भारत में केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी की गठबंधन सहयोगी शिवसेना ने बीजेपी को चुनौती देते हुए कहा है कि वह देश की अर्थव्यवस्था की हालत पर यशवंत सिन्हा की टिप्पणियों को गलत साबित करके दिखाए।
यशवंत सिन्हा ने बुधवार को भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाई थी, जिसके बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया है।
शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' और 'दोपहर का सामना' में प्रकाशित संपादकीय में कहा कि जब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम जैसे अर्थशास्त्री कह रहे थे तो उन्हें पागल कहा गया और जब शिवसेना और अन्य ने सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए तो उन्हें देशद्रोही कहा गया।
सामना के संपादकीय के मुताबिक, ''बीजेपी के पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने इन झूठे विचारों की बखिया उधेड़ी है। उन्होंने कई बयान दिए हैं और अब आप साक्ष्य देकर उन्हें गलत साबित करो।''
संपादकीय में हवाला दिया गया कि रूस के तानाशाह जोसेफ स्टालिन के शासन में उनकी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को रातों रात गायब कर दिया गया या उन्हें यातनागृह शिविरों में भेज दिया गया।
शिवसेना ने कहा, ''सिन्हा ने सच बोला है। उन्होंने कई मुद्दों पर रोशनी डाली है, जिन्होंने तबाही मचाई है। इसमें नोटबंदी और देश की अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत भी शामिल है। हमने यह देखना है कि उन्हें क्या सजा मिलेगी।''
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यशवंत सिन्हा को देश का वित्त मंत्री बनाया था और उनके विचारों को सोशल मीडिया नेटवर्को पर प्रचारकों द्वारा आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। इन दिनों बीजेपी सरकार की कई महत्वाकांक्षी योजनाएं अधर में लटकी हुई हैं। मेक इन इंडिया जैसी योजनाएं बेहतहाशा खर्च के बावजूद फ्लॉप रही हैं, लेकिन इन्हें विज्ञापनों के जरिए सफल बताया जा रहा है।
शिवसेना ने कहा, ''गुजरात में कहा जा रहा है कि 'विकास पागल हो गया है'। सिन्हा ने सरकार के उन खोखले दावों को बेनकाब कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश की जीडीपी दर 5.7 फीसदी है, लेकिन असल में यह 3.7 फीसदी है। जब कांग्रेस के मनमोहन सिंह और चिदंबरम ने भी यही बातें कही थी तो उन्हें बीजेपी ने पागल की संज्ञा दी थी।''
संपादकीय में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के उन बयानों पर भी प्रकाश डाला गया, जिसमें कहा गया था कि किस तरह कुछ लोग विकास का बखान करते हैं, लेकिन कुछ लोग अभी भी इस भ्रम है कि यदि वे ईवीएम में छेड़छाड़ कर चुनाव जीत गए तो यह विकास है।
शिवसेना ने लेख में अर्थव्यस्था को लेकर सरकार के कई बड़े-बड़े दावों पर सवाल उठाते हुए यशवंत सिन्हा के बयानों का जिक्र किया है कि किस तरह नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट आई, उत्पादन गिरा, महंगाई बढ़ी, गैस, डीजल और पेट्रोल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई, नौकरियों में कटौती, निवेश में तेज गिरावट, बैकिंग क्षेत्र की स्थिति बिगड़ी।
संपादकीय के मुताबिक, ''हमने यह बातें एक साल पहले कही थी और बीजेपी ने हमें देशद्रोही करार दे दिया था। अब यशवंत सिन्हा की बारी है।''
साल 2008 में जब पूरी दुनिया में आर्थिक तबाही मची थी। मेरिल लिंच और लीमैन ब्रदर्स जैसे दिग्गज ढह रहे थे। हर कोने से शेयर बाज़ारों के गर्त छूने की ख़बरें आ रही थीं।
भारत का हाल भी कुछ ऐसा ही था। दलाल पथ पर निवेशकों के लाखों-करोड़ों हर रोज़ गायब हो रहे थे, पिंक स्लिप थमाकर छंटनियां हो रही थीं और नई नौकरियां का अकाल पड़ता दिख रहा था।
जब लगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी, तभी सरकारी सूझबूझ ने हालात संभालने शुरू किए। एक अरब से ज़्यादा आबादी का पहला बड़ा फ़ायदा तब दिखा, जब घरेलू उपभोग ने कमज़ोर अर्थतंत्र को अपने कंधे पर रखकर संभाला।
ग्रामीण इलाकों में बिक्री बनी रही, बड़े कारोबारों पर कुछ असर ज़रूर हुआ, लेकिन छोटे उद्योगों पर वो प्रभाव नहीं दिखा, लेकिन ये सब हुआ कैसे?
