भारत

दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव में एबीवीपी क्यों हारी ?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में चुनाव हुए और वहां एक बार फिर यूनाइटेड लेफ़्ट का लाल परचम लहरा गया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने इस हार में भी अपनी जीत देखी।

उम्मीद थी कि जेएनयू में मिली हार और जीत तक ना पहुंचने के ज़ख़्मों पर डीयू की चुनावी जीत मरहम लगाएगी।

लेकिन ऐसा हो ना सका। साल 2016 में चार में से तीन सीट पर कब्ज़ा जमाने वाली एबीवीपी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनावों में दो सीटें ही जीतने में कामयाब रही।

इस चुनाव में सबसे बड़ी ट्रॉफ़ी माना जाने वाला अध्यक्ष पद उसके हाथ से निकल गया।

जेएनयू में उसकी जीत के बीच वाम छात्र संगठन आ गए थे तो यहां हैरतअंगेज़ तरीके से कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई उसके आड़े आ गई।

और एनएसयूआई ने अपनी जीत और एबीवीपी की हार का पोस्टमार्टम करने में ज़रा देर नहीं लगाई।

एनएसयूआई के नेशनल मीडिया इंचार्ज नीरज मिश्रा ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''ये भ्रष्टाचार के खिलाफ, विद्यार्थियों के साथ मार-पीट के साथ-साथ आरएसएस और एबीवीपी के खिलाफ एक बहुत बड़ी जीत है। यह जीत कैम्पेनिंग और सोशल मीडिया के बिना अधूरी थी।''

ज़ाहिर है आजकल हर छोटी-बड़ी जीत को केंद्रीय राजनीति से जोड़ने का चलन है, लेकिन जब हार मिले तो उसे संभालना कुछ मुश्किल हो जाता है।

एबीवीपी भी इस हार को डीयू कैम्पस की चारदीवारी तक देखना चाहती है। एबीवीपी के नेशनल मीडिया कंवेनर साकेत बहुगुणा ने कहा कि पिछले साल वो तीन सीट पर जीते थे, इस बार दो सीट पर, ऐसे में इसे हार कैसे कहा जा सकता है?

बहुगुणा ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''इस हार के कई कारण हैं। स्थानीय मुद्दे, यूनिवर्सिटी से जुड़े विषय और हमारे ख़िलाफ़ खड़े किए गए डमी उम्मीदवार, सब मिलाकर इस हार के लिए ज़िम्मेदार हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसे राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ना चाहिए।''

लेकिन एनएसयूआई की इस जीत को कांग्रेस अपनी वापसी के तौर पर पेश कर रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय माकन डूसू चुनावों के नतीजों से उत्साहित हैं और उन्होंने कहा कि ये बीजेपी और उसकी नीतियों का ख़ारिज होना है।

लेकिन असल में ये जीत एनएसयूआई (या कांग्रेस) और हार एबीवीपी (या बीजेपी) के लिए क्या मायने रखती है?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद ने कहा कि इन दिनों छात्र संघ चुनाव किसी छोटी विधानसभा चुनाव की तरह लड़ा जाता है जिसमें राजनीतिक दल अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा देते हैं।

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, ''ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन ऐसा है इसलिए ये नतीजे (एबीवीपी के लिए) बड़ा झटका हैं क्योंकि दावा किया जा रहा था कि ये एक तरह से प्रधानमंत्री पर जनमत है।''

अपूर्वानंद ने कहा कि इन चुनावों में मिली जीत को प्रधानमंत्री की स्वीकृति के रूप में देखा जाता तो हार को भी एक तरह से अस्वीकृति माना जाना चाहिए।

साल 1992 में एबीवीपी से जीतकर डूसू पहुंचे और अब पत्रकार के रूप में काम कर रहे अतुल गंगवार भी इस बात की तस्दीक करते हैं। उन्होंने कहा कि इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ही देखना चाहिए क्योंकि बीजेपी के कई नेताओं के तस्वीर वाले पोस्टर भी लगाए गए थे। ऐसे में इस हार की कुछ ज़िम्मेदारी उन्हें भी लेनी चाहिए।

ये पूछने पर कि बीते कई सालों में छात्र संघ चुनाव किस तरह बदला है, उन्होंने कहा, ''पहले ऐसा नहीं होता था। एबीवीपी और बीजेपी अलग-अलग होती थी। वैचारिक समर्थन रहता था, लेकिन बाकी कोई लेना-देना नहीं था।''

