यूरोप समेत दुनिया के कई देशों में कुछ संगठनों पर साइबर हमला हुआ है।
इन साइबर हमलों के बाद कंप्यूटर्स ने काम करना बंद कर दिया। प्रभावित कई संगठनों ने कंप्यूटर्स के लॉक होने और बिटकॉइन की मांग करने वाले स्क्रीनशॉट्स साझा किए हैं।
ब्रिटेन, अमरीका, चीन, रूस, स्पेन, इटली, वियतनाम और कई अन्य देशों में रेनसमवेयर साइबर हमलों की खबर है।
साइबर एक्सपर्ट इन घटनाओं को एक साथ जोड़कर देख रहे हैं।
एक साइबर सुरक्षा शोधकर्ता ने ट्वीट किया कि उन्होंने इसके बदले में बिटकॉइन मांगने के 36,000 मामलों का पता लगाया है। ये वानाक्राइ या इससे मिलते-जुलते नाम से किए गए हैं। उन्होंने कहा, ''ये बहुत बड़ा है।''
ब्रिटेन की नेशनल हेल्थसर्विस (एनएचएस) भी रेनसमवेयर से बुरी तरह प्रभावित हुई है।
हैकर्स ने ब्रिटेन की हेल्थ सर्विस से जुड़े कंप्यूटरों को निशाना बनाया है।
एनएचएस के कर्मचारियों ने वानाक्राइ के प्रोग्राम के स्क्रीनशॉट्स साझा किए हैं।
समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक, इंग्लैंड के कई अस्पतालों का कहना है कि उन्हें अपने कंप्यूटर खोलने में परेशानी हो रही है। जो कंप्यूटर्स हैक हुए हैं उन्हें खोलने पर एक मैसेज दिखाई दे रहा है जिसमें कहा गया है कि फ़ाइल रिकवर करना चाहते हो तो पैसे चुकाने होंगे।
रेनसमवेयर एक कंप्यूटर वायरस है जो कंप्यूटर्स फ़ाइल को बर्बाद करने की धमकी देता है। धमकी दी जाती है कि यदि अपनी फ़ाइलों को बचाना है तो फीस चुकानी होगी।
ये वायरस कंप्यूटर में मौजूद फ़ाइलों और वीडियो को इनक्रिप्ट कर देता है और उन्हें फिरौती देने के बाद ही डिक्रिप्ट किया जा सकता है।
ख़ास बात ये है कि इसमें फिरौती चुकाने के लिए समयसीमा निर्धारित की जाती है और अगर समय पर पैसा नहीं चुकाया जाता है तो फिरौती की रकम बढ़ जाती है।
ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन की वेबसाइट हैक होने का मामला सामने आया है। उस वेबसाइट पर हैकर्स ने कुलभूषण जाधव और भारत के खिलाफ मैसेज पोस्ट किए।
पोस्ट में लिखा गया है कि भारत जाधव को वापस मांग रहा है, लेकिन पाकिस्तान भारत को उसकी डेड बॉडी भेजेगा।
हैकर्स ने मैसेज के साथ कुलभूषण जाधव की तस्वीर और फांसी का फंदा भी लगाया था।
फिलहाल वेबसाइट को ठीक कर लिया गया है।
बता दें कि इंटरनेशनल कोर्ट ने पाकिस्तान में भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव की फांसी की सजा पर रोक लगाने को कहा है। जाधव को पाकिस्तान में जासूसी और विध्वसंक गतिविधियों के आरोप में फांसी की सजा सुनाई गई है।
भारत ने जाधव को फांसी के खिलाफ अंतराष्ट्रीय अदालत में अपील की थी।
मंगलवार देर रात मिली खबर के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत ने भारतीय नागरिक जाधव की फांसी की सजा की तामील पर स्टे दिया।
हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत (आइसीजे) ने भारत की ओर से यह कहे जाने के बाद कि नौसेना से सेवानिवृत्त होने के बाद व्यवसाय कर रहे जाधव का ईरान से अपहरण किया गया था, उन्हें मिली फांसी की सजा की तामील पर स्थगन लगा दिया है।
कुलभूषण जाधव को मार्च 2016 में जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसी महीने उन्हें मौत की सजा सुनाई गई है जिसकी पुष्टि खुद पाकिस्तान सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा ने की पुष्टि थी।
कुलभूषण जाधव भारतीय नौसेना के रिटायर्ड अधिकारी हैं, लेकिन पाकिस्तान ने उन पर रॉ का खुफिया एजेंट होने के आरोप लगाए।
रिपोर्टों के मुताबिक, कुलभूषण जाधव पर पाकिस्तान का दावा है कि वह हुसैन मुबारक पटेल के नाम से बलूचिस्तान इलाके में ईरान की सीमा से दाखिल हुए थे।
नाइजीरिया के राष्ट्रपति ने कहा है कि इस्लामी चरमपंथी समूह बोको हराम ने जिन लड़कियों का अपहरण किया था उनमें से एक चिबोक लड़की ने आज़ाद होने से इनकार कर दिया है।
उनका कहना है कि लड़की ने आज़ाद होने की बजाय अपने पति से साथ रहना चुना है। ये शनिवार को बोको हराम की चुंगल से छुड़ाई गई लड़कियों में से एक हैं।
नाइजीरिया के राष्ट्रपति मोहमदू बुहारी के प्रवक्ता गार्बा शेहू ने स्थानीय टीवी चैनल्स को बताया कि उस लड़की ने कहा, ''मैं जहां हूं वहीं खुश हूं। मुझे पति मिल गया है।''