अटल सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने कहा, ''निजी निवेश गिर रहा है। इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन सिकुड़ रहा है। कृषि संकट में है, कंस्ट्रक्शन और दूसरे सर्विस सेक्टर धीमे पड़ रहे हैं, निर्यात मुश्किल में है, नोटबंदी नाकाम साबित हुई और गफ़लत में लागू किए गए जीएसटी ने कइयों को डुबो दिया, रोज़गार छीन लिए। नए मौके नहीं दिख रहे। तिमाही ग्रोथ रेट धीमी पड़ रही है।''
ये हम सभी देख रहे हैं कि नोटबंदी का वो फ़ायदा नहीं हुआ जिसके सपने मोदी सरकार ने देखे थे।
अगर वाकई हम आर्थिक मंदी की ओर बढ़ रहे हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री अरुण जेटली मौजूदा हालात से निपटने के लिए क्या कर सकते हैं? क्या साल 2008 में भारत को संकट से बाहर निकालने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम की नीतियों से कुछ सीख ली जा सकती है?
आर्थिक जानकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने यशवंत सिन्हा के लेख पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यशवंत सिन्हा ने जो कहा है, वो सच है।
उन्होंने कहा, ''साल 2008 में जब दुनिया भर में आर्थिक मंदी आई थी तो यूपीए सरकार में प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम ने सुझाव दिया कि हमें और पैसा खर्च करना है। इससे वित्तीय घाटा बढ़ गया था। आने वाला वक़्त बताएगा कि मोदी सरकार और उनके वित्त मंत्री यही रास्ता अपनाते हैं या नहीं।''
जानकारों का मानना है कि जब एक आर्थिक संकट आता है तो हर देश में सरकार अपना खर्च बढ़ाने की कोशिश करती है क्योंकि उस वक़्त बेरोज़गारी और निवेश की समस्या होती है। अगर निजी क्षेत्र निवेश नहीं करता है तो सरकार को निवेश करना होगा।
उन्होंने कहा, ''एक-डेढ़ साल में चुनाव आने वाले हैं। ज़्यादा वक़्त बाकी नहीं है। शायद उस समय सरकार ऐसा करेगी। जब ऐसा होता है तो वित्तीय घाटा बढ़ता है और मुद्रास्फ़ीति पर इसकी छाप दिखती है।''
आम आदमी इन दिनों पेट्रोल के दामों से परेशान है, लेकिन सरकार के लिए ये फ़ायदे का सौदा साबित हो सकता है।
ठाकुरता ने कहा, ''सरकार ने पेट्रोल का दाम बढ़ाकर राजस्व बढ़ा लिया है, ऐसे में उससे भी खर्च किया जा सकता है। समय बताएगा कि सरकार की क्या रणनीति है अर्थव्यवस्था की उन्नति के लिए। क्योंकि इस समय उसकी हालत बहुत ही ज्यादा ख़राब है।''
उन्होंने कहा कि सरकार के विरोधी तो पहले से यही कहते आ रहे थे। अब जब यशवंत सिन्हा जैसे बीजेपी से जुड़े लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया है तो लोगों को नज़र आने लगा है। ये बात सभी को पता थी कि क्या स्थिति चल रही है?
ठाकुरता के मुताबिक, अभी लेबर ब्यूरो का नया आंकड़ा आया है जिसमें कहा गया है कि स्वाधीन भारत में पहली बार बेरोज़गारी इतनी बढ़ गई है।
साल 2008 में सरकार ने घरेलू उपभोग बढ़ाया था और उसके लिए उसने पैसा खर्च किया। अपना सरकारी घाटा बढ़ाया। अलग-अलग कार्यक्रम शुरू किए गए। जिससे फ़ायदा हुआ, क्या दोबारा ऐसा होगा?
उन्होंने कहा, ''उस समय भी कहा गया था कि सरकारी घाटा बढ़ेगा तो उसका असर महंगाई पर होगा, लेकिन ये फ़ैसला हुआ कि ऐसा हो तो हो, लेकिन सरकार को अपना खर्च बढ़ाना ही होगा। शायद वही कहानी दोहराई जाएगी। आने वाले वक़्त में मोदी सरकार भी ऐसा ही कुछ कर सकती है।''
दूसरे जानकार भी मानते हैं कि सरकार को तुरंत कारोबार में भरोसा पैदा करना होगा। 'द वायर' के वरिष्ठ संपादक और आर्थिक पत्रकार एम के वेणु ने कहा कि साल 2008 का जो वित्तीय संकट था, वो वैश्विक था। उसका असर सभी जगह हुआ था। भारत में भी हुआ। क्योंकि अगर वैश्विक कारोबार और निवेश पर असर पड़ता है तो उसका असर भारत पर भी होता है क्योंकि वो उसका अहम हिस्सा है। हमारे यहां भी दबाव आया था। फ़ाइनेंशियल बाज़ार गिरा, शेयर बाज़ार लुढ़का, रियल्टी सेक्टर कमज़ोर हुआ, कारोबार पर काफ़ी असर हुआ।
उन्होंने कहा, ''मगर उस वक़्त भारत में जो नीति अपनाई गई, उसके दो अहम हिस्से थे। पहला, वित्तीय गियर लगाया गया। सरकार ने अपने खर्च बढ़ाए जिससे उपभोग का स्तर बनाए रखा जा सके। और दूसरा, रिज़र्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति में बदलाव किया। उसके ज़रिए राहत दी गई। बाज़ार को सस्ता पैसा मुहैया कराया गया।''
