अमरीका में कोरोना संक्रमण के मामलों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। इसको देखते हुए अमरीका के शीर्ष महामारी रोग विशेषज्ञ डॉ. एंथनी फ़ाउची ने कहा कि स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। अमरीका में कोरोना संक्रमण को लेकर ताजा अपडेट इस तरह से है -
अमरीका के कई राज्यों ने लॉकडाउन खोलने के विचार को आगे के लिए बढ़ा दिया है। इस सूची में ताज़ा नाम फ़्लोरिडा के ग्रेटर मियामी इलाक़े का जुड़ गया है। सोमवार को यहां के रेस्टोरेंट में इंडोर डाइनिंग बंद किया गया, साथ में जिम बंद करने का फ़ैसला लिया गया।
कैलिफ़ोर्निया, टैक्सास और फ़्लोरिडा अमरीका के उन दो दर्जन प्रांतों में शामिल हैं जहां पिछले कुछ दिनों में संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े हैं। कैलिफ़ोर्निया के अस्पतालों में बीते दो सप्ताह के दौरान कोरोना संक्रमितों की संख्या में 50 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी देखने को मिली है।
बाक़ी के राज्यों में भी इसी तरह संक्रमण बढ़ रहा है, अधिकारियों के मुताबिक कई इलाक़ों में अस्पतालों के बेड पूरी तरह भर चुके हैं।
अमरीका के शीर्ष महामारी रोग विशेषज्ञ डॉ. एंथनी फ़ाउची ने कहा कि देश भर में गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है और इस पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत है।
अमरीका की यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों ने कैंपस खोलने की योजना को भी टाल दिया है।
हार्वर्ड यूनिविर्सिटी ने कहा कि आगामी सेमेस्टर की क्लासेज ऑनलाइन होंगी और दूसरे संस्थान भी इसको फॉलो करने वाले हैं।
अमरीका में कोरोना संक्रमितों की संख्या 29 लाख से ज़्यादा हो चुकी है, जबकि एक लाख 30 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, देश में कोविड-19 संक्रमण के कुल 6,97,213 मामले हो गए हैं। इनमें से 2,53,287 मामले सक्रिय हैं। संक्रमण की वजह से अब तक कुल 19,693 लोगों की मौत हुई है।
जॉन्स हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी के अनुसार, दुनिया भर में कोरोना वायरस संक्रमण की वजह से मरने वालों का आंकड़ा 5 लाख 35 हज़ार से भी ज़्यादा हो गया है। वहीं, दुनिया में संक्रमण के कुल 11,51,6,782 मामले हैं।
जॉन्स हॉप्किन्स यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के अनुसार, भारत संक्रमण मामलों की कुल संख्या में रूस को पीछे छोड़ते हुए तीसरे नंबर पर पहुंच गया है।
दुनिया के 240 वैज्ञानिकों का दावा है कि कोरोना वायरस संक्रमण हवा के ज़रिए भी फैल सकता है। वैज्ञानिकों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन से इसे गंभीरता से लेने को कहा है।
संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण से जुड़ी एक संस्था का कहना है कि अगर इंसानों ने जानवरों को मारना बंद नहीं किया तो उसे कोरोना संक्रमण जैसी और भयानक बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है।
कोरोना महामारी को देखते हुए भारत सरकार ने फ़िल्म शूटिंग की मानक संचालन प्रक्रिया जल्द शुरू करने वाली है जिससे फ़िल्म निर्माण को तेज़ी के साथ फिर से शुरू किया जा सके।
भारत में केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है, ''महामारी को देखते हुए भारत सरकार फ़िल्म शूटिंग की मानक संचालन प्रक्रिया जल्द जारी करने वाली है जिससे फ़िल्म निर्माण को तेज़ी के साथ फिर से शुरू किया जा सके जो कोविड की वजह से ठहर गया है। सरकार टीवी सीरियल, फ़िल्म मेकिंग, को-प्रोडक्शन, एनिमेशन, गेमिंग समेत सभी प्रोडक्शन के कामों के लिए इंसेंटिव भी ला रही है। इनकी जल्द घोषणा की जाएगी।''
ओडिशा में कोरोना संक्रमण के कुल मामले दस हज़ार से अधिक हो गये हैं। ओडिशा में अब तक 42 लोगों की कोविड-19 से मौत हुई है।
सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स (सीएपीएफ़) ने कहा है कि अब तक उनके पाँच हज़ार से ज़्यादा जवान कोरोना संक्रमित हो चुके हैं और कुल 27 सीएपीएफ़ जवानों की कोविड-19 से मौत हुई है।
कर्नाटक सरकार ने कहा है कि अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है जिसके आधार पर कहा जा सके कि प्रदेश में कम्युनिटी ट्रांसमिशन शुरू हो चुका है।