बोको हराम ने तीन साल पहले नाइजीरिया के उत्तर पूर्वी इलाके से 276 लड़कियों को अगवा किया था। इस इलाके में बगावत के दौरान बोको हराम ने कई और लोगों को भी अगवा किया था।
सरकार इस बात पर राज़ी हुई थी कि इनके बदले वो पकड़े गए बोको हराम के कुछ सदस्यों को रिहा करेगी। लेकिन कितने सदस्यों को छोड़ा जाना है इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।
माना जा रहा है कि सौ से अधिक लड़कियां अब भी चरमपंथियों की क़ैद में हैं।
ऐसी ख़बरे हैं कि जो लड़कियां अगवा की गई थीं उनमे से कुछ ने बोको हराम के लड़ाकों से शादी कर ली और अब उनके बच्चे भी हैं।
चिबोक लड़कियों के माता-पिता को धीरे-धीरे उनकी बेटियों के बारे में बताया जा रहा है।
सरकार ने लड़कियों के नाम ट्विटर पर पोस्ट किए हैं, लेकिन चिबोक में सोशल मीडिया की पहुंच सब लोगों तक नहीं है।
गार्बा शेहु का कहना है कि लड़कियों की पहचान की जा रही है ताकि जल्द से जल्द उन्हें उनके परिवारों से मिलाया जा सके।
ब्रिंगबैकअवरगर्ल्स अभियान की संयोजक आयशा यसुफू ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया कि वो इन लड़कियों के उनके माता-पिता से मिलाने के काम में जुटे हुए हैं।
भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान में फांसी की सज़ा सुनाए जाने के मामले में भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है।
भारतीय समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने इस मामले में पाकिस्तान से ये सुनिश्चित करने को कहा है कि कुलभूषण सुधीर जाधव को सभी विकल्पों पर विचार करने से पहले फांसी न दी जाए। हालांकि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की तरफ़ से इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है।
पाकिस्तान की मीडिया में भी कहा जा रहा है कि भारतीय मीडिया कुलभूषण जाधव की फांसी रोके जाने की ख़बर को ग़लत रिपोर्ट कर रही है।
पाकिस्तान सरकार की तरफ़ से भी इस पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ज़रूर ट्वीट कर कहा है कि उन्होंने आईसीजे के प्रेसिडेंट के ऑर्डर के बारे में कुलदीप जाधव की मां को जानकारी दी है।
भारतीय अख़बार 'द हिंदू' ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के प्रेसिडेंट रॉन अब्राहम के हवाले से लिखा है कि उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को निर्देश दिया है कि वो भारत की अपील पर गौर करें और जब तक न्यायालय मामले पर सुनवाई नहीं कर लेता और आदेश पारित नहीं कर देता, तब तक कुलभूषण जाधव की फांसी पर रोक रहेगी।
पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने जाधव को जासूसी और विध्वंसक गतिविधियों में शामिल होने के मामले में फांसी की सज़ा सुनाई है।
कुलभूषण जाधव अभी भी पाकिस्तान की जेल में बंद हैं।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की तरफ़ से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कहा कि फांसी के ख़िलाफ़ अपील करने के लिए बहुत कम समय है और पाकिस्तान में सभी विकल्प पर विचार करने के लिए भी समय नहीं है।
भारत ने 15 से ज़्यादा बार कुलभूषण जाधव को क़ानूनी मदद देने के लिए कॉन्सुलर एक्सेस की मांग की है, लेकिन पाकिस्तान ने अभी तक इसकी मंज़ूरी नहीं दी है।
कुलभूषण जाधव की मां भी पाकिस्तान से कुलभूषण की सज़ा पर फिर से विचार करने की अपील कर चुकी हैं।
जाधव की मां ने पाकिस्तान सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप का आग्रह किया था। इसके साथ ही उन्होंने अपने बेटे से मिलने की इच्छा जताई थी।
भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट कर कहा है कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भारत की अपील और आईसीजे के प्रेसिडेंट के ऑर्डर के बारे में कुलभूषण जाधव की मां को जानकारी दी है।
उन्होंने ये भी कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे अदालत में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में अपनी अपील में कहा था कि कुलभूषण जाधव को ईरान में अगवा किया गया था जहां वो भारतीय नौसेना से रिटायर होने के बाद व्यापार कर रहे थे।
भारत ने इस अपील में कहा है कि उसे कुलभूषण को फांसी की सज़ा सुनाने के बारे में जानकारी प्रेस रिलीज़ से मिली थी।