वेणु ने कहा, ''इन्हीं नीतियों की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था संभली रही और दुनिया भर में आई मंदी का उसका सीमित असर ही हुआ। साल 2008 में मंदी आई थी, लेकिन भारत ने साल 2009-10 और साल 2010-11 तक को ख़ुद को संभाले रखा।''
उन्होंने कहा कि उस मंदी का लंबा असर भी हुआ, ग्रोथ रेट भी गिरा, लेकिन इतना नहीं गिरा, जितना हम अब देख रहे हैं। जबकि जब मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी, तब वित्त मंत्री ने भी कहा था कि भारत बढ़िया स्थिति में है। तेल और मेटल के दाम गिर रहे थे, जिससे भारत को काफ़ी फ़ायदा हुआ। करंट अकाउंट डेफ़िसिट (चालू खाते का घाटा यानी निर्यात और आयात का अंतर) कम था।
एक तरह से देखें तो मोदी सरकार माकूल हालात का फ़ायदा नहीं उठा पाई। फ़ायदा क्यों नहीं उठा पाई, इसके जवाब में उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाने के बजाय इन्होंने ढांचागत सुधारों के नाम पर कुछ ऐसी चीज़ें कर दीं, जिनसे फ़ायदा नहीं हुआ।
जैसे काले धन से निपटने के नाम पर नोटबंदी की गई, जीएसटी भी जल्दबाज़ी में लागू किया गया। ऐसे में जो रिकवरी धीरे-धीरे हो रही थी, वो पूरी तरह रिकवर होने से पहले ये सारी चीज़ें आ गईं। इससे अर्थव्यवस्था को चोट पहुंची - ख़ास तौर से छोटे उद्योगों को नुकसान पहुंचा। इसका भी ख़ामियाज़ा भुगत रहे हैं।
मनमोहन सरकार की नीतियों से मोदी और जेटली क्या सीख सकते हैं, इस पर वेणु ने कहा, ''एक तो आरबीआई की ब्याज़ दरें अब भी ज़्यादा है। बैंकों को ज़्यादा पैसा मुहैया कराया जा सकता है। इससे फ़र्क पड़ सकता है। लेकिन दिक्कत ये है कि बैंकों की हालत भी ख़राब है। पिछली मंदी का सामना करने वाली कंपनियां उनका पैसा लौटा नहीं पा रही हैं जिससे उनका संकट भी बढ़ गया है।''
''50 कंपनियां ऐसी हैं जो 10 लाख करोड़ रुपए नहीं लौटा पा रही हैं। ऐसे में बैंकों को पैसा देना बहुत ज़रूरी हो गया है ताकि वो आगे पैसा दे सकें। पिछले आठ-महीने के दौरान आप देखेंगे कि बैंक पैसा नहीं दे रहे हैं। नोटबंदी के बाद सात-आठ महीने का दौर ऐसा रहा है जब बैंक कर्ज़ नहीं दे रहे। ये एक बड़ी समस्या है।''
उन्होंने बताया कि संगठित क्षेत्र के जिन आठ सेक्टरों के आंकड़े सरकार रखती है, उनमें 2011-12 तक 10 लाख अतिरिक्त नौकरियां थीं, वो गिरकर 1.5 लाख पर आ गई हैं। असंगठित क्षेत्र की तो बात ही छोड़ दीजिए जिन्हें काफ़ी चोट पहुंची है। सरकार को निजी उद्योगों में दोबारा जान फूंकनी होगी। ये एक चक्र है। बैंक अगर पैसा नहीं देगा, कारोबारों को भरोसा नहीं होगा, तो कैसे होगा। सरकार को बिज़नेस का कॉन्फ़िडेंस बढ़ाना होगा, ख़ास तौर से छोटे उद्योगों का।
इस साल जनवरी से मार्च के बीच छोटे उद्योगों की सेल्स में 58% की गिरावट आई है। अगर सेल्स में इतनी गिरावट आई है तो रोज़गार का क्या हाल होगा।
मौजूदा सरकार की दिक्कत ये है कि वो भारतीय अर्थव्यवस्था के डायनिमिक्स को समझने में गच्चा खा रही है। नोटबंदी से बड़े कारोबारियों के काले धन पर निशाना साधा गया था, लेकिन हुआ उल्टा।
वेणु ने कहा, ''छोटे कारोबारियों का काम कैश में होता था, उन्हें चोट पहुंची और इंडस्ट्रियल ग्रोथ में इनकी हिस्सेदारी क़रीब 40 फ़ीसदी है। इसका समाधान नहीं निकल सका है। किसानों का हाल देख लीजिए। रबी की फ़सल अच्छी रही, दालों का उत्पादन भी बढ़ा।लेकिन जब किसान मंडी गया, तो 50 फ़ीसदी कम दाम मिल रहा था। इसकी वजह ये है कि कैश ज़्यादा चलता था।''
''संघ परिवार के आर्थिक सलाहकार ने नोटबंदी को सही ठहराया था। लेकिन ये भी कहा था कि हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक कारोबार काम करते हैं, उन्हें गला पकड़कर डिजिटल नहीं बनाया जा सकता। बाज़ार की प्रक्रियाओं को धीमे-धीमे बदलकर ऐसा किया जा सकता है।''
अटल बिहारी सरकार में वित्त मंत्री रह चुके यशवंत सिन्हा ने मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है।
अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में लिखे लेख में उन्होंने कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था गर्त की ओर जा रही है। बीजेपी में कई लोग ये बात जानते हैं, लेकिन डर की वजह से कुछ कहेंगे नहीं।
