भारत में पंजाब नेशनल बैंक में एक और घोटाला सामने आया है। वित्तीय फर्जीवाड़ा का नया मामला भी मुंबई स्थित ब्रैडी हाउस शाखा से जुड़ा है। नीरव मोदी और मेहुल चोकसी ने इसी शाखा से भारत के सबसे बड़े बैंकिंग घोटाले को अंजाम दिया था। पंजाब नेशनल बैंक की ओर से इस बाबत शिकायत मिलने पर सीबीआई ने छानबीन शुरू कर दी है।
जांच एजेंसी सीबीआई के मुताबिक, चांदरी पेपर एंड एलाइड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के अधिकारियों ने बैंक को 9.1 करोड़ रुपये का चूना लगाया है। हीरा कारोबारी नीरव मोदी और उनके मामा मेहुल चोकसी ने पी एन बी की इसी शाखा के अधिकारियों से मिलीभगत कर बैंक को दो अरब डॉलर से भी ज्यादा (13,580 करोड़ रुपये) का चूना लगाया था। ब्रैडी हाउस शाखा से रिटायर्ड हुए गोकुलनाथ शेट्टी और मनोज खरट को गिरफ्तार किया जा चुका है, लेकिन नीरव और मेहुल चोकसी भारत से फरार हैं। जांच एजेंसियां पूछताछ के लिए पेश होने को लेकर दोनों के खिलाफ नोटिस भी जारी कर चुकी है। लेकिन, हजारों करोड़ रुपये के घोटाले के दोनों आरोपियों ने भारत लौटने से इनकार कर दिया है।
नीरव मोदी और मेहुल चोकसी ने लेटर्स ऑफ अंडरटेकिंग (एल ओ यू) के जरिये पी एन बी को 13 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का चूना लगाया था। दोनों ने गोकुलनाथ और मनोज खरट के साथ मिलकर बिना किसी सिक्योरिटी के एल ओ यू जारी कराते रहे थे। गोकुलनाथ के सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी जगह पर दूसरे अधिकारी को नियुक्त किया गया था, जिन्होंने बिना सिक्योरिटी के एल ओ यू जारी करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद घोटाले का भेद खुला था।
सीबीआई के अनुसार, नीरव और मेहुल ने सिक्योरिटी तो दूर की बात न्यूनतम कमीशन भी पी एन बी की ब्रैडी हाउस शाखा को नहीं दी थी। जांच एजेंसी का कहना है कि दोनों को मुफ्त में ही एल ओ यू जारी किए जाते रहे थे। ब्रैडी हाउस शाखा की ओर से 6,498 करोड़ रुपये मूल्य के 150 एल ओ यू फ्री में ही जारी कर दिए गए थे। ऐसे में कमीशन के तौर पर भी बैंक को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है। बता दें कि हजारों करोड़ के घोटाले के बाद आरबीआई ने एल ओ यू को ही प्रतिबंधित कर दिया है।
भारत में बुधवार से अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गई है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने पहला अहम फैसला देते हुए तीसरे पक्ष की सभी हस्तक्षेप याचिकाएं खारिज कर दीं। इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी सांसद और वकील सुब्रमण्यम स्वामी को भी हस्तक्षेप करने से रोक दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्रार को साफ शब्दों में निर्देश देते हुए कहा कि इस मामले में कोई हस्तक्षेप याचिकाएं स्वीकार न करें। कोर्ट का फैसला स्वामी की उस दलील के बाद आया, जब उन्होंने कहा कि अयोध्या में विवादास्पाद भूमि पर पूजा करना हमारा मौलिक अधिकार है और ये मौलिक अधिकार संपत्ति के अधिकार से बड़ा है। इस दलील पर कोर्ट ने कहा कि स्वामी की याचिका पर अलग से सुनवाई होगी। इस मामले में अब किसी भी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप वाली याचिका को मान्य नहीं माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मसले पर अगली सुनवाई 23 मार्च को होगी। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस मामले में लगभग 30 हस्तक्षेप याचिकाएं दाखिल हुई थीं। इसमें फिल्म निर्माता अपर्णा सेन और श्याम बेनेगल सहित सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की याचिका भी शामिल थी।
