भारत

अखिलेश को झटका: तीन एमएलसी ने दिया इस्तीफा

समाजवादी पार्टी के एमएलसी भुक्कल नवाब, यशवंत सिंह और मधुकर जेटली ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। शनिवार (29 जुलाई) को लखनऊ में इस्तीफा देते हुए नवाब ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ भी की।

याद रहे कुछ लोग सत्ता के साथी होते, सत्ता जाते ही पलटी मारने में देर नहीं लगती।

नवाब राष्ट्रीय शिया समाज के संस्थापक भी हैं। उत्तर प्रदेश में पहले समाजवादी पार्टी की ही सरकार थी। इसी साल हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को हराकर बीजेपी सत्ता में आई है।

बीजेपी ने गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाया। इसका कई लोगों ने विरोध भी किया था। योगी का विरोध करने की मुख्य वजह मुसलमानों को लेकर दिए गए उनके कुछ बयान थे। इसके अलावा माना जाता है कि मुसलमान बीजेपी और नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करते।

लेकिन याद रखे भुक्कल नवाब शिया मुसलमान है, सुन्नी मुसलमान नहीं। शिया और सुन्नी मुसलमानों की विचारधारा में फर्क है, इसलिए भुक्कल नवाब जो शिया मुसलमान हैं, के बीजेपी में शामिल होने पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनते ही भुक्कल नवाब ने इसी साल मई में राम मंदिर की वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि भव्य राम मंदिर बनना चाहिए। इतना ही नहीं, भुक्कल ने राम मंदिर के लिए 15 करोड़ दान देने की भी बात की थी। भुक्कल नवाब का राम मंदिर की वकालत तो सिर्फ बहाना है, वास्तव में अपने-आप को बचाना है।

भुक्कल नवाब पर इससे पहले गोमती नदी को लेकर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे।

भुक्कल नवाब पर आरोप था कि उन्होंने नदी की जमीन के नाम पर करोड़ों रुपए का मुआवजा लिया था। ऐसे में भुक्कल नवाब के बीजेपी में शामिल होने पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए। आख़िरकार सजा से बचने के लिए सत्ता का सहारा तो चाहिए ही।

इस बीच अमित शाह भी लखनऊ पहुंच चुके हैं। सीएम योगी उनको लेने पहुंचे थे। MLC के इस्तीफे पर जब उत्तर प्रदेश के मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव ही इस बात का सही जवाब दे पाएंगे कि ऐसा क्यों हो रहा है?

इसपर कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह ने ट्वीट किया, धनादेश के बल पर सत्ता के कारोबारी के लखनऊ पहुँचते ही MLC की ख़रीद फ़रोख़्त शुरू।

गुजरात: छह विधायक खोने के बाद, कांग्रेस ने बाकी 44 को बेंगलुरु भेजा

गुजरात में राज्यसभा चुनाव से पहले बीजेपी द्वारा अपने विधायकों के शिकार से बचाने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें बेंगलूरू भेजने का फैसला किया। विधायकों को शुक्रवार (28 जुलाई) की रात विमान से कांग्रेस शासित प्रदेश कर्नाटक भेजा गया। 44 विधायकों को वहां एक रिसोर्ट में रखा गया है।

हालांकि, कोई भी विधायक साफ तौर पर नहीं कबूल रहा कि कांग्रेस ने बीजेपी के डर से उनको वहां भेजा है। कर्नाटक कांग्रेस शासित राज्य है। इसलिए उस जगह को ठीक समझा गया। आठ अगस्त को राज्य सभा चुनाव होने हैं। हो सकता है कि छह तारीख तक कांग्रेस के सभी विधायक वहीं पर रहें।

नाम न उजागर करने की शर्त पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ''गुजरात में मौजूदा हालात को देखते हुए जहां हमारे सदस्यों को लालच देने की कोशिश की जा रही है, हम अपने विधायकों को बेंगूलरू ले जा रहे हैं।'' बैंगलूरू पहुंचकर कांग्रेस विधायक शैलेश परमार बोले कि अपनी कमियों को छिपाने के लिए बीजेपी पैसे का लालच देकर और डरा-धमकाकर विधायकों को अपनी तरफ शामिल कर रही है।

