दीपक कुमार - रीवा, मध्य प्रदेश

9. सिपाही राजेश ओरांग - बीरभूम, पश्चिम बंगाल

10. सिपाही कुंदन कुमार ओझा - साहेबगंज, झारखण्ड

11. सिपाही गणेश राम - कांकेर, छत्तीसगढ़

12. सिपाही चंद्राकांता प्रधान - कंधमाल, ओड़िसा

13. सिपाही अंकुश - हमीरपुर, हिमाचल प्रदेश

14. सिपाही गुरबिंदर - संगरुर, पंजाब

15. सिपाही गुरतेज सिंह - मनसा, पंजाब

16. सिपाही चंदन कुमार - भोजपुर, बिहार

17. सिपाही कुंदन कुमार - सहरसा, बिहार

18. सिपाही अमन कुमार - समस्तीपुर, बिहार

19. सिपाही जय किशोर सिंह - वैशाली, बिहार

20. सिपाही गणेश हंसदा - पूर्वी सिंहभूम, झारखण्ड

प्रधानमंत्री ने शुक्रवार को बुलाई सर्वदलीय बैठक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय से बताया गया है कि भारत-चीन सीमा की स्थिति पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री ने 19 जून को शाम पाँच बजे सर्वदलीय बैठक बुलाई है जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रमुख वीडियो कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए हिस्सा लेंगे।

भारत-चीन तनाव: चीन ने कहा - हम ज़िम्मेदार नहीं, भारतीय सैनिकों ने प्रोटोकॉल तोड़ा

चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि गलवान घाटी में हुई घटना के लिए उन्हें ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा, ''इसमें सही और ग़लत बिल्कुल साफ़ है। ये घटना एलएसी के चीन के तरफ़ वाले क्षेत्र में हुई और इसके लिए चीन को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।''

''गलवान घाटी की संप्रभुता हमेशा से चीन के पास रही है। भारतीय सैनिकों ने बॉर्डर प्रोटोकॉल और हमारे कमांडर स्तर की बातचीत में हुई सहमति का गंभीर उल्लंघन किया।''

प्रवक्ता ने साथ ही कहा कि चीन अब और संघर्ष नहीं चाहता।

उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और सैनिक स्तरों पर बातचीत चल रही है।

सैनिकों की मौत पर बोले राजनाथ सिंह

भारत के केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत चीन सीमा पर मारे गए सैनिकों की बहादुरी और बलिदान को देश कभी नहीं भूलेगा। राष्ट्र सैनिकों के परिवार वालों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है।

राजनाथ सिंह की बैठक

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टॉफ़ बिपिन रावत के अलावा तीनों सेना के प्रमुखों के साथ बैठक की है। भारत चीन सीमा पर हुई झड़प के बाद की स्थितियों को लेकर राजनाथ सिंह ने विदेश मंत्री एस जयशंकर से भी बात की है।

ब्रिटिश उच्चायोग ने कहा बातचीत करें दोनों देश

ब्रिटिश उच्चायोग के प्रवक्ता ने भारत-चीन सीमा पर विवाद के बीच बयान दिया है कि दोनों देशों को बातचीत करनी चाहिए क्योंकि सीमा पर हिंसा किसी के हित में नहीं है।

शिव सेना ने पूछा पीएम से सवाल

शिव सेना के सांसद संजय राउत ने कहा है कि सीमा पर जो कुछ हुआ है उसके लिए आप जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी या फिर राहुल गांधी को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। हम सब 20 सैनिकों की मौत के ज़िम्मेदार हैं। प्रधानमंत्री जो भी फ़ैसला लेंगे सभी पार्टियों को उनका साथ देना चाहिए लेकिन उससे पहले उन्हें यह तो बताना चाहिए कि क्या ग़लत हुआ है।

क्यों चुप हैं पीएम? - राहुल गांधी

पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में 15/16 जून की रात चीन और भारत की सेना के आमने-सामने के संघर्ष में भारतीय सेना के एक अधिकारी समेत 19 जवानों की मौत हुई है।

भारत और चीन की विवादित सीमा पर 45 साल बाद पहली बार किसी की जान गई है।

इस घटना के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट करके प्रधानमंत्री पर निशाना साधा है।

राहुल गांधी ने अपने ट्वीट में लिखा है कि आख़िर प्रधानमंत्री ख़ामोश क्यों हैं?

वे छिप क्यों रहे हैं?

बस अब बहुत हुआ। हमें यह जानने की ज़रूरत है कि आख़िर हुआ क्या है।

चीन ने हमारे सैनिकों को मारने की हिम्मत कैसे की?

हमारी जमीन लेने की उनकी हिम्मत कैसे हुई?

लद्दाख में भारत-चीन में हिंसक झड़प क्यों हो रहे हैं?

पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प में भारत के 20 सैनिक शहीद हो गए। हालांकि चीन की क्षति के बारे में सटीक संख्या की जानकारी नहीं दी गई है। कहा जा रहा है कि चीन को भी नुकसान का सामना करना पड़ा है।

आखिर बीते 41 दिन में ऐसा क्या हुआ जो भारत और चीन के बीच ऐसे हालात हो गए। भारत और चीन के बीच तनाव तब शुरू हुआ था, जब दोनों देशों के सैनिक पांच और छह मई को पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो में आपस में भिड़ गए थे। पांच मई की शाम को चीन और भारत के 250 सैनिकों के बीच हुई यह हिंसा अगले दिन भी जारी रही थी।

इसके बाद नौ मई को उत्तर सिक्किम सेक्टर में भी इस तरह की घटना हुई थी। भारत-चीन सीमा विवाद 3,488 किलोमीटर लंबी एलएसी को लेकर है। इसके बाद दोनों सेनाओं ने बातचीत के जरिए सीमा विवाद हल करने की कोशिश की थी।

6 जून को दोनों देशों के बीच लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किया। भारत सरकार ने कहा है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में ​स्थिति का हल निकालने और शांति सुनिश्चित करने और लिए दोनों पक्ष सैन्य और कूटनीतिक तौर पर जुड़े रहेंगे।

चुशुल-मोल्दो क्षेत्र में हुई बैठक पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, ''दोनों पक्ष सीमावर्ती क्षेत्रों में शांतिपूर्वक हल निकालने के लिए सहमत हुए हैं। यह फैसला विभिन्न द्विपक्षीय समझौतों और नेताओं के बीच हुए समझौते को ध्यान में रखते हुए लिया गया है कि भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में शांति द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए आवश्यक है।''

वार्ता में चीन की ओर से दक्षिण शिनजियांग मिलिट्री रीजन के कमांडर और पीपुल्‍स लिबरेशन आर्मी (PLA) के ग्रुप मेजर जनरल लियु लिन मौजूद रहे। वहीं भारत की ओर से जनरल हरिंदर सिंह थे।

15 जून को दोनों देशों के बीच कर्नल रैंक के अफसरों की बातचीत हुई। लेकिन 15 जून की ही देर रात दोनों सेनाओं के बीच झड़प की खबर आई।

इसके बाद 16 जून को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की इस अप्रत्याशित कार्रवाई हुई। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि 16 जून को दोनों ओर से सैनिकों द्वारा कोई गोलीबारी नहीं की गई है। दरअसल सैनिकों के बीच पथराव हुआ। डंडों से एक-दूसरे पर हमला किया गया।

चीन ने भी मान लिया है कि सोमवार (15 जून) रात वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर लद्दाख की गलवान घाटी में हिंसक झड़प के दौरान उसके भी सैनिक मारे गए हैं। हालांकि उसके कितने सैनिक हताहत हुए हैं, इसकी जानकारी उन्होंने नहीं दी।

चीन सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के हवाले से चीन की सेना (पीएलए) का बयान जारी हुआ है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर ताजा घटनाक्रम के बाद एक चीनी सैन्य प्रवक्ता ने मंगलवार (16 जून) को भारतीय सैनिकों से अपील करते हुए कहा कि वे सीमा पर चीनी सैनिकों के खिलाफ सभी भड़काऊ कार्रवाइयों को तुरंत रोके और बातचीत के माध्यम से विवादों को सुलझाने के सही रास्ते पर वापस आए। पीएलए ने कहा, ''भारतीय सैनिकों ने एक बार फिर गलवान घाटी क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा को पार किया और जानबूझकर उकसाने वाले हमले किए, जिससे गंभीर संघर्ष हुआ और सैनिक हताहत हुए।''

क्या डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बन पाएंगे?

पिछले कुछ सप्ताह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए मुश्किल भरे साबित हुए हैं। बुरी खबरों के बीच उन्हें अपने चुनाव प्रचार में उतरना पड़ रहा है, इससे उनका चुनावी अभियान भी प्रभावित हो रहा है। बतौर राष्ट्रपति वे लगातार संकटों से घिरते जा रहे है। ऐसे समय में उनके दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने की उम्मीदें गंभीर संकट में दिख रही हैं।

सर्वेक्षणों से यह ज़ाहिर हो रहा है कि ट्रंप बाइडन से पिछड़ गए हैं। कुछ सर्वे में तो वे दहाई अंकों से पिछड़ रहे हैं। हाल ही में इकानामिस्ट मैग्जीन में छपे विश्लेषण में बाइडन को छह में से पांच प्वाइंट मिले हैं, इसके मुताबिक बाइडन 2008 में बराक ओबामा की सहज जीत जैसी स्थिति को दोहरा सकते हैं।