वहीं पाकिस्तान ने पिछले साल तीन मार्च को बलूचिस्तान से उनकी गिरफ्तारी दिखाई है और इसके बारे में भारत को 25 मार्च 2016 को इस बारे में आधिकारिक जानकारी दी गई।
भारत ने उसी वक्त कॉन्सुलर एक्सेस की मांग की थी, लेकिन पाकिस्तान ने इनकार कर दिया था।
वहीं भारत ने अदालत को बताया है कि 23 जनवरी 2017 को पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव के कथित तौर पर पाकिस्तान में जासूसी और चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के मामले की जांच में मदद मांगी थी और कहा था कि कॉन्सुलर एक्सेस की मांग पर विचार करते हुए भारत की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखा जाएगा।
भारत का दावा है कि जांच में मदद मांगने को कॉन्सुलर एक्सेस की मांग से जोड़ना विएना कन्वेशन के ख़िलाफ़ है।
अंतरराष्ट्रीय अदालत में भारत ने अपील की है कि सैन्य अदालत ने जो सज़ा सुनाई है उसपर पाकिस्तान अमल न करे और सैन्य अदालत के फ़ैसले को निरस्त करने के लिए पाकिस्तान के कानून के मुताबिक क़दम उठाए।
मध्यमार्गी एमानुएल मैक्रोन फ्रांस के नए राष्ट्रपति होंगे। रविवार (सात मई) को फ्रांस में हुए राष्ट्रपति चुनाव में मैक्रोन ने धुर दक्षिणपंथी मरीन ली पेन को हराया।
नवनिर्वाचित राष्ट्रपति 39 वर्षीय पूर्व इन्वेस्टमेंट बैंकर मैक्रोन आज तक कभी किसी निर्वाचित पद पर नहीं रहे हैं। इस चुनाव को जीतकर फ्रांस के इतिहास में सबसे कम उम्र में चुनाव जीतने वाले राष्ट्रपति बन गये हैं।
राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद मैक्रोन ने कहा कि वो 'देश के अंदरूनी विभाजन' के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे।
मैक्रोन ने कहा, ''मैंने आप लोगों के क्रोध, तनाव और संदेहों को सुना है।''
पेरिस स्थित अपने पार्टी के मुख्यालय से मैक्रोन ने कहा, वो 'यूरोप और इसके नागरिकों के साथ लिंक को दोबारा जोड़ेंगे।'
मैक्रोन ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में फ्रांस अगली कतार में रहेगा।
चुनाव जीतने के बाद एक अन्य रैली में मैक्रोन ने कहा कि वो अगले पांच साल में वो सब करेंगे जिससे जनता को अतिवादियों को वोट न देना पड़े।
मैक्रोन ने जून में फ्रांस के निचले सदन के लिए होने वाले चुनाव में बहुमत प्राप्त करने की कोशिशें शुरू कर देने का भी संकेत किया।
फ्रांस के चुनाव में सबसे ज्यादा दिलचस्प बात ये रही कि देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों के राष्ट्रपति उम्मीदवार पहले ही दौड़ से बाहर हो गये थे। मरीन ली पेन की लोकप्रियता पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी थी जिससे इस बात की आशंका बढ़ गयी थी कि कई अन्य देशों की तरह फ्रांस में भी धुर दक्षिणपंथी पार्टी सत्ता में आ सकती है।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 65. 30 प्रतिशत मतदान हुआ है जो 2012 के राष्ट्रपति चुनाव से 6. 6 फीसदी कम है और 23 अप्रैल को हुए प्रथम चरण के चुनाव से चार फीसदी कम है। इस चुनाव में यूरोप समर्थक एवं कारोबार समर्थक मैक्रोन तथा आव्रजन विरोधी एवं यूरोपीय संघ विरोधी मरीन ली पेन के बीच मुकाबला था।
दोनों ही बिल्कुल अलग नजरिए वाले हैं और पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों के बीच के विभाजन को रेखांकित करते हैं। मैक्रोन 23 अप्रैल के प्रथम दौर के चुनाव में शीर्ष पर रहे थे। मरीन ली पेन ने इस चुनाव को मुक्त व्यापार, आव्रजन अैर साझा संप्रभुता के पक्षधर 'भूमंडलीकरण समर्थकों' और मजबूत सीमाओं और राष्ट्रीय पहचान की वकालत करने वाले राष्ट्रवादियों के बीच का मुकाबला बताया था।
दोनों उम्मीदवार नतीजे देखने के लिए पेरिस पहुंच हुए थे। मतदान की प्रक्रिया 66,546 मतदान केंद्रों पर भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े ग्यारह बजे शुरू हुई । इनमें से अधिकतर मतदान केंद्र रात साढ़े दस बजे बंद कर दिए गए, जबकि बड़े शहरों के केंद्र एक घंटा अधिक समय तक खुले हुए थे।
गौरतलब है कि 23 अप्रैल को हुए पहले दौर के चुनाव में मैक्रोन को 24.01 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि मरीन ली पेन को 21. 30 प्रतिशत मत मिले थे।
