उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर आज शपथ लेने जा रहे योगी आदित्यनाथ का विवादों से पुराना नाता रहा है। अपनी फायरब्रांड इमेज के लिए मशहूर इस बीजेपी सांसद ने कई एेसे विवादित बयान दिए हैं जिससे लोगों में उनकी इमेज एक कट्टर हिंदूवादी नेता की बन गई है, लेकिन इन सबसे अलग उनके ऊपर कई आपराधिक धाराओं में मुकदमे दर्ज हैं।
अगर बात उनके 2014 लोकसभा चुनावों में दाखिल हलफनामे की करें तो इसमें योगी ने अपने ऊपर लगे सभी मामलों के बारे में जानकारी दी है। आइए आपको बताते हैं इन मामलों और उनमें होने वाली सजा के बारे में:
1999 में उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री पर महाराजगंज जिले में आईपीसी की धारा 147 (दंगे के लिए दंड), 148 (घातक हथियार से दंगे), 295 (किसी समुदाय के पूजा स्थल का अपमान करना), 297 (कब्रिस्तानों पर अतिक्रमण), 153A (धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 307 (हत्या का प्रयास) और 506 (आपराधिक धमकी के लिए दंड) के मामले दर्ज हुए थे। पुलिस ने इन मामलों में क्लोजर रिपोर्ट तो साल 2000 में ही दाखिल कर दी थी, लेकिन स्थानीय अदालत का फैसला आना अभी बाकी है।
1999 में ही मामला महाराजगंज का ही है, जहां उन पर धारा 302 (मौत की सजा) के तहत मामला दर्ज किया गया था। इसके अलावा 307 (हत्या का प्रयास) 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) और 427 (पचास रुपये की राशि को नुकसान पहुंचाते हुए शरारत) के तहत भी उन पर मामला दर्ज हुआ था। पुलिस ने 2000 में ही क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी थी, लेकिन फैसला आना बाकी है।
1999 में ही महाराजगंज में उन पर आईपीसी की धारा 147 (दंगे के लिए दंड), 148 (घातक हथियार से दंगे), 149, 307, 336 (दूसरों के जीवन को खतरे में डालना), 504 (शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान) और 427 (पचास रुपये की राशि को नुकसान पहुंचाते हुए शरारत) के तहत मामले दर्ज किए गए। एफिडेविट के मुताबिक पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी, लेकिन फैसला आना बाकी है।
2006 में गोरखपुर में उन पर आईपीसी की धारा 147, 148, 133A (उपद्रव को हटाने के लिए सशर्त आदेश), 285 (आग या दहनशील पदार्थ के संबंध में लापरवाही), 297 (कब्रिस्तानों पर अतिक्रमण) के तहत मामला दर्ज किया गया था। यहां भी पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी, लेकिन फैसला अभी नहीं आया।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ सूबे के अगले मुख्यमंत्री होंगे। शनिवार को लखनऊ में भाजपा विधायकों की हुई बैठक में उन्हें विधायक दल का नेता चुना गया है।
इसके साथ ही यूपी भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा को डिप्टी सीएम उम्मीदवार चुना गया है।
भाजपा ने नतीजे आने के 7 दिनों बाद यह फैसला किया है।
योगी आदित्यनाथ रविवार को लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।
प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए वैंकेया नायडू ने कहा कि विधायक दल की बैठक में सुरेश खन्ना ने योगी आदित्यनाथ के नाम का प्रस्ताव रखा। 11 विधायकों ने उनके नाम के अनुमोदन किया। इसके बाद सबने एक साथ खड़े होकर कहा कि हम इसका समर्थन करते हैं। इसके बाद योगी आदित्यनाथ को भाजपा विधायक दल का नेता चुन लिया गया।