इससे पहले कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने मांग की थी कि धन और ताकत का इस्तेमाल करके कांग्रेस के विधायकों का शिकार करने के लिए चुनाव आयोग बीजेपी के खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज करे। इस आरोप को बीजेपी ने खारिज किया है।

गुजरात में विपक्षी पार्टी कांग्रेस को तगड़ा झटका देते हुए तीन और विधायकों ने आज इस्तीफा दे दिया। इसी के साथ राज्यसभा चुनाव से पहले पार्टी छोड़ने वाले विधायकों की संख्या छह हो गई। कांग्रेस ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल को गुजरात से संसद के उच्च सदन के लिए फिर उतारा है।

राज्य की 182 सदस्य विधानसभा में कांग्रेस की संख्या 57 से घटकर 51 रह गई है। इसका असर आगामी राज्यसभा चुनाव में पटेल की किस्मत पर पड़ सकता है।

लालू यादव का दावा, शरद ने फोन कर कहा वह लालू के साथ हैं

जनता दल युनाइटेड के सीनियर नेता शरद यादव की चुप्पी सबको खटक रही है। नीतीश कुमार द्वारा गठबंधन को तोड़कर बीजेपी के साथ मिल जाने के बाद शरद यादव ने मीडिया से कोई बात नहीं की है। ऐसे में राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू यादव ने शरद के बारे में चौंकाने वाला बयान दिया।

एनडीटीवी से बात करते हुए लालू यादव ने कहा कि नीतीश कुमार द्वारा विश्वास मत (एनडीए 131-108 से जीत गई) हासिल करने के बाद शरद ने उनको फोन किया और कहा कि वह लालू के साथ हैं।

पिछले कुछ वक्त से नीतीश कुमार विपक्ष की 18 पार्टियों से बातचीत नहीं कर रहे थे। ऐसे में जनता दल युनाइटेड की तरफ से शरद यह काम देख रहे थे। उन पार्टियों के साथ मीटिंग्स में शरद यादव लगातार कहते रहे कि जनता दल युनाइटेड की भी पहली लड़ाई बीजेपी और नरेंद्र मोदी से ही है।

बिहार का महागठबंधन (नीतीश और लालू की पार्टी के बीच) टूटने के बाद शरद यादव की चुप्पी के लोग अपने-अपने मायने लगा रहे हैं। शरद यादव पिछले कुछ महीनों से संसद में भी चुपचाप दिखे। मीटिंग और किसी कार्यक्रम में नेताओं और लोगों से मिलते वक्त वह ज्यादा बातचीत नहीं कर रहे। जिस दिन नीतीश कुमार एनडीए में वापस आए, उस दिन शरद यादव एक कार्यक्रम में थे। लेकिन वह वहां ज्यादा देर रुके नहीं।

इसके अगले दिन संसद में भी वह दूसरे दरवाजे से अंदर घुसे। माना जा रहा है कि उन्होंने ऐसा मीडिया वालों से बचकर निकलने और बात ना करने के लिए किया। शरद का यह बर्ताव अजीब इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आमतौर पर वह मीडिया से खुलकर बात करते रहे हैं। लेकिन अब पिछले तीन दिनों से वह मीडिया के सामने नहीं आए हैं।

तेजस्वी यादव हार कर भी जीते, ऐसे शानदार भाषण की उम्मीद नहीं थी

नीतीश कुमार और एनडीए के गठबंधन वाली सरकार ने शुक्रवार (28 जुलाई) को विश्वास मत हासिल कर लिया। इसके बावजूद चर्चा का विषय लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजस्वी यादव बने। विधानसभा में तेजस्वी का भाषण इतना प्रभावशाली रहा कि बीजेपी के एक सीनियर नेता को भी कहना पड़ा कि तेजस्वी से ऐसे भाषण की उम्मीद नहीं थी।