संयुक्त राष्ट्र की 30 वर्ष पुरानी यातना रोधी संधि के अनुमोदन में भारत अब भी पाकिस्तान समेत 161 देशों से पीछे खड़ा है। संधि के तहत वर्ष 1997 में हस्ताक्षर करने के बावजूद भारत अब तक इस संदर्भ में कानून नहीं बना पाया है।
भारत दुनिया के उन चुनिंदा नौ देशों में शामिल है जिसने अब तक इस अहम संधि का अनुमोदन नहीं किया है जो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधि के अनुमोदन के मकसद से हस्ताक्षरकर्ता देश के लिये आवश्यक है।
उच्चतम न्यायालय ने इस तथ्य पर कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार से पूछा कि आखिर सरकार ने मामले में कानून बनाने की मंशा से अब तक कम से कम नेक इरादे से अपनी प्रतिबद्धता ही क्यों नहीं दर्शायी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, ''हम समझते हैं कि कानूनी प्रक्रिया में समय लग सकता है, लेकिन आप (केंद्र) हमें बताइये कि आखिर कानून बनाने को लेकर आपने अब तक हमारे समक्ष नेक इरादे वाली अपनी प्रतिबद्धता ही क्यों नहीं जाहिर की।''
खेहर की अध्यक्षता वाली न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ तथा न्यायमूर्ति एस के कौल की पीठ ने कहा, ''इसमें कोई विवाद नहीं है कि राष्ट्रीय हित और इससे परे यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है।''
पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब कांग्रेस नेता एवं पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा नौ देशों में शामिल है जिन्होंने संधि पर हस्ताक्षर करने के बावजूद अब तक इसका अनुमोदन नहीं किया है।
संयुक्त राष्ट्र यातना रोधी संधि के नाम से विख्यात 'यातना एवं अन्य क्रूरता, अमानवीय या अपमानजनक बर्ताव अथवा सजा रोधी संधि' एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधि है जिसका लक्ष्य दुनियाभर में यातना एवं अन्य क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक बर्ताव को रोकना है।
केंद्र की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल रणजीत कुमार ने मामले में इस आधार पर अदालत से कुछ समय की मोहलत मांगी कि कानून बनाने के संदर्भ में नयी मुहिम शुरू किये जाने से पहले कुछ राज्यों से परामर्श किया जाना बाकी है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि ''यह कहना अच्छा है कि हमलोग संधि को लेकर प्रतिबद्ध है लेकिन इस संदर्भ में कानून तो होना ही चाहिए।''
बहरहाल, सॉलिसिटर जनरल ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि वर्ष 2010 में पूर्ववर्ती संप्रग-2 सरकार ने लोकसभा में यातना पर विधेयक पेश किया था। पूर्व कानून मंत्री एवं वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार इस प्रक्रिया का हिस्सा थे, लेकिन कानून नहीं बन पाया।
इस पर पीठ ने कहा था, ''यह पक्षपात रहित होना चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।''
पाकिस्तानी पुलिस ने कथित तौर पर सेना के खिलाफ लोगों को उकसाने और नफरत फैलाने के मामले में पाकितान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की है। नवाज शरीफ के खिलाफ बुधवार को इश्तियाक अहमद मिर्जा नाम के एडवोकेट ने रावलपिंडी के सिविल लाइंस पुलिस थाने में मामला दर्ज कराया। मिर्जा खुद के 'आई एम पाकिस्तान पार्टी' का प्रमुख होने का दावा करते हैं।
'द डान' अखबार के मुताबिक, पुलिस द्वारा दर्ज की गई यह रिपोर्ट एफआईआर नहीं है और स्थानीय भाषा में इसे 'रोजनामचा' के तौर पर जाना जाता है। मिर्जा ने दावा किया कि उन्हें अपने वाट्सएप पर एक वीडिया क्लिप मिली थी जिसमें एक शख्स भाषण देता दिख रहा था।
उन्होंने कहा कि भाषण देने वाला शख्स खुद प्रधानमंत्री नवाज शरीफ थे जो कथित तौर पर लोगों को उकसा रहे थे और सशस्त्र बलों के खिलाफ नफरत फैला रहे थे। शिकायतकर्ता ने नवाज़ शरीफ के खिलाफ मामला दर्ज करने की मांग की जो पीएमएलएन पार्टी के प्रमुख भी हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, इश्तियाक अहमद मिर्जा ने दावा किया कि उनका 'आईएम पाकिस्तान' राजनीतिक दल पाकिस्तानी निर्वाचन आयोग में पंजीकृत है।
दूसरी ओर खबर ये भी है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जून महीने में कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना में होने जा रही शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर बैठक से इतर मुलाकात कर सकते हैं। एक मीडिया रिपोर्ट में यह कहा गया है।