योगी आदित्यनाथ ने विधायकों को भाषण देते हुए कहा कि यूपी बहुत बड़ा प्रदेश है। इसे अच्छे से संभालना है तो मुझे दो साथी दें, पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व हमें इसकी मंजूरी दे। इसके बाद चर्चा की गई। बाद में तय किया गया कि यूपी भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा को डिप्टी सीएम बनाया गया।
साथ ही, योगी आदित्यनाथ ने बताया, रविवार को शपथ समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी के संसदीय बोर्ड के सभी सदस्य मौजूद होंगे। साथ ही कुछ वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री होंगे। पूरे देश में हमारे सहयोगी दलों के मुख्यमंत्री और हमारी पार्टी के मुख्यमंत्रियों को शपथ समारोह में बुलाया जाएगा। अब हम लोग राज्यपाल के पास जाकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे।
लखनऊ में भारतीय जनता के नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक लखनऊ के लोकभवन में हुई। इस बैठक में भाजपा के सभी नए विधायकों के अलावा केन्द्रीय पर्यवेक्षक के रुप में वेंकैया नायडु और भूपेन्द्र यादव और अन्य वरिष्ठ भाजपा नेता भी मौजूद थे।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की रेस में केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा, यूपी भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा भी शामिल थे। पहले मनोज सिन्हा इस रेस में सबसे आगे थे, लेकिन बाद में आदित्यनाथ का नाम इस रेस में आगे आ गया।
एन बीरेन सिंह ने 15 मार्च को मणिपुर के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनका यह शपथ कार्यक्रम इंफाल के राज भवन में हुआ। इससे पहले मंगलवार को मणिपुर की गवर्नर नजमा हेपतुल्लाह ने बीजेपी और उनकी साथी पार्टियों को सरकार बनाने का न्योता दिया था। 11 मार्च को आए चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियों द्वारा सरकार बनाने का दावा किया जा रहा था।
मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। कांग्रेस के 28 उम्मीदवार जीते थे, वहीं बीजेपी के 21 उम्मीदवार जीते थे। बीजेपी ने दावा किया था कि उसके पास NPP(4), NPF (4) और LJP(1) के साथ-साथ तीन और विधायकों का भी समर्थन है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीरेन सिंह को बधाई दी। मोदी ने कहा, ''बीरेन सिंह और उनकी पूरी टीम को शपथ ग्रहण की बधाई। मुझे भरोसा है कि उनकी टीम और वह मणिपुर के विकास के लिए दिन-रात मेहनत करेंगे।''
बाकी जिन मंत्रियों ने शपथ ली उसमें बीजेपी के विश्वजीत, NPP के एल जयंतकुमार, LJP के करण श्याम, NPP के एल होकिप, NPP के एन कोयिसी, NPF के लूसी दिखो, कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ने वाले श्यामकुमार का नाम शामिल है।
NPP के वाई जॉयकुमार ने डिप्टी सीएम की शपथ ली।
आखिरकार इबोबी सिंह कार्यक्रम के लिए पहुंच गए हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष टीएन हाओकिप भी वहां होंगे।
मंगलवार (14 मार्च) को भारतीय जनता पार्टी विधायक दल के नेता के तौर पर मनोहर पर्रिकर ने गोवा के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले ली। उन्हें गुरुवार (16 मार्च) को सदन में अपना बहुमत साबित करना है।