ट्रंप 2016 की रणनीति को ही अपना रहे है लेकिन उनकी मुश्किलें बता रही हैं कि इस बार देश का राष्ट्रीय मूड अलग हो सकता है।

अमरीका के आम लोग कोरोना वायरस की चपेट में है, जिसके चलते एक लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इस महामारी के चलते अमरीकी अर्थव्यवस्था में गिरावट देखने को मिल रहा है। इसके साथ ही अब नस्लभेद और पुलिस व्यवस्था को लेकर देश भर में विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहा है।

इसके अलावा अब दूसरे टकराव के लिए गुंजाइश नहीं हैं। जिस युद्धधर्मिता और अक्खड़पन ने अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प को अतीत में फ़ायदा पहुंचाया है, लेकिन मौजूदा वक्त में यह तरीका उस जनता से मेल नहीं खा रहा है जिसे सहानुभूति, चिकित्सा और सामंजस्य की दरकार है।

अमरीकी राष्ट्रपति उस वक्त क़ानून और व्यवस्था की दुहाई दे रहे है जबकि लोगों की धारणा नाटकीय तौर पर ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के साथ दिखाई दे रही है। आम लोगों के रूझान से यह साफ़ दिख रहा है कि वे जब नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट डालेंगे तब उनकी प्राथमिकताओं में नस्लीय भेदभाव वास्तविक समस्या के तौर पर शामिल होगा।

कानून और व्यवस्था का अभियान 1960 के अंतिम और 1970 के शुरुआती सालों में नागरिकों के विद्रोह पर क़ाबू पाने में मदद कर रिचर्ड निक्सन को राष्ट्रपति चुनाव में जीत दिला सकता है लेकिन अमरीका अब वह देश नहीं रहा जो 50 साल पहले हुआ करता था।

पिछले कुछ सप्ताह में सामने आए मामलों से अमरीका की मौजूदा राजनीतिक स्थिति का पता चल जाता है। गुरुवार को ट्रंप ने दक्षिण के 10 सैन्य ठिकानों के नाम से कंफेडरेट जनरल के नाम हटाने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा करना यहां प्रशिक्षित सैनिकों का अपमान होगा।

लेकिन उसी वक्त दक्षिण में शुरू हुए और बेहद लोकप्रिय नेस्कर कार रेसिंग सर्किट ने अपने सभी आयोजनों से कंफेडरेट झंडे को फहराने पर पाबंदी लगा दी। स्थानीय और प्रांतीय नेता ने अपने इलाकों में कंफेडरेट जनरलों की प्रतिमा को हटाना शुरू कर दिया है। और तो और इन जनरलों के नाम सैन्य ठिकाने के नाम से हटाने की मांग अमरीकी सेना के अंदर से आने लगी है। सेना के रिटायर्ड जनरल डेविड पेट्रेएस ने अटलांटिक मैग्जीन में अपने आलेख में इसकी मांग की है।

अमरीका में इन दिनों एक सांस्कृतिक संघर्ष देखने को मिला है, जिसका पहले ट्रंप आनंद उठा चुके हैं। पुलिस के अन्यायपूर्ण तौर तरीकों के ख़िलाफ़ पेशेवर एथलीटों ने राष्ट्रीय गान के वक्त घुटने टेक कर विरोध जताया है। नेशनल फुटबाल लीग ने आधिकारिक तौर पर खेद जताते हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल खिलाड़ियों का साथ नहीं देने की घोषणा की है।  इन खिलाड़ियों में पूर्व क्वार्टरबैक कोलीन केपरनिक भी शामिल हैं।

अमरीकी सॉकर फे़डरेशन ने बुधवार को इस बात की आवश्यकता को दोहराने के लिए मतदान किया है कि राष्ट्रीय गान के सभी खिलाड़ी सम्मानपूर्वक खड़े रहें। विवादों से दूर रहने वाले डेमोक्रेट्स अब एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए अपने घुटने टेक रहे हैं। इस बीच, ट्रंप ने इस अभ्यास की निंदा करते हुए नेशनल फुटबॉल लीग और लीग के क्वार्टर बैक ड्रीउ ब्रीस पर निशाना साधा। ब्रीस ने घुटने टेकने को राष्ट्रविरोधी मानने वाले अपने बयान के लिए हाल ही में माफ़ी मांगी है।

दो सप्ताह पहले, डोनाल्ड ट्रंप के एक चर्च में जाने से पहले क़ानून प्रवर्तन एजेंसी और नेशनल गार्ड के सैनिकों ने बलपूर्वक नजदीक के पार्क खाली करा लिया था। यहां ट्रंप ने बाइबिल हाथ में लेकर फोटोग्राफरों से तस्वीरें खिंचवाई थी। इसके बाद से वे लगातार अपने इस क़दम का बचाव कर रहे हैं, इस दौरान वे ये बताते हैं कि सुरक्षा बलों के लिए पार्क खाली कराना कितना आसान था। उन्होंने ट्वीट किया था, ''पार्क में सैर''।

