भारत में सुप्रीम कोर्ट में काजकाज को लेकर शुक्रवार (12 जनवरी) को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सवाल उठाने वाले चार जजों में शामिल जस्टिस कुरियन ने एक बार फिर साफ किया है कि उन्होंने जो किया, न्यायपालिका के हित में किया। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि जजों की प्रेस कॉन्फ्रेस ने किसी तरह के अनुशासन को तोड़ा है।
उन्होंने इसे सुप्रीम कोर्ट प्रबंधन में पारदर्शिता लाने वाला कदम बताया। जस्टिस कुरियन के पैतृक घर में जब कुछ स्थानीय समाचार चैनलों ने उनसे पिछले दिन की घटना को लेकर आगे के कदम के बारे में सवाल किया तो उन्होंने कहा, न्याय और न्यायपालिका के साथ वह खड़े हैं, जैसा कि उन्होंने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था।
उन्होंने पत्रकारों से कहा कि एक मुद्दा सामने आया है, जिसे निश्चित रूप से सुलझा लिया जाएगा। जस्टिस कुरियन ने कहा कि ऐसा केवल इसलिए किया गया ताकि लोगों का न्यायपालिका पर विश्वास बढ़ सके।
सुप्रीम कोर्ट के चार जजों जस्टिस जे चेलामेश्वर, रंजन गोगोई, एम बी लोकुर और कुरियन जोसफ ने शुक्रवार को नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सुप्रीम कोर्ट में कामकाज को लेकर सवाल उठाए थे। जजों ने सीजेआई पर अपने पसंद के जजों को मामले सौंपने का आरोप लगाया था।
उन्होंने कहा था कि अगर संस्थान में ऐसा चलता रहा तो लोकतंत्र जिंदा नहीं रहेगा। सीजेआई के बाद दूसरे स्थान पर आने वाले जस्टिस जे चेलामेश्वर ने कहा था कि कई दफा सुप्रीम कोर्ट का प्रबंधन अपनी लय में नहीं रहा, पिछले कुछ महीनों में ऐसी चीजों हुई जो नहीं होनी चाहिए थी। चेलामेश्वर ने कहा था कि इस बाबत वह सीजेआई दीपक मिश्रा से मिले थे और संस्थान को हानि पहुंचानी वाली चीजों को बारे में अवगत कराया था।
बता दें कि ऐसा पहली बार हुआ है। जब जजों ने सुप्रीम कोर्ट के अंदरूनी मामलों को मीडिया के सामने सार्वजनिक तौर पर उजागर किया हो। केंद्र की मोदी सरकार ने इसे न्यायपालिका का मामला बताया था। लेकिन शनिवार को प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा जस्टिस चेलामेश्वर से मुलाकात करने उनके आवास पर गए थे, जहां उन्हें बैरंग लौटना पड़ा। इससे पहले अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सब कुछ ठीक हो जाने की उम्मीद जताई थी। अटॉर्नी जनरल ने इस मामले पर शुक्रवार को ही सीजेआई से मुलाकात कर चर्चा की थी।
भारत में सुप्रीम कोर्ट में शीर्ष स्तर पर असंतोष खुलकर बाहर आ गया, इसके चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने सार्वजनिक रूप से शुक्रवार (12 जनवरी, 2017) को प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर मामलों को उचित पीठ को आवंटित करने के नियम का पालन नहीं करने का आरोप लगाया। इसमें से एक मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के न्यायाधीश बी एच लोया की रहस्यमय परिस्थिति में हुई मौत से संबंधित याचिका को उचित पीठ को नहीं सौंपे जाने का मामला शामिल है।
सीजीआई के खिलाफ विरोध जताने के लिए न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर के आवास पर चारों वरिष्ठ न्यायधीशों ने मीडिया को भी संबोधित किया जिसमें आरोप लगाया गया कि सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ठीक से काम नहीं कर रहा है। हालांकि खास बात यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायधीश प्रेस कॉन्फेंस कर रहे थे, तब प्रधान न्यायधीश दीपक मिश्रा ने अपने समझ करीब 77 केसों की सुनवाई की। वह कोर्टरूप में शाम 3:35 तक थे। उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी। लेकिन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने इस दौरान मीडिया से बात करने से इंकार कर दिया।