मंगलवार को जिन आठ मंत्रियों ने पर्रिकर के साथ शपथ ली उनमें से सात भाजपा के नहीं हैं। यानी मनोहर पर्रिकर अगर बहुमत साबित कर भी देते हैं तो उनके पहले मंत्रिमंडल में करीब 70 प्रतिशत विधायक ऐसे होंगे जो या तो भाजपा को हराकर आए हैं या फिर भाजपा उनकी प्रतिद्वंद्वी भी नहीं थी।
जाहिर है कि सत्ताधारी भाजपा को अन्य दलों और निर्दलीयों के मिले समर्थन का असली समीकरण सामने आ गया है। जमीनी आंकड़ों को देखें तो भले ही गोवा में भाजपा सरकार अंवैधानिक न हो, ''अनैतिक'' जरूर है।
गोवा विधान सभा की कुल 40 सीटों में से सत्ताधारी भाजपा को महज 13 पर जीत मिली है।
भाजपा के हारने वाले उम्मीदवारों में मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पार्सेकर भी शामिल हैं।
मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को इस चुनाव में 17 सीटों पर जीत मिली, लेकिन भाजपा ने अन्य छोटे दलों और निर्दलीयों की सहायता से राज्य में सरकार बनाने का दावा कांग्रेस से पहले पेश कर दिया। राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने पर्रिकर को सरकार बनाने का न्योता दे दिया। पर्रिकर ने रक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्य के मुख्यमंत्री पद के रूप में शपथ भी ले ली।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए कहा कि पर्रिकर यथाशीघ्र (16 मार्च) को सदन में अपना बहुमत साबित करें।
गोवा में 27 सीटों पर गैर-भाजपा उम्मीदवरों की जीत से इतना तो साफ है कि जनता ने सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ वोट दिया है।
नतीजे आने के बाद भाजपा को समर्थन देने वाले महाराष्ट्रवादी गोमांतक और गोवा फॉरवर्ड पार्टी दोनों ने ही चुनाव प्रचार के दौरान सत्ताधारी दल भाजपा के खिलाफ वोट मांगा था और दोनों को ही तीन-तीन सीटों पर जीत मिली।
महाराष्ट्रवादी गोमांतक को जिन तीन सीटों पर जीत मिली है तीनों पर ही उसने भाजपा उम्मीदवार को हराया है।
गोवा फॉरवर्ड पार्टी ने भी तीनों सीटों पर भाजपा को हराकर ही जीत हासिल की है।
तीन में से दो निर्दलीयों ने भाजपा को हराकर विजय हासिल की है और तीसरे ने जहां से जीत हासिल की है वहां भाजपा मुकाबले में ही नहीं थी।
एक सीट नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को मिली है जहां भाजपा मुकाबले में ही नहीं थी।
कांग्रेस ने भी जिन 17 सीटों पर जीत हासिल की है उनमें से 13 सीटों पर उसने भाजपा को सीधे तौर पर हराया है। कुंकली सीट पर कांग्रेस विजयी रही और भाजपा तीसरे स्थान पर रही।
इन आंकड़ों से साफ है कि करीब दो तिहाई सीटों पर जनता ने भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए वोट दिया, लेकिन हुआ क्या?
गोवा में भाजपा की पांच साल सरकार रही। मनोहर पर्रिकर नवंबर 2014 तक गोवा के मुख्यमंत्री रहे। उसके बाद लक्ष्मीकांत पार्सेकर मुख्यमंत्री बने। चुनाव में भाजपा ने अपना सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं किया।
अरुण जेटली समेत कई भाजपा नेताओं ने खुले आम कहा कि गोवा की जनता चाहेगी तो मनोहर पर्रिकर फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन जनता ने इसके बावजूद भाजपा को बहुमत नहीं दिया।
फिर भी भाजपा सरकार भी बन गयी और पर्रिकर मुख्यमंत्री भी बन गए। और जनता, देखती रह गयी।
उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड के विधान सभा चुनावों के नतीजे आने के बाद मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के इस्तेमाल पर बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सवाल उठाने लगे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तो अप्रैल में होने वाले दिल्ली महानगरपालिका के चुनाव बैलेट पेपर से कराने की मांग कर दी है।
ऐसा नहीं है कि ईवीएम पर पहली बार सवाल खड़े हुए हैं। जब 2009 के लोक सभा चुनाव में भाजपा गठबंधन को कांग्रेस गठबंधन से हार मिली थी तब पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने ईवीएम पर सवाल उठाए थे। भाजपा नेता और सैफोलॉजिस्ट जीवीएल नरसिम्हा ने तो ईवीएम के त्रुटियों पर पूरी किताब ही लिख दी जिसकी भूमिका खुद आडवाणी ने लिखी थी।
ईवीएम मशीन कैसे काम करती है? मतदान के लिए प्रयोग की जाने वाली ईवीएम मशीन में दो इकाइयां होती हैं- कंट्रोल यूनिट और बैलटिंग यूनिट। ये दोनों इकाइयां आपस में पांच मीटर के तार से जुड़ी होती हैं। कंट्रोल यूनिट चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त पोलिंग अफसर के पास होती है। बैलटिंग यूनिट मतदान कक्ष में होती है जिसमें मतदाता अपने वोट देते हैं। मतदाता पूरी गोपनीयता के साथ अपने पसंदीदा उम्मीदवार और उसके चुनाव चिह्न को वोट देते हैं।
कंट्रोल यूनिट ईवीएम का दिमाग होती है। बैलटिंग यूनिट तभी चालू होती है जब पोलिंग अफसर उसमें लगा बैलट बटन दबाता है। ईवीएम छह वोल्ट के सिंगल अल्काइन बैटरी से चलती है जो कंट्रोल यूनिट में लगी होती है। जिन इलाकों में बिजली न हो वहाँ भी इसका सुविधापूर्वक इस्तेमाल हो सकता है।
चुनाव आयोग ने पहली बार 1977 में इलेक्ट्रानिक कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (ईसीआईएल) से ईवीएम का प्रोटोटाइप (नमूना) बनाने के लिए संपर्क किया। छह अगस्त 1980 को चुनाव आयोग ने प्रमुख राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को ईवीएम का प्रोटोटाइप दिखाया। उस समय ज्यादातर पार्टियों का रुख इसे लेकर सकारात्मक था। उसके बाद चुनाव आयोग ने भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (बीईएल) को ईवीएम बनाने का जिम्मा दिया।
चुनाव आयोग ने 1982 में केरल विधान सभा चुनाव के दौरान पहली बार ईवीएम का व्यावहारिक परीक्षण किया। जनप्रतिनिधत्व कानून (आरपी एक्ट) 1951 के तहत चुनाव में केवल बैलट पेपर और बैलट बॉक्स का इस्तेमाल हो सकता था इसलिए आयोग ने सरकार से इस कानून में संशोधन करने की मांग की।
हालांकि आयोग ने संविधान संशोधन का इंतजार किए बगैर आर्टिकल 324 के तहत मिली आपातकालीन अधिकार का इस्तेमाल करके केरल की पारावुर विधान सभा के कुल 84 पोलिंग स्टेशन में से 50 पर ईवीएम का इस्तेमाल किया। इस सीट से कांग्रेस के एसी जोस और सीपीआई के सिवान पिल्लई के बीच मुकाबला था।
सीपीआई उम्मीदवार सिवान पिल्लई ने केरल हाई कोर्ट में एक रिट पिटिशन दायर करके ईवीएम के इस्तेमाल पर सवाल खड़ा किए। जब चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट को मशीन दिखायी तो अदालत ने इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया। लेकिन जब पिल्लई 123 वोटों से चुनाव जीत गए तो कांग्रेसी एसी जोस हाई कोर्ट पहुंच गए। जोस का कहना था कि ईवीएम का इस्तेमाल करके आरपी एक्ट 1951 और चुनाव प्रक्रिया एक्ट 1961 का उल्लंघन हुआ है। हाई कोर्ट ने एक बार फिर चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला सुनाया।