महाराष्ट्र के सतारा ज़िले की पुलिस ने एक सीसीटीवी फ़ुटेज जारी किया है जिसमें कुछ चोर पीपीई किट पहनकर चोरी करते हुए दिखाई दे रहे हैं। पुलिस के अनुसार, ''चोरों ने सुनार की दुकान का ताला तोड़ा और क़रीब 780 ग्राम सोना लेकर फरार हो गए।''
मेघालय सरकार के अधिकारियों ने बताया है कि इलाज के लिए क़रीब 400 किलोमीटर की यात्रा करके अरुणाचल प्रदेश से मेघालय लाए गए 8 महीने के बच्चे की मौत हो गई है। कोविड टेस्ट पॉज़िटिव पाये जाने के कुछ ही घंटों बाद ही बच्चे की मौत हो गई।
भारत और चीन के बीच गलवानी घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों तरफ से शांति बहाल करने की कोशिशों के बीच भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच रविवार को टेलिफ़ोन पर बातचीत हुई।
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई बातचीत का ब्यौरा भारत स्थित चीनी दूतावास ने बयान जारी दिया है।
भारत में चीनी राजदूत सुन वायडोंग ने अपने बयान में दोनों विशेष प्रतिनिधियों के आपस में बातचीत का ब्यौरा दिया है। उन्होंने कहा है कि चीनी विदेश मंत्री ने अजीत डोभाल को बताया कि भारत और चीन के आपसी रिश्ते 70 साल पुराने हैं।
चीनी विदेश मंत्री के मुताबिक़ भारत और चीन के बीच वेस्टर्न सेक्टर सीमा के गलवान घाटी में जो कुछ हुआ है, उसमें सही क्या है और ग़लत क्या हुआ है - ये स्पष्ट है।
चीनी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि चीन अपनी संप्रभुता की रक्षा करने के साथ-साथ इलाके में शांति भी बहाल करना चाहता है।
वांग यी ने अपनी बातचीत में इस बात पर भी ज़ोर दिया कि चीन और भारत दोनों की शीर्ष प्राथमिकता विकास है, ऐसे में दोनों देशों को तनाव कम करने पर ध्यान देना चाहिए।
चीनी राजदूत के मुताबिक़ दोनों प्रतिनिधियों के बीच विस्तार से बातचीत हुई। इस बातचीत में मोटे तौर पर चार बातों पर सहमति बनी है -
- दोनों देश के शीर्ष नेताओं के बीच बनी सहमति को लागू किया जाएगा। दोनों नेताओं के बीच सीमावर्ती इलाकों में शांति के साथ विकास के लिए लंबे समय तक साथ काम करने की सहमति है।
- दोनों देश आपसी समझौते के मुताबिक सीमा पर तनातनी को कम करने के लिए संयुक्त रूप से कोशिश करेंगे।
- विशेष प्रतिनिधियों के बीच होने वाली बातचीत के ज़रिए दोनों पक्ष आपसी संवाद को बेहतर बनाएंगे। भारत चीन के बीच सीमा मामलों में सलाह और संयोजन के लिए वर्किंग मैकेनिज्म की व्यवस्था को नियमित करके उसे बेहतर बनाया जाएगा। इससे दोनों पक्षों के बीच भरोसा मज़बूत होगा।
दोनों पक्ष ने हाल में हुई कमांडर स्तर की बैठक में जिन बातों पर सहमति जताई गई है, उसका स्वागत किया है। पहली जुलाई को कमांडर स्तर की बैठक में दोनों पक्षों ने सीमा पर तनातनी को कम करने पर सहमति जताई थी।
इससे पहले भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से बयान जारी कर कहा गया था कि भारत और चीन के बीच वेस्टर्न सेक्टर की सीमा पर हाल की गतिविधियों को लेकर डोभाल और वांग यी के बीच स्पष्ट और विस्तार से बात हुई है।
दोनों पक्षों में इस बात पर सहमति जताई गई है कि द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए दोनों देशों को सीमा पर शांति बहाल करनी होगी और मतभेदों को विवाद का रूप लेने से रोकना होगा।
इस दिशा में दोनों पक्ष सीमा पर तनातनी कम करने की प्रक्रिया पर काम कर चुके हैं, यानी अब वैसी स्थिति नहीं है जैसी कि दोनों पक्षों के सैनिकों के आमने सामने आ जाने से उत्पन्न हो गई थी। दोनों पक्षों ने इसे चरणबद्ध तरीके से कदम दर कदम करने पर सहमति जताई है।
बयान में ये भी कहा गया है कि दोनों विशेष प्रतिनिधियों की इस बातचीत में दोनों देशों के सैन्य और राजनयिक अधिकारियों के बीच भी बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई गई है।
इसके अलावा डोभाल और वांग यी के बीच आपसी बातचीत को नियमित रखने पर भी सहमति बनी है।
वहीं समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने सोमवार को बीजिंग में पत्रकारों से कहा, ''दोनों पक्षों में सीमा पर तनातनी कम करने को लेकर साकारात्मक प्रगति हुई है।''