तेजस्वी यादव ने नीतीश को घेरते हुए कई मुद्दों का जिक्र किया। पूछा कि बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के पीछे उनकी मंशा क्या है? उन्होंने नीतीश के इस कदम को लोकतंत्र की हत्या भी बताया। हालांकि, इतना सब होने के बावजूद एनडीए 131-108 से जीत गई।

तेजस्वी यादव को विपक्ष का नेता चुना गया था। सबसे पहले उनको ही बोलने का मौका मिला। कार्यवाही के दौरान राष्ट्रीय जनता दल नेता ललित यादव और भाई बीरेंद्र सिंह नीतीश कुमार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे थे। उस वक्त तेजस्वी ने अपनी समझदारी दिखाते हुए उनसे कहा कि आप शांति से बैठ जाइए, इनके लिए मैं अकेला काफी हूं।

नीतीश कुमार को बॉस से संबोधित करते हुए तेजस्वी यादव ने कहा, ''आपके पास 71 एमएलए थे बॉस।'' उन्होंने नीतीश से यह तक पूछ लिया कि क्या उनको शपथ लेते हुए शर्म नहीं आई? इसपर बीजेपी नेताओं ने अपना विरोध दर्ज करवाया। लेकिन तेजस्वी ने साफ कहा कि ऐसा बोलने में कुछ गलत नहीं है।

इसके बाद तेजस्वी ने नीतीश से कहा कि आप 'हे राम' से 'जय श्री राम' की तरफ बढ़ चले हैं। तेजस्वी बोले कि जो कोई भीड़ द्वारा मारपीट और बीजेपी के खिलाफ बोलता है उसे एंटी नेशनल कहा जाता है, लेकिन अब आप (नीतीश) राष्ट्रवादी हो गए हैं।

तेजस्वी ने आगे कहा कि वैसे तो नीतीश विपक्ष की एकजुटता की बात करते थे, लेकिन सोनिया गांधी की मीटिंग में जाने की जगह वह पीएम मोदी के डिनर में पहुंचे थे।

तेजस्वी ने कहा कि नीतीश ने बीजेपी के साथ मिलकर ड्रामा रचा। तेजस्वी ने कहा कि नीतीश पिछले छह-सात महीनों से बीजेपी के साथ गठबंधन करने पर विचार कर रहे थे।

महबूबा मुफ्ती ने कहा, मेरे लिए, भारत का मतलब इंदिरा गांधी हैं

जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना की, लेकिन कहा कि उनके लिए भारत का मतलब इंदिरा गांधी हैं।

राष्ट्रीय राजधानी में कश्मीर से संबंधित एक कार्यक्रम के दौरान महबूबा मुफ्ती ने कहा कि टेलीविजन के प्राइम टाइम में जिस तरह के भारत को दिखाया जा रहा है, उससे वह निराश हैं क्योंकि यह भारत तथा कश्मीर के बीच की खाई को गहरा करता है।

उन्होंने कहा कि वह उस भारत को नहीं जानती, जिसे उत्तेजित टेलीविजन चर्चाओं में दिखाया जाता है।

मुख्यमंत्री ने कहा, ''मुझे यह कहते हुए दुख होता है कि टेलीविजन एंकर भारत की जिस छवि को पेश करते हैं, वह भारत के बारे में नहीं है, जिस भारत को मैं जानती हूं उसके बारे में नहीं है।''

नेहरू-गांधी परिवार को नापसंद करने वाले संघ परिवार की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, ''मेरे लिए, भारत का मतलब इंदिरा गांधी हैं। जब मैं बड़ी हो रही थी, उन्होंने मेरे लिए भारत का प्रतिनिधित्व किया। हो सकता है कि कुछ लोगों को वह पसंद ना हों, लेकिन वही भारत थीं। महबूबा ने कहा, ''मैं उस भारत को देखना चाहती हूं, जो चीखता हो, कश्मीर का दर्द महसूस करता हो। वह भारत जो हमारी शर्तो पर हमें गले लगाता हो। हम अलग तरह के राज्य हैं, जिसमें धर्म व हर चीज में बहु-विविधता है। कश्मीर भारत में एक छोटा सा भारत है।''

कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे को निरस्त करने के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध करते हुए वह कहती हैं, ''कुछ लोग हमारे झंडे के बारे में बातें कर रहे हैं, तो कभी अनुच्छेद 370 के बारे में बातें करते हैं ... जो हमारे राज्य के लोगों को बेहद अजीज है और वह राज्य की अनोखी पहचान को बनाए रखने में मददगार है।''

मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद जताई कि वह जम्मू एवं कश्मीर मुद्दे का समाधान करेंगे। उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि मोदी इस वक्त के व्यक्तित्व हैं। वह इतिहास का व्यक्तित्व हो सकते हैं और उनका नेतृत्व एक संपत्ति है, जिसका दोहन करने की जरूरत है। और साथ मिलकर काम करने तथा कश्मीर को संकट से बाहर निकालने का एक रास्ता होना चाहिए।''

शरद यादव घर के बाहर जमा पत्रकारों का नहीं कर रहे सामना

नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ जाने के बाद से जनता दल युनाइटेड के सीनियर नेता शरद यादव चुप हैं। बिहार का महागठबंधन (नीतीश और लालू की पार्टी के बीच) टूटने के बाद शरद यादव की चुप्पी के लोग अपने-अपने मायने लगा रहे हैं।

शरद यादव पिछले कुछ महीनों से संसद में भी चुपचाप दिखे। मीटिंग और किसी कार्यक्रम में नेताओं और लोगों से मिलते वक्त वह ज्यादा बातचीत नहीं कर रहे। जिस दिन नीतीश कुमार एनडीए में वापस आए, उस दिन शरद यादव एक कार्यक्रम में थे। लेकिन वह वहां ज्यादा देर रुके नहीं।

इसके अगले दिन संसद में भी वह दूसरे दरवाजे से अंदर घुसे। माना जा रहा है कि उन्होंने ऐसा मीडिया वालों से बचकर निकलने और बात ना करने के लिए किया। शरद का यह बर्ताव अजीब इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि आमतौर पर वह मीडिया से खुलकर बात करते रहे हैं। लेकिन अब पिछले तीन दिनों से वह मीडिया के सामने नहीं आए हैं।

महबूबा मुफ्ती ने चेतावनी दी, कश्मीर में तिरंगा पकड़ने वाला कोई नहीं मिलेगा

जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने शुक्रवार (28 जुलाई) को चेतावनी दी कि अगर जम्मू और कश्मीर के लोगों को मिले विशेषाधिकारों में किसी तरह का बदलाव किया गया तो राज्य में तिरंगा को थामने वाला कोई नहीं रहेगा।

उन्होंने कहा कि एक तरफ हम संविधान के दायरे में कश्मीर मुद्दे का समाधान करने की बात करते हैं और दूसरी तरफ हम इसपर हमला करते हैं। महबूबा ने एक कार्यक्रम में कहा, ''कौन यह कर रहा है। क्यों वे ऐसा कर रहे हैं (अनुच्छेद 35 ए को चुनौती) मुझे आपको बताने दें कि मेरी पार्टी और अन्य पार्टियां जो तमाम जोखिमों के बावजूद जम्मू और कश्मीर में राष्ट्रीय ध्वज हाथों में रखती हैं, मुझे यह कहने में तनिक भी संदेह नहीं है कि अगर इसमें कोई बदलाव किया गया तो कोई भी इस (राष्ट्रीय ध्वज) को थामने वाला नहीं होगा।''

उन्होंने कहा, ''मुझे साफ तौर पर कहने दें। यह सब करके (अनुच्छेद 35 ए) को चुनौती देकर, आप अलगाववादियों को निशाना नहीं बना रहे हैं। उनका (अलगाववादियों का) एजेंडा अलग है और यह बिल्कुल अलगाववादी है।'' उन्होंने कहा, ''बल्कि, आप उन शक्तियों को कमजोर कर रहे हैं जो भारतीय हैं और भारत पर विश्वास करते हैं और चुनावों में हिस्सा लेते हैं और जो जम्मू और कश्मीर में सम्मान के साथ जीने के लिये लड़ते हैं। यह समस्याओं में से एक है।''