वहीं अमरीकी नेताओं और अमरीकी सेना के सादे कपड़े वाले सदस्यों ने इस घटना से खुद को अलग करना शुरू कर दिया है। पूर्व रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस सहित कई सेवानिवृत्त जनरलों ने इस कार्रवाई को लापरवाही भरा बताया था। लेकिन मौजूदा रक्षा मंत्री मार्क एस्पर और ज्वाइंट चीफ ऑफ़ स्टॉफ मार्क मिले ने ट्रंप के साथ चर्च जाने को लेकर खे़द जताया है।

पिछले सप्ताह वाशिंगटन डीसी में सुरक्षा मुहैया कराने के लिए भेजे गए नेशनल गार्ड के सदस्यों के बीच व्यापक बेचैनी पर न्यूयार्क टाइम्स ने रिपोर्ट प्रकाशित की है।

इसमें सबसे विवादास्पद प्रकरण ट्रंप का वो ट्वीट था जिसमें एक 75 साल का वीडियो प्रदर्शनकारी ज़मीन पर गिरा दिख रहा है और न्यूयार्क पुलिस ने उस शख़्स को लहूलुहान कर रखा है। ट्रंप ने आरोप लगाया था कि यह कट्टर वामपंथी देशद्रोही शख़्स क़ानून प्रवर्तन करने वाली एजेंसियों की इलेक्ट्रानिक निगरानी कर रहा था। इस आरोप को दक्षिणपंथी मीडिया ने खूब हवा दी लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के कई रिपब्लिकन समर्थनों ने इस ट्वीट का समर्थन नहीं किया।

इन सबने लोगों के मन में राष्ट्रपति ट्रम्प के फ़ैसलों पर सवाल उत्पन्न किया है। खासकर संकट के समय में वे जिस तरह के फ़ैसले ले रहे हैं, उसने उनके फिर से राष्ट्रपति चुने जाने की राह में मुश्किलें पैदा कर दी हैं।

पॉलिटिको मैग्जीन के कंजरवेटिव नेशनल रिव्यू के एडिटर रिक लॉरी ने लिखा है, ''अगर वे नवंबर में हार जाते हैं तो ऐसा इसलिए नहीं होगा कि वे बड़े विधायी सुधार करना चाहते थे जो राजनीतिक रूप में बहुत दूर की बात थी।''

''ऐसा इसलिए भी नहीं होगा कि वे उन्होंने कोई क्रिएटिव और अपरंपरागत नीति को अपना लिया था। ऐसा इसलिए भी नहीं होगा कि वे चुनौतीपूर्ण घटनाओं से घिरे हुए थे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उन्होंने अपने राष्ट्रपति पद को अनावश्यक तौर पर मैदान में उतार दिया है, एक वक्त में 280 शब्द के मैदान में।''

हालांकि अभी भी अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में साढ़े चार महीने से ज़्यादा का वक्त बचा है। अभी भी संभव है कि ट्रंप अपनी स्थिति मजबूत कर लें।

हालांकि अब तक ट्रंप के ऊपर डेमोक्रेट्स की बढ़त टिकाऊ दिख रही है। यह 2016 के हिलेरी क्लिंटन से ज़्यादा टिकाऊ दिख रही है। पिछले कुछ सप्ताह से डोनाल्ड ट्रंप मुश्किलों में ज़रूर दिख रहे हैं और इस बार उनकी ख़ासियतें उन्हें फेवरिट उम्मीदवार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं लग रही हैं।

यही पर सवाल उठता है कि क्या डोनाल्ड ट्रम्प दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बन पाएंगे? फ़िलहाल ऐसी संभावना नहीं दिख रही है।

क्या कोरोना वायरस को बिना लॉकडाउन के काबू किया जा सकता है?

कोरोना वायरस तुर्की में देर से आया। यहां संक्रमण का पहला मामला 19 मार्च को दर्ज किया गया था। लेकिन जल्द ही यह तुर्की के हर कोने में फैल गया। महीने भर के भीतर ही तुर्की के सभी 81 प्रांतों में कोरोना वायरस फैल चुका था।

तुर्की में दुनिया में सबसे तेज़ी से कोरोना संक्रमण फैल रहा था। हालात चीन और ब्रिटेन से भी ज़्यादा ख़राब थे। आशंकाएं थी कि बड़े पैमानों पर मौतें होंगी और तुर्की इटली को भी पीछे छोड़ देगा। उस समय इटली सबसे ज़्यादा प्रभावित देश था।

तीन महीने गुज़र गए हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, वो भी तब जब तुर्की ने पूर्ण लॉकडाउन लागू ही नहीं किया।