लिजियान ने उम्मीद जताई है कि भारतीय पक्ष चीन के साथ मिलकर उन बातों को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाएगा जिन बातों को लेकर आपसी सहमति बन गई है।
भारत-चीन सीमा विवाद पर नज़र रख रहे अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि सीमा पर तनातनी को कम करने की प्रक्रिया सोमवार सुबह से शुरू हो गई है।
अधिकारियों ने बताया कि यह काम तीन जगहों पर चल रहा है, ये जगहें हैं - गलवान, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स। बीबीसी को जानकारी देने वाले अधिकारी ने स्पष्ट किया कि वे देपसांग या पैंगोंग त्सो झील की बात नहीं कर रहे हैं।
एक अन्य अधिकारी ने बताया, "तंबू और अस्थायी ढांचे दोनों तरफ़ से हटाए जा रहे हैं और सैनिक पीछे हट रहे हैं। लेकिन इसका मतलब वापसी या प्रकरण का अंत नहीं है।''
भारतीय अधिकारियों ने बताया कि इन गतिविधियों की लगातार निगरानी की जा रही है जिसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों और ऊँचे प्लेटफॉर्म्स की मदद ली जा रही है।
कई मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि चीनी सैनिक कितने पीछे हटे हैं, इस सवाल के जवाब में अधिकारी ने कोई दूरी बताने से इनकार किया।
उन्होंने इतना ही कहा, ''यह उस प्रक्रिया की शुरूआत है जो 30 जून को चुसुल में हुई दोनों पक्षों के कमांडरों की बैठक के बाद तय की गई थी।''
हालांकि मीडिया में आ रही रिपोर्ट्स के अनुसार गलवान में जहां पर हिंसा हुई थी चीनी सैनिक वहां से दो किलोमीटर पीछे की ओर जा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि बीते 15 जून को गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी।
इसके बाद बीते एक जुलाई को दोनों देशों की सेनाओं के बीच कमांडर स्तर की बातचीत हुई और उस बातचीत में भी भारत-चीन एलएसी पर तनातनी को कम करने पर सहमति जताई गई थी।
इसके बाद सप्ताह भर पहले भारत सरकार ने 59 ऐसे मोबाइल ऐप्स बंद करने की घोषणा की जिनमें जाने माने सोशल प्लेटफ़ॉर्म टिकटॉक, वीचैट अली बाबा ग्रुप का यूसी ब्राउज़र भी शामिल थे।
हालांकि भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन स्पष्ट कहा कि शिकायत मिली थी कि एंड्रॉयड और आईओएस पर ये ऐप्स लोगों के निजी डेटा में भी सेंध लगा रहे थे। इन ऐप्स पर पाबंदी से भारत के मोबाइल और इंटरनेट उपभोक्ता सुरक्षित होंगे। यह भारत की सुरक्षा, अखंडता और संप्रभुता के लिए ज़रूरी है।
प्रवासियों को लेकर कुवैत में तैयार हो रहे क़ानून ने खाड़ी देश में रह रहे भारतीयों के मन में उन चिंताओं को फिर से जगा दिया है जब दो साल पहले नियमों में बदलाव के चलते सैकड़ों भारतीय इंजीनियरों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा था।
अंग्रेज़ी अख़बार 'अरब न्यूज़' के मुताबिक़ कुवैत की नेशनल एसेंबली की क़ानूनी समिति ने प्रवासियों पर तैयार हो रहे एक बिल के प्रावधान को विधि सम्मत माना है।
ख़बरों के मुताबिक़ मंज़ूरी के लिए इस प्रस्ताव को दूसरी समितियों के पास भेजा जाने वाला है। इस क़ानून के मसौदे में कहा गया है कि कुवैत में रहने वाले भारतीयों की तादाद को देश की कुल आबादी के 15 फ़ीसद तक सीमित किया जाना चाहिए।
समझा जाता है कि वहां रहने वाले तक़रीबन 10 लाख प्रवासी भारतीयों में से सात लाख लोगों को बिल के पास होने की सूरत में वापस लौटना पड़ सकता है।
सऊदी अरब के उत्तर और इराक़ के दक्षिण में बसे इस छोटे से मुल्क की तक़रीबन पैंतालीस लाख की कुल आबादी में मूल कुवैतियों की जनसंख्या महज़ तेरह-साढ़े तेरह लाख ही है।
यहां मौजूद मिस्र, फिलिपीन्स, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और दूसरे मुल्कों के प्रवासियों में सबसे अधिक भारतीय हैं।
ख़बरों के मुताबिक़, प्रस्तावित क़ानून में दूसरे मुल्कों से आकर कुवैत में रहने वाले लोगों की तादाद को भी कम करने की बात कही गई है। कहा गया है कि प्रवासियों की तादाद को वर्तमान स्तर से कम करके कुल आबादी के 30 फ़ीसद तक ले जाया जाएगा।
कुवैत की एक मंटीनेशनल कंपनी में काम करने वाले नासिर मोहम्मद (बदला हुआ नाम) को इंजीनयरिंग की डिग्री होते हुए भी मजबूरी में सुपरवाइज़र के तौर पर काम करना पड़ रहा है।
वो कहते हैं, ''यहां रहने वाले हिंदुस्तानी सोच रहे हैं कि अगर बिल क़ानून बन गया तो क्या होगा?''