उधर न्यायधीशों ने आरोप लगाते हुए आगे कहा, ''सुबह भी एक खास मुद्दे पर हम चारों एक खास अनुरोध के साथ प्रधान न्यायाधीश से मुलाकात करने गए। दुर्भाग्यवश हम उन्हें समझा पाने में विफल रहे। इसके बाद इस संस्थान को बचाने का इस देश से आग्रह करने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं रह गया।'' उन्होंने प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को लिखे बिना तिथि वाला एक पत्र जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा है कि प्रधान न्यायाधीश सर्वेसर्वा (मॉस्टर ऑफ रॉस्टर) हैं, लेकिन यह व्यवस्था ''साथी न्यायाधीशों पर कानूनी या तथ्यात्मक रूप से प्रधान न्यायाधीश के किसी आधिपत्य को मान्यता नहीं देती है।''
न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की मौजूदगी में न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने हालांकि इस बात का उल्लेख नहीं किया कि वह प्रधान न्यायाधीश द्वारा किस मामले को उचित पीठ को नहीं दिए जाने के बारे में बात कर रहे हैं। जब न्यायाधीशों से विशेष रूप से यह पूछा गया कि क्या वे सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बृजगोपाल हरिकृष्ण लोया की मौत की जांच की मांग करने वाले मामले को लेकर नाराज हैं? जवाब में न्यायमूर्ति गोगोई ने 'हां' कहा। न्यायाधीश लोया गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख के उस मामले की सुनवाई कर रहे थे, जो उसे कथित रूप से फर्जी मुठभेड़ में मार गिराए जाने से संबंधित था। इस मामले के आरोपियों में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का भी नाम था। न्यायाधीश लोया का कथित तौर पर हृदय गति रुक जाने से निधन हो गया था। उनके परिजनों ने उनके निधन की परिस्थितियों पर सवाल उठाया था, और मामले की स्वतंत्र जांच कराए जाने की मांग की थी।
इस मामले की जांच की मांग करने वाली याचिकाएं शुक्रवार को सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए पेश की गईं, और शीर्ष न्यायालय ने इस मामले पर चिंता जताते हुए इसे 'गंभीर मामला' बताया। न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को इस मामले से जुड़े सारे दस्तावेज 15 जनवरी तक न्यायालय के समक्ष पेश करने के निर्देश दिए। सात पृष्ठों के पत्र में हालांकि चारों न्यायाधीशों ने कहा कि वे संस्थान को शर्मिदगी से बचाने के लिए विस्तृत जानकारी नहीं दे रहे हैं, क्योंकि 'इस तरह कुछ हदतक संस्थान की छवि पहले ही खराब हो चुकी है।' सर्वोच्च न्यायालय में शीर्ष स्तर पर इस तरह का असंतोष ऐसे समय में सामने आया है, जब पिछले वर्ष नवंबर में न्यायमूर्ति मिश्रा ने घोषणा की थी कि प्रधान न्यायाधीश ही सर्वोच्च न्यायालय के सर्वेसर्वा हैं और उनके पास विशेषाधिकार है कि वह किस मामले को किस न्यायाधीश को देंगे।
इससे एक दिन पहले न्यायमूर्ति चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय पीठ ने आदेश दिया था कि सर्वोच्च न्यायालय में पांच शीर्ष न्यायाधीशों की पीठ को भ्रष्टाचार के उस मामले की जांच करनी चाहिए, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामले के निपटारे को लेकर कथित रूप से रिश्वत ली गई थी। चारों न्यायाधीशों ने कहा कि प्रधान न्यायाधीश समकक्ष न्यायाधीशों में सिर्फ पहला स्थान भर रखते हैं। चारों न्यायाधीशों ने कहा कि रॉस्टर निर्धारण के मामले में प्रधान न्यायाधीश के लिए एक सुव्यवस्थित और स्पष्ट दिशानिर्देश है, जिसके अनुसार पीठ की क्षमता के आधार पर ही किसी विशेष मामले को उसे सौंपा जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठता के आधार पर दूसरे नंबर के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर के आवास पर जल्दबाजी में बुलाए गए संवाददाता सम्मेलन में न्यायाधीशों ने कहा, ''यह भारतीय न्याय व्यवस्था, खासकर देश के इतिहास और यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय के लिए एक असाधारण घटना है। हमें इसमें कोई खुशी नहीं है, जो हम यह कदम उठाने पर मजबूर हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय का प्रशासन ठीक से काम नहीं कर रहा है। पिछले कुछ महीनों में ऐसा बहुत कुछ हुआ है, जो नहीं होना चाहिए था। देश और संस्थान के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। हमने प्रधान न्यायाधीश को संयुक्त रूप से समझाने की कोशिश की कि कुछ चीजें ठीक नहीं हैं और तत्काल उपचार की आवश्यकता है।''