एसी जोस ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी। सर्वोच्च अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए दोबारा बैलट पेपर से चुनाव कराने का आदेश दिया। दोबार चुनाव हुए तो एसी जोस जीत गए।
सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद चुनाव आयोग ने ईवीएम का इस्तेमाल बंद कर दिया। 1988 में आरपी एक्ट में संशोधन करके ईवीएम के इस्तेमाल को कानूनी बनाया गया। नवंबर 1998 में मध्य प्रदेश और राजस्थान की 16 विधान सभा सीटों (हरेक में पांच पोलिंग स्टेशन) पर प्रयोग के तौर पर ईवीएम का इस्तेमाल किया गया। वहीं दिल्ली की छह विधान सभा सीटों पर इनका प्रयोगात्मक इस्तेमाल किया गया। साल 2004 के लोक सभा चुनाव में पूरे देश में ईवीएम का इस्तेमाल हुआ।
ईवीएम के इस्तेमाल पर उठने वाले सवालों के जवाब में चुनाव आयोग का कहना है कि जिन देशों में ईवीएम विफल साबित हुए हैं उनसे भारतीय ईवीएम की तुलना 'गलत और भ्रामक' है। आयोग ने कहा, ''दूसरे देशों में पर्सनल कम्प्यूटर वाले ईवीएम का इस्तेमाल होता है जो ऑपरेटिंग सिस्टम से चलती हैं इसलिए उन्हें हैक किया जा सकता है। जबकि भारत में इस्तेमाल किए जाने वाले ईवीएम एक पूरी तरह स्वतंत्र मशीन होते हैं और वो किसी भी नेटवर्क से नहीं जुड़े होते और न ही उसमें अलग से कोई इनपुट डाला जा सकता है।''
आयोग ने कहा, ''भारतीय ईवीएम मशीन के सॉफ्टवेयर चिप को केवल एक बार प्रोग्राम किया जा सकता है और इसे इस तरह बनाया जाता है कि मैनुफैक्चरर द्वारा बर्नट इन किए जाने के बाद इन पर कुछ भी राइट करना संभव नहीं।''
जर्मनी और नीदरलैंड ने पारदर्शिता के अभाव में ईवीएम के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। इटली को भी लगता है कि ईवीएम से नतीजे प्रभावित किए जा सकते हैं। आयरलैंड ने तीन सालों तक ईवीएम पर शोध में पांच करोड़ 10 लाख पाउंड खर्च करने के बाद इनके इस्तेमाल का ख्याल छोड़ दिया। अमेरिका समेत कई देशों में बिना पेपर ट्रेल वाले ईवीएम पर रोक है। हालांकि इन सभी देशों में मतदाताओं की संख्या भारत की तुलना में बहुत कम है। चुनाव में खर्च होने वाले धन, समय और ऊर्जा के मामले में भी यही हाल है।
ईवीएम से जुड़ा सबसे बड़ा विवाद साल 2010 में हुआ। तीन वैज्ञानिकों ने दावा किया है उन्होंने ईवीएम को हैक करने का तरीका पता कर लिया है। इन शोधकर्ताओं ने इंटरनेट पर एक वीडियो डाला जिसमें ईवीएम को हैक करते हुए दिखाए जाने का दावा किया गया। इस वीडियो में भारतीय चुनाव आयोग की वास्तविक ईवीएम मशीन में एक देसी उपकरण जोड़कर इसे हैक करने का दावा किया गया। इस रिसर्च टीम का नेतृत्व मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जे एलेक्स हाल्डरमैन ने किया था। प्रोफेसर एलेक्स ने दावा किया कि वो एक मोबाइल फोन से मैसेज भेजकर ईवीएम को हैक कर सकते हैं।
इस वीडियो के सामने आने के बाद भारतीय चुनाव आयोग ने सभी आरोपों को खारिज किया। बाद में इस रिसर्च टीम में शामिल भारतीय वैज्ञानिक हरि प्रसाद को मुंबई के कलेक्टर कार्यालय से ईवीएम मशीन चुराने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