नासिर मोहम्मद फिर भी ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत मानते हैं कि उन्हें पुरानी कंपनी की जगह नई कंपनी में काम मिल गया वर्ना 2018 में आए नए कुवैती नियमों के दायरे से बाहर हो जाने की वजह से आईआईटी और बिट्स पिलानी से पास हुए इंजीनियरों तक की नौकरी बस देखते-देखते चली गई थी।
भारत की पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इंजीनियरों के मामले को कैवत की सरकार के साथ उठाया भी था लेकिन उसका कोई हल नहीं निकल सका।
नासिर मोहम्मद कहते हैं, "हालात ये हैं कि इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर चुके बहुत सारे भारतीय कुवैत में सुपरवाइज़र, फ़ोरमैन वग़ैरह की तनख्वाह और ओहदों पर काम कर रहे हैं जबकि ड्यूटी उन्हें एक इंजीनियर की निभानी पड़ती है।''
कुवैत में रह रहे हैदराबाद निवासी मोहम्मद इलियास कहते हैं कि नए प्रवासी क़ानून जैसे नियम की सुगबुगाहट 2008 की आर्थिक मंदी के बाद से बार-बार होती रही है और ये 2016 में तब और तेज़ हुई थी जब सऊदी अरब ने निताक़त क़ानून को लागू किया था।
निताक़त क़ानून के मुताबिक़ सऊदी अरब के सरकारी विभागों और कंपनियों में स्थानीय लोगों की नौकरी दर को ऊपर ले जाना है।
पिछले साल एक कुवैती सांसद ख़ालिद अल-सालेह ने एक बयान जारी कर सरकार से मांग की थी कि "प्रवासियों के तूफ़ान को रोका जाना चाहिए जिन्होंने नौकरियों और हुकूमत के ज़रिये मिलने वाली सेवाओं पर क़ब्ज़ा जमा लिया है।''
सफ़ा अल-हाशेम नाम की एक दूसरी सांसद ने चंद साल पहले कहा था कि "प्रवासियों को साल भर तक ड्राइविंग लाइसेंस न देने और एक कार ही रखने की इजाज़त दिए जाने के लिए क़ानून लाया जाना चाहिए।''
सफ़ा अल-हाशेम के इस बयान की कुछ हलकों में निंदा भी हुई थी।
कुवैत की नेशनल एसेंबली में 50 सांसद चुनकर आते हैं हालांकि माना जाता है कि वहां अमीर ही फ़ैसला लेने वाली भूमिका में हैं।
हाल में भी जब नए क़ानून की बात चली है तो कुछ स्थानीय लोग इसके ख़िलाफ़ भी बयान देते दिखाई दिए हैं।
19वीं सदी के अंत से 1961 तक ब्रिटेन के 'संरक्षण' में रहे कुवैत में भारतीयों का जाना लंबे समय से शुरु हो गया था। इस समय व्यापार से लेकर तक़रीबन सारे क्षेत्रों में वहां भारतीय मौजूद हैं, कुवैती घरों में ड्राइवर, बावर्ची से लेकर आया (महिला नौकरानी) तक का काम करने वालों की संख्या साढ़े तीन लाख तक बताई जाती है। लोगों का मानना है कि जल्दी-जल्दी में दूसरे लोगों से उनकी जगह भर पाना इतना आसान न होगा।
रीवन डिसूज़ा का परिवार 1950 के दशक में ही भारत से कुवैत चला गया था और उनकी पैदाईश भी वहीं की है।
रीवन डिसूज़ा स्थानीय अंग्रेज़ी अख़बार टाईम्स कुवैत के संपादक हैं।
बीबीसी से बातचीत के दौरान वो कहते हैं, "प्रवासियों पर बिल को अभी महज़ क़ानूनी समिति द्वारा संविधान के अनुकूल माना गया है, अभी इसे कई और कमिटियों जैसे मानव संसाधन समिति और दूसरे चरणों से गुज़रना है। इसके बाद ही ये बिल के तौर पर पेश हो सकेगा। इसके क़ानून बनने की बात उसके बाद ही मुमकिन है।''
रीवन डिसूज़ा इसे एक दूसरे नज़रिए से भी देखते हैं।
वो कहते हैं कि कोविड-19 से उपजे संकट और उसके बीच भारत सरकार के ज़रिये वहां रह रहे ग़ैर-क़ानूनी लोगों को वापस ले जाने की स्थानीय सरकार की मांग की अनदेखी करने को लेकर कुवैती हुकूमत के कुछ हलक़ों में नाराज़गी है और वो अब किसी एक देश के काम करने वालों पर आश्रित नहीं रहना चाहते हैं।
भूटान के सकतेंग वन्यजीव अभयारण्य पर चीन के दावों का भूटान के द्वारा विरोध करने के कुछ दिन बाद ही चीन ने भूटान के पूर्वी सेक्टर को सीमा विवाद से जोड़ दिया है।
भूटान और चीन के बीच अब तक सीमा निर्धारित नहीं है और सीमा विवाद सुलझाने के लिए अब तक दोनों देशों के बीच 24 बार वार्ता हो चुकी है। इनमें कभी भी पूर्वी सेक्टर के मुद्दे को चीन ने नहीं उठाया था।
भूटान के साथ सीमा विवाद में चीन की ओर से नए इलाक़ों पर दावा करने को विश्लेषक भारत को निशाना बनाकर उठाए गए क़दम के तौर पर देखते हैं।