पाकिस्तानी समाचार पत्र 'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' ने राजनयिक सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि एससीओ के प्रभावशाली देश पाकिस्तान और भारत के बातचीत की प्रक्रिया में फिर साथ आने पर जोर दे रहे हैं ताकि अगली शिखर बैठक अनुकूल माहौल में हो सके।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों देशों को एससीओ में इस शर्त पर शामिल किया गया है कि वे द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के साथ संगठन के हित को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे। यही एक मुख्य वजह थी कि 2015 के एससीओ शिखर बैठक से इतर मोदी और शरीफ रूस के उफा शहर में मिले थे।
संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्था की जेनेवा में हो रही एक बैठक में कई देशों ने भारत को दलितों, महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ हिंसा रोकने की सलाह दी है।
संयुक्त राष्ट्र ने 2008 से यूनिवर्सल पिरियोडिक रिव्यू नाम की परंपरा शुरू की थी जिसके तहत हर चार वर्ष में सदस्य देश मानवाधिकार मामलों पर एक-दूसरे से जवाब मांगते हैं।
भारत की तरफ़ से एटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कई देशों के सवालों का जवाब दिया।
उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी भारत के लोकतंत्र के मूल में है।
भारत ने इस बैठक में कहा कि भारत एक धर्मनिर्पेक्ष देश है। इसके अलावा भारत ने मानवाधिकार के लिए प्रतिबद्धता जताई।
कई देशों ने इस बैठक में अपनी-अपनी राय रखी है जिसमें मुख्य रूप से भारत में महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले भेदभाव और हिंसा के मुद्दे कई देशों ने उठाए हैं।
कई देशों ने धार्मिक हिंसा, फांसी की सज़ा ख़त्म करने और तस्करी पर लगाम कसने की अपील की है।
नरेंद्र मोदी सरकार के लिए ये पहला और भारत के लिए ये तीसरा मौका है जब सरकार मानवाधिकार मामलों पर अपने ट्रैक रिकॉर्ड पर जवाब दे रही है।
मेक्सिको ने भारत को दलितों और लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव को ख़त्म करने और यौन शोषण पीड़ितों के साथ काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों को सही ट्रेनिंग देने की अपील की।
लेबनान ने भारत को धार्मिक आज़ादी की रक्षा करने की गारंटी देने को कहा, इसके अलावा लेबनान ने तस्करी पर लगाम कसने को भी कहा है।
लिथुआनिया ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रक्षा करने, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं पर हमलों की जांच की अपील की है।
लातविया ने महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा ख़त्म करने की अपील की, वहीं कीनिया ने अल्पसंख्यकों और महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा और भेदभाव के खिलाफ़ कदम उठाने की अपील की है।
भारत ने कहा है कि दलितों के खिलाफ़ भेदभाव रोकने के लिए कानून हैं।
इटली ने फांसी की सज़ा ख़त्म करने के अलावा धार्मिक हमलों के पीड़ितों को न्याय दिलाने की अपील की।
इराक ने भारत से मानवाधिकार को बढ़ावा देने के अलावा शिक्षा के क्षेत्र में बजट बढ़ाने की अपील की है।
स्पेन ने शादी में बलात्कार को अपराध की श्रेणी में रखने, महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा और ऑनर किलिंग यानी सम्मान के लिए हत्या को ख़त्म करने के अलावा बाल मज़दूरी को भी ख़त्म करने की अपील की।
आईसलैंड ने कहा है कि कानूनों के बावजूद महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ़ हिंसा में कोई कमी नहीं हुई हैं। आईसलैंड ने धारा 377 को भी वापस लेने की अपील की है, धारा 377 के तहत समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
भारत ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई करेगा। वहीं फांसी की सज़ा पर भारत का कहना है कि सिर्फ़ रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस में ही फांसी की सज़ा दी जाती है।
स्विट्ज़रलैंड ने सिविल सोसायटी पर पाबंदियों, अल्पसंख्यकों पर हमले को लेकर चिंता ज़ाहिर की। इसके अलावा एफ्सपा की समीक्षा की अपील की।