अपनी नई पार्टी पीआईजेए बनाकर चुनावी मैदान में उतरी इरोम शर्मिला का कहना है कि बीजेपी ने पैसे और अपने बाहुबल का दम दिखाकर विधानसभा चुनाव जीता है। बीजेपी पर आरोप लगाते हुए मंगलवार को इरोम नें कहा कि मणिपुर के लोगों को ये एहसास होना चाहिए कि राज्य में सरकार बनाने के लिए बीजेपी ने इन चीजों का इस्तेमाल किया है।
इरोम शर्मिला ने इन चुनावों में केवल 90 वोट ही प्राप्त किए थे। शर्मिला ने कहा कि वह अपने गढ़ राज्य से कुछ समय के लिए दूर रहना चाहती है क्योंकि वह विधानसभा चुनावों के नतीजों से काफी खफा हैं।
शर्मिला ने कहा कि वह एक महीने के लिए केरल के पालक्कड़ जिले स्थित अट्टापड़ी के एक मेडिटेशन सेंटर में रहकर शांति प्राप्त करने के लिए जा रही हैं।
थाउबल सीट पर मुख्यमंत्री इबोबी सिंह 15 हजार से ज्यादा वोटों से लगातार चौथी बार जीत गए वहां मैदान में उतरी इरोम शर्मिला तीन अंकों का आंकड़ा तक नहीं छू सकी और चौथे नंबर पर रहीं। हताश इरोम ने अब राजनीति से तौबा करते हुए भविष्य में कभी चुनाव नहीं लड़ने की कसम खा ली।
वैसे इरोम इसके बावजूद बावजूद हार मानने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने माना कि नतीजों से वे खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। इसके साथ ही वह कहती हैं कि लोगों का कोई दोष नहीं है क्योंकि वोट के अधिकार पर पैसों की ताकत भारी पड़ गई है।
वहीं इरोम शर्मिला की हार पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना था कि उनकी इस हार का मतलब यह नहीं है कि आम लोगों में उनकी लोकप्रियता खत्म हो गई है। इसकी वजह एक राजनेता के तौर पर उनकी खामियां हैं। उन्होंने बिना सोचे-समझे राजनीति में उतरने का फैसला किया था जिसके कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
मनोहर पर्रिकर ने गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। विधानसभा चुनावों में 40 में से 13 सीटें जीतने के बावजूद छोटी पार्टियों के समर्थन से भाजपा गोवा में सरकार बना रही है। उसे महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ ही निर्दलीयों का भी समर्थन मिला है।
हालांकि कांग्रेस को 17 सीटें मिली थी, लेकिन सरकार बनाने के लिए राज्यपाल के बुलावे के इंतजार करना उसे भारी पड़ गया।
सीएम पद की शपथ लेने के बाद मनोहर पर्रिकर ने कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस के बाद समर्थन था तो वे लोग गवर्नर के पास क्यों नहीं गए थे।
बीजेपी को समर्थन देने वाले आठ विधायकों में से सात को मंत्रीपद दिया गया है।
फिर पांडुरंग मडकैकर ने शपथ ली। वह परिवहन मंत्री रह चुके हैं। उन्होंने इसी साल जनवरी में कांग्रेस छोड़ी थी।
उनके बाद रोहन खाउंते ने शपथ ली। वह निर्दलीय विधायक हैं। वह गोवा के लिए क्रिकेट और फुटबॉल भी खेल चुके हैं।
अगला नंबर मनोहर अजगांवकर का था। मनोहर MGP से हैं। वह पहले कांग्रेस और बीजेपी में भी रह चुके हैं।
उनके बाद विजय सरदेसाई ने शपथ ली। उनका जन्म अर्जंटीना में हुआ है।
मनोहर के बाद सबसे पहले सुदिन धवलीकर ने शपथ ली। वह 2016 में ही बीजेपी छोड़कर MGP में शामिल हुए थे।
मनोहर पर्रिकर को दो बार शपथ लेनी पड़ी। दरअसल, पर्रिकर ने पहले मंत्री बोल दिया था जिसके बाद नितिन गड़की ने उनको रोका, फिर पर्रिकर फिर से शपथ लेने के लिए गए। पहले उन्होंने मंत्री पद की शपथ ली, फिर सीएम पद की।
दिल्ली नगर निगम के लिए होने वाले चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है। 22 अप्रैल को वोटिंग होगी। इसके बाद 25 अप्रैल को मतगणना की जाएगी।