इस समय मुख्यतः दो देश हैं, एक भारत और दूसरा भूटान जिनके साथ चीन की सीमा निर्धारित नहीं हुई है और कई सालों से इसे लेकर विवाद है। भारत के साथ नियंत्रण रेखा पर चीन का तनाव जारी है जिसमें लद्दाख में हुए हिंसक संघर्ष में बीस भारतीय सैनिकों की मौत हाल ही में हुई है।
चीन का भूटान के साथ पश्चिमी सेक्टर और पूर्वी सेक्टर पर सीमा विवाद है। इस विवाद के समाधान के लिए भूटान और चीन के बीच में सुनियोजित ढंग से बातचीत चल रही है।
भूटान में भारत के पूर्व राजदूत पवन वर्मा ने कहा कि भूटान के साथ चीन का ताज़ा सीमा विवाद भारत के रणनीतिक हितों को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है।
पवन वर्मा ने कहा, ''मुझे लगता है कि ये भूटान पर दबाव बनाने का चीन का तरीक़ा है। चीन जानता हैं कि भूटान के साथ जहां उसकी सीमारेखा तय होगी, ख़ासतौर पर भूटान के पश्चिम की तरफ़, जहां चीन-भूटान और भारत के बीच में एक ट्राइ-जंक्शन (चिकेन नेक) बनता है, वहां किस जगह सीमा निर्धारित हो, उससे भारत के रणनीतिक हितों पर असर होगा।''
साल 2017 में भूटान के डोकलाम को लेकर चीन और भारत आमने सामने आए थे और दोनों देशों के बीच 75 दिनों तक सैन्य गतिरोध बना रहा था। तब भी चीन ने भूटान के डोकलाम को नियंत्रण में लेने की कोशिश की थी।
भूटान में भारत के पूर्व राजदूत इंद्र पाल खोसला ने कहा कि चीन इस समय विस्तारवादी मोड में है और हर ओर दावे कर रहा है।
बीबीसी बांग्ला सेवा से बात करते हुए इंद्र पाल खोसला ने कहा, ''मेरे नज़रिए में चीन विस्तारवादी मोड में है, चीन ने भूटान के ऐसे हिस्से पर दावा ठोका है जो अब तक दोनों देशों के बीच हुई वार्ता में नहीं उठाया गया था। सीमा विवाद को लेकर भूटान और चीन के बीच 24 बार बातचीत हुई है और इस इलाक़े पर कभी चर्चा नहीं हुई है। इन सालों के दौरान चीन ने कभी भी इस इलाक़े का मुद्दा नहीं उठाया।''
उन्होंने कहा, हाल ही में चीन ने रूस के व्लादिवोस्तोक पर दावा किया गया है, ऐसा लगता है कि चीन अब ऐसी दशा में है जब वो किसी समझौते या आपसी समझ या इतिहास में हुए समझौतों पर ध्यान नहीं दे रहा है। वो अब विस्तारवादी मोड में है।''
भूटान ने सकतेंग अभ्यारण्य पर चीन के दावे का विरोध करते हुए चीन को डीमार्श जारी किया है, आमतौर पर भूटान अपने सीमा विवादों को लेकर मुखर नहीं है और कम ही टिप्पणी करता है। ऐसे में भूटान के इस राजनीतिक क़दम की वजह क्या है?
ऑब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन यानी ओआरएफ़ से जुड़े विश्लेषक मिहिर भोंसले कहते हैं कि भूटान डर महसूस कर रहा है।
भोंसले ने कहा, ''जिस इलाक़े में भूटान समझता है कि वो सीमा विवाद चीन के साथ ख़त्म कर पाया है उसमें चीन ने विवाद खड़ा किया है। भूटान आमतौर पर सीमा विवादों पर बहुत बोलता नहीं हैं। भूटान के एक ओर चीन है और दूसरी ओर भारत है।''
''आमतौर पर भूटान शांत रहता है लेकिन चीन ने भूटान के अभ्यारण्य पर सवाल उठाया तो भूटान ने चीन को डीमार्श जारी किया है, जो एक नई बात है। आमतौर पर भूटान सीमा विवादों पर टिप्पणी नहीं करता है। भूटान ने डीमार्श जारी किया है जिसका सीधा मतलब है कि भूटान ख़तरा महसूस कर रहा है।''
मिहिर भोंसले का मानना है कि भूटान के साथ सीमा विवाद को हवा देने का मक़सद भारत को परेशान करना भी हो सकता है।
उन्होंने कहा, ''भारत के पड़ोस में भूटान एकमात्र ऐसा देश है जो हमेशा भारत के साथ रहा है, जबकि चीन के साथ भूटान के राजनयिक रिश्ते भी नहीं है। चीन को लगता है कि भूटान को परेशान करके वह भारत को तनाव दे सकता है।''
''डोकलाम में भी हमने देखा कि भूटान की ज़मीन पर चीन ने दावा किया था जिसके बाद भारत के साथ तनाव बढ़ गया था। ऐसा लगता है कि चीन भूटान का हाथ मरोड़कर भारत को दर्द देना चाहता है।''
2017 में जब चीन ने भूटान की ओर क़दम बढ़ाया था तो भारतीय सेना बीच में आ गई थी। भारत और चीन के बीच डोकलाम में 75 दिनों तक सैन्य तनाव रहा था। क्या ताज़ा विवाद उस स्थिति तक पहुंच सकता है?