न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने कहा, ''दुर्भाग्यवश इस संस्थान को बचाने के कदम उठाने के लिए भारत के प्रधान न्यायाधीश को राजी करने की हमारी कोशिश विफल साबित हुई है।'' चारों न्यायाधीशों ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए, जिसपर पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय और सरकार के बीच तकरार चल रही है। न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने पत्रकारों से कहा कि हम चारों इस बात से सहमत हैं कि ''लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए निष्पक्ष न्यायाधीश और न्याय प्रणाली की जरूरत है।''
उन्होंने कहा, ''हम चारों इस बात से सहमत हैं कि जबतक इस संस्थान को इसकी आवश्यकताओं के अनुरूप बचाया और बरकरार नहीं रखा जाएगा, इस देश का लोकतंत्र या किसी भी देश का लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रह सकता। किसी लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए, ऐसा कहा गया है ... किसी लोकतंत्र की कसौटी स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायाधीश होते हैं।'' उन्होंने कहा, ''हमने ढेर सारे विद्वानों को इस तरह की बातें करते सुना है ....लेकिन मैं नहीं चाहता कि कुछ विद्वान आज से 20 वर्ष बाद हमसे भी कहें कि हम चारों न्यायाधीशों ने संस्थान और देश की हिफाजत करने के बदले अपनी आत्मा को बेच दिया। हमने इसे जनता के समक्ष रख दिया है। हम यही कहना चाहते थे।
आखिर वास्तव में मुद्दा क्या है? न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने कहा, ''कुछ महीने पहले, हम चारों वरिष्ठ न्यायाधीशों ने प्रधान न्यायाधीश को एक हस्ताक्षरित पत्र लिखा था। हम एक विशेष विषय के बारे में चाहते थे कि उसे विशेष तरीके से किया जाए। यह हुआ, लेकिन इससे कई सवाल भी खड़े हुए।'' न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि वे लोग ''देश के प्रति अपना कर्ज उतार रहे हैं।''
केंद्रीय कानून राज्य मंत्री पी पी चौधरी ने कहा, ''हमारी न्यायप्रणाली विश्व भर में पहचानी जाने वाली और मान्यता प्राप्त न्यायिक प्रणाली है। यह एक स्वतंत्र न्यायपालिका है। मेरे विचार से किसी भी एजेंसी को हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। प्रधान न्यायाधीश और अन्य सदस्यों को एकसाथ बैठना चाहिए और मामले को सुलझाना चाहिए। घबराने का कोई जरूरत ही नहीं है।''
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भाकपा के नेता डी राजा ने न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर से मुलाकात की और उसके बाद उन्होंने कहा कि शीर्ष न्यायालय में पैदा हुई इस तरह की समस्याओं के निपटारे के लिए संसद को तरीके विकसित करने होंगे। समझा जाता है कि न्यायमूर्ति एस ए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव ने न्यायमूर्ति चेलमेश्वर से मुलाकात की है।
भारत में वकालत करने वाले जनप्रतिनिधियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने वकालत करने वाले नेताओं को नोटिस जारी किया है। भारत के 500 से ज्यादा सांसदों, विधायकों और पार्षदों को नोटिस का जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय दिया गया है। इसमें जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछा गया है कि क्यों न उन्हें वकालत करने से रोक दिया जाए?