दिल्ली में होने वाले एमसीडी चुनाव अब 22 अप्रैल को होंगे और इस चुनाव के नतीजे 25 अप्रैल को आएंगे। नगर निगम चुनावों में नई जान फूंकने के लिए दिल्ली भाजपा ने अपने सभी वर्तमान पार्षदों को उम्मीदवार नहीं बनाने का फैसला किया है। दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी ने ये एक संवाददाता सम्मेलन में यह घोषणा की।
मनोज तिवारी ने कहा कि हमने आम सहमति से निगम चुनावों में नये चेहरे उतारने का फैसला किया है। पार्षदों और पार्टी नेताओं के परिजनों को भी टिकट नहीं दिए जाएंगे। साल 2007 से दिल्ली के नगर निगमों पर नियंत्रण रखने वाली भाजपा जुए की तरह यह दांव खेल रही है। वह नहीं चाहती कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस मौजूदा पार्षदों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगा पाएं।
मनोज तिवारी ने कहा कि ये फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की युवा शक्ति से संचालित न्यू इंडिया की सोच को मूर्त रूप देने की दिशा में एक कदम है। संवाददाता सम्मेलन में दिल्ली से भाजपा के सांसद हर्षवर्धन, महेश गिरि, प्रवेश वर्मा और उदित राज मौजूद थे जिसे पार्टी में इस फैसले को लेकर एकता प्रदर्शित करने के रूप में देखा जा रहा है।
जब तिवारी से पूछा गया तो उन्होंने इन अटकलों को खारिज कर दिया कि इससे अंतर्विरोध बढ़ सकता है और वर्तमान पार्षद पार्टी के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं।
उन्होंने कहा, भाजपा में लोग पद के लिए काम नहीं करते। सभी मिलकर काम करेंगे और जनता भी इसे स्वीकार करेगी। तिवारी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भी निशाना साधते हुए कहा कि पंजाब और गोवा के नतीजों ने आप को आइना दिखा दिया है और यही हालत उसकी दिल्ली में भी होगी।
दिल्ली के तीन नगर निगमों एनडीएमसी, एसडीएमसी और ईडीएमसी की कुल 272 सीटों में से भाजपा के 153 पार्षद हैं। एनडीएमसी और एसडीएमसी में 104-104 सीटें और ईडीएमसी में 64 सीटें हैं।
हाल के चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद पार्टी के एक महासचिव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। ओडिशा पंचायत चुनावों में शिकस्त के चलते पार्टी महासचिव बीके हरिप्रसाद ने इस्तीफा दे दिया है। वे ओडिशा कांग्रेस के प्रभारी भी थे।
उन्होंने यहां पर हार की जिम्मेदारी ली है। ओडिशा पंचायत चुनावों के नतीजों में कांग्रेस तीसरे पायदान पर फिसल गई है। भाजपा ने मुख्य विपक्षी की उसकी भूमिका हथिया ली है।
कांग्रेस प्रवक्ता ब्रजेश कलप्पा ने कहा कि हरिप्रसाद ने पंचायत चुनावों में पार्टी के कमजोर प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ा है। उन्होंने बताया, ''उन्होंने ऐसा राहुल गांधी का हाथ मजबूत करने के लिए किया है।''
इसी बीच में पार्टी में असंतोष भी बढ़ता दिख रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली ने पार्टी में संरचनात्मक बदलाव, बड़ी सर्जरी और सत्ता विकेंद्रीकरण की जरुरत बताई है।
हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि यह बात सोनिया गांधी या राहुल गांधी पर लागू नहीं होती है।
उन्होंने उत्तर प्रदेश के नतीजों पर कहा कि यह सपा और बसपा की अस्मिता की राजनीति की हार है और कांग्रेस को इस प्रकिया के दौरान नुकसान उठाना पड़ा।