तुर्की में आधिकारिक तौर पर 4397 लोगों की कोरोना संक्रमण से मौत की पुष्टि की गई है। दावे किए जा रहे हैं कि वास्तविक संख्या इसके दो गुना तक हो सकती है क्योंकि तुर्की में सिर्फ़ उन लोगों को ही मौत के आंकड़ों में शामिल किया गया है जिनकी टेस्ट रिपोर्ट पॉज़िटिव थीं।

लेकिन अगर दूसरे देशों की तुलना में देखा जाए तो सवा आठ करोड़ की आबादी वाले इस देश के लिए ये संख्या कम ही है।

विशेषज्ञ चेताते हैं कि कोरोना संक्रमण को लेकर किसी नतीजे पर पहुंचना या दो देशों के आंकड़ों की तुलना करना मुश्किल है, वो भी तब जब कई देशों में मौतें जारी हैं।

लेकिन यूनिवर्सिटी आफ़ केंट में वायरलॉजी के लेक्चरर डॉ. जेरेमी रॉसमैन के मुताबिक़ 'तुर्की ने बर्बादी को टाल दिया है।'

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''तुर्की उन देशों में शामिल है जिसने बहुत जल्द प्रतिक्रिया दी। ख़ासकर टेस्ट करने, पहचान करने, अलग करने और आवागमन को रोकने के मामले में। तुर्की उन चुनिंदा देशों में शामिल है जो वायरस की गति को प्रभावी तरीक़े से कम करने में कामयाब रहे हैं।''

जब वायरस की रफ़्तार बढ़ रही थी, अधिकारियों ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। कॉफ़ी हाउस जाने पर रोक लग गई, शापिंग बंद हो गई, मस्जिदों में सामूहिक नमाज़ रोक दी गई।

पैंसठ साल से ऊपर और बीस साल से कम उम्र के लोगों को पूरी तरह लॉकडाउन में बंद कर दिया गया। सप्ताहांत में कर्फ्यू लगाए गए और मुख्य शहरों को सील कर दिया गया।

इस्तांबुल तुर्की में महामारी का केंद्र था। इस शहर ने अपनी रफ़्तार खो दी, जैसे कोई दिल धड़कना बंद कर दे।

अब प्रतिबंधों में धीरे-धीरे ढील दी जा रही है, लेकिन डॉ. मेले नूर असलान अभी भी चौकन्नी रहती हैं। वो फ़तीह ज़िले की स्वास्थ्य सेवाओं की निदेशक हैं। ये इस्तांबुल के केंद्र में एक भीड़भाड़ वाला इलाक़ा है।  ऊर्जावान और बातूनी डॉ. असलान कांटेक्ट ट्रेसिंग अभियान का नेतृत्व कर रही हैं। पूरे तुर्की में कांटेक्ट ट्रेसिंग अभियान की छह हज़ार टीमें हैं।

वो बताती हैं, ऐसा लगता है जैसे हम युद्धक्षेत्र में हों। मेरी टीम के लोग घर जाना ही भूल जाते हैं, आठ घंटे के बाद भी वो काम करते रहते हैं। वो घर जाने की परवाह नहीं करते क्योंकि वो जानते हैं कि वो अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।

डॉ. मेले नूर असलान कहती हैं कि उन्होंने मार्च 11, यानी पहले दिन से ही वायरस को ट्रैक करना शुरू कर दिया था, इसमें ख़सरे की बीमारी को ट्रैक करने का उनका अनुभव काम आया।

वो कहती हैं, ''हमारी योजना तैयार थी। हमने सिर्फ़ अलमारी से अपनी फ़ाइलें निकालीं और हम काम पर लग गए।''

फ़तीह की तंग गलियों में हम दो डॉक्टरों के साथ हो लिए। पीपीई किटें पहने ये डॉक्टर एक एप का इस्तेमाल कर रहे थे। वो एक अपार्टमेंट में एक फ्लैट में गए जहां दो युवतियां क्वारंटीन में थीं। उनका दोस्त कोविड पॉज़िटिव है।

अपार्टमेंट के गलियारे में ही दोनों महिलाओं के कोविड के लिए परीक्षण किए गए, उन्हें रिपोर्ट चौबीस घंटों के भीतर मिल जाएगी। एक दिन पहले उन्हें हल्के लक्षण दिखने शुरु हुए हैं। 29 वर्षीया मज़ली देमीरअल्प शुक्रगुज़ार हैं कि उन्हें तुरंत रेस्पांस मिला है।

वो कहती हैं, ''हम विदेशों की ख़बरें सुनते हैं। शुरू में जब हमें वायरस के बारे में पता चला तो हम बेहद डर गए थे लेकिन जितना हमने सोचा था तुर्की ने उससे तेज़ काम किया। यूरोप या अमरीका के मुक़ाबले बहुत तेज़ काम किया।''