अतुल ने कहा, ''एबीवीपी को लग रहा था कि वो ये चुनाव जीती हुई है, इसलिए सभी क्रेडिट लेने में लगे थे, लेकिन ये भूल गए कि नतीजे आने अभी बाकी हैं।''

क्या इन नतीजों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ा जाए या नहीं, क्या ये केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री पर जनमत है या नहीं, इन गंभीर सवालों से अलहदा ज़मीनी स्तर पर ऐसे क्या कारण थे कि एबीवीपी को मुंह की खानी पड़ी।

दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस में पीएचडी कर रहे रंगनाथन रवि से जब इन नतीजों की वजह पूछी गई तो उन्होंने कहा, ''छात्र असल में एबीवीपी के कामकाज से खुश नहीं थे। इसके अलावा एनएसयूआई की कैम्पनिंग इस बार बढ़िया थी।''

रवि ने एबीवीपी की हार के लिए वायरल वीडियो को भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, ''सोशल मीडिया पर एबीवीपी के ख़िलाफ़ कई वीडियो वायरल हुए थे और इससे छात्र काफ़ी ख़फ़ा थे।''

कुछ वक़्त पहले मीडिया में ख़बरें आई थीं कि डूसू को मिलने वाले आवंटन का बड़ा हिस्सा चाय-कॉफ़ी पर खर्च कर दिया गया। इस ख़बर ने भी एबीवीपी को नुकसान पहुंचाया।

मोतीलाल नेहरू कॉलेज के सिद्धार्थ राज ने कहा, ''इस रिपोर्ट ने छात्रों को काफ़ी नाराज़ कर दिया था। इसके अलावा कई लोगों को लगता है कि एबीवीपी हर वक़्त राष्ट्रवाद का रोना रोकर फ़ायदा लेना चाहती है।''

एबीवीपी के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया कैम्पेन चलाने वाली गुरमेहर कौर भी नतीजों से काफ़ी खुश हैं।

उन्होंने ट्वीट किया, ''डीयू के हर छात्र को मुबारक़बाद, आप लोगों ने अपनी यूनिवर्सिटी दोबारा जीत ली है। आपने दिखा दिया है कि हिंसा और हुड़दंग स्वीकार नहीं किया जाएगा .... एनएसयूआई और राहुल गांधी को इस जीत पर बधाई।''

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में एनएसयूआई की दमदार वापसी

दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनावों में कांग्रेस की छात्र इकाई एन एस यू आई ने चार में दो शीर्ष पदों पर जीत हासिल कर दमदार वापसी की है।

प्रेसिडेंट और वाइस प्रेसिडेंट के पदों पर एन एस यू आई के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है, जबकि सेक्रेटरी और ज्वाइंट सेक्रेटरी के पदों पर ए बी वी पी को जीत मिली है।

रॉकी तुशीद ने प्रेसिडेंट पद के लिए 1,590 वोटों से जीत हासिल की, जबकि वाइस प्रेसिडेंट पद पर कुनाल शेरावत को जीत मिली।

इससे पहले एन एस यू आई के अरुण हुड्डा ने 2012 में डूसू अध्यक्ष का पद जीता था।

डीयू में अध्यक्ष पद पर जीत के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एन एस यू आई को बधाई दी है और कांग्रेस में भरोसा रखने के लिए शुक्रिया भी कहा है।

ए बी वी पी की दिल्ली शाखा की नेशनल सेक्रेटरी मोनिका चौधरी ने बीबीसी संवाददाता मानसी दाश को बताया कि सेक्रेटरी के पद पर महामेधा नागर और ज्वाइंट सेक्रेटरी के पद पर उमाशंकर को जीत मिली है।

उन्होंने कहा, ''डूसू में अब तक जो ट्रेंड रहा था, हमने तीन या चार सीटों पर जीत हसिल की थी। हम अपने काम पर फिर से नज़र डालेंगे और विमर्श करेंगे कि बाकी दो सीटों पर क्या कमी रह गई।''

वो कहती हैं, ''हम सकारात्मक काम करते हैं और पूरे साल हमने कई ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए हैं। हमें लगता है कि जो काम हमने किया है उसे लेकर हमें छात्रों के पास जाने की ज़रूरत है।''

वो कहती हैं, ''आने वाले वक्त में हम अपने मेनिफेस्टों में किए वायदों पर चलते हुए छात्रों के मुद्दों को लेकर काम करेंगे।''