पवन वर्मा ने कहा, ''ये संभव है कि ये विवाद डोकलाम जैसी स्थिति तक पहुंच जाए, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ऐसा हो ही। भारत और भूटान के बीच बेहद क़रीबी रिश्ते हैं। चीन के साथ भूटान के राजनयिक रिश्ते भी नहीं है।''
''चीन की ये कोशिश होगी कि भूटान पर दबाव डालकर अपने नक़्शे क़दम पर चलाए और भारत पर दबाव बनाए। लेकिन मुझे लगता नहीं कि ऐसा होगा। लेकिन अगर भूटान पर और दबाव बढ़ेगा तो भारत को भूटान के साथ खड़ा होना होगा।''
मिहिर भोंसले ने कहा, ''यदि भूटान के साथ चीन का सीमा विवाद और बढ़ा तो एक बार फिर डोकलाम जैसा स्टेंड ऑफ़ हो सकता है। डोकलाम भारत, चीन और भूटान के बीच एक ट्राइ जंक्शन हैं, उसके अलावा सकतेंग अभ्यारण्य अरुणाचल सीमा के बहुत क़रीब है, वहां भी एक ट्राइ जंक्शन एरिया बन सकता है। यहां भविष्य में तनाव और बढ़ सकता है।''
पवन वर्मा का मानना है कि भारत के साथ सीमा विवाद में उलझा चीन भारत के पड़ोसी देशों का इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के लिए कर रहा है। ये चीन की एक जानी मानी रणनीति है।
वहीं मिहिर भोंसले का मानना है कि भूटान पर दबाव बनाना चीन का रणनीतिक फ़ैसला हो सकता है। अभी जो भूटान के साथ विवाद है वो कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। भूटान सकतेंग अभ्यारण्य में ग्लोबल एन्वायरंमेंट फ़ंड का इस्तेमाल करना चाहता था जिसका चीन ने विरोध कर दिया। इससे संकेत मिलता है कि चीन भारत के ख़िलाफ़ हर संभव मोर्चे पर प्रयास कर रहा है।
ईरान में परमाणु ऊर्जा से संबंधित एक प्रमुख संस्था के प्रवक्ता ने कहा है कि गुरुवार को ईरान के एक न्यूक्लियर प्लांट में लगी आग से बहुत ज़्यादा तबाही हुई है।
उन्होंने कहा कि उत्तरी ईरान के नतांज़ शहर के पास स्थित इस प्लांट में आग से काफ़ी नुक़सान हुआ है। हालांकि इससे संबंधित कोई विवरण उन्होंने प्रेस को नहीं दिया।
ईरान की राजधानी तेहरान से क़रीब 250 किलोमीटर दक्षिण में स्थित नतांज़, ईरान का सबसे बड़ा और बढ़िया गुणवत्ता का यूरेनियम निकालने वाला प्लांट है।
उन्होंने कहा कि आग से नष्ट हुई मशीनरी को अब और अधिक उन्नत उपकरणों से बदला जाएगा। ताज़ा सूचना के अनुसार, यह आग प्लांट में अपकेन्द्रण यंत्र तैयार करने वाली एक कार्यशाला में लगी।
ईरान के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे संभावित साइबर-हमले का नतीजा बताया है। हालांकि उन्होंने इस संबंध में कोई सबूत पेश नहीं किया। उत्तम क्वॉलिटी के यूरेनियम का उत्पादन करने के लिए अपकेन्द्रण यंत्रों की ज़रूरत होती है, जिसका उपयोग रिएक्टर ईंधन बनाने के साथ-साथ परमाणु हथियार बनाने के लिए भी किया जा सकता है।
ईरानी परमाणु ऊर्जा संगठन के प्रवक्ता बहरोज़ कमलवंडी ने रविवार को कहा कि सुरक्षा अधिकारी सुरक्षा कारणों से नतांज़ में लगी आग के बारे में खुलकर बात नहीं कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि आग लगने की इस घटना से महत्वपूर्ण क्षति हुई है, लेकिन कोई हताहत नहीं हुआ। ईरान में पिछले सप्ताह में आग लगने और विस्फ़ोट होने के कुछ अन्य मामले भी सामने आए थे।
ईरान सरकार ने पहले सूचना दी थी कि गुरुवार को प्लांट के एक निर्माणाधीन हिस्से में आग लगी जिसे काबू कर लिया गया। लेकिन अमरीकी विश्लेषकों ने बताया कि आग सेंटरीफ़्यूज बनाने वाली वर्कशॉप में लगी और उन्होंने इस आग की कुछ तस्वीरें भी जारी कीं।
नतांज़ में आग की घटना, ईरान के पारचिन मिलिट्री कॉम्लेक्स में हुए धमाके के छह दिन बाद हुई। इस धमाके के बारे में भी ईरान प्रशासन ने कहा था कि गैस लीक होने के कारण ये धमाका हुआ, लेकिन सेटेलाइट तस्वीरों के आधार पर इस धमाके के बारे में विश्लेषकों ने कहा कि धमाका मिसाइल बनाने वाली यूनिट के पास हुआ।
तेहरान से सटा पारचिन कॉम्लेक्स, वही स्थान है जिसके बारे में पश्चिमी देशों को शक़ है कि ईरान ने क़रीब एक दशक पहले इस जगह पर ही न्यूक्लियर हथियार टेस्ट किए थे।
ईरान दावा करता है कि उसका न्यूक्लियर प्रोग्राम एक शांतिपूर्ण मिशन है और न्यूक्लियर हथियार विकसित करने का उनका कोई इरादा नहीं है।
सऊदी अरब में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले बढ़कर दो लाख से ज़्यादा हो गए हैं। पड़ोस के देश संयुक्त अरब अमीरात में संक्रमितों की संख्या बढ़कर 50 हज़ार पार कर गई है।
पिछले महीने ही अरब जगत की इन दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में कर्फ्यू पूरी तरह से हटा लिया गया था। दोनों ही देशों में 15 मार्च के आस-पास लॉकडाउन से जुड़ी पाबंदियां लागू की गई थीं।
यहां धीरे-धीरे पाबंदियां हटाने का फैसला किया गया था और कारोबार और सार्वजनिक जगहों को फिर से खोल दिया गया था। खाड़ी के दूसरे देशों में लॉकडाउन में छूट दी जाने लगी थी।