पाकिस्तान ने भारत के कश्मीर में पेलेट गन का इस्तेमाल बंद करने की अपील की।
अमरीका ने भारत सरकार की लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए तारीफ़ की।
नेपाल और बांग्लादेश ने भी मानवाधिकार में भारत की नीतियों की तारीफ़ की।
अमरीका ने सुप्रीम कोर्ट के 2016 के फ़ैसले की तारीफ़ की जिसमें अदालत ने कहा था कि सेना को विशेषाधिकार देने वाले आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट के तहत सैनिक सज़ा से न बच पाएं।
अमरीका ने कहा कि भारत में अभी भी दलितों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ भेदभाव बरकरार है।
ऑस्ट्रिया ने भारत में ग़ैर सरकारी संस्थाओं को एफ़सीआरए के तहत विदेशों से मिलने वाले फंड पर कार्रवाई को लेकर चिंता जताई और कहा कि इससे एनजीओ की गतिविधियों पर असर पड़ेगा।
इस बैठक में कई देशों ने भारत से संयुक्त राष्ट्र के कनवेशन अगेनस्ट टॉर्चर को प्रमाणित करने की अपील की।
अफ़्रीकियों पर हमलों पर भारत ने माना कि ये दुखी करने वाली घटना है, लेकिन ये हमले नस्लवाद से प्रेरित नहीं थे।
भारत और पाकिस्तानी मीडिया में कई लोग, भारत के मुक़ाबले पाकिस्तानी मीडिया के ताक़तवर होने के सबूत के तौर पर देखते हैं।
ठीक इसी दौरान, भारत के उदारवादी माने जाने वाले चैनलों में से एक एनडीटीवी ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए भारत के पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम का इंटरव्यू ड्रॉप कर दिया।
एनडीटीवी की सह-संस्थापक और चेयरमैन राधिका रॉय ने ऑनलाइन प्रकाशन 'द वायर' को दिए एक स्टेटमेंट में कहा, ''सर्जिकल स्ट्राइक के मसले पर राजनीतिक छींटाकशी, जो बिना सबूत के की जा रही थी, उससे हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान हो रहा था।''
पाकिस्तानी पत्रकारों को भी लगता है कि वो ज़्यादा साहसी हैं और वो सरकार का समर्थन करने वाले भारतीय पत्रकारों की तुलना में अपनी सरकार के पक्ष से अलग पक्ष रख सकते हैं।
हालांकि इस बहस का कोई नतीजा नहीं निकल सकता है। इतना ज़रूर साबित होता है कि दोनों देशों में प्रेस की आज़ादी की स्थिति बहुत ख़राब है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, बावजूद इसके 'रिपोर्टर्स बिदाउट बॉर्डर्स' संस्था की ओर से 2017 में प्रकाशित वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के मुताबिक, प्रेस की स्वतंत्रता के पैमाने पर भारत निचले पायदानों पर है।
2017 में प्रकाशित वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के मुताबिक, 180 देशों की सूची में भारत का 136 वां स्थान दर्शाता है कि भारत में प्रेस की आज़ादी की स्थिति लगातार बिगड़ रही है।
भारत ज़िम्बॉब्वे और म्यांमार जैसे देशों से भी पीछे है।
निर्भीक पत्रकारिता करने के मामले में नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड अव्वल हैं।
इस मामले में चीन 176वें और पाकिस्तान 139 वें नंबर पर है।
'रिपोर्टर्स बिदाउट बॉर्डर्स' ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ''भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा है और मीडिया डर की वजह से ख़बरें नहीं छाप रही है।''
रिपोर्ट में कहा गया है, ''भारतीय मीडिया में सेल्फ़ सेंसरशिप बढ़ रही है और पत्रकार कट्टर राष्ट्रवादियों के ऑनलाइन बदनाम करने के अभियानों के निशाने पर हैं। सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को रोकने के लिए मुक़दमे तक किए जा रहे हैं।''
भारत में 2015 में चार पत्रकारों की हत्या हुई और हर महीने कम से कम एक पत्रकार पर हमला हुआ है। कई मामलों में पत्रकारों पर आपराधिक मानहानि के मुकदमे दर्ज किए गए। इसका नतीजा रहा है कि पत्रकारों ने ख़ुद पर सेंशरशिप लगा ली।
मीडिया पर नजर रखने वाली वेबसाइट द हूट डॉट ओआरजी की गीता सेशू कहती हैं, ''इन हमलों का दायरा चौंकाने वाला है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कश्मीर में इंटरनेट और समाचार पत्रों पर पाबंदी लगाई गई। कारपोरेट धोखाधड़ी पर मानहानि के मुकदमे, स्थानीय माफिया के भ्रष्टाचार की ख़बर करने पर पत्रकारों की हत्याओं से लकर छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बल का स्वतंत्र पत्रकारों को प्रताड़ित करना और जेल भेजने की घटनाएं भी हुई हैं।''