दिल्ली विश्वविद्यालय में होने वाले चुनावों को भारत की राजनीति का एक अहम संकेतक भी माना जाता है।

एन एस यू आई के अध्यक्ष रह चुके अशोक तंवर का कहना है कि ये मौजूदा सरकार और उनके समर्थकों की नीतियों के ख़िलाफ़ जीत है।

उन्होंने बीबीसी संवाददाता मानसी दाश से कहा, ''उन्होंने वहां से बाबा साहब आंबेडकर की मूर्ति हटाई, जो वायदे किए थे वो पूरे नहीं किए और मौजूदा सरकार भी छात्रवृत्ति काटने के बारे में बात कर रहे हैं। इन बातों के लेकर छात्रों में रोष था।''

अशोक तंवर कहते हैं, ''जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी और उनकी स्टूडेंट विंग आर एस एस के इशारे पर काम करती है कोई भी आज़ादी पसंद करने वाला और टोलरेंट व्यक्ति इन चीज़ों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। इस जीत को सरकार की छात्र विरोधी और युवा विरोधी नीति के विरोध में भारतीय लोगों की जीत के तौर पर देखा जा सकता है।''

अशोक तंवर कहते हैं, ''2003 और 2004 में कांग्रेस की वापसी युवा के माध्यम से हुई थी और इस बार के डी यू, जे एन यू, राजस्थान विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय में एन एस यू आई का प्रदर्शन दिखाता है कि कांग्रेस युवाओं का भरोसा जीत पा रही है।''

अशोक कहते हैं, ''युवा अब बीजेपी की नीतियों से निराश हो चुके हैं। उन्होंने स्किल इंडिया का 'एस' हटा कर उसे 'किल इंडिया' कर देश की शांति भंग कर दी। ये स्पष्ट संकेत है कि छात्रों ने अब हिंसा को रिजेक्ट कर दिया है।''

इससे पहले दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू छात्रसंघ चुनाव के नतीजों में वामपंथी छात्र समूहों की गूंज सुनाई दी थी।

इसी सप्ताह जारी चुनाव नतीजों में चारों सीटों पर यूनाइटेड लेफ्ट पैनल यानी आईसा, एस एफ़ आई और डी एस एफ़ के गठबंधन को जीत मिली थी।

जे एन यू छात्रसंघ चुनावों में अध्यक्ष के पद के लिए गीता कुमारी को जीत मिली। उन्होंने एबीवीपी की निधि त्रिपाठी को हराया।

वाइस प्रेसिडेंट के पद के लिए लेफ्ट की सिमोन ज़ोया खान ने ए बी वी पी के दुर्गेश कुमार को, सेक्रेटरी के पद के लिए लेफ्ट के दुग्गीराला श्रीकृष्णा ने ए बी वी पी के निकुंज मकवाना को हराया। ज्वाइंट सेक्रेटरी के चुनाव में लेफ्ट के सुभांशु सिंह ने ए बी वी पी के पंकज केशरी को पछाड़ कर जीत हासिल की।

रिश्ते को खत्म करने के लिए 'तलाक-ए-बिद्दत' का सहारा नहीं लिया जाएगा: एआईएमपीएलबी

भारत में सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक बार में तीन तलाक को असंवैधानिक और गैरकानूनी करार दिए जाने के मद्देनजर आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने फैसला किया है कि अब निकाह के समय ही काजियों और धर्मगुरूओं के माध्यम से वर और वधू पक्ष के बीच यह सहमति बन जाएगी कि रिश्ते को खत्म करने के लिए किसी भी सूरत में 'तलाक-ए-बिद्दत' का सहारा नहीं लिया जाएगा।

मालूम हो कि बीते 22 अगस्त को भारत की शीर्ष अदालत ने एक बार में तीन तलाक 'तलाक-ए-बिद्दत' को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया था।

बोर्ड की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कल भोपाल में हुई, जिसमें बोर्ड ने स्पष्ट किया कि वह न्यायालय के फैसले का सम्मान करता है और तीन तलाक के खिलाफ और शरीयत को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए व्यापक स्तर पर अभियान शुरू करेगा।

बोर्ड ने इस संदर्भ में एक समिति के गठन का भी फैसला किया है। पर्सनल लॉ बोर्ड की इस बैठक में कुछ और भी फैसले किए गए जिसमें शादी के समय ही एक बार में तीन तलाक को 'ना' कहने की बात प्रमुख है।