इस लेख का शीर्षक 'I need to speak up now' (मुझे अब बोलना ही होगा) है। उन्होंने लिखा है, ''देश के वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था की हालत जो बिगाड़ दी है, ऐसे में अगर मैं अब भी चुप रहूं तो ये राष्ट्रीय कर्तव्य के साथ अन्याय होगा।''
यशवंत ने लिखा है, ''मुझे इस बात का भी भरोसा है कि मैं जो कुछ कह रहा हूं, यही बीजेपी के और दूसरे लोग मानते हैं, लेकिन डर की वजह से ऐसा कहेंगे नहीं।''
उन्होंने लिखा है कि अरुण जेटली को सरकार में बेस्ट माना जाता रहा है। साल 2014 चुनावों से पहले ये पता चल गया था कि वो नई सरकार में वित्त मंत्री होंगे। हालांकि वो अमृतसर से लोकसभा चुनाव हार गए थे, लेकिन ये बात भी उनकी नियुक्ति के आड़े नहीं आ सकी।
सिन्हा ने याद किया, ''अटल बिहारी वाजपेयी ने इन्हीं हालात में अपने करीबी सहयोगी जसवंत सिंह और प्रमोद महाजन को कैबिनेट में जगह नहीं दी थी।''
उन्होंने कहा कि मोदी सरकार में जेटली कितने ज़रूरी है, इस बात का पता इससे चलता है कि जेटली को चार मंत्रालय दिए गए, जिनमें से तीन अब भी उनके पास हैं।
सिन्हा ने लिखा है, ''मैं वित्त मंत्री रहा हूं इसलिए जानता हूं कि अकेले वित्त मंत्रालय में कितना काम होता है। कितनी मेहनत की जरूरत होती है। कितनी चुनौतियां होती हैं। हमें ऐसे शख़्स की ज़रूरत होती है, जो सिर्फ़ वित्त मंत्रालय का काम देखे। ऐसे में जेटली जैसे सुपरमैन भी इस काम को नहीं कर सकते थे।''
पूर्व वित्त मंत्री ने लिखा है कि अरुण जेटली कई मायनों में खुशकिस्मत वित्त मंत्री थे क्योंकि उन्हें माकूल हालात मिले, लेकिन सब बर्बाद कर दिया गया।
उन्होंने लिखा है, ''आज अर्थव्यवस्था की क्या हालत है? निजी निवेश गिर रहा है। इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन सिकुड़ रहा है। कृषि संकट में है, कंस्ट्रक्शन और दूसरे सर्विस सेक्टर धीमे पड़ रहे हैं, निर्यात मुश्किल में है, नोटबंदी नाकाम साबित हुआ और गफ़लत में लागू किए गए जीएसटी ने कइयों को डुबो दिया, रोज़गार छीन लिए। नए मौके नहीं दिख रहे।''
यशवंत सिन्हा के मुताबिक, ''तिमाही दर तिमाही ग्रोथ रेट धीमी पड़ रही है। सरकार के लोग कह रहे हैं कि इसकी वजह नोटबंदी नहीं है। वो सच कह रहे हैं। ये तो पहले से शुरू हो गया था। नोटबंदी ने आग में घी का काम किया।''
पूर्व वित्त मंत्री ने आगे भी अर्थव्यवस्था के धीमे पड़ने की तकनीकी वजह बताई हैं। साथ ही ये भी कहा है कि प्रधानमंत्री भी इस बात से चिंतित हैं।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी अरुण जेटली पर निशाना लगाने में ज़रा देर नहीं लगाई। टि्वटर पर यही लेख पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा, ''लेडीज़ एंड जेंटलमैन, मैं आपका को-पायलट और वित्त मंत्री बोल रहा हूं। अपनी सीट बेल्ट बांध लें और ब्रेस पोज़िशन में आ जाएं। हमारे विमान के पंख गायब हो गए हैं।''
ज़ाहिर है, यशवंत सिन्हा ने अरुण जेटली पर सीधा हमला बोला है, सो सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा शुरू हो गई। कांग्रेस ने भी इस लेख को हाथोंहाथ लपका।
यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम ने इस लेख को पढ़ने के बाद ट्वीट की झड़ी लगा दी।
उन्होंने लिखा, ''यशवंत सिन्हा ने सत्ता को सच बता दिया है। क्या अब सत्ता ये सच स्वीकार करेगी कि अर्थव्यवस्था डूब रही है। सिन्हा ने कहा, पहला सच: 5.7% का ग्रोथ रेट, दरअसल 3.7% या उससे कम है। दूसरा सच: लोगों के दिमाग में डर भरना नए खेल का नाम है।''
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी ने एक वीडियो पोस्ट करके कहा, ''सिन्हा सही कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था मुशिकल में है। मोदी की अगुवाई में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने भारतीय अर्थव्यवस्था को डुबो दिया है। किसी को तो शहंशाह को बताना था कि क्या हो रहा है और यशवंत सिन्हा ने ठीक यही किया है।''

वाराणसी के कमिश्नर नितिन रमेश गोकर्ण ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में छात्राओं पर लाठीचार्ज की घटना पर सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी है।