बार काउंसिल ने इस गंभीर मसले पर विचार करने के लिए एक्सपर्ट कमेटी का भी गठन किया है। जनप्रतिनिधियों का जवाब आने के बाद इसको लेकर नए सिरे से गाइडलाइंस तय किये जायेंगे। नेताओं द्वारा वकालत करने का मामला समय-समय पर उठता रहा है। इसको देखते हुए बार काउंसिल ने इस पर ठोस कदम उठाया है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया की 22 जनवरी को होने वाली बैठक में सांसदों और विधायकों के वकालत करने के मामले पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। बार काउंसिल ने नोटिस जारी कर पूछा है, 'चूंकि आप सभी जनप्रतिनिधि के तौर पर काम कर रहे हैं तो क्यों न आपको वकालत करने से रोक दिया जाए।'
ऐसे सभी नेता अपने जवाब, आपत्ति और सुझाव दर्ज करा सकते हैं। बार काउंसिल की बैठक में इस पर विचार किया जाएगा। इस मसले पर बार काउंसिल द्वारा गठित समिति के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने इसपर स्थिति साफ की है। उन्होंने बताया कि इन नेताओं को इसलिए नोटिस भेजा गया है, ताकि मान्यता रद्द करने की स्थिति में वे न्यायिक व्यवस्था के उल्लंघन की बात न कह सकें।
बार काउंसिल द्वारा ऐसे नेताओं के खिलाफ फैसला लेने की स्थिति में कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, के टी एस तुलसी, पी. चिदंबरम, भूपेंद्र यादव, मिनाक्षी लेखी जैसे दिग्गज जनप्रतिनिधियों की वकालत खतरे में पड़ सकती है।
सांसदों द्वारा वकालत करने से जुड़ी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने शीर्ष अदालत में अर्जी दाखिल कर नेताओं द्वारा वकालत करने को हितों के टकराव का गंभीर मामला करार दिया है।
बार काउंसिल द्वारा गठित विशेषज्ञों की समिति ने भी सांसदों और विधायकों द्वारा वकालत करने को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन माना है।
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (10 जनवरी, 2017) को इस तरह की आलोचनाओं पर नाराजगी जाहिर की कि वह सरकार चलाने का प्रयास कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि यदि कार्यपालिका द्वारा अपना काम नहीं करने की ओर ध्यान खींचा जाए तो न्यायपालिका पर आरोप लगाए जाते हैं। न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने इस तरह की कड़ी टिप्पणियां देश में शहरी बेघरों को आवास मुहैया कराने से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान की।
पीठ ने सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश के योगी सरकार को आड़े हाथ लिया और कहा, ''ऐसा लगता है कि आपका तंत्र विफल हो गया है।'' पीठ ने कहा, ''यदि आप लोग काम नहीं कर सकते हैं तो ऐसा कहिए कि आप ऐसा नहीं कर सके। हम कार्यपालिका नहीं हैं। आप अपना काम नहीं करते हैं और जब हम कुछ कहते हैं तो देश में सभी यह कहकर हमारी आलोचना करते हैं कि हम सरकार और देश चलाने का प्रयास कर रहे हैं।''
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन योजना 2014 से चल रही है परंतु उत्तर प्रदेश सरकार ने लगभग कुछ नहीं किया है।
पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सालिसीटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि प्राधिकारियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह मामला मनुष्यों से संबंधित है। पीठ ने कहा, ''ऐसी कुछ चीजे हैं। हम उन लोगों के बारे में बात कर रहे हैं जिनके पास रहने की कोई जगह नहीं है। और ऐसे लोगों को जिंदा रहने के लिए कोई स्थान तो देना ही होगा।'' मेहता ने कहा कि राज्य सरकार स्थिति के प्रति सजग है और शहरी बेघरों को बसेरा उपलब्ध कराने के लिए अथक प्रयास कर रही है।