बोर्ड के एक शीर्ष पदाधिकारी ने आज 'भाषा' को बताया, ''बेहतर होगा कि निकाह के समय ही लड़का और लड़की के परिवारों में यह सहमति बन जाए कि अगर रिश्ते खत्म करने की कोई स्थिति पैदा होती है तो इसके लिए तलाक-ए-बिद्दत का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

जागरूकता अभियान में यह बात भी शामिल की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के इस तरीके को गैरकानूनी करार दिया है, ऐसे में यह तलाक अब मान्य नहीं होगा। बेहतर होगा कि लोग इस तलाक पर अमल नहीं करें। इसमें काजियों और धर्मगुरूओं की भी मदद ली जाएगी।''

बता दें कि सुन्नी मुसलमानों के 'हनफी पंथ' में तलाक-ए-बिद्दत की प्रथा रही है। बोर्ड का शुरू से यह मत रहा है कि तलाक-ए-बिद्दत तलाक का बेहतर तरीका नहीं है। उसने कई बार लोगों से तलाक के इस तरीके पर अमल नहीं करने की अपील की थी।

बोर्ड का कहना है कि न्यायालय के फैसले के बाद लोगों के बीच जागरूकता फैलाना जरूरी है और इसलिए व्यापक अभियान शुरू किया जाएगा।

बोर्ड के सदस्य कमाल फारूकी ने कहा, ''इस अभियान के लिए अगले कुछ दिनों में तैयारियां शुरू हो जाएंगी। इस संदर्भ में पर्चे और दूसरी चीजें की जा रही हैं।''

यह पूछे जाने पर कि सरकार की ओर से कानून बनाने की स्थिति में बोर्ड का क्या रूख होगा तो फारूकी ने कहा, ''अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति आने पर फैसला किया जाएगा।''

आयकर विभाग ने सांसदों और विधायकों की लिस्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी

भारत में आयकर विभाग ने एक बंद लिफाफे में उन सांसदों और विधायकों के नाम सुप्रीम कोर्ट को सौंपे हैं जिनकी आय पिछले दो चुनावों के बाद बेतहाशा बढ़ी है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने लखनऊ स्थित गैर सरकारी संगठन लोक प्रहारी द्वारा दायर मामले में सह-याचिकाकर्ता के रूप में आवेदन दायर किया था। इसमें तर्क दिया गया कि कई लोग अपनी संपत्तियों के सेल्फ अटेस्ट किए हुए एफिडेविट जमा कर रहे हैं, जिसमें उनके इनकम टैक्स रिटर्न्स की जानकारी नहीं है।

चुनाव सुधारों में काम करने वाली एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ए डी आर) के मुताबिक, 4 वर्तमान लोकसभा सांसदों की संपत्ति 12 प्रतिशत, जबकि 22 अन्य ने अपनी परिसंपत्तियों में पांच गुना वृद्धि की घोषणा की है। वहीं हाल ही में राज्यसभा के लिए चुने गए सांसद ने अपनी संपत्ति में 21 गुना इजाफे की घोषणा की है।

ए डी आर के मुताबिक, सात नव निर्वाचित राज्यसभा सांसदों ने संपत्ति में दो गुना इजाफे की घोषणा की है। सिर्फ पांच सालों में सांसदों की संपत्ति में एक बेतहाशा बढ़ोत्तरी का उदाहरण देते हुए याचिकाकर्ता ए डी आर ने कहा कि चार लोकसभा सदस्यों की संपत्ति में 1200 प्रतिशत, जबकि 22 अन्य लोकसभा सदस्यों की संपत्ति में 500 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

ए डी आर ने जनवरी में बताया था कि असम के एक विधायक ने संपत्तियों में 5 हजार गुना से अधिक के इजाफे का एेलान किया है। जबकि 2011 के विधानसभा चुनावों के बाद केरल के एक विधायक की संपत्ति में 1700 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि 2014 लोकसभा चुनाव, 2016 राज्य सभा चुनाव के अलावा तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल, असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद कई विधायकों और सांसदों की संपत्तियों में बेहताशा बढ़ोत्तरी हुई है।

भारत में केंद्र की मोदी सरकार को लताड़ लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को टिप्पणी की थी कि सरकार एक तरफ चुनाव सुधार की बात करती है, मगर दूसरी तरफ कोई भी काम समय पर पूरा नहीं करती है।

सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने अतिरिक्त महाधिवक्ता पी एस नरसिम्हा से कहा, क्या भारत सरकार का यही रवैया है? आज तक आपने इस मामले में क्या किया है?