तुर्की में विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी प्रमुख डॉ. इरशाद शेख कहते हैं कि तुर्की के पास सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर दुनिया के लिए कई सबक़ हैं।

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''शुरुआत में हम चिंतित थे। रोज़ाना साढ़े तीन हज़ार तक नए मामले आ रहे थे। लेकिन टेस्टिंग ने बहुत काम किया। और नतीजों के लिए लोगों को पांच-छह दिनों का इंतेज़ार नहीं करना पड़ा।''

उन्होंने तुर्की की कामयाबी का श्रेय कांटेक्ट ट्रेसिंग, क्वारंटीन और तुर्की की अलग-थलग करने की नीति को भी दिया।

तुर्की में मरीज़ों को हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन भी दी गई। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इसकी जमकर तारीफ़ की थी लेकिन अंतरराष्ट्रीय शोध ने इस दवा को खारिज कर दिया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के इलाज के तौर पर इस दवा का ट्रायल रोक दिया है। मेडिकल जर्नल लेंसेट में प्रकाशित एक शोध पत्र में दावा किया गया है कि इस दवा से कोविड-19 के मरीज़ों में कार्डिएक अरेस्ट का ख़तरा बढ़ जाता है और इससे फ़ायदे से ज़्यादा नुकसान हो सकता है।

हमें उन अस्पतालों में जाने की अनुमति दी गई जहां हज़ारों लोगों को दवा के रूप में हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दी गई है। दो साल पहले बना डॉ. सेहित इल्हान वारांक अस्पताल कोविड के ख़िलाफ़ लड़ाई का केंद्र बना हुआ है।

यहां की चीफ़ डॉक्टर नुरेत्तिन यीयीत कहते हैं कि शुरू में ही हाड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन इस्तेमाल करना अहम है। डॉ यीयीत के बनाए चित्र इस नए चमकदार अस्पताल की दीवारों पर लगे हैं।

वो कहती हैं, ''दूसरे देशों ने इस दवा का इस्तेमाल देरी से शुरू किया है, ख़ासकर अमरीका ने, हम इसका इस्तेमाल सिर्फ़ शुरुआती दिनों में करते हैं, हमें इस दवा को लेकर कोई झिझक नहीं है। हमें लगता है कि ये प्रभावशाली है क्योंकि हमें नतीजे मिल रहे हैं।''

अस्पताल का दौरा कराते हुए डॉ, यीयीत कहते हैं कि तुर्की ने वायरस से आगे रहने की कोशिश की है। हमने शुरू में ही इलाज किया है और आक्रामक रवैया अपनाया है।

यहां डॉक्टर हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन के अलावा दूसरी दवाओं, प्लाज़्मा और बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं।

डॉ. यीयीत को गर्व है कि उनके अस्पताल में कोविड से मरने वालों की दर एक प्रतिशत से भी कम रही है। यहां कि इंटेसिव केयर यूनिट यानी आईसीयू में बिस्तर खाली हैं। वो मरीज़ों को यहां से बाहर और वेंटिलेटर के बिना ही रखने की कोशिश करते हैं।

हम चालीस साल के हाकिम सुकूक से मिले जो इलाज कराने के बाद अब अपने घर लौट रहे हैं। वो डॉक्टरों के शुक्रगुज़ार हैं।

वो कहते हैं, ''सभी ने मेरा बहुत ध्यान रखा है। ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपनी मां की गोद में हूं।''

तुर्की मेडिकल एसोसिएशन ने अभी महामारी पर सरकार के रेस्पांस को क्लीन चिट नहीं दी है। एसोसिएशन कहती है कि सरकार ने जिस तरह से महामारी को लेकर क़दम उठाए उनमें कई कमियां थीं।

इनमें सीमाओं को खुला छोड़ देना भी शामिल है।

हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन तुर्की को कुछ श्रेय दे रहा है। डॉ शेख कहते हैं, ''ये महामारी अपने शुरुआती दिनों में है। हमें लगता है कि और भी बहुत से लोग गंभीर रूप से बीमार होंगे। कुछ तो है जो ठीक हो रहा है।''

कोरोना महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में तुर्की के पक्ष में भी कई चीज़ें हैं।  जैसे, युवा आबादी और आईसीयू के बिस्तरों की अधिक संख्या। लेकिन अभी भी रोज़ाना लगभग एक हज़ार नए मामले सामने आ ही रहे हैं।

तुर्की को कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में कामयाबी की कहानी के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन अभी भी सावधानी बरतने की ज़रूरत है क्योंकि अभी ये कहानी ख़त्म नहीं हुई है।