बता दें कि हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बाद अब बौद्ध समुदाय ने भी अयोध्या की विवादित भूमि पर अपना दावा ठोक दिया है। बौद्ध समुदाय के कुछ सदस्यों ने इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की है। याचिका में दावा किया गया है कि अयोध्या की विवादित भूमि असल में एक बौद्ध स्थल है। याचिका में कहा गया है कि बौद्ध समुदाय के दावे का आधार विवादित भूमि पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा की गई 4 खुदाई है, जिनमें बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेष मिले हैं।
गौरतलब है कि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा विवादित स्थल पर अन्तिम बार खुदाई साल 2002-03 में की गई थी। याचिका के अनुसार, अयोध्या में बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले विवादित भूमि का संबंध बौद्ध धर्म से था।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लोकसभा उप चुनाव में भारतीय जनता पार्टी पर बड़ी जीत दर्ज करने पर समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव को बधाई दी।
तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ने ट्वीट किया, ''महान जीत। मायावती और अखिलेश जी को बधाई। अंत की शुरुआत हो चुकी है।'' उन्होंने कहा, ''अररिया और जहानाबाद जीतने पर लालू जी को बधाई। यह महान जीत है।''
ममता बनर्जी के बधाई संदेश पर लालू ने काफी भावुक जवाब दिया। उन्होंने कहा, ''धन्यवाद दीदी, हम सब एक साथ लड़ रहे हैं। हम एक साथ लड़ेंगे और जीतेंगे।''
बता दें कि बिहार में अररिया लोकसभा सीट, भभुआ और जहानाबाद विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे। भभुआ विधानसभा सीट पर जहां बीजेपी की रिंकी पांडे ने जीत हासिल कर ली है तो वहीं जहानाबाद विधानसभा सीट पर आर जे डी प्रत्याशी सुदय यादव जीतने में कामयाब हुए हैं।
वहीं अररिया के लिए अभी मतगणना की जा रही है। अब तक मिले रुझान के अनुसार, अररिया लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय जनता दल की अगुवाई वाला महागठबंधन आगे चल रहा है। 16वें चरण की मतों की गिनती के बाद, अररिया में राजद के सरफराज आलम, भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह से 15000 मतों से आगे चल रहे हैं।
उत्तर प्रदेश की फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में समीकरण बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं। बुधवार को हो रही मतगणना में समाजवादी पार्टी ने फूलपुर सीट पर जीत हासिल कर ली है। समाजवादी पार्टी प्रत्याशी नागेंद्र सिंह पटेल बीजेपी प्रत्याशी कौशलेंद्र सिंह पटेल को 59,613 वोटों से हराने में कामयाब रहे।
वहीं गोरखपुर में भी समाजवादी पार्टी जीत के करीब है। गोरखपुर सीट पर पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और फूलपूर पर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का कब्जा था।
गोरखपुर से समाजवादी पार्टी उम्मीदवार प्रवीण निषाद अपने करीबी प्रतिद्वंदी और भाजपा उम्मीदवार उपेंद्र दत्त शुक्ला से 22,954 मतों से आगे चल रहे हैं। भाजपा इस सीट पर सात बार कब्जा जमा चुकी है।
भारत में आम बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए कम फंड आवंटित करने पर वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने रक्षा मामलों की समिति के समक्ष मौखिक तौर पर बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए कम फंड की व्यवस्था करने की शिकायत की है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि फंड की कमी के कारण कई रक्षा परियोजनाएं बंद हो जाएंगी।
लेफ्टिनेंट जनरल ने समिति के समक्ष कहा, ''बजट 2018-19 से हमारी उम्मीदों को झटका लगा है। रक्षा क्षेत्र में अब तक जो हासिल किया गया है, उस लिहाज से इस बजट से निराशा मिली है। कुछ मद (बी ई) के लिए आवंटित फंड महंगाई दर के अनुरूप भी नहीं है। इससे कर की भी पूर्ति नहीं हो सकेगी। आधुनिकीकरण के लिए आवंटित 21, 338 करोड़ रुपये की राशि बेहद कम है। इससे तो भुगतान (29,033 करोड़ रुपये) को लेकर किए गए वादे को भी पूरा नहीं किया जा सकेगा। आधुनिकीकरण के तहत फिलहाल 125 परियोजनाओं पर काम चल रहा है। इसके अलावा आपात खरीद और अन्य मद पर भी खर्च होगा।''
लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद ने सशस्त्र बलों की मौजूदा स्थिति के बारे में भी समिति को जानकारी दी थी। उन्होंने कहा, ''सामान्य तौर पर किसी भी आधुनिक आर्म्ड फोर्सेज में एक तिहाई उपकरण विंटेज (पुराने), एक तिहाई मौजूदा तकनीक की श्रेणी और एक तिहाई सैन्य साजो-सामान स्टेट ऑफ द आर्ट (अत्याधुनिक) होते हैं। जहां तक हमारा सवाल है तो हमारे सशस्त्र बलों के पास मौजूद 68 फीसद उपकरण विंटेज श्रेणी के हैं।''
सैन्य अधिकारी ने मौखिक शिकायत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी मेक इन इंडिया परियोजना का भी उल्लेख किया। लेफ्टिनेंट जनरल शरत ने कहा, ''सेना में 25 परियोजनाओं की पहचान मेक इन इंडिया के तौर पर की गई है। हालांकि, सेना के पास इसे पूरा करने के लिए पर्याप्त बजट नहीं है। नतीजतन इनमें से कई परियोजनाओं को समय से पहले ही बंद कर दिया गया।''
लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद ने रक्षा समिति के समक्ष फ्यूचर रेडी कांबैट व्हिकल्स (एफ आर सी वी) के उत्पादन की भी निराशाजनक तस्वीर पेश की। उन्होंने कहा, ''जितना बजट आवंटित किया गया है, इससे एफ आर सी वी के उत्पादन के काम में कुछ और वर्षों की देरी होगी। मुझे नहीं मालूम कि इसका क्या भविष्य होगा।''
सैन्य अधिकारी ने उत्तरी सीमा से लगते इलाकों में आधारभूत संरचना को विकसित करने के लिए भी कम फंड आवंटित करने की बात कही। उन्होंने बताया कि सशस्त्र बलों के लिए कुल मिलाकर 12,296 करोड़ रुपये की कमी है।
बता दें कि डोकलाम में तनाव के बाद भारत ने उत्तरी सीमा पर मौलिक सुविधाओं का विस्तार करने की योजना बनाई है। इसके अलावा पाकिस्तान से लगते सीमावर्ती इलाकों में तैनात सुरक्षाबलों को अत्याधुनिक उपकरण मुहैया कराने की बात कही गई है। मोदी सरकार ने रक्षा क्षेत्र के लिए ऐसे समय में कम बजट का प्रावधान किया है, जब चीन लगातार अपने रक्षा बजट को बढ़ा रहा है। सेना की तरह ही वायुसेना और नौसेना भी अत्याधुनिक उपकरणों और विमानों की कमी से जूझ रही है।
त्रिपुरा के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर भारतीय जनता पार्टी ने आई पी एफ टी के साथ मिलकर सरकार बना ली है। बिप्लब देब को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया है। इससे पहले 25 सालों तक कम्युनिस्ट पार्टी के मानिक सरकार सत्ता पर काबिज थे।
इन चुनावों में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सरकार बनाई है। बीजेपी की इस जीत के पीछे जिस नेता का नाम सबसे ज्यादा उछला, वो नाम है त्रिपुरा में बीजेपी के चुनाव प्रभारी सुनील देवधर का। अब सरकार बनने के बाद सुनील देवधर ने कहा है कि यहां राज्य में हिंदू भी बीफ खाते हैं इसलिए इस पर बैन नहीं लगना चाहिए।
बता दें कि केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद से ही बीफ को लेकर काफी हो-हल्ला मचा हुआ है। बीजेपी की तरफ से कई बार बीफ बैन के पक्ष में बातें कही जाती रही हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने भी बीफ बैन की वकालत की थी।
बीफ बैन को लेकर जहां विरोधी दल बीजेपी पर ये कहते हुए हमला करते रहे हैं कि 'कई राज्यों में अभी भी लोग बीफ खाते हैं। ऐसे में बीजेपी कानून लाकर पूरे देश में बीफ को क्यों नहीं बैन कर देती।'
मंगलवार को त्रिपुरा में बीजेपी प्रभारी सुनील देवधर ने कहा, ''किसी राज्य में अगर बहुसंख्यक लोग नहीं चाहते हैं तो वहां की सरकार बीफ पर बैन लगाएगी? नॉर्थ ईस्ट के राज्यों में बहुसंख्यक लोग उसे खाते हैं तो वहां की सरकार उस पर प्रतिबंध नहीं लगाती।''
सुनील देवधर ने त्रिपुरा में बीफ बैन के मुद्दे पर मीडिया से बात करते हुए कहा कि, ''यहां पर ज्यादातर मुसलमान और क्रिश्चियन हैं। कुछ हिंदू भी ऐसे हैं जो ये मांस खाते हैं तो मुझे लगता है कि उसपर कोई बैन नहीं होना चाहिए। इसलिए वहां बैन नहीं है।''