डिविज़नल कमिश्नर गोकर्ण ने बताया, ''कई लोगों ने उनके समक्ष आकर ये बयान दिया है कि ये घटना किस तरह हुई।''
बीएचयू की छात्राएं छेड़छाड़ के विरोध में प्रदर्शन कर रही थीं।
उन्होंने कहा, ''बयान के मुताबिक़ घटना हुई थी और लड़की के साथ छेड़छाड़ भी हुई थी।
कमिश्नर गोकर्ण ने कहा, ''लड़कियों ने इस संबंध में जानकारी परिसर में तैनात पुलिसकर्मियों को दी गई थी, लेकिन उन्होंने उचित कार्रवाई नहीं की। इसके चलते लड़कियों में आक्रोश बढ़ गया। इसके साथ ही उन्हें उनकी मांगों को लेकर भी पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं मिली।''
बीएचयू कैंपस के बाहर छात्राएं शुक्रवार से छेड़छाड़ के विरोध में धरने पर बैठी थीं। इसके बाद शनिवार शाम को पुलिस ने लाठीचार्ज किया।
बीएचयू में हुई हिंसा और तनाव पैदा होने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने दशहरा अवकाश अकादमिक कैलेंडर से एक दिन पहले ही घोषित कर दिया।
बनारस के बीएचयू में छात्राओं के साथ छेड़खानी, कमेंट्स और उन पर गंदी टिप्पणियां कैम्पस लाइफ का हिस्सा बन चुकी है।
कई छात्राओं ने इसे रोज की रुटीन का हिस्सा मान लिया है और वे इसे सहन करती हैं, नजरअंदाज करती हैं।
कुछ मुखर लड़कियां इस अत्यातार के खिलाफ आवाज भी उठाती हैं, लेकिन बीएचयू कैंपस के आस-पास ये घटनाएं रोजाना की जिंदगी में शामिल हो चुकी हैं।
बीएचयू कैंपस में लड़कियों की छेड़खानी के लिए शोहदों ने बकायदा एक टर्म बना लिया है और इसे 'लंकेटिंग' के नाम से जाना जाता है।
लंकेटिंग शब्द बीएचयू के सिंह द्वार गेट के पास स्थित लंका बाजार के नाम पर बना है। बीएचयू कैंपस के आसपास घुमने वाले गुंडे किस्म के लोग लड़कियों को तंग और परेशान करने के लिए लंकेटिंग शब्द का इस्तेमाल करते हैं।
लंका बाजार में कैफे, नाश्ते की दुकानें और बड़ी संख्या में कपड़े की दुकाने हैं। इन इलाकों में बाइक पर सवार लफंगे छात्राओं और महिलाओं का पीछा करते, उन पर अश्लील कमेंट्स करते नजर आ जाएंगे।
बीएचयू के एक मात्र वूमेंस कॉलेज महिला महाविद्यालय के आस पास भी ऐसे सड़क छाप मजनुओं की भरमार दिखती है। इन घटनाओं की वजह से इस इलाके में अक्सर झगड़े और मार पीट होते रहते हैं।
नाम ना बताने की शर्त पर एक छात्रा ने कहा कि जब भी हम इस बाजार की ओर जाते हैं। हम ग्रुप बनाकर निकलते हैं या फिर अपने साथ किसी लड़के को लेकर जाते हैं। इन इलाकों में छेड़खानी की आशंका हर वक्त रहती है।
कुछ और छात्राओं का कहना है कि वे ऐसी घटनाओं को बर्दाश्त कर जाती हैं क्योंकि इन वाकयों को रिपोर्ट करने पर उलटे बदनामी का खतरा रहता है।
गुजरात में राहुल गाँधी इस बार नरेंद्र मोदी पर भारी पड़ सकते हैं।
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सोमवार से तीन दिन के गुजरात दौरे पर हैं। राहुल गांधी सबसे पहले द्वारका में श्री कृष्ण मंदिर गए।
द्वारकाधीश के दर्शन के बाद पुरोहित ने उन्हें दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी के हस्ताक्षरयुक्त संदेश दिखाए।
इन संदेशों के साथ कांग्रेस की ओर से ट्वीट किया गया कि राहुल गांधी ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है।
राहुल पार्टी के चुनाव प्रचार के तहत सड़क के रास्ते सौराष्ट्र का दौरा करेंगे। इस दौरान राहुल गांधी कई रोड शो, जनसभाएं करेंगे। यहां राहुल किसानों से भी मिलेंगे।
राहुल गांधी 26 सितंबर को राजकोट में व्यवसायियों और उद्योगपतियों से मिलेंगे। गुजरात में इस साल के अंत में होनेवाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र राहुल गांधी का ये दौरा बेहद अहम माना जा रहा है।
राहुल गांधी के चुनावी मुहिम की शुरुआत द्वारकाधीश से करने के पीछे की वजह को गुजरात की धार्मिक परंपरा से जोड़कर देखा जा सकता है। गुजरात के संदर्भ में ये परंपरा ये रही है कि यहां किसी अच्छी चीज़ की शुरुआत धार्मिक स्थान से की जाती है।
जिस तरीके से उत्तर भारत में जयश्रीराम कहने की परंपरा है, वैसे ही गुजरात में जयश्रीकृष्ण। गुजरात में जबसे बीजेपी सियासत में आगे आई है, तभी से उसने इसे धर्म के साथ आगे बढ़ाया है।