हालांकि कुवैत में आंशिक कर्फ़्यू जारी रखने का फ़ैसला किया गया है। बहरीन और ओमान में तो ऐसी कोई पाबंदी नहीं लगाई गई थी। खाड़ी के देशों में सऊदी अरब कोरोना संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित है।
शुक्रवार को सऊदी अरब में कोरोना संक्रमण के 4100 मामले दर्ज किए गए थे और शनिवार को कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़कर 205,929 हो गई। सऊदी अरब में कोरोना महामारी के कारण 1858 लोगों की मौत भी हुई है।
15 जून के आस-पास सऊदी अरब में कोरोना संक्रमण के रोज़ दर्ज किए जाने वाले मामले 4000 पार कर गए थे लेकिन बाद में इसमें गिरावट देखी गई थी।
संयुक्त अरब अमीरात में मई के आख़िर में रोज़ाना 900 के आस-पास कोरोना संक्रमण के मामले दर्ज किए जा रहे थे, लेकिन हाल के दिनों में ये आंकड़ें गिरकर 300 से 400 के आस-पास पहुंच गए थे।
पर शुक्रवार को संयुक्त अरब अमीरात में कोरोना संक्रमण के 600 और शनिवार को 700 से ज़्यादा मामले दर्ज किए थे। वहां कोरोना संक्रमितों की कुल संख्या बढ़कर 50,857 हो गई है जबकि कोरोना के कारण 321 लोगों की मौत भी हुई है।
संयुक्त अरब अमीरात के प्रमुख व्यापारिक केंद्र दुबई में सात जुलाई से विदेशी यात्रियों को आने की इजाजत दी जा रही है।
हालांकि पूरे संयुक्त अरब अमीरात में ये छूट नहीं दी गई है। खाड़ी क्षेत्र में कोरोना वायरस से क़तर दूसरा सबसे प्रभावित देश है।
यहां मई के आख़िर में रोज़ाना 2000 के क़रीब मामले रिपोर्ट हो रहे थे लेकिन इस शनिवार को ये आंकड़ा गिरकर 500 के लगभग पहुंच गया है। क़तर में कोरोना संक्रमितों की कुल संख्या एक लाख के पास है।
उधर, ओमान के स्वास्थ्य मंत्री ने गुरुवार को बताया कि पिछले छह हफ़्तों के दौरान देश में कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से बढ़े हैं।
उन्होंने लोगों से स्वास्थ्य संबंधी एहतियात बरतने की अपील भी की है। मध्य पूर्व में ईरान कोरोना महामारी से सबसे ज़्यादा प्रभावित देश है।
वहां कोरोना संक्रमण के मामले 237,878 पर पहुंच गए हैं और 11,408 लोगों की मौत हो चुकी है। ये आंकड़े शनिवार तक के हैं। महामारी को रोकने के लिए ईरान में नई पाबंदियां लगाई गई हैं।
कोरोना महामारी को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण क़तर में फंसे 300 से अधिक भारतीय स्वदेश वापस लौट आए हैं। इन लोगों को लेकर पहला चार्टर्ड विमान शुक्रवार को नागपुर पहुंचा और दूसरा विमान शनिवार को मुंबई में उतरा।
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ ये फ्लाइट्स भारत सरकार के वंदे भारत मिशन का हिस्सा नहीं थे। इनकी व्यवस्था दोहा स्थित भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के प्रतिनिधियों ने किया था।
दोहा स्थित इंडियन कल्चरल सेंटर के उपाध्यक्ष विनोद नायर ने बताया कि नागपुर पहुंचने वाली फ्लाइट में छत्तीसगढ़ के 86, मध्य प्रदेश के 34 और महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के 52 लोग थे। इन्होंने किराये के तौर पर 24 हज़ार रुपये दिए थे। मुंबई पहुंचने वाले लोगों ने किराये के तौर पर 20 हज़ार रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से अदा किए।
विनोद नायर ने बताया कि क़तर में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो घर वापस लौटना चाहते हैं। उन्होंने बताया, ''हमने इंडिगो एयरलाइंस और भारतीय दूतावास से उनकी वापसी के बारे में बात की। क़तर में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के महाराष्ट्र मंडल से जुड़े लोगों ने उनके टिकट के रुपये इकट्ठा किए और यात्रा दस्तावेज़ों का प्रबंध किया।''
उन्होंने बताया कि 169 यात्रियों को लेकर एक और यात्री विमान सोमवार को गोवा पहुंचेगा।
इस चार्टर्ड फ़्लाइट से नागपुर पहुंचने वाले एक यात्री मधुसूदन एकरे ने पीटीआई को बताया कि वे चार मार्च को बिज़नेस वीज़ा पर क़तर पहुंचे थे लेकिन लॉकडाउन के कारण वहीं फंस गए।
उन्हें सोशल मीडिया से भारतीय सांस्कृतिक केंद्र की इस पहल के बारे में जानकारी मिली थी।
कुछ दिनों पहले इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) ने घोषणा की थी कि 2037 तक हवाई यात्रियों की संख्या 8.2 बिलियन तक पहुंच जाएगी और दुनिया भर में विमानन उद्योग यात्रियों की संख्या में होने वाली इस वृद्धि के लिए कमर कस रहा है। लेकिन कोरोना वायरस की गंभीर चोट से अन्य सेक्टर्स की तरह यह सेक्टर भी बर्बाद हो गया।
महामारी का असर इतना गहरा है कि देशों को अपनी सीमाएं बंद करनी पड़ीं और लॉकडाउन में विमानन उद्योग को अपने विमानों को खड़े रखना पड़ा।
इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) के मुताबिक, हवाई यात्रा में 98 फ़ीसदी तक की कमी आई है और अनुमान लगाया गया कि दुनिया भर की एयरलाइंस कंपनियों को 2020 तक 84 बिलियन डॉलर का नुकसान होगा।