पीठ शहरी बेघरों और राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन योजना पर अमल से संबंधित मामले से निबटने के लिए राज्य स्तर पर समितियां गठित करने के सुझाव पर भी विचार कर रही है। केन्द्र ने न्यायालय को सुझाव दिया कि इन मुद्दों से निबटने के लिए वह प्रत्येक राज्य में दो सदस्यीय समिति गठित कर सकता है। अदालत ने केन्द्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ तालमेल करके समिति के लिए अधिकारी के नामों के सुझाव देने को कहा। न्यायालय ने याचिकाकर्ता से भी कहा कि उसे भी सिविल सोसायटी से एक-एक व्यक्ति के नाम का सुझाव देना चाहिए।
अदालत ने दो सप्ताह के भीतर आवश्यक कदम उठाने का निर्देश देते हुए इस मामले की सुनवाई आठ फरवरी के लिए स्थगित कर दी है। इस बीच, याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि उत्तर प्रदेश में यह बहुत बड़ा काम है क्योंकि वहां एक लाख अस्सी हजार बसेरों की आवश्यकता है और अभी करीब सात हजार ही बने हैं।
भारत में कांग्रेस ने बुधवार को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निंदा की। कांग्रेस ने कहा कि सरकार के 'सकल आर्थिक कुप्रबंधन' के कारण ही भारत की विकास दर घटी है।
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट किया, ''सरकार का सकल आर्थिक कुप्रबंधन, जिसके कारण भारत की आर्थिक रफ्तार घट गई है, काफी कुछ कहता है। कांग्रेस नेता ने कटाक्ष करते हुए कहा कि मोदी ने अर्थशास्त्रियों की सही सलाह पर भी ध्यान नहीं दिया, क्योंकि ''मोदीनोमिक्स के सहज ज्ञान को किसी सलाह की जरूरत नहीं है''।
सुरजेवाला की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब प्रधानमंत्री ने कृषि और ग्रामीण विकास, बेरोजगारी, निर्माण और निर्यात को लेकर नीति आयोग में देशभर के सभी क्षेत्रों के अग्रणी अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों से मुलाकात की है।
सुरजेवाला ने कहा कि आर्थिक गतिविधि के सही मापक योजित सकल मूल्य (जीवीए) में भी तीव्र गिरावट आई है।
देहरादून में भाजपा कार्यालय में आत्महत्या करने और अपने इस कदम के लिए नोटबंदी और जीएसटी को जिम्मेदार ठहराने वाले एक शख्स का जिक्र करते हुए सुरजेवाला ने कहा कि उस व्यापारी की मौत मोदी द्वारा पैदा की गई नोटबंदी और गब्बर सिंह टैक्स की त्रासदी के कारण हुई है।
उन्होंने साथ ही कहा कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य में 50 प्रतिशत से अधिक वृद्धि का वादा भी सबसे बड़ा झूठ साबित हुआ है, जिसके कारण उन्हें अपनी उपज को सड़क पर फेंकने पर मजबूर होना पड़ा।
भारत में चुनाव आयोग की हनक कायम करने वाले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन आज बुढ़ापे में संकट भरा जीवन गुजार रहे हैं। गुमनाम शख्स की तरह एक वृद्धाश्रम में उनकी जिंदगी कट रही है। उनके दौर के लोग बताते हैं कि उन्होंने इस कदर आयोग का रुतबा कायम किया था कि 90 के दशक में एक मजाक बहुत प्रचलित था कि 'भारत के नेता या तो खुदा से डरते हैं या फिर टीएन शेषन से।''