वर्ष 2014 में एक एनजीओ ने रिट याचिका दायर करके अनुच्छेद 35 ए को निरस्त करने की मांग की थी। मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित है। महबूबा ने कहा कि कश्मीर भारत की परिकल्पना है। उन्होंने कहा, ''बुनियादी सवाल है कि भारत का विचार कश्मीर के विचार को कितना समायोजित करने को तैयार है। यह बुनियादी निचोड़ है।''

उन्होंने याद किया कि कैसे विभाजन के दौरान मुस्लिम बहुल राज्य होने के बावजूद कश्मीर ने दो राष्ट्रों के सिद्धांत और धर्म के आधार पर विभाजनकारी बंटवारे का उल्लंघन किया और भारत के साथ रहा।

उन्होंने कहा, ''भारत के संविधान में जम्मू और कश्मीर के लिये विशेष प्रावधान हैं। दुर्भाग्य से समय बीतने के साथ कहीं कुछ हुआ कि दोनों पक्षों ने बेईमानी शुरू कर दी।'' उन्होंने केंद्र और राज्य की ओर इशारा करते हुए कहा कि दोनों पक्ष हो सकता है अधिक लालची हो गये हों और पिछले 70 वर्षों में राज्य को भुगतना पड़ा।

उन्होंने कहा, ''समस्या का निवारण करने की बजाय हमने सरकार को बर्खास्त करने या साजिश, राजद्रोह के आरोप लगाने जैसे प्रशासनिक कदम उठाए।''

उन्होंने कहा, ''इन प्रशासनिक कदमों ने कश्मीर के विचार का समाधान करने में हमारी मदद नहीं की है।''

रात के अँधेरे में तोड़ा राजघाट ... कचरे के ट्रक में ले गए बापू और बा की अस्थियाँ

मध्य प्रदेश के बड़वानी में नर्मदा घाटी के किनारे बने राजघाट पर गांधी समाधि को प्रशासन ने तोड़ दिया। इतना ही नहीं, रात के अंधेरे में महात्मा गांधी, उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी और उनके शिष्य महादेव भाई देसाई की अस्थियां कचरे की गाड़ी में उठाकर भी ले गए। इसकी भनक नर्मदा बचाओ आंदोलन को लगने के बाद काफी हंगामा हुआ।

जानकारी के अनुसार, गुरूवार सुबह करीब 3 बजे प्रशासन का अमला बड़वानी के राजघाट पर पहुंचा और खुदाई शुरू कर दी। मौके पर पहुंचीं मेधा पाटकर ने जब अधिकारियों से राजघाट की खुदाई का लिखित आदेश मांगा तो उन्होंने आदेश दिखाने से इनकार कर दिया।

इतना ही नहीं, पुलिसबल के साथ पहुंचा सरकारी अमला लोगों को बलपूर्वक हटाते हुए तीनों के अस्थि कलश को लेकर रवाना हो गया।

मेधा पाटकर ने कहा कि जिस ढंग से प्रशासन ने कार्रवाई की है उससे उनकी मंशा साफ़ नजर आती है। आखिर रात में तीन बजे राजघाट की खुदाई क्यों की गई? राष्ट्रपिता के अस्थि कलशों का अपमान क्यों किया गया?