भारत के कश्मीर में मौजूदा तनाव को देखते हुए सरकार ने प्रेस की आज़ादी पर कई तरह के अंकुश लगाए हैं। पत्रकारों को कर्फ्यू के दौरान पास नहीं दिया गया, पत्रकारों पर हमले हुए, राज्य में समाचार पत्रों के प्रसार को रोक दिया गया और कश्मीर रीडर नामक अख़बार पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई।
दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में अगर एक अख़बार पर पाबंदी लगाई जाती तो इस पर हंगामा मच जाता, लेकिन भारतीय मीडिया ने बड़े पैमाने पर इसको नज़रअंदाज़ किया।
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई इस पर लिखते हैं, ''आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। भारत 136वें और पाकिस्तान 139वें नंबर पर है। बहुत कुछ कहा जा चुका है। उन चुनिंदा लोगों को सलाम जो अब भी आवाज़ उठा रहे हैं।''
अपने अगले ट्वीट में राजदीप ने लिखा, ''सच ये है कि भारत में प्रेस स्वतंत्रता की महान परंपरा रही है। बिज़नेस मॉडलों और निजी हितों की वजह से इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग हुआ है।''
वहीं पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने फ़ेसबुक पर लिखा, ''विश्व प्रेस स्वंत्रता दिवस दुनिया का सबसे बड़ा छलावा है। प्रेस स्वतंत्रता एक मिथक और जनता के साथ एक क्रूर मज़ाक है।''
उन्होंने लिखा, ''दुनियाभर में मीडिया कार्पोरेट के हाथ में है जिसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक फ़ायदा कमाना है। वास्तव में कोई प्रेस स्वतंत्रता है ही नहीं।''
काटजू ने लिखा, ''बड़े पत्रकार मोटा वेतन लेते हैं और इसी वजह से वो फैंसी जीवनशैली के आदी हो गए हैं। वो इसे खोना नहीं चाहेंगे और इसलिए ही आदेशों का पालन करते हैं और तलवे चाटते हैं।''
पाकिस्तान में लोकतंत्र की स्थिति भी डांवांडोल रही है, बड़े पैमाने पर पाकिस्तान में चरमपंथ भी फैला हुआ है, इसलिए प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पाकिस्तान का 139 वें पायदान पर होना बहुत चौंकाता नहीं है। ये रैंकिंग पाकिस्तान के मुक्त मीडिया के दावे से मेल नहीं खाती है।
2016 की रिपोर्टर्स बिदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट पाकिस्तान के बारे में कहती है, ''पत्रकारों को जो निशाना बनाते हैं, उनमें चरमपंथी समूह, इस्लामिक संगठन, ख़ुफ़िया एजेंसियां शामिल है। ये प्रेस की आज़ादी में बाधा पहुंचाते हैं। ये सब एक-दूसरे से भले लड़ रहे हों, लेकिन जैसे हमेशा मीडिया को चोट पहुँचाने के लिए तैयार रहते हैं। ऐसे में समाचार संगठनों ने सेल्फ-सेंसरशिप को अपना लिया है।''
पाकिस्तान में 2014 में हत्या की नीयत से किए गए हमले में बाल बाल बचे और अब अमरीका में रह रहे पाकिस्तानी पत्रकार रज़ा रूमी कहते हैं, ''जहां तक पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा की बात है, अंग्रेजी अख़बारों में थोड़ी जगह अलग विचार व्यक्त करने के लिए हो सकती है, लेकिन टीवी न्यूज़ में सत्ता प्रतिष्ठान का विरोध काफी ख़तरनाक है। संस्थाएं इसकी अनुमति नहीं देती हैं।''
रूमी एक टीवी शो होस्ट करते थे और उन्होंने पाकिस्तान की विदेश नीति से मतभेद जताए थे और अल्पसंख्यकों के अधिकार के मुद्दे को उठाया था।
बलूचिस्तान में मानवाधिकार के मुद्दे पर रिपोर्टिंग करने के दौरान 2014 में पाकिस्तान के जाने माने एंकर और पत्रकार हामिद मीर पर भी जानलेवा हमला हुआ था। तब मीर के भाई ने टीवी चैनल पर आकर इस हमले के लिए पाकिस्तानी सेना को जिम्मेदार ठहराया था।
वैसे शारीरिक हमला और सीधी सेंसरशिप- समस्या का छोटा हिस्सा भर हैं, भारत और पाकिस्तान में मीडिया पर अंकुश लगाने की कोशिशें बढ़ती जा रही हैं।
टेलीग्राफ़ अख़बार में मानिनी चटर्जी ने लिखा है, ''सेंसरशिप-सेल्फ सेंसरशिप, सच-प्रोपागैंडा और पत्रकारिता-अंधराष्ट्र भक्ति के बीच अंतर को शायद ही कोई जानता समझता हो।''
इतना ही नहीं, भारत में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने ख़बर तक पत्रकारों की पहुंच के तरीके कम कर दिए हैं और पीआर को बढ़ावा दिया है ताकि मीडिया की ख़बरों को बेहतर ढ़ंग से नियंत्रित किया जा सके।
पाकिस्तान में सेना की ओर से दबाव ज़्यादा होता है। पाकिस्तान की सुरक्षा संबंधी नीतियों पर लगातार लिखने वाली आयशा सिद्दिका के लेख पाकिस्तान में कई बार रिजेक्ट कर दिए जाते हैं और वो भारत में कहीं ज़्यादा छपती हैं।