भारतीय संसद में पिछले सात दिन से लगातार जारी गतिरोध के बीच कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने मंगलवार को सरकार पर चर्चा से भागने का आरोप लगाया। विपक्षी दलों ने दावा किया कि वह किसानों सहित प्रमुख मुद्दों पर संसद में सरकार की जवाबदेही तय करेगी।
सोनिया गांधी के आवास पर मंगलवार को विपक्षी दलों का रात्रिभोज हुआ जिसमें मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, जनता दल एस, राष्ट्रीय जनता दल सहित 20 विपक्षी दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया।
इस बैठक में मौजूदा राजनीतिक हालात सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। रात्रिभोज में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार, तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय, समाजवादी पार्टी के रामगोपाल यादव, बहुजन समाज पार्ट के सतीशचंद्र मिश्र, राष्ट्रीय जनता दल से मीसा भारती और तेजस्वी यादव, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से मोहम्मद सलीम, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से डी राजा, द्रमुक से कनिमोई, और शरद यादव आदि ने हिस्सा लिया। कांग्रेस की ओर से पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल, ए के एंटनी आदि ने भाग लिया।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस रात्रिभोज के बाद ट्वीट कर कहा, ''संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी जी की मेजबानी में आज शानदार रात्रिभोज। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए औपचारिक रूप से मिलने एवं संबंध बनाने का अवसर।''
राहुल ने कहा, ''काफी राजनीतिक चर्चा, किन्तु इससे भी महत्वपूर्ण खासी सकारात्मक ऊर्जा, गर्मजोशी एवं वास्तविक स्रेह।'' राहुल ने इस ट्वीट के साथ रात्रिभोज की तस्वीरें भी टैग की हैं जिसमें वह शरद पवार समेत विभिन्न नेताओं के साथ दिख रहे हैं।
रात्रि भोज के बाद कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने संवाददाताओं को बताया कि यह प्रीति और मैत्री वाला रात्रि भोज था। कांग्रेस का मानना है कि जहां सरकार दीवार खड़ी करेगी, वहीं हम मित्रता, सौहार्द एवं मिलकर साथ चलने का रास्ता तैयार करेंगे।
उन्होंने कहा कि यह रात्रिभोज राजनीति के लिए नहीं था। पर स्वाभाविक है कि जहां सरकार संसद चलाने को इच्छुक नहीं है तो वे राजनीतिक नेता, जो अपने क्षेत्रों के लोगों की समस्याओं को लेकर जागरूक और चिंतित हैं, जब मिलेंगे तो प्रदेश और देश की राजनीति पर चर्चा अवश्य होगी। सुरजेवाला ने कहा कि इन नेताओं के बीच गरीबों, युवाओं और किसानों को लेकर बातचीत हुई। उन्होंने कहा कि देश की धुरी संसद में सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित हो, इस बारे में अनौपचारिक बातचीत होना भी स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा कि इस रात्रिभोज का एक ही मकसद है ... सौहार्दपूर्ण और मित्रता वाले माहौल में विपक्षी नेता बैठकर व्यक्तिगत और राष्ट्र से जुड़े मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान कर सकें।
पत्रकार के एक प्रश्न के उत्तर में सुरजेवाला ने कहा, ''आज जब देश के सामने विकट संकट है, सरकार की नाक के नीचे से करोड़ों रूपये लेकर भगोड़े भाग गये। हजारों किसान सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर सरकार के पास अपनी व्यथा सुनाने पहुंचे, पर सरकार उनकी बात सुन नहीं रही। आज जब बेरोजगारी सिर चढ़कर बोल रही है। भ्रष्टाचार का बोलबाला है। ऐसे में विपक्षी नेता, भले ही उनसे हमारा मतभेद हो, पर वे राष्ट्रीय हित में इन मुद्दों का समाधान निकालने के लिए चिंतित हैं।
सुरजेवाला ने कहा कि संसद चलाने की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की है। अगर संसद में कोई गतिरोध उत्पन्न कर रहा है तो वह सत्ता पक्ष के लोग हैं, विपक्ष के नेता नहीं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और विपक्षी नेता चाहते हैं कि सरकार की संसद में जवाबदेही तय हो। सरकार चर्चा से भाग रही है । लेकिन हम यह सुनिश्चित करेंगे कि संसद भी चले और सरकार की जवाबदेही भी तय हो।