मोइली ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ''हमारे पास सैंकड़ों अमित शाह हैं। लेकिन उन्हें ताकत देने और सामने लाने की जरुरत है। वे जिम्मेदारियां संभालने की योग्यता रखते हैं। सभी राज्य इकाइयों और एआईसीसी में हमें पार्टी को विकेंद्रित करना होगा। कांग्रेस में संरचनात्मक बदलाव की जरुरत है।''
जब उनसे पूछा गया कि क्या पार्टी आलाकमान को भी बदलने की जरुरत है तो मोइली ने जवाब दिया, ''संरचनात्मक बदलाव करने होंगे। समय और बदलावों के अनुसार इसे खुद को ढालना होगा। जो लोग दो बार की हार के जिम्मेदार हैं उन्हें बदलना होगा। उन्हें और जिम्मेदारियां देने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि यह हमारे नेतृत्व पर लागू नहीं होता। सोनिया और राहुल के नेतृत्व के नीचे से बड़ी सर्जरी की जरूरत है। आप भाजपा में नरेंद्र मोदी को नहीं बदल सकते। आप कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी को नहीं बदल सकते। लेकिन अमित शाहों को बदला जा सकता है।''
उन्होंने राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता को लेकर कहा कि वे काबिल नेता हैं। उन्हें हार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मोइली ने कहा, ''हमारे आला कमान को निर्बल कम कीजिए। यदि वे गलतियां करते हैं तो भी फर्क नहीं पड़ता। इंदिरा गांधी भी ऐसे ही समझदार हुई थीं। उन्हें (राहुल) भी दबाया नहीं जाना चाहिए। उनके पंख खुले रखने चाहिए।''
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मिले भारी बहुमत के बाद विरोधियों ने ईवीएम (इलेट्रॉनिक वोटिंग मशीन) में गड़बड़ी का मुद्दा उठाया था।
अब इस मामले को उठाते हुए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने चुनाव आयोग को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में केजरीवाल ने दिल्ली में होने वाले आगामी नगरपालिका चुनाव (MCD) में ईवीएम मशीन का इस्तेमाल ना करने की मांग की है।
अगले महीने अप्रैल में एमसीडी चुनाव होने हैं। अरविंद केजरीवाल ने चुनाव आयोग से कहा कि एमसीडी इलेक्शन ईवीएम मशीन की जगह बैलेट पेपर से कराए जाएं।
11 मार्च को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद कई नेताओं ने ईवीएम मशीन में गड़बड़ी किए जाने का दावा किया था और जांच की मांग की थी।
इसी मद्देनजर सोमवार को कांग्रेस नेता अजय माकन ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को एमसीडी चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाने की सलाह दी थी। अजय माकन ने ट्विट कर लिखा था, ''ईवीएम मशीन पर कई लोगों ने सवाल खड़े किए हैं। मैं चाहता हूं कि निष्पक्ष और निर्विवाद चुनाव के लिए अरविंद केजरीवाल बैलेट पेपर के जरिए एमसीडी चुनाव कराएं।”
आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह पहले ही कह चुके थे कि अगर उत्तर प्रदेश में नगर पालिका और नगर पंचायत के चुनाव बैलेट पेपर से करवाए जा सकते हैं तो दिल्ली में भी नगर निगम चुनाव बैलेट पेपर से करवाए जा सकते हैं।
बता दें कि चुनाव आयोग मंगलवार शाम चुनाव की तारीखों का ऐलान कर देगा। माना जा रहा है कि अप्रैल के पहले हफ्ते में चुनाव हो सकते हैं।
वर्तमान में एमसीडी पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है।