1955 में आईएएस टॉपर रहे टीएन शेषन ने जब 1990 में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार संभाला तो स्थितियां खराब थीं। चुनावों में बूथ कैप्चरिंग के लिए बिहार बदनाम रहता था। हिंसा और बड़े पैमाने पर गड़बडी़ होती थी। मगर उस वक्त टीएन शेषन ने कठोर कदम उठाया। कई चरणों में चुनाव कराने का फैसला किया। उस समय पांच चरणों में बिहार के चुनाव हुए। यहीं नही, एक रणनीति के तहत कई बार चुनाव तिथियों में फेरबदल भी किया। बूथ कैप्चरिंग रोकने के लिए पहली बार उन्होंने देश में केंद्रीय सुरक्षा बलों की निगरानी में चुनाव कराया। वर्ष 1997 में शेषन राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ चुके हैं, हालांकि उन्हें केआर नारायणन से हार का सामना करना पड़ा।
एनबीटी में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, चुनावों में पारदर्शिता लाने वाले शेषन आज चेन्नई में गुमनामी भरी जिंदगी जी रहे हैं। भूलने की बीमारी के भी शिकार हैं। स्वस्थ महसूस करने पर कभी अपने घर आ जाते हैं तो कभी 50 किलोमीटर दूर ओल्ड एज होम में रहने के लिए चले जाते हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 85 वर्षीय टीएन शेषन साईं बाबा के भक्त रहे। 2011 में साईं बाबा का निधन हुआ तो उन्हें सदमा पहुंचा। फिर भूलने की बीमारी हो गई। इस हाल में नजदीकी रिश्तेदारों ने एस एस एम रेजिडेंसी नामक वृद्धाश्रम में भर्ती करा दिया। करीब तीन साल उन्होंने ओल्ड एज होम में बिताए, बाद में स्वस्थ हुए तो घर लौट आए। अब भी वे कभी-कभी ओल्ड एज होम चले जाते हैं।
तमिलनाडु काडर के आईएएस अफसर टी एन शेषन ने 12 दिसंबर 1990 को देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पदभार संभाला था। इस पद पर वे 11 दिसंबर 1996 तक रहे। 1995 में उन्होंने पहली बार बिहार में निष्पक्ष चुनाव कराकर इतिहास रच दिया।
सख्ती के कारण कई नेताओं से उनका विवाद भी हुआ। इससे पहले 1992 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्होंने सभी आईएएस-आईपीएस अफसरों को दो टूक कह दिया था कि किसी भी तरह की गड़बड़ी होने पर वही जिम्मेदार होंगे। साथ ही 50 हजार अपराधियों को चेतावनी देते हुए कहा था कि या तो वे खुद को तुरंत पुलिस के हवाले कर दें या फिर अग्रिम जमानत लें, नहीं तो बख्शे नहीं जाएंगे। इसका असर हुआ कि उस समय उत्तर प्रदेश में भी शांतिपूर्वक और पारदर्शिता के साथ चुनाव हुए।
भारत में केंद्रीय विद्यालयों में प्रार्थना के जरिए खास धर्म को बढ़ावा देने की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। बुधवार को जारी इस नोटिस के बाद अब सरकार को सुप्रीम कोर्ट में चार हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट की इस पहल के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई। कहा जा रहा है कि प्रार्थना कोई नई बात नहीं है, बहुत पहले से होती चली आ रही है। इस पर विवाद बेवजह है। हालांकि याचिका दायर करने वाले वकील विनायक शाह का कहना है कि सरकारी विद्यालयों में ऐसी प्रार्थना नहीं होनी चाहिए, जिससे किसी विशेष धर्म (हिंदुत्व) को बढ़ावा मिलता हो।
याची ने आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा, ''केंद्रीय विद्यालयों में हिंदुत्व का प्रोपोगंडा किया जा रहा, चूंकि स्कूल सरकारी हैं, इस नाते इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।'' वकील ने दावे के समर्थन में कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के तहत सरकारी वित्तपोषित स्कूलों में धर्म विशेष को बढ़ावा देने वाला कोई आयोजन नहीं हो सकता।
जनहित याचिका को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह संवैधानिक मामला है। इस पर सुप्रीम कोर्ट विचार करेगा कि क्या देश के सभी केंद्रीय विद्यालयों में हकीकत में हिंदी की प्रार्थना धर्म विशेष को बढ़ावा दे रही है। क्या हिंदी की संबंधित प्रार्थना संविधान के मूल्यों के खिलाफ है?
गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने मंगलवार को हुंकार रैली की। दिल्ली के संसद मार्ग पर हुई रैली में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर बरसे। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी सरीखे असल मुद्दे केंद्र सरकार ने दबा दिए। घर वापसी, लव जिहाद और गाय जैसे मसलों को जगह दी गई। वे इसके खिलाफ हैं।
आपको बता दें कि गुजरात के नवनिर्वाचित विधायक जिग्नेश मेवाणी की अगुवाई में यहां युवा हुंकार रैली का आयोजन किया गया। सुरक्षा के लिहाज से आयोजन स्थल के आसपास भारी पुलिस तैनात किया गया था। अधिकारी अंतिम वक्त तक बोलते रहे कि मेवाणी को रैली करने के लिए अनुमति नहीं मिली थी।
हालांकि, उन्होंने रैली की, मगर वे यहां पर भीड़ जुटाने में नाकामयाब रहे है। महज 200 से 300 लोग ही उनकी इस रैली में हिस्सा लेने पहुंचे थे। संसद मार्ग थाने के पास इस दौरान बने मंच पर जवाहर लाल नेहरू विवि (जेएनयू) के पूर्व एवं वर्तमान छात्र-छात्राएं भी उपस्थित थे। रैली में वह बोले, ''हम पर भी मुकदमा दर्ज कर लिया। हम चुनाव लड़े और जीते। वही सिलाई मशीन .... पूरे कैंपेन में बोलते थे कि 22 साल में गुजरात में बोलने की राजनीति हुई। हम तो सिलाई मशीन वाले हैं। धागे से धागा जोड़कर राजनीति करने आए हैं। साथी कन्हैया, शेहला और बाकी साथियों का कहना सही है। हम लव जिहाद वाले नहीं हैं। हम 14 अप्रैल भी मनाएंगे और वैलेंटाइन डे भी मनाने वाले हैं। ये भी साफ कर दें कि जिस तरह गुजरात में अल्पेश ठाकुर, जिग्नेश मेवानी और हार्दिक ने मिल कर इनके घमंड को तोड़ा, उसी के चलते हमें टारगेट किया जा रहा है।''
मेवाणी ने असल मुद्दे उठाते हुए पूछा, ''मोदी जी, मैं आपके ही राज्य का हूं। आपको जवाब देना होगा। मध्य प्रदेश के किसानों पर गोलियां क्यों चलाई गईं? लव जिहाद के नाम पर राजनीति हुई। गाय के नाम पर राजनीति हुई। लव जिहाद के नाम पर सियासत की गई। विदेशों से कालाधन भी क्यों वापस नहीं लाया गया? युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिला?''
मेवाणी की हुंकार रैली का मकसद दलित संगठन भीम आर्मी संस्थापक चंद्रशेखर आजाद की रिहाई की मांग रखना और शैक्षणिक अधिकार, रोजगार, आजीविका और लैंगिक न्याय सरीखे मसलों पर ध्यान देना है। आजाद को बीते साल जून में हिमाचल से पुलिस ने पकड़ लिया था। उन्हें यूपी के सहारनपुर जिले में हुए ठाकुर-दलित संघर्ष का मुख्य आरोपी बताया गया है, जिसके चलते उनकी गिरफ्तारी हुई थी।
बीजेपी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शत्रुधन सिन्हा ने मुंबई के जुहू स्थित अपने आवास 'रामायण' में बीएमसी द्वारा तोड़फोड़ किए जाने पर शक जाहिर किया है कि कहीं पार्टी के कद्दावर नेता यशवंत सिन्हा का साथ देने का बदला तो उनसे नहीं लिया जा रहा है।
हालांकि, इस बावत उन्होंने साफ-साफ नहीं लिखा है, लेकिन सोशल मीडिया पर उन्होंने एक के बाद एक कुल छह ट्वीट किए हैं और लिखा है कि लोग उनसे पूछ रहे हैं कि कहीं यह बदला तो नहीं है। उन्होंने लिखा है कि हो सकता है कि लोगों की बातें सही भी हो क्योंकि पहले तो दिल्ली में हमारी सुरक्षा हटाई गई और अब मुंबई में बिल्डिंग में तोड़फोड़ की गई है।
शत्रुघ्न सिन्हा ने लिखा है, ''मुंबई स्थित मेरे घर 'रामायण' में बीएमसी द्वारा की गई तोड़फोड़ की न्यूज चैनलों पर काफी चर्चा है। लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि क्या महाराष्ट्र के सतारा में किसानों के मुद्दे पर राजनेता यशवंत सिन्हा का साथ देने और तथ्यों, आंकड़ों और सच्चाई को सामने लाने की ईमानदार राजनीति की कीमत तो मैं नहीं चुका रहा हूं। मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं है।''
दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा है, ''हो सकता है, वो सही हों। पहले तो दिल्ली में हमारी सुरक्षा हटाई गई और अब मुंबई में मेरे घर पर तोड़फोड़। हो सकता है कि मुंबई के रेस्टोरेन्ट में आग लगने की घटना के बाद बीएमसी ने यह कार्रवाई की हो। मैं इसका स्वागत करता हूं। अगर ऐसा है तो यह आगे भी जारी रहना चाहिए।''
शत्रुघ्न सिन्हा ने बीएमसी द्वारा की गई कार्रवाई का विवरण भी दिया है। उन्होंने लिखा है कि घर में काम करने वाले सहायकों के इस्तेमाल के लिए घर की छत पर एक शौचालय बनवाया था जिसे बीएमसी द्वारा तोड़ा गया है।
उन्होंने लिखा है कि मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है। पूजा घर भी वहां से हटा दिया गया है, उसे शिफ्ट किया जा रहा है।
बता दें कि भाजपा सांसद और अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की आठ मंजिला आवासीय इमारत के अवैध विस्तार एवं निर्माण को बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने मंगलवार (09 जनवरी) को गिरा दिया है।
बीएमसी जब यह कार्रवाई कर रही थी। बीजेपी सांसद उस वक्त घर पर ही थे।
पटना साहिब से सांसद शत्रुधन सिन्हा कई मुद्दों पर भाजपा की नीतियों से असहमति जता चुके हैं। आधार कार्ड की जानकारियां लीक होने पर चल रही बहस पर भी उन्होंने सोमवार को अपनी राय जाहिर की थी और कहा था कि आधार ब्यौरे के दुरुपयोग को रेखांकित करने वाली खबर देने वाली पत्रकार को कथित सच्चाई सामने लाने के लिए परेशान किया जा रहा है और पूछा कि क्या देश के लोग किसी 'बनाना रिपब्लिक' में रह रहे हैं।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव सीताराम येचुरी ने मंगलवार को कहा कि भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ 2019 का लोकसभा चुनाव संयुक्त रूप से लड़ने के लिए उनकी पार्टी सभी विपक्षी दलों से संपर्क करेगी।
गैर भाजपा, गैर राजग दलों को मिलाकर भाजपा के खिलाफ संयुक्त चुनावी लड़ाई के बारे में पूछे जाने पर येचुरी ने कहा, ''हमें नेता नहीं, नीति चाहिए। हम सभी राजनैतिक दलों से वैकल्पिक सामाजिक व आर्थिक नीतियों के आधार पर साथ आने के लिए कहेंगे।''
येचुरी चुनावी बॉन्ड पर वित्तमंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखने के बाद संवाददाताओं से बात कर रहे थे। उन्होंने इन चुनावी बॉन्ड को प्रतिगामी कदम बताया और कहा कि यह धन शोधन को वैध बना देगा।
माकपा नेता ने विधायक व दलित नेता जिग्नेश मेवानी को दिल्ली में मार्च निकालने की इजाजत नहीं देने के लिए दिल्ली पुलिस की निंदा की और कहा कि यह भाजपा सरकार के 'गैर लोकतांत्रिक स्वरूप' को दिखाता है।
उन्होंने कहा कि यह दलित विरोधी रुख है। माकपा नेता ने कहा कि जीडीपी में गिरावट, कुपोषण, बेरोजगारी के कारण आने वाले दिनों में और बड़े जनसंघर्ष होंगे। येचुरी ने कहा कि शासन व अर्थव्यवस्था को लेकर पैदा गुस्से को भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तरफ मोड़ रही है।
माकपा महासचिव ने सरकार की विदेश नीति का विरोध करते हुए कहा कि इसमें एक बड़ा बदलाव आया है और देश को 'अमेरिका के वैश्विक रणनीतिक हितों के सहायक' के रूप में देखा जाने लगा है। अमेरिका समर्थक यह नीति भारतीय हितों के प्रतिकूल है।
गौरतलब है कि पिछले दिनों महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव हिंसा पर भी नाराजगी जताते हुए सीताराम येचुरी ने इसे दलित विरोधी मानसिकता का प्रहार बताया था।
येचुरी ने आरोप लगाया था कि राष्ट्रवाद की बात करने वाली बीजेपी के लिए दलितों की परिभाषा अलग रखी गई है। उन्होंने सवालिया लहजे में ट्वीट किया था, ''क्या भाजपा दलितों को भारत का हिस्सा मानती है या नहीं? या उन्हें भारतीय होने की परिभाषा से ही बाहर रखा गया है? केवल यहीं बात महाराष्ट्र हिंसा पर सरकार की चुप्पी को बता सकती है।