बापू के अस्थि कलश कचरे की गाड़ी में ले जाए गए और विरोध करने पर महिलाओं सहित ग्रामीणों के साथ बल प्रयोग किया गया।

वहीं बड़वानी कलेक्टर तेजस्वी नायक ने मेघा पाटकर के सभी आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार हमें 31 जुलाई के पहले डूब क्षेत्र को खाली करवाना है। उन्होंने बताया कि सुबह साढ़े चार बजे ब्रह्म मुहूर्त होने के कारण यह समय चुना गया था। स्मारक का विस्थापन अस्थाई रूप से एनवीडीए द्वारा निर्धारित जगह पर पूरे सम्मान के साथ किया गया है।

आपको बता दें कि 1965 में गांधीवादी काशीनाथ त्रिवेदी तीनों महान विभूतियों की देह-राख यहां लाए थे जिसे समाधि के रूप में 12 फरवरी, 1965 को बनाया गया था । इस स्थल को राजघाट नाम दिया गया है।

गौरतलब है कि गुजरात में सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाकर 138 मीटर की गई है और उसके सारे गेट 31 जुलाई तक पुनर्वास के बाद बंद होना है, इसके चलते मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी के 192 गांव और एक नगर पानी में डूब जाएंगे। इसके विरोध में नर्मदा बचाओ आंदोलन लंबे समय से चल रहा है, यह समाधि स्थल इस आंदोलन का केन्द्र माना जाता है। लेकिन अब इसे यहां से हटा दिया गया है जिसके विरोध में आज से नर्मदा बचाओ आंदोलन यहां अनिश्चितकालीन अनशन शुरु कर रहा है।

बीजेपी सरकार ने तुड़वाया 'राजघाट', 'हे राम' को टूटता देखकर रोये गांधीवादी

मध्यप्रदेश में नर्मदा तट पर स्थित महात्मा गांधी का दूसरा राजघाट गुरुवार को मिट्टी में मिल गया। यहां लोग सत्य, अहिंसा और शांति की प्रेरणा लेने आते थे।

बता दें गांधीवादियों को कुछ दिन बाद वहां सिर्फ पानी ही पानी नजर आएगा। प्रशासन ने दूसरे स्थान पर गांधी स्मारक बनाने के मकसद से इस राजघाट के अवशेषों को सुरक्षित निकाल लिया है। सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने से मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में नर्मदा नदी के तट पर स्थित 'राजघाट' भी डूब में आने वाला था।

प्रशासन ने इस स्थल को दूसरी जगह शिफ्ट कराने की योजना बनाई। इस काम के लिए सरकार ने हालांकि सिर्फ सवा लाख रुपये ही मंजूर किए हैं।

'आईएएनएस' ने जब गांधीवादी चिंतक और कवि बालकवि बैरागी से 'राजघाट' को तोड़े जाने की चर्चा की, तो यह बात सुनते ही वह विचलित हो गए। उन्होंने कहा, ''राजघाट को तोड़ने से बेहतर था कि उसे जलमग्न हो जाने दिया जाता। अब खंडहर जलमग्न होगा जो ठीक बात नहीं है। जिन्होंने ऐसा किया है, उनके लिए यही कह सकता हूं कि ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दे। मगर यह अच्छा नहीं हुआ। इस राजघाट को जलमग्न हो जाने देते और दूसरे स्थान पर नया गांधी स्मारक बना देते तो कोई ऐतराज नहीं था।''

बैरागी ने चंबल नदी पर गांधी सागर बांध बनने के समय को याद करते हुए कहा, ''उस दौर में भी ढाई सौ गांव और कई धार्मिक स्थल जलमग्न हुए थे, मगर किसी को तोड़ा नहीं गया था। राजघाट को क्यों तोड़ा गया, यह मेरी समझ से परे है।''

वहीं बड़वानी के जिलाधिकारी तेजस्वी नायक ने बताया कि जिस चबूतरे पर महात्मा गांधी की देह-राख रखी हुई थी, वह पूरी तरह कंक्रीट का बना हुआ था। उस समूचे चबूतरे को जेसीबी मशीन की मदद से जस का तस निकाल लिया गया है, किसी तरह की क्षति नहीं हुई है। अब दूसरी जगह अस्थायी स्मारक बनाया जाएगा। आपसी सहमति से भव्य स्मारक बनाने की योजना है।