रात्रिभोज में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, बसपा प्रमुख मायावती और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के नहीं आने के बारे में पूछे जाने पर सुरजेवाला ने कहा कि इन पार्टियों के संसद के नेता इस रात्रिभोज में आये हैं। इस मित्रतापूर्ण रात्रिभोज को राजनीतिक तौर पर इससे अधिक नहीं देखा जाना चाहिए। सोनिया गांधी के इस रात्रिभोज को 2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा खड़ा करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, रात्रि भोज में तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय, नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, ए आई यू डी एफ, झामुमो के हेमंत सोरेन, रालोद के अजित सिंह, आई यू एम एल के कुट्टी, जे वी एम के बाबूलाल मरांडी, आर एस ए पी के रामचन्द्रन, शरद यादव, हिन्दुस्तानी वाम मोर्चा के जीतनराम मांझी, जनता दल एस के डा. कुपेन्द्र रेड्डी तथा केरल कांग्रेस के प्रतिनिधि ने भाग लिया।
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने आधार लिंक करने की आखिरी तारीख को बढ़ा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा जब तक आधार योजना की वैधता पर संविधान पीठ का फैसला नहीं आता, तब तक लिंकिंग जरूरी नहीं है।
इसका मतलब है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आधार को लिंक कराने से जुड़े मामले पर फैसला नहीं देती, तब तक आधार को लिंक कराने की जरूरत नहीं है।
भारत के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा कि सरकार आधार लिंकिंग पर किसी को बाध्य नहीं कर सकती। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कोई तारीख निर्धारित नहीं की गई है।
बता दें कि मोबाइल, बैंकिंग, इनकम टैक्स, पैन कार्ड आदि से आधार को लिंक करने की आखिरी तारीख 31 मार्च 2018 थी।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 23 फरवरी 2018 को ही आधार लिंकिंग की तारीख को बढ़ाकर 31 मार्च 2018 कर दिया गया था।
सरकार ने सरकारी स्कीमों के तहत फायदा लेने के लिए आधार कार्ड को बैंक खाते से लिंक कराना अनिवार्य कर दिया है। पेंशन, एल पी जी सिलेंडर, सरकारी स्कॉलरशिप के लिए आधार कार्ड की जानकारी देना जरूरी है। सरकार ने अब ड्राइविंग लाइसेंस के लिए भी आधार कार्ड जरूरी कर दिया है। इसके बाद इन सभी के लिए आधार को लिंक करने की आखिरी तारीख को बढ़ाकर 31 मार्च 2018 कर दिया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आधार लिंकिंग की समय सीमा ख़त्म हो गई है।
भारत के जम्मू-कश्मीर में हुर्रियत कांफ्रेंस और आतंकियों के बीच के संबधों की एक बार फिर से पुष्टि हुई है। अनंतनाग में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में ढेर आतंकी ईसा फाजली की हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गीलानी के साथ एक तस्वीर सामने आई है। अनंतनाग मुठभेड़ में तीन आतंकियों को मार गिराया गया, जिसमें ईसा भी एक था।
श्रीनगर के डाउन-टाउन इलाके सोहरा का रहने वाला ईसा राजौरी में स्थित बाबा गुलाम शाह बादशाह यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ईसा फाजली ने पिछले साल सितंबर में अचानक से पढ़ाई छोड़ दी थी और आतंकी संगठन में शामिल हो गया था। वह लंबे समय से लापता था।
बता दें कि हुर्रियत नेताओं पर अक्सर ही आतंकियों से साठगांठ करने के आरोप लगते रहे हैं। भारत की जाँच एजेंसी एन आई ए आतंकियों को धन मुहैया कराने के मामले में अलगाववादी संगठन के कई नेताओं की जांच भी कर रही है। जांच एजेंसी छानबीन के दौरान आई एस आई-हुर्रियत-लश्कर के बीच के संबंधों का पहले ही पता लगा चुकी है।