विश्व हिंदू परिषद ने शहरों से लेकर गांवों तक एक नेटवर्क फैला दिया था जिसे 'पगपाड़ा संघ' यानी पैदल चलकर जाना कहा जाता था। किसी धार्मिक कार्यक्रम में लोग पैदल ही निकल पड़ते हैं।
दरअसल, कांग्रेस ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वो भी धार्मिक महत्व को स्वीकार करती है। जिस तरह से गुजरात के सामाजिक ताने-बाने में धर्म शामिल है, उसे कोई भी राजनीतिक दल नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। यही वजह है कि राहुल गांधी सौराष्ट्र के तीन दिनों के दौरे पर कई मंदिरों में जाएंगे।
मंदिरों में जाने का कांग्रेस के परंपरागत मुसलमान वोटर्स में कैसा राजनीतिक संदेश जाएगा, इस पर अभी अटकलें नहीं लगाई जानी चाहिए।
अभी तो राहुल गांधी ने अपनी यात्रा की शुरुआत की है। अपनी यात्रा के दौरान कांग्रेस मुसलमानों को भी ये संदेश ज़रूर देगी कि उन्हें भुलाया नहीं गया है।
गुजरात में मुसलमान सशक्त वोट बैंक हैं और बेशक उनकी काफ़ी अहमियत है।
चुनावी बिसात की बात करें तो कांग्रेस के लिए इससे बेहतर स्थिति तो पिछले 20 सालों में कभी नहीं थी। आने वाले चुनावों में बीजेपी के ख़िलाफ़ एंटी इनकम्बेंसी समेत कई फ़ैक्टर हैं। लोगों में निराशा का वातावरण है और जिस तरह से बीजेपी सरकार क़दम उठा रही है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि बीजेपी बैकफ़ुट पर है।
सौराष्ट्र वैसे भी गुजरात की राजनीति में बेहद अहम रहा है। गुजरात की कुल 182 में से 58 सीटें इस क्षेत्र से हैं। नरेंद्र मोदी के गुजरात से दिल्ली चले जाने के बाद 2015 में हुए 11 में से 8 ज़िला पंचायतों में कांग्रेस विजयी रही थी।
हालांकि ये भी सही है कि ये वो दौर था, जब गुजरात में पाटीदारों का आंदोलन चल रहा था।
सौराष्ट्र का इलाक़ा किसानों का है। पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने बड़ी मेहनत से इस इलाक़े में बीजेपी को मज़बूत बनाया है। लेकिन आज इन क्षेत्रों में असंतोष का माहौल है।
किसान, दलित और पाटीदारों में असंतोष दिखता है। राहुल की यात्रा से बीजेपी में कितना हड़कंप है। इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राहुल गांधी की यात्रा से ठीक एक दिन पहले गुजरात सरकार ने मूंगफली की ख़रीद कीमत 600 रुपये से बढ़ाकर 900 रुपये प्रति क्विंटल कर दी। तो कहीं न कहीं बीजेपी किसानों के असंतोष से डरी हुई है।
अब सोशल मीडिया का ही हाल ले लें। जिस सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर बीजेपी ने 2012 का गुजरात विधान सभा चुनाव और 2014 का लोक सभा चुनाव जीता था, उसी सोशल मीडिया से अब बीजेपी पर हमले हो रहे हैं।
यही वजह है कि अरुण जेटली को गुजरात का दो बार दौरा करना पड़ा और कार्यकर्ताओं को सोशल मीडिया पर सतर्क और तैयार रहने को कहना पड़ा।
पटेल आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हार्दिक पटेल ने भी ट्वीट करके राहुल गांधी का स्वागत किया है।
हार्दिक पटेल ने लिखा है कि 'कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल जी का गुजरात में हार्दिक स्वागत है। जय श्री कृष्णा।'
पाटीदार और हार्दिक पटेल को लेकर भी बीजेपी के अंदर घबराहट या अफ़रातफरी का माहौल है। अभी 15 दिन पहले तक हार्दिक पटेल के ख़िलाफ़ केस किए जा रहे थे, अब स्थिति ये है कि गुजरात की बीजेपी सरकार पाटीदारों से हर हाल में समझौता करना चाह रही है।
मंगलवार को पाटीदारों के संगठनों की बैठक बुलाई गई है जिसमें सरदार पटेल ग्रुप और पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के लोगों को भी बुलाने का भी दबाव बनाया जा रहा है।
कुल मिलाकर बीजेपी की रणनीति गुजरात में अब मतदाताओं को बांटने की है। बीजेपी कुल मिलाकर मोदी और ओबीसी पर दांव लगा रही है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल कि गुजरात के विधान सभा चुनाव में बीजेपी जीत पायेगी ! गुजरात में बीजेपी के बुरे हालत को देख कर तो ऐसा लगता है कि बीजेपी गुजरात का चुनाव हार जाएगी।
एक प्रारंभिक जांच में पता चला है कि राजस्थान के पोखरण में इस माह की शुरुआत में सेना की लंबी दूरी की बेहद हल्की (यू एल एच) हॉवित्जर एम-777 तोप के फील्ड परीक्षण के दौरान जो विस्फोट हुआ था उसका कारण खराब गोलाबारूद था।