याचिका में एन जी ओ ने कहा है कि ना केवल सांसद-विधायकों की संपत्ति और उनकी आय के स्रोत को सार्वजनिक किया जाये बल्कि उनकी पत्नी और बच्चों की संपत्ति और आय के स्रोतों को भी जगजाहिर किया जाए।

मोदी ने विदेशी धरती पर किया भारत का अपमान: कांग्रेस

कांग्रेस ने मंगलवार को कहा कि राहुल गांधी ने नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी धरती पर भारत का अपमान किया है।

कांग्रेस का यह बयान बीजेपी के उस बयान के बाद आया है जिसमें बीजेपी ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अमेरिकी विश्वविद्यालय में अपने संबोधन में प्रधानमंत्री की उपेक्षा की है।

कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने मंगलवार को कहा, ''हम सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के इन बयानों से अचंभित है। ये आलोचनाएं न्यायोचित नहीं हैं। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा उठाए गए मुद्दे और बयानों से उनके द्वारा इतिहास की अवहेलना करना और प्रधानमंत्री से माफी मांगने की उनकी बेचैनी का पता चलता है।''

उन्होंने कहा, ''राहुल गांधी ने बीते 70 वर्षो में भारत की उपलब्धियों के बारे में बात की। हम समझते हैं कि बीजेपी आखिर क्यों उनकी आलोचना कर रही है। यदि राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री की आलोचना कर रहे हैं तो इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह लोकतंत्र का गुण है।''

गौरतलब है कि स्मृति ने मंगलवार सुबह एक संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस उपाध्यक्ष की कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में उनके संबोधन का हवाला देकर उनकी आलोचना करते हुए था कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री की उपेक्षा की है।

स्मृति ईरानी ने कहा कि राहुल गांधी ने एक ऐसे मंच का चुनाव किया, जहां वह अपनी सुविधा के अनुसार अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की आलोचना कर सकें।

आनंद शर्मा ने कहा, ''यह देश के प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) हैं जिन्होंने विदेशी धरती पर भारत का अपमान किया। प्रधानमंत्री ने अपने पहले विदेशी दौरे पर देश को भ्रष्ट कहा था और उन्होंने एक अन्य मौके पर कहा था कि विदेशों में रह रहे भारतीयों को खुद को भारतीय कहने पर शर्म आती है।''

उन्होंने कहा कि यह आलोचना सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की असहिष्णुता दर्शाती है।

बता दें कि राहुल गांधी ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अपने संबोधन में नोटबंदी की आलोचना करते हुए कहा था कि केंद्र सरकार के इस फैसले से रातोंरात 86 फीसदी नकदी देश की अर्थव्यवस्था से बाहर हो गई थी।

राहुल ने बढ़ रही हिंसा की घटनाओं का भी जिक्र किया। राहुल ने कहा कि अब अहिंसा के विचार पर हमला हो रहा है, लेकिन यह ही एक रास्ता है जो कि मानवता को आगे लेकर जा सकता है।

राहुल ने कहा कि नफरत, गुस्सा और हिंसा हमको खत्म कर सकती है, उन्होंने कहा कि धुव्रीकरण की राजनीति काफी खतरनाक होती है।

राहुल गांधी ने कहा, वो दिनभर मेरे बारे में दुर्भावना फैलाते हैं

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक अमरीकी यूनिवर्सिटी में छात्रों के साथ संवाद किया है। दो सप्ताह के लिए अमरीकी दौरे पर गए राहुल गांधी के निशाने पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहे।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले में बोल रहे राहुल गांधी ने कहा कि विभाजन और ध्रुवीकरण की राजनीति भारत के लोगों को अलग-थलग कर रही है और कट्टरपंथी बना रही है।

जब राहुल गांधी से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी संबंधी एक सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वो अपनी पार्टी की ओर से 2019 के चुनावों में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।

हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि इस पर फ़ैसला कांग्रेस को लेना है।

1949 में भारत का प्रधानमंत्री रहते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी इस यूनिवर्सिटी में भाषण दिया था। राहुल नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी से हैं।

गांधी के भाषण की मुख्य बातें
- अहिंसा का विचार भारत की जातियों, धर्मों और भाषाओं को एक एकजुट करता है। एक विचार जिसे महात्मा गांधी ने एक ख़ूबसूरत, लेकिन ताक़तवर राजनीतिक हथियार में विकसित किया।