आईएटीए ने यह भी अनुमान लगाया है कि प्रति पैसेंजर रेवेन्यू में भी 2019 की तुलना में 2020 में 48 फीसदी की गिरावट आएगी और सबसे बड़ा ख़तरा तो विमानन उद्योग और इससे जुड़ी 3.2 करोड़ नौकरियों पर मंडरा रहा है।
कोरोना वायरस के कारण भारतीय विमानन क्षेत्र को भी आने वाले वक्त में मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने अनुमान लगाया है कि भारतीय विमानन उद्योग को 24,000 से 25,000 करोड़ के रेवेन्यू का नुक़सान उठाना पड़ सकता है।
क्रिसिल इन्फ्रास्ट्रक्चर के ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक निदेशक जगनारायण पद्मनाभन ने एक प्रेस नोट के ज़रिए कहा, ''एयरलाइंस को लगभग 17 हज़ार करोड़, हवाई अड्डे के रिटेलर्स को 1,700 से 1,800 करोड़ रुपये और हवाई अड्डा ऑपरेटर्स को क़रीब 5,000 से 5,500 करोड़ रुपये तक का नुकसान होने की संभावना है।''
भारत-चीन सीमा तनाव के बीच अमरीका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो का एक नया बयान सामने आया है।
माइक पॉम्पियो ने ब्रसेल्स फ़ोरम में कहा कि चीन से भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया में बढ़ते ख़तरों को देखते हुए अमरीका ने यूरोप से अपनी सेना की संख्या कम करने का फ़ैसला किया है।
भारत-चीन लद्दाख सीमा पर 15-16 जून को गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें भारत के 20 सैनिक मारे गए थे। दोनों देशों के बीच इस विवाद को सुलझाने के लिए बैठकों का दौर जारी है। लेकिन पूरे विश्व में इसकी चर्चा हो रही है।
इस तनाव पर अमरीकी विदेश मंत्री माइक पहले भी संवेदना जता चुके हैं। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वो भारत और चीन के बीच जारी तनाव पर नज़र रखे हुए हैं और मदद करना चाहते हैं।
ऐसे में अमरीकी विदेश मंत्री के नए बयान ने दोबारा से भारत-चीन सीमा विवाद को सुर्ख़ियों में ला दिया है।
माइक पॉम्पियो ने कहा, ''हम इस बात को सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हम चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का सामना करने के लिए तैयार रहें। हमें लगता है कि हमारे वक़्त की यह चुनौती है और हम इसे सुनिश्चित करने जा रहे हैं कि हमारी तैयारी पूरी है।''
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में घोषणा की थी कि अमरीका, जर्मनी में अपनी सेना की तादाद घटाएगा। राष्ट्रपति ट्रंप के इस फ़ैसले से यूरोपीय यूनियन ने नाराज़गी ज़ाहिर की थी।
अमरीका में डोनाल्ड ट्रंप के विरोधी इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। वहाँ की राजनीति में इसे अमरीका को सैन्य रूप से कमज़ोर करने वाले बयान के तौर पर पेश किया जा रहा है। इसी साल नंवबर में वहाँ चुनाव होने हैं। इस लिहाज़ से ये बयान और महत्वपूर्ण हो जाता है।
लेकिन भारत में भी चीन के साथ सीमा विवाद के मद्देनज़र इस बयान को काफ़ी अहमियत दी जा रही है।
माइक पॉम्पियो ने सिर्फ़ भारत के संदर्भ में ऐसा नहीं कहा है। वैसे इस इलाके़ में भारत अमरीका के लिए एक महत्वपूर्ण पार्टनर है।
भारत-चीन सीमा विवाद के बाद अमरीका की तरफ़ से सबसे पहले माइक पॉम्पियो ने ही बयान दिया था। चाहे अमरीका में नवंबर में होने वाले चुनाव की बात हो या फिर रक्षा मामलों की या फिर क्वॉड समूह की बात। भारत अमरीका के रिश्ते हर मोर्चे पर दोस्ताना रहे हैं। यही वजह है कि चुनाव से पहले डोनाल्ड ट्रंप भारत का दौरा भी कर चुके हैं।
आर्थिक क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच अच्छे संबंध है। लेकिन हाल के दिनों में भारत को अमरीका की व्यापार की वरियता सूची से बाहर कर दिया गया था। दोनों देशों के बीच सामाजिक संबंध भी अच्छे हैं। यही वजह है कि एच1बी वीज़ा लेने वालों में भी भारतीयों की तादाद सबसे ज़्यादा है। अमरीका जानता है कि चीन के विश्व में बढ़ते दबाव को रोकने के लिए भारत का साथ ज़रूरी है।
अमरीका इस बयान के साथ दो हित एक साथ साध रहा है। पहला जर्मनी को इसके ज़रिए संदेश देना चाहता है।
दूसरी बात ये कि जब चीन का बर्ताव भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, ताइवान और फिलीपीन्स के साथ बदतर हो रहे थे, तो अमरीका को लगा कि ये सही मौक़ा है।
तब अमेरिका को लगता है कि सैन्य शक्ति का इस्तेमाल जर्मनी से हटा कर इन देशों की तरफ़ किया जाए। यहाँ याद रखने वाली बात है कि ये सभी देश अमरीका के अलायंस पार्टनर या स्ट्रैटेजिक पार्टनर हैं। अगर चीन इन सभी देशों पर हावी होगा तो उसको आर्थिक तौर पर नुक़सान होगा, साथ ही पार्टनरशिप पर भी असर पड़ेगा।
इसलिए अमरीका के इस बयान को एशिया में चीन के बढ़ते प्रसार के ख़तरे से अमरीका की बढ़ती चिंता के तौर पर देखना चाहिए।