दो सितंबर को अमेरिका निर्मित तोप की नली उस वक्त फट गई थी, जब इसमें भारतीय गोलाबारूद का परीक्षण किया जा रहा था।
सूत्रों ने बताया कि प्रारंभिक जांच में पता चला है कि यह विस्फोट आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की ओर से खराब गोलाबारूद आपूर्ति करने के कारण हुआ था। इस मामले में आगे की जांच जारी है।
आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के प्रवक्ता उद्दीपन मुखर्जी ने कहा, ''ऐसी किसी प्रकार की असफलता आंतरिक बैलेस्टिक से जुड़ी किसी जटिल घटना के कारण हो सकती है क्योंकि नली के अंदर गोला बेहद तेज गति से घूमता है।''
उन्होंने कहा कि केवल गोले की गुणवत्ता ही एक कारण नहीं है बल्कि कई कारणों से इस प्रकार की चूक हो सकती हैं।
जांच के निष्कर्षों के बारे में कोई खास टिप्पणी किए बगैर उन्होंने कहा कि एम-777 तोप में इस्तेमाल किए गए गोले का गुणवत्ता परीक्षण किया गया था।
गौरतलब है कि बोफोर्स घोटाले का खुलासा होने के करीब 30 वर्ष बाद भारत को मई में दो बेहद हल्की हॉवित्जर तोपें मिली थीं। प्रति तोप इनकी कीमत 35 करोड़ रूपए थी और इन्हीं में से एक तोप के परीक्षण के दौरान दुर्घटना हुई थी।
सेना के सूत्रों ने बताया कि विस्फोट में तोप की बैरल क्षतिग्रस्त हो गई थी।
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में छेड़खानी के ख़िलाफ़ छात्राओं का आंदोलन उग्र हो गया है। शनिवार देर शाम पुलिस ने लाठीचार्ज कर छात्रों को धरनास्थल से हटाया जिसके बाद छात्रों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं।
कई वाहनों को आग लगा दी गई है। स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए बड़ी तादाद में सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं।
पुलिस ने यूनिवर्सिटी के हॉस्टलों में सर्च अभियान भी चलाया है।
छात्र आंदोलन के हिंसक होने के बाद यूनिवर्सिटी को दो अक्टूबर तक के लिए बंद कर दिया गया है।
स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए बड़ी तादाद में सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं।
छात्रों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल भी किया।
लाठीचार्ज के बाद गुस्साए छात्रों ने कई वाहनों को आग लगा दी जिसमें पुलिस और पत्रकारों के वाहन भी शामिल हैं।
वरिष्ठ अधिकारियों और पत्रकारों के साथ भी छात्रों की झड़पें हुई हैं।
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में शुक्रवार को छात्राओं ने छेड़खानी के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरू किया था।
छात्राओं का आरोप है कि यूनिवर्सिटी परिसर में छात्राओं की सुरक्षा के पुख़्ता इंतेज़ाम नहीं है और छेड़छाड़ आम बात है।
छात्राओं का ये भी आरोप है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन छेड़खानी की शिकायतों को गंभीरता से लेने के बजाए छात्राओं पर ही सवाल उठाता है।
बीजेपी और आरएसएस की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ए बी वी पी) को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र संघ चुनावों में भी हार का सामना करना पड़ा है।
यहां सभी सीटों पर एबीवीपी हार गई है, जबकि विपक्षी मोर्चा अलायंस फॉर सोशल जस्टिस (ए एस जे) को सभी सीटों पर जीत मिली है।
इससे पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनावों में भी एबीवीपी को दो सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था। वहां कांग्रेस की छात्र इकाई एन एस यू आई को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर जीत मिली थी।
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव शुक्रवार (22 सितंबर) को हुए थे और देर रात उसके नतीजे आए।
चुनाव जीतने वालों में अलायंस फॉर सोशल जस्टिस के तीन दलित, दो मुस्लिम और एक आदिवासी उम्मीदवार हैं।
अलायंस फॉर सोशल जस्टिस दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक छात्रों के साथ-साथ लेफ्ट संगठनों का एक गठबंधन है।
हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में चुनाव उस वक्त हुए हैं, जब साल भर पहले ही दलित छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी सुर्खियों में थी।