-  भारत के लोकतंत्र के बारे में चाहे कोई कुछ भी कहे, लेकिन मानव इतिहास में कोई ऐसा राष्ट्र नहीं रहा जिसने इतनी बड़ी तादाद में लोगों को गरीबी से बाहर निकाला हो।

- अभी तक हमारी ताक़त यही रही है कि हमने जो कुछ भी हासिल किया, शांतिपूर्वक किया।  नफ़रत, गुस्सा और ध्रवीकरण की राजनीति हमारी आर्थिक विकास की गति को बर्बाद कर देगी।

- लोगों को दलित होने की वजह से मारा जा रहा है, मुसलमानों को बीफ़ खाने के संदेह में मारा जा रहा है। ये भारत के लिए नया है। इससे भारत को बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। भारत के दसियों लाख लोगों को लग रहा है कि उनका इस देश में कोई भविष्य नहीं है। आज की जुड़ी हुई दुनिया में ये बहुत ख़तरनाक है। ये लोगों को अलग-थलग करता है और उन्हें कट्टरपंथी विचारों की चपेट में ले आता है।

- 2012 में कांग्रेस में एक तरह का दंभ आ गया था और कांग्रेसियों ने आम लोगों से संवाद कम कर दिया था।

- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उन लोगों से बात नहीं करते हैं जिनके साथ वो काम करते हैं, इनमें सांसद भी शामिल हैं। ऐसा बीजेपी के लोगों ने ही मुझे बताया है।

- एक बड़ी मशीनरी है जो दिन भर मेरे बारे में दुर्भावना फैलाती है और इसे वो व्यक्ति ही चला रहा है जिसके हाथ में हमारा देश है।

- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक अच्छे वक्ता हैं। वो मुझसे कहीं ज़्यादा अच्छे वक़्ता हैं।

रेयान स्कूल के मालिक पर जुवेनाइल एक्ट के तहत मुकदमा चलेगा, मीडिया वालों को पुलिस ने पीटा

हरियाणा में गुड़गांव के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में सात साल के मासूम प्रद्युम्न की हुई नृशंस हत्या मामले में हरियाणा सरकार ने स्कूल के मालिक अल्बर्ट पिन्टो के खिलाफ जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत मुकदमा चलाने का निर्देश दिया है।

हरियाणा के शिक्षा मंत्री रामबिलास शर्मा ने इस हत्याकांड की सीबीआई जांच से इनकार करते हुए गुड़गांव पुलिस को निर्देश दिया है कि स्कूल के मालिक के खिलाफ जुवेनाइल एक्ट के तहत केस दर्ज करे।

बता दें कि मृत बच्चे के पिता वरुण ठाकुर मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग कर रहे हैं। साथ ही लोगों से हिंसा नहीं करने की अपील भी कर रहे हैं।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि स्कूल प्रशासन की तरफ से मामले में लापरवाही बरती गई है। स्कूल की मान्यता रद्द करने के सवाल पर शिक्षा मंत्री ने कहा कि ऐसा नहीं किया जा सकता क्योंकि यहां पढ़ने वाले 1200 बच्चों के भविष्य का सवाल है।

उन्होंने कहा, ''हमने गुड़गांव पुलिस को रेयान इंटरनेशनल स्कूल के मालिक अल्बर्ट पिन्टो के खिलाफ जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 75 के तहत मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया है।''

शिक्षा मंत्री ने कहा कि मामले में हरियाणा सरकार ने त्वरित कार्रवाई करने और स्कूल के बाहर शराब की दुकान को स्थाई रूप से बंद कराने का आदेश दिया है।

इधर, रेयान स्कूल के बाहर अभिभावकों के विरोध-प्रदर्शन का कवरेज कर रहे पत्रकारों की गुरुग्राम पुलिस ने पिटाई कर दी। पुलिस के हमले में कई पत्रकार घायल हुए हैं। तीन पत्रकारों को गम्भीर चोट आई हैं। कई कैमरे भी तोड़े गए हैं। मीडिया की गाड़ियों को भी नुकसान पहुंचाया गया है।

गौरतलब है कि शुक्रवार (8 सितंबर) को दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले सात साल के प्रद्युम्न की गला रेत कर हत्या कर दी गई थी और उसकी लाश बाथरूम में फेंक दी गई थी।

इस मामले में स्कूल में कार्यरत एक बस कंडक्टर को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उस बस कंडक्टर का नाम अशोक है। उसने अपना गुनाह भी कबूल कर लिया है।