गांधीवादी और अहिंसा के प्रेमियों के लिए बड़वानी का 'राजघाट' दिल्ली के 'राजघाट' से कम महत्व का नहीं था, क्योंकि यहां बनाई गई समाधि में केवल महात्मा गांधी की ही नहीं, कस्तूरबा गांधी और उनके सचिव रहे महादेव देसाई की देह-राख (एश) रखी हुई थी। गुरुवार की सुबह इस स्थान पर जेसीबी मशीन चलते देखकर कुछ लोग भड़क उठे, मगर पुलिस ने उन्हें काबू में कर लिया।

'राजघाट' पर जेसीबी चलाने का विरोध करने वालों में नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर भी थीं। वह 'हे राम' लिखे शिलालेख को ढहते देखकर भाव-विह्वल हो उठीं। यही वह स्थान था, जहां से मेधा बीते साढ़े तीन दशक से नर्मदा घाटी के लोगों के लिए लड़ाई लड़ती आ रही थीं।

तीनों महान विभूतियों की देह-राख यहां गांधीवादी काशीनाथ त्रिवेदी जनवरी, 1965 में लाए थे और समाधि 12 फरवरी, 1965 को बनकर तैयार हुई थी। इस स्थल को 'राजघाट' नाम दिया गया था। त्रिवेदी ने इस स्थान को गांधीवादियों का तीर्थस्थल बनाने का सपना संजोया था, ताकि यहां आने वाले लोग नर्मदा के तट पर गांधी की समाधि के करीब बैठकर अहिंसा और शांति का पाठ पढ़ सकें। समाधि स्थल पर संगमरमर के दो शिलालेख लगे थे। एक पर 'हे राम' लिखा था और दूसरे पर 'यंग इंडिया' में 6 अक्टूबर, 1921 को महात्मा गांधी के छपे लेख का अंश दर्ज है।

इसमें लिखा है, 'हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति और हमारा स्वराज अपनी जरूरतें दिनों दिन बढ़ाते रहने पर, भोगमय जीवन पर, निर्भर नहीं करते, बल्कि अपनी जरूरतों को नियंत्रित रखने पर, त्यागमय जीवन पर निर्भर करते हैं।'

गांधीवादियों को लगता है कि शिवराज सरकार की मंशा इस राजघाट को दूसरे स्थान पर ले जाकर भव्य स्वरूप देने की नहीं है, तभी तो राज्य सरकार के नर्मदा घाटी विकास मंत्री लाल सिंह आर्य ने विधानसभा में कहा कि नया गांधी स्मारक कुकरा गांव के पास बनाया जाएगा। इसके लिए बड़वानी के जिलाधिकारी के खाते में एक लाख 25022 रुपये जमा कराए गए हैं।

सवाल उठ रहा है कि इतनी कम रकम में क्या निर्धारित जमीन का समतलीकरण भी हो पाएगा?

बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार को मिला विश्वासमत, 131 विधायकों का समर्थन मिला

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधान सभा में विश्वास मत जीता। नीतीश कुमार के समर्थन में 131 वोट पड़े, जबकि विरोध में 108 वोट पड़े।

बिहार के सीएम नीतीश कुमार को बिहार में बहुमत मिल गया है। 131 विधायकों का उन्हें समर्थन मिला है। वहीं राष्ट्रीय जनता दल के समर्थन में 108 वोट पड़े हैं।

कुछ देर पहले बिहार के सीएम नीतीश कुमार बिहार विधानसभा में भाषण दे रहे थे। उनका भाषण खत्म होने के बाद ही बहुमत साबित करने के लिए वोटिंग शुरू हो गई है। उन्होंने विश्वासमत प्रस्ताव के पक्ष में अपनी बात रखी।

नीतीश कुमार ने विधानसभा में कहा कि सांप्रदायिकता की आड़ में भ्रष्टाचार का साथ नहीं दिया जा सकता। मैं सबको आईना दिखाऊंगा। हमारे अस्तित्व को नकारने की कोशिश की गई है। सत्ता सेवा के लिए होती है, भ्रष्टाचार के लिए नहीं होती है। इससे पहले तेजस्वी यादव और अन्य नेता उन्हें बोलने नहीं दे रहे थे। वह बार-बार उन्हें टोक रहे थे।