अलायंस फॉर सोशल जस्टिस के बैनर तले अंबेडकर स्टूडेन्ट्स यूनियन के श्रीराग पोइकदन हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी छात्र संघ के नए अध्यक्ष चुने गए हैं।
श्रीराग ने एबीवीपी के करण पलसानिया को 170 वोटों से हराया।
महासचिव पद पर स्टूडेन्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के आरिफ अहमद की जीत हुई है। उन्होंने एबीवीपी के किरण कुमार को 409 वोटों से हराया, जबकि मुस्लिम स्टूडेन्ट्स फेडरेशन के मुहम्मद आशिक ने संयुक्त सचिव पद पर एबीवीपी उम्मीदवार रानी को 281 वोटों से हराया है।
दलित छात्र संघ के प्रतिनिधि की जीत सांस्कृतिक और खेल सचिव पद पर भी हुई है।
एक आदिवासी छात्र लुनावाथ नरेश की जीत छात्र संघ उपाध्यक्ष के पद पर हुई है। उसने एबीवीपी उम्मीदवार अपूर्वा को 261 वोटों से हराया।
हालांकि, इस पद के चुनाव नतीजे अभी स्थगित रखे गए हैं क्योंकि विजेता के अटेंडेंस से संबंधित कुछ शक जताए गए थे।
बता दें कि अलायंस फॉर सोशल जस्टिस गठबंधन में स्टूडेन्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, अंबेडकर स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन, दलित स्टूडेन्ट्स यूनियन, ट्राइवल स्टूडेन्ट्स फोरम, स्टूडेन्ट्स इस्लामिक आर्गेनाईजेशन, मुस्लिम स्टूडेन्ट्स फेडरेशन और तेलंगाना विद्यार्थी वेदिका शामिल थे।
भारत के पी एम नरेंद्र मोदी के वाराणसी दौरे से एक दिन पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में गुरुवार (21 सितंबर) को एक छात्रा से छेड़छाड़ के बाद यहां छात्राओं में जबरदस्त आक्रोश है।
आरोप है कि गुरुवार शाम छह बजे तीन युवाओं ने छात्रा से छेड़छाड़ और उत्पीड़न किया। पीड़िता की पहचान फाइन आर्ट्स प्रथम वर्ष की छात्रा के रूप में की गई है।
घटना के बाद छात्र-छात्राओं ने प्रशासन के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर कर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
खबर है कि बीती शुक्रवार रात से करीब 200 छात्र-छात्राएं प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और विश्वविद्यालय के कुलपति से मामले में अपना पक्ष रखने को कहा है।
द क्विंट की खबर के अनुसार, इस मामले में विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने बताया कि गुरुवार शाम करीब छह बजे बाइक सवार तीन युवाओं ने उनकी दोस्त को छेड़ा और कुर्ते के अंदर हाथ डालने की कोशिश की। जब आरोपियो के खिलाफ शिकायत की तो उलटे पीड़िता से ही सवाल पूछा गया और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए। जबकि छात्रा ने बताया था कि उसके साथ क्या हुआ है।
खबर के अनुसार, पीड़िता ने छात्रावास जाकर अन्य छात्राओं को घटना की जानकारी दी। जिसपर सभी छात्राओं ने बड़े पैमाने पर कुलपति के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने का फैसला लिया।
छात्राओं का कहना है कि वो इस बात से बहुत खुश है कि इस मुहिम में विश्वविद्यालय के छात्र भी उनके साथ हैं।
खबर के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि कुलपति आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें और छात्राओं की सुरक्षा पुख्ता करें।
वहीं छात्राओं ने मामले में लिखित शिकायत भी की है।
चीफ प्रोटेक्टर को लिखे पत्र में कहा गया है, ''छात्राओं को आए दिन अनेक सुरक्षा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। छात्रावास आने-जाने का मार्ग भी सुरक्षित नहीं है।
आए दिन छेड़खानी होती रहती हैं। यहां तक अंतर्राष्ट्रीय छात्राओं को भी ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
लड़के छात्रावास के बाहर आकर आपत्तिजनक हरकतें करते हैं।
वो हस्तमैथुन करते हैं। पत्थर फेंकते हैं। छात्राओं के खिलाफ आपत्तिनजक शब्द बोलते हुए निकलते हैं।''
ये लेटर वायरल हो रहा है, जिसमें ऐसा कहा गया है। हालांकि, प्रमाणिकता की पुष्टि नहीं हो पाई है।
दूसरी तरफ बीएचयू की अन्य छात्राओं का आरोप है कि यहां छात्राओं को सुरक्षा बहुत कम दी जाती है। यहां उत्पीड़न बहुत ही आम बात है। आमतौर पर छात्राओं को रोज ऐसी परिशानियों से गुजरना पड़ता है। इस वजह से बहुत सी छात्राएं पढ़ाई पूरी करने से पहली ही जा चुकी हैं। ये बात एक छात्रा ने कही है।