आयशा सिद्दिका ने पाकिस्तानी अख़बार द न्यूज़ में लिखा है, ''मौजूदा समय में इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशन के मुखिया लेफ्टिनेंट जनरल हैं, सेना की पीआर एजेंसी आज बड़े पैमाने पर रेडियो चैनल चला रही है, कई टीवी चैनलों में हिस्सेदारी है। फ़िल्म और थिएटर को फ़ाइनेंस करते हैं। यह केवल संस्थागत विस्तार भर नहीं है, बल्कि यह देश (पाकिस्तान) के मीडिया की आवाज़ को आकार देने जैसा मामला है।"
पाकिस्तान के बलूचिस्तान में पत्रकारों को स्वतंत्र रूप से जाने की इज़ाजत नहीं है। ऐसे में किस देश का मीडिया ज़्यादा स्वतंत्र है, इस बहस का कोई नतीजा नहीं निकल सकता।
भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में प्रेस की आज़ादी गंभीर ख़तरे के दौर से ज़रूर गुजर रही है।
तीन मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इस मौक़ै पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर प्रेस की आज़ादी के महत्व को बताया है।
पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, ''विश्व प्रेस फ्रीडम डे पर हम स्वतंत्र और बहुमुखी पत्रकारिता का दृढ़ समर्थन करते हैं। यह लोकतंत्र के लिए बहुत ज़रूरी है।''
हालांकि दुनिया भर में पत्रकारिता के लिहाज़ से भारत में कई मुश्किलें हैं। 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने 180 देशों की सूची जारी की है जिसमें प्रेस स्वतंत्रता के हिसाब से भारत का स्थान 136वां है।
भारत ज़िम्बॉब्वे और म्यांमार जैसे देशों से भी पीछे है।
निर्भीक पत्रकारिता करने के मामले में नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड अव्वल हैं।
इस मामले में चीन 176वें और पाकिस्तान 139 नंबर पर है।
मई 2014 में नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने थे। तब भारत 140वें नबंर पर था। 2015 में भारत 136वें नंबर पर आया। 2016 में 133वें नबंर आया और 2017 में 136वें पायदान पर आ गया।
2010 में भारत इस सूची में 122वें नंबर पर था और तब यूपीए सरकार सत्ता में थी। इसके बाद भारत 2014 तक 140वें नबंर पर रहा।
'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर' ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ''भारत में प्रेस की स्वतंत्रता को मोदी के राष्ट्रवाद से ख़तरा है और मीडिया डर की वजह से ख़बरें नहीं छाप रही है।''
रिपोर्ट में कहा गया है, ''भारतीय मीडिया में सेल्फ़ सेंसरशिप बढ़ रही है और पत्रकार कट्टर राष्ट्रवादियों के ऑनलाइन बदनाम करने के अभियानों के निशाने पर हैं। सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को रोकने के लिए मुक़दमे तक किए जा रहे हैं।''
जबकि मोदी ने अपने ट्वीट में कहा है, ''आज के दौर में सोशल मीडिया लोगों से जुड़ने के एक सक्रिय माध्यम के रूप में उभरा है और इसने स्वतंत्र प्रेस को और अधिक ताक़त दी है।''
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई इस पर लिखते हैं, ''आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। भारत 136वें और पाकिस्तान 139वें नंबर पर है। बहुत कुछ कहा जा चुका है। उन चुनिंदा लोगों को सलाम जो अब भी आवाज़ उठा रहे हैं।''
अपने अगले ट्वीट में राजदीप ने लिखा, ''सच ये है कि भारत में प्रेस स्वतंत्रता की महान परंपरा रही है। बिज़नेस मॉडलों और निजी हितों की वजह से इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग हुआ है।''
वहीं पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने फ़ेसबुक पर लिखा, ''विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस दुनिया का सबसे बड़ा छलावा है। प्रेस स्वतंत्रता एक मिथक और जनता के साथ एक क्रूर मज़ाक है।''
उन्होंने लिखा, ''दुनियाभर में मीडिया कार्पोरेट के हाथ में है जिसका एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक फ़ायदा कमाना है। वास्तव में कोई प्रेस स्वतंत्रता है ही नहीं।''
काटजू ने लिखा, ''बड़े पत्रकार मोटा वेतन लेते हैं और इसी वजह से वो फैंसी जीवनशैली के आदी हो गए हैं। वो इसे खोना नहीं चाहेंगे और इसलिए ही आदेशों का पालन करते हैं और तलवे चाटते हैं।''