लेकिन पेरेंट्स का कहना है कि स्कूल प्रशासन खुद को बचाने के लिए उस बस कंडक्टर पर आरोप लगाया है। कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि उस कंडक्टर को फंसाकर बलि का बकरा बनाया जा रहा है।

नरेन्द्र मोदी सरकार वैदिक ब्राह्मणों को दे सकती है अल्पसंख्यक दर्जा

भारत में केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार वैदिक ब्राह्माणों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने पर विचार कर रही है। लेकिन राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने केन्द्र के ऐसे किसी भी कदम का विरोध किया है और कहा है कि ऐसा कोई भी कदम मौजूदा अल्पसंख्यकों के हितों के खिलाफ होगा।

मोदी सरकार ने अल्पसंख्यक आयोग को कहा था कि वो इस प्रस्ताव पर विचार करे और वैदिक ब्राह्मणों को अल्पसंख्यकों का दर्जा देने की सिफारिश करे। लेकिन अल्पसंख्यक आयोग सरकार के ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ है।

साल 2016-17 की रिपोर्ट में अल्पसंख्यक आयोग ने कहा है कि वैदिक ब्राह्मणों को अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया जा सकता है क्योंकि वे हिन्दू धर्म के अभिन्न अंग हैं। हालांकि कमीशन ने इस बारे में अंतिम फैसला केन्द्र सरकार पर छोड़ दिया है।

अल्पसंख्यक आयोग का कहना है कि यदि सरकार ब्रह्माण महासभा या फिर अखिल भारतीय ब्रह्माण महासभा की मांग पर वैदिक ब्रह्माणों को अल्पसंख्यक का दर्जा दे देती है तो इसी तरह की मांग राजपूत, वैश्य और दूसरे हिन्दू जातियों की तरफ से भी उठ सकती है। इसलिए ब्रह्माणों को अल्पसंख्यक दर्जा देना सही नहीं है।

बता दें कि केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक कानून 1992 के तहत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की है। भारत में 6 धार्मिक समुदायों को अल्पसंख्यकों का दर्जा हासिल है इनमें मुस्लिम, क्रिश्चयन, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी शामिल है।

पिछले कुछ दिनों से हिन्दू समुदाय की कई जातियां भी अपनी पौराणिक अस्मिता और पहचान के आधार पर अल्पसंख्यक दर्जे की मांग कर रही है। अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के लिए केन्द्र और राज्य सरकारें कई योजनाएं और स्कीमें चलाती है और उनकी धार्मिक, सामाजिक पहचान की रक्षा करती हैं।

उत्तर प्रदेश, झारखंड के बाद अब महाराष्ट्र के नासिक में 55 बच्चों की मौत

बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश और झारखंड के बाद अब महाराष्ट्र के नासिक सिविल अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत का मामला सामने आया है। महाराष्ट्र भी बीजेपी शासित प्रान्त है।

अस्पताल के विशेष शिशु देखभाल खंड में पिछले महीने (अगस्त में) 55 शिशुओं की मौत हो गयी। इधर प्रशासन ने चिकित्सकीय लापरवाही से बच्चों की मौत होने से इनकार किया है।

नासिक के सिविल सर्जन सुरेश जगदले ने पीटीआई को बताया कि अप्रैल के बाद से विशेष शिशु देखभाल खंड में 187 शिशुओं की मौत हुई, लेकिन अगस्त महीने में 55 शिशुओं की जान चली गई।

जगदले ने सफाई देते हुए कहा, ''इनमें से अधिकतर मौतें निजी अस्पतालों से शिशुओं को अंतिम स्थिति में लाए जाने के कारण हुई और उनके बचने की गुंजाइश बहुत कम थी। समय पूर्व जन्म और श्वसन तंत्र कमजोरी के कारण भी मौतें हुई।''

सिविल सर्जन ने कहा कि किसी भी मामले में चिकित्सकीय लापरवाही नहीं हुई।

उन्होंने कहा, ''अस्पताल में 18 इनक्यूबेटर हैं और हमें जगह के अभाव में दो कभी-कभी तीन बच्चों को एक ही इनक्यूबेटर में रखना पड़ता है।''

स्वास्थ्य मंत्री दीपक सावंत ने कहा, ''यह तथ्य है कि शिशुओं को अंतिम स्थिति में सरकारी अस्पताल लाया गया।'' उन्होंने कहा कि निजी और सरकारी अस्पतालों में जल्द ही एक प्रोटोकॉल का पालन होगा।