एन आई ए द्वारा फरवरी में दाखिल चार्जशीट में यूनाइटेड जिहाद काउंसिल (कश्मीर में सक्रिय आतंकी गुटों का संगठन), जमात-उद-दावा, कश्मीर के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई एस आई का डेडिकेटेड सेल और हुर्रियत नेताओं के साथ मिलकर काम करने की बात कही गई थी। जांच एजेंसी के अनुसार, ये सब मिलकर भारत विरोधी गतिविधियां चला रहे हैं।
भारतीय सेना के साथ मुठभेड़ में मारे जाने के बाद ईसा फाजली के शव को उसके परिजनों के हवाले कर दिया गया था। आतंकी के घर पर बड़ी तादाद में लोग इकट्ठा हो गए थे। वहां उसके घर पर इस्लामिक स्टेट (आई एस) का झंडा भी फहराया गया। स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक एस पी वैद्य ने बताया कि अनंतनाग मुठभेड़ में मारे गए आतंकी पुलिसकर्मियों की हत्या और हथियार छीनने की घटनाओं में संलिप्त थे।
आतंकी ईसा के पिता नईम फाजली बेटे के गायब होने से बहुत चिंतित थे। मुठभेड़ से कुछ दिनों पहले ही उन्होंने फेसबुक पर एक पोस्ट डालकर ईसा से घर लौटने का आग्रह किया था। उन्होंने लिखा था, ''ईसा तुम्हारी मासूमियत का कुछ निहित स्वार्थों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। तुम्हें कठपुतली या पोस्टर ब्वॉय बनाया जा रहा है। मैं कसम खाकर कहता हूं कि कुरआन के तहत तुम सही रास्ते पर नहीं हो। कृपा करके आग से मत खेलो। जितना जल्द हो सके, तुम लौट आओ। तुम्हारी मां अपने हाथों में तुम्हारा सामान लेकर यहां-वहां भटकती रहती है। विश्वास करो, माता-पिता के आशीर्वाद और प्रार्थना के बिना कोई भी कभी भी सफल नहीं हो सकता है।''
जम्मू-कश्मीर में एक कॉलेज लेक्चरर की मौत के मामले में पुलिस ने अपनी जांच में भारतीय सेना के 23 जवानों को जिम्मेदार ठहराया है। ये लोग 50 राष्ट्रीय राइफल्स से ताल्लुक रखते हैं। राज्य पुलिस ने सेना के जवानों के खिलाफ केस चलाने की इजाजत मांगी है।
आरोप है कि साल 2016 में लेक्चरर की मौत सेना की हिरासत में बेरहमी से पीटे जाने के कारण हुई थी। अवंतिपुरा एस एस पी मोहम्मद जाहिद ने बताया, ''दो हफ्ते पहले इस मामले में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने जांच पूरी की थी। अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं हुई है। हमें उनके (सेना के लोगों) खिलाफ केस चलाने के लिए ऑर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (ए एफ एस पी ए) के तहत मंजूरी चाहिए होगी। ऐसे में मैं अभी जांच के अंतिम निष्कर्ष के बारे में कुछ नहीं कहना चाहूंगा। आपको बता दें कि 17 अगस्त 2016 की रात को लेक्चरर शब्बीर अहमद मंगो (30) की मौत हो गई थी।
आरोप है कि दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा जिले के शारशाली गांव में सेना के जवानों ने उन्हें पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया था। यह भी दावा किया गया था कि सेना के जवानों ने गांव वालों को लकड़ी के तख्तों, सरिया और राइफल की बट से पीटा था। ग्रामीणों के अनुसार, सेना के जवान शब्बीर के घर में घुस आए थे। वे उसे घसीटते हुए बाहर लाए थे और पीटने लगे थे, जिसके बाद वे उसे अपने साथ ले गए थे। शब्बीर के साथ गांव के अन्य 20 नौजवानों को भी सेना के जवान अपने साथ ले गए थे।
बाद में उसी रात सैनिक लेक्चरर समेत तीन लोगों को थाने ले गए। शब्बीर की हालत नाजुक थी, लेकिन पुलिस वाले उसे वापस ले जाने के लिए कह रहे थे। उसने पानी मांगा था, जिसके बाद वहीं उसने दम तोड़ दिया। फिर उसकी लाश पंपोर के उप-जिला अस्पताल ले जाई गई। सीएम महबूबा मुफ्ती ने इस मामले पर सेना के आरोपी लोगों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए थे। विधानसभा में सीएम ने ऐलान किया था कि राज्य पुलिस एस आई टी इस मामले की जांच करेगी।
पुलिस ने इस मामले में रणबीर पेनल कोड (आर बी सी) की धारा 364, 302, 307, 447, 427, 120-बी के तहत पंपोर पुलिस थाने में सेना के 23 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था। हालांकि, सेना की ओर से बाद में जवाबी एफ आई आर दाखिल की गई, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि शब्बीर की मौत में सेना के लोगों का कोई हाथ नहीं है। मगर इसका कोई खास फायदा नहीं हुआ। 50 राष्ट्रीय राइफल्स के मेजर की ओर से दर्ज कराई गई इस एफ आई आर में कही गई बातें साबित नहीं की जा सकीं।