पुलिस चीफ़ की ट्रंप को नसीहत 'आप कोई ढंग की बात नहीं कर सकते तो मुँह बंद रखिए'

अमेरिका में एक काले व्यक्ति की पुलिस हिरासत में मौत से तमाम अमरीकी ग़ुस्से में हैं। अमेरिका में व्यापक पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं।

कई जगहों पर इन प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया है और प्रशासन को राजधानी वॉशिंगटन समेत कई बड़े शहरों में रात्रि कर्फ्यू तक लगाना पड़ा है।

दरअसल, पिछले हफ़्ते अमरीका में एक गोरे पुलिस अधिकारी के हाथों हुई काले व्यक्ति जॉर्ज फ़्लायड की मौत को लेकर हिंसक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

विरोध प्रदर्शनों के कारण कम से कम 40 शहरों में कर्फ्यू लगाया गया है, लेकिन इसके बाद भी लोग सड़कों पर उतर रहे हैं।

ज़ाहिर है इन प्रदर्शनों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चिंता भी बढ़ा दी है।

इसी साल के आख़िर में राष्ट्रपति चुनाव भी होने हैं। एक तरफ़ ट्रंप कोरोना महामारी के संकट से जूझ रहे हैं, वहीं अब इस हिंसा ने उनके लिए नई सियासी मुश्किल पैदा कर दी है।

ट्रंप ने बढ़ती हिंसा पर चेतावनी देते हुए कहा कि अगर राज्यों के गवर्नर हालात पर क़ाबू पाने में विफल रहे तो शांति स्थापित करने का काम सेना को सौंपा जाएगा।

यही नहीं उन्होंने आरोप लगाया कि अमरीकी नागरिक जॉर्ज फ़्लायड की मौत को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों की आड़ में एंटीफ़ा ने दंगे भड़काए हैं। उन्होंने ये भी कहा कि फ़ासीवाद विरोधी समूह एंटीफ़ा को आतंकवादी संगठन घोषित किया जाएगा।

इस बीच, अमरीका के एक प्रमुख शहर ह्यूस्टन के पुलिस प्रमुख आर्ट अक्वेडो का एक बयान भी सुर्खियों में आ गया है। एक न्यूज़ चैनल से बात करते हुए उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को चुप रहने की नसीहत दे डाली।

अक्वेडो का कहना था, ''मैं इस देश के पुलिस प्रमुखों की तरफ़ से अमरीकी राष्ट्रपति से कहना चाहता हूँ कि अगर आप कोई ढंग की बात नहीं कर सकते तो अपना मुंह बंद रखिए।''

अक्वेडो ने कहा, "आप साल 2020 में लोगों को ख़तरे में डाल रहे हैं। यह समय लोगों के दिल जीतने का है ना कि उन्हें धमकाने का। पूरे देश में पुलिस अधिकारी घायल हुए हैं, लोग घायल हुए हैं। ऐसे में हमें नेतृत्व की ज़रूरत है, लेकिन नेतृत्व हमें दुखी कर रहा है। आप एक राष्ट्रपति हैं और उसके लिहाज़ से फ़ैसले लीजिए। यह हॉलीवुड नहीं है। यह असली जीवन है और यह ख़तरे में है।''

यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और लोग पुलिस प्रमुख अक्वेडो की तारीफ़ कर रहे हैं और ट्रंप की आलोचना।

वाल डेमिंग्स ने ट्वीट किया, ''जब हमने ट्रंप पर महाभियोग चलाया था, तो हमने चेतावनी दी थी कि वो तानाशाही की तरफ़ बढ़ रहे हैं। मैंने तब जो आशंका जताई थी, उस पर अब यक़ीन हो गया है। यह राष्ट्रपति लोकतंत्र, हमारे परिवार और हमारे लिए ख़तरा है।''

गवर्नर क्रिस्टीन टॉड विटमैन ने ट्वीट किया, ''कृपया आप इस संकट से दूर ही रहें। गवर्नर्स को ना बताएं कि उन्हें क्या करना है। लोगों से शांत और एकजुट रहने की अपील करने के बजाय आप व्हाइट हाउस के बेसमेंट में हैं और चुप हैं। जबकि गवर्नर और मेयर सक्रिय हैं।''

हालाँकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पुलिस की भूमिका से संतुष्ट नहीं हैं और उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे लेकर सवाल भी उठाए हैं।

एच रोजर्स ने लिखा है, ''मैं अमरीका के पुलिस प्रमुखों से कहना चाहूँगा कि अगर आप अपना काम नहीं कर सकते, लोगों का जीवन और उनकी संपत्ति नहीं बचा सकते तो किनारे हो जाइए और किसी और को ये काम करने दीजिए।''