बता दें कि इससे पहले बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में पिछले महीने सैकड़ों बच्चों की मौत हो गई। इनमें से 30 बच्चों की मौत सिर्फ 48 घंटे में ऑक्सीजन की कमी से हुई थी।

बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में पिछले एक साल के दौरान जनवरी में 152 बच्चों की मौत हुई, जबकि फरवरी में 122, मार्च में 159, अप्रैल में 123, मई में 139, जून में 137, जुलाई में 128 और अगस्त में 325 बच्चों की मौत हुई । इसके बाद बीजेपी शासित झारखंड में भी कई मासूमों की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई थी। अब यही लापरवाही बीजेपी शासित राज्य महाराष्ट्र में दोहराई गई है।

गुजरात दंगों के स्टिंग पर राणा अय्यूब की किताब लॉन्‍च

पत्रकार राणा अय्यूब की गुजरात दंगों पर स्टिंग ऑपरेशन को लेकर किताब 'गुजरात फाइल्‍स - अनाटॉमी ऑफ ए कवर अप' में दावा किया है कि कई अधिकारियों ने 2002 दंगों के समय राजनीतिक दबाव की बात मानी थी।

शुक्रवार को नई दिल्‍ली में यह किताब लॉन्च हुई। अय्यूब ने कहा कि उन्‍होंने गांधीनगर स्थित बंगले पर मोदी का भी बयान रिकॉर्ड किया था। यह बयान घड़ी में कैमरा लगाकर रिकॉर्ड किया गया था।

राणा अय्यूब ने कहा कि सभी स्टिंग ऑपरेशन में अमित शाह साझा कड़ी थे। वे उस समय गुजरात के गृह मंत्री थे और अब बीजेपी अध्‍यक्ष हैं। अमित शाह को सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में जेल भी जाना पड़ा था। 2014 में सीबीआई कोर्ट ने उन्‍हें बरी कर दिया था।

राणा अय्यूब का आरोप है कि तहलका ने उन्‍हें इस असाइनमेंट के लिए भेजा था। लेकिन बाद में राजनीतिक दबाव का जिक्र करते हुए स्‍टोरी छापने से इनकार कर दिया।

उनका दावा है कि उन्‍होंने अशोक नारायण, जी एल सिंघल, पी सी पांडे, जी सी राईघर, राजन प्रियदर्शी और वाई ए शेख का भी स्टिंग ऑपरेशन किया था। उन्‍होंने खुद की पहचान अमेरिका की रहने वाली फिल्‍ममेकर के रूप में कराई और मैथिली त्‍यागी नाम बताया।

अय्यूब ने दावा किया कि उन्‍होंने तत्‍कालीन मुख्‍य सचिव (गृह) अशोक नारायण से पूछा था, ''आप को जब सी एम ने दंगों को नियंत्रित करने में सुस्‍ती दिखाने को कहा तो आप नाराज थे।''

इस पर नारायण ने कथित तौर पर कहा, ''वह ऐसा कभी नहीं करेंगे। वह कुछ भी पेपर नहीं लिखते। उनके अपने आदमी हैं और उनके जरिए ही वे वी एच पी और फिर नीचे के पुलिस अधिकारियों तक जाते हैं।''

अय्यूब ने उस समय सी आई डी (इंटेलीजेंस) के चीफ रहे जी सी राईघर से पूछा था, ''मुठभेड़ में क्‍या हुआ था। आप वहां थे।''
उन्‍होंने बताया कि राईघर का जवाब था, ''मैं केवल एक में था। एक अपराधी (सोहराबुद्दीन) फर्जी मुठभेड़ में मारा गया। गलती यह हुई कि उन्‍होंने उसकी बीवी को भी मार दिया।''

किताब में हरेन पांड्या मर्डर केस पर भी एक चैप्‍टर है। इसमें जांच अधिकारी वाई ए शेख के आरोपों को भी जगह दी गई है।

बुक लॉन्‍च कार्यक्रम में पत्रकार हरतोश सिंह बल और राजदीप सरदेसाई व वकील इंदिरा जयसिंह मौजूद थे।

सरदेसाई ने कहा कि गुजरात दंगों के संबंध में वे एक बार एक वरिष्‍ठ जज से बात कर रहे थे तो उन्‍होंने कहा, ''ये जो मुसलमान है, वो बदलेगा नहीं। इसके साथ यही होना था।''