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपने एक ऐतिहासिक फैसले में इस तथ्य को मान्यता दे दी कि असाध्य रोग से ग्रस्त मरीज इच्छा-पत्र (वसीयत) लिख सकता है। अदालत का यह फैसला चिकित्सकों को असाध्य रोग के मरीज के जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति देता है। अदालत ने कहा है कि जीने की इच्छा नहीं रखने वाले व्यक्ति को निष्क्रिय अवस्था में शारीरिक पीड़ा सहने नहीं देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा है कि निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु और अग्रिम इच्छा पत्र लिखने की अनुमति है। संविधान पीठ ने कहा कि इस मामले में कानून बनने तक फैसले में प्रतिपादित दिशा-निर्देश प्रभावी रहेंगे। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति ए के सीकरी, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं।
पीठ ने अपने फैसले में कुछ दिशा-निर्देश भी प्रतिपादित किए हैं। जिनमें कहा गया है कि कौन इस तरह के इच्छा पत्र का निष्पादन कर सकता है और किस तरह से मेडिकल बोर्ड इच्छा मृत्यु के लिए अपनी सहमति देगा। इच्छा-पत्र भी वसीयत का ही एक रूप है। संविधान पीठ ने गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया। इस याचिका में अनुरोध किया गया था कि असाध्य रोगों से ग्रस्त मरीजों को शारीरिक कष्टों से मुक्ति दिलाने और मृत्यु का वरण करने के लिए जीवन रक्षक उपकरणों को हटाने की अनुमति प्रदान की जाए।
शीर्ष अदालत ने कहा कि असाध्य बीमारी से ग्रस्त मरीजों के मामले में ऐसे मरीज के नजदीकी मित्र और रिश्तेदार इस तरह अग्रिम निर्देश दे सकते हैं और इच्छा-पत्र का निष्पादन कर सकते हैं। इसके बाद मेडिकल बोर्ड ऐसे इच्छा-पत्र पर विचार करेगा।
प्रधान न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हालांकि संविधान पीठ की चार और अलग-अलग राय हैं, परंतु सभी जज इस बात पर एकमत हैं कि चूंकि एक मरीज में जीने की इच्छा नहीं होने पर उसे निष्क्रिय अवस्था की पीड़ा सहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, इसलिए ऐसे इच्छा-पत्र (वसीयत) को मान्यता दी जानी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने 2011 में अरुणा शानबाग के मामले में निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु को मान्यता देते हुए अपने फैसले में ऐसे मरीज के जीवन-रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दी थी जो एक सुविज्ञ निर्णय करने की स्थिति में नहीं है।
केंद्र सरकार ने 15 जनवरी, 2016 को अदालत को सूचित किया था कि विधि आयोग ने अपनी 241वीं रिपोर्ट में चुनिंदा सुरक्षा उपायों के साथ निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु की अनुमति देने की सिफारिश की थी।
बता दें कि एक मई, 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति को निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु की अनुमति देने संबंधी गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका को मंजूरी दी। अदालत ने सम्मान के साथ मृत्यु के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में घोषित करने का अनुरोध करने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा।
16 जनवरी, 2006 को अदालत ने दिल्ली चिकित्सा परिषद (डी एम सी) को हस्तक्षेप करने की अनुमति दी और निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु पर दस्तावेज दायर करने का निर्देश दिया।
28 अप्रैल, 2006 को विधि आयोग ने निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु पर एक विधेयक का मसौदा तैयार करने की सलाह दी और कहा कि हाईकोर्ट में दायर ऐसी याचिकाओं पर विशेषज्ञों की राय लेने के बाद ही फैसला हो।