अमरीका में पिछले एक हफ्ते में ज़ोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं। लोगों की नाराज़गी एक वीडियो क्लिप के वायरल होने के बाद सामने आई है जिसमें एक गोरा पुलिस अधिकारी जॉर्ज फ़्लॉयड नाम के एक निहत्थे काले व्यक्ति की गर्दन पर घुटना टेककर उसे दबाता दिखता है।

इसके कुछ ही मिनटों बाद 46 साल के जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत हो गई।

वीडियो में देखा जा सकता है कि जॉर्ज और उनके आसपास खड़े लोग पुलिस अधिकारी से उन्हें छोड़ने की मिन्नतें कर रहे हैं।

पुलिस अधिकारी के घुटने के नीचे दबे जॉर्ज बार-बार कह रहे हैं कि ''प्लीज़, आई कान्ट ब्रीद (मैं सांस नहीं ले पा रहा)''। यही उनके आख़िरी शब्द बन गए। अमरीका के कई शहरों में प्रदर्शनकारी 'आई कॉन्ट ब्रीद' का बैनर लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विनः फ़्रांस ने रोक लगाई, लेकिन कई देशों में इस्तेमाल जारी

हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन नाम की मलेरिया की दवा से कोरोना वायरस के संक्रमण का इलाज होने के दावों को एक बड़ा आघात लगा है जब फ़्रांस में कोविड रोगियों के इलाज के लिए इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई।

फ़्रांस सरकार ने कहा है कि दो सलाहकार संस्थाओं ने ये पाया कि इस दवा के सेहत से जुड़े गंभीर प्रभाव हो सकते है जिसके बाद वहाँ डॉक्टरों के इस दवा को लेने पर रोक लगा दी गई है जो एहतियात के तौर पर इसका सेवन कर रहे थे।

पर कई देशों में इसका इस्तेमाल हो रहा है और कई देशों में इस पर रिसर्च किया जा रहा है।

अमरीका में सरकार ने अस्पतालों में रोगियों को आपातकाल परिस्थितियों में इस दवा के इस्तेमाल की मंज़ूरी दे दी है। लेकिन उसने चेतावनी दी है कि अस्पतालों के बाहर या शोध से अलग इस दवा का प्रयोग नहीं किया जाए क्योंकि इससे दिल को ख़तरा हो सकता है। हालाँकि अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप खुलकर इस दवा को समर्थन देते रहे हैं और उन्होंने कहा कि वे ख़ुद एहतियात के तौर पर इस दवा का सेवन करते रहे हैं।

ब्राज़ील में भी इस दवा पर लगी पाबंदियों में ढील दी गई है और साधारण मामलों से लेकर अस्पतालों में गंभीर रूप से बीमार रोगियों को ये दवा देने की छूट दे दी गई है। ब्राज़ील के राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो इस दवा के इस्तेमाल के पक्षधर रहे हैं।

भारत सरकार ने इसके इस्तेमाल के दायरे को और बढ़ाकर अब इसे एहतियाती दवा के तौर पर स्वास्थ्यकर्मियों को देना तय किया है।

मगर अब किसी भी रिसर्च में ये नहीं कहा गया है कि ये दवा कोरोना संक्रमण का इलाज है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस सप्ताह सुरक्षा कारणों से इस दवा के परीक्षण पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी।

लेकिन और कुछ जगह अध्ययन हो रहे हैं, जैसे स्विस दवा कंपनी नोवार्टिस अमरीका में परीक्षण कर रही है। ऐसे ही ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के समर्थन से थाईलैंड में महिडोल ऑक्सफ़ोर्ड ट्रॉपिकल मेडिसीन रिसर्च यूनिट में भी एक शोध हो रहा है।

अफ़्रीकी देश नाइजीरिया ने कहा है कि वो इस दवा से जुड़ी एक और दवा क्लोरोक्वीन के क्लीनिकल ट्रायल के लिए दबाव डालेगा।

क़तर में मास्क नहीं पहनने पर तीन साल की जेल या 40 लाख रुपए का जुर्माना

क़तर में मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया गया है और नियम तोड़ने पर तीन साल तक की जेल या 55,000 डॉलर यानी लगभग 42 लाख रुपए का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

प्रति व्यक्ति संक्रमण के हिसाब से क़तर की स्थिति दुनिया के सबसे गंभीर देशों में होती है।

30 लाख की आबादी वाले क़तर में 30,000 लोग संक्रमित पाए गए हैं।

क़तर मध्य पूर्व का एक छोटा, पर अमीर देश है जिसकी गिनती दुनिया में सबसे ज़्यादा प्रति व्यक्ति आय वाले देशों में होती है।

वहाँ मस्जिद, स्कूल, कॉलेज, मॉल आदि बंद हैं मगर भवन निर्माण पर पाबंदी नहीं लगाई गई है क्योंकि क़तर को 2022 में फ़ुटबॉल विश्व कप का आयोजन करना है।